आधुनिक विज्ञान से कहीं अधिक समृद्ध और प्रामाणिक था भारतीय ज्ञान


पांच [untitled1.bmp]विज्ञान के वर्तमान दौर में आस्था व विश्वास को अंधविश्वास कहे जाने का चलन चल पड़ा है। आस्था और विज्ञान को एक दूसरे का बिल्कुल उलट-विरोधाभाषी कहा जा रहा है। यानी जो विज्ञान नहीं है, वैज्ञानिक नियमों और आज के वैज्ञानिक दौर के उपकरणों से संचालित नहीं है, जो मनुष्य की आंखों और वैज्ञानिक ज्ञान से प्राप्त बुद्धि-विवेक के अनुसार सही नहीं ठहरता, अंधविश्वास है। और आस्था का भी चूंकि वर्तमान ज्ञान-विज्ञान के अनुसार कोई आधार नहीं है, इसलिए वह भी अंधविश्वास ही है।

मजेदार बात यह है कि जिस विज्ञान पर हमारा विश्वास इतना प्रबल हुआ है, और जिसके बिना आज हम जीवन की कल्पना भी नहीं कर पा रहे हैं, उसकी उम्र महज कुछ सौ (अधिकतम 500) वर्ष ही है (तब तक की धारणाओं के विपरीत सूर्य को ब्रह्माण्ड का केन्द्र बताने वाले निकोलस कोपरनिकस (1473-1543) को पहला वैज्ञानिक माना जाता है, जबकि उनसे पूर्व भौतिक विज्ञान के मूल माने जाने वाले दर्शनशास्त्र के जनक कहे जाने वाले अरस्तू (384-322 ई.पू.) को उनके द्वारा भारी वस्तु के  हल्की वस्तु की तुलना में अधिक वेग से गिरने का सिद्धांत देने के बाद आधुनिक इतिहास में पहले वैज्ञानिक सोच के व्यक्ति के रूप में जाना जाता है हालांकि उनकी यह धारणा इटालियन भौतिकविद गैलीलियो गैलिली (1564-1642) के सिद्धांत ‘गुरुत्वाकर्षण सभी वस्तुओ को समान वेग से अपनी ओर खींचती है’ कहने तक ही मान्य रही। जबकि मनुष्य की सैकड़ों पीढ़ियां, करीब 25 लाख वर्ष पुराने पुरापाषाण काल से इस विज्ञान के बिना भी मजे और आज के मुकाबले कहीं कम तनाव और सुख-शांति के रही हैं।

और शायद हम शुरूआती कक्षाओं में पढ़ाई गयी बात भी भूल गए हैं- “Science is A Good Servant but A Bad Master” और हमने विज्ञान को बिना किसी सवाल-जवाब, किसी धार्मिक ग्रन्थ की तरह (कमोबेस अन्धविश्वास करते हुए) स्वीकार करना अपनी आदत बना लिया है। हम एक सेवक या उपकरण की तरह विज्ञान का उपयोग नहीं कर रहे हैं, वरन उसे अपना ‘भाग्यविधाता’ या मालिक बना लिया है, और खुद उसके दास या सेवक हो गए हैं। वह जैसे चाहे हमें नचा रहा है, और हम उसकी तान पर नाच रहे हैं। क्या नहीं ? दिल पर हाथ रखकर बोलिए………….।

आइये विषय को गंभीरता से समझते हैं। सबसे पहले, विज्ञान किसे कहते हैं ? विज्ञान वह ज्ञान या व्यवस्था है, जो हर बार एक जैसी स्थितियों में एक जैसे ही परिणाम देती है। जैसे यातायात के साधन हैं, जिनसे हर बार ईधन भरकर या टिकट लेकर यात्रा की जा सकती है। संचार के साधन हैं, जिन्हें रिचार्ज कर देश-दुनिया में तय नंबरों पर बात की जा सकती है। कम्प्यूटर हैं, जिन्होंने जिंदगी को आसान बना दिया है। टीवी, इंटरनेट पर देश-दुनिया की खबरें ली जा सकती हैं। अस्पताल हैं, जहां उपचार किया जा सकता है। मनुष्य चांद के बाद मंगल पर जाने की बात कर रहा है। वायुयान, रॉकेट, मिसाइल, रसायनिक, परमाणु बन बना लिए हैं, तो यह विज्ञान है। वहीँ यदि किसी धर्मग्रंथ में पुष्पक विमान, स्वर्ग, नरक जाने की बात लिखी हो तो वह अंधविश्वास है। उपचार के लिए ऐलोपैथी विज्ञान है, पर घरेलू नुस्खों, जड़ी-बूटियों से इलाज की विधा अंधविश्वास है। यहां तक कि योग अंधविश्वास है और ‘योगा’ विज्ञान है। क्योंकि हमारा मानना है की जिन्हें हम अन्धविश्वास कहते हैं, उनके बारे में जो ज्ञान है वह पुष्ट नहीं है, या विज्ञान उसे स्वीकार नहीं करता है।

यह भी पढ़ें : हमारे प्राचीन धर्मग्रंथों की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए : इसरो चीफ 

आज हम खासकर शहर के लोग शायद बिना मोबाइल, बिना कम्प्यूटर, इंटरनेट, टीवी व यातायात के सुख-साधनों के रहने की कल्पना भी न कर पाएं, लेकिन आज भी दुनिया की आधी से अधिक आबादी इनके बिना रहती है। उन्हें आज भी पता नहीं है कि इलाज करने के लिए कोई डॉक्टर नाम का व्यक्ति होता भी है। वह आज भी, किसी भी बड़ी से बड़ी बीमारी के इलाज के लिए पहले खुद ही कोई टोना-टोटका कर लेते हैं, या बहुत हुआ तो किसी झाड़-फूक वाले ओझा (पहाड़ में डंगरिए) आदि के पास चले जाते हैं। कोई बाबा उनके माथे पर कुछ शब्द मुंह के भीतर ही बुदबुदाते हुए चुटकी भर राख भभूत के नाम पर लगा देता है, अधिक ही हुआ तो देवता का आह्वान कर उससे ही पूछ कर और आदेश मिला तो किसी जीव की बलि चढ़ाकर उपचार की उम्मीद करते हैं, और कई बार ठीक भी हो जाते हैं। जीवन की बड़ी से बड़ी समस्याएं ईश्वर का नाम लेकर कई बार छू-मंतर हो भी जाती हैं। लेकिन हम इसे इत्तफाकन ठीक होना मानकर ख़ारिज कर देते हैं।

इस सब को अंधविश्वास भी मानें, तो भी एक बात तो माननी पड़ेगी कि हमारी अनेकों सभ्यताएं इन्हीं मान्यताओं के भरोसे रही हैं। Life in Earth‘यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफोर्निया, लॉस एंजिल्स (UCLA)’ की ताजा रिपोर्ट के अनुसार पृथ्वी 4.54 अरब वर्ष पूर्व एक गृह के रूप में अस्तित्व में आई थी, और कम से कम 4.1 वर्ष पूर्व पृथ्वी पर जीवन की शुरुवात हो गयी थी, जबकि पूर्व मान्यता के अनुसार 30 करोड़ वर्ष पूर्व जीवन की शुरुवात हुई थी। लिहाजा इस तथ्य को ध्यान में रखना जरूरी है की हमारी पुरानी मान्यताओं ने मानव सभ्यता को अरबों वर्ष आगे बढ़ाया है, जबकि विज्ञान के भरोसे हम अधिकतम कुछ सौ वर्ष ही आगे आए हैं। निस्संदेह इसकी गति पिछली कई शताब्दियों से अधिक तेज कही जा सकती है। बावजूद, आज भी अधिसंख्य वैज्ञानिक अपने हाथों में ग्रहों को शांत या अभीष्ट फल देने की इच्छा के साथ अंगूठियाँ धारण करते हैं। और पत्नी-बच्चों के साथ मठ-मंदिर जाते हैं। और जीवन के सर्वाधिक हताशा-निराशा के दौर में ईश्वर को याद करते हैं। और यह भी जान लें कि विज्ञान भी अपने चरम पर बढ़ता हुआ आज के दौर के सबसे बड़े भौतिकी ब्रह्माण्ड वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग की अगुवाई में “Big Bang Theory” के ‘महाप्रयोग’ से होता हुआ आखिर ‘गॉड पार्टिकल्स’ पर आ पहुंचा है। यानी ‘विज्ञान-विज्ञान’ कहते हुए आखिर मानव सभ्यता विज्ञान द्वारा अन्धविश्वास कहे जाने ‘ईश्वर’ की शरण में ही आकर ठिठक गयी है। हालाँकि यह भी कहा जाता है की Scientific determination (वैज्ञानिक दृढ़ संकल्प) की सर्वप्रथम बात करने वाले ‘ला प्लाज’ से नेपोलियन बोनापार्ट (15 अगस्त 1769-5 मई 1821) ने सवाल किया था- “ईश्वर तुम्हारे (विज्ञान के) System में कहाँ और कैसे Fit होता है ?” यानी विज्ञान का ईश्वर से संघर्ष अपने जन्म से रहा है। आगे भी अल्बर्ट आइंस्टीन  ने ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के सम्बन्ध में मार्क प्लांक की ‘क्वांटम थ्योरी’ को आगे बढ़ाते हुए ईश्वर पर टिप्पणी की थी-“God does not Play Dies (पाशे) ” और माना था कि ईश्वर की सत्ता को चुनौती नहीं दी जा सकती है, जबकि स्टीफन हॉकिंग ने अब जाकर उनकी बात को यह कहते हुए आगे बढ़ाया कि, “ईश्वर न केवल हमारे साथ पाशे खेलता है, वरन कभी-कभी वह पाशों को कुछ ऐसे स्थानों पर भी फेंक देता है, जहाँ हम उन्हें ढूंढ नहीं पाते”। गौरतलब है की स्टीफन यहाँ ‘गॉड पार्टिकल्स’ की बातें कर रहे थे, जिन्हें आखिर खोजने के दावे किये गए।

बहरहाल, अब यह समझने की कोशिश करते हैं कि विज्ञान, विज्ञान क्यों है। इसलिए कि यह विश्वसनीय है। और आस्था-विश्वास अंधविश्वास क्यों है, शायद इसलिए कि यह विश्वसनीय है। हर बार जब हम किसी नंबर पर फोन मिलाते हैं तो उसी नंबर के फोन वाले व्यक्ति से बात होती है।हम किसी एक जैसे रोग में एक विशिष्ट गोली खाते हैं, और ठीक हो जाते हैं, लेकिन हर बार हमारा ईश्वर पर विश्वास काम नहीं आता। हर बार ओझा का तंत्र-मंत्र. हमें रोगमुक्त नहीं कर पाता। तो क्या मानव सभ्यता का इन हजारों वर्षों में आगे बढ़ाने वाले विश्वास को एक झटके में अंधविश्वास कह कर झटक देना ही ठीक है।

कहीं ऐसा तो नहीं कि हम उस हजारों वर्ष तक आजमाये हुए विश्वास को कुछ सौ वर्ष के ‘ज्ञान-विज्ञान’ के मद में चूर होकर नकारने में जल्दबाजी कर रहे हैं, जबकि कई बार हमारा वही पुरातन ज्ञान हमें सोचने पर मजबूर कर देता है। हमारे पुरुखों ने अपने उसी अज्ञान के साथ और बिना आज के सीमेंट-सरिया और मशीनों से कटी-धुली रेत के बिना भी ऐसी मजबूत ऐतिहासिक गगनचुम्बी ‘सात आश्चर्यों’ सरीखी इमारतें तैयार की थीं, और हमारी इमारतें कुछ दशकों में ही डोलने लगती हैं। उन्होंने समुंदरों पर पुल बना डाले थे और हमारे पुल गाड़-गधेरों पर भी नहीं टिक पा रहे। वह पीढ़ियां शतायु होती थीं, और कई सैकड़ों वर्ष भी जीती थीं, और हमारी पीढ़ियां युवावस्था में ही गंजी, रोगी और कुपोषणग्रस्त हो रही हैं।

