नैनीताल देखने की चाह में पहाड़ों पर चढ़ आया हाथियों का झुंड


Elephants by Balbeer Singh

(इस पोस्ट में प्रतीकात्मक तौर पर जोड़ा जा रहा यह चित्र मूलतः दिवंगत, देश के अपनी तरह के इकलौते विकलांग छायाकार बलवीर सिंह द्वारा जिम कार्बेट पार्क में लिया गया है। )

-पूर्व में भी सूखाताल एवं नैनी झील के पास हाथियों के पहुंचने हैं प्रमाण
नवीन जोशी, नैनीताल। जी हां, आश्चर्य होगा। किंतु क्षेत्रीय ग्रामीणों के दावों पर यकीन किया जाए तो यह सच है।

नैनीताल के निकटवर्ती बल्दियाखान क्षेत्र में समुद्र सतह से करीब 1850 मीटर की ऊंचाई पर स्थित बसगांव के बुड़ भूमिया मंदिर के पास गत दिवस हाथियों का झुंड देखे जाने का दावा किया गया है। वन विभाग के आला अधिकारी भी इस दावे पर न केवल यकीन कर रहे हैं, वरन पूर्व के संदर्भों व प्रमाणों के आधार पर इसे हाथियों का यहां पहली बार आना नहीं वरन अपने पुराने रास्तों पर वापस लौटना मान रहे हैं। यानि, कह सकते हैं कि हाथियों का झुंड नैनीताल को देखने अथवा पुरानी यादें ताजा करने की चाह में पहाड़ों पर चढ़ आया होगा।

देश में बाघों की संख्या (ऑल इंडिया टाइगर एक्सपीडिशन 2014 के मुताबिक) बीते चार वर्ष में 30 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी के साथ (2010 में 1520-1909) औसत अनुमानित 1706 से बढ़कर अब 1,945 से 2,491 के बीच (औसत अनुमानित 2226) हो जाने और उत्तराखंड के इस मामले में राष्ट्रीय औसत से भी आगे करीब 50 प्रतिशत के साथ देश में में नंबर 2 रहने (यहां पिछले चार वर्षो में बाघों की संख्या में 113 यानी करीब 50 फीसद की बढ़ोतरी के साथ 340 हो गई है, और वह कर्नाटक (406) तथा मध्यप्रदेश (308) के बीच दूसरे स्थान पर है।) की खुशखबरी के बीच यह एक और अच्छी खबर है।

नगर के खोजी युवक दीपक बिष्ट ने क्षेत्र से लौटने के बाद बसगांव के बुड़ भूमिया मंदिर के पास अनेक स्थानों पर यहां से हाथियों का बड़ी मात्रा में मल देखे जाने की जानकारी दी। उल्लेखनीय है कि वन्य जीवों की गतिविधियां जानने के लिए वन्य जीव शोधकर्ता उनके पद चिन्हों व मल आदि से ही पुष्टि व पहचान करते हैं।

Rashtriya Sahara, Dehradun 21.01.2015

बल्दियाखान निवासी खीमराज सिंह बिष्ट ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि बड़ी मान्यता वाले बुड़ भूमिया मंदिर के पास गत दिवस हाथियों का झुंड देखा गया था। इसने ग्रामीणों की फसलों को भी नुकसान पहुंचाया है। पहाड़ की इतनी ऊंचाई पर हाथियों के चढ़ आने से जहां ग्रामीणों में फसलों के नुकसान की चिंता के साथ ही आश्चर्य भी है, वहीं वन्य जीव विशेषज्ञ के तौर पर प्रभागीय वनाधिकारी डा. पराग मधुकर धकाते ने माना कि ऐसा संभव है। उनका कहना था कि हालांकि हाथी मैदानी क्षेत्रों में ही रहने वाला प्राणी है, और जिम कार्बेट पार्क और जनपद मे भाबर क्षेत्र के हाथी कॉरीडोर क्षेत्र में इसकी काफी उपस्थिति है, लेकिन उन्होंने स्वयं वर्ष 2006 में एक जीर्ण-शीर्ण पुरानी पुस्तक में १०-१५ हाथियों के झुंड के नैनीताल के संभवतया नैनी झील के पास का चित्र देखा है। उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष कालाढुंगी रोड पर मंगोली के निकट भी हाथियों का झुंड देखा गया था, जो कि खासा चर्चा में रहा था। वहीं दीपक बिष्ट ने बताया कि हैनरी रैमजे की 1892 में लंदन से प्रकाशित पुस्तक-अपर इंडिया फॉरेस्ट में हाथियों के नैनीताल की सूखाताल झील के पास तक पहुंचने का जिक्र मिलता है। इस आधार पर डा. धकाते कहते हैं कि हाथी भोजन की उपलब्धता होने पर एक स्थान से दूसरे स्थान को जाते रहते हैं, लेकिन इनके आने-जाने में एक खाशियत यह भी होती है कि यह पूर्व में प्रयोग किए गए मार्ग पर ही चलते हैं। लिहाजा यह संभव है कि बसगांव में दिखे झुंड का कोई हाथी संभवतया कभी पूर्व में अपने बाल्यकाल में इसी रास्ते से नैनीताल आया होगा। डा. धकाते ने स्वयं भी शीघ्र इसकी पुष्टि के लिए क्षेत्र का दौरा किये जाने की बात कही।

