दुनिया भर के वैज्ञानिक मिलकर दुनिया के ‘तीसरे ध्रुव’ हिमालय पर जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाएंगे जीवन


-भारत के अलावा अमेरिका, चीन, ब्रिटेन, नेपाल, श्रीलंका व आस्ट्रेलिया के वैज्ञानिक होंगे शामिल -कुमाऊं विवि के भूगोल विभाग को हिमालय पर जलवायु परिवर्तनों से अनुकूलता तथा जल के संरक्षण एवं जल के उपयोग, जल विद्युत परियोजनाओं पर एक साथ मिली तीन अंतराष्ट्रीय परियोजनाएं

नवीन जोशी, नैनीताल। दुनिया भर में हो रहे जलवायु परिवर्तन व ग्लोबलवार्मिंग से सर्वाधिक प्रभावित हिमालय और वहां रहने वाले लोग हो रहे हैं। लेकिन मानव की जिजीविषा है कि वह कैसी भी परिस्थितियों में स्वयं के जीवन को अपने पारंपरिक ज्ञान से अनुकूल बना लेता है। जैसे पहाड़ों पर उसने बदलते मौसम के साथ लगातार आ रही आपदाओं से अपना सब कुछ खो देने के बावजूद जीना कमोबेश सीख लिया है। इधर विश्व के वैज्ञानिक समुदाय ने पहाड़ के लोगों को ऐसी स्थितियों के अनुकूल बनाने और उनके नुकसान को बचाने के प्रति अपनी चिंता को कार्य रूप में परिणत करने की तैयारी कर ली है। कुमाऊं विवि के भूगोल विभाग को इन्हीं चिंताओं के समाधान के लिए अलग-अलग तीन अंतराष्ट्रीय परियोजनाओं का हिस्सा बनाया गया है, जो अपने निश्कर्षों से सीधे तौर पर आम जन के हाथ मजबूत करेंगे तथा केंद्र एवं राज्य सरकार के साथ मिलकर नीतिगत निर्णय भी लेंगे।

Pr.PC Tiwari

प्रो. पीसी तिवारी

कुमाऊं विवि के भूगोल विभाग के अध्यक्ष प्रो. पीसी तिवारी ने बताया कि पहली अंतर्राष्ट्रीय परियोजना ‘एशिया पैसिफिक नेटवर्क ऑफ ग्लोबल चेंज रिसर्च’ यानी एपीएन की ओर से शुरू की जा रही है, जिसमें आस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी, इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट यानी आईसीमोड काठमांडू, चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज बीजिंग, त्रिभुवन विश्व विद्यालय काठमांडू और भारत की ओर से कुमाऊं विवि की सहभागिता होगी। इस परियोजना का उद्देश्य हिमालय के लिए जलवायु परिवर्तन के साथ अनुकूलन करने के लिए योजना बनाना है। इस परियोजना के तहत हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को वहां आने वाली प्राकृतिक आपदाओं व कम हो रहे जल स्तर व बदलते मौसम के कारण बदलने पड़ रहे फसल चक्र को वैज्ञानिक ज्ञान के आधार पर सलाह व मदद दी जाएगी, कि कैसे वह इन स्थितियों के बावजूद अपने जीवन व आजीविका को यथावत बनाए रख पाएं। वहीं दूसरी परियोजना भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी मंत्रालय एवं ब्रिटिश काउंसिल का दो वर्ष का कार्यक्रम है। इसमें भारत की ओर से कुमाऊं विवि तथा ब्रिटेन की ओर से यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू कैसल्स की सहभागिता होगी। इस कार्यक्रम के तहत उत्तराखंड में प्राकृतिक जल संसाधनों, जल श्रोतों को जनता की सहभागिता से पुर्नर्जीवित, संरक्षित एवं संवर्धित करना है। इसी तरह तीसरी परियोजना अंतराष्ट्रीय जल प्रबंधन संस्थान कोलंबो द्वारा शुरू की जा रही है, जिसके तहत गंगा नदी के ‘हेड वाटर’ यानी जलागम क्षेत्र में उपलब्ध जल को जल विद्युत परियोजनाओं के साथ ही सिंचाई, कृषि एवं आजीविका व पीने के लिए प्रयोग किए जाने के बारे में नीतिगत निर्णय लिया जाना है। इस परियोजना में अमेरिका की एरीजोना विवि और कुमाऊं विवि साझेदार हैं। परियोजना को अमलीजामा पहनाने के लिए सर्वप्रथम नीति नियंताओं यानी केंद्र एवं राज्य सरकार के जल, जल विद्युत, सिंचाई, कृषि आदि संबंधित विभागों के सचिव स्तरीय अधिकारियों से भी परामर्श लिया जाएगा। इस हेतु आगामी 18, 19 व 20 फरवरी को देहरादून में शुरुआती कार्यशाला आहूत की गई है, जिसमें पहले दिन राज्य व केंद्र के उच्चाधिकारियों से उनकी जरूरतें पता की जाएंगी, तथा अगले दो दिन वैज्ञानिक उनकी जरूरत के अनुसार अपनी कार्ययोजना-रोडमैप तैयार करेंगे। कुमाऊं विवि के कुलपति प्रो. एचएस धामी ने विवि के भूगोल विभाग की मिली इन तीन अंतराष्ट्रीय स्तर की परियोजनाओं से उत्तराखंड एवं हिमालय के लिए बड़े स्तर पर ठोस कार्य होने का विश्वास जताया है।

