“जो जावत के बाद फिर-फिर आवत है, वो हरीश रावत है”


बचपन में पढ़ी संस्कृत की कहानी पुर्नमूषको भव: 24 घंटे से भी कम समय के लिए दुबारा सीएम बने हरीश रावत पर कमोबश सही बैठी, इस तरह संभवतया उन्होंने एक दिन के लिए सीएम बने जगदंबिका पाल का रिकॉर्ड भी शायद तोड़ दिया। लगने लगा था कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद दुबारा मुख्यमंत्री बनने की जल्दबाजी ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा। लगा, बिना हाईकोर्ट के आदेश की लिखित कॉपी के मुख्यमंत्री बनने और रात्रि में ही आनन-फानन में कैबिनेट की बैठक कर उन्होंने 11 महत्वपूर्ण फैसले लेकर अपने पक्ष को और कमजोर कर दिया है। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। हरीश रावत बदले राजनीतिक घटनाक्रमों के साथ फिर से मुख्यमंत्री बन गए, और सदन में अपना बहुमत भी साबित कर लिया। इस पर कहा जाने लगा, “जो आवत है-वो जावत है। पर जो जावत के बाद फिर-फिर आवत है, वो हरीश रावत है”। रावत ने इस बार ही नहीं, पूर्व में तीन बार अल्मोड़ा से लोकसभा का चुनाव स्वयं और फिर अपनी पत्नी को भी न जीता पाने के बाद, राजनीतिक रूप से ‘चुक’ जाने की चर्चाओं के बाद पुनः लौटते हुए हरिद्वार से न केवल जीत दर्ज की, वरन केन्द्रीय मंत्री और फिर उत्तराखंड के मंत्री भी बन गए।

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21 अप्रैल 2016 की खबर: फिर ‘न्यायिक हिरासत’ में ही जा सकती है उत्तराखंड की ‘सियासत’

-केंद्र के अधिवक्ता ने कहा सर्वोच्च न्यायालय में देंगे हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड की ‘सियासत’ कमोबेश तीन सप्ताह से फिर ‘न्यायिक हिरासत’ में है, और उत्तराखंड उच्च न्यायालय से बृहस्पतिवार को फैसला आने के बाद भी आगे कुछ दिन यह उसी स्थिति में रह सकती है। केंद्र सरकार के अधिवक्ता एडीशनल सॉलीसिटर जनरल राकेश थपलियाल ने इस बाबत शुरुआती हिचक के बाद ‘राष्ट्रीय सहारा’ से कहा कि इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जाएगी। अलबत्ता, उन्होंने इस बात पर भी नाराजगी व्यक्त की कि उच्च न्यायालय ने उनके सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने के अधिकार के अनुपालन तक अपने फैसले के प्रभावी होने तक रोक लगाने की मांग भी स्वीकार नहीं की। साथ ही साफ किया कि उच्च न्यायालय के आदेश की प्रति प्राप्त होने से पूर्व वह (केंद्र) आदेश के प्रभावी होने पर रोक लगाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर सकता है, जबकि याचिकाकर्ता (हरीश रावत) आदेश की प्रति प्राप्त करने से पूर्व आदेश के अनुरूप कार्यभार ग्रहण नहीं कर सकते हैं। उल्लेखनीय है कि शुरू में केंद्र के अधिवक्ता श्री थपलियाल उच्च न्यायालय के आदेश का अध्ययन करने और इस पर केंद्र सरकार के अटॉर्नी जनरल के साथ संवाद करने के बाद ही सर्वोच्च न्यायालय जाने पर कोई निर्णय लेने की बात कर रहे थे। वहीं केंद्र सरकार की ओर से न्यायालय में पैरवी करने आए सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता केसी कौशिक ने कहा कि उच्च न्यायालय के केंद्र द्वारा प्रस्तुत की गई सामग्री को राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए पर्याप्त नहीं माना है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।

तीन-चार दिन लग सकते हैं न्यायालय का लिखित आदेश आने में

नैनीताल। बृहस्पतिवार को उच्च न्यायालय का फैसला हालांकि याचिकाकर्ता हरीश रावत के पक्ष में आ गया है, लेकिन लिखित में फैसला आने में तीन-चार दिन लग सकते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद वशिष्ठ ने बताया कि उच्च न्यायालय की संयुक्त खंडपीठ में शामिल न्यायाधीश न्यायमूर्ति बीके बिष्ट ने न्यायालय में लिखित फैसले के तीन-चार दिन में आने की बात कही। यह भी उल्लेखनीय तथ्य है कि उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति केएम जोसफ अगले दो दिन उच्च न्यायालय में उपस्थित नहीं रहेंगे। वह शुक्र व शनिवार को दिल्ली में आयोजित हो रही देश भर के उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की संगोष्ठी में भाग लेने जा रहे हैं। इसी कारण बृहस्पतिवार को खंडपीठ ने भोजनावकाश भी नहीं लिया और भोजनावकाश में भी फैसला लिखाते रहे। श्री वशिष्ठ ने कहा कि चूंकि मुख्य न्यायाधीश उच्च न्यायालय में उपस्थित नहीं होंगे इस आधार पर केंद्र सरकार पर आज के आदेश पर रोक लगाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर सकती है। हालांकि उन्होंने इस संभावना से भी इंकार नहीं किया कि इस बीच यानी शुक्र-शनिवार के दौरान भी ईमेल के माध्यम से आदेश की लिखित प्रति जारी की जा सकती है।

रावत के भ्रष्टाचार और कांग्रेस द्वारा बलि चढ़ाई सरकारों पर भी हाईकोर्ट ने की कड़ी टिप्पणी

