जितने सवाल-उतने जवाब थे अपने फक्कड़दा-गिर्दा


Late Girish Tiwari 'Girda' , Photo By: Navin Joshi
Late Girish Tiwari ‘Girda’ , Photo By: Navin Joshi

‘बबा, मानस को खोलो, गहराई में जाओ, चीजों को पकड़ो.. यह मेरी व्यक्तिगत सोच है, मेरी बात सुनी जाए लेकिन मानी न जाए….’ प्रदेश के जनकवि, संस्कृतिकर्मी, आंदोलनकारी, कवि, लेखक गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ (जन्म 9 सितंबर, 1945 को अल्मोड़ा के ज्योली हवालबाग गांव में हंसादत्त तिवाडी और जीवंती तिवाडी के घर-मृत्यु 22 अगस्त 2010 को हल्द्वानी में ) जब यह शब्द कहते थे, तो पीछे से लोग यह चुटकी भी लेते थे कि ‘तो बात कही ही क्यों जाए’ लेकिन यही बात जब वर्ष 2009 की होली में ‘स्वांग’ परंपरा के तहत युगमंच संस्था के कलाकारों ने उनका ‘स्वांग’ करते हुए कही तो गिर्दा का कहना था कि यह उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है। और शायद इसी सबसे बड़े पुरस्कार के वह इंतजार में थे, और इसे लेने के बाद वह दुनिया के रंगमंच से विदा ही हो लिए।

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नैनीताल के बच्चों ने एपीजे से बनाया था ‘काका कलाम’ का रिश्ता


नैनीताल के सेंट मेरीज कान्वेंट हाई स्कूल में बोलते डा. कलाम।
नैनीताल के सेंट मेरीज कान्वेंट हाई स्कूल में बोलते डा. कलाम।

-‘काका कलाम’ ने बच्चों से यहां कहा था- सपने देखो और उन्हें कार्यान्वित करो
– यहां 9-10 अगस्त 2011 नैनीताल के बच्चों से भी एक गुरु की भांति मिले थे दिवंगत पूर्व राष्ट्रपति को
-कहा था-‘असंभव कल्पनाएें करो और उन्हें पूरा कर अद्वितीय बनो’ , ‘मुझे कुछ लेना है’ के बजाय’ मुझे देश को कुछ देना है’ का भाव रखो
नवीन जोशी, नैनीताल। ‘ड्रीम…. ड्रीम…. ड्रीम, ट्रांसफर देम इन टु थाट्स एंड रिजल्ट्स, एंड मेक एक्शन’ यानी खूब-खूब सपने देखो, उन्हें विचारों और परिणामों में बदलों और फिर कार्यान्वित करो। यह वे अनुकरणीय और प्रेरणादायी शब्द थे, जो दुनिया से ‘रातों को सोने न देने वाले सपने’ देखने का आह्वान करने वाले स्वप्नदृष्टा युगपुरुष दिवंगत पूर्व राष्ट्रपति भारत रत्न डा. एपीजे अब्दुल कलाम ने नैनीताल के बच्चों से कहे थे। देश के शीर्ष पद व सम्मान प्राप्त करने और दुनिया के शीर्ष वैज्ञानिक होने के बावजूद बच्चों को पढ़ाने, देश के ‘विजन-2020’ के लिए प्रेरणा देने के लिए उनके बीच ही बालसुलभ तरीके से अधिक समय लगाने वाले, वास्तविक अर्थों में सच्चे भारतीय, मां भारती के सच्चे सपूत, चमत्कारिक प्रतिभा के धनी, ज्ञान-विज्ञान व प्रौद्योगिकी के साथ ही कला, साहित्य, संस्कृति के साथ ही संगीत के प्रेमी, मानवता के पोषक, देश को स्वदेशी सैन्य ताकत से युक्त करने वाले ‘मिशाइल मैन’, ‘रामेश्वरम के कलाम’ को कदाचित पहली बार नैनीताल के बच्चों ने ही ‘काका कलाम’ नाम से पुकारा था। यहां डा. कलाम से सेंट मेरीज कान्वेंट हाई स्कूल में नौ अगस्त 2011 को बच्चों ने घंटे के वार्तालाप में उनसे ढेरों प्रश्न पूछकर अपने बालमन की अनेक जिज्ञासाएं भी शांत की थीं।

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तीन करोड़ प्रवासी उत्तराखंडियों की ‘घर वापसी’ कराएगा आरएसएस !