हमें अपनी उन परंपराओं से अंधविश्वास की ऐसी ‘बू’ आती है कि हम उन्हें नहीं अपना सकते। धर्म के नाम पर ब्रत-उपवास नहीं कर सकते, पर फिगर मेन्टेन करने के लिए ‘डाइटिंग’ करने से हमें कोई गुरेज नहीं। खेतों में बेहतर उपज के लिए गोबर का इस्तेमाल करने में भी हमें ‘बू’ आती है, बेहतर उपज के लिए हमने कैसे-कैसे वैज्ञानिक रसायनिक खादें और कीटनाशक बनाए, और आखिर हमें वापस अपने परंपरागत कृषि के तरीकों पर लौटना पड़ा तो इसे हमें परंपरागत तरीकों पर लौटना कह हार मानना कतई बर्दास्त नहीं, इसे हम जैविक खेती का नया नाम देंगे। बाबा का योग हमें कतई बर्दास्त नहीं, हां ‘योगा’ करने में हमें कोई गुरेज नहीं। इसी तरह देश की परंपरागत ‘ओल्ड फैशंड’ गतका व कलारीपयत जैसी युद्ध शैलियां हम नहीं अपनाएंगे, और यही चीन से जूडो-कराटे और जापान-कोरिया से सेनसेई बनकर लौट आएं तो इन्हें अपनाने में हमें हर्ष होगा।

लेकिन हमें यह भी मानना पड़ेगा कि जिस तरह कई बार आस्था, विज्ञान की तरह निश्चित फल नहीं देती, उसी तरह विज्ञान भी हर बार निश्चित फल नहीं देता। हर बार किसी फोन नंबर पर फोन मिलाने से फोन नहीं मिलता। हर बार कोई दवा समान उपचार नहीं करती। हर बार किसी यहां से वहां जाने वाले यातायात के साधन में बैठकर हम अपने गंतव्य पर नहीं पहुंच पाते, कई बार दुर्घटना भी हो जाती है। हम ऐसी परिस्थितियों को भी यह कहते हुए स्वीकार कर लेते हैं कि नेटवर्क में कोई दिक्कत होगी, अथवा दवा के प्रयोग में कोई त्रुटि हुई होगी। ऐसा हम स्वीकार भी कर लेते हैं, क्योंकि हम इस बारे में कुछ संबंधित आधुनिक ज्ञान रखते हैं। और जहां हमारी समझ में ना आए, तो भी मान लेते हैं कि कुछ न कुछ गड़बड़ अवश्य हुई होगी। लेकिन ऐसा ही यदि आस्था, धर्म, आध्यात्म व विश्वास के मामले में हो तो हम आधुनिक विज्ञान वालों को उसे अंधविश्वास कहने में जरा भी नहीं देती। लिहाजा, मेरा मानना है कि आस्था भी जरूर किसी ना किसी ठोस कारण की वजह से ही काम नहीं करती, जिसका हमें ज्ञान नहीं होता है। हमें याद रखना होगा कि विज्ञान भी कई बार अपना स्वरूप बदलता, अपने पुराने स्वरूप को झुठलाता रहा है, तथा कई पुराने ज्ञान को विज्ञान मानता रहा है, साथ ही आधुनिक विज्ञान को मानने वाले कितने की पश्चिमी दुनिया के लोग भारतीय परंपराओं, ईश्वर को मानने लगे हैं। ताजा बडी पहल भारत के योग को अंतराष्ट्रीय स्तर पर ‘विश्व योग दिवस’ के रूप में मान्यता मिलने की हुई है। इसलिए संभव है कि एक दिन वह भी समझेगा और पुराने ज्ञान, आस्था को भी विज्ञान के रूप में स्वीकारने को मजबूर होगा।

गोमूत्र में मौजूद है सोना और 5100 तत्व
जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय के जैव प्रोद्योगिकी विभाग के प्रमुख डा. बीए गोलकिया के निर्देशन में शोध दल ने गिर नस्ल की 400 गायों के गोमूत्र की अपनी खाद्य जांच प्रयोगशाला में गैस क्रोमैटोग्राफी मास स्पेक्ट्रोमेट्री (जीसी-एमएस) की गई जांच के बाद घोषणा की है कि इन गायों के प्रति 1 लीटर गोमूत्र में तीन से 10 मिलीग्राम सोने की मात्रा घुलनशील ‘गोल्ड सॉल्ड अयस्क के रूप में मौजूद है, और इसे रसायनिक प्रक्रिया के जरिए ठोस सोने का रूप दिया जा सकता है। इसके अलावा भी गोमूत्र में 5100 तत्व पाए गए, जिसमें से 388 में कई बीमारियों को दूर करने के चिकित्सकीय गुण मौजूद मिले। आगे जांच दल ने अन्य नस्लों की गायों के गोमूत्र की भी इसी तरह जांच करने का इरादा जाहिर किया है। जांच दल ने इसके अलावा ऊंटों, भैंसों, भेड़ों और बकरियों के मूत्र की भी इसी तरह से जांच की, लेकिन उनमें कोई तत्व नहीं मिला। मूलतः यहाँ देखें

परीक्षा में बेहतर अंक दिला सकते हैं वैदिक मंत्र, रिसर्च में दावा

mantra@123

वैदिक मंत्रों का जाप करने से छात्रों को पढ़ाई से होने वाले तनावों से निपटने और परीक्षा में बेहतर अंक मिलने में मदद मिलती है। बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी (BITS) पिलानी के हैदराबाद कैम्पस की एक रिसर्च में यह दावा किया गया है। इतना ही नहीं, वैदिक मंत्रों के जाप से छात्र मनोवैज्ञानिक और शारीरिक तौर पर बेहतर होते हैं और उन्हें एकाग्रता बढ़ाने में भी मदद मिलती है।
रिसर्च में हिस्सा ले रहे छात्रों ने 5 मंत्रों का उच्चारण किया। जिनमें गायत्री मंत्र (ऋगवेद से), विष्णु सहस्रनामम (भगवान विष्णु के एक हजार नाम), ललिता सहस्रनामम (माता के हजार नाम), पुरुष सुक्तम (ब्रह्मांड से जुड़ा मंत्र, ऋग्वेद से), आदित्य हृदयम (सूर्य देव की स्तुति) शामिल रहे। मंत्रोच्चारण के बाद छात्रों की सामान्य खुशहाली और बुद्धि की स्पष्टता में बेहतरी दर्ज की गई।
बिट्स पिलानी, हैदराबाद कैम्पस में सोशल साइंस और ह्यूमैनिटी विभाग की डॉ. अरुणा लोला ने कहा, ‘हमने इस शोध के पहले और बाद में मनोवैज्ञानिक टेस्ट किया गया। इसमें विषयों को लेकर दिमागी स्पष्टता और सामान्य खुशहाली में बढ़ोतरी देखी गई। मंत्रोच्चारण एक शक्तिशाली आवाज या वाइब्रेशन है, जिसकी मदद से कोई भी अपने दिमाग को स्थिर रख सकता है। ओम के उच्चारण से तनाव से राहत मिलती है और याददाश्त भी बढ़ती है।’ यह शोध धर्म और स्वास्थ्य के नए अंक में पब्लिश हुआ है। डॉक्टर लोला ने बताया, ‘यह शोध मंत्र के प्रयोग और इंसानी दिमाग पर इसके प्रभाव के साथ ही इसके पीछे के आध्यात्मिक विज्ञान को जानने के मकसद से किया गया।’ मूलतः यहाँ देखें

पुरातत्व विशेषज्ञ बीबी लाल का दावा, ‘मनु के वक्त जल प्रलय काल्पनिक कथा नहीं, सच्चाई’

manukibaadh

अयोध्या पर लिखी अपनी पुस्तक के लिए जाने जाने वाले विवादास्पद पुरातत्व विशेषज्ञ बीबी लाल ने अब मनु के समय आए जल प्रलय को लेकर चौंकाने वाला दावा किया है। लाल ने अपने शोध पत्र में दावा किया है कि ‘जल प्रलय’ पौराणिक कथा नहीं, बल्कि एक सच्ची घटना थी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के महानिदेशक रह चुके लाल ने इस संबंध में अपना शोध पत्र सोमवार को भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (ICHR) द्वारा आयोजित एक सेमिनार में पेश किया। शोध पत्र में पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर मनु के जल प्रलय को सरस्वती नदी के गायब होने से जोड़कर दिखाया गया है। शोध पत्र में बताया गया है, ‘पुरातात्विक रूप से सरस्वती की भारी बाढ़ 2000-1,900 ईसा पूर्व के आसपास या मोटे तौर पर, दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के पहले चरण में आई। मनु के जल प्रलय का भी ठीक यही वक्त था जो ऋग्वेद के बाद आई, पर दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के शुरू होने से पहले। क्या अब भी हमें मनु के समय के आए जल प्रलय को काल्पनिक मानना चाहिए?’पद्म सम्मान से नवाजे जा चुके बीबी लाल इसे लेकर एक किताब भी लिख रहे हैं। इसके पहले उनकी पुस्तक ‘राम, उनकी ऐतिहासिकता, मंदिर और सेतु: साहित्य, पुरातत्व और अन्य विज्ञान’ को लेकर काफी हंगामा हुआ था क्योंकि उसमें अयोध्या की बाबरी मस्जिद के नीचे हिंदू मंदिर का ढांचा होने की बात कही गई थी।

बता दें कि भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (ICHR) मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अंतर्गत आने वाला एक शोध संस्थान है। ‘पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व पुरातनता, निरंतरता और सभ्यता और संस्कृति के विकास’ विषय पर आधारित तीन दिवसीय इस सेमिनार का उद्घाटन केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को करना था। हालांकि वह इसमें शामिल नहीं हो सके।

हर ताज़ा अपडेट पाने के लिए NBT के

आईडिया ऑफ़ इंडिया :

आईडिया ऑफ़ इंडिया

आईडिया ऑफ़ इंडिया

आर्यों व सिंधु घाटी सभ्यता से भी पहले का करीब 11 हजार वर्ष पुराना है ‘स्वास्तिक चिन्ह’

आर्यों से भी कहीं पुराना है 'स्वास्तिक'।आईआईटी खड़गपुर में वरिष्ठ प्राध्यापकों तथा कई आईआईटी, एनआईटी, पर्यावरण प्लानिंग और तकनीक अहमदाबाद, स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर भोपाल और जादवपुर विवि के शोधार्थियों द्वारा केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सहयोग से किये जा रहे एक शोध के अनुसार हिंदू धर्म का प्रमुख ‘स्वास्तिक’ चिन्ह आर्यों और सिंधु घाटी सभ्यता से भी पहले का और करीब 11 हजार वर्ष पुराना है। इसे हिटलर ने आर्यों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने के सूचक के तौर पर भी अपनाया था तथा इसकी छाप पश्चिमी और मध्य एशियाई सभ्यताओं में भी देखने को मिलती है। सिंधु घाटी सभ्यता के भग्नावशेषों में भी स्वास्तिक चिन्ह पाया गया है। शोध में यह भी कहा गया है कि ऋग्वेद को आर्यों की सभ्यता से जोड़ा जाता है, जबकि यह हड़प्पा सभ्यता से पूर्व की है। तब यह जनश्रुतियों के रूप में मौजूद था, जिसे मौखिक रूप से सिंधु घाटी सभ्यता के हवाले कर दिया गया।