नैनीताल। केंद्र सरकार के अधिवक्ता राकेश थपलियाल ने कहा कि उच्च न्यायालय ने सभी तथ्यों को देखा है, तथा खासकर याचिकाकर्ता हरीश रावत के राष्ट्रीय चैनलों पर विधायकों की खरीद फरोख्त के लिये खुले ऑफर देने को लेकर भी कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि भ्रष्टाचार को कतई नजरअंदाज नहीं किया जाता। खासकर जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों से सुचिता की उम्मीद तो की ही जानी चाहिए। इसके साथ ही न्यायालय ने यह टिप्पणी कर कांग्रेस पार्टी को भी मुश्किल में डाला कि आजादी के बाद शुरुआती 40 वर्षों में उन्होंने भी 100 से अधिक चुनी हुई सरकारों को राष्ट्रपति शासन लगाकर बलि चढ़ाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी। लेकिन तब इस तरह पीड़ित सरकारें भी न्यायालय की शरण में नहीं आती थीं।

यहां नाक कटी है, शौक हो तो सुप्रीम कोर्ट में भी कटवाएं : नवप्रभात

नैनीताल। केंद्र सरकार के इस मामले में उच्च न्यायालय के आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने के सवाल पर कांग्रेस की ओर से न्यायालय में उपस्थित रहे एकमात्र विधायक नवप्रभात ने तल्ख टिप्पणी की। कहा केंद्र सरकार की यहां नाक कटी है। सर्वोच्च न्यायालय में भी नाक कटवाने का शौक हो तो जरूर सर्वोच्च न्यायालय जाएं। कहा उच्च न्यायालय का फैसला केवल कांग्रेस पार्टी, हरीश रावत या राज्य की जनता की ही जीत नहीं है, वरन इससे देश भर में यह संदेश जाएगा कि केंद्र देश की अन्य गैर कांग्रेसी सरकारों को शडयंत्रपूर्वक बलि नहीं चढ़ा सकता। केंद्र का कांग्रेस मुक्त भारत का सपना इस तरह सफल नहीं हो पाएगा। कहा, कांग्रेस 28 मार्च को भी सदन में बहुमत साबित करने के लिए तैयार थी और 29 अप्रैल के लिए भी तैयार है। कहा आज का दिन उत्तराखंड, लोकतंत्र व न्यायपालिका की विजय का दिन भी है।

::20 अप्रैल::’राष्ट्रपति राजा नहीं’, मतलब केंद्र-राजभवन में ‘सब-कुछ’ ठीक नहीं !

राष्ट्रीय सहारा 20 अप्रैल 2016

न्यायपालिका से राष्ट्रपति के आदेश के सही-गलत होने पर सवाल !

-राज्यपाल के पत्रों में नौ बागी विधायकों का जिक्र न होना राष्ट्रपति के आदेश पर पड़ सकता है भारी -उच्च न्यायालय में बताया गया कि राज्यपाल ने राष्ट्रपति को आठ पत्र भेजे, जिनमें भाजपा के 27 विधायकों द्वारा ही विनियोग विधेयक पर मत विभाजन की मांग की गई -न्यायालय ने केंद्र सरकार के अधिवक्ताओं से पूछा नवीन जोशी, नैनीताल। पिछले एक पखवाड़े से न्यायपालिका की चौखट पर किसी फैसले की आस में अटकी प्रदेश की राजनीति का ऊंट न्यायपालिका के फैसले से किस करवट बैठेगा, यह तो भविष्य की बात है। लेकिन इतना साफ लग रहा है कि उत्तराखंड के राजभवन और केंद्र सरकार में ‘सब कुछ” ठीक नहीं चल रहा था। यह सर्वविदित है कि 18 मार्च को प्रदेश की राजनीति में आये ताजा भूचाल के दिन कांग्रेस के नौ बागी विधायक भाजपा के 27 विधायकों के साथ एक ही बस में राजभवन गए, और बाद में भी साथ रहे। किंतु इस दौरान राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति को जो आठ पत्र अपनी राज्य के हालातों पर रिपोर्ट के रूप में भेजे, उनमें से किसी में भी नौ बागी विधायकों का नाम नहीं था। इस प्रश्न के आलोक में ही उच्च न्यायालय ने राष्ट्रपति के आदेश के सही-गलत होने पर भी टिप्पणियों के स्तर पर सवाल खड़े कर दिये हैं। आगे राज्यपाल की रिपोर्टों में नौ बागी विधायकों का जिक्र न होना प्रदेश में राष्ट्रपति के आदेशों पर लगे राष्ट्रपति शासनों पर भारी पड़ जाए जो आश्चर्य न होगा।
बुधवार को अवकाश के दिन भी हुई इस बेहद महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के दौरान राज्यपाल की रिपोर्टों में नौ बागी विधायकों का जिक्र न होने का मामला न्यायालय में छाया रहा। उच्च न्यायालय की संयुक्त खंडपीठ ने भी इस मामले पर केंद्र सरकार के अधिवक्ताओं ने इसका कारण पूछा। इस पर केंद्र के अधिवक्ताओं ने यह कहकर मामला संभाला कि यह प्रश्न राष्ट्रपति ने नहीं उठाया। यदि राष्ट्रपति चाहते तो इस तथ्य के अभाव में केंद्र सरकार की प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश को पुर्नविचार के लिये लौटा सकते थे। राष्ट्रपति ने ऐसा नहीं किया। इसका अर्थ साफ है कि उत्तराखंड में संवैधानिक संकट था। इसी कड़ी में न्यायालय की संयुक्त खंडपीठ ने यह टिप्पणी भी कर दी कि न्यायालय राष्ट्रपति की विद्वता व विवेक पर सवाल नहीं रही है, लेकिन राष्ट्रपति का आदेश गलत भी हो सकता है। राष्ट्रपति का आदेश राजा का आदेश नहीं है। राष्ट्रपति के आदेश की भी समीक्षा की जा सकती है।

