नाम सूखाताल, लेकिन नैनी झील को देती है वर्ष भर और सर्वाधिक 77 प्रतिशत पानी


Sukhatal as it today
Sukhatal as it today

जानें कहां से कितना आता और कहां कितना जाता है नैनी झील का पानी

Water Flowing in Nainital Skeetch-IIT Roorkee (2002)
Water Flowing in Nainital Skeetch-IIT Roorkee (2002)

नवीन जोशी, नैनीताल। आईआईटीआर रुड़की के अल्टरनेट हाइड्रो इनर्जी सेंटर (एएचईसी) द्वारा वर्ष 1994 से 2001 के बीच किये गये अध्ययनों के आधार पर 2002 में जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार नैनीताल झील में सर्वाधिक 53 प्रतिशत पानी सूखाताल झील से जमीन के भीतर से होकर तथा 24 प्रतिशत सतह पर बहते हुऐ (यानी कुल मिलाकर 77 प्रतिशत) नैनी झील में आता है। इसके अलावा 13 प्रतिशत पानी बारिश से एवं शेष 10 प्रतिशत नालों से होकर आता है। वहीं झील से पानी के बाहर जाने की बात की जाऐ तो झील से सर्वाधिक 56 फीसद पानी तल्लीताल डांठ को खोले जाने से बाहर निकलता है, 26 फीसद पानी पंपों की मदद से पेयजल आपूर्ति के लिये निकाला जाता है, 10 फीसद पानी झील के अंदर से बाहरी जल श्रोतों की ओर रिस जाता है, जबकि शेष आठ फीसद पानी सूर्य की गरमी से वाष्पीकृत होकर नष्ट होता है। पढ़ना जारी रखें “नाम सूखाताल, लेकिन नैनी झील को देती है वर्ष भर और सर्वाधिक 77 प्रतिशत पानी”

सूखाताल से निकलने वाली नदी से हुआ था नैनी झील का निर्माण


Catchment Area of Sukhatal in Nainital's Survey of India Map (1936)
Catchment Area of Sukhatal in Nainital’s Survey of India Map (1936)

-सेंट जोन्स चर्च व तल्लीताल डांठ के पास नदी का मार्ग अवरुद्ध होने से बनी झीलें
नवीन जोशी, नैनीताल। कुमाऊं विवि के सेवानिवृत्त प्रोेफेसर वरिष्ठ भूगोलविद् एवं नैनी झील पर गहन शोधरत प्रो.जीएल साह ने अपने शोध के उपरांत निश्कर्ष निकाला है कि विश्व प्रसिद्ध नैनी झील का निर्माण लाखों वर्ष पूर्व एक नदी का मार्ग अवरुद्ध होने की वजह से हुआ होगा। संभवतया बलिया नाम की उस नदी का उद्गम स्थल आज की सूखाताल झील के पास रहा होगा। इस नदी में वर्तमान सेंट जोन्स चर्च के पास तथा तल्लीताल डांठ के पास भूगर्भीय हलचलों की वजह से नगर की पूर्वी व पश्चिमी ओर की पहाड़ियां शेर का डांडा और अयारपाटा में विचलन से हुए भूस्खलन की वजह से नदी का मार्ग अवरुद्ध हो गया होगा, और इस प्रकार आज की नैनी झील और सूखाताल झील का निर्माण हुआ होगा।

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नैनी झील एवं नैनीताल नगर के बारे में नगर वासियों की संवेदनशीलता का परीक्षण करने के लिए किया गया एक लघु शोध


Mandir-Gurudwara, Nainital

यह नैनीताल पर एक लघु शोध प्रबंध है, इसे इस लिंक पर क्लिक कर फॉर्मेट में भी देखा-पढ़ा जा सकता है @ Research Analysis on Nainital
जल को हमेशा से जीवन कहा जाता है। जल देश-प्रदेश पढ़ना जारी रखें “नैनी झील एवं नैनीताल नगर के बारे में नगर वासियों की संवेदनशीलता का परीक्षण करने के लिए किया गया एक लघु शोध”

