पाषाण युग से यायावरी का केंद्र रहा है कुमाऊं


Lakhu udiyar (3)

-पाषाणयुगीन हस्तकला को संजोए लखु उडियार से लेकर रामायण व महाभारत काल में हनुमान व पांडवों से लेकर प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग, आदि गुरु शंकराचार्य, राजर्षि विवेकानंद, महात्मा गांधी व रवींद्रनाथ टैगोर सहित अनेकानेक ख्याति प्राप्त जनों के कदम पड़े

-इनके पथों को भी विकसित किया जाए तो लग सकते हैं कुमाऊं के पर्यटन को पंख
नवीन जोशी, नैनीताल। जी हां, उत्तराखंड का प्राकृतिक व सांस्कृतिक तौर पर समृद्ध कुमाऊं अंचल युग-युगों से प्रकृति की गोद में ज्ञान और शांति की तलाश में आने वाले लोगों की सैरगाह और पर्यटन के लिए पहली पसंद रहा है। पाषाण युग की हस्तकला आज भी यहां अल्मोडा के पास लखु उडियार नाम के स्थान पर सुरक्षित है जो उस दौर में भी यहां मानव कदमों के पड़ने और उनकी कला प्रियता के साक्षी हैं। त्रेता युग में रामायण के कई चरित्र व महाभारत काल में कौरव-पांडवों से लेकर आगे प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग, आदि गुरु शंकराचार्य, राजर्षि स्वामी विवेकानंद, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर, घुमक्कड़ी साहित्य लेखक राहुल सांस्कृत्यायन, सुप्रसिद्ध छायावादी कवयित्री महादेवी वर्मा सहित अनेकानेक ख्याति प्राप्त जनों के कदम यहां पड़े। वहीं स्कंद पुराण के मानसखंड में देवभूमि के रूप में वर्णित अनेकों धार्मिक महत्व के स्थलों से लेकर दुनिया के सबसे ऊंचे श्वेत-धवल नगाधिराज हिमालय पर्वत के अलग-अलग कोणों से सुंदरता के साथ दर्शन कराने वाले और अपनी आबोहवा से बीमार मानवों को प्राकृतिक उपचार से नवयौवन प्रदान करने तथा समृद्ध जैव विविधता और वन्य जीवों से परिपूर्ण जिम कार्बेट पार्क व अस्कोट मृग विहार जैसी अनेकों खूबियों वाले यहां के सुंदर पर्यटन स्थल मानव ही नहीं, पक्षियों को भी आकर्षित करते हैं, और इस कारण पक्षियों के भी पसंदीदा प्रवास स्थल हैं। कुमाऊं में इनके अलावा भी अपनी अलग वास्तुकला, सदाबहार फल-फूल, समृद्ध जैव विविधता के साथ ईको-टूरिज्म तथा ऐसी अनेकों विशिष्टताएं (आधुनिक पर्यटन के लिहाज से यूएसपी) हैं कि इनका जरा भी प्रयोग किया जाए तो कुमाऊं में वर्ष भर कल्पना से भी अधिक संख्या में पर्यटक आ सकते हैं। पढ़ना जारी रखें “पाषाण युग से यायावरी का केंद्र रहा है कुमाऊं”

अब बच्चों को लगेगा केवल एक “पेंटावैलेंट टीका”


  • प्रदेश में योजना की शुरुआत आगामी एक जनवरी को  होगी मुख्यमंत्री के हाथों
  • एक टीके से ही हो जायेगा पांच बीमारियों का इलाज
  • बाजार से नहीं खरीदना पड़ेगा हिब का महंगा टीका
  • नौ की जगह बच्चों को लगानी पड़ेंगी सिर्फ तीन सुइयां