तीन बार हो चुकी है राष्ट्रपति के आदेशों की न्यायालय में समीक्षा : पंत

नैनीताल। उत्तराखंड बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष एमसी पंत ने उच्च न्यायालय में चल रही सुनवाई के बीच प्रदेश के आम नागरिकों के ओर से उनका पक्ष भी सुने जाने की एक याचिका दायर की थी। बुधवार को उच्च न्यायालय ने उन्हें भी अपना पक्ष रखने का मौका दिया। जिसकी जानकारी देते हुए पंत ने कहा कि उन्होंने तीन सवाल उठाते हुए 18 मार्च को सदन में मौजूद सभी विधायकों से उस दिन विनियोग विधेयक पारित होने अथवा न होने को लेकर शपथ पत्र लेने की मांग की। साथ ही 28 नवम्बर 1948 को संविधान निर्माता डा. भीमराव अंबेडकर द्वारा संविधान सभा में दिये गए वक्तव्य के आधार पर राष्ट्रपति, राज्यपाल व सदन के अध्यक्ष के आदेशों की समीक्षा किये जाने का उल्लेख करते हुए राष्ट्रपति के आदेश की भी न्यायालय में समीक्षा किये जाने की बात कही और बताया कि वर्ष 2002, 2013 और 2014 में ऐसे ही मामलों में राष्ट्रपति के आदेशों की समीक्षा की जा चुकी है। यदि यह तीनों यानी राष्ट्रपति, राज्यपाल व सदन के अध्यक्ष संविधान के अनुरूप कार्य नहीं कर रहे हैं तो उनके आदेशों की समीक्षा की जा सकती है।

न्यायालय की राष्ट्रपति संबंधी टिप्पणी केवल न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा : वशिष्ठ

नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं विशेषज्ञ ने न्यायालय के राष्ट्रपति के राजा नहीं होने संबंधी टिप्पणी पर कहा कि इसे अधिक तूल नहीं दिया जाना चाहिए। दरअसल यह न्यायालयी प्रक्रिया के दौरान अनौपचारिक सवाल-जवाब के दौरान कहा गया। यह प्रश्न इस संदर्भ में आया कि राष्ट्रपति के आदेश पर न्यायालय का कितना हस्तक्षेप हो सकता है। राष्ट्रपति को केंद्रीय मंत्रिमंडल की संस्तुति गोपनीय दस्तावेज है, उसे अधिवक्ता नहीं देख सकते और उसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता, किंतु अदालत चाहे तो उसे देख सकती है। वशिष्ठ ने स्वीकारा कि राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति को भेजी गई आठ रिपोर्टों में प्रदेश में संवैधानिक मशीनरी के फेल होने का जिक्र नजर नहीं आ रहा है।

राष्ट्रपति राजा नहीं, अब राष्ट्रपति शासन हटाकर उकसाए न केंद्र : हाईकोर्ट

-उत्तराखंड उच्च न्यायालय में चल रही सुनवाई बृहस्पतिवार को भी रहेगी जारी -केंद्र सरकार की ओर से अधिवक्ता भीमलाल की सदस्यता के मामले में रखे गए नये तथ्यों पर पेश करेंगे अपना जवाब नैनीताल। बुधवार (20.04.2016) का दिन उत्तराखंड उच्च न्यायालय में न्यायालय की तल्ख टिप्पणियों के लिये याद किया जाएगा। न्यायालय ने आज राष्ट्रपति और केंद्र सरकार दोनों पर अनौपचारिक तौर पर कड़ी टिप्पणियां की। राष्ट्रपति पर कहा कि वे राजा नहीं हैं। उनके आदेश को भी चुनौती दी जा सकती है। वहीं केंद्र सरकार पर टिप्पणी करने हुए उम्मीद जताई कि उम्मीद है वह (केंद्र) उन्हें (न्यायालय) को उकसाएंगे नहीं। वहीं न्यायालय में बुधवार को अवकाश के बावजूद लगातार तीसरे दिन सुनवाई जारी रही। इस दौरान याचिकाकर्ता हरीश रावत की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने भाजपा विधायक भीमलाल की सदस्यता को विधानसभा अध्यक्ष द्वारा अन्य बागियों की तरह समाप्त नहीं करने के प्रश्न पर कहा कि भीमलाल की सदस्यता समाप्त करने की मांग राष्ट्रपति शासन लगने के बाद की गई है। इसे नया तथ्य बताते हुए केंद्र सरकार के अधिवक्ता अतिरिक्त सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यह नया तथ्य है, इसकी वह पुष्टि करेंगे, और उसके बाद जवाब देंगे। इसके बाद न्यायालय में बृहस्पतिवार को भी मामले की सुनवाई जारी रखने की बात कही। इससे पूर्व बुधवार को नैनीताल उच्च न्यायालय में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की राज्य में लागू राष्ट्रपति शासन और लेखानुदान को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर पूरे दिन केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता और याचिकाकर्ता की ओर से अभिषेक मनु सिंघवी ने अपने-अपने पक्ष रखे। मध्याह्न बाद के सत्र में सिंघवी ने फिर आशंका जताई कि केंद्र सरकार राष्ट्रपति शासन को समाप्त कर सकता है, और भाजपा सरकार बना सकती है। न्यायालय सुनिश्चित करवाए कि ऐसा नहीं होगा। इस पर न्यायालय ने टिप्पणी की कि केंद्र सरकार नहीं उकसाऐगा, ऐसी उम्मीद है। वहीं इससे पूर्व राष्ट्रपति और राष्ट्रपति के आदेश पर कड़ी टिप्पणी करते हुऐ न्यायालय ने कहा कि पूर्ण शक्ति किसी को भी भ्रष्ट कर सकती है, और राष्ट्रपति भी गलत हो सकते हैं। ऐसे में उनके फैसलों की समीक्षा हो सकती है। न्यायालय ने कहा कि सभी (राष्ट्रपति, राज्यपाल और सदन के अध्यक्षों सहित) न्यायालयों के आदेशों के न्यायिक रिव्यू का अधिकार भारत के न्यायालयों को है। उधर, याचिकाकर्ता हरीश रावत के अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने न्यायालय से कहा की विधानसभा अध्यक्ष के बिल स्वीकृत कहने और राज्यपाल के विवादित कहने से राष्ट्रपति शासन लगाने का आधार नहीं बन जाता है। वहीं न्यायालय ने असिस्टेंट सलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि गोपनीय दस्तावेजों के अनुसार नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट द्वारा राज्यपाल को लिखे खत में 27 विधायकों द्वारा विनियोग विधेयक के दौरान ‘फ्लोर टेस्ट” कराने की मांग की थी, जबकि नौ बागी विधायकों का नाम उसमें नहीं था। इस पर तुषार मेहता ने कहा कि 18 मार्च की ही रात्रि 11.30 बजे अजय भट्ट ने 35 विधायकों के साथ राजभवन में राज्यपालको पत्र देकर वित्त विधेयक गिरने का हवाला देकर हालातों से अवगत कराया था। उन्होंने यह भी कहा कि विधेयक गिरने के बावजूद विस अध्यक्ष द्वारा विधेयक को पास बताकर संविधान का मजाक उड़ाया गया। उन्हांने इस संबंध में दोहराया कि विस अध्यक्ष मत विभाजन की मांग माने जाने को बाध्य हैं। इस संबंध में उन्होंने सरकारिया आयोग की सिफारिशों का हवाला भी दिया। कोर्ट ने सिंघवी से भी सवाल किया कि अध्यक्ष ने मत विभाजन की मांग क्यों नहीं मानी, जबकि नियम है कि एक भी सदस्य की मांग पर भी मत विभाजन किया जाना चाहिए। इस पर सिंघवी का का कहना था कि यदि सीएम या अध्यक्ष गलती करते हैं तो नियमानुसार कार्रवाई का प्राविधान है, किंतु यह राष्ट्रपति शासन लगाए जाने का आधार नहीं हो सकता है। न्यायालय ने सिंघवी से हरीश रावत के सीडी में पांच करोड़ रुपये देने पर भी सवाल पूछे। सिंघवी का कहना था कि इससे विधायकों की खरीद-फरोख्त किए जाने की बात साबित नहीं होती है।