5114 ईसा पूर्व पैदा हुए थे राम, 3139 ईसा पूर्व हुआ था महाभारत का युद्ध

भारतीय वेद-पुराणों के ज्ञान पर एक बड़ा उल्लेखनीय वैज्ञानिक शोध अध्ययन सामने आया है। नई दिल्ली में 17 सितम्बर 2015 से लगी ‘यूनीक एक्जीबिशन ऑन कल्चरल कंटिन्युटी फ्रॉम ऋगवेदा टु रोबॉटिक्स’ यानी ‘ऋग्वेद से रोबोटिक्स तक की सांस्कृतिक निरंतरता पर अनूठी प्रदर्शनी’ नाम की प्रदर्शनी में भारतीय धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन कर कई उल्लेखनीय व ठोस बातें कही गई हैं। नई दिल्ली के ललित कला अकादमी में चल रही इस प्रदर्शनी में महाभारत और रामायण को पौराणिक महाकाव्यों की जगह ऐतिहासिक ग्रंथ कहा गया है, तथा इनके वैज्ञानिक शोध के आधार पर बताया गया है कि भगवान राम ईसा से 5114 वर्ष पूर्व 10 जनवरी की तिथि को 12 बजकर पांच मिनट पर पैदा हुए थे। आगे 25 वर्ष की आयु में राम 14 वर्ष के बनवास पर गए थे, 7 अक्टूबर 5077 ईशा पूर्व को खर-दूषण नाम के राक्षशों का वध किया था तथा 5076 ईसवी पूर्वमें यानी जब राम की उम्र 38 वर्ष थी, हनुमान सीता माता से उनकी खोज करते हुए अशोक वाटिका में मिले थे। अलबत्ता इन तिथियों को वर्तमान में लागू अंग्रेजी ग्रेगेरियन कलेंडर के हिसाब से सही नहीं भी माना जा सकता, क्योंकि तब यह कलेंडर अस्तित्व में ही नहीं था। प्रदर्शनी में खगोल विज्ञान के चार्टों के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है कि जब हनुमान सीताजी से अशोक वाटिका में मिले थे, तब चंद्रग्रहण लगा हुआ था, तथा जब 3153 वर्ष ईशा पूर्व में पांडव जुए में सब कुछ हारने के बाद 13 वर्ष के बनवास पर जा रहे थे, तब सूर्यग्रहण लगा हुआ था। प्रदर्शनी में राम से 63 पूर्ववर्ती वंशजों एवं 59 उत्तराधिकारियों की पहचान भी बताई गई है। इस शोध अध्ययन में महाभारत के युद्ध का वर्ष 3139 ईशा पूर्व बताया गया है। इंस्टिट्यूट ऑफ साइंटिफिक रिसर्च ऑन वेदाज’ (आई-सर्व) की निदेशक सरोज बाला ने बताया कि यह तारीखें वैज्ञानिक शोध के बाद एक सॉफ्टवेयर की मदद से तय की गई हैं।
यह भी कहा गया है रामायण और महाभारत में विभिन्न स्थानों पर ग्रहों की विशेष स्थितियों की जो बातें लिखी गई हैं, वे वर्तमान विज्ञान के अनुसार भी सही पाई गई हैं। आयोजक संस्थान-‘द केंद्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने कहा है कि उनके मंत्रालय ने इन शोध अध्ययनों पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।
इसके अलावा प्रदर्शनी में आर्यों द्वारा भारत पर आक्रमण कर यहां आने और नरसंहार करने यानी आर्यों के भारत का मूल निवासी न होने के सिद्धांत को भी खारिज किया गया है, तथा बताया गया है कि आर्य कहीं बाहर से आए नहीं थे, वरन यहीं के मूल निवासी थे। दिल्ली विश्वविद्यालय में 26 से 28 सितम्बर 2015 के बीच लगी ‘वैदिक क्रोनोलोजी-ए रिएसेमेंट’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी में भी इस तथा वेदों का काल 1500 ईशा पूर्व होने के सिद्धांतों को नाकारा गया। तथा ईशा से 7500 से 1800 ईशा पूर्व तक वैदिक काल की चार अवस्थाओं को प्रतिपादित किया गया। डा. मोहन चन्द्र तिवारी ने ऋग्वेद का काल 7000 वर्ष ईशा पूर्व बताया। साथ ही भारत के मेहरगढ़ में दंत चिकित्सा के सर्वाधिक पुराने ईशा से सात हजार वर्ष पूर्व के सबूत पेश किए गए हैं। यह भी कहा गया है कि भारतीय इतिहास मुस्लिमों एवं इसाइयों के आने से करीब 10 हजार वर्ष पुराना है।
प्रदर्शनी में शामिल रही प्रसिद्ध नृत्यांगना सोनल मानसिंह ने कहा कि हम अब तक वही इतिहास पढ़ते आए हैं, जो बाहरी लोगों ने लिखा है। वहीं कृष्ण गोपाल ने कहा कि ‘इसाई विद्वान’ चार हजार वर्ष से पुराने इतिहास के बारे में सोच भी नहीं पाते हैं। यहां तक कि मैक्स मूलर भी केवल ईशा से पांच हजार वर्ष पूर्व ही जा पाए थे।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी खरे हैं पांडुलिपियों के संरक्षण के परंपरागत तरीके

नैनीताल। जी हां, सदियों पुरानी पांडुलिपियों को संरक्षित करने के लिए जो परंपरागत तरीके अपनाए जाते रहे हैं, वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी खरे उतर रहे हैं। यह बात मुख्यालय में राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के तहत हिमालयन सोसायटी फॉर हेरिटेज एंड आर्ट कंजर्वेशन-हिमशाको के तत्वावधान में पांडुलिपियों के वैज्ञानिक व सुरक्षित तरीके से संरक्षण के लिए चल रहे एक माह के प्रशिक्षण शिविर में सामने आई है। प्रशिक्षण कार्यक्रम के प्रोजेक्ट प्रभारी संजय साह ने बताया कि पहाड़ पर पांडुलिपियों-पोथियों को रसोई में धुंवे के स्थान पर तथा सामान्यतया लाल कपड़े में पोटली की तरह बांध कर रखा जाता है। इधर देखने में आया है कि इस तरह रखी पोथियां बहुत पुरानी होने और धुंवे की वजह से भले धुंधली हो जाती हों, लेकिन उन पर कीड़ा नहीं लगता है, और वह सुरक्षित रहती हैं, तथा वैज्ञानिक तरीके से सफाई करने पर अपने मूल स्वरूप में लौट आती हैं। पुरानी पोथियों पर शोध भी कर रहे साह ने बताया कि धुंवे के स्थान व लाल कपड़े के साथ ही कापी किताबों में मोर पंख, सांप की कैंचुली रखने तथा आसपास कपूर की गोलियां रखने के परंपरागत तरीके भी प्रयोग किए जाते हैं, जो वास्तव में कीटरोधी प्रवृत्ति के होने के कारण पोथियों को कीड़ों से बचाते हैं। पुरानी पोथियों तथा किताबों को बचाने के लिए किताबों की रैकों को दीवार से सटाने के बजाय थोड़ी दूर रखना, महीने-दो महीने में उनकी झाड़-पोंछकर सफाई करना तथा उन्हें नमी से बचाना तथा कुछ-कुछ अंतराल में धूप के बजाए छाया में सुखाना लाभदायक रहता है। बताया कि संस्था पुरानी पोथियों के संरक्षण का बिना कोई शुल्क लिए संरक्षण करती है। पुरानी पोथियों को उनके मूल स्वरूप में लौटाने के लिए वैज्ञानिक तरीके से उनकी अम्लीयता का पता लगाया जाता है तथा उसी अनुसार अत्याधुनिक रसायनिक तरीकों से उनका उपचार किया जाता है। शिविर में मेजबान उत्तराखंड के साथ ही उत्तर प्रदेश, हिमांचल, जम्मू-कश्मीर, बिहार, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश व दिल्ली आदि प्रांतों के 20 प्रतिभागी अपने साथ लाई गई क्षतिग्रस्त पुरानी व कई दुर्लभ पांडुलिपियों के संरक्षण का प्रशिक्षण ले रहे हैं।

भारतीय प्राचीन ज्ञान के बारे में एक बेहद रोचक जानकारी :

भारत में घर-घर में गाई जाने वाली हनुमान चालीसा के एक अंश पर गौर कीजिए:

‘‘जुग (युग) सहस्त्र जोजन (योजन) पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।’’

यानी एक युग, सहस्त्र योजन की दूरी पर स्थित भानु यानी सूर्य को बालक हनुमान ने कोई मीठा फल समझ कर खा लिया।

अब इस स्लोक में दी गई दूरियों का विश्लेषण करें। एक युग =1200 वर्ष, एक सहस़्त्र =1000 वर्ष, एक योजन =आठ मील  अथवा  X 1.6= 12.8 किमी । इस प्रकार पृथ्वी से सूर्य की दूरी =12000 X 1000 X 8 मील  =9,60,00,000 मील अथवा  X 1.6 = 15,36,00,000 किमी ।

चाहें तो दूरियों की सत्यता की पुष्टि विकीपीडिया से भी की जा सकती है।  सूर्य से पृथ्वी की औसत दूरी लगभग  14,96,00,000 किलोमीटर या 9,26,60,000 मील बताई गई है, जो बड़ा अंतर नहीं है।” इससे पता चलता है कि भारतीय पौराणिक ज्ञान कितना प्रामाणिक और वैज्ञानिक था।

शिवलिंग के बारे में सच्चाई

शिवलिंग को भगवन शिव के गुप्तांग के रूप में प्रचारित किया जाता है। जोकि पूरी तरह गलत है। इस विषय में गलत प्रचार की वजह से हिन्दू भी शिवलिंग को शिव भगवान का गुप्तांग समझने लगे हैं और दूसरे हिन्दुओ को भी ये गलत जानकारी देने लगे हैं। इस आधार पर शिवलिंग की पूजा की आलोचना भी की जाती हैं। जबकि सच्चाई इससे बिलकुल अलग है। सभी भाषाओं की जननी देववाणी संस्कृत में लिंग का अर्थ ‘चिन्ह या प्रतीक’ होता है, जबकी जननेंद्रिय को संस्कृत मे ‘शिशिन’ कहा जाता है। इस प्रकार शिवलिंग का अर्थ हुआ ‘शिव का प्रतीक’
जैसे पुरुलिंग का अर्थ हुआ पुरुष का प्रतीक इसी प्रकार स्त्रीलिंग का अर्थ हुआ स्त्री का प्रतीक और नपुंसकलिंग का अर्थ हुआ नपुंसक का प्रतीक। अब यदि जो लोग पुरुष लिंग को पुरुष की जनेन्द्रिय समझ कर आलोचना करते है, तो उनके अनुसार ‘स्त्री लिंग’ का अर्थ ‘स्त्री का लिंग’ होना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं है, इस तरह यह बात साबित हो जाती है कि शिवलिंग का अर्थ लिंग या योनी नहीं होता। वैसे भी ‘शिवलिंग’ शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है। बागेश्वर जिले के कांडा स्थित माता वैष्णवी की सहित कई स्थानों पर देवियों की पार्थिव मूर्तियों को भी लिंग कहा जाता है। स्कन्द पुराण में यह भी कहा गया  है कि आकाश स्वयं लिंग है। वातावरण सहित घूमती धरती तथा सारे अनन्त ब्रह्माण्ड ( क्योंकि, ब्रह्माण्ड गतिमान है ) का अक्स/धुरी (axis) ही लिंग है। शिव लिंग का अर्थ अनन्त भी होता है अर्थात जिसका कोई अन्त नहीं है और ना ही शुरुआत।
दरअसल यह गलतफहमी भाषा के रूपांतरण और संस्कृत न जानने वाले मलेच्छों-यवनों के द्वारा हमारे पुरातन धर्म ग्रंथों को नष्ट कर दिए जाने पर तथा बाद में षडयंत्रकारी अंग्रेजों के द्वारा इसकी गलत व्याख्या करने  से उत्पन्न हुई है।

