नैनी झील में मलबा सफाई: बिना काम ख़तम-पैसा हजम


नवीन जोशी, नैनीताल। काम खत्म होने के बाद पैसा हजम हो जाए तो कोई बात नहीं, किंतु नैनीताल जिला प्रशासन नैनी झील का मलबा हटाने के लिए वाहवाही लूटने की कोशिश कर रहा है। वह भी बिना काम खत्म पैसा हजम के फार्मूले पर चलकर। यहां यह बताना जरूरी है कि नैनी झील से मलबा हटाने के लिए प्रशासन ने तीन मदों से 80 लाख रपए तो खर्च कर दिए गए, किंतु झील में आया पूरा मलबा हटाना दूर, स्वयं इकट्ठा किया गया मलबा भी बारिश आने पर झील में वापस जाने के लिए छोड़ दिया गया और ऐसा बहुत सारा मलबा झील में वापस चला भी गया है। वहीं झील में दोबारा मलबा न आए, इस के लिए नालों की सफाई जैसे कार्य पिछले एक वर्ष से लंबित पड़े हैं। नालों की मरम्मत के भी पिछले वर्ष जुलाई माह में आई बारिश के बाद ध्वस्त हुए कार्य आज तक पूरे नहीं हो पाए हैं, जिस कारण हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं, और हालातों में पिछले वर्ष से कोई सुधार नहीं देखने को मिला है।

उल्लेखनीय है कि इस वर्ष 31 मई 2016 को सर्वाधिक रिकॉर्ड -7.1 फीट के स्तर तक नैनी झील का जल स्तर गिरा, जबकि इससे पूर्व मई 2012 में -2.5 फीट तक जल स्तर गिरा था। इधर झील में -12 फीट तक जल स्तर मापने का प्रबंध भी किया जा रहा है।

माल रोड पर इंडिया और एवरेस्ट होटल के बीच हल्की सी बारिश में भी नाला नंबर 6 से आने वाले मलबे का ढेर लग रहा है। यहां 12-12 मीटर की दो दीवारें अब तक नहीं बन पाई हैं, इस कारण यहां मलबा हटाने के लिए हर समय जेसीबी डोजर मशीन तैनात रखनी पड़ रही है। वहीं पिछले वर्ष क्षतिग्रस्त हुए नाला नंबर 20 भी मल्लीताल रिक्शा स्टैंड के पीछे भारी मात्रा में मलबा आने से चोक हो गया है। उल्लेखनीय है कि सर्वप्रथम नैनी झील में जलस्तर कम होने से उभरे मलबे के डेल्टा से मलबा हटाने के लिए स्थानीय विधायक सरिता आर्य की निधि से पांच लाख रपए से कार्य शुरू हुआ। इसके बाद डीएम ने झील विकास प्राधिकरण से 10 लाख रपए लेकर कार्य आगे बढ़ाया और इस बीच शासन को भी मलबा हटाने के लिए 64.55 लाख का प्रस्ताव भेजा। यह धनराशि भी प्राप्त हो गई और इसे भी मलबा हटाने के नाम पर खर्च कर दिया गया।इधर लोनिवि के अधिशासी अभियंता एसके गर्ग ने दावा किया कि कुल करीब 4500 ट्रकों से प्रति ट्रक पांच घन मीटर के हिसाब से करीब 19000 घन मीटर मलबा झील से हटा लिया गया है। बहरहाल, झील से मलबा हटाने का कार्य धनराशि खर्च हो जाने की बात कहकर कार्य रोक दिया गया है, लेकिन माल रोड के मध्य में पालिका पुस्तकालय के पास तथा झील की पूरी परिधि में डेल्डा पूर्व की तरह बरकरार हैं, और इन्हें हटाने के लिए छुआ तक नहीं गया है। केवल मल्लीताल बोट स्टैंड, तल्लीताल बोट स्टैंड, फांसी गधेरा और नैना देवी मंदिर के पास के सिरों से मलबा हटाया गया है। इनमें से भी नैना देवी मंदिर के पास एकत्र किया गया मलबा हटाया नहीं जा सका है।

पहली बार जनवरी में शून्य पर पहुंचा नैनी झील का जलस्तर,  क्या रूठ गयी हैं माता नंदा !