सरकार गिरने के भय से अध्यक्ष ने नहीं मानी मत विभाजन की मांग : द्विवेदी

-बागी कहे जा रहे विधायकों के अधिवक्ता दिनेश द्विवेदी ने कहा बागी आज भी कांग्रेसी, उनका विरोध सिर्फ हरीश रावत से, रावत को हटा दें तो किसी का भी समर्थन कर सकते हैं नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय में बुधवार को बागी बताए जा रहे नौ कांग्रेसी विधायकों की ओर से सर्वोच्च न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता एवं पूर्व सीएम विजय बहुगुणा के रिश्तेदार दिनेश द्विवेदी ने भी अपना पक्ष रखा। इस दौरान विशेष भेंट में श्री द्विवेदी ने राज्यपाल के पत्र में नौ बागी विधायकों का जिक्र न होने और नौ बागी विधायकों के द्वारा 18 मार्च को सदन में मत विभाजन की औपचारिक तौर पर मांग न किए जाने के सवाल पर कहा, विधानसभा अध्यक्ष को 27 विधायकों की मांग को ही स्वीकार कर लेना चाहिए था, और कम से कम विधायकों के ‘हेड काउंट’ ही कर लिये जाने चाहिए थे। लेकिन उन्होंने मत विभाजन की मांग नहीं मानी। इसलिए नहीं मानी कि उन्हें पता था कि नौ बागी सरकार की ओर नहीं हैं, और मत विभाजन होता तो सरकार 18 मार्च को ही गिर गई होती। कहा कि जिन्हें बागी विधायक कहा जा रहा है वे सभी आज भी कांग्रेस के विधायक हैं, और उनकी कांग्रेस पार्टी में पूरी आस्था है। उन्हें केवल तत्कालीन सीएम हरीश रावत से परेशानी और विरोध है। रावत हट जाएं तो सभी कांग्रेसी विधायक आज भी साथ हैं।

भाजपा मौके की तलाश में, बना सकती है सरकार: भाजपा अध्यक्ष अजय भट्ट ने कहा-सदन में साबित कर देंगे बहुमत

प्रदेश में मौजूदा राजनीतिक स्थितियों में यह सवाल बेहद महत्वपूर्ण हो गया है कि प्रदेश का सियासी भविष्य क्या है। क्या राज्य में राष्ट्रपति शासन आगामी चुनावों तक जारी रह सकता है। कांग्रेस सरकार वापस आ सकती है अथवा क्या भाजपा केवल अगले सात-आठ माह के लिए सरकार बनाने का जोखिम ले सकती है। बहरहाल भाजपा सात-आठ माह के लिए सरकार बनाने और इतने छोटे कार्यकाल से भी उपज सकने वाली एंटी इंकमबेंसी का जोखिम लेने को तैयार है। पार्टी नेताओं की ओर से रामनवमी तक सरकार बनाने के बयान इसके लिए वास्तव में माहौल बनाने का प्रयास हैं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष एवं नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट ने इस सवाल के जवाब में दो-टूक कहा है कि भाजपा को मौका मिले तो वह सदन में बहुमत साबित कर देगी।