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि एक ही शब्द के विभिन्न भाषाओँ में अलग-अलग अर्थ निकलते हैं। उदाहरण के लिए, यदि हम हिंदी के एक शब्द “सूत्र” को ही ले लें तो सूत्र का मतलब डोरी/धागा, गणितीय सूत्र कोई भाष्य अथवा लेखन भी हो सकता है। जैसे कि नासदीय सूत्र ब्रह्म सूत्र इत्यादि । उसी प्रकार ‘अर्थ’ शब्द का भावार्थ सम्पति भी हो सकता है, और मतलब (मीनिंग) भी । ठीक इसी प्रकार शिवलिंग के सन्दर्भ में लिंग शब्द से अभिप्राय चिह्न, निशानी, गुण, व्यवहार या प्रतीक है। धरती उसका पीठ या आधार है और सब अनन्त शून्य से पैदा हो उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है। तथा प्रकाश स्तंभ/लिंग, अग्नि स्तंभ/लिंग, उर्जा स्तंभ/लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ/लिंग (cosmic pillar/lingam) जैसे कई अन्य नामों से भी संबोधित किया गया है।

ब्रह्माण्ड में दो ही चीजे हैं: ऊर्जा और प्रदार्थ। हमारा शरीर प्रदार्थ से निर्मित है और आत्मा ऊर्जा है। इसी प्रकार शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक बन कर शिवलिंग कहलाते हैं। ब्रह्मांड में उपस्थित समस्त ठोस तथा ऊर्जा शिवलिंग में निहित है। वास्तव में शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड की आकृति है (The universe is a sign of Shiva Lingam)। शिवलिंग भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-अनादि एकल रूप है तथा पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतीक भी है। अर्थात इस संसार में न केवल पुरुष का और न केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है अर्थात दोनों समान हैं।

अब बात करते हैं ‘योनि’ शब्द की। मनुष्ययोनि, पशुयोनि, पेड़-पौधों की योनि, जीव-जंतुओं की योनि। योनि का संस्कृत में  अर्थ प्रादुर्भाव या प्रकटीकरण होता है।कहा जाता है जीव अपने कर्म के अनुसार विभिन्न योनियों में जन्म लेता है। किन्तु कुछ धर्मों में पुनर्जन्म की मान्यता ही नहीं है। इसीलिए वे योनि शब्द के संस्कृत अर्थ को नहीं जानते हैं। जबकी हिंदू धर्म मे 84 लाख प्रकार के योनि बताई जाती हैं। यानी 84 लाख प्रकार के जन्म हैं। अब तो वैज्ञानिकों ने भी मान लिया है कि धरती में 84 लाख प्रजीव (पेड़, कीट,जानवर,मनुष्य आदि) है।

“मनुष्य योनी” : पुरुष और स्त्री दोनों को मिलाकर मनुष्य योनि होता है। अकेले स्त्री या अकेले पुरुष के लिए मनुष्य योनि शब्द का प्रयोग संस्कृत में नहीं होता है। तो कुल मिलकर लिंग का तात्पर्य प्रतीक से है। शिवलिंग का मतलब है पवित्रता का प्रतीक। दीपक की प्रतिमा बनाये जाने से इस की शुरुआत हुई, बहुत से हठ योगी दीपशिखा पर ध्यान लगाते हैं। हवा में दीपक की ज्योति टिमटिमा जाती है और स्थिर ध्यान लगाने की प्रक्रिया में अवरोध उत्पन्न करती है। इसलिए दीपक की प्रतिमा स्वरूप शिवलिंग का निर्माण किया गया। ताकि निर्विघ्न एकाग्र होकर ध्यान लग सके। लेकिन मुग़ल काल में कुछ विकृत व गंदी मानसिकता बाले तथा गोरे अंग्रेजों के गंदे दिमागों ने इस में गुप्तांगो की कल्पना कर ली और झूठी कुत्सित कहानियां बना ली और इसके पीछे के रहस्य की जानकारी न होने के कारण अनभिज्ञ भोले हिन्दुओं को भ्रमित किया गया |

आज भी बहुतायत हिन्दू इस दिव्य ज्ञान से अनभिज्ञ है। हिन्दू सनातन धर्म व उसके त्यौहार विज्ञान पर आधारित है। जोकि हमारे पूर्वजों ,संतों ,ऋषियों-मुनियों तपस्वीयों की देन है। आज विज्ञान भी हमारी हिन्दू संस्कृति की अदभुत हिन्दू संस्कृति व इसके रहस्यों को सराहनीय दृष्टि से देखता है व उसके ऊपर रिसर्च कर रहा है।

भारत में थे ‘रिवर्स गियर’ में भी चलने वाले विमान, भारतीय विज्ञान कांग्रेस में वैज्ञानिकों ने पेश किये शोध पत्र

भारतीय विज्ञान कांग्रेस के उद्घाटन के मौके पर पीएम नरेंद्र मोदी।

आखिरकार, दुनिया को हमने सुना ही दिया कि हम साइंस के मामले में ‘लुल’ नहीं हैं। राइट ब्रदर्स के प्लेन का आविष्कार करने से हजारों साल पहले ही हम अपने बनाए देसी विमानों से कई ‘गोलों’ का चक्कर लगा चुके थे । मुंबई यूनिवर्सिटी में हो रही 102वीं साइंस कांग्रेस में रविवार (04.01.2015) को इसी तरह की बातों वाला एक रिसर्च पेपर पढ़ा गया। वैदिक युग में भारत में ऐसे विमान थे जिनमें ‘रिवर्स गियर’ था, यानी वे उलटे भी उड़ सकते थे। इतना ही नहीं, वे दूसरे ग्रहों पर भी जा सकते थे। यह बात किसी पोंगा पंथी, धर्मांध अथवा संस्कृत अध्येता ने नहीं, वरन केरल में एक पायलट ट्रेनिंग सेंटर के प्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए कैप्टन आनंद जे बोडास और संस्कृत में एमए के साथ-साथ एमटेक भी कर चुके स्वामी विवेकानंद इंटरनैशनल स्कूल में प्राध्यापक अमीय जाधव ने भारतीय विज्ञान कांग्रेस में ‘प्राचीन भारतीय वैमानिकी तकनीक’ विषय पर एक रिसर्च पेपर पढ़ा। इस कार्यक्रम में दो नोबेल पुरस्कार से सम्मानित वैज्ञानिकों सहित दुनियाभर के बुद्धिजीवियों ने भी हिस्सा लिया

कैप्टन बोडास ने कहा कि ‘आधुनिक विज्ञान दरअसल वैज्ञानिक नहीं’ है। जो चीजें आधुनिक विज्ञान को समझ नहीं आतीं, यह उसका अस्तित्व ही नकार देता है। ‘वैदिक बल्कि प्राचीन भारतीय परिभाषा के अनुसार विमान एक ऐसा वाहन था, जो वायु में एक देश से दूसरे देश तक, एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप तक और एक ग्रह से दूसरे ग्रह तक जा सकता था। उन दिनों विमान विशालकाय होते थे। वे आज के विमानों जैसे एक सीध में चलने वाले नहीं थे, बल्कि दाएं-बाएं और यहां तक कि ‘रिवर्स’ भी उड़ सकते थे।’ आज से करीब 7,000 साल पहले ऐसे विमान बना लिए गए थे जिनसे एक देश से दूसरे देश, एक द्वीप से दूसरे द्वीप और एक ग्रह से दूसरे ग्रह तक भी पहुंचा जा सकता था। उन्होंने अपनी बात और विमानन तकनीक की ऐसी जानकारी के लिए 97 किताबों का रेफरेंस भी दिया। कैप्टन बोडास भारतवर्ष में हजारों साल पहले हासिल की गईं जिन तकनीकी उपलब्धियों का दावा करते हैं, उनका स्रोत वह वैमानिकी प्रक्रणम नामक एक ग्रंथ को बताते हैं, जो उनके मुताबिक ऋषि भारद्वाज ने लिखा था। वह कहते हैं, ‘इस ग्रंथ में विमान उड़ाने के 100 सेक्शन, आठ चैप्टर, 500 निर्देशों और 3,000 श्लोक हैं, लेकिन, दुख की बात है कि आज इनमें से सिर्फ 100-200 ही बचे हैं। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि बहुत वक्त गुजर गया, फिर विदेशियों ने हम पर राज किया और देश की बहुत सी चीजें चुरा ली गईं।’ कहा कि प्राचीन भारत की विमानन तकनीक इतनी उन्नत थी कि आज भी दुनिया उस तकनीक के आस-पास तक नहीं फटक सकी है। इन दोनों वैज्ञानिकों ने बताया कि विमान तकनीक का ज्ञान संस्कृत ग्रंथों के  इससे एक दिन पहले भारत के साइंस और टेक्नॉलजी मिनिस्टर डॉ. हर्षवर्धन ने यहां दावा किया था कि पाइथागोरस के प्रमेय की खोज भी भारत ने कर ली थी।

यह भी पढ़ें : गणित का मूल-‘शून्य’, ‘बीज गणित’ और  ‘पाइथागोरस ‘ प्रमेय मूलतः भारत की खोजें : हर्ष वर्धन

बोडास का कहना था कि भारतीयों ने सर्जरी के लिए 20 तरह के उन्नत यंत्र और 100 तरह के सर्जरी नाइफ बना लिए थे। ये दिखने में ब्लिकुल आजकल के सर्जिकल इंस्ट्रुमेंट्स की तरह ही थे। यही नहीं, फोड़े की सर्जरी के बाद स्किन का कलर और आकार पहले की तरह बनाने के लिए हमारे पास सात चरणों वाला उपचार भी था। बताया गया कि, यह तकनीक भी आज के मॉर्डन साइंस के पास नहीं है।

इंडियन साइंस कांग्रेस में यह विषय इसलिए रखा गया है, ताकि ‘संस्कृत साहित्य के नजरिए से भारतीय विज्ञान को देखा जा सके’। इस विषय पर होने वाले कार्यक्रम में संचालक की भूमिका मुंबई यूनिवर्सिटी के संस्कृत विभाग की अध्यक्ष प्रो. गौरी माहूलीकर निभाएंगी। कैप्टन बोडास की बात को सही ठहराते हुए उन्होंने कहा, ‘ऐसा पहली बार हो रहा है जब भारतीय विज्ञान कांग्रेस में एक सत्र में संस्कृत साहित्य के नजरिए से भारतीय विज्ञान को देखने की कोशिश होगी। इस साहित्य में वैमानिकी, विमान बनाने की जानकारी, पायलटों के पहनावे, खाने-पीने और यहां तक कि सात तरह के ईंधन की भी बात की गई है। अगर हम इन चीजों के बारे में बोलने के लिए संस्कृत के विद्वानों को बुलाते तो लोग हमें खारिज कर देते।’ इस भारतीय विज्ञान कांग्रेस में इस विषय पर चर्चा का कई जाने-माने वैज्ञानिक समर्थन कर रहे हैं, जिनमें आईआईटी बेंगलुरु में एयरोस्पेस इंजिनियरिंग के प्रोफेसर डा. एसडी शर्मा भी शामिल हैं।

अमेरिका से इस सम्मेलन में भाग लेने पहुंचे एक भारतीय वैज्ञानिक का कहना था, ‘ज्ञान हमेशा बढ़ता है, यह कभी थमता नहीं है। अगर यह सब ज्ञान पहले से ही मौजूद था तो मैं जानना चाहता हूं कि इसका विकास क्यों रुक गया? इसके बाद कोई विकास क्यों नहीं हुआ? यह कहां पर आकर रुका था? मैं इन आविष्कारों के घटनाक्रम के बारे में नहीं जानता था, लेकिन अब तो वाकई जानना चाहता हूं।’ एक और विशेषज्ञ ने कहा कि वैज्ञानिक को हमेशा सवाल खड़े करने चाहिए। उन्होंने कहा, ‘अगर यह ज्ञान और तकनीक किताबों में मौजूद थी तो इस पुरानी तकनीक को इस्तेमाल क्यों नहीं किया गया? अगर ऐसा कुछ करके आविष्कार किया जाता तो इस पर यकीन करना ज्यादा आसान हो जाता।’

