चार हजार वर्ष पुराना हड़प्पा कालीन है उत्तराखंड राज्य का इतिहास


नवीन जोशी, नैनीताल । उत्तराखंड राज्य के प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो.राम सिंह के अनुसार उत्तराखंड का इतिहास चार हजार वर्ष पुराना है। उन्होंने बताया कि ईसा से डेढ़ से दो हजार वर्ष पूर्व की हड़प्पा कालीन संस्कृति के भग्नावशेष प्रदेश के पिथौरागढ़ जिले के बनकोट व नैनी पातल क्षेत्रों में मिली ताम्र मानवाकृतियों के रूप में प्राप्त हुए हैं। प्रो. सिंह के अनुसार हड़प्पा काल में यहां के लोग कबीलों में रहते थे। क्षेत्र में सर्वप्रथम राज सत्ता के प्रमाण ईसा पूर्व पांचवी से दूसरी शताब्दी के सिक्कों से पता चलते हैं। इनसे पुष्ट होता है कि यहां सबसे पहले कुणिंद वंश के राजाओं ने शासन किया। पढ़ना जारी रखें “चार हजार वर्ष पुराना हड़प्पा कालीन है उत्तराखंड राज्य का इतिहास”

उत्तराखंड में गुझिया-मिठाई सहित कुछ भी खाना रिस्की, मैगी नूडल्स की जांच की भी नहीं व्यवस्था


Gujhiyaनवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड राज्य में त्योहार राज्य वासियों के स्वास्थ्य पर भारी न पड़ जाए। राज्यवासी होली दिवाली या आम दिनों में गुझिया-मिठाई सहित कुछ भी खाएें तो अपने रिस्क पर। इसमें पूरा जोखिम उनका स्वयं का होगा। राज्य के इकलौते रुद्रपुर स्थित फूड एंड ड्रग टेस्टिंग लेबोरेटरी यानी खाद्य एवं औषधि परीक्षण प्रयोगशाला में पिछली होलियों तक एक भी खाद्य विश्लेषक नहीं था। हमारे द्वारा समाचार प्रकाशित किये जाने के बाद इधर बमुश्किल एक खाद्य विश्लेषक की तैनाती की गयी है, जो भी नाकाफी साबित हो रही है। ऐसे में पिछले सितंबर (2014) माह से राज्य में खाद्य पदार्थों एवं औषधियों के जो भी नमूने लिए जा रहे हैं, वह जांच के बिना ही प्रयोगशाला से बैरंग वापस आ रहे हैं। ऐसे में खाद्य सुरक्षा से जुड़े अधिकारी होली पर किसी तरह की छापेमारी करने से ही बच रहे हैं। होली के त्योहार में राज्य में एक जगह भी खाद्य पदार्थों की छापेमारी नहीं की गई। पढ़ना जारी रखें “उत्तराखंड में गुझिया-मिठाई सहित कुछ भी खाना रिस्की, मैगी नूडल्स की जांच की भी नहीं व्यवस्था”

अब पहाड़ पर सैलानी ले सकेंगे गोवा की तरह खुले में नहाने का आनंद


मदकोट में बनेगा देश का पहला गंधक के पानी का ‘तप्त स्विमिंग पूल’

Madkot (2)
मदकोट में गंधक के पानी का ‘तप्त स्विमिंग पूल’

-गोरी नदी में बहता है गंधक का पानी, जो शरीर को गोरा करने के साथ ही त्वचा रोगों के लिए भी बहुत लाभदायक है
-पिथौरागढ़ जिले के मदकोट में केएमवीएन कर रहा निर्माण, निगम के टीआरएच के बिल्कुल करीब बहती गोरी नदी में है गंधक का बड़ा प्राकृतिक जल श्रोत
नवीन जोशी, नैनीताल। सामान्यतया पहाड़ पर लोग नहाने और खासकर खुले में नहाने में ठंड की वजह से डर जाते हैं, लेकिन कुमाऊं मंडल यहां पिथौरागढ़ जिले के सुदूरवर्ती प्राकृतिक सुषमा के बीच गोरी नदी के किनारे गोवा की तरह खुले में न केवल प्राकृतिक तौर पर गर्म पानी से नहा पाएंगे, वरन यहां नहाने से उनका शरीर नदी के नाम की तरह गोरा भी होगा और त्वचा रोगों से मुक्ति भी मिलेगी। पढ़ना जारी रखें “अब पहाड़ पर सैलानी ले सकेंगे गोवा की तरह खुले में नहाने का आनंद”

