इंटरनेट की दुनिया की ताजा खबरें


Estatisticas da internet
विश्व में इंटरनेट के प्रयोग सम्बंधित ताजा आंकड़े

नए मीडिया के आने से परंपरागत प्रिंट मीडिया के समक्ष बड़ी चुनौती

समय से अधिक तेजी से हो रहे मौजूदा बदलाव के दौर में परंपरागत या प्रिंट पत्रकारिता के करीब दो हजार वर्ष तक रहे एकाधिकार को 20वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि, ‘ई-सूचना हाईवे’ के रूप में अस्तित्व में आये इंटरनेट के माध्यम से जुड़े साइबर मीडिया, साइबर जर्नलिज्म, ऑनलाइन जर्नलिज्म, इंटरनेट जर्नलिज्म, कम्प्यूटराइज्ड जर्नलिज्म, वेबसाइट पत्रकारिता व वेब पत्रकारिता सहित कई समानार्थी नामों से पुकारे जाने वाले ‘कलम रहित’ नये मीडिया और इसके प्रमुख घटक सोशल मीडिया ने पिछले करीब दो दशकों में बेहद कड़ी चुनौती दी है। एक रिपोर्ट के अनुसार लंदन में वर्ष 2002 में ही ई-अखबारों यानी इंटरनेट पर उपलब्ध समाचार पत्रों ने प्रिंट पत्रकारिता के पारंपरिक माध्यम को चौथे स्थान पर विस्थापित कर दिया है। यही कारण है कि कई देशों में इस नये मीडिया माध्यम को अखबारों के लिये ‘नये शत्रु’ के रूप में बताया जा रहा है। अमेरिका में वाशिंगटन पोस्ट, न्ययार्क टाइम्स, वॉल स्ट्रीट जनरल, यूएसए टुडे जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों के साथ ही फिलाडेल्फिया इनक्वायर, सेंट लुईस, पोस्ट डिस्पैच और डेली ओकसोहोमन जैसे क्षेत्रीय अखबार, सबके सामने अपने खुद के उपजाये इस नये शत्रु से निपटने का बड़ा प्रश्न खड़ा है। दूसरी ओर कोलम्बिया विश्वविद्यालय का प्राचीन पत्रकारिता संस्थान हो या मिसौरी विश्वविद्यालय का स्कूल ऑफ जर्नलिज्म, हर जगह इस बात की कोशिश हो रही है कि कैसे वेब पत्रकारिता को अधिक से अधिक कमाऊ बनाया जाये।
इधर ताजा खबर यह है कि 1972 में 70 लाख प्रतियों के प्रसार वाली अमेरिका ही नहीं दुनिया में प्रसिद्ध वयस्क पत्रिका-प्लेबॉय बिकने की कगार पर पहुंच गयी है। इसका कार्यालय प्लेबॉय मैंशन भी बिकाऊ घोषित कर दिया गया है। इसके प्रसार का आंकड़ा घटकर आठ तक सिमट गया है। इसकी वजह आज के दौर में इसके पाठकों की ऑनलाइन पॉर्न सामग्री तक आसान पहुंच हो गयी, जिसके परिणाम स्वरूप यह पत्रिका अपनी दूसरी इमेज गढ़ने की कोशिश भी कर रही है।
उधर फ्रांस के अखबारों पर भी वेब पत्रकारिता या नये मीडिया का काफी प्रभाव देखने को मिल रहा है। यहां वर्ष 1999 से वर्ष 2001 के बीच फ्रांसीसी अखबार उद्योग में यह बात सामने आयी कि वेबसाइटों का प्रसार अखबारों से ज्यादा रहा। यहां दैनिक समाचार पत्रों की अपेक्षा साइटों का प्रदर्शन 0.6 प्रतिशत अधिक रहा। ऐसी स्थितियों से बचने के लिये अमेरिका के अखबार ‘डिस्पैच’ ने स्वयं को नितांत स्थानीय शक्ल देने की कोशिश की। वहां सुदूर ग्रामीण इलाकों में भी लोगों के पास निजी कम्प्यूटर या टीवी कम्प्यूटर आम बात है, और लोगों को राष्ट्रीय खबरें पढ़ने के लिये अखबारों की जरूरत नहीं है, इसलिये डिस्पैच अखबार ने कोशिश की कि दूरस्थ क्षेत्रों के लोगों को उनकी आसपास की खबरों को अधिक से अधिक जुटाकर अखबार पढ़ने को मजबूर किया जाये। भारत में भी अखबारों से आई अत्यधिक स्थानीयता इसी का प्रभाव नगर आती है। वहीं एक अध्ययन के अनुसार फ्रांस में लोग जितना समय समाचार पढ़ने में बिताते हैं, उससे तीन गुना समय वे इंटरनेट सर्फिंग, ई-मेल अथवा खरीददारी एवं बैंकिंग में खर्च करते हैं। शाम के समय तो यह आंकड़ा छह गुना तक हो जाता है। एक और भयावह आंकड़ा प्रकाश में आया कि 16 से 34 वर्ष के युवा अखबार देखने या पढ़ने से 15 गुना अधिक समय नेट पर बिताते हैं। यहां तक कि महिलायें भी पत्रिका पढ़ने से पांच गुना ज्यादा समय ऑनलाइन माध्यम पर बिताती हैं।
