ऐसे पर्यटन की चाह शायद किसी को नहीं !


  • सड़कों पर हुआ सैलानियों-वाहनों का कब्जा, नगरवासी हुए पैदल चलने को मजबूर, खेल मैदान के वाहनों से पटने से बच्चे खेलने से महरूम
  • नैनी झील और माल रोड पर खुले में कर रहे शौच
  • निकटवर्ती क्षेत्रों के सैलानियों के भारी संख्या में उमड़ने से नगर की व्यवस्थाएं तार-तार

नवीन जोशी। नैनीताल। उत्तराखंड पर्यटन प्रदेश है। पर्यटन से यहां सर्वाधिक रोजगार मिलता है, तथा आगे भी अपार संभावनाएं हैं। किंतु सरोवरनगरी में पिछले दो दिनों से जिस तरह का पर्यटन नजर आ रहा है, शायद ऐसे पर्यटन की चाह किसी को न हो। यहां निकटवर्ती क्षेत्रों के सैलानियों के भारी संख्या में उमड़ने से नगर की व्यवस्थाएं तार-तार हो गयी हैं। खुद के वाहनों पर आकर, साथ में अपना दिन का भोजन लेकर आने वाले यूपी के सीमावर्ती रुहेलखंड मंडल के ये सैलानी न केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘स्वच्छ भारत अभियान’ को पलीता लगाते हुए अपनी प्राकृतिक सुंदरता व पर्यावरण के लिये वैश्विक महत्व की नैनी झील और नगर की शान माल रोड में खुले में शौच करने से भी बाज नहीं आ रहे, वहीं इन्होंने नगर की सड़कों पर कमोबेश कब्जा ही कर लिया है। परिणामस्वरूप नगर के मूल वासी अपने वाहनों को घर पर ही रखकर पैदल चलने को मजबूर हो गये हैं। नगर का एकमात्र खेल मैदान, डीएसए फ्लैट्स भी इन सैलानियों के वाहनों से पट गया है, जिस कारण नगर बच्चे मैदान में सुबह-शाम खेलने से महरूम हो गये हैं। यह सैलानी न तो नगर के बड़े पंजीकृत होटलों की सेवाएं ले रहे हैं, और न ही नौकाओं पर नैनी झील की सैर करने का चाव ही इनमें दिख रहा है। अलबत्ता ये झील में पैदल ही उतर कर मछलियों को ब्रेड, बन के साथ नमकीन तक उड़ेल रहे हैं। अलबत्ता, इनकी वजह से नगर के गैर पंजीकृत और अवैध होटलों की जरूर पौ-बारह है। क्योंकि वहां ये कम दरों पर एक ही कमरे में दर्जनों की संख्या में रात्रि गुजार रहे हैं। ऐसे दर्जनों सैलानी बीती रात्रि फ्लैट्स मैदान, रोडवेज बस स्टेशन और पार्कों में भी सोते हुए मिले और सुबह खुले में ही शौच आदि नित्य कर्मों से निवृत्त भी हुए। इससे नगर में गंदगी का भी अंबार लग गया है।

बैंड स्टेंड व यहां लगे कुमाउनी संस्कृति के संग्रहालय को किया तबाह

नैनीताल। नगर के ऐतिहासिक धरोहर महत्व के, अंतर्राष्ट्रीय शिकारी व पर्यावरणविद् जिम कॉर्बेट द्वारा अपने पैंसे से निर्मित और इधर दशकों बाद जीर्णाेद्धार हुए ऐतिहासिक बैंड स्टेंड में इन दिनों कुछ कुमाउनी लोक संस्कृति के प्रेमी युवाओं ने बकायदा अनुमति लेकर आगामी 30 जून तक के लिये कुमाउनी संस्कृति का संग्रहालय स्थापित किया है। इधर बुधवार को ये युवा किसी कारण से संग्रहालय से दूर गये कि सैलानी संग्रहालय में चढ़ आये, और यहां लगी माता नंदा देवी के चित्र युक्त पोस्टर सहित कुमाउनी लोक संस्कृति से संबंधित अनेक पोस्टरों को पैरों तले कुचलकर और फाड़कर जबर्दस्त नुकसान पहुंचाया। यही नहीं बैंड स्टेंड को पान-गुटखे की पीक से रंग डाला, और बैंड स्टेंड के बीच में बच्चों के शौच युक्त हगीज तथा अन्य गंदगी बिखेर दी। इससे आहत आयोजक युवाओं ने बताया कि वे संग्रहालय को तीन दिन पूर्व ही समेटने की सोच रहे हैं।

