‘काले-मैकालों’ का नया साल सबको मुबारक हो यारो !


KC Pantभारत में अंग्रेजी शिक्षा के प्रवर्तक ‘लॉर्ड मैकाले’ ने कभी अपने पिता को पत्र लिखा था-‘आप आस्वस्त रहें, हमें भारत को छोड़ना भी पड़े तो हम यहां ऐसे काले अंग्रेजों को छोड़ जाएंगे, जो अपनी सभ्यता, संस्कृति, स्वाभिमान और शर्म तक भले छोड़ दें पर अंग्रेजियत नहीं छोड़ेंगे… इसकी जड़ें बहुत गहरी हो चुकी हैं।” जब अंग्रेज भारत छोड़कर गए तो मैकाले को पता नहीं था कि जो काले अंग्रेज, भारत में रहेंगे वे धर्म व संस्कृति के ठेकेदार बन देश को लूटने में बढ़-चढ़ कर भाग भी लेंगे। शायद भारत की ऐसी हालत देख लॉर्ड विलियम वेंटिंग के जमाने में पकड़े गए ठग पिण्डारियों की रूह भी कॉंप रही होगी। इस आंग्ल नव वर्ष पर महाकवि तुलसी की एक चौपाई “बिछुड़त एक प्राण हर लेहीं, मिलत एक दारुण दु:ख देहीं”  के साथ यादों के इन्हीं गलियारों से निकली है केसी पंत ‘किसन” सेवानिवृत्त अध्यापक, हरी निवास, सूखाताल, नैनीताल की यह कविता-

नया साल ये नाजिर ये हाजिर है यारो, है गैरत ये गुमसुम शहर पुरसॉं वालो।
मुबालगा नहीं, ये ना बोहतान यारो, हकीकत जो देखा, बयॉं है वो यारो।।
नये साल का जश्न दीवाने देखो, ये तारीख पहली के परवाने देखो।
बेहया बेअदब ये नकलनवीस देखो, कबीले ये ‘काले-मैकालों” के देखो।।
ये घोटाले सरदार सालार देखो, ये मजमा हुम्करानों का मखमूर देखो।
जरा इन रकीबों के औसाफ देखो, नफासत, बंदर नंग नीलाम देखो।।
ये पार्टी में चौबंद चमचों को देखो, थी काकाकशी, आज गुलछर्रे देखो।
‘इनामी पदम” जानी बदारी देखो, गिरह गॉंठ दस्तक ये दिल्ली तक देखो।।
ये उस्ताद नायाब उस्तादी देखो, ये मक्कार नक्काल तालीमी देखो।
सरकार कुमुक भाई मौसेरे देखो, ये तारीख में दर्ज तकदीरी देखो।।
हरियाली हजामत कारोबार देखो, सफाई में जुटते चिरागी ये देखो।
ये गारदगरी झील गारद भी देखो, ये रिश्वत रिसाला की किस्में भी देखो।।
सितारा बुलंद डाकू सरकारी देखो, पुलिसिया सलाम ठाट बंगलों में देखो।
गैर सरकारी डाकू की किस्मत भी देखो, सर पे डंडे पुलिस डेरा कैदखाना देखो।।
दरिया चंबल के वीरान बीहड़ वो देखो, सियासी ये अब इन डकैतों को देखो।
ये ‘जिन सवार” मजहबी ये खुदगर्ज देखो, फितूरी ये मकबूल महफूज देखो।।
मुशायरा, कवि गोष्ठी के बुनकर भी देखो, ये हाकी की मजलिस, फोतेदार देखो।
ये ड्रामा की डफली, डफालची भी देखो, कमाई है गफ्फा, ये गालिब भी देखो।।
ये पुतला जलाते वतनपरस्त देखो, वतनफरोश बेखौफ मंडराते देखो।
ये चौकी पुलिस गश्त सुस्ती भी देखो, जमैयत में गुत्थम, ये जमहूरी देखो।।
साहबा वो फलादी को क्लबों में देखो, ‘किसन” संग हसीना हरफगीर देखो।
खबरगीर नामानिगारों को देखो, है पहचान गुम, जोड़ी असली ये देखो।।
शराब और शबाब, जरा मुड़के भी देखो, चूल्हे जलते कभी ऐसे घर भी तो देखो।
ये बेआब बेहाल वतनी भी देखो, दुआ देंगे ये सब, खबर लेके देखो।
तोबा लत ये बुरी जरा हट के भी देखो, ये ईमान अब और बिगड़ा न देखो।
खुदा का फजल, उसकी फैयाजी देखो, उसकी रहमत दुआगोई खुशहाली देखो।।