दुनिया को हिलाने वाले खुलासे करने वाले विकीलीक्स के साथ ही सोशल मीडिया और ब्लॉगों सरीखे अनेक स्वरूपों में प्रिंट मीडिया ही नहीं, इलेक्ट्रानिक मीडिया सहित पूरे परंपरागत मीडिया के समानांतर खड़े होकर वैकल्पिक मीडिया के रूप में उभरे नये मीडिया की इस चुनौती का परिणाम विश्व के विकसित देशों में साफ तौर पर दिखने लगा है। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के सदस्य राजीव रंजन नाग के अनुसार ‘वर्तमान में दुनिया में प्रतिदिन 2.7 करोड़ वेब पेज सर्च किये जा रहे हैं। अमेरिका का युवा कागज पर छपा अखबार नहीं पढ़ रहा बल्कि वह अखबार की जगह नेट पर गूगल समाचार में एक ही जगह तमाम अखबारों की सुर्खियां देख ले रहा है। गूगल समाचार के कारण यूरोप और अमेरिका के अखबारों की संख्या और राजस्व दोनों गिर रहे हैं। अमेरिकी मीडिया अकादमिक प्रो. फिलिप ने अखबारों के पतन का उल्लेख करते हुये लिखा है कि अगर ऐसा ही रहा तो अप्रेल 2040 में अमेरिका में आखिरी अखबार छपेगा। अमेरिका का सर्वाधिक प्रतिष्ठित अखबार वाशिंगटन पोस्ट बिक गया, जिसे अमेजन डॉट कॉम ने खरीद लिया। न्ययार्क टाइम्स भी कर्ज में डूब चुका है। साप्ताहिक पत्रिका न्यज वीक का प्रिंट संस्करण भी बंद हो चुका है, और वह अब केवल ऑनलाइन ही पढ़ी जा सकती है।’
वैश्वीकरण के युग में समस्यायें किसी एक स्थान पर नहीं सिमटी रहतीं। अमेरिका और यूरोपीय देशों से शुरू हुई समाचार पत्रों के घटते प्रसार की यह चिंता इधर एशिया तक पहुंच गयी है। दिसंबर 2009 में हैदराबाद में आयोजित हुये 16वें वर्ल्ड एडीटर्स फोरम और 62वें न्यज पेपर्स कांग्रेस सहित अनेक मंचों पर देश के साथ ही विश्व भर के समाचार पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों और मालिकों के बीच समाचार पत्रों की घटती लोकप्रियता बड़ी चिंता के कारण के रूप में दिखी। जहां मीडिया क्षेत्र के अनुभवी लोगों ने माना कि विश्व में भारत, चीन, ब्राजील, जापान और विएतनाम सहित कुछ देशों को छोड़कर अधिकतर देशों और विशेषकर अमेरिका और यूरोप में समाचार पत्रों का प्रसार और प्रभाव लगातार घट रहा है।
वर्ल्ड एडीटर्स फोरम में फोरम के अध्यक्ष जैवियर विडाल फोल्क ने हालांकि आशा बंधाई कि समाचार पत्रों का भविष्य अच्छा ही होगा, क्योंकि छपे हुए समाचार पत्र के बिना एक अच्छी पत्रकारिता की कल्पना नहीं की जा सकती है। लेकिन उन्होंने पिं्रट पत्रकारिता पर खतरे को रेखांकित करते हुये संहेह भी जताया कि ‘समाचार पत्र न हों तो पत्रकारिता ही खतरे में पड़ जाएगी।’ वहीं टाइम्स ऑफ इंडिया के प्रधान संपादक जयदीप बोस ने समाचार पत्रों को बचाने के लिये पत्रकारिता के अंदाज को बदलने की आवश्यकता जताई। उन्होंने माना कि नई पीढ़ी के आने के नई तकनीक का उपयोग करते हुए समाचार पत्रों को नए पढ़ने वालों के लिए आकर्षक बनाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि आज भारत में भले समाचार पत्रों को उन समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ रहा है जो अमेरिका और यूरोप में हैं, लेकिन उनका स्पष्ट कहना था कि हो सकता है 10 वर्षों में यहां भी वही स्थिति उत्पन हो जाए।
इधर भारत में पत्रकारिता के बेहतर भविष्य के पीछे यह तर्क भी दिया जा रहा है कि यहां जिस तरह जनसंख्या के साथ साक्षरता और लोगों की आमदनी बढ़ रही है, और साथ ही अंग्रेजी भाषा पढ़ने वालों की संख्या बढ़ रही है, उस हिसाब से सभी समाचार पत्रों की प्रसार संख्या भी जिस तरह बढ़ रही है, उसी तरह बढ़ती रहेगी। वरिष्ठ पत्रकार दिलीप पड़गांवकर भी मानते हैं कि भले भारत में 19-20 वर्ष के युवा समाचार पत्र नहीं पढ़ते, लेकिन चूंकि भारत में जनसंख्या सहित हर चीज बढ़ रही है, इसलिये बढ़ती साक्षरता के साथ अगले 15 वर्षों में समाचार पत्र और फैलेंगे। अंग्रेजी से ज्यादा, भारत की प्रांतीय भाषाओं में समाचार पत्रों के प्रसार में और वृद्धि होगी। मलयालम दैनिक मध्यम के संपादक अब्दुल रहमान भी मानते हैं कि केरल में शत-प्रतिशत साक्षरता के बावजूद अभी इंटरनेट या टीवी का ज्यादा प्रभाव समाचार पत्रों पर नहीं पड़ा है, लेकिन पत्रिकाओं पर जरूर पड़ा है। अलबत्ता समाचार पत्रों को इंटरनेट की तुलना में टीवी न्यज चैनलों से ज्यादा खतरा है।