प्रदेश में भाजपा की तीसरी बार सरकार बनने की संभावनाओं पर भले राजनीतिक पंडित भी राजनीतिक नफा-नुकसान एवं भाजपा के नेताओं के कभी एक पग आगे तो कभी दो पग पीछे जैसे बयानों को देखते हुए किंतु-परंतु के साथ ही जवाब दे रहे हैं। शुरू में इसे भाजपा की साथ आये कांग्रेस के बागी विधायकों को बांधे रखने और पीडीएफ के विधायकों को आकर्षित करने के रूप में देखा जा रहा था लेकिन भाजपा की सरकार बनाने की संभावनाएं कितनी प्रबल हो चुकी हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अभिषेक मनु सिंघवी बतौर अधिवक्ता इस सवाल को उत्तराखंड उच्च न्यायालय की संयुक्त खंडपीठ के समक्ष शंका जाहिर करते हुए ऐसी स्थितियों पर रोक लगाने की मांग की है। बृहस्पतिवार को उन्होंने उच्च न्यायालय से ऐसी स्थितियां न आने पाएं। इसके लिए कोई अंतरिम आदेश देने का औपचारिक अनुरोध भी किया। वहीं केंद्र सरकार के अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने यह कहते हुए उन्हें और न्यायालय को आास्त किया कि ऐसी कोई कोशिश किए जाने पर न्यायालय से इजाजत ली जाएगी। एक तरह से ऐसी स्थितियों के आने की संभावना से इनकार नहीं किया गया है। भाजपा पूरी तरह इस बात का जोखिम लेने को तैयार दिख रही है कि नियमानुसार 13 सितम्बर से चुनाव अधिसूचना जारी होने तक भी केंद्र सरकार की मदद से राज्यवासियों का विकास कायरे की मदद से मन मोह लिया जाए कि जनता में कांग्रेस के साथ किसी तरह की सहानुभूति न रहे। जनता को दिखाया जाए कि वास्तव में क्या हो सकता था और कांग्रेस सरकार ने क्या किया। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष भट्ट ने आज इसका इशारा करते हुए कहा भी कि बुधवार के एक दिन में केवल एक नदी गौला से प्रदेश सरकार को 12.5 करोड़ का राजस्व मिला। यदि एक दिन में इतना राजस्व मिला तो पिछले चार वर्षो में राज्य सरकार को 18,250 करोड़ रुपये राजस्व मिलना चाहिए था लेकिन यह राज्य को मिलने के बजाय कुछ नेताओं की जेब में गया है। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार बनाने की कोशिश नहीं कर रही है। उनके पार्टी नेताओं ने राम नवमी तक सरकार बनाने का कोई बयान नहीं दिया है। उन्होंने कहा, जनता चाहेगी तो प्रदेश में सरकार बनाने को तैयार हैं। स्पष्ट तौर पर कहा कि भाजपा सदन में मौका मिलने पर बहुमत साबित कर देगी। बहुमत कैसे साबित करेंगे। उनका जवाब था-विधायकों से अंतरात्मा की आवाज पर प्रदेश की जनता के हित में समर्थन मांगेंगे और भरोसा जताया कि पहले के मुकाबले अधिक कांग्रेस विधायकों से उन्हें समर्थन मिलेगा।

‘न्यायिक हिरासत’ में उत्तराखंड की ‘सियासत’, उच्च न्यायालय में कानूनी दांव-पेंच के साथ शह-मात का खेल

उत्तराखंड की राजनीति अब उच्च न्यायालय पहुँच गयी है, और यहाँ कानूनी दांव-पेंच में फंस गयी है। पहले दिन एकल पीठ के आदेश पर ‘न्याय की जीत’ बता रहे सभी पक्षों की ओर से यहाँ, खासकर कांग्रेस पार्टी की ओर से हर रोज एक नयी याचिका दायर की जा रही है। वहीँ अब तक जहाँ हरीश रावत लगातार ‘हवा में उड़’ रहे थे,  अब यह सिलसिला कांग्रेस के लिए कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी जारी रखे हुए हैं। केंद्र सरकार ने भी महाधिवक्ता मुकुल रोहतगी के साथ ही अपने नेताओं को भी मोर्चे पर उतार दिया है।  हरीश रावत व डा.इंदिरा हृदयेश की ओर से केंद्र सरकार के विनियोग विधेयक को चुनौती देने के बाद अब 31 विधायकों की ओर से राष्ट्रपति शासन के खिलाफ भी एक याचिका दायर कर दी गयी है, जिसे कांगेस की ओर से अपने विधायकों को बचाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है, वहीँ कांग्रेसी विधायकों को अन्य कांग्रेस शासित राज्य हिमांचल प्रदेश लेजाकर एक तरह से ‘गोठ्या’ दिया गया है।

27 मार्च :  राज्य के इतिहास में पहली बार राष्ट्रपति शासन लागू, विधान सभा अध्यक्ष ने रद्द की कांग्रेसी बागियों की सदस्यता

राष्ट्रपति ने किये राज्यपाल की संस्तुति के बाद केंद्र सरकार की रिपोर्ट पर संविधान की धारा 356 के तहत हस्ताक्षर, गयी फ़रवरी 2014 में आई हरीश रावत सरकार, राज्य में पहली बार आया ऐसा मौका, किसी चुनी हुई सरकार में पहली बार हुई ऐसी बगावत

  • स्ट्रिंग ऑपरेशन में प्रदेश के मुखिया द्वारा खुलेआम बागी विधायकों की सौदेबाजी किये जाने का खुलासा होने के बाद केंद्र सरकार को मिला मौका, कांग्रेस दे सकती है राष्ट्रपति शासन के आदेश को कानूनी चुनौती, स्ट्रिंग ऑपरेशन की सीडी चंडीगढ़ की लैब में पाई गयी असली
  • आखिर घोड़े (Horse) से शुरू हुई उत्तराखंड की राजनीति में Horse Trading के आरोपों के बाद रावत को पड़ी ‘नौ’लत्ती
  • विधान सभा को अभी निलंबित स्थिति में रखा गया, भंग नहीं किया गया, आगे हो सकते हैं सरकार बनाने के प्रयास
  • विधान सभा में एक दिन के बाद ही रावत सरकार को हासिल करना था विश्वास का मत
  • पूर्व में इंदिरा गांधी के दौर में भी इसी तरह राज्यों में लागू होते रहे हैं राष्ट्रपति शासन
  • और बढ़ सकती हैं हरीश रावत की मुश्किलें, दिल्ली वालों (कांग्रेस हाईकमान) को बताया था ‘कंगले’

हरीश रावत

26 मार्च:

  • दिल्ली में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में केन्द्रीय मंत्रिमंडल की बैठक शुरू, लग सकता है उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन
  • देहरादून में विधानसभा अध्यक्ष भी दुबारा रात्रि में पहुंचे दुबारा अपने दफ्तर
  • दिल्ली में कांग्रेस की उत्तराखंड प्रभारी अम्बिका सोनी, प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय के साथ कर रही हैं प्रेस कांफ्रेंस, जताई राष्ट्रपति शासन लगाने की आशंका
  • भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय की अगुवाई में भाजपा का एक शिष्टमंडल दिल्ली में राष्ट्रपति से मिलने पहुंचा. करेंगे रावत सरकार को बर्खास्तगी करने की मांग..
  • देहरादून में सभी बागियों की ओर से विधायक सुबोध उनियाल ने विधान सभा अध्यक्ष से मिलकर दिया नोटिस का जवाब, कुछ प्रपत्र तथा उन प्रपत्रों पर जवाब देने के लिए माँगा समय, अध्यक्ष ने किया समय देने से इनकार
  • विजय बहुगुणा ने रावत सरकार को बहुमत साबित करने की लिए अधिक समय देने के लिए राज्यपाल को भी हटाने की उठाई मांग 