नैनी झील के बाबत उम्मीद की किरणें


Mandir-Masjid-Gurudwara, Nainital
Mandir-Masjid-Gurudwara, Nainital

Also can be seen in PDF format by clicking Here @ ummend ki kiran

अमेरिकी ‘औगर’ मशीन रख सकती है नैनी झील की सेहत का खयाल

विश्व प्रसिद्ध नैनी झील को नव जीवन देने के लिये एरियेशन जैसी ही बढ़ी सफलता मिलने की उम्मीद बांधी जा सकती है। एरियेशन से जहां दो तिहाई मृत हो  पढ़ना जारी रखें “नैनी झील के बाबत उम्मीद की किरणें”

नैनी झील के बारे में कुछ चिंतित करने वाले तथ्य


Sukhatal, Rarely Filled with Water in Nainital
Sukhatal, Rarely Filled with Water in Nainital

लगातार सिकुड़ रही है नैनी झील, 2100 वर्ष ही बची है उपयोगी आयु

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सत्याग्रह के लिए गांधी जी को भी झुका दिया था डुंगर सिंह ने


Freedom Fighter Dungar Singh Bisht
Freedom Fighter Dungar Singh Bisht

नवीन जोशी नैनीताल। जिद यदि नेक उद्देश्य के लिए हो और इच्छाशक्ति के साथ की जाए तो फिर पहाड को भी झुकना पड़ता है। जिस अहिंसा और सत्याग्रह के मार्ग से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कभी अपने राज्य में सूर्य के न छिपने के घमंड वाले अंग्रेजों को झुका कर देश से बाहर खदेड़ दिया था, उसी अहिंसा और सत्याग्रह की जिद से पहाड़ के एक बेटे ने महात्मा गांधी को भी झुका दिया था। राष्ट्रपिता के समक्ष भी ऐसे कम ही अनुभव आए होंगे, जहां उन्हें किसी ने अपना निर्णय बदलने को मजबूर किया होगा। देश को आजाद कराने के लिए गांधी जी के ऐसे ही एक जिद्दी सिपाही और स्वतंत्रता सेनानी का नाम डुंगर सिंह बिष्ट था, जो आज 98 वर्ष की आयु में इस दुनिया को अलविदा कह गए। 

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1899 Photo Taken by Lawrie & Company.

नैनीताल में विरासत महत्व के भवन


नैनीताल। 18 नवंबर 1841 में बसे नैनीताल के प्रमुख विरासत महत्व के भवनों में नगर का पहला भवन पिलग्रिम हाउस (1841), सेंट जॉन्स इन विल्डरनेस चर्च (1846), मेथोडिस्ट चर्च व सीआरएसटी इंटर कालेज (1858), शेरवुड कालेज (1869), नैनीताल क्लब (1877) … पढ़ना जारी रखें नैनीताल में विरासत महत्व के भवन

श्री नंदादेवी राजजात से कुमाऊं गढ़वाल दोनों के राज परिवार संतुष्ट नहीं


नवीन जोशी, नैनीताल। माता नंदा देवी उत्तराखंड राज्य के दोनों अंचलों-कुमाऊं व गढ़वाल में समान रूप से पूज्य एवं दोनों अंचलों को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में पिरोने वाली देवी हैं, और उनकी कमोबेश हर 12 वर्ष में आयोजित होने वाला और विश्व का अनूठा हिमालयी सचल महाकुंभ कही जाने वाली श्री नंदा देवी राजजात यात्रा मूलतः यहां के दोनों राजाओं की यात्रा है। अंग्रेजी शासनकाल में अंग्रेजों के साथ ही आजादी के बाद यूपी के दौर में यूपी सरकार ने कभी इसके आयोजन में हस्तक्षेप नहीं किया, और राजाओं के वंशजों को ही यात्रा कराने दी। लेकिन उत्तराखंड बनने के बाद पहली बार और पिछले वर्ष आई आपदा के कारण टलने के बाद 14 वर्षों के बाद हो रही यात्रा को प्रदेश सरकार ने अपने हाथ में लिया है। यात्रा पर सरकार करीब एक करोड़ रुपए खर्च कर रही है, लेकिन सरकार द्वारा इसके आयोजन को हाथ में लिए जाने से यात्रा राजाओं के वंशजों और उनकी प्रजा तथा पारंपरिक व धार्मिक स्वरूप की कम सरकारी स्वरूप की और सरकार द्वारा खर्ची जा रही करीब एक करोड़ रुपए को खपाने-कमाने की जुगत अधिक नजर आने लगी है। इससे दोनों राजाओं के वंशज भी संतुष्ट पढ़ना जारी रखें “श्री नंदादेवी राजजात से कुमाऊं गढ़वाल दोनों के राज परिवार संतुष्ट नहीं”