कठिन शब्दार्थ: नाजिर-निरीक्षक, गैरत-शर्म, पुरसॉं-खोज-खबर लेने वाला, मुबालगा-अतिशयोक्ति, बोहतान-झूठा अभियोग, मखनूर-नशे में चूर, औसाफ-खूबियां, रकीबों-प्रेमिका के दूसरे प्रेमी, नफासत-निर्मलता, बदर-दरवाजा, नंग-इज्जत, जानिबदारी-पक्षपात, गारदगरी-लूट खसोट, गारद-पुलिस की टुकड़ी, जिन सवार-गुस्सैल, मकबूल-मान्य, महफूज-सुरक्षित, फितरी-शरारती, वतनफरोश-देश द्रोही, जमैयत-विधान या संसद, जमहूरी-प्रजातंत्र, हरफगीर-बात की खाल निकालने वाला, फजल-कृपा, फैयाजी-उदारता, रहमत-करुणा, दुआगोई-दुआ।

इस उम्मीद व आशाओं के साथ कि हमारी हर सुबह नव वर्ष की तरह आशाओं व उम्मीदों के नए सूरज और हर शाम अभीष्टों व सफलताओं के नए चाँद के साथ आये.. हम आगे बढ़ने के साथ अपनी समृद्ध परंपराओं की जड़ों से भी जुड़े रहें… और अपना भारतीय नव वर्ष-संवत्सर भी मनाएं..
सभी अंग्रेजीदां परिजनों, इष्ट-मित्रों व शुभाकांक्षियो को हैप्पी न्यू ईयर !!

कमोबेस भारतीय कलेंडर जैसा ही था दुनिया का प्राचीनतम कलेंडर

नवीन जोशी, नैनीताल। वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सर्वाधिक प्रचलित कलेंडर को ‘ग्रेगोरियन कलैंडर’ कहा जाता है। इसकी शुरूआत यूनान में प्रचलित ‘ओलम्पियद कलेंडर’ से हुई। रोम नगर की प्रतिष्ठा के दिन से यह कलेंडर ‘रोमन कलेंडर’ कहलाने लगा। इस पारंपरिक रोमन कलेंडर का नव वर्ष भारतीय हिन्दू नववर्ष के चैत्र माह के आस-पास ही मार्च माह से शुरू होता था, जिसमें 304 दिन का वर्ष माना जाता था। इसका पहला माह मार्टियस-Martius (31 दिन), दूसरा अप्रिलिस-Aprilis (30 दिन), तीसरा मेयस-Maius (31 दिन), चौथा लूनियस-Iunius (30 दिन) पांचवां क्विनटिलिस-Quintilis (31 दिन), छठा सेक्सिटिलिस-Sextilis (30 दिन), में 7वां सेप्टेम्बर-September (30 दिन), 8वाँ  ऑक्टोबर- October (31 दिन), 9वाँ नवम्बर-November (30 दिन) और 10वाँ दिसंबर-December (31 दिन) थे। इन नामों में आखिरी चार महीनों के नामों की भारतीय अंकों संस्कृत के सप्तम, अष्टम, नवम और दशम से साम्यता रोमांचित करने के साथ ही भारत की तत्कालीन समृद्ध ज्ञान परंपरा की की ओर इशारा करती है। बाद में इसके शुरू में 29 दिन के Ianuarius (वर्तमान जनवरी) और 28 दिन  के Februarius  (वर्तमान फरवरी) को जोड़ा गया आगे 46 ईशा पूर्व में प्रसिद्ध रोमन सम्राट जूलियस सीजर ने इसमें सुधार कर ‘जूलियन कलेंडर’ तैयार किया, जिसके एक वर्ष में 12 माह और 365 दिन तय किये गए। तब इस कलेंडर का सातवाँ माह लूनियस और आठवां माह क्विनटिलिस ही था, जिसे बाद में उनके सम्मान में उनके नाम पर ही जुलाई और उनके भतीजे व रोम के अगले सम्राट औगस्टस के नाम के आधार पर ‘अगस्त’ किया गया। 1582 में 13वें पोप ग्रेगरी ने उस दौर में प्रचलित  के एक वर्ष में 0.002% का संसोधन कर इस कलेंडर को तैयार किया था। तभी से इसे ‘ग्रेगोरियन कलैंडर’ कहा जाता है। उन्होंने  इस कलेंडर में ईसवी सन् की गणना ईसा मसीह के जन्म से तीन वर्ष बाद से की गयी। ईसा के जन्म के बाद ही जनवरी को पहला मास माना गया।