अलबत्ता, वर्ल्ड एडीटर्स फोरम में बांग्लादेश के स्टार न्यजपेपर के सीईओ और प्रकाशक महफूज अनाम की मानें तो अमेरिका में समाचार पत्रों की सबसे खराब हालत के लिये पिछले 40 वर्षों में समाचार पत्रों के प्रकाशकों द्वारा किये गये कुछ न किये जाने योग्य कार्यों को जिम्मेदार हैं। जबकि साउथ एशिया फ्री मीडिया एसोसिएशन के अध्यक्ष और ‘साउथ एशिया’ के संपादक इम्तियाज आलम के अनुसार पाकिस्तान में समाचार पत्रों का प्रसार पहले से ही कम है, क्योंकि वहाँ साक्षरता कम है। इस पर भी टीवी चैनलों ने रही-सही कसर तोड़ दी है, और नई पीढ़ी अधिकतर इन्टरनेट की और देख रही है। पहले ही खबर को टीवी-इंटरनेट पर देख चुके लोग अब 24 घंटे पुरानी खबर के लिए किसी समाचार पत्र का इंतजार नहीं करना चाहते हैं।
इस प्रकार हम देखते हैं कि वैश्विक स्थितियों को देखते हुये वर्तमान में यूरोप-अमेरिका की स्थितियों के विपरीत समाचार पत्रों के प्रसार में वृद्धि दर्ज करने के बावजूद मीडिया जगत इस विषय में आश्वस्त नहीं है। जबकि सामान्यतया भारत में समाचार पत्रों के भविष्य पर किसी भी तरह की नकारात्मकता की बात करना आज की तिथि में बेमानी सा ही लगता है।
किंतु दूसरी ओर नये मीडिया-सोशल मीडिया के लगातार वढ़ते जा रहे आंकड़े प्रिंट या परंपरागत पत्रकारिता पर खतरे का इशारा कर रहे हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में फेसबुक और ट्विटर पर सक्रिय सदस्यों की संख्या 3.3 करोड़ से अधिक हो गयी है। देश में अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान जहां सोशल मीडिया ने एक ‘मैसेंजर’ के रूप में लोगों को आपस में जोड़कर संगठित करने और देश-दुनिया में जोश और जुनून पैदाने में अहम भूमिका निभाई, वहीं आरुषि-हेमराज हत्याकांड, गीतिका-गोपाल कांडा कांड और दामिनी बलात्कार कांड में जहां नये मीडिया ने ‘इंसाफ की जंग’ लड़ने के हथियार के रूप में अपनी भूमिका निभाई, वहीं पिछले लोक सभा चुनावों में इसने ‘गेम चेंजर’ की भूमिका निभाई। एक अध्ययन के अनुसार 2014 के लोकसभा चुनावों की घोषणा के बाद केवल फेसबुक पर 2.9 करोड़ लोगों ने 22.7 करोड़ बार चुनाव से संबंधित पारस्परिक क्रियायें (जैसे पोस्ट लाइक, कमेंट व शेयर इत्यादि) की। इसके अतिरिक्त 1.3 करोड़ लोगांे ने केवल नरेंद्र मोदी के बारे में फेसबुक पर बातचीत की। इससे 81.4 करोड़ योग्य मतदाताओं वाले देश भारत में सोशल मीडिया और नये मीडिया के प्रचार के व्यापक प्रभाव को समझा जा सकता है।
अतः इस प्रकार हम देखते हैं कि नये मीडिया और सोशल मीडिया को समाज के हर वर्ग ने अपनी स्वीकृति दी है, और नये मीडिया की यहीं सर्वस्वीकार्यता व उपयोगिता अन्य मीडिया माध्यमों, खासकर परंपरागत मीडिया के लिये एक गंभीर चुनौती के तौर पर उभरी है। खासकर भारत में जहां इंटरनेट का प्रयोग लगातार बढ़ता जा रहा है, और उसने इंटरनेट प्रयोक्ताओं के मामले में अभी हाल (दिसंबर 2015) में अमेरिका का पीछे कर नंबर दो पर पहुंच गया है। जबकि आधिकारिक तौर पर उपलब्ध वर्ष 2014-15 के आंकड़ों के अनुसार भारत अपनी जनसंख्या में इंटरनेट प्रयोक्ताओं के प्रतिशत के लिहाज से चीन के 19.24 प्रतिशत के बाद 17.5 प्रतिशत हिस्से के साथ दूसरे चीन के बाद ही दूसरे स्थान पर था। गौरतलब है कि 2014-15 में उसकी इंटरनेट प्रयोक्ताओं के मामले में वार्षिक वृद्धि दर 19.5 प्रतिशत थी, और विश्व जनसंख्या में भारत के इंटरनेट प्रयोक्ताओं का हिस्सा 8.33 प्रतिशत के साथ तीसरा स्थान था, और वह अमेरिका (9.58 प्रतिशत) से थोड़ा पीछे था।
इन आंकड़ों को देखते हुये ही बड़े मीडिया हाउसों की रणनीतिकार भी नये-सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के मद्देनजर अपनी व्यापारिक और पेशेवर रणनीतियों में बदलाव करने को मजबूर हुये हैं। लघु शोध-प्रबंध में भारत में समाचार पत्रों एवं इंटरनेट आधारित नये मीडिया के प्रसार के आंकड़ों एवं जनता की नये मीडिया के प्रति रुचि आदि का अध्ययन करते हुये प्रिंट पत्रकारिता के भविष्य को जानने का प्रयास किया गया है।