सर्पराज किंग कोबरा और रॉयल बंगाल टाइगर भी देखे जा चुके हैं नैनीताल में

(10-11 फ़रवरी 2014 की रात्रि नैनीताल की कैमल्स बैक छोटी पर वन विभाग के कैमरे से लिया गया चित्र )

(10-11 फ़रवरी 2014 की रात्रि नैनीताल की कैमल्स बैक छोटी पर वन विभाग के कैमरे से लिया गया चित्र )

नैनीताल। उल्लेखनीय है कि नैनीताल में पूर्व में सर्पराज कहे जाने वाले अनुसूचि एक में शामिल किंग कोबरा को नैनीताल व इसके आसपास के 7500 फिट की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तथा जिले के कालाढुंगी में विश्व रिकार्ड 22 फिट लंबे किंग कोबरा को वन विभाग द्वारा देखा गया है। जनपद में 1998 में बेलुवाखान, 2004 में भवाली सेनिटोरियम, 2006 में तल्ला रामगढ़ तथा ज्योलीकोट में बीते वर्ष भी किंग कोबरा को देखे जाने के रिकॉर्ड दर्ज हैं। जबकि इधर 10-11 फरवरी 2014 की रात्रि बाघों के राजा रॉयल बंगाल टाइगर को 2591 मीटर ऊंची कैमल्स बैक चोटी पर वन विभाग द्वारा लगाए गए कैमरे में रिकार्ड किया गया था। इन वन्य जीवों की नैनीताल में उपस्थिति को इस क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता व मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र का परिचायक माना जा सकता है।

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विश्व रिकार्ड है किंग कोबरा की नैनीताल में उपस्थिति

King Cobra laying Eggs near Jeolikot 2014

(ज्योलीकोट में २०14 में देखे गए किंग कोबरा का चित्र )