Lake level (1)

शुक्रवार 5 फ़रवरी को नैनी झील के तल्लीताल नियंत्रण   कक्ष पर शून्य नजर आ रहा झील का जलस्तर।

-सितम्बर के बाद से चार महीने रहे हैं पूरी तरह वर्षाविहीन, पिछले तीन महीनों में हुई है केवल 17 मिमी की बेहद मामूली बारिश, इससे पूर्व बीते वर्ष 2015 में हुई थी रिकार्ड 4684.83 मिमी बारिश
नवीन जोशी, नैनीताल। नैनी झील के जलस्तर के बारे में वर्ष 1977 से यानी पिछले 40 वर्षो के रिकार्ड उपलब्ध हैं, लेकिन उपलब्ध रिकार्डों के अनुसार जनवरी माह के आखिर और फरवरी माह के पहले सप्ताह में नैनी झील का जलस्तर 1985 में 5.3 फीट एवं अधिकतम 1989 में 10.7 फीट रहा है, लेकिन इस वर्ष यह अभूतपूर्व रूप से शून्य पर उतर आया है जबकि इससे पूर्व इस तरह की स्थिति सामान्यत: मई माह में आती रही है। वहीँ बुजुर्गों की मानें तो पिछले 82 वर्षो में ऐसी स्थिति पहली बार आयी है। इसका कारण नगर में सितम्बर के बाद से चार महीने पूरी तरह वर्षाविहीन रहे हैं। इस दौरान केवल तीन दिन कुल मिलाकर 17 मिमी के बराबर बेहद मामूली बारिश ही हुई है। यह स्थिति इसलिए भी अधिक गंभीर है, क्योंकि भले इस वर्ष अब तक केवल 2.54 मिमी ही बारिश हुई हो, किंतु इससे पूर्व बीते वर्ष 2015 में पहली बार रिकार्ड 4684.83 मिमी बारिश हुई थी और पूरे वर्ष झील का जलस्तर शून्य पर नहीं पहुंचा था, जबकि अनेक वर्षो में बारिश न होने के बावजूद झील का जलस्तर कहीं ऊपर रहा है।

शुक्रवार 5 फ़रवरी को मल्लीताल बोट स्टैंड पर नैनी झील का जलस्तर गिरने से उभरा मलबे का पहाड़ सरीखा डेल्टा।

शुक्रवार 5 फ़रवरी को मल्लीताल बोट स्टैंड पर नैनी झील का जलस्तर गिरने से उभरा मलबे का पहाड़ सरीखा डेल्टा।

नैनी झील किनारे विसर्जित की गयी साईं बाबा की एक मूर्ति

नैनी झील किनारे विसर्जित की गयी साईं बाबा की एक मूर्ति

नैनी झील का जलस्तर नगर ही नहीं प्रदेशभर में शीतकालीन वर्षा न होने और पानी की बढ़ती खपत के प्रत्यक्ष कारण से संबंधित है, किंतु नगर में अलग-अलग लोग झील के घटे जलस्तर के अलग-अलग कारण बता रहे हैं। नगर के वरिष्ठ नागरिक एवं पूर्व म्युनिसिपल कमिश्नर रहे गंगा प्रसाद साह ने इसे इस वर्ष नंदा देवी महोत्सव में हुए व्यवधान से जोड़ते हुए कहा कि कुछ लोगों के विघ्न का खमियाजा पूरे नगर व प्रदेश की जनता को भुगतना पड़ रहा है, क्योंकि नयना देवी पूरे राज्य की कुलदेवी, आराध्य देवी एवं युद्ध की विजय देवी हैं। बकौल श्री साह ‘अपनी 82 वर्ष की आयु में उन्होंने ऐसे हालात कभी नहीं देखे।’ वहीं अन्य बुजुर्गों ने दावा किया कि नैनी झील में इसकी स्थापना से पूर्व मौजूदा डांठ जैसी व्यवस्था नहीं थी। उन्होंने अपने बुजुर्गों से सुना था कि नैनी झील में भीमताल झील के बीच में डूबी हुई अवस्था में हालिया वर्षो में ही जलस्तर गिरने पर प्रकाश में आये कैंचुला देवी के मंदिर की तरह यहां भी दो कोटरों के बीच वाले स्थान पर मंदिर स्थित है, जो इस वर्ष नजर आ सकता है।

