वन भूमि हस्तांतरण: सिविल सोयम की भूमि समाप्त होने से उत्तराखंड में विकास कार्य ठप हो जाने की आशंका !


-राज्य में समाप्त हुई विकास कार्यों के बदले दोगुनी दी जाने वाली सिविल सोयम की भूमि

नवीन जोशी नैनीताल। देश-दुनिया को अपने 60 फीसद से अधिक वनों से प्राणवायु व जलरूपी जीवन से समृद्ध करने वाले उत्तराखंड के विकास कायरे की राह ठप होने के आसार उत्पन्न हो गए हैं। प्रदेश के अधिकांश जिलों में वन भूमि पर होने वाले विकास कार्यों के बदले दोगुनी दी जाने वाली सिविल सोयम की जमीन समाप्त हो गई है इसलिए राज्य सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद विकास कार्यों के लिए सिविल सोयम की भूमि नहीं मिल पा रही है। ऐसे में नैनीताल, चंपावत व ऊधमसिंह नगर सहित कई जिले दूसरे जनपदों से जरूरी भूमि मांग रहे हैं और कमोबेश राज्य के सभी जिलों में अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुकी सिविल सोयम की भूमि के लैंड बैंक कंगाल हो गए हैं।

उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड में केवल 38 फीसद ही गैर वन भूमि उपलब्ध है। मौजूदा नियमों के अनुसार वन भूमि पर विकास कराने वाले विभागों को वन भूमि के बदले वन विभाग को क्षतिपूरक पौधरोपण के लिए सिविल सोयम की दोगुनी भूमि न केवल लौटाने वरन इस भूमि को राजस्व दस्तावेजों में वन विभाग को नामांतरित करने का प्रावधान है। बीते वर्ष अक्टूबर तक के आंकड़ों के अनुसार वन भूमि हस्तांतरण के 268 मामले केंद्र सरकार के स्तर पर, जबकि 15 अगस्त 2014 से पूर्व केंद्र सरकार से सैद्धांतिक सहमति मिलने के बावजूद 267 मामले राज्य की ओर से औपचारिकताएं पूर्ण न होने के कारण लंबित हैं। इनमें 45 मामले नैनीताल जनपद, 32 मामले बागेश्वर, 31 टिहरी, अल्मोड़ा व देहरादून के 30-30, पौड़ी के 28 और चमोली के 27 मामले शामिल हैं। वर्तमान में भी कमोबेश यही स्थिति बताई गई है। इनमें अधिकांश मामलों में दोगुनी सिविल सोयम की वन भूमि का न मिलना प्रमुख कारण बताया जा रहा है।

डीएम नैनीताल ने पौड़ी व कुमाऊं आयुक्त ने गढ़वाल आयुक्त को भेजी अर्जी

नैनीताल। नैनीताल जनपद को 118.484 हेक्टेयर वन भूमि पर प्रस्तावित 28 सड़कों के निर्माण के लिए 240.876 हेक्टेयर सिविल सोयम भूमि नहीं मिल पा रही है। नैनीताल डीएम दीपक रावत ने कुमाऊं आयुक्त से भूमि उपलब्ध कराने की गुहार लगाई और अब पौड़ी के डीएम से संपर्क साधा है। वहीं कुमाऊं आयुक्त अवनेंद्र सिंह नयाल के हवाले से अपर आयुक्त जगदीश चंद्र कांडपाल ने बताया कि नैनीताल, ऊधमसिंह नगर व चंपावत जिले अपने यहां सिविल सोयम भूमि न होने से दूसरे जिलों से गुहार लगा चुके हैं। कुमाऊं आयुक्त ने गढ़वाल मंडल आयुक्त से वहां उपलब्ध सिविल सोयम भूमि की जानकारी मांगी है और उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है। नैनीताल जिले की 45 सड़कें वन भूमि हस्तांतरण संबंधी फाइलें लटकी हुई हैं। इनमें 36 सड़कें याचक विभागों में लटकी हैं। नैनीताल दो से ढाई हजार हेक्टेयर भूमि विकास कायरे के बदले वन विभाग के नियंतण्रमें दे चुका है। अक्टूबर में नैनीताल ने चंपावत में बन रही टनकपुर- जौलजीबी मोटरमार्ग के ककराली गेट से ठुलीगाड़ तक के 12 किमी हिस्से को डेढ़ लेन करने के लिए 3.8 हेक्टेयर वन भूमि के बदले चंपावत जिले द्वारा मांगे जाने पर कोश्यां- कुटौली तहसील के छ्योड्ीधूरा गांव में 7.8 हेक्टेयर वन भूमि उपलब्ध कराई थी। जनपद की अपनी पूरी सिविल सोयम का लैंड बैंक पर्यटन विभाग द्वारा टूरिस्ट कॉटेजों के निर्माण के लिए कोरड़ पट्टी में वन विभाग के नाम दो हेक्टेयर भूमि नामांतरित करने के साथ खाली हो गया है।

याचक विभागों को ही शायद जरूरत नहीं अनुमति की !