दुनिया में हर सातवें व्यक्ति के चहेते बन एक अरब क्लब में शामिल हुये ह्वाट्सऐप और जी-मेल, फेसबुक डेढ़ अरब से ऊपर

मोबाइल मैसेजिंग ऐप-ह्वाट्सऐप द्वारा गत दो फरवरी 2016 को अपने ब्लॉग पोस्ट के जरिये घोषणा की कि उसने पिछले पांच माह में 10 करोड़ नये उपभोक्ताओं को जोड़कर वैश्विक स्तर पर एक अरब उपयोगकर्ताओं का आंकड़ा छू लिया है। यानी धरती पर हर सात में से एक व्यक्ति ह्वाट्सऐप का प्रयोग कर रहा है। ह्वाट्सऐप के सह संस्थापक जान कोउम ने कहा कि इस प्लेटफॉर्म पर हर दिन 42 अरब संदेश, 1.6 अरब फोटो और 25 करोड़ वीडियो साझा किये जाते हैं। ज्ञात हो कि फरवरी 2014 में ह्वाट्सऐप का फेसबुक ने अपने इतिहास में सबसे अधिक 19 अरब डॉलर में अधिग्रहण कर लिया था। इसके अलावा दो फरवरी को ही गूगल की जी-मेल सुविधा देने वाली सह कंपनी अल्फाबेट के लिये गूगल के भारतीय मूल के सीईओ संुदर पिचाई ने घोषणा की कि उसने अक्टूबर-दिसंबर 2015 की तिमाही में एक अरब उपयोगकर्ताओं के क्लब में जगह बना ली है। उल्लेखनीय है कि गूगल सर्च, यूट्यूब, गूगल क्रोम, एंड्राइड ऑपरेटिंग सिस्टम, गूगल मैप्स, फेसबुक और एप्पल भी पहले से एक अरब के क्लब में शामिल है। एक फरवरी 2016 को घोषित परिणामों के अनुसार एल्फाबेट का राजस्व एप्पल से अधिक हो गया है। वर्ष 2015 की आखिरी तिमाही में फेसबुक के प्रयोक्ताओं की संख्या में 4.6 करोड़ की वृद्धि हुई है, और यह वर्ष 2015 के आखिर तक 1.59 अरब तक पहुंच गयी है। और इसका मुनाफा दोगुना होकर 1.56 अरब डॉलर हो गया है।