प्रशासनिक इकाइयों नहीं नदियों के जलागम क्षेत्र की इकाई पर आधारित हो हिमालयी राज्यों में विकास

-विकाय कार्यो का जलवायु परिवर्तन व आपदा अनुकूलन होना भी जरूरी
नवीन जोशी, नैनीताल। हिमालयी राज्यों में विकास जिलों, तहसीलों या विकास खंड की प्रशासनिक आधार पर नहीं वरन नदियों के जलागम क्षेत्रों के आधार पर होना चाहिए। तथा इन राज्यों में जो भी विकास योजनाएं बनें वह यहां पड़ रहे जलवायु परिवर्तन के अत्यधिक प्रभावों एवं यहां संभावित आपदाओं के अनुकूल हों। सरोवरनगरी में स्विस एजेंसी फॉर डेवलपमेंट एंड कोऑपरेशन के इंडियन हिमालया क्लाइमेट एडप्टेशन प्रोग्राम के तहत व नेशनल मिशन फॉर सस्टेनिंग द हिमालया ईकोसिस्टम व भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी मंत्रालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित हुई हिमालय पर मौसम परिवर्तन के प्रभावों पर विज्ञान एवं पॉलिसी के स्तर पर अपेक्षित बदलावों पर दो दिवसीय अंतराष्ट्रीय कार्यशाला के अंत में यह संस्तुतियां की गई हैं। यह संस्तुतियां आगे पेरिस में 2021 में होने वाली संयुक्त राष्ट्र महासंघ की बैठक में प्रस्तुत की जाएंगी।
सरोवरनगरी के मनु महारानी होटल में आयोजित इस दो दिवसीय अंतराष्ट्रीय कार्यशाला में यह विचार सामान्यतया सभी वैज्ञानिकों के शोधपत्रों में उभर कर आया। वैज्ञानिकों का कहना था कि देश की 1965 की पंचवर्षीय योजना में भी विकास के लिए प्रशासनिक इकाइयों के बजाय जलागम क्षेत्रों को आधार बनाए जाने की बात कही गई थी। कहा गया कि जलागम आधारित विकास योजनाएं बनाते समय यह भी ध्यान में रखना होगा कि जल विकास योजनाओं के मूल में हो। भविष्यवाणी की गई कि आगे जलवायु परिवर्तन के प्रभाव लगातार बढ़ेंगे। अधिकांशतया अतिवृष्टि तथा अतिवृष्टि के साथ ही अन्य क्षेत्रों में साथ-साथ सूखे के हालात होने, अतिवृष्टि से जमीन पर खेती, सिंचाई व कृषि उत्पादन के साथ ही खासकर गरीब व समाज के निचले तबकों एवं महिलाओं व बच्चों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है। भावर व तराई के क्षेत्रों में नदियों के उथला हो जाने से बाढ़ की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। साथ ही केदारनाथ के चौराबारी की तरह अन्य हिमनद भी फट सकते हैं, इसलिए नदियों के किनारे नगरीकरण योजनाबद्ध तरीके से हो। इस संबंध में स्थानीय निवासियों के नदियों के किनारे न बसने व मौसम के हिसाब से फसलें बदलने के परंपरागत ज्ञान को भी तरजीह दी जाए और उस ज्ञान को भी योजनाओं में शामिल किया जाए, तथा उनकी उसी रूप में बेहतर सलाह देते हुए मदद की जाए। इसके अलावा हिमालयी क्षेत्रों में अचानक होने वाले मौसमी परिवर्तनों के मद्देनजर हिमालय पर कार्य करने वाले वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, पर्वतारोहियों को मौसम संबंधी सूचनाओं का अतिशीघ्र विश्लेषण करने व उपलब्ध कराने के लिए मौसम सुविधा केंद्रों (क्लाइमेट सर्विस सेंटर्स) की स्थापना किए जाने की संस्तुतियां की गई हैं।