गणित शास्त्र और शून्य भारत की विश्व को देन

गणित शास्त्र की परम्परा भारत में बहुत प्राचीन काल से ही रही है। गणित के महत्व को प्रतिपादित करने वाला एक श्लोक प्राचीन काल से प्रचलित है।

यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा।
तद्वद् वेदांगशास्त्राणां गणितं मूर्धनि स्थितम्‌।। (याजुष ज्योतिषम)

अर्थात्‌ जैसे मोरों में शिखा और नागों में मणि सबसे ऊपर रहती है, उसी प्रकार वेदांग और शास्त्रों में गणित सर्वोच्च स्थान पर स्थित है।

ईशावास्योपनिषद् के शांति मंत्र में कहा गया है-

ॐपूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात्‌ पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।

यह मंत्र मात्र आध्यात्मिक वर्णन नहीं है, अपितु इसमें अत्यंत महत्वपूर्ण गणितीय संकेत छिपा है, जो समग्र गणित शास्त्र का आधार बना। मंत्र कहता है, यह भी पूर्ण है, वह भी पूर्ण है, पूर्ण से पूर्ण की उत्पत्ति होती है, तो भी वह पूर्ण है और अंत में पूर्ण में लीन होने पर भी अवशिष्ट पूर्ण ही रहता है। जो वैशिष्ट्य पूर्ण के वर्णन में है वही वैशिष्ट्य शून्य व अनंत में है। शून्य में शून्य जोड़ने या घटाने पर शून्य ही रहता है। यही बात अनन्त की भी है।

हमारे यहां जगत के संदर्भ में विचार करते समय दो प्रकार के चिंतक हुए। एक इति और दूसरा नेति। इति यानी पूर्णता के बारे में कहने वाले। नेति यानी शून्यता के बारे में कहने वाले। यह शून्य का आविष्कार गणना की दृष्टि से, गणित के विकास की दृष्टि से अप्रतिम रहा है।

भारत गणित शास्त्र का जन्मदाता रहा है, यह दुनिया भी मानने लगी है। यूरोप की सबसे पुरानी गणित की पुस्तक “कोडेक्स विजिलेन्स” है। यह पुस्तक स्पेन की राजधानी मेड्रिड के संग्राहलय में रखी है। इसमें लिखा है- “गणना के चिन्हों से (अंकों से) हमें यह अनुभव होता है कि प्राचीन हिन्दुआें की बुद्धि बड़ी पैनी थी तथा अन्य देश गणना व ज्यामिति तथा अन्य विज्ञानों में उनसे बहुत पीछे थे। यह उनके नौ अंकों से प्रमाणित हो जाता है, जिनकी सहायता से कोई भी संख्या लिखी जा सकती है।”

नौ अंक और शून्य के संयोग से अनंत गणनाएं करने की सामर्थ्य और उसकी दुनिया के वैज्ञानिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका की वर्तमान युग के विज्ञानी लाप्लास तथा अल्बर्ट आईंस्टीन ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की है।

भारतीय अंकों की विश्व यात्रा की कथा विश्व के अनेक विद्वानों ने वर्णित की है। इनका संक्षिप्त उल्लेख पुरी के शंकराचार्य श्रीमत्‌ भारती कृष्णतीर्थ जी ने अपनी गणित शास्त्र की अद्भुत पुस्तक “वैदिक मैथेमेटिक्स” की प्रस्तावना में किया है। वे लिखते हैं “इस संदर्भ में यह कहते हर्ष होता है कि कुछ तथाकथित भारतीय विद्वानों के विपरीत आधुनिक गणित के मान्य विद्वान यथा प्रो. जी.पी. हाल्स्टैंड. प्रो. गिन्सबर्ग, प्रो. डी. मोर्गन, प्रो. हटन- जो सत्य के अन्वेषक तथा प्रेमी हैं, ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया और प्राचीन भारत द्वारा गणितीय ज्ञान की प्रगति में दिए गए अप्रतिम योगदान की निष्कपट तथा मुक्त कंठ से भूरि-भूरि प्रशंसा की है।”

शून्य (0) दिया मेरे भारत ने…

शून्य को अंकों की दुनिया में काफ़ी देर से शामिल किया गया था। सातवीं सदी में भारतीय गणितज्ञों द्वारा प्रचलन में लाए जाने तक शून्य को अंक तक का दर्जा नहीं दिया गया था। (भारत को 1 से 9 तक के अंकों के संकेतों का भी जनक माना जाता है जिनके ज़रिए तमाम संख्याएँ बनती हैं। इस व्यवस्था को अरबी-हिंदू अंक प्रणाली कहा जाता है।) शून्य को यूरोप लाया इतालवी गणितज्ञ फ़िबोनाचि ने 12वीं सदी में। शुरू में शून्य को इटली में संदेह के साथ देखा गया और 1299 में फ़्लोरेंस की सरकार ने इसके उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया था।

संस्कृत के प्राचीन शास्त्रों से पता चलता है कि शुरू से ही भारत में गणना और बड़ी संख्याओं के प्रति रुझान रहा है।

ललित विस्तार नामक ग्रंथ के एक आख्यान में बताया गया है कि कैसे एक बार गौतम बुद्ध को 1 से लेकर 421 शून्य वाली संख्या तक को गिनाने के लिए कहा गया था।

इनमें से कुछ विद्वानों के उदाहरण इस विषय में स्वत: ही विपुल प्रमाण प्रस्तुत करेंगे। प्रो. जी.पी. हाल्स्टेंड अपनी पुस्तक “गणित की नींव तथा प्रक्रियाएं” के पृष्ठ 20 पर कहते हैं, “शून्य के संकेत के आविष्कार की महत्ता कभी बखानी नहीं जा सकती है।” “कुछ नहीं” को न केवल एक नाम तथा सत्ता देना वरन्‌ एक शक्ति देना हिन्दू जाति का लक्षण है, जिनकी यह उपज है। यह निर्वाण को डायनमो की शक्ति देने के समान है। अन्य कोई भी एक गणितीय आविष्कार बुद्धिमत्ता तथा शक्ति के सामान्य विकास के लिए इससे अधिक प्रभावशाली नहीं हुआ।

इसी संदर्भ में बी.बी.दत्त अपने प्रबंध “संख्याआें को व्यक्त करने की आधुनिक विधि (इंडियन हिस्टोरिकल क्वार्टरली, अंक 3, पृष्ठ 530-450) में कहते हैं “हिन्दुआें ने दाशमलविक पद्धति बहुत पहले अपना ली थी। किसी भी अन्य देश की गणितीय अंकों की भाषा प्राचीन भारत के समान वैज्ञानिक तथा पूर्णता को नहीं प्राप्त कर सकी थी। उन्हें किसी भी संख्या को केवल दस बिंबों की सहायता से सरलता से तथा सुन्दरतापूर्वक व्यक्त करने में सफलता मिली। हिन्दू संख्या अंकन पद्धति की इसी सुन्दरता ने विश्व के सभ्य समाज को आकर्षित किया तथा उन्होंने इसे सहर्ष अपनाया।”

इसी संदर्भ में प्रो. गिन्सबर्ग “न्यू लाइट ऑन अवर न्यूमरल्स” लेख, जो बुलेटिन आफ दि अमेरिकन मैथेमेटिकल सोसायटी में छपा, के पृष्ठ 366-369 में कहते हैं, “लगभग 770 ई, सदी में उज्जैन के हिन्दू विद्वान कंक को बगदाद के प्रसिद्ध दरबार में अब्बा सईद खलीफा अल मन्सूर ने आमंत्रित किया। इस तरह हिन्दू अंकन पद्धति अरब पहुंची। कंक ने हिन्दू ज्योतिष विज्ञान तथा गणित अरबी विद्वानों को पढ़ाई। कंक की सहायता से उन्होंने ब्रह्मपुत्र के “ब्रह्म स्फूट सिद्धान्त” का अरबी में अनुवाद किया। फ़्रांसीसी विद्वान एम.एफ.नाऊ की ताजी खोज यह प्रमाणित करती है कि सातवीं सदी के मध्य में सीरिया में भारतीय अंक ज्ञात थे तथा उनकी सराहना की जाती थी।”

बी.बी. दत्त अपने लेख में आगे कहते हैं “अरब से मिश्र तथा उत्तरी अरब होते हुए ये अंक धीरे-धीरे पश्चिम में पहुंचे तथा ग्यारहवीं सदी में पूर्ण रूप से यूरोप पहुंच गए। यूरोपियों ने उन्हें अरबी अंक कहा, क्योंकि उन्हें अरब से मिले। किन्तु स्वयं अरबों ने एकमत से उन्हें हिन्दू अंक (अल-अरकान-अलहिन्द) कहा”।

‘समय’ पर भारत का दुनिया में सबसे समृद्ध ज्ञान

क्या हम जानते हैं भारतीय समय गणना दुनिया में सर्वश्रेष्ठ और आधुनिक वैज्ञानिक गणना से कहीं अधिक बेहतर है। वर्तमान में दुनिया में मान्य अंग्रेजी ग्रेगेरियन कलेंडर में लगातार कुछ अंतराल में घड़ियों के समय को पीछे करना पड़ता है। वर्ष 1752 के सितंबर माह में तो 11 दिन यानी करीब एक पखवाड़ा ही कलेंडर से गायब करने पड़े थे, और दो सितंबर के बाद सीधे 14 सितंबर की तिथि आ गई थी, यानी सितंबर 1752 के तीन, चार, पांच से लेकर 13 तक की तिथियों का कोई ऐतिहासिक अस्तित्व ही नहीं है। इसके उलट भारतीय समय गणना एक-एक सेंकेंड का सटीक हिसाब रखती है। यहां तक कि यह भी बताया गया है कि सृष्टि की शुरुआत कब हुई।

हेमाद्रि ग्रंथ में ब्रह्ममपुराण का कथन है- चैत मासे जगदब्रह्मा ससर्जप्रथमे हनि। शुक्ल पक्षे समग्रं तु तदा सूर्यादर्यो सति।।