उत्तराखंड से 1.5 और सिक्किम से 1.7 लाख में होगी कैलाश मानसरोवर यात्रा


kailash mansarovar
कैलाश पर्वत
  • -उत्तराखंड से 1080 और सिक्किम से 250 यात्री जा पाएंगे यात्रा पर
  • -उत्तराखंड के पौराणिक मार्ग से 25 तो सिक्किम से 23 दिनों में पूरी होगी यात्रा
  • -उत्तराखंड के रास्ते पहला बैच 12 जून को और सिक्किम के रास्ते 18 जून को दिल्ली से रवाना होंगे पहले दल
  • -उत्तराखंड के रास्ते नौ सितंबर तक 60 यात्रियों के 18 दल और सिक्किम के रास्ते 22 अगस्त तक 50 यात्रियों के पांच दल पूरी कर लेंगे यात्रा
  • -10 अप्रैल तक कर सकते हैं ऑनलाइन आवेदन

नवीन जोशी, नैनीताल। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने बृहस्पतिवार को कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए कार्यक्रम जारी कर स्थिति स्पष्ट कर दी है। इससे पहली बार उत्तराखंड के पांडवों द्वारा भी प्रयुक्त पौराणिक लिपुपास दर्रे के साथ ही सिक्किम के नाथुला दर्रे से होने जा रही यात्रा से संबंधित सभी किंतु-परंतु और संशयों से परदा उठ गया है। इसके साथ ही दोनों मार्गों से प्रस्तावित यात्रा का अंतर भी साफ हो गया है। यात्रा के लिए 10 अप्रैल से पूर्व ऑनलाइन माध्यम से विदेश मंत्रालय की वेबसाइट-केएमवाई डॉट जीओवी डॉट इन पर आवेदन किए जा सकते हैं। पढ़ना जारी रखें “उत्तराखंड से 1.5 और सिक्किम से 1.7 लाख में होगी कैलाश मानसरोवर यात्रा”

उत्तराखंड की सांस्कृतिक राजधानी-रत्नगर्भा अल्मोड़ा


Almora (2)चंद शासकों की राजधानी रहे अल्मोड़ा की मौजूदा पहचान निर्विवाद तौर पर उत्तराखंड की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में है। अपनी प्रसिद्ध बाल मिठाई, चॉकलेट व सिगौड़ी जैसी ही मिठास युक्त कुमाउनी रामलीला और कुमाऊं में बोली जाने वाली अनेक उपबोलियों के मानक व माध्य रूप-खसपर्जिया की यह धरती अपने लोगों की विद्वता के लिए भी विश्व विख्यात है। राजर्षि स्वामी विवेकानंद, विश्वकवि रविन्द्रनाथ टैगोर, नृत्य सम्राट उदय शंकर, सुप्रसिद्ध नृत्यांगना व अदाकारा जोहराबाई, घुमक्कड़ी के महापंडित राहुल सांकृत्यायन व गांधी वादी सरला बहन की प्रिय एवं सुप्रसिद्ध छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत से लेकर मनोहर श्याम जोशी, मृणाल पांडे, रमेश चंद्र साह व प्रसून जोशी जैसे कवि, लेखकों व साहित्यकारों तथा हर्ष देव जोशी, भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत, कुमाऊं केसरी बद्री दत्त पांडे, पूर्व राज्यपाल भैरव दत्त पांडे, विक्टर मोहन जोशी आदि की जन्म-कर्मभूमि अल्मोड़ा की धरती सही मायनों में रत्नगर्भा है। अपने किलों, मंदिरों, प्राकृतिक खूबसूरती, वर्ष भर रुमानी मौसम तथा तहजीब के लिए भी अल्मोड़ा की देश ही दुनिया में अलग पहचान है। बोली-भाषा के साथ ही कुमाऊं की मूल लोक संस्कृति, पहनावा, भोजन, रहन-सहन के साथ ही बदलते परिवेश के भी यहां वास्तविक स्वरूप में दर्शन होते हैं। पढ़ना जारी रखें “उत्तराखंड की सांस्कृतिक राजधानी-रत्नगर्भा अल्मोड़ा”