  • नैनीताल जनपद की कुल 45 सड़कों पर वन भूमि हस्तांतरण का पेंच, इनमें सर्वाधिक 36 सड़कें याचक विभाग पर ही लंबित
  • वन भूमि हस्तांतरण संबंधी फाइलें लंबित, लटकीं सड़कें

नवीन जोशी नैनीताल। प्रदेश के लिए पर्यावरण की रक्षा क्षेत्र के विकास पर बाधक साबित हो रही है। अकेले नैनीताल जनपद की 45 सड़कें अलग-अलग स्तरों पर वन भूमि हस्तांतरण संबंधी फाइलें लंबित होने की वजह से लटकी हुई हैं। हालांकि यह भी सच्चाई है कि इनमें सर्वाधिक 36 सड़कें याचक विभागों में ही यानी प्राथमिक स्तर पर लटकी हुई हैं। केवल तीन सड़कें केंद्र सरकार के स्तर पर जबकि पांच सड़कें नोडल अधिकारी के स्तर पर लंबित हैं।

जनपद मुख्यालय के निकट वर्षो से लंबित भवाली नगर के लिए बेहद अहम एवं जनप्रतिनिधियों द्वारा दबाव बनाए व जवाब-तलब किए जाने वाले भवाली बाईपास मोटर मार्ग की बात हो या फिर लोनिवि की बजून-फगुनियाखेत, डोमास-कांडा-फफड़िया, छीड़ाखानत ल्ली पोखरी, मंगोली-खमार, खनस्यूं- टांडा, रिखौली जनौनी खलाड़-सिमराड़ पांग कटारा, कैंची-हरतपा, पंगोठ-देचौड़ी, कसियालेख-धारी भूमिया बूंरासी, मुरकुटिया लुगड़ पटरानी, नौनिया विनायक बांसी-सीतसबनी, नाई चौड़ा-सूखा, काला पातल-सलियाकोट, सूखाधोडिया टापू, दैनकन्या-सिरमोली, बिडाली-पोखराधार, क्वारब मोना सरगाखेत-मौना भुजानखान बैरोली तक शहीद स्मृति मार्ग, नौनिया विनायक- अंबेडकर ग्राम रिखौली, पटुवाडांगर- कलौना दोगड़ा चोपड़ा, चांफी-अल्चौना मलुवाताल,पंगोठ-बुधलाकोट, सौनगांव- खैराली, कूल विरखन-सूण प्यूड़ा, नलनी हल्का वाहन मार्ग, घुघुखान सौड़-हरियाल, डाका रौली-मल्ला निगलाट, मोतियापाथर-नाटाडोर जैंती, बगडवार बैगड़ दूनी विरसिंग्या, पोखरी बैगनिया- पोखरी बिनवाल। चायखान बलिया के अलावा प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत आने वाली सौड़ महरोड़ा दोनियाखान, महतौलिया गांव-मज्यूली, टकुरा पुल से तुषराड़, मलुवाताल, मोरनौला-भीड़ापानी से थली-मोहनागांव व स्यूड़ा-कौंता पटरानी से ककोड़ हरीशताल मोटर मागरे के प्रस्ताव संबंधित याचक यानी निर्माण करने वाले विभाग के स्तर पर ही लंबित हैं। वहीं केंद्र सरकार के स्तर पर तीन सड़कों, वर्ष 2010 में आई आपदा से ध्वस्त हुए अल्मोड़ा राजमार्ग के काकड़ीघाट से क्वारब के बीच के दो हिस्से तथा दरमोली से पिठोली मोटर मार्ग के मामले लंबित हैं।

हर शुक्रवार समीक्षा करेंगे डीएम

नैनीताल। इस बाबत पूछे जाने पर डीएम दीपक रावत ने कहा कि इस मामले को गंभीरता से लेंगे। वह स्वयं हर सप्ताह शुक्रवार को विभागीय स्तर पर लंबित सड़कों के मामलों की समीक्षा करेंगे। सभी विभागीय अधिकारियों को सप्ताह भर के भीतर अपना यूजर आईडी बनाने को कहा गया है, जिससे वन भूमि हस्तांतरण के मामलों को ऑनलाइन माध्यम से आगे बढ़ाया जाएगा।

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