भारत में मोबाइल फोन उत्पादन 10 करोड़ के स्तर पर पहुंचा

दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद ने 30 जनवरी 2016 को मीडिया रिपोर्टों के अनुसार ग्लोबल बिजनेस समिट में कहा कि भारत में मोबाइल फोन उत्पादन 10 करोड़ के स्तर पर पहुंच गया है, और प्रमुख कंपनियां देश में विनिर्माण केंद्र स्थापित कर रही हैं। उन्होंने बताया कि दिसंबर 2015 के दौरान भारत में इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण में 1.14 लाख करोड़ रुपये का निवेश हुआ, जिसके अंतर्गत करीब 15 नए मोबाइल संयंत्रों की स्थापना हो रही है। इससे पहले 2014 में 6.8 करोड़ मोबाइल फोन का विनिर्माण किया गया था, जबकि अब 10 करोड़ का विनिर्माण हो रहा है। बताया कि शीर्ष भारतीय कंपनियों के अलावा पैनासोनिक, मित्सुबिशी, निडेक, सैमसंग, बॉश, जबील, फ्लेक्स्ट्रॉनिक्स, कांटीनेंटल समेत सभी प्रमुख कंपनियां भारत में कारोबार कर रही हैं। इस मौके पर भारतीय सेल्युलर संघ के संस्थापक और अध्यक्ष पंकज मोहिंद्रू ने कहा कि मूल्य के लिहाज से देश में चालू वित्त वर्ष के दौरान पिछले साल के मुकाबले मोबाइल फोन उत्पादन 95 प्रतिशत बढ़ा है। सरकार के इस ओर किये गये गंभीर प्रयासों के फलस्वरूप इन नए निवेशों से देश में 30,000 नए रोजगार पैदा हुए हैं।

2013 में भारत में 55.48 करोड़ लोग प्रयोग करते थे मोबाइल और 14.23 करोड़ लोग इंटरनेट

