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कुमाउनी लोक संगीत को बचाने में जुटेगा कुमाऊं विश्वविद्यालय


राष्ट्रीय सहारा, 1 फरवरी 2016

कुमाऊं विवि ने बनाया कुमाऊं के लोक संगीत को अपना ‘मैन्डेट’
-कुमाऊं के परंपरागत लोकगीतों न्यौली, छपेली, चांचरी व शगुराखरों आदि को उनके मूल स्वरूप में आगे लाने, कुमाउनी संगीत को हालिया दौर में आ रहे हल्केपन से बचाने के साथ फ्यूजन के जरिये राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाने के होंगे प्रयास
नवीन जोशी, नैनीताल। कुमाऊं विश्व विद्यालय कुमाऊं मंडल के परंपरागत लोकगीतों न्यौली, छपेली, चांचरी व शगुराखरों आदि को उनके मूल स्वरूप में आगे लाने, कुमाउनी संगीत को हालिया दौर में आ रहे हल्केपन से बचाने के साथ फ्यूजन के जरिये राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाने सुनियोजित पहल करने जा रहा है। इस हेतु एक कार्यशाला पूर्व में की जा चुकी है, तथा आगे और भी इसी तरह की कार्यशालायें और संगोष्ठियां आयोजित की जायेंगी, तथा उनसे निकलने वाली दिशा पर आगे चलकर यहां के लोक संगीत को आधुनिक संचार माध्यमों के जरिये अमर व गैर कुमाउनी भाषी जन-जन की जुबान पर चढ़ाकर लोकप्रिय करने की है। कुमाऊं विवि के कुलपति प्रो. होशियार सिंह धामी का कहना है कि हर राज्य विश्वविद्यालय का अपने क्षेत्र के परंपरागत ज्ञान, लोक संगीत, संस्कृति को संरक्षित व संवर्धित करने का आधिकारिक तौर पर कार्य (मैन्डेट) होना चाहिये। कुमाऊं विवि ने इसी उद्देश्य से कुमाऊं के लोक संगीत को संरक्षित व संवर्धित करने का अपना ‘मैन्डेट’ तय किया है। उनकी कोशिश होगी कि इस सुनियोजित प्रयास के जरिये गैर कुमाउनी भाषी लोग भी कुमाउनी गीतों को सुनकर वैसे ही कुमाउनी पढ़ने की कोशिश करें, जैसे भूपेन हजारिका के असमी गीतों को सुनकर लोग असमी और रवींद्र नाथ टैगोर के बांग्ला गीतों को सुनकर बांग्ला गीतों को सुनने की कोशिश करते हैं।

प्रो. धामी कहते हैं कि ‘बेड़ू पाको बारों मासा..’ गीत मूलत: कुमाउनी का लोकगीत नहीं, वरन 1980 के आसपास प्रख्यात संस्कृतिकर्मी व गायक मोहन उप्रेती द्वारा तैयार किया व गाया गया गीत है। स्वर्गीय उप्रेती ने इसे 12 तरह से गाकर इतना प्रसिद्ध कर दिया कि आज यह कुमाउनी लोकगीतों का प्रतिनिधि गीत बन गया है। कुछ इसी तर्ज पर कुमाऊं विवि कुमाऊं के परंपरागत लोक गायकों को तलाशकर यहां के परंपरागत लोक गीतों, न्यौली, चांचरी, झोड़ा व छपेली आदि को तलाशकर उसका ‘डॉक्यूमेंटेशन’ करेगा, तथा मूल स्वरूप को मीडिया के जरिये जनता के बीच जे जाने के साथ ही बॉलीवुड व अन्य बड़े स्तरों पर कार्य कर रहे यहां के गीतकारों-संगीतकारों को साथ लेकर उन्हें हल्केपन से बचाते हुये आज के ‘स्टाइल’ में उनका ‘फ्यूजन’ तैयार करके भी लोकप्रिय बनाने के प्रयास करेंगे।

इस तरह ढूंढेंगे मूल स्वरूप

नैनीताल। कुलपति प्रो. धामी स्वयं कुमाउनी लोक संगीत के अच्छे मर्मज्ञ हैं, तथा इसके आज के दौर के स्वरूप को लेकर चिंतित भी। वे कहते हैं, कुमाऊं का न्यौली गीत मूलत: सोरघाटी यानी पिथौरागढ़ क्षेत्र का पहाड़ की महिलाओं द्वारा वनों में सेना अथवा दूर देश में कार्यरत अपने पतियों के वियोग में गाया जाने वाला विरह गीत है। इसका मूल स्वरूप आज कठिनता से ही समझ में आता है। अनेक कुमाउनी गीतों में जोड़ की तरह ‘तीलै धारू बोला…’ का प्रयोग किया जाता है, जिसका संबंध करीब एक हजार वर्ष पूर्व कत्यूरी शासनकाल के दौर में प्रदेश के पहले श्रमिक संघर्ष और दुराचारी राजा के अत्याचारों से जुड़ा हुआ है। इसी तरह शगुनाखरों के वर्तमान में सीमित स्वरूप ही दिखते हैं। इसी तरह शगुनाखरों के एक-दो स्वरूप ही प्रचलित हैं, जबकि बच्चे के नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह के आगमन, फेरों व विदाई जैसे हर शुभ कार्य के अवसर पर अलग-अलग तरह के शगुनाखर परंपरागत तौर पर गाये जाते रहे हैं।

एफटीआई पुणे से किया अनुबंध

नैनीताल। कुमाऊं विवि ने कुमाऊं के कलाकारों को फिल्मों एवं टेलीविजन में अदाकारी व फिल्म निर्माण का प्रशिक्षण दिलाने के उद्देश्य से फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट पुणे से एक अनुबंध कर लिया है। इस अनुबंध के तहत एफटीआई के सात विशेषज्ञ विजिटिंग फैकल्टी के रूप में कुमाऊं विवि के छात्र-छात्राओं को फिल्मों में अदाकारी व फिल्मों के निर्माण का प्रशिक्षण देंगे। कुमाऊं विवि के कुलपति प्रो. एचएस धामी ने बताया कि इस हेतु आगामी शैक्षिक सत्र से छह माह का पाठ्यक्रम प्रारंभ किया जायेगा।

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