नैनीताल। एक वर्ष के बच्चों को अब तक नौ सुइयां लगाकर तीन टीके लगाए जाते हैं तथा इनमें से भी एक महंगा (करीब 700-800 रुपये का) हिब यानी हिमोफिलिस इंफ्लूऐंजा-बी का टीका बाजार से खरीदकर लगाना पड़ता है। लेकिन अब बच्चों को वर्ष भर में नौ की जगह केवल तीन बार ही पेंटावैलेंट टीके की एक-एक सुइयां लगानी पड़ेंगी। हर बार एक सुई से लगने वाले टीके से बच्चे पांच खतरनाक बीमारियों- गलघोंटू, काली खांसी, टिटनेस, हेपेटाइटिस बी और हिमोफिलस इंफ्लूएंजा टाइप-बी से सुरक्षित हो जाएंगे। यह टीके बच्चों को जन्म के छह, 10 व 14 सप्ताह होने पर लगाए जाएंगे। प्रदेश में योजना की शुरुआत आगामी एक जनवरी को मुख्यमंत्री के हाथों हो सकती है। पढ़ना जारी रखें “अब बच्चों को लगेगा केवल एक “पेंटावैलेंट टीका””

वार्षिक प्रवास पर कजाकिस्तान से नैनीताल पहुंचे खास दीवाने परवाने


-नैनीताल पहुंचे प्रवासी पक्षी स्टीपी ईगल, आगे देश-दुनिया के पक्षी प्रेमियों के भी आने की उम्मीद
नवीन जोशी, नैनीताल। जी हां, इश्क हो तो एसा। कजाकिस्तान से बिना नागा किए स्टीपी ईगल नाम का शिकारी और प्राकृतिक स्वच्छक प्रजाति का पक्षी अपने शीतकालीन प्रवास पर ‘पक्षियों के तीर्थ” कहे जाने वाले नैनीताल पहुंच गया है। आगे यह पक्षी यहां करीब दो माह के प्रवास पर रहेगा और सहवास करते हुए अपनी नई संतति को भी जन्म देगा। इसके साथ ही देश-दुनिया के पक्षी प्रेमी भी स्टीपी ईगल तथा उस जैसे अनेकों स्थानीय और प्रवासी पक्षियों की खूबसूरती को निहारने के लिए नैनीताल और नजदीकी क्षेत्रों का रुख करने लगे हैं। ऐसे में मानव प्रेमियों के साथ ही पक्षियों और उनके प्रेमियों के मिलन स्थल बने नैनीताल में ऐसे और भी नजारे इन दिनों आम बने हुए हैं। पढ़ना जारी रखें “वार्षिक प्रवास पर कजाकिस्तान से नैनीताल पहुंचे खास दीवाने परवाने”

स्विट्जरलेंड-मसूरी की तरह प्रकृति के स्वर्ग सरोवरनगरी से भी दिखती है ‘विंटर लाइन’


नैनी झील व नगर के साथ 'विंटर लाइन' का विहंगम नजारा।
नैनी झील व नगर के साथ ‘विंटर लाइन’ का विहंगम नजारा।

-दुनिया में केवल स्विटजरलैंड की बान वैली और मसूरी के लाल टिब्बा से ही नजर आती है कुदरत की यह अनूठी नेमत
नवीन जोशी, नैनीताल। प्रकृति के स्वर्ग कही जाने वाली सरोवरनगरी पर कुदरत एक बार फिर नया तोहफा लेकर मेहरबान हुई है। यह तोहफा ऐसा है जिसे प्रकृति प्रेमी ‘विंटर लाइन” के नाम से जानते हैं। कुदरत की इस अनूठी नेमत ‘विंटर लाइन” के बारे में कहा जाता है कि यह दुनिया में केवल स्विटजरलैंड की बान वैली और मसूरी के लाल टिब्बा से ही नजर आती है। मसूरी में बीते वर्ष से इस अवसर पर ‘विंटर लाइन महोत्सव’ मनाने की शुरुआत भी हुई थी, जबकि नैनीताल अभी इस बारे में भाग्यशाली साबित नहीं हुई है। नगर में भी ऐसे महोत्सव की खासकर शरदोत्सव या इस वर्ष से शुरू होने जा रहे ‘नैनीताल शीतोत्सव’ (नैनीताल विंटर कार्निवाल) से जोड़ते हुए अच्छी संभावना बनती है। पढ़ना जारी रखें “स्विट्जरलेंड-मसूरी की तरह प्रकृति के स्वर्ग सरोवरनगरी से भी दिखती है ‘विंटर लाइन’”