बावजूद भारत में अंतरराष्ट्रीय अंक 1,2,3… आदि की तरह भारत सरकार ने 1957 में इसी ग्रेगरियन कलेंडर को स्वीकार किया, और भारतीय लोगों की भावनाओं का ध्यान में रखते हुए चैत्र माह से शुरू होने उज्जयिनी सम्राट महाराज विक्रम के विक्रमी संवत यानी हिन्दू नववर्ष को भी खानापूर्ति के लिये साथ में स्वीकार किया।

समय की शुद्ध गणना नहीं, 1752 में करने पड़े 12 दिन गायब, अब भी आता है हर वर्ष 1 पल का अंतर

वर्ष 1752 का रोचक इतिहास, जब 2 सितम्बर के अगले दिन सीधे आया 14 सितम्बर

वर्ष 1752 का रोचक इतिहास, जब 2 सितम्बर के अगले दिन सीधे आया 14 सितम्बर

क्या हम जानते हैं भारतीय समय गणना दुनिया में सर्वश्रेष्ठ और आधुनिक वैज्ञानिक गणना से कहीं अधिक बेहतर है। वर्तमान में दुनिया में मान्य अंग्रेजी ग्रेगेरियन कलेंडर में लगातार कुछ अंतराल में घड़ियों के समय को पीछे करना पड़ता है। वर्ष 1752 के सितंबर माह में तो 11 दिन यानी करीब एक पखवाड़ा ही कलेंडर से गायब करने पड़े थे, और दो सितंबर के बाद सीधे 14 सितंबर की तिथि आ गई थी, यानी सितंबर 1752 के तीन, चार, पांच से लेकर 13 तक की तिथियों का कोई ऐतिहासिक अस्तित्व ही नहीं है। इसके उलट भारतीय समय गणना एक-एक सेंकेंड का सटीक हिसाब रखती है। यहां तक कि यह भी बताया गया है कि सृष्टि की शुरुआत कब हुई।

पश्चिमी दुनिया से प्रचलित हुए मौजूदा ग्रेगोरियन कलेंडर में समय की गणना के अनुसार हमेशा काफी अशुद्धियाँ प्रकाश में आती रहीं। इसलिए समय-समय पर इसमें कई संसोधन किये जाते रहे। रोमन सम्राट जूलियस सीजर के बाद छठी शताब्दी मे डायोनिसियस ने इसमें फिर संशोधन किये, बावजूद इनमें भारतीय गणनाओं के अनुसार प्रति वर्ष 27 पल, 55 विपल का अन्तर पड़ता ही रहा। सन् 1752 में यह अन्तर बढ़ते-बढ़ते 11 दिन का हो गया। तब पोप ग्रेगरी ने आज्ञा निकाली कि इस वर्ष 2 सितम्बर के पश्चात ठीक अगले दिन यानी 3 सितम्बर को 14 सितम्बर कहा जाय और जो ईस्वी सन् 4 की संख्या से विभाजित हो, वह ‘लीप इयर’ कहा जाये और उसका फरवरी मास 29 दिन का हो। वर्ष का प्रारम्भ 25 मार्च के स्थान पर 1 जनवरी से माना जाय। इस आज्ञा को इटली, डेनमार्क, हॉलैण्ड ने उसी वर्ष स्वीेकार कर दिया। जर्मनी और स्विजरलैण्ड ने सन् 1759 में, इग्लैण्ड ने सन् 1859 में, प्रशिया ने सन् 1835 में, आयरलैण्ड ने सन् 1839 में और रूस ने सन् 1849 में इसे स्वीकार किया। इतना संशोधन होने पर भी इस ईस्वी सन् में सूर्य की गति के अनुसार प्रतिवर्ष एक पल का अन्तर पड़ता है। सामान्य दृष्टि से यह बहुत थोड़ा अन्तर है, पर गणित के लिये यह एक बड़ी भूल है। 3600 वर्षों के बाद यही अन्तर 1 दिन का हो जायेगा और 36,000 वर्षों के बाद 10 दिन का और इस प्रकार यह अन्तर चालू रहा तो किसी दिन जून का महीना वर्तमान दिसंबर-जनवरी के शीत काल में पड़ने लगेगा। इसके इतर भारत के परंपरागत विक्रमी सम्वत् में आज तक कोई अंतर नही पड़ा और न आगे पड़ने की सम्भावना है। अतएव यह आवश्यकता भी महसूस की जा रही है कि विशुद्ध वैज्ञानिक दृष्टिकोण युक्त विक्रमी संवत को भारत का राष्ट्रीय सम्वत् विक्रम सम्वत् घोषित किया जाए। उज्जैन के समय से दिन के समय का निर्धारण हो। घंटा, मिनट, सेकेंड के स्थान पर होरा, बिहोरा, प्रति बिहोरा रखे जाएं। 6 बजे के स्थान पर ‘इष्टकल’ शब्द का प्रयोग हो दिन का प्रारम्भ वर्तमान 7 बजे को 1 मानकर हो और 12 बजे दिन तथा 12 बजे रात्रि की समाप्ति मानी जाय।