-सर्पराज का संरक्षित क्षेत्र हो सकता है नैनीताल
-समृद्ध जैव विविधता का परिचायक है किंग कोबरा का मिलना
नवीन जोशी, नैनीताल। सर्पराज कहे जाने वाले अनुसूचि एक में शामिल किंग कोबरा को मैदानी क्षेत्रों में पाया जाने वाला जीव माना जाता है। लेकिन नैनीताल व इसके आसपास के क्षेत्रों में यह 7500 फिट की ऊंचाई तक पाया गया है, वहीं जिले के कालाढुंगी में अब तक के रिकार्ड 22 फिट के किंग कोबरा को वन विभाग द्वारा देखा गया है। इस लिहाज से नैनीताल में इसकी उपस्थिति विश्व रिकार्ड कही जा रही है। इस आधार पर विशेषज्ञ भी स्वीकार कर रहे हैं कि क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता, मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र व आहार श्रृंखला के परिचायक किंग कोबरा का यहां मिलना इस क्षेत्र के लिये बड़ी उपलब्धि हो सकता है, और इस क्षेत्र को सर्पराज के संरक्षित क्षेत्र के रूप में विकसित किया जा सकता है। परीक्षण किया जाये तो यह क्षेत्र ही नहीं देश के लिये बड़ी उपलब्धि हो सकती है।
नैनीताल एवं इसके करीबी क्षेत्रों में किंग कोबरा के मिलने के कई प्रसंग मिलते हैं, जिसे कई मायनों में विश्व रिकार्ड भी माना जा सकता है। उत्तराखण्ड वन्य जीव बोर्ड के सदस्य, अंतर्राष्ट्रीय छायाकार व प्रकृतिविद् अनूप साह बताते हैं कि करीब 60 वर्ष पहले नगर के हीरा लाल साह ठुलघरिया द्वारा नैनीताल के बारापत्थर क्षेत्र में किंग कोबरा को देखने का दावा किया था। सर्प विशेषज्ञ मनीश राय ने इस क्षेत्र में किंग कोबरा का पहला घोंसला वर्ष 2006 में तल्ला रामगढ़ में देखा व इस पर शोध किये। वहीं वन्य जीव प्रेमी विनोद पांडे के अनुसार किंग काबरा वर्ष 1998 में भी निकटवर्ती बेलुवाखान में देखा गया था। इधर वर्ष 2005 में इसे भवाली सेनेटोरियम के पास देखा गया। गत वर्ष जून में नगर के मान परिवार ने किलबरी रोड में समुद्र तल से करीब 7500 फिट की ऊंचाई पर किंग कोबरा को देखने का दावा किया है, जो कि इतनी अधिक ऊंचाई के लिहाज से श्री साह के अनुसार विश्व कीर्तिमान है। इसी तरह गत वर्ष कालाढुंगी में 22 फिट का किंग कोबरा सांप वन विभाग को सड़ी-गली अवस्था में मृत अवस्था में मिला था। श्री साह के अनुसार इससे अधिक लंबे किंग कोबरा के पाये जाने के कोई रिकार्ड नहीं हैं। जोकि लंदन के चिड़ियाघर में रखे गये सर्वाधिक 18.5 फिट के सांप से भी अधिक लंबा था। नैनीताल नगर में सूखाताल में प्रसाद भवन,फ्लैट्स, टैक्सी स्टैंड आदि स्थानों पर भी किंग कोबरा की मौजूदगी पायी गयी है, जबकि प्रदेश के चम्पावत, लोहाघाट, बागेश्वर, आदि बद्री, रूद्रप्रयाग व तराई-भाबर में इसकी मौजूदगी के प्रमाण मिलते हैं। गौरतलब है कि यहां पाये जा रहे आम किंग कोबरा की लंबाई करीब 10 से 17 फुट पायी गयी है।

सर्वाधिक विषैले के साथ ही सहनशील भी होता है किंग कोबरा

नैनीताल। अनूप साह के अनुसार किंग कोबरा सबसे अधिक  विषैला सांप होने के साथ ही अत्यन्त सहनशील सांप भी है, यह आमतौर पर बिना कारण किसी प्राणी को नहीं काटता है। इसमें इतना विष होता है कि यह एक बार में ही 20 लोगों को मार सकता है, बावजूद पूरे भारत मे सांपो के काटने से जहां प्रतिवर्ष 50000 मौतें  होती हैं, वहीं किंग कोबरा के काटने से पिछले 20 साल में मात्र चार व्यक्तियों की मृत्यु हुई है। इसलिए इस सर्प से भयभीत होने का कारण नहीं है। श्री साह इस आधार पर भी किंग कोबरा की विषेश सुरक्षा किये जाने की मांग उठा रहे हैं।

क्यों महत्वपूर्ण है किंग कोबरा

नैनीताल। नि:संदेह यह प्रश्न उठता है कि मनुष्य इतने विषैले सांप को बचाने का प्रयास क्यों करे। इसका उत्तर बाघों के संरक्षण के लिये चल रही देश व्यापी मुहिम में ही समाहित है। पारिस्थितिकी तंत्र की आहार श्रृंखला में बाघ की तरह सबसे ऊपर स्थित इस जीव की पहाड़ में उपस्थिति का अर्थ है, यहां इसकी आहार श्रृंखला के अन्य जीव भी भरपूर मात्रा में मौजूद हैं। इसका मुख्य भोजन छोटे सांप हैं। वह अन्य जीव जंतुओं को खाते हुऐ क्षेत्र में पारिस्थितिकीय संतुलन बनाते हैं।

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