अब भारतीय कूड़े पर यूरोप की नजर


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-यहां प्रति वर्ष 625 मिलियन टन कृषि क्षेत्र का सहित हजारों टन कूड़ा हो रहा बरबाद
नवीन जोशी, नैनीताल। कभी सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत देश की समृद्धि एक यूरोपीय देश-इंग्लेंड की आंखों में इस तरह चुभी थी कि उसने ईस्ट इंडिया कंपनी के जरिए भारत को गुलाम ही बना डाला था। आज उसी यूरोप को भारत के कूड़े में ऐसा कुछ नजर आ रहा है, कि उसके कदम एक बार फिर भारत की ओर लौट रहे हैं। यूरोपियन यूनियन के एक देश इटली के इटेलियन नेशनल एजेंसी फॉर न्यू टेक्नॉलॉजीज में कार्यरत डा. नीता शर्मा की अगुवाई में यूरोपियन यूनियन के इटली, बेल्जियम, नीदरलेंड और जर्मनी के सात संस्थान तथा भारत के जवाहर लाल नेहरू, पंतनगर विवि, आईआईसीटी हैदराबाद, तेजपुर कृषि विवि आसोम, एनजीओ-पुणे महाराष्ट्र की आरती व टेरी आदि संस्थान ‘स्ट्रेंथनिंग नेटवर्किंग ऑफ बायो-मास एवं बायो-वेस्ट टेक्नोलॉजी फॉर यूरोप-इंडिया इंटीग्रेशन” यानी ‘सहयोग” प्रोजेक्ट से जुड़े हैं।

प्रोजेक्ट की प्रमुख डा. नीता शर्मा ने कहा कि यूरोपीय यूनियन के पास बायो-वेस्ट यानी जैविक कूड़े को सौंदर्य प्रसाधन एवं फार्मास्युटिकल उत्पाद बनाने एवं इसके बाद बचे कूड़े का ईधन की ब्रिकेट यानी र्इंटें बनाकर पूर्ण उपयोग करने की तकनीकी है, पर कूड़ा नहीं है। जबकि भारत में कूड़े की प्रचुरता है। इसलिए यूरोपीय यूनियन का भारत की ओर झुकाव है कि यूरोप की तकनीक से भारतीय कूड़े का सदुपयोग कर दोनों लाभांन्वित हों। उन्होंने दावा कि भारत में अकेले कृषि क्षेत्र में हर वर्ष 800 मिलियन टन कूड़ा निकलता है, जिसमें से केवल 175 मिलियन टन कूड़े का उपचोग ही पशुओं के चारे, र्इंधन व अन्य हर तरह के कार्यों में हो पा रहा है, और 625 मिलियन टन कूड़ा बेकार जला दिया जाता है। वहीं जंगलों, भोजन, घरों तथा शहरी निकायों के कूड़े की मात्रा के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, पर यह बहुत अधिक है। इसका गैसीफायर, बायो इथेनॉल, बायो फ्यूल, बायो डीजल आदि के रूप में सदुपयोग कर भारी मात्रा में आय प्राप्त की जा सकती है।

कुमाऊं विवि का यूरोपीय यूनियन के ‘सहयोग” प्रोजेक्ट से करार

-पांच यूरोपीय देशों के सात एवं भारत के छह बड़े संस्थान जुड़े हैं इस प्रोजेक्ट से
-कुलपति ने पहाड़ों के कूड़े, लैंटाना और नदियों के सूखने की समस्या के निदान को मांगा सहयोग
नैनीताल। अभी हाल ही में कैंसर संस्थान के लिए अमेरिकी संस्थान से करार करने के बाद कुमाऊं विवि यूरोपीय यूनियन के पांच देशों के जुड़ाव वाले स्ट्रेंथनिंग नेटवर्किंग ऑन बायो-मास एवं बायो-वेस्ट टेक्नोलॉजी फॉर यूरोप-इंडिया इंटीग्रेशन” यानी ‘सहयोग” नाम के इस प्रोजेक्ट के लिए करार करार करने जा रहा है। इधर कुमाऊं विवि के कुलपति प्रो. होशियार सिंह धामी ने पंतनगर विवि आर्इं प्रोजेक्ट की भारतीय मूल की प्रमुख डा. नीता शर्मा से कुमाऊं विवि को भी इस प्रोजेक्ट में शामिल करने का अनुरोध किया, जिसे डा. नीता ने स्वीकारने के संकेत दिए हैं। शीघ्र दोनों के बीच इस बारे में औपचारिक करार होने की संभावना जताई जा रही है।
शुक्रवार को कुमाऊं विवि प्रशासनिक भवन में सहयोग प्रोजेक्ट की प्रमुख डा. नीता शर्मा, कुलपति प्रो. धामी मीडिया से मुखातिब हुए। डा. नीता ने कहा कि प्रोजेक्ट के जरिए भारत में कूड़े की उपलब्धता, उसकी गुणवत्ता आदि पर शोध कर उसके सदुपयोग के लिए कार्य करने की काफी संभावनाएं हैं। वहीं कुलपति प्रो. धामी ने कहा कि उन्होंने प्रोजेक्ट के लिए नैनीताल सहित पहाड़ के कमोबेश सभी शहरों के द्वार पर लगे कूड़े के अंबार के निस्तारण, पहाड़ में बुरी तरह फैल चुकी लैंटाना (कुरी) घास और कोसी सहित अनेक नदियों के किनारे अन्य वनस्पतियों के गायब होने और नागफनी, कैक्टस जैसे पेड़-पौधों के उगकर आगे यानी बंजर रेगिस्तान बनने के इशारे को देखते हुए वहां की जैविक पारिस्थितिकीय स्वास्थ्य को सुधारने पर शोध कार्य करने के सुझाव दिए हैं। इस अवसर पर प्रोजेक्ट से जुड़ी जेएनयू दिल्ली के स्कूल आफ लाइफ सांइसेज की पूर्व विभागाध्यक्ष डा. नीरा भल्ला सरीन, पंतनगर विवि की जैव प्रोद्योगिकी विभागाध्यक्ष डा. रीता गोयल व कुमाऊं विवि की जैव प्रोद्योगिकी विभागाध्यक्ष डा. बीना पांडे भी मौजूद रहीं।

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