नैनीताल में ‘नेचुरल एसी’ बना कौतूहल का केंद्र


Chill Point Nainital -बारापत्थर चौराहे पर सैलानी आकर लेने लगे हैं इसका अनुभव सरोवरनगरी में एक पहाड़ी चट्टान पर प्रकट हुआ ‘नेचुरल एसी’ सैलानियों के साथ ही नगरवासियों के बीच भी आकर्षण और कौतूहल का केंद्र बना हुआ है। सैलानी और स्थानीय लोग इसकी सत्यता जांचने और अनुभव लेने यहां पहुंच रहे हैं। नगर में कालाढुंगी रोड पर बारापत्थर चौराहे के पास पंगोट जाने वाली सड़क से दो-चार कदमों की ऊंचाई पर यह ‘नेचुरल एसी’ बाहर से एक चट्टानी दरार के रूप में नजर आता है। नैनीताल में ‘नेचुरल एसी’ बना कौतूहल का केंद्र दरार भीतर की ओर बंद होती … पढ़ना जारी रखें नैनीताल में ‘नेचुरल एसी’ बना कौतूहल का केंद्र

मेरी कुमाउनी कविताओं की पुस्तक-उघड़ी आंखोंक स्वींड़ और कुमाउनी नाटक-‘जैल थै, वील पै’ पीडीएफ फॉर्मेट में


कुमाउनी का पहला PDF फार्मेट में भी उपलब्ध कविता संग्रह-“उघड़ी आंखोंक स्वींण” और खास तौर पर अपने सहपाठियों को समर्पित नाटक-“जैल थै, वील पै“ लिंक क्लिक कर देखें। उघड़ी आंखोंक स्वींण पढ़ना जारी रखें मेरी कुमाउनी कविताओं की पुस्तक-उघड़ी आंखोंक स्वींड़ और कुमाउनी नाटक-‘जैल थै, वील पै’ पीडीएफ फॉर्मेट में

उत्तराखंड से पहले मुख्य न्यायाधीश और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश बने न्यायमूर्ति प्रफुल्ल चंद्र पंत


नैनीताल (एसएनबी)। उत्तराखंड उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के बाद मेघालय हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने न्यायमूर्ति प्रफुल्ल चंद्र पंत सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश बनाए गए हैं। इस तरह वह यह दोनों उपलब्धियां हासिल करने वाले उत्तराखंड राज्य के पहले व्यक्ति भी बन गए हैं।गत वर्ष 18 सितंबर को राष्ट्रपति की स्वीकृति पर न्याय विभाग के संयुक्त सचिव प्रवीण गर्ग की ओर से उन्हें मेघालय हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश नियुक्ति का नोटिफिकेशन उत्तराखंड उच्च न्यायालय में मिला था। इसके बाद वह दिल्ली रवाना हो गए। न्यायमूर्ति पंत उत्तराखंड के पहले निवासी हैं जो किसी प्रदेश के मुख्य न्यायाधीश बने और अब सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीष पद पर उनकी नियुक्ति हुई है। उनसे पूर्व न्यायमूर्ति बीसी कांडपाल को ही उत्तराखंड हाई कोर्ट के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्यरत रहने का गौरव प्राप्त हुआ था, जबकि उत्तराखंड उच्च न्यायालय के वर्तमान कार्यकारी न्यायाधीश न्यायमूर्ति बीके बिष्ट भी उत्तराखंड के ही हैं।

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नैनीताल और नैनी झील के कई जाने-अनजाने पहलू