सैलानियों को नगर से बाहर ही रोके जाने की उठ रही मांग

नैनीताल। राष्ट्रीय सहारा ने सैलानियों की समस्या पर नगर वासियों से बात की। लोगों का कहना है कि पूर्व की तरह नगर के पैक होने पर सैलानियों को कालाढुंगी व रानीबाग में रोके जाने की व्यवस्था दुबारा से लागू की जानी चाहिये। वहीं ऐसे सैलानियों पर नकेल कसने के प्रबंध होने चाहिये। नैनी झील में उतर रहे और वहां मछलियों को चारा खिला रहे तथा पार्कों को नुकसान पहुंचा रहे सैलानियों का निर्धारित नियमों के अनुसार चालान व अन्य दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिये। जबकि इधर सैलानियों पर किसी भी तरह का नियंत्रण करने के लिये पालिका या पुलिस-प्रशासन के कर्मचारी कहीं भी नजर नहीं आ रहे हैं। साथ ही ऐसे पर्यटक वाहनों को नगर से बाहर ही पार्किंग स्थल विकसित करके या सड़कों पर ही खड़ा कर रोकने तथा उन्हें खासकर माल रोड पर न आने देने की जरूरत भी महसूस की जा रही है।

हद है, राज्य बनने के बाद औसतन सवा फीसद ही बढ़े नैनीताल में विदेशी सैलानी

English Tourists (1)-पिछले पांच वर्षों में तो विदेशी सैलानियों की संख्या में हो गयी करीब 27 फीसद की कमी 

-कुल आने वाले सैलानियों में भी राज्य बनने के बाद औसतन सवा आठ फीसद की दर से ही बढ़त
नवीन जोशी, नैनीताल। जी हां, पर्यटन प्रदेश कहे जाने वाले उत्तराखंड प्रदेश में पर्यटन शहरों में सर्वप्रमुख सरोवरनगरी नैनीताल में भले सीजन में पर्यटकों की जितनी बढ़ी संख्या, भीड़-भाड़ दिखाई देती हो, पर पर्यटन विभाग के आंकड़े गवाह हैं कि प्रकृति के स्वर्ग कहे जाने वाले विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी में अपार संभावनाओं के बावजूद विदेशी सैलानियों की संख्या राज्य बनने के डेढ़ दशक में औसतन महज सवा फीसद (1.26 फीसद) की दर से ही बढ़ रही है। वहीं इधर तो हालात और भी बुरे हैं। पिछले पांच वर्षों में तो विदेशी सैलानियों की संख्या में करीब 27 फीसद की कमी हो गयी है। नगर में कुल आने वाले सैलानियों की बात भी करें तो राज्य बनने के बाद औसतन सवा आठ फीसद की दर से बढ़ रही है।