बैरन (18 नवंबर 1841) से पहले ही 1823 में नैनीताल आ चुके थे कमिश्नर ट्रेल


nainital panorama

-नैनीताल की आज के स्वरूप में स्थापना और खोज को लेकर ऐतिहासिक भ्रम की स्थिति
नवीन जोशी, नैनीताल। इतिहास जैसा लिख दिया जाए, वही सच माना जाता है, और उसमें कोई झूठ हो तो उस झूठ को छुपाने के लिए एक के बाद एक कई झूठ बोलने पड़ते हैं। प्रकृति के स्वर्ग नैनीताल के साथ भी ऐसा ही है। युग-युगों पूर्व स्कंद पुराण के मानस खंड में त्रिऋषि सरोवर के रूप में वर्णित इस स्थान के बारे में कहा जाता है कि सर्वप्रथम पीटर बैरन नाम का अंग्रेज व्यापारी 18 नवंबर 1841 को यहां पहुंचा, और नगर में अपना पहला घर-पिलग्रिम लॉज बनाकर नगर को वर्तमान स्वरूप में बसाना प्रारंभ किया। लेकिन अंग्रेजी दौर के अन्य दस्तावेज भी इसे सही नहीं मानते। उनके अनुसार 1823 में ही कुमाऊं के दूसरे कमिश्नर जॉर्ज विलियम ट्रेल यहां पहुंच चुके थे और इसकी प्राकृतिक सुन्दरता देखकर अभिभूत थे, लेकिन उन्होंने इस स्थान की सुंदरता और स्थानीय लोगों की धार्मिक मान्यताओं के मद्देनजर इसे न केवल अंग्रेज कंपनी बहादुर की नजरों से छुपाकर रखा, वरन स्थानीय लोगों से भी इस स्थान के बारे में किसी अंग्रेज को न बताने की ताकीद की थी। इसके अलावा भी बैरन के 1841 की जगह 1839 में पहले भी नैनीताल आने की बात भी कही जाती है। पढ़ना जारी रखें “बैरन (18 नवंबर 1841) से पहले ही 1823 में नैनीताल आ चुके थे कमिश्नर ट्रेल”

बारिश का पानी बचाने पर उत्तराखंड देगा ‘वाटर बोनस”


Pagot Fall

नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि उत्तराखंड स्वयं से इतर पूरे उत्तर भारत के पर्यावरण को प्रभावित करता है, लिहाजा केंद्र सरकार को उत्तराखंड के सरोकारों से जुड़कर गंगा को बचाने की शुरुआत करनी चाहिए। रविवार को नैनीताल क्लब के शैले हॉल में भारत विश्व प्रतिष्ठान द्वारा आयोजित ‘हिमालयी क्षेत्रो में महिलाओं की पर्यावरण संबंधी चुुनौतियां” विषय पर आयोजित संगोष्ठी का शुभारंभ करने के उपरांत श्री रावत ने कहा कि उत्तराखंड चाल-खाल बनाकर बारिश के पानी को बचाने वाले लोगों को बचाए गए पानी का आंकलन कराकर ‘वाटर बोनस” देने की अनूठी पहल करने जा रहा है। पढ़ना जारी रखें “बारिश का पानी बचाने पर उत्तराखंड देगा ‘वाटर बोनस””

हरीश रावत से मंच साझा कर उन्ही पर सवाल उठाए आचार्य कृष्णन ने


 