वैज्ञानिकों ने पूछा देहरादून राजधानी क्यों ?

नैनीताल। अंतराष्ट्रीय कार्यशाला के दौरान वैज्ञानिकों ने पूछा कि पर्वतीय प्रदेश के लिए लड़ी गई लड़ाई के परिणामस्वरूप बने उत्तराखंड राज्य की राजधानी मैदानी क्षेत्र देहरादून में क्यों है। इसका उत्तर देते हुए भी कहा गया कि पर्वतीय क्षेत्र के लोगों का संसद या विधानसभाओं में विरल जनसंख्या की वजह से कम प्रतिनिधित्व होता है, इसलिए उनके बारे में निर्णय उनकी समस्याओं को न जानने वाले लोगों के द्वारा किया जाता है। इसका निदान यह है कि हिमालयी राज्यों-पहाड़ों के लोग अपनी समस्याओं के लिए जनप्रतिनिधियों को न ताकें, वरन अपनी लड़ाई स्वयं लड़ें।

उत्तराखंड में एक वर्ष से जलवायु केंद्र की स्थापना पर प्रगति शून्य

नैनीताल। अंतराष्ट्रीय कार्यशाला के संयोजक प्रो. पीसी तिवारी ने बताया कि केंद्र सरकार ने एक वर्ष पूर्व देहरादून में वन विभाग की अगुवाई में जलवायु केंद्र की स्थापना के लिए प्रस्ताव तैयार करने को कहा था। इस कार्य के लिए उनसे भी वन विभाग की मदद करने को कहा गया था। केंद्र सरकार इस केंद्र की स्थापना के लिए पांच करोड़ रुपए देने को तैयार बैठी है, किंतु राज्य सरकार की ओर से इसकी स्थापना के लिए एक वर्ष में कोई प्रयास नहीं किए गए हैं।

तीसरे ध्रुव पर मौसमी परिवर्तनों का प्रभाव अंतर्राष्ट्रीय चिंता का विषय : प्रो. सिंह