वर्ष 2013 की अनुसंधान फर्म ‘जक्स्ट’ के एक सर्वेक्षण ‘इंडिया मोबाइल लैंडस्केप 2013’ के आधार पर प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार देश में वास्तविक मोबाइल फोन धारकों की संख्या करीब 54 फीसदी यानी 29.8 करोड़ ग्रामीण, 25.6 करोड़ शहरी व कश्बाई मोबाइल धारकों के साथ 55.48 करोड़ तथा इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 14.32 करोड़ रही। जक्स्ट के सह संस्थापक मत्युंजय के अनुसार देश में इस दौरान चालू और वैध सिमों की संख्या 77.39 करोड़ थी, जिनमें से सिर्फ 64.34 करोड़ सिम का इस्तेमाल 55.48 करोड़ मोबाइल धारकों द्वारा किया जा रहा था। रिपोर्ट में देश में डेस्कटाप या लैपटाप, स्मार्ट टीवी या मोबाइल डेटा कनेक्शन के जरिये इंटरनेट एक्सेस करने वालों की संख्या 9.47 करोड़ और एयरटेल लाइव और रिलायंस आर वर्ल्ड जैसे आपरेटरों-पोर्टलों के जरिये इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों की संख्या जोड़ने के बाद यह आंकड़ा 14.32 करोड़ हो जाता है।

भारत में मोबाइल फोनों की संख्या में दुनिया की सर्वाधिक वृद्धि

वहीं मोबाइल फोन निर्माता कंपनी एरिक्शन की मोबिलिटी रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2015 की तीसरी तिमाही यानी जुलाई से सितंबर के दौरान दुनिया में मोबाइल फोनों की संख्या करीब 8.7 करोड़ बढ़ी, जिसमें से सर्वाधिक वृद्धि भारत में 1.3 करोड़ की और दूसरे नंबर पर चीन में 70 लाख, तीसरे नंबर पर अमेरिका में 60 लाख, म्यांमार में 50 लाख व नाइजीरिया में 40 लाख की वृद्धि हुई। रिपोर्ट के अनुसार साल-दर-सात मोबाइल फोन धारकों की संख्या में पांच फीसद की वृद्धि हो रही है। रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि इस अवधि में बिके मोबाइल फोनों में से 75 फीसद स्मार्ट फोन हैं, और इस प्रकार स्मार्ट फोनों का प्रतिशत पिछले वर्ष की तीसरी तिमाही के 40 प्रतिशत से बढ़कर इस वर्ष 45 प्रतिशत हो गया। रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में ब्रॉडबैंड के ग्राहकों की संख्या भी 16 करोड़ बढ़कर 3.4 अरब पहुंच गयी है, औ इसमें प्रतिवर्ष 25 फीसद की बढ़ोत्तरी हो रही है। वर्तमान में देश की आबादी का करीब आधा हिस्सा-590 मिलियन यानी 59 करोड़ लोगों के पास मोबाइल फोन हैं, और 97.6 करोड़ मोबाइल कनेक्शन हैं तथा हर सेकेंड 3.5 नये कनेक्शन लिये जा रहे हैं। वर्ष 2015 के आखिर तक इस संख्या के एक अरब तक पहुंचने का अनुमान है। (केम्प साइमन-2015, ग्लोबल डिजिटल स्टैटशॉट-अगस्त 2015)। इसके अलावा मैरी मीकर की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 65 प्रतिशत इंटरनेट उपयोग मोबाइल फोन के जरिये हो रहा है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 23.2 करोड़ इंटरनेट प्रयोक्ताओं के साथ भारत वर्ष-दर-वर्ष 37 प्रतिशत की गति से आगे बढ़ता हुआ विश्व का तीसरा सबसे बड़ा इंटरनेट प्रयोक्ताओं का बाजार है। इसके साथ ही भारत वर्ष 2014 को 6.3 करोड से अधिक़ इंटरनेट प्रयोक्ताओं को जोड़ने के के साथ प्रति वर्ष नये इंटरनेट प्रयोक्ताओं को जोड़ने के मामले में विश्व में प्रथम स्थान पर है। गौरतलब है कि मोबाइल फोन ही भारत में इंटरनेट प्रयोक्ताओं की संख्या में वृद्धि का प्रमुख कारण है। रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में कम्प्यूटर टेबलेट पर इंटरनेट का उपयोग करने वाले प्रयोक्ता दिन में औसतन चार घंटे 43 मिनट, मोबाइल पर औसतन तीन घंटे 17 मिनट, सोशल मीडिया का उपयोग औसतन दो घंटे 36 मिनट है, जबकि इंटरनेट प्रयोक्ताओं के द्वारा औसतन दो घंटे चार मिनट ही टीवी देखा जाता है। साथ ही यह भी कहा गया है कि सभी प्रकार के उपकरणों पर इंटरनेट का प्रयोग करने वाले 35 करोड़ लोगों में से सर्वाधिक 15.9 करोड़ यानी 45 प्रतिशत प्रयोक्ता मोबाइल के जरिये इंटरनेट का उपयोग करते हैं। इंटरनेट के मोबाइल पर अधिक उपयोग का कारण यह भी है कि मोबाइल पर इंटरनेट की अन्य माध्यमों के मुकाबले बेहतर गति प्राप्त होती है। यह भी बताया गया है कि 19 प्रतिशत मोबाइल कनेक्शन ब्रॉडबैंड के हैं, जबकि केवल 10 प्रतिशत फिक्स्ड हैं। यह स्थिति तब है जबकि भारत में औसतन सात में से एक व्यक्ति ऐसे क्षेत्र में रहते हैं, जहां मोबाइल के संकेत नहीं आते हैं।