अर्थात – चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के पहले सूर्याेदय पर ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी। इसी दिन से विक्रमी सम्वत् की शुरूआत होती है। आज भले ही कलैण्डर के अनुसार एक जनवरी को मनाया जाने वाला नव वर्ष ज्यादा चर्चित है, लेकिन इससे कही पहले अस्तित्व में आया हिन्दू विक्रमी सम्वत आज भी धार्मिंक अनुष्ठानों और मांगलिक कार्यों में तिथि व काल गणना का आधार बना हुआ है। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान से पूर्व ‘हरिः ॐ विष्णुः विष्णुः विष्णुः नमः परमात्मने श्री ब्रह्म पुराण पुरूषोत्तमाय श्री विष्णुराजज्ञया प्रवर्तमानस्याद्य तत्सत् अत्र पृथिण्याँ जम्बू द्वीपे भरत खण्डे आर्यावर्ते पुण्यक्षेत्रे हिमवत्पर्वतैकदेशे ब्रह्मणों द्वितिय प्रहराद्धे श्री श्वेत बाराह कल्पे कृत त्रेता द्वापरान्ते वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविशंतितमे कलियुगे कलियुगस्य प्रथम चरणे षटयब्दानां मध्ये अमुकनाम सम्वतसरे अमुकार्य ने अमुक ऋतौ अमुक मासे अमुक पक्षे अमुक तिथौ अद्य अहं अमुक गोत्रे अमुक शर्महि श्रुतिस्मृति पुरोणाक्त फला-वाप्तये अमुक कर्म करिष्यमान।’ मंत्र कहा जाता है, जिसमें भारतीय समय गणना के सबसे छोटे से सबसे बड़े घटकों तक का जिक्र किया जाता है। जिसका अर्थ है, ‘श्री विष्णु पुराण पुरूषोत्तम परमात्मा को नमस्कार वही सत्य है। यहाँ इस पृथ्वी में, जम्बू द्धीप में, ब्रह्मा के प्रथम दिन के द्वितिय प्रहरार्द्व में, श्री मन्वन्तर में अट्ठाईसवे कलियुग के प्रथम चरण में, साठ सम्वत्सरों के क्रम में से अमुक नाम के सम्वत्सर में अमुक अयन में, अमुक तिथि को आज अमुक ऋतु में, अमुक मास में, अमुक पक्ष में अमुक तिथि को आज अमुक गोत्र का अमुक नाम का श्रुति-स्मृति पुराणों मे वर्णित फल को प्राप्त करने हेतु अमुक कार्य करूँगा।’ इससे सिद्ध होता है कि अनादि काल से भारतीयों को समय का अत्यन्त सूक्ष्म ज्ञान था। वे काल एवं गृह नक्षत्रादि की स्थिति से पूर्ण परिचित रहते थे। भारतीय ज्योतिर्विज्ञान की इस काल-गणना के अनुसार वर्तमान वर्ष 2014, में 28 वें कलियुग के 4115 वर्ष, पृथ्वी की सृष्टि को अर्थात ब्रह्मा के दिनारम्भ हुए 1,97,29,49,115 वर्ष व्यतीत हो चुके है। पृथ्वी के सृष्टि योग होने में 1,70,64,000 वर्ष लगे हैं। इस प्रकार पृथ्वी पर वर्तमान सृष्टि को 1,95,58,85,115 वर्ष हो चुके है। वर्तमान में उत्तर भारत में ‘‘सौम्य युग’’ और दक्षिण भारत में ‘‘अहिर्बुध्न्य’’ नामक युग है। इस वर्ष ‘‘31 मार्च, वर्ष 2014 से विक्रमी ’पल्लवंग’ नामक (41वाँ) सम्वत्सर चल रहा है।’’ सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के शासनकाल से प्रचलित विक्रम सम्वत् 2071 और विक्रमादित्य के पौत्र धारानरेश शलिवाहन द्वारा प्रवर्तित शकारि सम्वत (शकाब्द) का 1936 वें वर्ष में प्रवेश हो रहा है।

■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■
8 अप्रैल, 2016 से शुरू हो रहे भारतीय नववर्ष “सम्वत 2073″ की हार्दिक शुभकामनायेँ”
■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■

■ स्वयं महसूस करें कि अंग्रेजी नए वर्ष 1 जनवरी और भारतीय नववर्ष में कौन बेहतर है ?

1 जनवरी को : ◆ न ऋतु बदली.. न मौसम
◆ न कक्षा बदली… न सत्र
◆ न फसल बदली…न खेती
◆ न पेड़ पोधों की रंगत
◆ न सूर्य चाँद सितारों की दिशा
◆ ना ही नक्षत्र।
नए वर्ष में कुछ तो नई अनुभूति होंनी ही चाहिए।

देखिये नए वर्ष में क्या-क्या बदल रहा है, जबकि 1 जनवरी को ऐसी कुछ नई अनुभूति नहीं होती हैं।
■ ईस्वी संवत का नया साल 1 जनवरी को और भारतीय नववर्ष (विक्रमी संवत) चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाता है। आईये देखते हैं दोनों का तुलनात्मक अंतर:
1. प्रकृति- 1 जनवरी को कोई अंतर नही जैसा दिसम्बर वैसी जनवरी.. जबकि चैत्र मास में चारो तरफ फूल खिल जाते हैं, पेड़ो पर नए पत्ते आ जाते हैं। चारो तरफ हरियाली मानो प्रकृति नया साल मना रही हो।
2. वस्त्र- दिसम्बर और जनवरी में वही वस्त्र, कंबल, रजाई, ठिठुरते हाथ पैर.. जबकि चैत्र मास में सर्दी जा रही होती है, गर्मी का आगमन होने जा रहा होता है।
3. विद्यालयो का नया सत्र- दिसंबर जनवरी वही कक्षा कुछ नया नहीं.. जबकि मार्च अप्रैल में स्कूलो का रिजल्ट आता है नई कक्षा नया सत्र यानि विद्यालयों में नया साल।
4. नया वित्तीय वर्ष- दिसम्बर-जनबरी में कोई खातों की क्लोजिंग नही होती.. जबकि 31 मार्च को बैंको की (audit) कलोसिंग होती है नए वही खाते खोले जाते है I सरकार का भी नया सत्र शुरू होता है।
5. कलैण्डर- जनवरी में नया कलैण्डर आता है.. चैत्र में नया पंचांग आता है। उसी से सभी भारतीय पर्व, विवाह और अन्य महूर्त देखे जाते हैं। इसके बिना हिन्दू समाज जीबन की कल्पना भी नही कर सकता इतना महत्वपूर्ण है ये कैलेंडर यानि पंचांग।
6. किसानो का नया साल- दिसंबर-जनवरी में खेतो में वही फसल होती है.. जबकि मार्च-अप्रैल में फसल कटती है नया अनाज घर में आता है तो किसानो का नया वर्ष और उतसाह।
7. पर्व मनाने की विधि- 31 दिसम्बर की रात नए साल के स्वागत के लिए लोग जमकर मदिरा पान करते है, हंगामा करते है, रात को पीकर गाड़ी चलने से दुर्घटना की सम्भावना, रेप जैसी वारदात, पुलिस प्रशासन बेहाल और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का विनाश.. जबकि भारतीय नववर्ष व्रत से शुरू होता है पहला नवरात्र होता है घर घर मे माता रानी की पूजा होती है I शुद्ध सात्विक वातावरण बनता है।
8. ऐतिहासिक महत्त्व- 1 जनवरी का कोई ऐतेहासिक महत्व नही है.. जबकि चैत्र प्रतिपदा के दिन महाराज विक्रमादित्य द्वारा विक्रमी संवत् की शुरुआत, भगवान झूलेलाल का जन्म, नवरात्रे प्रारंम्भ, ब्रहम्मा जी द्वारा सृष्टि की रचना इत्यादि का संबंध इस दिन से है।
■ अंग्रेजी कलेंडर की तारीख और अंग्रेज मानसिकता के लोगों के अलावा कुछ नही बदला..
■ जब ब्रह्माण्ड से लेकर सूर्य चाँद की दिशा, मौसम, फसल, कक्षा, नक्षत्र, पौधों की नई पत्तिया, किसान की नई फसल, विद्यार्थी की नई कक्षा, मनुष्य में नया रक्त संचरण आदि परिवर्तन होते है, जो विज्ञान आधारित है।..तो क्यों न अपनी मानसिकता को बदलें, विज्ञान आधारित भारतीय काल गणना को पहचानें, स्वयं सोचें और क्यों न मनायें 1 जनवरी के साथ चैत्र प्रतिपदा पर भी नया वर्ष..?
■ “केवल कैलेंडर बदलें.. अपनी संस्कृति नहीं” ■ आओ जागेँ जगायेँ, भारतीय संस्कृति अपनायेँ और आगे बढ़ें।
1752 calander

वर्ष 1752 का रोचक इतिहास, जब 2 सितम्बर के अगले दिन सीधे आया 14 सितम्बर

भारतीय पंचांग के अनुसार हर वर्ष का अलग राजा व मंत्री होने का विधान है, जिसके बारे में यह मंत्र स्थिति स्पष्ट करता है, ‘चैेत सित प्रतिपदियों वारों अर्कोदये स वर्शेषः’ अर्थात-चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा को जो बार होगा वही सम्वतसर का राजा होगा, (वैशाख) मेषार्क सक्रांन्ति का बार मंत्री होगा, कर्क सँँक्रान्ति का वार पूर्ण धन्येध, तुला संक्रान्ति का वार रशेरन, सिहं संक्रान्ति का वार नीरेसषं, आद्रा प्रवेश समय का वार मेधष, धनु संक्रान्ति का वार अग्र धान्येश होगा। और जिस वार को कर्क संक्रान्ति होगी उसी वार को मकर संक्रान्ति भी होगी।’’ एक अन्य मंत्र ‘ब्रहस्पतेमर्ध्यमरात्रि भोगात् संवत्सरं संहिततिका वदन्ति’ के अनुसार वृहस्पति ग्रह मध्यम गति से जब एक राशि को भोगता है, तो उतने समय को सम्वत्सर कहते है। सम्वत्सर 60 होते है। वर्तमान सम्वत्सर का नाम ‘प्लवंग’ है, जो 41वाँ सम्वत्सर है। इन 60 सम्वत्सरों में से प्रथम 20 की संज्ञा ब्रह्मा, अगले 20 की विष्णु एवं शेष 20 की रूद्र संज्ञा होती है जो क्रमशः सृष्टि स्थिति व प्रलय के तुल्य फलदायिनि है। भारतीय मान्यतानुसार- सृष्टि की रचना की शुरूआत ब्रह्मा जी की प्रेरणा से स्वायम्भुव मनु तथा शतरूपा ने की और उस समय सृष्टि की रचना के साथ काल का विभाजन भी हुआ। श्रीमद्भागवत् के तृतीय सर्ग के एकादश अध्याय के अनुसार-सृष्टि का सबसे सूक्ष्मतम अंश परमाणु होता है, दो परमाणु मिलकर एक अणु बनाते है। तीन अणुओं के मिलने से एक ‘त्रसरेणु’ तथा तीन त्रसरेणु को पार करने में सूर्य को जितना समय लगता है उसे ‘त्रुटि’ कहते है। त्रुटि का सौ गुना काल ‘बेध’ कहलाता है। तीन बेध का एक ‘लव’ होता है। तीन लव से एक ‘निमेष’ तीन निमेष से लव का ‘क्षण’ पाँच क्षण का एक ‘लघु’ तथा 15 लघु की एक ‘नाड़िका’ दो नाड़िकाओं का एक ‘मुहूर्त’ होता है। छः या सात नाड़िकाएँ मिलकर ‘प्रहर’ बनाती है। यह प्रहर ‘याम’ कहलाता है, जो मनुष्य के दिन-रात का चौथा भाग होता है। चार-चार प्रहर के दिन-रात होते है। 15 दिन-रात का एक ‘पक्ष’ होता है। यह ‘कृष्ण-पक्ष’ एवं ‘शुक्ल पक्ष’ यानी दो प्रकार का होता है। दो पक्षों का एक ‘मास’ होता है। दो मास की एक ‘ऋतु’ होती है। छः मास अर्थात तीन ऋतुओं का एक ‘अयन’ होता है। यह अयन ‘उत्तरायण’ एवं ‘दक्षिणायन’ यानी दो प्रकार का होता है। दो अयन मिलकर एक ‘वर्ष’ बनाते हैैं। इसके अलावा ‘विष्णु पुराण द्वितीय अंश’ में वर्णित प्राचीन भारतीय काल-गणना के अनुसार ‘15 निमेष की एक काष्ठ, 30 काष्ठ की एक कला, 30 कला का एक मुहूर्त एवं 30 मुहूर्त का एक सम्पूर्ण दिन-रात्रि बनता है। सूर्याेदय से लेकर तीन मुहूर्त की गति के काल को प्रातः काल कहते है। यह सम्पूर्ण दिन का पाँचवा भाग होता है। इस प्रकार प्रातः काल के तीन मुहूर्त का समय सग्ङव कहलाता है तथा संग्ङवकाल के तीन मुहूर्त का मध्याह्न होता है। अपराह्न के बीतने पर सायंकाल आता है।’ समय ज्ञात करने के लिए भारत में सदियों पूर्व जल घड़ी का प्रयोग किया जाता था। जिसके लिए तांबे के बर्तन में छेद कर दिया जाता था, जिसमें सोने की 4 अंगुल लम्बी सलाई से बर्तन के पैंदे में छेद कर दिया जाता था तथा जब वह पूरी तरह भर जाता, जल में डूब जाता, उतने समय को एक नाड़िका कहा जाता था। जबकि वर्तमान मानव सभ्यता 1500-1300 ईसवी पूर्व मिश्र में सूर्य घड़ी का और सन् 1325 में मिश्र में ही पहली घड़ी का अविष्कार कर पाई। कहने की जरूरत नहीं कि जब शेष विश्व के लोग दिन, रात, मास, तक के नाम नही जानते थे, भारतीय मनीषियों ने काल गणना के सुक्ष्म रूप से लेकर ब्रह्माण्ड से प्रलय तक की दीर्घतम गणना कर ली थी। समय गणना में सौर मण्डल को 360 अंशों में बाँटा गया और फिर इन 360 अंशों को 30-30 अंशों की बारह राशियाँ समय गणना के लिए तीन शब्द घंटा, मिनट, सेकेेड प्रचलित है। जिन्हें संस्कृत भाषा में ‘अहोरात्र’ के नाम से जाना जाता है। अहोरात्र का अर्थ-दिन-रात से है। जबकि घंटे के लिए ‘होरा’, मिनट के लिए ‘निमेज’ तथा सेकेंड के लिए ‘अनिमेष’ शब्द का प्रयोग किया गया है। एक अहोरात्र का मान 60 घड़ी या 24 घंटे होता है। दिनों का नाम सौर मण्डल मे स्थित ग्रहोें के आधार पर रखा गया, जो उनकी गति से निर्धारित होता है। सूर्य सौर मंडल का मुख्य ग्रह है, इसलिए प्रथम दिन रविवार कहलाता था इसी प्रकार मंगल, बुध, गुरू, शुक्र, व शनिवार निर्धारित होते है। चार सप्ताह को मिलाकर एक मास, बारह महीनों को मिलाकर एक वर्ष बनता है। भारत में मासों (माह) का नामकरण चन्द्रमा के बारह भ्रमण अवधि वृत्तों पर आधारित है, जो यूरोपीय मासों की अपेक्षा कई अधिक वैज्ञानिक है। प्रत्येक मास की पूर्णिमा तिथि को चन्द्रमा जिस नक्षत्र का भोग करता है उसी के अनुसार उस मास का नाम पड़ जाता है जैसे-चैत्र मास की पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा ‘चित्रा’ नक्षत्र में रहता हैं अतः उस मास का नाम पड़ गया ‘चैत्र’ इसी प्रकार शेष ग्यारह मासो की पूर्णिमा तिथि को चन्द्रमा क्रमशः विशाखा, ज्येष्ठा, पूर्वाषाढ़ा श्रावण, पूर्वभाद्रपद अश्विनी, कृतिका, मृगशिरा, पुण्य, मघा, तथा पूर्वाफाल्गुनी में स्थित होता है। अतः इन मासों का नाम- चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़ श्रावण, भाद्रपद, अश्विनि, कार्तिक, मार्गाशीर्ष, पौष, माघ तथा फाल्गुन पड़े। अग्नि पुराण के अनुसार-60 सम्वत्सर का पहला मण्डल समाप्त हो जाने के पश्चात अलग मण्डल पुनः इन्ही नामों से जाना जाता है।

