ग्लोबल वार्मिग की वजह से ही होती है बेमौसम व कम-ज्यादा बारिश


नवीन जोशी नैनीताल। सामान्यत: कयास ही लगाए जाते हैं कि पहाड़ों पर बेमौसम और कभी बहुत कम तो कभी बहुत अधिक मात्रा में होने वाली अनियमित बारिश की मूल वजह ग्लोबल वार्मिग है। काठमांडू स्थित संस्था इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीमोड) द्वारा हिंदुकुश हिमालय में जलवायु परिवर्तन पर कराए गए एक अंतरराष्ट्रीय शोध की रिपोर्ट में दुनियाभर के पहाड़ों और हिंदुकुश हिमालय की उपयोगिता और बीते कुछ वर्षो में यहां बढ़े तापमान के आंकड़ों के आधार पर इन कयासों पर अपनी मुहर लगाई गई है तथा इस विषय में आगे और अधिक बड़े, विस्तृत व गंभीर शोध अध्ययन किये जाने की अनुशंसा की गई है। आईसीमोड के लिए भारत के सुरेंद्र पी. सिंह, भीम सिंह कार्की व एकलव्य शर्मा के साथ ही विदेशी शोधकर्ता ईसाबेल्ला बागेनाना- खड़का के द्वारा किए गए इस शोध अध्ययन की रिपोर्ट के अनुसार अफगानिस्तान से पाकिस्तान, भारत, नेपाल और चीन होते हुए म्यांमार तक फैले हिंदुकुश हिमालय से एक ओर ‘वाटर टावर ऑफ एशिया’ के रूप में सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र, मेकोंग, चांच व येलो जैसी नदियां निकलती हैं तथा यह हिमाच्छादित पर्वतों के साथ ही अपने यहां मौजूद 50 हजार ग्लेशियरों पर पानी को बर्फ के रूप में जमाकर तथा बड़े तालों, जल कुंडों व नदियों में भी सतही जल को एवं परोक्ष तौर पर भू जल को भी बड़ी मात्रा में संरक्षित करते हैं और दूसरी ओर दुनिया के सबसे युवा पहाड़ होने की वजह से भौगोलिक व पारिस्थितिकीय तौर पर दुनिया के सर्वाधिक संवेदनशील और कमजोर क्षेत्र भी हैं। यहां के पर्वतीय क्षेत्र वैश्वीकरण के प्रभावों से सबसे कम प्रभावित यानी अविकसित क्षेत्र हैं। दुनिया में आई हरित क्रांति का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। यह स्वयं सबसे कम कार्बनिक उत्सर्जन करते हैं, लेकिन निचले मैदानी क्षेत्रों से आने वाले हवा के प्रदूषित कण ऊपर उठकर यहां हिमालय की बर्फ पर इकट्ठे होकर वहां केदारनाथ के चोराबाड़ी और नेपाल के अन्नपूर्णा व एवरेस्ट पर्वतों पर हालिया वर्षो में आये विनाशकारी हिमस्खलनों का कारण बनते हैं। यहां रहने वाले लोगों को इन खतरों के बीच अपनी कमजोर आर्थिकी, पूरी तरह प्रकृति पर ही निर्भर अपनी खेती, आजीविका तथा कच्चे घरों में ठंड, गरमी व बारिश से बचने के मजबूत प्रबंध न होने के कारण दुनियाभर के प्रदूषण और परिणामस्वरूप ग्लोबल वार्मिग से सर्वाधिक प्रभावित होना पड़ता है। हालिया वर्षो में आसान जीवन के लिए उनका नदियों के किनारे आना उनके खतरे को और बढ़ा रहा है। ग्लोबल वार्मिग का प्रभाव यहां की समृद्ध जैव विविधता के साथ ही मानव स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है।

हिमालय के तापमान में इस तरह हो रही है वृद्धि

नैनीताल। शोध रिपोर्ट के अनुसार ग्लोबल वार्मिग के प्रभावों से मध्य हिमालय हिस्से में वर्ष 1977 से 2000 की बीच हर दशक में औसतन 0.6 डिग्री सेल्सियस की तापमान वृद्धि हुई है। इसी तरह तिब्बती प्लेट पर ल्हासा में बीते तीन वर्षो में औसत तापमान 1.35 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है। वहीं हिंदुकुश हिमालय के क्षेत्र में पिछली सदी में सतह पर हवा के तापमान में औसतन 0.74 फीसद की वृद्धि हुई है जबकि 1975 से वर्ष 2006 के बीच 35 स्थानों से लिए गए आंकड़ों के आधार पर औसत तापमान के मामले में 0.8 से 1.3 डिग्री, अधिकतम तापमान में 1.1 से दो डिग्री एवं न्यूनतम तापमान में 0.4 से 0.5 डिग्री सेल्सियस की एवं वर्ष की गरम रातों में 90 फीसद व ठंडी रातों के मामले में 10 फीसद की वृद्धि हुई है तथा किसी भी प्रकार के आंकड़ों में कमी नहीं देखी गई है। इस कारण ही इस क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने व अनियमित बरसात हो रही है। मानसून के मौसम में परिवर्तन हो गया है। ग्लेशियरों पर हिमस्खलन एवं पहाड़ों पर भूस्खलन एवं केदारनाथ व लद्दाख में बाढ़ आने जैसी घटनाएं हो रही हैं।

दुनिया के तीन बिलियन लोग लेते हैं हिमालय से लाभ

नैनीताल। शोध रिपोर्ट में कहा गया है कि चार मिलियन वर्ग किमी क्षेत्रफल में यानी दुनिया के 29 फीसद भू भाग में फैले हिंदुकुश हिमालय में दुनिया के पहाड़ों के 18 फीसद लोग रहते हैं। यहीं दुनिया की सबसे ऊंची एवरेस्ट के साथ ही के- 2, कंचनजंघा, धौलागिरि और अन्नपूर्णा जैसी अन्य ऊंची चोटियां भी हैं। 210 मिलियन (21 करोड़) लोग इन पहाड़ों पर सीधे तौर पर रहते हैं, जबकि 1.3 बिलियन (1.3 अरब) लोग इसकी घाटियों में रहते हैं और तीन बिलियन यानी तीन अरब लोग इनसे भोजन, ऊर्जा, पानी और अन्य संसाधनों से सीधे लाभान्वित होते हैं, और इसके बदले में हिमालय की कुछ देने की बात हो, तो वह है सिर्फ प्रदूषण। रिपोर्ट के अनुसार हिमालय के 14 फीसद भूभाग पर वन, 26 फीसद में खेती और प्राकृतिक वनस्पतियां, पांच फीसद पर बर्फ, एक फीसद में पानी, 54 फीसद में छोटी झाड़ियां हैं, जबकि कुल क्षेत्रफल में से 39 फीसद संरक्षित क्षेत्र हैं। इस प्रकार यह पानी, भोजन, ऊर्जा, खनिज, जंगल, जल विद्युत, लकड़ी, जैव विविधता, कृषि उत्पादों, मनोरंजन (पर्यटन), पर्यावरण और वन्य जीवों की लुप्त प्राय प्रजातियों तथा नियंतण्र पारिस्थितिकी तंत्र का अनिवार्य हिस्सा होने के साथ उनकी इन आवश्यकताओं की पूर्ति भी करते हैं।

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