वहीँ

नैनीताल में होने वाली वर्षा और नैनी झील में जल स्तर के दशकों पुराने आंकड़े

नैनीताल में होने वाली वर्षा और नैनी झील में जल स्तर के दशकों पुराने आंकड़े

झील नियंत्रण कक्ष से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार पिछले पांच वर्षो की बात करें तो वर्ष 2011 में दो मई को, 2012 में 30 अप्रैल को, 2013 में 26 मई को, 2014 में 17 मई को झील का जलस्तर शून्य पर पहुंचा था, जबकि 2015 में वर्षभर ऐसी स्थिति नहीं आयी। वहीं पिछले वर्षो में पांच फरवरी को झील के जलस्तर और बारिश की बात करें तो वर्ष 1990 में जनवरी माह में बारिश नहीं हुई थी, बावजूद झील का जलस्तर 9.4 फीट था। ऐसी ही स्थितियों में 1997 में जलस्तर 8.3 फीट था। वहीं बीते वर्ष सितंबर माह के बाद हुई बारिश की बात करें तो 13 अक्टूबर को 2.54 मिमी, 30 अक्टूबर को 12.7 मिमी और इधर 29 जनवरी की रात्रि 2.54 मिमी ही बारिश हुई। जबकि पिछले वर्ष जुलाई माह में 1706.88 और खासकर छह जुलाई को 388.42 मिमी बारिश ने नगर को हिलाकर रख दिया था।

अंग्रेजों के जमाने की जलस्तर मापने की व्यवस्था खराब

नैनीताल। नैनीताल झील नियंत्रण कक्ष में इन दिनों अंग्रेजों के जमाने में लगी जलस्तर मापने की व्यवस्था काम नहीं कर रही है। झील के जलग्रहण वाले क्षेत्र गंदगी और मलबे से पटे हैं, इसलिए जलस्तर मापना संभव नहीं है। ऐसे में नियंत्रण कक्ष के कर्मी मौजूदा गेज को नियंत्रण कक्ष से कुछ दूर झील किनारे पानी के पाइप को वाटर गेज के रूप में काम चलाकर झील का जल स्तर मापने की कोशिश कर रहे हैं। गौरतलब है कि अंग्रेजी दौर में लगे गेज में जब पानी नहीं पहुंचता तो झील का जलस्तर शून्य बताया जाता है। इधर पिछले कई वर्षो से यहां शून्य से नीचे कहे जाने वाले जलस्तर को मापने के लिए उचित प्रबंध किये जाने की मांग पर्यावरण प्रेमियों की ओर से उठती रहती है। अंग्रेजी दौर में तल्लीताल में झील के शिरे पर गेट लगाकर झील के पानी को नियंत्रित करने का प्रबंध हुआ, जिसे स्थानीय तौर पर डांठ कहा जाता है। गेट कब खोले जाऐंगे, इसका बकायदा कलेंडर बना, जिसका आज भी पालन किया जाता है। इसके अनुसार झील के गेट जून में 7.5, जुलाई में 8.5, सितंबर में 11 तथा 15 अक्टूबर तक 12 फीट जल स्तर होने पर ही गेट खोले जाते हैं।