English Tourists (2)उल्लेखनीय है उत्तराखंड को पर्यटन प्रदेश के रूप में प्रदेश सरकारों के द्वारा खूब प्रचारित किया जाता है। प्रदेश में नैनीताल, मसूरी व कार्बेट पार्क रामनगर जैसे अपार पर्यटन संभावनाओं वाले अनेक पर्यटन स्थलों वाले प्रदेश में ऐसी संभावनाएें भी मौजूद हैं। लेकिन सरकारी उदासीनता के चलते राज्य बनने के बाद पर्यटन विभाग का ठीक से ढांचा ही न बन पाने और बेहतर ‘कनेक्टिविटी’ और प्रचार-प्रसार जैसे कारण राज्य के पर्यटन को गर्त में धकेल रहे हैं। वहीं दूसरी ओर राज्य के पर्यटन को बढ़ाने के नाम पर मंत्रियों-विधायकों व नौकरशाहों के विदेशी दौरों की बात करें तो ऐसे कई दौरों पर साथ गये भरोसेमंद सूत्रों के अनुसार जितना विदेशी धन इन लोगों के द्वारा खर्च किया गया है, उतना विदेशी धन राज्य में आये सैलानियों से प्राप्त नहीं हो पाया है। अधिकारी -जनप्रतिनिधि विदेशों में आयोजित होने वाले ‘ट्रेड फेयर’ और ‘ट्रेवल व टूरिज्म मेलों “के नाम पर होने वाले दौरों को तफरी के लिये ही अधिक लेते हैं, और वहां राज्य के पर्यटन को बढ़ाने के कोई प्रयास नहीं करते हैं। यहां तक ​​कि पिछले दिनों जर्मनी जैसे देशों में हुये मेलों में हिंदी में प्रदेश के पर्यटन के ब्रोशर बांटे गये। अधिकांश अधिकारी देश लौटने पर सरकार को अपनी रिपोर्ट भी नहीं देते हैं। आंकड़े भी इसके गवाही कर रहे हैं।

राष्ट्रीय सहारा, 22 जनवरी 2016

राष्ट्रीय सहारा, 22 जनवरी 2016

वर्ष 2001 में यहां 5793 विदेशी सैलानी आये थे , जबकि बीते वर्ष 2015 में यह संख्या केवल 6902 रही है। जबकि इससे पूर्व 2011, 4109 में में 8256, 12 और 2014 में 13 में 7088 के 7622 में साथ यह संख्या लगातार गिरती गयी है। उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व विदेशी सैलानियों की संख्या में वृद्धि हो रही थी। वर्ष 2009 व 10 के बीच वृद्धि दर 24.48 फीसद व 2010 व 11 के बीच वृद्धि दर 32 फीसद रही थी। इस बाबत नार्थ इंडिया होटल ऐसोसिऐशन के प्रबंधन कमेटी के कार्यकारिणी सदस्य इन स्थितियों को स्वीकारते हुये कहते हैं कि राज्य के पर्यटन को अपनी साहसिक पर्यटन, योग, ट्रेकिंग, माउंटेन बाइकिंग जैसी विशेषताओं (यूएसपी) पर फोकस करते हुए अपने प्रचार को बढ़ाना तथा इस दिशा में ठोस कार्य करना होगा, तभी स्थितियां बेहतर हो सकती हैं, वरना मौजूदा ट्रेड तो स्थितियों के और भी बदतर होने का ही इशारा कर रहा है।

नैनीताल में वर्षवार आये सैलानियों की संख्या:

वर्ष          देशी सैलानी             विदेशी सैलानी               कुल

2001      356941                   5793                            362734

2002      412440                  4224                            416664

2003      441593                   4839                           446432

2004      478133                   6277                            484410

2005       510957                   6789                            517748

2006       554527                   7533                            562060

2007       580079                   9437                           589516

2008      615469                    7070                           622539

2009      749556                     5722                          755278

2010      786705                     7123                           793828

2011      834405                     9410                          843815

2012      898077                    8256                          906333

2013      737130                     7088                          744218

2014      750501                    7622                           758123

2015      808903                   6902                          815805

2016      866164                    7231                            873395

विदेशी सैलानियों की पसंद हैं बसंत व शरदकाल

नैनीताल। बीते वर्षों में सरोवरनगरी में आने वाले विदेशी सैलानियों की संख्या की वृद्धि दर देशी सैलानियों के मुकाबले अधिक रिकार्ड की गई है। विदेशी पर्यटकों के लिये बसंत व शरद ऋतुएें नगर में पहुंचने के लिये सर्वाधिक पसंदीदा समय रहते हैं। बीते वर्ष की बात करें तो यहां जनवरी में 515, फरवरी में 456, मार्च में 1223, अप्रैल में 796, मई में 564, जून में 259, जुलाई में 253, अगस्त में 319, सितंबर में 344, अक्टूबर में 575, नवंबर में 807 तथा दिसंबर में 791 विदेशी सैलानी पहुंचे। यह भी कहा जाता है कि सरोवरनगरी आने वाले विदेशी सैलानियों में सर्वाधिक संख्या अमेरिका और दूसरे स्थान पर इंग्लेंड, ग्रेट ब्रिटेन के सैलानियों की रहती है। इंग्लेंड व ग्रेट ब्रिटेन के कई सैलानी तो अपने पूर्वजों के निसान तलाशने भी यहां आते हैं।