-कहा, रावत व रामदेव की दोस्ती की ‘दाल में जरूर कुछ काला है”, नरेंद्र मोदी को देश की शान बताया
नवीन जोशी, नैनीताल। कल्कि धाम के पीठाधीश्वर एवं कांग्रेस पार्टी से लोक सभा का चुनाव लड़ चुके आचार्य प्रमोद कृष्णन ने शुक्रवार को मुख्यालय में मुख्यमंत्री हरीश रावत के साथ भारत विश्व प्रतिष्ठान द्वारा आयोजित संगोष्ठी में न केवल मंच साझा किया, वरन सीएम का झुककर स्वागत करने के साथ उनके ठीक बगल में बैठकर काफी गुफ्तगू भी की, लेकिन संगोष्ठी से पहले बाबा रामदेव को अन्य संतों के साथ केदारनाथ धाम की यात्रा कराए जाने को लेकर सीएम पर सवाल भी उठाए। कहा, मुख्यमंत्री रावत और रामदेव की नजदीकी सवालों के घेरे में है। सोनिया-राहुल को गाली देने वाले रामदेव उत्तराखंड सरकार के मित्र कैसे हो सकते हैं। कहा, दोनों की दोस्ती की ‘दाल में जरूर कुछ काला है”। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश की शान बताते हुए कहा कि उनकी योजनाएं अच्छी हैं, अलबत्ता उनका परिणाम आने में अभी समय लगेगा। लेकिन वह दुनिया में भारत का नाम ऊंचा कर रहे हैं। पढ़ना जारी रखें “हरीश रावत से मंच साझा कर उन्ही पर सवाल उठाए आचार्य कृष्णन ने”

हरीश रावत : यह हश्र तय ही था शायद !


आखिर फ़रवरी 2014 में अपने ही एक कार्यकर्ता को झन्नाटेदार झापड़ मारने से त्तराखंड राज्य के आठवें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण करने वाले हरीश रावत की बीती 18 मार्च 2016 को विधान सभा में मंत्रिमंडलीय सहयोगियों के बीच हुई मारपीट से पतन की कहानी शुरू हुई, और आखिर 27 मार्च को उनकी दो वर्ष एक माह लम्बी पारी का समापन हो गया। उनके इस हश्र की आशंका पहले ही जता दी गयी थी।

  • राष्ट्रपति शासन 27 फ़रवरी को : 7 + 2 = 9
  • विधायक बागी हुए = 9
  • वर्ष 2016 = 2 + 0 +1 + 6 = 9
  • राज्य को अब मिलेगा नौवां मुख्यमंत्री
  • तो क्या 9 का अंक हुआ रावत के लिए अशुभ, क्या घोड़े (Horse) से शुरू हुई उत्तराखंड की राजनीति में Horse Trading के आरोपों के बाद रावत को पड़ी ‘नौ’लत्ती

त्तराखंड राज्य के आठवें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण करने वाले हरीश रावत की धनै के पीडीएफ से इस्तीफे, महाराज के आशीर्वाद बिना और झन्नाटेदार थप्पड़ जैसे एक्शन-ड्रामा के साथ हुई ताजपोशी के बाद यही सबसे बड़ा सवाल उठ रहा है कि क्या रावत अपना बोया काटने से बच पाएंगे। इस बाबत आशंकाएं गैरवाजिब भी नहीं हैं। रावत के तीन से चार दशक लंबे राजनीतिक जीवन में उपलब्धियों के नाम पर वादों और विरोध के अलावा कुछ नहीं दिखता।

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क्यों ना पहाड़ों पर बुलडोजर चला दें : हरीश रावत


नवीन जोशी नैनीताल। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने नैनीताल हाईकोर्ट में यह टिप्पणी की। कहा, अधिकारियों-कर्मचारियों को सरकार गाड़ी और बंगले उपलब्ध कराने के साथ पहाड़ भेज रही है, और वह आदेश पाकर ऐसे प्रतिक्रिया कर रहे हैं, मानो किसी ने उनके मुंह में नींबू डाल दिया हो। उन्होंने इसे राज्य की सबसे बड़ी परेशानी और इस समस्या से निपटने को सबसे बड़ी चुनौती बताते हुए टिप्पणी की-ऐसे में मन में आता है कि पहाड़ों पर बुलडोजर चलाकर उन्हें भी मैदान कर दिया जाए। तभी पहाड़ों का विकास हो पाएगा।
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अंग्रेजों के आगमन (1815) से ही अपना अलग अस्तित्व तलाशने लगा था उत्तराखंड


-अंग्रेजी हुकूमत के दौर में भी थी अस्तित्व की तलाश
-सिगौली की संधि में किया गया था उत्तराखंड को अपने परंपरागत कानूनों के साथ अलग इकाई के रूप में माने जाने की शर्त
-1897 में महारानी बिक्टोरिया के समक्ष भी उठाई गई थी मांग, 1916 से 1994 तक जलती रही राज्य आंदोलन की अलख 

