नितीश के ‘महानायक’ होने का सच


d9125मीडिया में बहुप्रचारित हो रहा है-‘महागठबंधन की महाजीत, महानायक बने नितीश’। मानो एक प्रांत बिहार जीते नितीश में मोदी से खार खाए लोगों को उनके खिलाफ मोहरा मिल गया है। नितीश बाबू भी राष्ट्रीय चैनलों पर राष्ट्रीय नेता बनने के दिवास्वप्न देखते दिखाए जा रहे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि चुनाव परिणाम की रात नितीश सो नहीं पाए हैं। सच है कि उन्हें महागठबंधन ने अपने नेता के रूप में पेश किया था, इसलिए उनकीं तीसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी तय है। लेकिन भीतर का मन सवाल कर कचोट रहा है, पिछली बार के मुकाबले सीटें और वोट दोनों कम मिले हैं। गठबंधन में ‘छोटे भाई’ लालू, अधिक सीटों (80)के साथ ‘बड़े भाई’ बनकर उभरे हैं। पीछे से मन कह रहा है, जिस भाजपा को पिटा हुआ बता रहे हैं, वह तो 24.8 फीसद वोटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। मीडिया कह रहा है, उन (नितीश) का जादू चला है, जबकि सच्चाई यह है कि उन्हें लोक सभा चुनाव (16.04फीसद)  से महज 0.76 फीसद अधिक ही और भाजपा से आठ फीसद से भी कम, महज 16.8 फीसद वोट मिले हैं, और उनके सहयोगी लालू व कांग्रेस को मिलाकर पूरे महागठबंधन का वोट प्रतिशत भी लोक सभा चुनाव के मुकाबले करीब पांच फीसद गिरा है। लोक सभा चुनाव में जहां लालू को 20.46 फीसद वोट मिले थे, वहीं अबकी 18.4 फीसद मिले हैं। चार से 27 सीटों पर पहुंचकर ‘बाल सुलभ’ बल्लियां उछल रही राहुल बाबा की कांग्रेस को भी लोक सभा के 8.56 फीसद के बजाय 6.7 फीसद वोट ही मिले हैं और कुल मिलाकर महागठबंधन को भी जहां लोक सभा चुनाव में 46.28 फीसद वोट मिले थे, वहीं इस बार महज 41.9 फीसद वोट ही मिले हैं।

वहीँ, 2010 के वोटों से तुलना करने पर भी नितीश की पार्टी जदयू सबसेे कमजोर प्रदर्शन कर पाई है, जबकि भाजपा का प्रदर्शन सबसे बेहतर रहा है। भाजपा को जहां 2010 में 16.49 फीसद वोट मिले थे, वहीं अबके करीब आठ फीसद की बढ़ोत्तरी के साथ 24.8 फीसद वोट मिले हैं, और वोटों में बढ़ोत्तरी वाली वह इकलौती पार्टी है। उसके उलट नितीश बाबू की जदयू 5.78 फीसद के सबसे बड़े घाटे में रही है। उसे तब 22.58 फीसद वोट मिले थे, और अबकी महज 16.8 फीसद। लालू का राजद भी सबसे बड़ा दल बनने के बावजूद पिछली बार के मुकाबले 0.44 फीसद की मामूली ही सही लेकिन वोट फीसद के मामले में नुकसान में रहा है। वहीं कांग्रेस को 1.67 फीसद का नुकसान हुआ है। उसे 2010 में 8.3 फीसद और अब 6.7 फीसद वोट मिले हैं, जबकि राम विलास पासवान की लोजपा का नुकसान 1.94 फीसद का है। लोजपा को 2010 में 6.74 फीसद वोट मिले थे और अब 2014 में 4.8 फीसद वोट मिले हैं। इस प्रकार कह सकते हैं बिहार में महागठबंधन की जीत और एनडीए की हार आंकड़ों की सच्चाई के लिहाज से किसी भी खेमे के लिए खुश होने का कारण नहीं है।

