फिर कानूनी प्रक्रिया में फंसते दिख रहे हैं डीजीपी बीएस सिद्धू


DGP BS SIddhuडीजीपी के खिलाफ अर्जी पर कोर्ट में सुनवाई आज, भाजपा नेता रवींद्र जुगरान ने दायर की है याचिका पद के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए हटाने की मांग की सीबीआई या एसआईटी से जांच कराने की गुहार

नैनीताल। उत्तराखंड में क़ानून-व्यवस्था बनाये रखने की जिम्मेदारी जिन पर है, वही पुलिस महानिदेशक बीएस सिद्धू एक बार फिर कानूनी प्रक्रिया में फंसते दिख रहे हैं। भाजपा नेता रविंद्र जुगरान ने डीजीपी के खिलाफ नैनीताल उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर उन पर पद के दुरुपयोग की संभावना जताते हुए उन्हें हटाने और मामले की जांच सीबीआई अथवा कोर्ट द्वारा गठित विशेष जांच टीम (एसआईटी) से कराने की मांग की है। उच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति बीके बिष्ट एवं न्यायमूर्ति यूसी ध्यानी की खंडपीठ ने बुधवार को सुनवाई के बाद याचिका की अग्रिम तिथि बृहस्पतिवार तय कर दी। याचिका में कहा गया है कि मसूरी वन प्रभाग के वीरगिरवाली गांव में वन भूमि को कब्जा करने और अवैध रूप से पेड़ काटने के मामले में वन विभाग के अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने संबंधी मामले में तत्कालीन मुख्य सचिव सुभाष कुमार ग्रीन ट्रिब्यूनल में बीएस सिद्धू की संलिप्तता स्वीकार कर चुके हैं। लिहाजा सिद्धू को डीजीपी जैसे अहम पद से हटा दिया जाना चाहिए। क्योंकि सिद्धू के डीजीपी बने रहने से उनके द्वारा पद के दुरुपयोग की संभावना बनी रहेगी। इसके अलावा उच्च न्यायालय उनके खिलाफ जांच के लिए एसआईटी बनाने अथवा प्रदेश सरकार को सीबीआई जांच का आदेश दे।