नवीन जोशी, नैनीताल। नौ नवंबर 2000 को देश के 27वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आए उत्तराखंड राज्य का गठन बहुत लंबे संघर्ष और बलिदानों के फलस्वरूप हुआ। क्षेत्रीय जनता ने अंग्रेजों को 1815 में सिगौली की संधि के साथ इसी शर्त के साथ अपनी जमीन पर पांव रखने दिये थे कि वह उनके परंपरागत कानूनों के साथ उन्हें अलग इकाई के रूप में रखेंगे। जून 1897 में रानी विक्टोरिया को शर्तें याद दिलाते हुए लोगों ने स्वयं को अलग रखने को प्रत्यावेदन भी भेजा था। पढ़ना जारी रखें “अंग्रेजों के आगमन (1815) से ही अपना अलग अस्तित्व तलाशने लगा था उत्तराखंड”

दुनिया की ‘टीएमटी” में अपनी ‘टीएमटी” का ख्वाब भी बुन रहा है भारत



-30 मीटर की दूरबीन के निर्माण में महत्वपूर्ण सहयोगी है भारत
-इसके निर्माण के जरिए अपनी दूरबीन निर्माण की क्षमता बढ़ाना चाहता है देश
नवीन जोशी, नैनीताल। जी हां, दुनिया की दूसरे नंबर की सबसे बड़ी 30 मीटर (एक छोटे फुटबॉल स्टेडियम जितने बड़े) व्यास की दूरबीन-थर्टी मीटर टेलीस्कोप यानी टीएमटी के निर्माण में जुटे भारत के वैज्ञानिक इसके निर्माण के अनुभवों से अपनी 10 मीटर व्यास की दूरबीन (टेन मीटर टेलीस्कोप-टीएमटी) के लिए विशेषज्ञता जुटाने का ख्वाब भी बुन रहे हैं। बताया गया है कि केंद्र सरकार ने भारतीय वैज्ञानिकों के लिए 30 मीटर की दूरबीन में अपनी सहभागिता को मंजूरी ही इस शर्त के साथ दी है कि वह स्वयं में देश के लिए 10 मीटर की दूरबीन तैयार करने की विशेषज्ञता हासिल कर लें। इसके बाद भारतीय वैज्ञानिकों ने टीएमटी के निर्माण में अपने हिस्से के लिए ऐसे कार्य ही चुने, जिनकी उन्हें अपनी टीएमटी बनाने में जरूरत होगी, और अभी तक उसमें देश की क्षमता बहुत कमतर थी। पढ़ना जारी रखें “दुनिया की ‘टीएमटी” में अपनी ‘टीएमटी” का ख्वाब भी बुन रहा है भारत”

2018-19 में उत्तराखंड में होंगे राष्ट्रीय खेल !


राजीव मेहता
राजीव मेहता

-भारतीय ओलंपिक संघ के महासचिव राजीव मेहता ने जताई पूरी संभावना
-कहा, मुख्यमंत्री से वार्ता हुई है, लिखित प्रस्ताव दे रहे हैं
नवीन जोशी, नैनीताल। यदि योजनानुसार सब कुछ ठीक रहा तो उत्तराखंड में वर्ष 2018 में प्रतिष्ठित राष्ट्रीय खेल हो सकते हैं। भारतीय ओलंपिक संघ के महासचिव राजीव मेहता ने इसकी पूरी संभावना जताई है। उन्होंने बताया कि इस संबंध में उनकी प्रदेश के मुख्यमंत्री हरीश रावत से वार्ता हो गई है। एक-दो दिन में उत्तराखंड की ओर से भारतीय ओलंपिक संघ को औपचारिक प्रस्ताव मिलने जा रहा है, जिसके स्वीकृत होने की उन्होंने अपनी ओर से पूरी संभावना जताई है। मेहता ने कहा कि यदि यह तय हुआ तो उत्तराखंड में केंद्रीय निधि से कम से कम सात-आठ विश्व स्तरीय खेल स्टेडियम बनाए जाएंगे।