1.2 करोड़ वर्ष पुराना इतिहास संजोए, उच्च हिमालयी मिनी कश्मीर-सोर घाटी पिथौरागढ़


Pithoragarhउच्च हिमालयी हिमाच्छादित पंचाचूली पर्वत श्रृंखलाओं तथा कल-कल बहती सदानीरा काली-गोरी व रामगंगा जैसी नदियों के बीच प्राकृतिक जैव विविधता से परिपूर्ण उत्तराखंड के सीमान्त जनपद मुख्यालय पिथौरागढ़ की पहचान ‘सोर’ यानी सरोवरों की घाटी तथा ‘मिनी कश्मीर’ के रूप में भी है। भारतीय प्रायद्वीप एवं एशिया महाद्वीपीय भू-पट्टियों के बीच करीब 1.2 करोड़ वर्ष पूर्व हुए मिलन या टक्कर की गवाही स्वरूप आज भी तत्कालीन टेथिस सागर को अपने  नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व स्थित लेप्थल, लिलंग व गर्ब्यांग नाम के पर्वतीय गावों में “शालिग्राम” कहे जाने वाले और आश्चर्यजनक तौर पर मिलने वाले समुद्री जीवाश्मों को संभाले पिथौरागढ़ की ऐतिहासिक और विरासत महत्व की पहचान भी रही है। पांडु पुत्र नकुल के नाम पर मुख्यालय के चार किमी करीब मौजूद खजुराहो स्थापत्य शैली में बना नकुलेश्वर मंदिर महाभारत काल से इस स्थान के जुड़ाव की पुष्टि करता है। महान राजपूत शासक पृथ्वी राज चौहान से भी इसके नाम को जोड़ा जाता है। उत्तराखंड राज्य के राज्य पशु कस्तूरा के एकमात्र मृग विहार और अस्कोट वन्य जीव अभयारण्य भी यहां दर्शनीय हैं। पिथौरागढ़ ऐरो स्पोर्टस यानी पैराग्लाइडिंग जैसे हवा के तथा सरयू व रामगंगा नदियों में रिवर राफ्टिंग व मुन्स्यारी के कालामुनी व खलिया टॉप में स्कीइंग व हैंग ग्लाइडिंग जैसे साहसिक खेलों के लिए भी सर्वश्रेष्ठ गंतव्य है। पढ़ना जारी रखें “1.2 करोड़ वर्ष पुराना इतिहास संजोए, उच्च हिमालयी मिनी कश्मीर-सोर घाटी पिथौरागढ़”

चंपावत से मिला ‘कुमाऊं’ को अपना नाम और यह ही ‘कुमाऊं’ की मूल पहचान


Baleshwar Templeयूं चंपावत वर्तमान में कुमाऊं मंडल का एक जनपद और जनपद मुख्यालय है, लेकिन यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि कुमाऊं का मूल ‘काली कुमाऊं’ यानी चंपावत ही है। यही नहीं यहीं काली नदी के जलागम क्षेत्र में ‘कर्नतेश्वर पर्वत’ को भगवान विष्णु ने ‘कूर्म’ अवतार का जन्म स्थान माना जाता है, और इसी कारण ही ‘कुमाऊं’ को अपने दोनों नाम ‘कुमाऊं’ और ‘कूर्मांचल’ मिले हैं। लगभग 10वीं शताब्दी में स्थापित चंपावत की ऐतिहासिकता केवल यहीं तक सीमित नहीं, वरन यह भी सच है कि रामायण और महाभारत काल से भी चंपावत सीधे संबंधित रहा है। अल्मोड़ा आने से पूर्व चम्पावत आठवीं अठारहवीं शताब्दी तक कुमाऊं के चंद वंश के राजाओं की राजधानी रहा है, जहां से एक समय सम्पूर्ण पर्वतीय अंचल ही नहीं, अपितु मैदानों के कुछ भागों तक शासन किया जाता था। पढ़ना जारी रखें “चंपावत से मिला ‘कुमाऊं’ को अपना नाम और यह ही ‘कुमाऊं’ की मूल पहचान”

आज भी सड़क से दो से 15 किमी पैदल दूर हैं नैनीताल के 130 गांव


-सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा सहित हर तरह की सरकारी सुविधा से दूर आदिम युग का जीवन जीने को मजबूर हैं इन गांवों के हजारों ग्रामीण
नवीन जोशी, नैनीताल। सुदूर मंगल तक कदम बढ़ाकर तथा अमेरिका से दोस्ती गांठ कर चीन, पाकिस्तान सहित अन्य देशों को अपनी बढ़ती शक्ति व ऐश्वर्य से चिढ़ा रहे, तथा आज भी कभी गांवों का देश कहे जाने वाले भारत में सैकड़ों गांव आदिम युग में जीने को अभिशप्त हैं। उत्तराखंड राज्य के सुविधासंपन्न व सुगम की श्रेणी में आने वाले नैनीताल जनपद के आंकड़े गवाह हैं, आज भी यहां 130 गांव ऐसे हैं, जहां तक पहुंचने के लिए कच्ची पथरीली सड़क के बाद भी दो से 15 किमी तक पैदल चलना पड़ता है। बताने की जरूरत नहीं, कि जब इन गांवों में विकास की बुनियाद मानी जाने वाली सड़क ही नहीं होगी तो शिक्षा व स्वास्थ्य तथा अन्य विकास योजनाओं की भी कोई व्यवस्था यहां नहीं होगी। होगी भी तो वहां इन सेवाओं को पहुंचाने के लिए तैनात सरकारी कारिंदे अपनी काहिली से न खुद वहां पहुंचते होंगे, और ना ही सेवाओं को पहुंचने देते होंगे। पढ़ना जारी रखें “आज भी सड़क से दो से 15 किमी पैदल दूर हैं नैनीताल के 130 गांव”