भारत में एक साल में बढ़े 49 फीसद की दर से दस करोड़ नए इंटरनेट यूजर:

आईएमआरबी की ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारत ने पिछले एक वर्ष में इंटरनेट प्रयोक्ताओं की संख्या में 49 फीसदी की भारी-भरकम वृद्धि दर्ज कराते हुये 40 करोड़ प्रयोक्ताओं के आंकड़े पर पहुंचकर दुनिया में दूसरे स्थान पर पहुंचने का करिश्मा कर दिखाया है। रिपोर्ट के अनुसार भारत को इंटरनेट प्रयोक्ताओं की संख्या में एक करोड़ के आंकड़े से दस करोड़ तक पहुंचने में एक दशक लगा था और दस करोड़ से बीस करोड़ तक पहुंचने में तीन साल लगे। लेकिन तीस करोड़ से चालीस करोड़ तक पहुंचने में सिर्फ एक साल लगा है। इस रफ्तार को देखते हुए आने वाले वर्षो में भारत में इंटरनेट के प्रयोग की स्थिति क्या होगी, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। (दाधीच बालेन्दु शर्मा, राष्ट्रीय सहारा-उमंग, में 22 नवम्बर 2015 )
इंटरनेट प्रयोक्ताओं की संख्या में वृद्धि समय लगा
40 करोड़ से 50 करोड़ होने का लक्ष्य-2016 तक 1 वर्ष
30 करोड़ से 40 करोड़-22 दिसंबर 2015 को 1 वर्ष
10 करोड़ से 20 करोड़ 3 वर्ष
1 करोड़ से 10 करोड़ 10 वर्ष