-प्रधानमंत्री मोदी द्वारा विदेशों में बसे भारतवंशियों से किए जा रहे आह्वान की तर्ज पर उत्तराखंडियों से किया जाएगा वर्ष में एक सप्ताह अपने गांव आने का आह्वान करते हुए शुरू की ‘मेरा गांव-मेरा तीर्थ’ योजना
-संघ ने इस कार्य हेतु 670 गांवों में तैनात कर दिए हैं संयोजक
नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड राज्य की वर्ष 2011 में हुई जनगणना में आबादी एक करोड़ एक लाख 16 हजार 752 है, लेकिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का दावा है कि इससे तीन गुना उत्तराखंडी पलायन कर चुके हैं। इनमें से 30-35 लाख उत्तराखंडी प्रवासी तो अकेले दिल्ली में ही हैं, जबकि अमेरिका, जापान, यूएई सहित दुनिया भर में फैले हुए हैं। जापान जैसे छोटे देश में भी संघ के अनुसार करीब 35 हजार उत्तराखंडी रहते हैं। संघ अब इन लोगों को वर्ष में कम से कम एक बार सप्ताह भर के लिए अपने मूल गांव वापस लाने का खाका बुन रहा है। इस हेतु संघ ने ‘मेरा गांव-मेरा तीर्थ’ योजना शुरू की है। योजना के तहत प्रदेश की 670 न्याय पंचायतों में संयोजक तैनात कर दिए हैं, जिन्हें प्रवासियों को गाँव लौटाने के लिए प्रेरित करने की जिम्मेदारी दी जा रही है।

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नैनीताल को कमजोर नगर बताना सच्चाई है या कोई साजिश !


Nainital Zone Map
नैनीताल का संवेदनशीलता को प्रदर्शित करता मानचित्र, जिसमें केवल पीला भाग ही भूस्खलनों से कम प्रभावित और शेष खतरनाक बताया गया है।

हाईकोर्ट की रोक हटने के बाद नैनीताल में फिर ध्वस्तीकरण संकट: कदम-दर-कदम प्रशासनिक अक्षमताएं, और खामियाजा जनता को
फिर वही सवाल – क्या नैनीताल को बचाया नहीं जा सकता ? क्या ध्वस्तीकरण ही है आखिरी विकल्प ?

-2011 में पूरी हो चुकी है 1995 में बनी ‘नैनीताल महायोजना’, प्रशासन चार वर्षों से महायोजना नहीं बना पाया
-नालों की मरम्मत के लिए चार वर्ष पुराने करीब 21 करोड़ के दो प्रस्तावों पर शासन ने नहीं दिया एक ढेला भी, अब सारी गलती जनता पर डालने की तैयारी
-प्रशासन के पास कमजोर घरों का कोई सर्वेक्षण भी नहीं है
नवीन जोशी, नैनीताल। नैनीताल जिला प्रशासन नगर को ‘बचाने’ के नाम पर नगर के कमजोर, असुरक्षित घरों को ध्वस्त करने का मंसूबा बना रहा है। उत्तराखंड उच्च न्यायालय के कथित आदेशों का हवाला देकर नगर के जोन-एक व जोन-दो तथा सूखाताल के डूब क्षेत्र के घरों को ध्वस्त करने की योजना बताई जा रही है। इसके लिए प्रशासन भूमिका बनाने के लिए नगर के चुनिंदा लोगों की बैठक बुला चुका है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या नैनीताल को बचाने को अन्य विकल्प आजमाए जा चुके हैं, और क्या ध्वस्तीकरण ही आखिरी विकल्प बचा है।

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उत्तराखंड के ‘सरकारी हरेला महोत्सव’ से क्या मजबूत होगी परंपरा ?


उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अंतराष्ट्रीय योग दिवस मनाने की तर्ज पर उत्तराखंड में ‘हरेला’ पर्व मनाने की राजाज्ञा जारी कर दी है। राजाज्ञा के अनुसार हर गांव में सर्वश्रेष्ठ हरेला उगाने वाली महिला को एक वर्ष तक हर माह 500 रुपए दिए जाएंगे। इससे क्या लाभ होगा ? क्या महिलाएं और भी बेहतर हरेला मनाने को प्रेरित होंगी ? जबकि परंपरागत तौर पर वे सदियों से हरेला उगा रही हैं। दूसरे, क्या वे 500 रुपए का इनाम प्राप्त करने के लिए परंपरा तोड़ हरेले की टोकरी को गांव की समिति के समक्ष दिखाने जाएंगी। चलिए, इस जल्दबाजी में जारी राजाज्ञा में इस हेतु यह संशोधन भी हो सकता है कि समिति के लोग हर घर जाकर हरेले की टोकरियों का पुरस्कार हेतु परीक्षण करेंगे। यहां फिर समिति के सदस्यों को टोकरियों के स्थान मंदिर में समिति के सदस्यों को आने देने पर विवाद हो सकता है। विवाद ना भी हो, तो भी बड़ा सवाल यह है कि इस पुरस्कार व हरेला महोत्सव को इस रूप में मनाने से हरेला मनाने की परंपरा मजबूत होगी या टूटेगी ? बेहतर न होता कि हर गांव में सर्वाधिक पौधे लगाने व बचाने वालों को सरकार पुरस्कृत करती ?

हरेला: लाग हरिया्व, लाग दसैं, लाग बग्वाल, जी रये, जागि रये….

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नालों को बचाना होगा तभी बचेगा नैनीताल


मल्लीताल में रोप-वे स्टेशन के पास के नाले की आज भी पाइप लाइनों और मलवे से पटी हुई ऐसी है स्थिति।
मल्लीताल में रोप-वे स्टेशन के पास के नाले की आज भी पाइप लाइनों और मलवे से पटी हुई ऐसी है स्थिति।

-नगर में अंग्रेजी दौर में बने 100 शाखाओं युक्त करीब 324 किमी लंबे 50 नालों में पानी की लाइनें, अतिक्रमण और गंदगी है बाधक
-कैचपिटों को हर बारिश के बाद साफ करने की व्यवस्था का नहीं होता पालन, मरम्मत के निर्माण कार्यों की गुणबत्ता बेहद खराब, सफाई के नाम पर भी होती है खानापूरी
नवीन जोशी, नैनीताल। सरोवरनगरी नैनीताल में सितंबर 1880 में 18 को आए महाविनाशकारी भूस्खलन के बाद वर्ष 1901 तक बने 100 शाखाओं युक्त करीब 324.45 किमी लंबे 50 नालों की स्थिति बहुत ही दयनीय है। नगर की धमनियां कहे जाने वाले इन नालों को हर किसी ने अपनी ओर से मनमाना इस्तेमाल किया है। नगर वासियों ने इन्हें कूड़ा व मलवा निस्तारण का कूड़ा खड्ड तथा इनके ऊपर तक अतिक्रमण कर अपने घर बनाने का स्थान बनाया है तो जल संस्थान ने इन्हें पानी की पाइप लाइनें गुजारने का स्थान, जबकि इसकी सफाई का जिम्मा उठाने वाली नगर पालिका और लोक निर्माण विभाग ने इनमें आने वाले कूड़े व गंदगी को उठाने के नाम पर जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालने और सफाई के नाम पर पैंसे बनाने का माध्यम बनाया है। यदि ऐसा न होता तो आज नाले अपना मूल कार्य, नैनी झील में इसके जलागम क्षेत्र का पूरा पानी बिना किसी रोकटोक के ला रहे होते, और नगर को कैसी भी भयानक जल प्रलय या आपदा न डिगा पाती। गनीमत रही कि उत्तराखंड उच्च न्यायालय के आदेशों पर नगर के होटलों द्वारा अभी हाल ही में उसी स्थान से छह कमरे हटा दिए गए थे, जहां से रविवार की रात्रि दो हजार टन मलवा माल रोड पर आया है, यह कमरे न हटे होते तो रात्रि में इन कमरों में सोए लोगों के साथ हुई दुर्घटना का अंदाजा लगाना अधिक कठिन नहीं है।

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