उत्तराखंड के निकायों में सफाई कर्मियों, पशु चिकित्साधिकारियों व शिक्षिकाओं सहित डेढ़ दर्जन पद समाप्त


DSCN0333-प्रति एक हजार की जनसंख्या पर आउटसोर्सिंग से अधिकतम दो पर्यावरण मित्र ही होंगे तैनात

नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड सरकार ने प्रदेश के नगर निकायों के लिए बताए नए ढांचे में सफाई कर्मचारियों, पशु चिकित्सा अधिकारियों, सहायक अध्यापिका एवं लाइब्रेरियन सहित करीब डेढ़ दर्जन पद नामों को समाप्त कर दिया है। इनमें से सफाई कर्मचारियों का नाम परिवर्तित कर उन्हें पर्यावरण मित्र नाम देकर उनकी नियुक्ति केवल मृतक आश्रित कोटे से अथवा आउटसोर्सिंग से करने की नई व्यवस्था कर दी है, जबकि अन्य पद नामों को गैर जरूरी बताते हुए समाप्त कर दिया गया है। चतुर्थ श्रेणी के मृत संवर्ग की तरह ही इन पदों पर कार्यरत कार्मिक सेवानिवृत्ति अथवा अपनी मृत्यु तक इन पदों पर बने रहेंगे, और उनके पद से हटने के बाद पद स्वत: समाप्त हो जाएंगे। वहीं पर्यावरण मित्र एक हजार की जनसंख्या पर केवल दो ही तथा सीधी भर्ती के बजाय केवल आउटसोर्सिंग से ही भरे जा सकेंगे। कोई निकाय तय सीमा से अधिक संख्या में पर्यावरण मित्रों की नियुक्ति आउटसोर्सिंग से भी शासन से अनुमति लेने के बाद ही कर पाएगा, बावजूद उसे अतिरिक्त कर्मियों का मानदेय स्वयं वहन करना होगा।
बीती 12 जून को जारी शासनादेश के बृहस्पतिवार को मंडल मुख्यालय पहुंचने पर हड़कंप की स्थिति है। निकायों में समाप्त घोषित किए गए पदों में टॉल मोहर्रिर, भिश्ती, वैद्य, हकीम श्रेणी तीन, कम्पाउंडर, दाई, लोहार, मेसन, टीकाकार, वन रक्षक व लाइब्रेरियन आदि के पद भी शामिल हैं। जबकि ऊपरी स्तर पर अधिकारियों के पद बढ़ा दिए गए हैं। प्रदेश के श्रेणी एक के दो शहरों नैनीताल व मसूरी में अब दो अधिशासी अधिकारी होंगे। इनमें से एक ग्रेड -1 के तथा दूसरे ग्रेड -3 के होंगे। नए ढांचे में सफाई हवलदार जैसे पद भी गायब हैं, जबकि सफाई नायकों की जगह पर्यावरण पर्यवेक्षक के पद भी प्रति एक हजार की जनसंख्या में केवल एक तक सीमित किए गए हैं।

भगवान भरोसे होगी नैनीताल, मसूरी व अल्मोड़ा पर्यटन नगरियों की सफाई व्यवस्था

नैनीताल। शासनादेश में साफ तौर पर मसूरी, अल्मोड़ा व नैनीताल का नाम लेकर कहा गया है कि इन निकायों में सफाई कर्मचारियों के क्रमश: 157, 175 व 261 पद स्वीकृत हैं, जबकि 2011 की जनसंख्या पर आधारित नए ढांचे में अब इन निकायों में आगे पर्यावरण मित्रों की संख्या मात्र 61, 6 से 9 व 83 तक सीमित कर दी गई है। नैनीताल की बात करें तो ब्रिटिश दौर में तब की जनसंख्या के हिसाब से स्वीकृत सफाई कर्मचारियों के 261 पदों को लगातार बढ़ाए जाने की मांग एवं आवश्यकता महसूस की जाती रही है। हर वर्ष सीजन के तीन महीनों में यहां 9 0 अतिरिक्त कर्मियों की तैनाती की जाती है, बावजूद सफाई केवल माल रोड एवं निचले क्षेत्रों में ही सीमित रहती है। अब एक तिहाई से भी कम पद रह जाने के बाद नगर की सफाई व्यवस्था का क्या होगा, भगवान ही मालिक है। दूसरी ओर नैनीताल से कहीं छोटे व नए निकायों में पर्यावरण मित्रों के यहां से अधिक पद स्वीकृत किये गए हैं। अभी ठीक से अस्तित्व में भी नहीं आ पाई श्रेणी -3 की बिंदूखत्ता नगर पालिका में 99, 10 9 में 105 में जसपुर के 101, मंगलौर, रामनगर, पिथौरागढ़ में 113 व ऋषिकेश में राज्य की नगर पालिकाओं में सर्वाधिक 141 पर्यावरण मित्रों के पद रखे गए हैं। उल्लेखनीय पक्ष यह भी है कि किच्छा में अभी सफाई कर्मचारियों के 26 पद स्वीकृत हैं, जबकि अब यहां 43 पर्यावरण मित्र होंगे।

चलायमान जनसंख्या का नहीं रखा गया है ध्यान

नैनीताल। प्रदेश के नगर निकायों के नए ढांचे से राज्य ही नहीं देश की मसूरी के बाद दूसरी नगर पालिका नैनीताल के अध्यक्ष श्याम नारायण ने कड़ी नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि नगरों की जनसंख्या में फ्लोटिंग यानी चलायमान जनसंख्या के आंकड़ों का खयाल नहीं रखा गया है। नैनीताल को सर्दियों में होने वाली जनगणना से प्राप्त 2011 की जनसंख्या केवल 41,461 होने का खामियाजा उठाना पड़ा है, परंतु पर्यटन विभाग के आंकड़े पुष्टि करते हैं कि यहां प्रति वर्ष 7.5 से 8 लाख के करीब सैलानी आते हैं। उत्तराखंड पर्यटन प्रदेश है, राज्य सरकार लगातार प्रदेश में पर्यटन को बढ़ावा देने की बात भी करती है, लेकिन सैलानियों द्वारा फैलाई जाने वाली गंदगी, और उनके समक्ष राज्य या निकाय को साफ रखने का प्रबंध नए ढांचे में नहीं किया गया है। श्री नारायण ने कहा कि नैनीताल को उनकी 8.41 लाख की कुल जनसंख्या के हिसाब से ग्रांट एवं पद मिलने चाहिए। इस माह के आखिरी सप्ताह होने वाली बोर्ड बैठक में नए ढांचे के शासनादेश पर चर्चा की जाएगी। वहीं कांग्रेस पार्टी के पूर्व जिला उपाध्यक्ष तथा पूर्व पालिका उपाध्यक्ष व वर्तमान सभासद डीएन भट्ट ने कहा कि नया ढांचा संविधान के 74 वें संविधान संसोधन के तहत निकायों को शक्ति संपन्न बनाने के प्राविधान का उल्लंघन है। इससे निकायों को पंगु बनाया गया है। खुद वेतन देने वाले कर्मियों के लिए शासन से अनुमति लेने का प्राविधान नियमविरुद्ध है।

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