ऐतिहासिक भवाली सेनिटोरियम को लगाया 22 लाख का ‘चूना’


  • भवाली सेनिटोरियम में लघु निर्माण मद में अलग-अलग भागों में 11 लाख एवं अनुरक्षण मद में रंगाई-पुताई पर 11 लाख के घोटाले का अंदेशा
  • महानिदेशक के आदेशों पर स्वास्थ्य निदेशक कुमाऊं की जांच में सेनिटोरियम की तत्कालीन प्रमुख अधीक्षक सहित तीन अधिकारियों को उत्तरदायी बताते हुये की गई है विशेष जांच की संस्तुति
  • गठिया के पूर्व ग्राम ट्रेवोर मेसी व नैनीताल के पूर्व सभासद संजय साह द्वारा सूचना के अधिकार के तहत ली गयी जानकारी में हुआ खुलासा 

नवीन जोशी, नैनीताल। जनपद में एनआरएचएम के बाद भवाली स्थित ऐतिहासिक टीबी सेनीटोरियम में पिछले वित्तीय वर्ष 2014-15 में 22 लाख रुपये के कार्यों में घोटाले का नया मामला प्रकाश में आया है। प्रदेश की स्वास्थ्य महानिदेशक के आदेशों पर स्वास्थ्य निदेशक कुमाऊं डा. गीता शर्मा द्वारा की गई जांच सूचना के अधिकार के तहत उजागर हुई है। जांच रिपोर्ट में साफ तौर पर इस धनराशि से हुये रंगाई-पुताई व अन्य लघु निर्माण के कार्यों को गैर तर्कसंगत तरीके से गैंग मजदूरों से बिना आगणन गठित किये करने व बिलों का सत्यापन किसी अभियंता से न कराये जाने का हवाला देते हुये कहा गया है कि तत्कालीन प्रमुख अधीक्षक डा. तारा आर्या, सहायक अधीक्षक केएल गौतम और प्रधान सहायक डीडी पांडे उत्तरदायी प्रतीत होते हैं, लिहाजा मामले में विशेष सम्प्रेक्षा की संस्तुति की गई है। इसके अलावा आगे ऐसे कार्यों में नियमानुसार प्रक्रिया अपनाये जाने की भी संस्तुति की गई है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार वित्तीय वर्ष 2014-15 में श्रय रोगाश्रम भवाली में लघु निर्माण मद में अलग-अलग भागों में 11 लाख एवं अनुरक्षण मद में 11 लाख का बजट आवंटित हुआ था। इसमें से अनुरक्षण पद में आवासीय एवं अनावासीय भवनों की दीपावली पर रंगाई-पुताई का कार्य तत्कालीन प्रमुख अधीक्षक के स्तर पर गठित कमेटी द्वारा कोटेशन के आधार पर प्राप्त दरों से न्यूनतम दरों पर सामग्री क्रय करने के उपरांत सभी कार्मिकों को सामग्री वितरित कर दी गई। इन कार्यों का पूर्व आगणन तथा कार्य के उपरांत बिलों का सत्यापन विभागीय अभियंता से नहीं कराया गया। इसे जांच अधिकारी निदेशक डा. शर्मा ने गलत ठहराया है।

कमला नेहरु चेस्ट इंस्टिट्यूट और आयुष ग्राम बनने के टूटे ख्वाब भी देख चुका है ऐतिहासिक भवाली सेनीटोरियम

नैनीताल। वर्ष 1912 में अंग्रेजों ने 220 एकड़ भूमि में सम्राट एडवर्ड सप्तम की याद में भवाली में एशिया के सबसे बड़े 320 बेड के टीबी संस्थान की स्थापना की थी। 16 जून 1929 को यहां महात्मा गांधी भी आये थे, और 11 अक्टूबर 1934 को नैनी जेल में रहने के दौरान देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू को यहां डा. प्रेम लाल से टीबी के उपचार कराने के लिये भर्ती कराया गया था। इस कारण 1935 में नेहरू को पत्नी के करीब रहने के लिये नैनी से अल्मोड़ा जेल स्थानांतरित किया गया था। यहां कमला नेहरू के नाम से एक वार्ड अब भी है। इधर टीबी का इलाज घर बैठे डॉट विधि से किये जाने की व्यवस्था के बाद से इसके बुरे दिन शुरू हुये। वर्ष 2002 में तत्कालीन सीएम एनडी तिवारी की सरकार ने यहां बेडों की संख्या 150 तक सीमित करते हुये जापान के सहयोग व 50 करोड़ रुपये की लागत से कमला नेहरू चेस्ट इंस्टिट्यूट की स्थापना के लिये शासनादेश भी जारी कर दिया था, और इस हेतु 2.67 करोड़ रुपये से अत्याधुनिक सीटी स्कैन, 44 लाख रुपये से अल्ट्रासाउंड व 11.89 लाख से ऑटो ऐनालाइजर सहित कई अन्य मशीनें भी ले आई गई थीं। तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री डा. तिलक राज बेहड़ ने चेस्ट इंस्टिट्यूट का उद्घाटन भी कर दिया था। लेकिन विशेषज्ञ चिकित्सकों की तैनाती न होने से करोड़ों की मशीनें कबाड़ में तब्दील हो गयीं। आगे 2010 में तत्कालीन सीएम डा. रमेश पोखरियाल निशंक ने यहां करीब 10 एकड़ भूमि पर देश की प्रमुख सौंदर्य प्रसाधन कंपनी-इमामी की मदद से करीब 50 करोड़ रुपये से आयुष ग्राम बनाने का प्रस्ताव तैयार करवाया, लेकिन डा. निशंक का यह ड्रीम प्रोजेक्ट भी परवान नहीं चढ़ पाया।

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