बागियों ने राज्यपाल को भेजा मुख्यमंत्री रावत का स्टिंग, की सरकार को बर्खास्त करने की मांग

  • समाचार प्लस चैनल के मालिक उमेश शर्मा ने किया 23 मार्च को स्टिंग, स्टिंग में मुख्यमंत्री बागियों को 15 करोड़ रुपये तक और मंत्री पद का ऑफर देते दिख रहे
  • बागियों व भाजपा का कहना है कि इससे मुख्यमंत्री रावत का असली चेहरा उजागर,
  • इससे पहले मुख्यमंत्री भाजपा पर धनबल, बाहुबल के दुरुपयोग के लगा रहे थे आरोप
  • मुख्यमंत्री रावत ने उमेश शर्मा को बताया पूर्व से बदनाम, उनकी अचानक बढ़ी संपत्ति पर उठाये सवाल, पूर्व के अन्य कई मुख्यमंत्रियों को भी दबाव में लेने के लिये इसी तरह घेरने के लगाये आरोप

25 मार्च :  बागी विधायकों को हाईकोर्ट से राहत नहीं, जा सकते हैं सुप्रीम कोर्ट

सरकार गिरी तो विधानसभा भंग कर चुनाव की सिफारिश कर सकते हें रावत

रावत सरकार का जाना तय, सरकार गिरी तो विधानसभा भंग कर चुनाव की सिफारिश कर सकते हैं रावत, उत्तराखंड में भाजपा सरकार नहीं बनाएगी, लागू हो सकता है राष्ट्रपति शासन

-अवकाश के दिन बैठी उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने मामले को किया खारिज, दोनों पक्षों के लिये सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ताओं हरीश द्विवेदी व कपिल सिब्बल ने की पैरवी -बागियों ने विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल एवं संसदीय कार्य मंत्री डा. इंदिरा हृदयेश को बनाया था विपक्षी -मांगा था विस अध्यक्ष से व्यक्तिगत सुनवाई के लिये पर्याप्त समय नैनीताल। प्रदेश की राजनीति में बीती 18 मार्च को उथल-पुथल मचाने वाले नौ बागी विधायकों में से आठ ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल के द्वारा बीती 19 मार्च को जारी नोटिस को चुनौती दी थी। लेकिन अवकाश के दिन बैठी उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की खंडपीठ से उच्च न्यायालय के इतिहास में आये अपनी तरह के पहले मामले में बागी विधायकों को राहत नहीं मिली। खंडपीठ ने याचिका को खारिज कर दिया। आगे माना जा रहा है कि विधायक शनिवार को इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय ले जा सकते हैं। उच्च न्यायालय में दोनों पक्षों के लिये सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ताओं राकेश द्विवेदी तथा पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने पैरवी की। उत्तराखंड उच्च न्यायालय में शुक्रवार को विशेष प्राविधानों के तहत अवकाश के दिन पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को छोड़कर उत्तराखंड सरकार के खिलाफ बगावत करने वाले आठ विधायक डा. हरक सिंह रावत, अमृता रावत, कुंवर प्रणव चैंपियन, शैलेंद्र मोहन सिंघल, शैलारानी रावत, सुबोध उनियाल व उमेश शर्मा काउ उच्च न्यायालय की शरण में पहुंचे। खास बात यह थी कि उन्होंने अपनी याचिका में सरकार के बजाय उनकी सदस्यता खत्म करने के लिये विधान सभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल को नोटिस देने वाली संसदीय कार्य मंत्री डा. इंदिरा हृदयेश तथा विधायकों को बीती 19 मार्च को नोटिस देने वाले विस अध्यक्ष कुंजवाल को विपक्षी बनाते हुये नोटिस को पूर्वाग्रह से प्रेरित बताते हुये चुनौती दी थी। उनकी ओर से अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने न्यायालय के कहा कि उनके याचीगण सरकार और मुख्यमंत्री के खिलाफ हैं, किंतु उन्होंने उनकी सदस्यता निरस्त हो, ऐसा कोई गैरकानूनी कृत्य नहीं किया है, लिहाजा उन्हें विधानसभा अध्यक्ष व्यक्तिगत सुनवाई का मौका दिया जाये। वहीं विपक्षी अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि याचियों ने अपनी पार्टी का विरोध करने के तथ्य को छुपाया है। अपराह्न तीन बजे से करीब पौने पांच बजे तक पौने दो घंटे चली सुनवाई के बाद न्यायालय ने याचियों की याचिका को निरस्त करने का आदेश सुनाया।

भाजपा के डीएनए में है असहिष्णुता : सिब्बल

नैनीताल। कभी भाजपा कांग्रेस के डीएनए पर सवाल उठाती रही है, जबकि शुक्रवार को पूर्व केंद्रीय मंत्री व वरिष्ठ कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने भाजपा को उसी की भाषा में जवाब देते हुये भाजपा के डीएनए पर सवाल उठाया। शुक्रवार को मुख्यालय में पत्रकारों के सवालों के जवाब देते हुये सिब्बल ने कहा कि भाजपा के डीएनए में असहिष्णुता है। अरुणांचल और हिमांचल के साथ उत्तराखंड की चुनी हुई कांग्रेस सरकारों पर भाजपा द्वारा किया जा रहा हमला इसका सबूत है। भाजपा देश को कांग्रेस मुक्त करने की बात करती रही है, और उसने दिखा दिया है कि वह देश को कांग्रेस मुक्त करने के लिये किसी भी हद तक जा सकती है। जनता इसका जवाब देगी।

