प्रयोगशाला में दुनिया की इकलौती बची प्रजाति-पटवा के क्लोन तैयार


Rashtriya Sahara 15.12.15-सरोवरनगरी के निकट इसी प्रजाति के नाम पर स्थित है पटवाडांगर नाम का कस्बा
नवीन जोशी, नैनीताल। कुमाऊं विवि के जैव प्रोद्योगिकी संस्थान भीमताल स्थित प्लांट एंड मॉलीक्यूलर बायलॉजी प्रयोगशाला ने एक अनूठा कारनामा कर डाला है। प्रयोगशाला में दुनिया की एक ऐसी प्रजाति का प्रयोगशाला में क्लोन तैयार करने में सफलता प्राप्त की है, जो पूरी तरह से विलुप्त होने की कगार पर है, और जिसके दुनिया में 100 से भी कम आखिरी पौधे ही बचे हैं, और इसके प्राकृतिक तौर पर नए पौधे उगने की प्रक्रिया भी समाप्त हो चुकी है। जैव पारिस्थितिकी के लिहाज से यह वैश्विक स्तर पर बड़ी सफलता आंकी गई है, और अमेरिका की शोध पत्रिका-अमेरिकन जर्नल ऑफ प्लांट साइंस व एशियन जर्नल ऑफ माईक्रोबायोलॉजी एंड इन्वायरमैंटल साइंस एवं इण्डियन जर्नल ऑफ साइंटिफिक रिसर्च में भी इस बाबत शोध पत्र प्रकाशित किये गये हैं।

पटवा के सुन्दर फूल
पटवा के सुन्दर फूल

यहां बात वैज्ञानिक नाम ‘मीजोट्रोपिस पेलीटाय” यानी पटवा की हो रही है। इस विलुप्तप्राय पौधे की दुनिया में पहचान सर्वप्रथम 1925 में ब्रिटिश वनस्पति वैज्ञानिक ऑसमॉसटोन ने सरोवनगरी के निकट पटवाडांगर में की थी। उनके अनुसार यह पौधा नेपाल के काली कुमाऊं एवं धोती जिले में भी पाये जाते थे। किंतु वर्तमान में यह पौधा पूरे विश्व में सिर्फ उत्तराखंड के पटवाडांगर नाम के स्थान पर ही उपलब्ध है, और इसके वहां भी 100 से भी कम पौधे बचे हैं। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए कुमाऊं विवि के जैव प्रौद्योगिकी विभाग भीमताल भीमताल में उत्तराखंड काउंसिल ऑफ साइंस एण्ड टेक्नोलॉजी से वित्तपोषित परियोजना के द्वारा इसके संर्वधन तथा संरक्षण के लिये ऊतक संर्वधन की एक प्रभावशाली विधि तैयार की गयी। इस परियोजना के प्रमुख अन्वेषक डा. तपन नैलवाल ने बताया कि इस तकनीक को विकसित करने के लिये सर्वप्रथम इस प्रजाति के बीजों, तने व पत्तियों के ऊतक लेकर उनसे नए पौधे तैयार करने के प्रयास किए गए। इन प्रयोगों में पत्तियों व तनों से तो पौधे उत्पन्न नहीं हुए, किंतु बीजों से नए पौधे उत्पन्न हो गए, लेकिन पौधों की वृद्धि अपेक्षित तेज नहीं थी।

प्रयोगशाला में तैयार किये  गए पटवा के नन्हे पौधे
प्रयोगशाला में तैयार किये गए पटवा के नन्हे पौधे

गौरतलब है कि प्राकृतिक तौर पर भी इसके काफी मोटी सख्त फलियों में बंद बीजों से नए पौधे नहीं उत्पन्न हो पा रहे हैं। बहरहाल, अगली कोशिश प्रयोगशाला में धीमी दर से बढ़ रहे बीजों से उत्पन्न पौधों की पत्तियों और तनों से ऊतक प्राप्त कर उनसे नए पौधे उगाने की कोशिश की गई, जो कि सफल रही। इस उपलब्धि में शोध छात्र डा. ललित सिंह एवं सह अन्वेषक प्रो. ललित तिवारी के द्वारा लगातार चार वर्षाें तक कड़ी मेहनत की गई। कुमाऊं विवि के कुलपति प्रो. एचएस धामी ने कहा कि जैव पारिस्थितिकी के लिए हर पौधे का बड़ा महत्व है। एक पौध प्रजाति के समाप्त हो जाने का प्रभाव उसकी पूरी श्रृंखला के अस्तित्व पर खतरे के रूप में आता है। इस लिहाज से यह बहुत बड़ी सफलता है।

पटवा के गुणों से अभी भी अनजान है दुनिया

नैनीताल। एक ऐसा पौधा जिसकी दुनिया में 100 से भी कम प्रजातियां बची हुई हैं, जिसके नाम पर एक ऐसा कस्बा बसा हुआ है, जो दशकों तक विभिन्न शोधों के लिए विख्यात है, और जिस पर बहुत सुंदर नारंगी-लाल रंग के फूल खिलते हैं। बावजूद दुनिया अब भी उसके गुणों से अनभिज्ञ है। इधर नए शोधों के उपरांत इस पौधे में वातावरणीय नाईट्रोजन नियतन एवं ऑक्सीकरणरोधी क्षमतायें भी पायी गयी हैं, तथा आगे भी इस बाबत शोध जारी हैं।

आगे राज्य वृक्ष बुरांश को प्रयोगशाला में उगाने के हो रहे हैं प्रयास

नैनीताल। हम जानते हैं कि राज्य वृक्ष बुरांश भी विलुप्ति की कगार पर है। इसके नए पौधों के प्राकृतिक तौर पर उगने की दर लगातार गिर रही है। ऐसे में जैव प्रोद्योगिकी विभाग की अध्यक्ष डा. बीना पांडे ने बताया कि कुमाऊं विवि का जैव प्रोद्योगिकी संस्थान प्रयोगशाला में इसके पौधे तैयार करने की पुरजोर कोशिश में है। वहीं डा. तपन नैलवाल ने बताया कि इसे उगाने की एक कोशिश शुरुआती सफलता के बाद असफल हो गई है। पुन: प्रयास किए जा रहे हैं।

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