चुुनावी ‘जीत’ के लिए देश को ना हराएं

बिहार में हुई चुनावी जंग के बाद से देश में ना तो ‘बीफ’ की कोई बात सुनाई दी है, और ना ही ‘असहिष्णुता’ की। ‘अखलाक-कलबुर्गी’ तो सपने में भी नहीं आ रहे हैं, और पुरस्कार लौटाने की ‘आंधी’ भी पूरी तरह से रुक गई है। लिहाजा लग रहा है मानो देश अचानक फिर से वापस ‘सहिष्णु’ हो गया है। दाल की कीमतें भी जैसे अचानक नीचे लौट आई हैं, ‘ओआरओपी’ पर लौटने वाले पुरस्कार भी थम गए हैं। लगता है देश में सब कुछ ठीक-ठाक हो गया है, या कि ‘अच्छे दिन’ आ गए हैं !
चुनाव बीत गया है सो समय है कुछ पीछे जाने का, कि किस तरह सरकार की कथित असहिष्णुता के खिलाफ हमारे साहित्यकारों ने अपनी ओर से ‘अपनी तरह की क्या खूब सहिष्णुता’ दिखाते हुए पुरस्कार लौटाए। शायद इससे पूर्व वह साबित कर चुके थे कि एक दक्षिणपंथी दल की सरकार के प्रति वे एक-डेढ़ वर्ष ‘सहिष्णु’ रह चुके हैं, और इससे अधिक समय नहीं रह (झेल) सकते। आखिर वह कैसे उनके साथ कदम से कदम मिलाकर ‘लेफ्ट-राइट’ कर सकते हैं। दिल्ली में वह बड़ी चालाकी से ‘आम आदमी’ के साथ हो गए थे, और उसके (आम आदमी के) ‘हाथ’ को साथ लेकर दक्षिण पंथ को धूल चटा दी थी। बिहार में कोई ‘चारा’ नहीं था, इसलिए यह सब किया-कराया, और चुनाव जीत भी गए। लेकिन इस ‘जीत’ की कोशिश में देश को दुनिया के समक्ष कितना ‘हरा’ दिया, क्या वे सोचेंगे भी ?

देश की राजनीति में जीत का फार्मूलाः ज्यादा गाली खाओ-जीत पाओ

जी हां, भारतीय राजनीति में जीत का यह फार्मूला अब से नहीं पिछले करीब ढाई दशक से लगातार मजबूत होता जा रहा है। बिहार चुनावों से यह फार्मूला राज्यों की ओर भी जाता और सही साबित होता नजर आ रहा है। याद कीजिए, 1998 का लोक सभा चुनाव, जब भाजपा अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व में दूसरी बार चुनाव लड़ रही थी, और विपक्ष सांप्रदायिकता के नाम पर बाजपेयी के खिलाफ जमकर विष वमन कर रहा था। नतीजा भाजपा व एनडीए को सत्ता प्राप्ति के रूप् में मिला। 2004 के चुनावों में जहां बाजपेयी आत्ममुग्धता के साथ ‘फील गुड’ और ‘इंडिया शाइनिंग’ के नारे के साथ ही सोनिया गांधी पर ‘विदेशी मूल’ का ठप्पा लगाकर चुनाव मैदान में गए थे, कांग्रेस की 13 वर्ष के बनवास के बाद सत्ता में वापसी हुई थी। सोनिया की जगह प्रधानमंत्री बने मनमोहन सिंह की सरकार 2009 के चुनाव में बहुत सुविधाजनक स्थिति में नहीं गई थी, लेकिन भाजपा की ओर से लाल कृष्ण आडवाणी और तब उनके सारथी की भूमिका में रहे नरेंद्र मोदी ने मनमोहन को ‘कमजोर प्रधानमंत्री’ कह कर जमकर हमला किया था। नतीजा मनमोहन को और मजबूत कर सत्ता में वापसी करा गया। इधर 2014 के चुनावों में हर किसी के निशाने पर नरेंद्र मोदी थे, और वह पहली सबसे बड़े बहुमत की गैर भाजपाई सरकार के करिश्मे के साथ दिल्ली की गद्दी पर आसीन हुए। दिल्ली विधानसभा के चुनावों में कुछ ऐसे ही निसाने पर केजरीवाल रहे थे, और उन्हें भी एक तरफा जीत मिली, और अब यही कहानी ‘जंगलराज पार्ट-टू’ के लिए कुप्रचारित लालू के बिहार विधान सभा में सबसे बड़े दल के रूप में उभरने के रूप में दिखाई दे रही है। यानी यदि आप यदि सत्ता में वापसी के लिए चुनाव में हैं तो आत्ममुग्धता में स्वयं ‘अपने मुंह मियां मिट्ठू’ बनते हुए शेखी न बघारें और हर स्थिति में दूसरे प्रत्याशी पर कमर से नीचे वार करते हुए हमला न बोलें, यह भारतीय चुनाव में जीत की गारंटी हो सकता है। 

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