मुद्दा : पर्यटक नगरी पर बोझ 2017 का, व्यवस्थाएं 1994 की

  • १७ वर्षों में नहीं बना पर्यटन विभाग का ठीक से ढांचा ही
  • १९९४ से नगर में व्यवसायिक निर्माणों पर रोक, यानी नहीं बढ़ी वैधानिक तौर पर ‘बेड कैपेसिटी’
  • सरोवरनगरी में पार्किंग क्षमता अधिकतम ढाई हजार, जबकि आते हैं सीजन में कई गुना वाहन

नवीन जोशी। नैनीताल। कहा जाता है कि पर्यटन उत्तराखंड प्रदेश की आर्थिकी का मुख्य आधार हो सकता है, लेकिन असीमित संभावनाओं के बावजूद स्थितियां कैसी हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सरकारी उदासीनता के चलते राज्य बनने के १७ वर्षों के बाद भी पर्यटन विभाग का ठीक से ढांचा ही ठीक से नहीं बन पाया है। वहीं प्रदेश में सर्वाधिक देशी-विदेशी को आकर्षित करने वाली विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी सरोवरनगरी नैनीताल में १९९४ से सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों पर व्यवसायिक निर्माण प्रतिबंधित हैं। इसका अर्थ यह भी है कि इस दौरान नगर में कोई भी नया होटल अथवा नये कक्ष औपचारिक तौर पर नहीं बढ़े हैं, यानी नैनीताल २०१७ के पर्यटन का बोझ १९९४ की व्यवस्थाओं पर ही ढो रहा है। इसी तरह नगर में जहां अधिकतम दो हजार वाहनों को ही पार्क करने की व्यवस्था है, वहीं नगर में ग्रीष्मकालीन पर्यटन सीजन के करीब डेढ़ माह हर दिन पांच से १० हजार तक वाहन पहुंचते हैं। वहीं करीब एक दशक से नगर के लिये बाइपास का निर्माण कार्य चल रहा है, परंतु दो वर्ष पूरा होने का दावा होने के बावजूद यह लगातार ढहने के कारण इसका आज भी उपयोग नहीं हो पा रहा है।प्रदेश में पर्यटन विभाग का ठीक से ढांचा ही न बना होने का परिणाम है कि पर्यटन विभाग का न राज्य के पर्यटन व्यवसायियों पर कोई नियंत्रण है, और न वह पर्यटकों की मदद या उन्हें सुविधाएें दिलाने में कोई मदद कर पाता है। सरोवरनगरी की बात करें तो यहां केवल १४४ होटल ही सराय एक्ट में पंजीकृत हैं। १९९४ से वैधानिक तौर पर एक भी नया होटल नहीं बना है, सो ‘बेड कैपेसिटी” भी नहीं बढ़ी है। साफ है इन १९ वर्षों में बढ़े पर्यटक दो दशक पूर्व की सुविधाओं से ही काम चलाने को मजबूर हैं। नगर की बाहरी शहरों से ‘कनेक्टिविट के लिहाज से ट्रेनों की संख्या में भी कोई खास वृद्धि हुई। पंतनगर के लिए नियमित हवाई सेवा कई बार शुरू होने के बाद बंद पड़ी है। सड़कों की स्थिति खासकर यूपी के रामपुर-बिलासपुर क्षेत्र में खासी  खस्ता है। राज्य बनने के बाद के एक दशक से अधिक समय में भी यहां वाहनों की पार्किंग सुविधा में भी औपचारिक तौर पर कोई वृद्धि नहीं हुई है। नगर में छोटे-बड़े कामचलाऊ पार्किंग स्थलों में मिलाकर अधिकतम दो हजार वाहनों के खड़े होने की जगह है, जबकि सीजन में कई दिनों में हर रोज पांच से दस हजार वाहन भी प्रवेश करते हैं। सैलानियों को नगर में पार्किंग की खोज में अनावश्यक यहां से वहां भागना पड़ता है, सो शहर में वाहनों की अनावश्यक भीड़भाड़ रहती है। वहीं नगर के प्रमुख आकर्षण माल रोड स्थित होटलों को वाहनों के खड़े होने की अनुमति न होने से सैलानी नहीं मिल पाते। सैलानी अनाधिकृत तौर पर चलने वाले सस्ते-सुविधाविहीन होटलों में रहने को मजबूर होते हैं, और इससे नगर की छवि खराब होती है।