इधर एसोचैम यानी ‘द एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्श एंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया’ की 22 दिसंबर 2015 को जारी ताजा रिपोर्ट मंे भी इस आंकड़े की पुष्टि की गयी है कि भारत में इंटरनेट प्रयोक्ताओं की संख्या लगभग 400 मिलियन यानी 40 करोड़ हो गयी है। केंद्रीय संचार मंत्री रविशंकर प्रसाद ने वर्ष 2016 में इस संख्या को 50 करोड़ करने का इरादा जाहिर किया हैं।
भारत एशिया का सबसे तेजी से बढ़ता गेम्स ऐप बाजार, 2015 में हर स्मार्टफोन धारक ने डाउन लोड किये औसतन 32 ऐप, हिंदी ऐप केवल 26 प्रतिशत के पास:
भारत में स्मार्टफोन के अधिकतम उपयोग करने और सोशल नेटवर्किंग साइटों के जरिये एक-दूसरे से जुड़े रहने की होड़ में वर्ष 2015 मंे ह्वाट्सऐप, फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूसी ब्राउजर जैसे ऐप सबसे अधिक डाउनलोड किये गये। नाइन ऐप्स द्वारा जारी एक सर्वेक्षण रिपोर्ट में यह खुलासा करते हुए कहा गया है कि वर्ष 2015 में स्मार्टफोन धारकों ने औसतन 32 ऐप डाउनलोड किये, जिनमें फेसबुक, ह्वाट्सऐप, इंस्टाग्राम और यूसी ब्राउजर शीर्ष पर रहे, जबकि 17 प्रतिशत हिस्सेदारी गेम्स के ऐप्स की है। रिपोर्ट के अनुसार भारत एशिया का सबसे तेजी से बढ़ता मोबाइल गेमिंग बाजार है, जिसका कारोबार 2018 तक 1 अरब डॉलर पार करने की संभावना है। वहीं केवल 26 प्रतिशत प्रयोक्ताओं के पास ही हिंदी भाषा के ऐप हैं। ज्यादातर उपभोक्ता अभी भी 2जी नेटवर्क के जरिये ही ऐप डाउनलोड करते हैं।
भारत में 95 प्रतिशत किशोर करते हैं इंटरनेट, और 81 प्रतिशत करते हैं सोशल मीडिया का उपयोग: एसोचैम
देश के अग्रणी वाणिज्यिक संगठन एसोचैम से संबद्ध सोशल डेवलपमेंट फाउंडेशन (एएसडीएफ) द्वारा सात मई 2014 को जारी एक रिपोर्ट के अनुसार देश के टायर-1 व टायर-2 श्रेणी के दिल्ली-एनसीआर (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र), मुंबई, अहमदाबाद, चेन्नई, कोलकाता, बेंगलुरू, हैदराबाद, पुणे, कोयंबटूर, चंडीगढ़ और देहरादून में शहरों में आठ से 13 वर्ष के 4200 बच्चों के माता-पिता पर किये गये एक सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 73 फीसदी किशोर फेसबुक सहित किसी न किसी सोशल नेटवर्किंग साइट पर सक्रिय हैं, तथा इनमें से कम से कम 72 फीसदी किशोर दिन में एक से अधिक बार इसका उपयोग करते हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 85 फीसद बच्चों के द्वारा फ्लिक डॉट कॉम, गूगल प्लस, पिन्टरेस्ट आदि सोशल साइटों का प्रयोग भी किया जाता है।
वहीं एसोचैम सोशल डेवलपमेंट फाउंडेशन (एएसडीएफ) द्वारा ही इन्हीं शहरों के 6 से 13 वर्ष के आयु वर्ग के बच्चों के 4,750 परिजनों पर करवाए गए एक ताजा सर्वेक्षण की 21-22 दिसंबर 2015 को जारी ताजा रिपोर्टों के अनुसार ‘इंडियन ट्वीन्स आर ऑन फेसबुक डिस्पाइट बीइंग अंडर एज’ किया गया था। इस रिपोर्ट के अनुसार देश के 12 से 17 वर्ष की आयुवर्ग के 95 फीसदी किशोर इंटरनेट का उपयोग कर रहे हैं। इनमें से 81 फीसद बच्चे सोशल मीडिया का प्रयोग कर रहे हैं। सात से 13 वर्ष के 76 प्रतिशत बच्चों के यूट्यूब पर नियमविरुद्ध तथा अपने परिजनों की जानकारी में अकाउंट हैं। इन बच्चों में से 51 फीसदी बच्चों के पास स्मार्टफोन है, जबकि देश के करीब 35 प्रतिशत यानी करीब एक-तिहाई बच्चे लैपटॉप तथा 32 फीसदी बच्चे टैबलेट का उपयोग करते हैं, जबकि 18 वर्ष से अधिक उम्र के बच्चे ही सोशल साइटों पर अपने अकाउंट खोल सकते हैं। पांच वर्ष से अधिक उम्र के बच्चे केवल अपने अभिभावकों की अनुमति से खाते खोल सकते हैं।
इस सर्वेक्षण में यूट्यूब को सर्वाधिक-75 प्रतिशत बच्चों में लोकप्रिय बताया गया है, और इसका इस्तेमाल करने के मामले में लखनऊ सबसे ऊपर, दिल्ली-एनसीआर (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) दूसरे स्थान पर रहा, जबकि इसके बाद मुंबई, अहमदाबाद, चेन्नई, कोलकाता, बेंगलुरू, हैदराबाद, पुणे, कोयंबटूर, चंडीगढ़ और देहरादून आते हैं। एसोचौम स्वास्थ्य समिति के अध्यक्ष बी. के. राव ने कहा, ‘सोशल नेटवर्क का इस्तेमाल करने के बारे में बच्चे सही निर्णय नहीं ले पाते, जिसके कारण बच्चों के साइबर उत्पीड़न का शिकार होने का खतरा होता है। (http://assocham.org/newsdetail.php?id=4489)

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