यह है पूरा मामला

सिद्धू पर आरोप है कि पुलिस महानिदेशक (रूल्स/मैनुअल्स) के पद पर तैनात रहते उन्होंने देहरादून के पुरानी मसूरी रोड, राजपुर स्थित ग्राम बीरगीरवाली में लगभग सवा करोड़ में 0.74 हैक्टेयर (7450 वर्ग मीटर) जमीन ( जिसमें एक पुराना भवन व 250 पेड़ खड़े थे) नाथूराम नाम के व्यक्ति से 21 मई 2012 को अनुबंध पत्र लिखवाया था, और 20 नवम्बर 2012 को इसकी रजिस्ट्री हुई थी। बाद में यह बात उजागर हुई की जिस नाथूराम के नाम से यह भूमि राजस्व अभिलेखों में दर्ज थी, उस की मृत्यु 1983 में ही हो चुकी थी। बाद में विवाद बढ़ने के बाद 4 नाथूराम सामने आ गये।
एक तथ्य यह भी है कि 1969 में ही गजट नोटिफिकेशन द्वारा उक्त भूमि को आरक्षित वन भूमि घोषित कर दिया गया था। यानी यह वन भूमि है। डीजीपी सिद्धू दोनों मामलों में जानकारी से इंकार करते हैं।
आगे मार्च 2013 में इस भूमि पर साल के लगभग 25 पेड़ अवैध रूप से काटे जाने की घटना प्रकाश में आई। 15 मई 2013 की मसूरी वन प्रभाग की रायपुर रेंज के वन दरोगा वीरेंद्र दत्त जोशी ने अपनी जांच रिपोर्ट में अवैध रूप से पेड़ काटने के लिए सिद्धू को उत्तरदायी ठहराते हुए उनके विरुद्ध मुकदमा दायर करने की संस्तुति की। जांच रिपोर्ट में यह तथ्य भी अंकित है कि सिद्धू द्वारा भूमि की खरीद से पहले वन विभाग के दो वन दरोगाओं से संपर्क कर उक्त जमीन के बारे में जानकारी मांगी गयी थी, और वन कर्मियों ने उन्हें आरक्षित वन के पिलर दिखा कर यह बता दिया था कि यह भूमि आरक्षित वन भूमि है।
आगे तत्कालीन पुलिस क्षेत्राधिकारी-मसूरी स्वतंत्र कुमार सिंह द्वारा वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक देहरादून को अप्रैल 2013 में सौंपी गयी जांच रिपोर्ट में भी उक्त भूमि की फर्जी तरीके से सुनियोजित षड्यंत्र के तहत खरीद-फरोख्त किये जाने की संभावना प्रकट की थी और उक्त प्रकरण की गंभीरता को देखते हुई इसकी जांच सीबीआई. जैसी किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराने की संस्तुति की गयी थी। 10 अप्रैल 2013 को तत्कालीन पुलिस महानिदेशक सत्यव्रत ने सीओ मसूरी की जांच रिपोर्ट को सही ठहराते हुए मुख्य सचिव को पत्र लिख कर उक्त प्रकरण को मुख्यमंत्री के संज्ञान में लाने का आग्रह किया था। जबकि सिद्धू द्वारा वन विभाग को उनके विरुद्ध सी.जे.एम. न्यायालय देहरादून में चल रहे मुकदमे वापस लेने के लिए पत्र लिखा गया। इस पत्र के सन्दर्भ में मसूरी वन प्रभाग के उप प्रभागीय वन अधिकारी (डिप्टी डिविजनल फॉरेस्ट आफिसर) द्वारा विधिक राय ली गयी। 21मई 2014 को मसूरी वन प्रभाग के उप प्रभागीय वन अधिकारी को दी गयी विधिक राय में देहरादून के जिला शासकीय अधिवक्ता(डीजीसी) ने मुक़दमे को निरस्त करने की कार्यवाही को विधि सम्मत नहीं होना बताया।
इधर राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) नयी दिल्ली में 3 मई 2014 को दिए गए शपथ पत्र में उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्य सचिव सुभाष कुमार ने स्वीकार किया कि सिद्धू ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए अवैध रूप से वन भूमि खरीदी और पेड़ काटे। शपथ पत्र में यह भी कhaa गया है कि सिद्धू ने अपने पद का नाजायज फायदा उठाते हुए वन विभाग के प्रभारी वन अधिकारी, मसूरी वन प्रभाग व अन्य कई वन कर्मियों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करवा दिया।
अब स्थिति यह है की श्री सिद्धू को एक ओर न्यायालय अपने सम्मानों में “अभियुक्त” संबोधित कर रहे हैं तो दूसरी ओर वे राज्य पुलिस के सर्वोच्च पद-महानिदेशक पर हैं। यह भी बताया गया है की उनके खिलाफ जांच करने वाले और कई तथ्यों को सामने लाने वाले उपनिरीक्षक (सब इन्स्पेक्टर) निर्विकार को निलंबित कर दिया गया है।

उल्लेखनीय है कि इस मामले में नौ जुलाई 2013 को डीजीपी सिद्धू ने मसूरी के डीएफओ धीरज पांडेय, कुछ वन कर्मियों व कुछ अज्ञात लोगों के मामले में राजपुर थाने में जानबूझकर परेशान करने, धोखाधड़ी करने और सरकारी दस्तावेजों में छेड़छाड़ करने व धमकी देने के आरोपों में मामला दर्ज करवाया था। इस पर मामला उत्तराखंड उच्च न्यायालय आया, और उच्च न्यायालय ने अगले आदेशों तक के लिए वनाधिकारियों की गिरफ्तारी और निचली अदालत की कार्रवाई पर रोक लगाते हुए मामले की जांच के लिए विशेष जांच टीम-एसआईटी बनाने के आदेश दिए थे।
जबकि इधर डीजीपी देहरादून के डीएम को जमीन से अपना दावा वापस लेने का पत्र लिख चुके हैं, और जमीन की खरीद में किसी तरह का गैरकानूनी कार्य नहीं करने की बात कही है।

Advertisements

2 thoughts on “फिर कानूनी प्रक्रिया में फंसते दिख रहे हैं डीजीपी बीएस सिद्धू

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s