चार बहुमंजिला पूर्णतया ऑटोमेटेड पार्किंग का स्वीकृत प्रस्ताव गायब !

नैनीताल। २०१५ में सरोवरनगरी में शुरुआत में २५३ व बाद में ४०० वाहनों की विस्तारित क्षमता की चार, चार मंजिला पूर्णतया ऑटोमेटेड मल्टी स्टोरी पार्किंग स्वीकृत हो गयी थीं। इनमें से ८.५ करोड़ की लागत से तीन पार्किंग मल्लीताल में बीडी पांडे जिला चिकित्सालय के पास, नगर पालिका कार्यालय के पीछे पुराने घोड़ा स्टेंड में और पुलिस कोतवाली के पीछे पुराने कोयला टाल में एशियाई विकास बैंक के जरिए, जबकि चौथी लोक निर्माण विभाग के माध्यम से कालाढुंगी रोड पर नगर से करीब छह किमी दूर नारायणनगर में बननी प्रस्तावित थी। एडीबी ने इन पार्किंगों के लिए निविदा की प्रक्रिया भी पूरी की। किंतु अज्ञात कारणों से प्रस्ताव ही गायब हो गये। इधर बमुश्किल कुमाऊं आयुक्त ने नारायणनगर वाली पार्किंग के लिये ठीक चुनाव से पहले कुछ हरकत की थी, लेकिन फिर नतीजा सिफर ही रहा है। उल्लेखनीय है कि नगर में वर्तमान में पार्किंग की ढांचागत सुविधा के नाम पर एकमात्र सूखाताल स्थित कुमाऊं मंडल विकास निगम की पार्किंग ही उपलब्ध है, जिसका नगर से दूर होने की वजह से पूरा उपयोग नहीं हो पाता है। इन दिनों इस पर्किंग में निगम मुख्यालय भी संचालित हो रहा है। ऐसी स्थिति में नगर के एकमात्र खेल के मैदान फ्लैट्स पर खेल गतिविधियां रोककर वाहनों को खड़ा करने की नौबत आना आम बात है। डीएम की कस्टडी में मौजूद शत्रु संपत्ति मेट्रोपोल होटल के मैदान का प्रयोग भी पार्किंग के लिए करना पड़ता है। पूर्व में हनुमानगढ़ी में एक पार्किंग प्रस्तावित की गई थी, लेकिन पर्यावरण प्रेमियों के हस्तक्षेप से वह भी नहीं बन पाई थी। इस दौरान नगर में पार्किंग तो नहीं बनीं, उल्टे नगर पालिका के पीछे की घोड़ा स्टेंड पार्किंग को पार्क बना दिया गया।

सरोवरनगरी में पार्किग स्थलों की वाहन क्षमता :

  • डीएसए मैदान- ३००
  • मोहन-को पार्किग-३०
  • हल्द्वानी रोड-५०
  • मेट्रोपोल (अस्थायी)-६००
  • सूखाताल- ३००
  • अंडा मार्केट-२०
  • इसके अलावा बड़े होटलों की पार्किग में करीब ७०० वाहन पार्क किए जा सकते हैं।

कुल : अधिकतम करीब दो हजार वाहन।

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