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Early Nainital

सरोवर नगरी नैनीताल को कभी विश्व भर में अंग्रेजों के घर ‘छोटी बिलायत’ के रूप में जाना जाता था, और अब नैनीताल के रूप में भी इस नगर की वैश्विक पहचान है। इसका श्रेय केवल नगर की अतुलनीय, नयनाभिराम, अद्भुत, अलौकिक जैसे शब्दों से भी परे यहां की प्राकृतिक सुन्दरता को दिया जाऐ तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
नैनीताल की वर्तमान रूप में खोज करने का श्रेय अंग्रेज व्यवसायी पीटर बैरन को जाता है, कहते हैं कि उनका शाहजहांपुर के रोजा नाम के स्थान में शराब का कारखाना था। कहा जाता है कि उन्होंने 18 नवम्बर 1841 को नगर की खोज की थी। बैरन के हवाले से सर्वप्रथम 1842 में आगरा अखबार में इस नगर के बारे में समाचार छपा, जिसके बाद 1850 तक यह नगर ‘छोटी बिलायत’ के रूप में देश-दुनियां में प्रसिद्ध हो गया। कुमाऊं विश्वविद्यालय के विज्ञान संकाय एवं भूविज्ञान विभाग के अध्यक्ष भूगर्भ वेत्ता प्रो.सीसी पंत के अनुसार बैरन ने ईस्ट इंडिया कंपनी के लोगों को दिखाने के लिये लंदन की पत्रिका National Geographic में भी नैनीताल नगर के बारे में लेख छापा था। 1843 में ही नैनीताल जिमखाना की स्थापना के साथ यहाँ खेलों की शुरुआत हो गयी थी, जिससे पर्यटन को भी बढ़ावा मिलने लगा। 1844 में नगर में पहले ‘सेंट जोन्स इन विल्डरनेस’ चर्च की स्थापना हुई। 1847 में यहां पुलिस व्यवस्था शुरू हुई। 1862 में यह नगर तत्कालीन नोर्थ प्रोविंस (उत्तर प्रान्त) की ग्रीष्मकालीन राजधानी व साथ ही लार्ड साहब का मुख्यालय बना साथ ही 1896 में सेना की उत्तरी कमांड का एवं 1906 से 1926 तक पश्चिमी कमांड का मुख्यालय रहा। 1872 में नैनीताल सेटलमेंट किया गया। 1880 में नगर का ड्रेनेज सिस्टम बनाया गया। 1881 में यहाँ ग्रामीणों को बेहतर शिक्षा के लिए डिस्ट्रिक्ट बोर्ड व 1892 में रेगुलर इलेक्टेड बोर्ड बनाए गए। 1892 में ही विद्युत् चालित स्वचालित पम्पों की मदद से यहाँ पेयजल आपूर्ति होने लगी। 1889 में 300 रुपये प्रतिमाह के डोनेशन से नगर में पहला भारतीय कॉल्विन क्लब राजा बलरामपुर ने शुरू किया। कुमाऊँ में कुली बेगार आन्दोलनों के दिनों में 1921 में इसे पुलिस मुख्यालय भी बनाया गया। वर्तमान में यह  कुमाऊँ मंडल का मुख्यालय है, साथ ही यहीं उत्तराखंड राज्य का उच्च न्यायालय भी है। यह भी एक रोचक तथ्य है कि अपनी स्थापना के समय सरकारी दस्तावेजों में 1842 से 1881 तक यह नगर नइनीटाल (Nynee tal) तथा इससे पूर्व 1823 में यहाँ सर्वप्रथम पहुंचे पहले कुमाऊं कमिश्नर जी डब्लू ट्रेल द्वारा 1828 में नागनी ताल (Nagni Tal) भी लिखा गया। पढ़ना जारी रखें “नैनीताल और नैनी झील के कई जाने-अनजाने पहलू”

नैनीताल आएं तो जरूर ले जाएं यहाँ के प्रसिद्ध काष्ठ उत्पाद


-सरोवरनगरी की पहचान हैं चीड़ के ठींठों व ड्रिफ्टवुड से बने कलात्मक उत्पाद नवीन जोशी नैनीताल। सरोवरनगरी आने वाले सैलानी नगर की यादगार के रूप में जो कुछ अनूठी वस्तुएं ले जाते हैं, उनमें नगर की बनी मोमबत्तियों के साथ काष्ठ उत्पादों का खास महत्व है। नगर में लंबे दौर से कलाकारों चीड़ के ठींठों और नदियों में बहकर आने वाली लकड़ियों (ड्रिफ्टवुड) को अपनी कलाकारी से खूबसूरत उत्पादों में बदलकर न केवल अलग पहचान बनाई है, वरन इसे अपनी आजीविका आजीविका भी बनाया हुआ है। लेकिन हाल के वर्षों में नैनीताल की यह कला किसी भी तरह के सरकारी … पढ़ना जारी रखें नैनीताल आएं तो जरूर ले जाएं यहाँ के प्रसिद्ध काष्ठ उत्पाद