हरीश रावत सरकार के बचने की उम्मीदें ख़त्म, राज्यपाल ने विधानसभा अध्यक्ष से कहा 28 तक न करें विधायकों पर कार्रवाई, रखें 18 मार्च जैसी यथा स्थिति, राष्ट्रपति को भी भेजी रिपोर्ट इस प्रकार सभी विधायक डाल सकेंगे 28 को अविश्वास प्रस्ताव पर वोट

वहीँ सूत्रों के हवाले से मिल रही जानकारी के अनुसार, उत्तराखंड में भाजपा सरकार नहीं बनाएगी, लागू हो सकता है राष्ट्रपति शासन. राज्यपाल ने केंद्र सरकार को भेज दी है अपनी रिपोर्ट

ज्ञात हो कि राज्यपाल ने हरीश रावत को 28 मार्च को बहुत साबित करने का निर्देश दिया है, जबकि बीजेपी ने दावा किया कि 70 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस के नौ बागी विधायकों को मिलाकर उसे 35 विधायकों का समर्थन प्राप्त है, उधर विधान सभा अध्यक्ष गोविन्द सिंह कुंजवाल ने बागी विधायकों की सदस्यता ख़त्म करने के उद्देश्य से उन्हें नोटिस भिजवा दिए हैं, जबकि बागी डा. हरक सिंह रावत ने इस तथ्य का हवाला देकर कि कुंजवाल ने बजट पर विनियोग विधेयक को पास बताया है, जिसका मतलब बागियों ने सदन में कोई बगावत नहीं की, और अध्यक्ष के जाने के बाद सदन में, या सदन के बाहर और राज्यपाल से मिलने में भी बगावत साबित नहीं होती. लेकिन यदि कुंजवाल सदन में बगावत को स्वीकार करते हैं तो इसका मतलब होगा-विनियोग विधेयक पास नहीं हुआ और सरकार गिर गयी. रावत बागियों द्वारा अध्यक्ष के खिलाफ पहले ही दिए गए अविश्वास प्रस्ताव का हवाला देकर अध्यक्ष के नोटिस को असंवैधानिक और उनकी जगह प्रोटेम स्पीकर से 28 को सदन की कारवाई चलाने की मांग भी कर रहे हैं. प्रोटेम स्पीकर सबसे वरिष्ठ विधायक के रूप में भाजपा के हरबंश कपूर हो सकते हैं.

यह तथ्य भी दिलचस्प है की अध्यक्ष के खिलाफ दिए गए अविश्वास प्रस्ताव पर राज्यपाल 14 दिन 4 अप्रेल के बाद ही दखल दे सकते हैं.

सूत्र बताते हैं कि बीजेपी की योजना थी कि वित्त विधेयक पर ही मतदान कराकर रावत सरकार को सदन में ही गिरा देंगे. लेकिन, रावत को भनक लगने पर विधानसभा अध्यक्ष ने मतदान न कराकर ध्यनिमत से वित्त विधेयक पारित करा दिया.

हरक सिंह रावत कुछ दिन पहले दिल्ली आए थे. सतपाल महाराज और विजय बहुगुणा उनके मार्फत सरकार गिराने के लिए की रणनीति बना रहे थे. अब पासा पलट गया. नौ विधायकों से कांग्रेस पार्टी में टूट नहीं हो सकती है.

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नए कानून के अनुसार पार्टी तोड़ने के लिए आधे से अधिक विधायक होने चाहिए. कांग्रेस के 35 विधायक हैं. यह भी स्पष्ट हो चुका है कि बहुमत साबित करने के दौरान ये विधायक सरकार के खिलाफ वोट डालेंगे. ऐसी स्थिति में हरीश रावत उन्हें मतदान करने की स्थिति में नहीं रखेंगे. उनकी सदस्यता जानी तय है.

हालांकि, राज्यपाल से उत्तराखंड में हरीश रावत सरकार को बहुमत सिद्ध करने का समय मिलने के बाद कांग्रेस नेतृत्व कुछ आशावान हुआ है. अरुणाचल की तरह उत्तराखंड में सत्ता समय से पहले न जाए, इसके लिए मुख्यमंत्री के साथ-साथ कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व भी असंतुष्ट विधायकों से संपर्क साध रहा है.

मामले में अगली रणनीति के लिए रावत को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने रविवार को दिल्ली तलब किया था, लेकिन बाद में मना कर दिया है.

इस बीच कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा है कि मोदी सरकार के इशारे पर उत्तराखंड में राजनीति को अस्थिर करने की कोशिश की जा रही है. हरीश रावत बुलावे पर दिल्‍ली पहुंच रहे हैं. इससे पहले उन्‍होंने कहा था कि उन्‍हें दिल्‍ली जाने की जरूरत नहीं होगी.

राज्यपाल से मिले अभयदान के बाद मुख्यमंत्री हरीश रावत ने सदन पर अपना बहुमत सिद्ध करने के लिए रणनीति तैयार कर ली है. इसके तहत सबसे पहले कांग्रेस पार्टी के बागी नौ विधायकों को बाहर का रास्ता दिखाएगी, ताकि सदन में इन्हें वोटिंग के अधिकार से वंचित किया जा सके और बहुमत का आंकडा उसके लिए सहज बन सके.

इसके लिए मुख्य सचेतक व संसदीय कार्यमंत्री इन्दिरा हृदयेश की ओर से विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिह कुंजवाल को याचिका प्रस्तुत,जिसमें बागी नौ विधायकों को पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्त बताते हुए उनकी सदस्यता समाप्त करने को कहा गया है.

इसी आधार पर विधानसभा अध्यक्ष की ओर से बागी विधायकों को नोटिस जारी कर 25 मार्च तक जवाब दाखिल करने को कहा गया है. राज्यपाल ने मुख्यमंत्री हरीश रावत को सदन में 28 मार्च तक बहुमत सिद्ध करने का समय दे दिया है. रावत सरकार को मौजूदा संकट से उबरने के लिए इस पर्याप्त समय माना जा रहा है. बहुमत साबित करने के लिए जो आंकड़ा रावत सरकार को चाहिए वह सहजता के मिल सके इसके लिए रणनीति तैयार कर ली गई है.