नैनीताल। गढ़वाल विवि के पूर्व कुलपति प्रो. एसपी सिंह ने हिमालय को धरती के उत्तरी व दक्षिणी ध्रुवों के इतर तीसरा ध्रुव कहा और इस पर मौसमी परिवर्तनों के कारण दिख रहे प्रभावों को वैश्विक चिंता का विषय बताया, वहीं कुमाऊं विवि के कुलपति प्रो. एचएस धामी ने हिमालयी क्षेत्र में वनस्पतियों के स्थान परिवर्तित करने और क्षेत्र में आंकड़ों व अध्ययनों की कमी पर चिंता जताई।
मौका था सोमवार (02.11.2015) से नगर के मनुमहारानी होटल में स्विस एजेंसी फॉर डेवलपमेंट एंड कोऑपरेशन के इंडियन हिमालया क्लाइमेट एडप्टेशन प्रोग्राम के तहत व नेशनल मिशन फॉर सस्टेनिंग द हिमालया ईकोसिस्टम व भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी मंत्रालय के संयुक्त तत्वावधान में शुरू हुई हिमालय पर मौसम परिवर्तन के प्रभावों पर विज्ञान एवं पॉलिसी के स्तर पर अपेक्षित बदलावों पर दो दिवसीय अंतराष्ट्रीय कार्यशाला के उद्घाटन सत्र का, जिसमें सभी वक्ताओं ने हिमालय पर दिख रहे सर्वाधिक प्रभावों पर चिंता जताई, तथा इसे अंतराष्ट्रीय चिंता का विषय बताया। खासकर प्रो. सिंह ने कहा कि 6100 मीटर की औसत ऊंचाई वाले और 2500 किमी में फैैले दुनिया के सबसे युवा 30 मिलियन वर्ष पुराने ग्रेटर हिमालय में दुनिया की 14 में से एवरेस्ट सहित नौ सर्वाधिक ऊंची चोटियां मौजूद हैं। यहां पृथ्वी के दोनों ध्रुवों के इतर सर्वाधिक 6100 वर्ग किमी में बर्फ फैली है, इसलिए यह तीसरे ध्रुव जैसा है। यहां से गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र व सिंधु सहित 10 बड़ी नदियां निकलती हैं, इसलिए इसे एशिया का वाटर टावर भी कहा जाता है। बावजूद यहां वैज्ञानिक अध्ययनों व आंकड़ों की भारी कमी है। एक अध्ययन के आधार पर उन्होंने बताया कि पिछले 120 वर्षों में हिमालय पर तापमान में 1.2 डिग्री सेल्सियस की औसत वृद्धि हुई है, जबकि कई क्षेत्रों में यह वृद्धि 0.16 डिग्री सेल्सियस तो तिब्बत में 0.2 से 0.6 डिग्री सेल्सियस तक भी है। उन्होंने 1951 से 2000 के बीच सर्दियों में प्रति दशक 0.32 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होने की बात भी कही, तथा यह दावा भी किया कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अधिक ऊंचाई, गरीब व पिछड़े वर्गों तथा महिलाओं व बच्चों पर तथा रात्रि के तापमान पर अधिक पड़ रहा है।ट्री-लाइन यानी उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पेड़ों की लाइन के नीचे आने अथवा ग्लेशियरों के खिसकने पर भी भ्रम की स्थिति है। कहा कि हिमालय पर मानसून लगातार कमजोर पड़ रहा है, और पश्चिमी विक्षोभ मजबूत होता जा रहा है, इस कारण मानसून से पहले या बाद में विनाशकारी केदारनाथ आपदा सरीखी बारिश हो रही है।
कार्यशाला के संयोजक कुमाऊं विवि के के प्रो. पीसी तिवारी ने कार्यशाला की उपयोगिता व विषय पर बताया कि हिमालय क्षेत्र में वैश्विक मौसमी परिवर्तनों का सर्वाधिक प्रभाव पड़ रहा है। इसलिए यह कार्यशाला अत्यधिक महत्वपूर्ण है। कार्यशाला में भारत सहित विश्व भर के करीब 40 वैज्ञानिकों ने प्रतिभाग किया। कार्यशाला की संस्तुतियां पेरिस में 2021 में होने वाली संयुक्त राष्ट्र महासंघ की बैठक में प्रस्तुत की जाएंगी।

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