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दुनियां के अलग-अलग कलेंडर

अलबत्ता दुनिया भर में तमाम कलेंडर प्रचलित हैं, और हर कैलेंडर का नया साल अलग-अलग होता है। एक मोटे अनुमान के अनुसार अकेले भारत में ही करीब 50 कलेंडर (पंचाग) हैं, और इनमें से कई का नया साल अलग-अलग दिनों पर होता है। एक जनवरी को मनाया जाने वाला नव वर्ष ग्रेगोरियन कलेंडर पर आधारित है, जिसकी शुरूआत रोमन कलेंडर से हुई, जिसका नव वर्ष एक मार्च से शुरू होता है।ईसाइयों का एक अन्य पंथ ईस्टर्न आर्थोडाक्स चर्च तथा इसके अनुयायी ग्रेगरियन कैलेंडर को मान्यता न देकर पारंपरिक रोमन कैलेंडर को ही मानते हैं। इस कैलेंडर की मान्यता के अनुसार जार्जिया, रूस, यरूशलम, सर्बिया आदि में 14 जनवरी को नववर्ष मनाया जाता है।

वहीँ इस्लाम धर्म के कैलेंडर को हिजरी साल के नाम से जाना जाता है। इसका नव वर्ष मोहर्रम माह के पहले दिन होता है। हिजरी कैलेंडर कर्बला की लड़ाई के पहले ही निर्धारित कर लिया गया था। मोहर्रम के दसवें दिन को ‘आशूरा’ के रूप में जाना जाता है। इसी दिन पैगम्बर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन बगदाद के निकट कर्बला में शहीद हुए थे। हिजरी कैलेंडर के बारे में एक दिलचस्प बात है कि इसमें चंद्रमा की घटती-बढ़ती चाल के अनुसार दिनों का संयोजन नहीं किया गया है। लिहाजा इसके महीने हर साल करीब 10 दिन पीछे खिसकते रहते हैं। इसी तरह प्राचीन सभ्यताओं के देश चीन का कलेंडर भी चंद्र गणना पर आधारित है। इसका नया साल 21 जनवरी से 21 फरवरी के बीच पड़ता है। चीनी वर्ष के नाम चीनी ज्योतिष में वर्णित 12 राशियों की तरह 12 जानवरों के नाम पर रखे गए हैं।

भारत भी कलेंडरों अर्थात पंचाग के मामले में कम समृद्ध नहीं हैं। वर्तमान में देश में विक्रम संवत, शक संवत, हिजरी संवत, फसली संवत, बांग्ला संवत, बौद्ध संवत, जैन संवत, खालसा संवत, तमिल संवत, मलयालम संवत, तेलुगु संवत आदि तमाम कलेंडर प्रचलित हैं। इनमें से हर एक के अपने अलग-अलग नववर्ष होते हैं। देश में सर्वाधिक प्रचलित संवत विक्रम और शक संवत है। माना जाता है कि विक्रम संवत गुप्त सम्राट विक्रमादित्य ने उज्जयिनी में शकों को पराजित करने की याद में शुरू किया था। यह संवत 58 ईसा पूर्व शुरू हुआ था। विक्रम संवत चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होता है। इसी समय चैत्र नवरात्र का प्रारंभ होता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन उत्तर भारत के अलावा गुड़ी पड़वा और उगादी के रूप में भारत के विभिन्न हिस्सों में नववर्ष मनाया जाता है। सिंधी लोग इसी दिन चेटीचंड के रूप में नववर्ष मनाते हैं। वहीँ शक सवंत को शालीवाहन शक संवत के रूप में भी जाना जाता है। माना जाता है कि इसे शक सम्राट कनिष्क ने 78 ई. में शुरू किया था। स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार ने इसी शक संवत में मामूली फेरबदल करते हुए इसे राष्ट्रीय संवत के रूप में अपना लिया। राष्ट्रीय संवत का नववर्ष 22 मार्च को होता है जबकि लीप ईयर में यह 21 मार्च होता है।

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One response to “‘काले-मैकालों’ का नया साल सबको मुबारक हो यारो !

  1. पिंगबैक: आधुनिक विज्ञान से कहीं अधिक समृद्ध और प्रामाणिक था भारतीय ज्ञान – नवीन समाचार : हम बताएंगे नैनी·

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