नैनी झील के 2012 में वर्षा और जल स्तर के रिकॉर्ड

नैनी झील का जल स्तर 2012 में तीन मई से एक जुलाई के बीच शून्य से नीचे रहा था, और 29  जुलाई को ही 8.7 फीट पर पहुंच गया था, जिस कारण गेट खोलने पड़े थे। इसके बाद 16 सितंबर तक कमोबेश लगातार गेट अधिकतम 15 इंच तक भी (15 अगस्त को) खोले गये। जबकि 2012 में गर्मियों में 30 अप्रेल से 17 जुलाई तक जल स्तर शून्य से नीचे (अधिकतम माइनस 2.6 फीट तक) रहा था। उल्लेखनीय है कि नैनीताल नगर की औसत वर्षा 2480 मिमी और नैनीताल जनपद की औसत वार्षिक वर्षा 1,152 मिमी है। इससे पूर्व 2011 में नगर में सर्वाधिक रिकार्ड 4,183 मिमी बारिश हुई थी।

वहीं, 2010 में ठीक 18 सितंबर और 2011 में भी सितंबर माह में प्रदेश व निकटवर्ती क्षेत्रों में जल प्रलय जैसे हालात आये। 2010 में नगर की सामान्य 248 सेमी से करीब दोगुनी 413 सेमी बारिश रिकार्ड की गई, बावजूद नगर पूरी तरह सुरक्षित रहा। चित्रों में देखें 2012 में जून माह में बने थे ऐसे हालात 

वहीं, ईईआरसी यानी इंदिरा गांधी इंस्टिटय़ूट फार डेवलपमेंटल रिसर्च मुंबई की 2002 की रिपोर्ट के अनुसार नगर की सूखाताल झील नैनी झील को प्रति वर्ष 19.86 लाख यानी करीब 42.8 फीसद पानी उपलब्ध कराती है।

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पूरे उत्तराखण्ड के पहाड़ों में सूखे से खेती तबाह, उग ही नहीं रही रबी की फसल

नैनीताल। इस बार मौसम के ऐसे हालत केवल नैनीताल में ही नहीं पूरे उत्तराखण्ड के सभी पहाड़ी क्षेत्रों में हैं। नैनीताल जिले के ओखलकांडा, धारी, रामगढ व बेतालघाट जैसे सभी पहाड़ी ब्लॉक सूखे से प्रभावित हैं, यहाँ सूखे से खेती तबाह हो गयी है। रबी की प्रमुख फसल गेहूं के बीज अंकुरित ही नहीं हो रहे हैं। बारिश ने पहाड़ों से ऐसा मुंह मोड़ा है कि सूखे के हालात बन गए हैं, और सूखे ने किसानों की कमर तोड़ कर रख दी है। काश्तकारों की सारी खेती ही चौपट हो गई है। बारिश नहीं होने से खेतों में कुछ भी नहीं उग सका है, और जहां बीज अंकुरित होकर फूटा भी है तो उस पर भी सूखे की मार पड़ गई है। किसानों को सिंचाई के लिए तो पानी दूर अब पीने के पानी का भी संकट पैदा हो गया है। ऐसे में किसान सरकार की ओर मदद के लिए मुंह ताकने को मजबूर हो रहे हैं। आशंका इस बात को लेकर भी है की अभी न हुई फसल बागों में फलदार पेड़ों में फूल लगने के समय ओलों से फूलों को भी नष्ट न कर दें, जबकि बारिश-बर्फवारी न होने से सेब जैसे फलों की फसल के बर्बाद होने, फल छोटे ही रह जाने की स्थितियां भी बन गयी हैं। साथ ही जानवरों के लिए भी चारे का संकट उत्पन्न होने का खतरा नजर आ रहा है। पहाड़ की चौपट खेती के बाद अब जिले का महकमा सूखे का आंकलन करने में जुटने की बात कर रहा है। डीएम नैनीताल दीपक रावत का कहना है कि जिले के मुख्य कृषि अधिकारी को आंकलन करने के निर्देश दे दिए हैं।