यह भी पढ़ें : ‘काले-मैकालों’ का नया साल सबको मुबारक हो यारो !

इस प्रकार देखा जाए तो भारतीय संस्कृति सबसे प्राचीन तथा इसकी काल गणना अत्यन्त सूक्ष्म है। जबकि वर्तमान समय में लोक प्रचलित-‘‘ग्रेगोरियन कलैंडर’’ को वर्तमान स्वरूप 1752 ई॰ में ‘पोप ग्रेगरी’ ने दिया था। तभी से इसे ‘ग्रेगरियन कलैंडर’ कहा जाता है। इसके पहले इसमें समय-समय में संशोधन होते रहे। ईसा के जन्म के बाद ही जनवरी को पहला मास माना गया, जबकि इसके पूर्व ईस्वी कलैंडर भी मार्च से प्रारम्भ होता था जो भारतीय चैत्र के समकालीन था। ग्रेगोरियन कलेंडर में आज भी सितम्बर (7वां) अक्टूबर (8वाँ) आदि नाम वैसे ही हैं, जब कि वे अब नवें तथा दसवें माह हैं।

गुरुत्वाकर्षण के असली खोजकर्ता-न्यूटन नहीं भास्कराचार्य 

गुरुत्वाकर्षण की खोज का श्रेय न्यूटन को दिया जाता है। माना जाता है की सन 1666 में गुरुत्वाकर्षण की खोज न्यूटन ने मात्र 350 साल पहले की। परन्तु महर्षि भाष्कराचार्य ने न्यूटन से लगभग 500 वर्ष पूर्व ही पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति पर एक पूरा ग्रन्थ रच डाला था |

भास्कराचार्य प्राचीन भारत के एक प्रसिद्ध गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री थे। इनका जन्म 1114 ई0 में हुआ था। उज्जैन में स्थित वेधशाला के प्रमुख भास्कराचार्य थे। यह वेधशाला प्राचीन भारत में गणित और खगोल शास्त्र का अग्रणी केंद्र था। जब इन्होंने “सिद्धान्त शिरोमणि” नामक विशाल ग्रन्थ लिखा तब वें मात्र 36 वर्ष के थे। “सिद्धान्त शिरोमणि” के चार भाग हैं:-

(1) लीलावती
(2) बीजगणित
(3) गोलाध्याय और
(4) ग्रह गणिताध्याय।

लीलावती भास्कराचार्य की पुत्री का नाम था। अपनी पुत्री के नाम पर ही उन्होंने पुस्तक का नाम लीलावती रखा। यह पुस्तक पिता-पुत्री संवाद के रूप में लिखी गयी है। लीलावती में बड़े ही सरल और काव्यात्मक तरीके से गणित और खगोल शास्त्र के सूत्रों को समझाया गया है।

भास्कराचार्य सिद्धान्त की बात कहते हैं कि वस्तुओं की शक्ति बड़ी विचित्र है-“मरुच्लो भूरचला स्वभावतो यतो, विचित्रावतवस्तु शक्त्य:।।” :- सिद्धांतशिरोमणि गोलाध्याय – भुवनकोश

आगे कहते हैं- “आकृष्टिशक्तिश्च मही तया यत् खस्थं, गुरुस्वाभिमुखं स्वशक्तत्या। आकृष्यते तत्पततीव भाति,
समेसमन्तात् क्व पतत्वियं खे।।” :– सिद्धांतशिरोमणि गोलाध्याय – भुवनकोश

अर्थात् पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है। पृथ्वी अपनी आकर्षण शक्ति से भारी पदार्थों को अपनी ओर खींचती है और आकर्षण के कारण वह जमीन पर गिरते हैं। पर जब आकाश में समान ताकत चारों ओर से लगे, तो कोई कैसे गिरे? अर्थात् आकाश में ग्रह निरावलम्ब रहते हैं क्योंकि विविध ग्रहों की गुरुत्व शक्तियाँ संतुलन बनाए रखती हैं।

ऐसे ही अगर यह कहा जाय की विज्ञान के सारे आधारभूत अविष्कार भारत भूमि पर हमारे विशेषज्ञ ऋषि मुनियों द्वारा हुए तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी ! गुरुत्वाकर्षण की खोज हजारों वर्षों पूर्व ही की जा चुकी थी जैसा की महर्षि भारद्वाज रचित ‘विमान शास्त्र ‘ के बारे में बताया था । विमान शास्त्र की रचना करने वाले वैज्ञानिक को गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत के बारे में पता न हो ये हो ही नही सकता क्योंकि किसी भी वस्तु को उड़ाने के लिए पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति का विरोध करना अनिवार्य है। जब तक कोई व्यक्ति गुरुत्वाकर्षण को पूरी तरह नही जान ले उसके लिए विमान शास्त्र जैसे ग्रन्थ का निर्माण करना संभव ही नही |

हजारों साल पहले ऋषियों के असाधारण आविष्कार 

आचार्य कणाद: कणाद परमाणुशास्त्र के जनक माने जाते हैं। आधुनिक दौर में अणु विज्ञानी जॉन डाल्टन के भी हजारों साल पहले आचार्य कणाद ने यह रहस्य उजागर किया कि द्रव्य के परमाणु होते हैं।

भास्कराचार्य : आधुनिक युग में धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति (पदार्थों को अपनी ओर खींचने की शक्ति) की खोज का श्रेय न्यूटन को दिया जाता है। किंतु बहुत कम लोग जानते हैं कि गुरुत्वाकर्षण का रहस्य न्यूटन से भी कई सदियों पहले भास्कराचार्यजी ने उजागर किया। भास्कराचार्यजी ने अपने ‘सिद्धांतशिरोमणि’ ग्रंथ में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के बारे में लिखा है कि ‘पृथ्वी आकाशीय पदार्थों को विशिष्ट शक्ति से अपनी ओर खींचती है। इस वजह से आसमानी पदार्थ पृथ्वी पर गिरता है’।

आचार्य चरक : ‘चरकसंहिता’ जैसा महत्तवपूर्ण आयुर्वेद ग्रंथ रचने वाले आचार्य चरक आयुर्वेद विशेषज्ञ व ‘त्वचा चिकित्सक’ भी बताए गए हैं। आचार्य चरक ने शरीरविज्ञान, गर्भविज्ञान, औषधि विज्ञान के बारे में गहन खोज की। आज के दौर की सबसे ज्यादा होने वाली डायबिटीज, हृदय रोग व क्षय रोग जैसी बीमारियों के निदान व उपचार की जानकारी बरसों पहले ही उजागर की।

भारद्वाज : आधुनिक विज्ञान के मुताबिक राइट बंधुओं ने वायुयान का आविष्कार किया। वहीं हिंदू धर्म की मान्यताओं के मुताबिक कई सदियों पहले ऋषि भारद्वाज ने विमानशास्त्र के जरिए वायुयान को गायब करने के असाधारण विचार से लेकर, एक ग्रह से दूसरे ग्रह व एक दुनिया से दूसरी दुनिया में ले जाने के रहस्य उजागर किए। इस तरह ऋषि भारद्वाज को वायुयान का आविष्कारक भी माना जाता है।

कपिल मुनि: भगवान विष्णु का पांचवां अवतार माने जाते हैं। इनके पिता कर्दम ऋषि थे। इनकी माता देवहूती ने विष्णु के समान पुत्र चाहा। इसलिए भगवान विष्णु खुद उनके गर्भ से पैदा हुए। कपिल मुनि ‘सांख्य दर्शन’ के प्रवर्तक माने जाते हैं। इससे जुड़ा प्रसंग है कि जब उनके पिता कर्दम संन्यासी बन जंगल में जाने लगे तो देवहूती ने खुद अकेले रह जाने की स्थिति पर दुःख जताया। इस पर ऋषि कर्दम देवहूती को इस बारे में पुत्र से ज्ञान मिलने की बात कही। वक्त आने पर कपिल मुनि ने जो ज्ञान माता को दिया, वही ‘सांख्य दर्शन’ कहलाता है।

पतंजलि : आधुनिक दौर में जानलेवा बीमारियों में एक कैंसर या कर्करोग का आज उपचार संभव है। किंतु कई सदियों पहले ही ऋषि पतंजलि ने कैंसर को रोकने वाला योगशास्त्र रचकर बताया कि योग से कैंसर का भी उपचार संभव है।

शौनक : वैदिक आचार्य और ऋषि शौनक ने गुरु-शिष्य परंपरा व संस्कारों को इतना फैलाया कि उन्हें दस हजार शिष्यों वाले गुरुकुल का कुलपति होने का गौरव मिला। शिष्यों की यह तादाद कई आधुनिक विश्वविद्यालयों तुलना में भी कहीं ज्यादा थी।