प्रसिद्ध वैष्णो देवी शक्तिपीठ सदृश रामायण-महाभारतकालीन द्रोणगिरि वैष्णवी शक्तिपीठ दूनागिरि


हिमालय की गोद में बसे आध्यात्मिक महिमा से मंडित और नैसर्गिक प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर दूनागिरि शक्तिपीठ का अपार महात्म्य है। जम्मू के प्रसिद्ध वैष्णो देवी शक्तिपीठ की तरह ही यहां भी वैष्णवी माता की स्वयंभू सिद्ध पिंडि विग्रह मौजूद हैं। कहते हैं कि इन दोनों स्थानों पर अन्य शक्तिपीठों की तरह माता के कोई अंग नहीं गिरे थे, वरन माता यहां स्वयं उत्पन्न हुई थीं। जैव विविधता से परिपूर्ण इस बेहद पवित्र स्थान पर मृत व्यक्तियों को जीवित करने की क्षमता युक्त संजीवनी जैसी दिव्य जड़ी-बूटियों की उपस्थिति भी बताई जाती है। पढ़ना जारी रखें “प्रसिद्ध वैष्णो देवी शक्तिपीठ सदृश रामायण-महाभारतकालीन द्रोणगिरि वैष्णवी शक्तिपीठ दूनागिरि”

समृद्ध सांस्कृतिक विरासत सहेजे द्वाराहाट और स्याल्दे बिखौती का मेला


‘ओ भिना कसिकै जानूं द्वारहाटा’ जैसे कुमाऊं के लोकप्रिय लोक गीतों में वर्णित और कत्यूरी शासनकाल में राजधानी रहा द्वाराहाट अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए देश-प्रदेश में प्रसिद्ध है। उत्तराखण्ड राज्य के अल्मोड़ा जिले में रानीखेत तहसील मुख्यालय से लगभग 21 किलोमीटर दूर गेवाड़ घाटी में स्थित इस छोटे से कस्बे में 8वीं से 13वीं शदी के बीच निर्मित महामृत्युंजय, गूजरदेव, मनिया, शीतला देवी व रत्नदेव आदि अनेक मंदिरों के अवशेष आज भी अपनी स्थापत्य कला से प्रभावित करते हैं। मंदिरों के चारों ओर अनेक भित्तियों को कलापूर्ण तरीके से शिलापटों अलंकृत किया गया है। पढ़ना जारी रखें “समृद्ध सांस्कृतिक विरासत सहेजे द्वाराहाट और स्याल्दे बिखौती का मेला”

राजुला-मालूशाही और उत्तराखंड की रक्तहीन क्रांति की धरती, कुमाऊं की काशी-बागेश्वर


Bageshwar1 पौराणिक काल से ऋषि-मुनियों की स्वयं देवाधिदेव महादेव को हिमालय पुत्री पार्वती के साथ धरती पर उतरने के लिए मजबूर करने वाले तप की स्थली बागेश्वर कूर्मांचल-कुमाऊं मंडल का एक प्रमुख धार्मिक एवं पर्यटन स्थल है। नीलेश्वर और भीलेश्वर नाम के दो पर्वतों की उपत्यका में सरयू, गोमती व विलुप्त मानी जाने वाली सरस्वती नदी की त्रिवेणी पर बसा यह स्थान शायद इसी कारण तीर्थराज और कुमाऊं की काशी के रूप में विख्यात है। कुमाऊं की प्रसिद्ध लोक गाथा-राजुला मालूशाही, कुमाऊं के प्रसिद्ध लोक त्योहार-घुघुतिया और कुमाऊं से गोरखा-अंग्रेजी राज की बेहद दमनकारी प्रथा-कुली बेगार को समाप्त करने को हुई उत्तराखंड की रक्तहीन क्रांति की भी यह भूमि रही है, जिसकी परंपरा आज भी यहां स्थित बागनाथ मंदिर व सरयू बगड़ में प्रति वर्ष होने वाले विश्व प्रसिद्ध उत्तरायणी मेले के रूप में जारी है।कुमाऊं के प्रथम कत्यूर राजवंश की शुरुआत यहीं से हुई मानी जाती है, जिनकी राजधानी कार्तिकेयपुर यहीं पास में बैजनाथ नाम के स्थान पर थी। पढ़ना जारी रखें “राजुला-मालूशाही और उत्तराखंड की रक्तहीन क्रांति की धरती, कुमाऊं की काशी-बागेश्वर”