सूखाग्रस्त घोषित हो सकता है नैनीताल जिला, 30 फीसद तक फसल बरबाद

नैनीताल। पिछले चार माह से नहीं हुई बारिश की वजह से मुख्यालय में जहां नैनी झील इतिहास में पहली बार जनवरी माह में शून्य के जल स्तर पर आ गयी है, वहीं जिले के पर्वतीय क्षेत्रों में कमोबेश दो तिहाई खेती बरबाद हो गयी है। इसमें से 25 से 30 फीसद के बरबाद होने पर जिले के कृषि विभाग ने भी मुहर लग गई है। आगे जिले की इस रिपोर्ट के पहले राज्य सरकार और फिर केंद्र सरकार तक पहुंचने और केंद्र सरकार की टीम द्वारा निरीक्षण करने के बाद जिले को सूखाग्रस्त घोषित किया जा सकता है।
जनपद के मुख्य कृषि अधिकारी धनपत सिंह ने बताया कि जिले के असिचिंत क्षेत्रों में अधिक व सिंचित क्षेत्रों में कम नुकसान दिख रहा है, इसलिये पहले असिंचित यानी पर्वतीय क्षेत्रों का सर्वे किया गया, जिसमें रबी के तहत बोई गई गेहूं, जौं व मसूर आदि की 25 से 30 फीसद खेती को नुकसान साफ तौर पर दिखा है। आगे सिंचित क्षेत्रों मंे भी ऐसा ही सर्वे कराया जायेगा। बताया कि पूर्व में 50 फीसद से अधिक क्षति पर ही किसानों को सूखा आपदा ग्रस्त माना जाता था, किंतु इधर केंद्र सरकार ने मानकों में शिथिलीकरण कर इसे 30 फीसद कर दिया है। साथ ही आगे भी बारिश होने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं, जिससे सूखे के प्रभावों के और बढ़ने की संभावना ही नजर आ रही है, लिहाजा उनकी रिपोर्ट के बाद केंद्र सरकार की टीम का सर्वे होने और इसके बाद जिले के सूखाग्रस्त होने की संभावना है।

फल के बागान भी बरबाद

नैनीताल। उल्लेखनीय है कि सूखे की मार फसलों पर ही नहीं बागानों पर भी पड़ी है। फलों का आकार बर्फवारी से पड़ने वाली ठंड और इसके बाद पड़ने वाली गर्मी के अंतर पर निर्भर बताया जाता है, इस बार बर्फ न पड़ने की वजह से फलोत्पादन पर प्रभाव पड़ना निश्चित है, वहीं काश्तकार आगे फूलों पर फूल लगने के दौरान ऐसे मौसम में ओलावृष्टि की संभावना से भी आशंकित हैं।

प्रदेश सूखाग्रस्त, राज्य सरकार केंद्र से मांगे मुआवजा : कुुंजवाल

नैनीताल। उत्तराखण्ड के विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल ने कहा कि प्रदेश पूरी तरह सूखाग्रस्त हो गया है। शीतकालीन वर्षा न होने से राज्य में रबी के साथ ही फल-फूल, गेहूं, सेब, आलू, मटर आदि की फसलें इस कदर पूरी तरह से चौपट हो गयी हैं कि यदि अब बारिश हो भी जाती है तो फसलों को सूखे से हुये नुकसान से उबारा नहीं जा सकता। इसलिये राज्य सरकार को चाहिये कि वह अभी से राज्य में सूखे से हुये नुकसान का सही तरह से सर्वेक्षण कराकर केंद्र सरकार को रिपोर्ट भेजे ओर केंद्र सरकार से राज्य के किसानों के लिये मुआवजे की मांग करे।

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