सूत्रों के अनुसार पार्टी नौ बागी विधायकों को मतदान के अधिकार से वंचित करने के लिए 28 मार्च से पहले ही दल विरोधी कानून का सहारा लेकर बाहर का रास्ता दिखा सकती है. संसदीय कार्य मंत्री ने भारत के संविधान की अनुछेद 10 के तहत उत्तराखंड विधानसभा सदस्य( दल परिवर्तन के आधार पर निहर्ता) नियमावली 2005 को आधार बना कर विधानसभा अध्यक्ष को याचिका प्रस्तुत कर दी है. जिसमें बागी नौ विधायक पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा, पूर्व कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत, सुबोध उनियाल, शैलारानी रावत, डा. शैलेंद्र मोहन सिंघल, उमेश शर्मा(काऊ ), कुंवर प्रणव चैम्पियन, अमृता रावत व प्रदीप बत्रा को पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होना बता कर उनकी सदस्यता समाप्त किए जाने की मांग की है.

संसदीय कार्य मंत्री की इसी याचिका के आधार पर विधानसभा अध्यक्ष की ओर से सभी बागी विधायकों को नोटिस जारी कर दिया है. जिसमें बागी विधायकों से 25 मार्च सांय पांच बजे तक अपनी स्थिति स्पष्ट करने को कहा गया है. ऐसा न होने पर सदस्यता समाप्त किए जाने को कहा गया है. विधानसभा अध्यक्ष ने बताया कि सभी बागी विधायकों को विशेष पत्र वाहक के माध्यम से उनके निवास स्थान पर नोटिस भिजवा दिया गया है.

बागी विधायकों का निष्कासन होगा सदन में जीत का आधार

लोकसभा अध्यक्ष और विधानसभा अध्यक्ष को संविधान की 10वीं अनुसूची में असीमित अधिकार हैं. अध्यक्ष को सदस्यों की गतिविधियों से अनुमान लगाकर निर्णय लेने का अधिकार है. उत्तराखंड के कांग्रेसी बागी विधायकों की गतिविधियां सरकार विरोधी होने के आधार पर विधानसभा अध्यक्ष उन्हें अयोग्य घोषित कर सकता है.

सरकार को 28 मार्च से पहले बहुमत सिद्ध करना है. इस बीच, भाजपा के सभी 26 विधायक और कांग्रेस के बागी विधायक दिल्ली में पांच सितारा होटल लीला में डेरा डाले हैं. ये विधायक बीजेपी हाईकमान के आदेश की प्रतीक्षा कर रहे हैं. इन विधायकों की राष्ट्रपति के सामने परेड कराने के बारे में अभी निर्णय नहीं लिया गया है, यदि जरूरत पड़ी तो ही इन्हें राष्ट्रपति के सामने पेश किया जाएगा.

संविधान विशेषज्ञ और लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप के अनुसार, राज्यपाल के पास सरकार को बहुमत साबित करने के लिए मौका देने का अधिकार है और विधानसभा अध्यक्ष का कर्तव्य है कि वह मतविभाजन कराए. लेकिन, कांग्रेस के बागी विधायकों को वोट करने देने के मसले पर कश्यप कहते हैं कि यह क्षेत्र अस्पष्ट है. विधानसभा अध्यक्ष बागियों की गतिविधियों को आधार मानकर उन्हें अयोग्य घोषित कर सकते हैं और उन्हें वोट देने से रोक सकते हैं.

इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए विधानसभा अध्यक्ष को पार्टी एक याचिका सौंपेगी. उस पर सुनवाई करते हुए अध्यक्ष बागियों को नोटिस देंगे और अपना मत रखने का मौका देंगे, उसके बाद वह निर्णय सुनाएंगे. उनके निर्णय को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है, लेकिन यह प्रक्रिया लंबी हो जाती है.

दूसरे संविधान विशेषज्ञ एसके शर्मा कहते हैं कि सदन के अंदर विधानसभा अध्यक्ष के निर्णय को चुनौती नहीं दी जा सकती है. सामान्य तौर पर कोई भी मुख्यमंत्री विधानसभा अध्यक्ष अपने ही चहेते विधायक को बनाते हैं, जो ऐसे संकट के समय कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बजाय सरकार को बचाने के लिए काम करते हैं.

दरअसल, कांग्रेस के पास अब विधानसभा अध्यक्ष के पास अपने बागी विधायकों के खिलाफ याचिका दायर करने का मौका है. इसी याचिका के दम पर नौ विधायकों की सदस्यता पर तलवार लटकेगी. ऐसे अनेक मौके आए हैं जब विधानसभा अध्यक्ष ने बागियों को मतदान करने से रोका है. झारखंड, बिहार, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश इसके उदाहरण रहे हैं.

उत्तराखंड की ताजा राजनीतिक स्थिति पर रोचक टिप्पणियां :

1. उत्तराखण्ड का गणित……

कांग्रेस सरकार के कुल विधायक= 36 घोडे की कुल टांगे =4 घोडे की एक टांग=36÷4=9 विधायक (घोडा शासन का प्रतीक होता है) एक टांग टूटी =9 विधायक टूटे

2. एक रावत (हरीश रावत) की सरकार को दूसरे रावत (रणजीत रावत) के चक्कर में तीसरे, चौथे और पांचवे रावत (हरक सिंह रावत, अमृता रावत और शैलारानी रावत) ने मिलकर गिरा दिया… लिहाजा यह होली रावतों के नाम !

3. 16 वर्ष की कमसिन उम्र में ही उत्तराखंड की 9वीं “Pre Mature Delivery” के लिए तैयारी…

4. उत्तराखंड की राजनीति भी खेल रही है इस तरह होली

नौटंकियों को स्वांग लगो है काली चूनर दाग लगो है मुख्यमन्त्री मुख भांग लगो है विधायक पिचकारी डांठ लगो है राकस छलड़ी 28 को होवे बाकी दुनिया फाग लगो है..

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