महर्षि सुश्रुत : ये शल्यचिकित्सा विज्ञान यानी सर्जरी के जनक व दुनिया के पहले शल्यचिकित्सक (सर्जन) माने जाते हैं। वे शल्यकर्म या आपरेशन में दक्ष थे। महर्षि सुश्रुत द्वारा लिखी गई ‘सुश्रुतसंहिता’ ग्रंथ में शल्य चिकित्सा के बारे में कई अहम ज्ञान विस्तार से बताया है। इनमें सुई, चाकू व चिमटे जैसे तकरीबन 125 से भी ज्यादा शल्यचिकित्सा में जरूरी औजारों के नाम और 300 तरह की शल्यक्रियाओं व उसके पहले की जाने वाली तैयारियों, जैसे उपकरण उबालना आदि के बारे में पूरी जानकारी बताई गई है।

जबकि आधुनिक विज्ञान ने शल्य क्रिया की खोज तकरीबन चार सदी पहले ही की है। माना जाता है कि महर्षि सुश्रुत मोतियाबिंद, पथरी, हड्डी टूटना जैसे पीड़ाओं के उपचार के लिए शल्यकर्म यानी आपरेशन करने में माहिर थे। यही नहीं वे त्वचा बदलने की शल्यचिकित्सा भी करते थे।

विश्वामित्र : ऋषि बनने से पहले विश्वामित्र क्षत्रिय थे। ऋषि वशिष्ठ से कामधेनु गाय को पाने के लिए हुए युद्ध में मिली हार के बाद तपस्वी हो गए। विश्वामित्र ने भगवान शिव से अस्त्र विद्या पाई। इसी कड़ी में माना जाता है कि आज के युग में प्रचलित प्रक्षेपास्त्र या मिसाइल प्रणाली हजारों साल पहले विश्वामित्र ने ही खोजी थी। ऋषि विश्वामित्र ही ब्रह्म गायत्री मंत्र के दृष्टा माने जाते हैं। विश्वामित्र का अप्सरा मेनका पर मोहित होकर तपस्या भंग होना भी प्रसिद्ध है। शरीर सहित त्रिशंकु को स्वर्ग भेजने का चमत्कार भी विश्वामित्र ने तपोबल से कर दिखाया।

गर्गमुनि : गर्ग मुनि नक्षत्रों के खोजकर्ता माने जाते हैं। यानी सितारों की दुनिया के जानकार। ये गर्गमुनि ही थे, जिन्होंने श्रीकृष्ण एवं अर्जुन के के बारे नक्षत्र विज्ञान के आधार पर जो कुछ भी बताया, वह पूरी तरह सही साबित हुआ। कौरव-पांडवों के बीच महाभारत युद्ध विनाशक रहा। इसके पीछे वजह यह थी कि युद्ध के पहले पक्ष में तिथि क्षय होने के तेरहवें दिन अमावस थी। इसके दूसरे पक्ष में भी तिथि क्षय थी। पूर्णिमा चौदहवें दिन आ गई और उसी दिन चंद्रग्रहण था। तिथि-नक्षत्रों की यही स्थिति व नतीजे गर्ग मुनिजी ने पहले बता दिए थे।

बौद्धयन : भारतीय त्रिकोणमितिज्ञ के रूप में जाने जाते हैं। कई सदियों पहले ही तरह-तरह के आकार-प्रकार की यज्ञवेदियां बनाने की त्रिकोणमितिय रचना-पद्धति बौद्धयन ने खोजी। दो समकोण समभुज चौकोन के क्षेत्रफलों का योग करने पर जो संख्या आएगी, उतने क्षेत्रफल का ‘समकोण’ समभुज चौकोन बनाना और उस आकृति का उसके क्षेत्रफल के समान के वृत्त में बदलना, इस तरह के कई मुश्किल सवालों का जवाब बौद्धयन ने आसान बनाया।

अत्याधुनिक होकर वापस महर्षि सुश्रुत के दौर में पहुंच गई नेत्र चिकित्सा

Dr. Vinod Tiwari

डा. विनोद तिवारी

260 वर्ष पूर्व आयुर्वद की सुश्रुत संहिता में बताई गई तकनीक पर ही आधारित है मोतियाबिंद की अत्याधुनिक टॉपिकल एनेस्थीसिया विधि
बिना चीरा, बिना टांका, बिना इंजक्शन के होता है ऑपरेशन, ऑपरेशन के बाद तत्काल आंखों से देख सकते हैं मरीज
नवीन जोशी, नैनीताल। जी हां, सुनने में कुछ अजीब जरूर लग सकता है, पर देश के जाने-माने नेत्र शल्यक डा. विनोद तिवारी का यही कहना है। डा. विनोद तिवारी सिलसिलेवार बताते हैं कि कैसे देश-दुनिया में मोतियाबिंद के ऑपरेशन की तकनीक अत्याधुनिक होते हुए एक तरह से 2600 वर्ष पूर्व शल्यक्रिया के पितामह कहे जाने वाले महर्षि सुश्रुत द्वारा प्रयुक्त तकनीक की ओर ही लौट आई है।
उल्लेखनीय है कि नैनीताल के मूल निवासी डा. तिवारी उत्तर भारत के मोतियाबिंद की फेको इमल्सिफिकेशन तकनीक से ऑपरेशन करने वाले शुरुआती चिकित्सकों में शामिल हैं। उनका मोदीनगर यूपी में अपना नेत्र चिकित्सालय है, और वह अब तक कई जन्मान्धों सहित एक लाख से अधिक नेत्र रोगियों के ऑपरेशन कर उनकी आंखों की रोशनी लौटा चुके हैं, जिसमें पहाड़ के हजारों लोगों के निःशुल्क ऑपरेशन भी शामिल हैं। नैनीताल में नयना ज्योति संस्था के तत्वावधान में निःशुल्क शिविर चलाने वाले डा.तिवारी ने ‘राष्ट्रीय सहारा’ से विशेष बातचीत में मोतियाबिंद चिकित्सा के महर्षि सुश्रुत के दौर में वापस लौटने की बात बताते हुए देश के समृद्ध पुरातन ज्ञान-विज्ञान की ओर ध्यान आकृष्ट किया। बताया कि देश-दुनिया में मोतियाबिंद के आधुनिक उपचार की शुरुआत मोतियाबिंद को तकनीकें महर्षि सुश्रुत की प्रविधि के उलट मोतियाबिंद को आंखों के अंदर के बजाय बाहर लाकर करने की इंट्रा कैप्सुलर तकनीक से हुई थी। शुरुआती तकनीक में भी टांका लगाने की जरूरत नहीं होती थी, पर आगे 10 दिन तक आंख पर सफेद पट्टी और फिर तीन माी तक हरी पट्टी बांधी जाती थी। इस दौरान रोगी को बड़ी मुश्किल में बिना करवट बदले रहना पड़ता था। इसके बाद 10-12 नंबर का मोटा चश्मा दिया जाता था। आगे इंट्राकुलर लेंस की तकनीक में बड़ा 14 मिमी का चीरा लगाया जाता था। फिर फेको इमल्सिफिकेशन की बेहतर तकनीक आई, जिसमें मात्र तीन मिमी का चीरा लगाना पड़ता है। इसके बाद माइक्रो फेको तकनीक में 2.2 मिमी का चीरा लगाने की तकनीक से आंखों के ऑपरेशन होने लगे, जबकि अब टॉपिकल एनस्थीसिया तकनीक आई है, इसमें आंख में बेहोशी का इंजक्शन भी नहीं लगाना पड़ता है, और टांके व पट्टी की जरूरत भी नहीं पड़ती है, और रोगी ऑपरेशन के तत्काल बाद अपनी आंखों से देखते हुए ऑपरेशन थियेटर से बाहर आ सकते हैं, तथा अगले दिन से ही रसोई या वाीन चलाने जैसे कार्य भी कर सकते हैं। इस तकनीक में रोगी की आंखों में बेहोशी की दवाई की एक बूंद डालकर मोतियाबिंद को महर्षि सुश्रुत की ही भांति पीछे खिसका दिया जाता है। डा. तिवारी दोनों तकनीकों को समान बताते हुए कहते हैं कि महर्षि सुश्रुत और आज की टॉपिकल एनस्थीसिया तकनीक में केवल मशीन और तकनीक का फर्क आ गया है, दोनों में यह समानता भी है कि दोनों तकनीकों में आंख के ‘लिंबस’ नाम के हिस्से से मशीन को प्रवेश कर ऑपरेशन किया जाता है। उन्होंने बताया कि नैनीताल में भी डेड़ दर्जन रोगियों के इस विधि से सफल ऑपरेशन किये जा चुके हैं।

सुश्रुत इस तरह करते थे आंखों की शल्य क्रिया

डा. तिवारी बताते हैं कि ईसा से 600 वर्ष पूर्व आयुर्वेद के अंतर्गत आने वाली सुश्रुत संहिता लिखने वाले व धन्वंतरि के शिष्य कहे जाने वाले महर्षि सुश्रुत मोतियाबिंद का ऑपरेशन आंख में पतली गर्म कर स्टरलाइज की गई सींक डालकर करते थे, वह सींक से आंख के मोतियाबिंद को पीछे की ओर धकेल देते थे, जिससे आंख तात्कालिक तौर पर ठीक हो जाती थी। हालांकि यह तकनीक मोतियाबिंद को बाहर न निकाले जाने की वजह से तब बहुत अच्छी नहीं थी और कुछ समय बाद आंख पूरी तरह ही खराब हो जाती थी, लेकिन साफ तौर पर यह का जा सकता है कि उस दौर में भी सुश्रुत भारत में आंखों के ऑपरेशन करते थे। सुश्रुत की तकनीक को अब ‘कॉचिंग’ तकनीक कहा जाता है, और दक्षिण अफ्रीका के कई गरीब देशों में अब भी यह विधि प्रयोग की जाती है।

उम्र बढ़ने पर हर व्यक्ति को होता है मोतियाबिंद

नेत्र विशेषज्ञ डा. विनोद तिवारी का कना है कि उम्र बढ़ने पर 56 की आयु से कमोबेश हर व्यक्ति को मोतियाबिंद की शिकायत होती है। पहाड़ पर ईधन के धुंवे की वजह से इसके अधिक मामले होते हैं। इधर पहाड़ पर 30 से कम उम्र के कुछ लोगों को भी मोतियाबिंद की शिकायत मिली है। आधुनिक खानपान को इसका कारण माना जा सकता है।

Advertisements

13 responses to “आधुनिक विज्ञान से कहीं अधिक समृद्ध और प्रामाणिक था भारतीय ज्ञान

  1. आपके विचारो से सहमत हूँ … वास्तव में विज्ञानं के नाम पर जैसे होड़ लगी हो अपनी वर्षो पुरानी संस्कृति संस्कार आस्था विशवास से दूर करने की

    Like

  2. पिंगबैक: तरुण विजय ने पूरा किया कुमाऊं विवि में नैनो साइंस एवं नैनो तकनीकी केंद्र का सपना | नवीन समाचार : हम ·

  3. पिंगबैक: ‘काले-मैकालों’ का नया साल सबको मुबारक हो यारो ! | नवीन समाचार : हम बताएंगे नैनीताल की खिड़की से दे·

  4. मुझे ज्यादा तो ज्ञान नही है लेकिन जो हमारी प्राचीन परम्पराओ (जिन्हें आजकल अंध्वविश्वास बोलते ) का सटीक वैज्ञानिक मतलब होता है हमारी प्राचीन विज्ञान आज से काफी विकसित और प्रकृति को नुकसान भी नही पहुचाती थी
    मुझे अपनी संस्कृति पर गर्व है
    जय हिन्द

    Like

  5. पिंगबैक: ‘प्रोक्सिमा-बी’ पर जीवन की संभावनाओं के प्रति बहुत आशान्वित नहीं वैज्ञानिक – नवीन समाचार : ह·

  6. पिंगबैक: गंगा-यमुना के बाद ग्लेशियर, नदी, नाले, झील, जंगल, चरागाह भी अब ‘जीवित मानव’ – नवीन समाचार : हम बत·

  7. पिंगबैक: गंगा-यमुना के बाद ग्लेशियर, नदी, नाले, झील, जंगल, चरागाह भी अब ‘जीवित मानव’ – नवीन समाचार : हम बत·

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s