‘काले-मैकालों’ का नया साल सबको मुबारक हो यारो !


KC Pantभारत में अंग्रेजी शिक्षा के प्रवर्तक ‘लॉर्ड मैकाले’ ने कभी अपने पिता को पत्र लिखा था-‘आप आस्वस्त रहें, हमें भारत को छोड़ना भी पड़े तो हम यहां ऐसे काले अंग्रेजों को छोड़ जाएंगे, जो अपनी सभ्यता, संस्कृति, स्वाभिमान और शर्म तक भले छोड़ दें पर अंग्रेजियत नहीं छोड़ेंगे… इसकी जड़ें बहुत गहरी हो चुकी हैं।” जब अंग्रेज भारत छोड़कर गए तो मैकाले को पता नहीं था कि जो काले अंग्रेज, भारत में रहेंगे वे धर्म व संस्कृति के ठेकेदार बन देश को लूटने में बढ़-चढ़ कर भाग भी लेंगे। शायद भारत की ऐसी हालत देख लॉर्ड विलियम वेंटिंग के जमाने में पकड़े गए ठग पिण्डारियों की रूह भी कॉंप रही होगी। इस आंग्ल नव वर्ष पर महाकवि तुलसी की एक चौपाई “बिछुड़त एक प्राण हर लेहीं, मिलत एक दारुण दु:ख देहीं”  के साथ यादों के इन्हीं गलियारों से निकली है केसी पंत ‘किसन” सेवानिवृत्त अध्यापक, हरी निवास, सूखाताल, नैनीताल की यह कविता- पढ़ना जारी रखें “‘काले-मैकालों’ का नया साल सबको मुबारक हो यारो !”

उत्तराखंड में अब शिक्षा महकमे के लिए ‘गा’, ‘गे’ व ‘गी’ की खबर


-प्राइवेट स्कूलों की तर्ज पर चलेंगे उत्तराखंड के सरकारी स्कूल, 500 मॉडल स्कूल बनेंगे, नर्सरी कक्षाएं भी होंगी, स्मार्ट क्लासें भी लगेंगी -हर ब्लॉक में होंगे पांच मॉडल स्कूल, यहां प्राइवेट स्कूलों की तर्ज पर होगी पढ़ाई व अन्य आयोजन -शिक्षकों-प्रधानाध्यापकों कोे दिया जाएगा प्रशिक्षण, गणित-विज्ञान व भाषाओं के अतिरिक्त शिक्षक होंगे तैनात नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड में हालांकि अधिकांश सरकारी खबरें ‘गा, गे व गी” की ही यानी भविष्य के लिए बेहतर उम्मीदें जगाने वाली आती हैं, पर यह वर्तमान के धरातल पर उतरती हैं या नहीं, यह अलग बात है। अब प्रदेश सरकार प्रदेश के सरकारी स्कूलों की दुर्दशा … पढ़ना जारी रखें उत्तराखंड में अब शिक्षा महकमे के लिए ‘गा’, ‘गे’ व ‘गी’ की खबर

प्रयोगशाला में दुनिया की इकलौती बची प्रजाति-पटवा के क्लोन तैयार


Rashtriya Sahara 15.12.15-सरोवरनगरी के निकट इसी प्रजाति के नाम पर स्थित है पटवाडांगर नाम का कस्बा
नवीन जोशी, नैनीताल। कुमाऊं विवि के जैव प्रोद्योगिकी संस्थान भीमताल स्थित प्लांट एंड मॉलीक्यूलर बायलॉजी प्रयोगशाला ने एक अनूठा कारनामा कर डाला है। प्रयोगशाला में दुनिया की एक ऐसी प्रजाति का प्रयोगशाला में क्लोन तैयार करने में सफलता प्राप्त की है, जो पूरी तरह से विलुप्त होने की कगार पर है, और जिसके दुनिया में 100 से भी कम आखिरी पौधे ही बचे हैं, और इसके प्राकृतिक तौर पर नए पौधे उगने की प्रक्रिया भी समाप्त हो चुकी है। जैव पारिस्थितिकी के लिहाज से यह वैश्विक स्तर पर बड़ी सफलता आंकी गई है, और अमेरिका की शोध पत्रिका-अमेरिकन जर्नल ऑफ प्लांट साइंस व एशियन जर्नल ऑफ माईक्रोबायोलॉजी एंड इन्वायरमैंटल साइंस एवं इण्डियन जर्नल ऑफ साइंटिफिक रिसर्च में भी इस बाबत शोध पत्र प्रकाशित किये गये हैं।

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