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भारत के सच्चे मुस्लिम नहीं करते गौ-हत्या, बाबर भी था गौरक्षक : कुरैशी


Taking Interview with Governor Dr. Ajij Kuraishi

-दावा किया, वह आज से नहीं 50 वर्षों से हैं गौहत्या के विरोधी, उनकी वकालत को गवर्नर पद बचाने का उपक्रम बताने वाले लोग मानसिक दिवालियापन के शिकार
नवीन जोशी, नैनीताल। गौरक्षा के बाबत लगातार अपने विचार रख रहे प्रदेश के राज्यपाल ने कहा कि वह आज से नहीं 50 वर्षों से गौहत्या का विरोध कर रहे हैं। मध्य प्रदेश में उनके पुराने जानने वाले लोग इसकी पुष्टि कर सकते हैं। कहा कि जो लोग उनकी इस बात को उनका गवर्नर पद बचाने का उपक्रम बता रहे हैं, वह वास्तव में मानसिक दिवालियापन के शिकार हैं। दावा किया कि सच्चे मुसलमान कभी गौ हत्या नहीं करते। दुनिया के ईरान-ईराक सहित तमाम मुस्लिम राष्ट्रों में गायें ही नहीं होती हैं। भारत के अन्य प्रांतों में गौहत्या पर केवल तीन वर्ष की सजा का प्राविधान है जबकि देश के मुस्लिम बहुल जम्मू-कश्मीर प्रांत में गौ हत्या पर 10 वर्ष की सजा मिलती है। उन्होंने पूर्व सीएम विजय बहुगुणा के नाना द्वारा लिखित एतिहासिक पुस्तक के आधार पर दावा किया कि मुगल शासक बाबर भी गौरक्षक था। उसने अपनी वसीयत में हुमायूं के लिए लिखा था-हिंदुस्तान पर हुकूमत करनी है तो हिंदुओं का विश्वास जीतो, और गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाओ। पढ़ना जारी रखें “भारत के सच्चे मुस्लिम नहीं करते गौ-हत्या, बाबर भी था गौरक्षक : कुरैशी”

शाही इमाम ने मोदी नहीं 125 करोड़ देशवासियों का किया है अपमान: कुरैशी


While taking Interview with Governor Dr. Ajij Kuraishi-कहा, शाहों-बादशाहों का दौर गया, मस्जिद में बैठकर नमाज पढ़ाने की ड्यूटी तक सीमित रहें इमाम, मुस्लिम कौम भी बर्दास्त नहीं करेगी
-कहा-पाक प्रधानमंत्री को बुलाकर राष्ट्रद्रोह जैसा कार्य किया है शाही इमाम ने पढ़ना जारी रखें “शाही इमाम ने मोदी नहीं 125 करोड़ देशवासियों का किया है अपमान: कुरैशी”

नाथुला नहीं, कुमाऊं-उत्तराखंड से ही है कैलाश मानसरोवर का पौराणिक व शास्त्र सम्मत मार्ग


केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों से चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग से वार्ता कर कैलाश मानसरोवर के लिए सिक्किम के नाथुला दर्रे का रास्ता खुलवा दिया है, लेकिन सार्वभौमिक तथ्य है कि कैलाश मानसरोवर का पौराणिक व शास्त्र सम्मत मार्ग कुमाऊं-उत्तराखंड के परंपरागत लिपुलेख दर्रे से ही है। कहते हैं कि स्वयं भगवान शिव भी माता पार्वती के साथ इसी मार्ग से कैलाश गए थे। उत्तराखंड के प्राचीन ‘कत्यूरी राजाओं’ के समय में भी यही मार्ग कैलाश मानसरोवर के तीर्थाटन के लिए प्रयोग किया जाता था। पांडवों ने भी इसी मार्ग से कैलाश की यात्रा की थी … पढ़ना जारी रखें नाथुला नहीं, कुमाऊं-उत्तराखंड से ही है कैलाश मानसरोवर का पौराणिक व शास्त्र सम्मत मार्ग