उत्तराखंड में ‘दावानल’ की राष्ट्रीय आपदा : न खुद भड़की आग, न उकसाया हवा ने


  पूरी तरह मानव जनित थी आग  !

-सभी आग कहीं न कहीं लोगों द्वारा ही लगाई गई हैं, तापमान कम होने से प्राकृतिक कारणों से आग लगने का अभी कोई कारण नहीं
-आग को भड़काने में प्राकृतिक हालात बने मददगार, अलबत्ता लकड़ी माफिया द्वारा आग लगाने की संभावनाओं से इन्कार
नवीन जोशी, नैनीताल। पहली बार ‘राष्ट्रीय आपदा’ घोषित उत्तराखंड की वनाग्नि पूरी तरह मानव जनित है, और इसके प्राकृतिक कारणों से शुरू होने के कहीं कोई सबूत या स्थितियां नहीं हैं। अलबत्ता पिछले तीन-चार दिनों में जब यह आग दावानल के रूप में दिखाई दी, तब प्राकृतिक हालातों ने जरूर इसे इस हद तक भड़काने में ‘आग में घी डालने’ जैसा कार्य किया। वहीं वन माफिया द्वारा आग लगाने के दावों को खारिज तो नहीं किया जा रहा है, पर इसकी स्पष्ट वजह भी नहीं बताई जा रही है।

गर्मियों के दिनों में आग के शुरू होने के दो ही प्रमुख कारण होते हैं, मानव जनित और प्राकृतिक। प्राकृतिक कारण तापमान के 30-35 डिग्री सेल्सियस से ऊपर और आद्र्रता के 20 डिग्री तक पहुंच जाने की स्थितियों में बनते हैं, जब पहाड़ी चट्टानों से वन्य जीवों के गुजरने से गिरने वाले पत्थरों की आपसी रगड़ से आग उत्पन्न हो जाती है, और जंगल में फैल जाती है। जबकि मानव जनित आग लगने के गलती, लापरवाही व नासमझी के साथ जानबूझकर आग लगाने के अनेक कारण हो सकते हैं। जंगल के बीच से गुजरते लोग गलती से धूम्रपान के शेष अवशेषों को लापरवाही से जंगल में फेंक देते हैं, जंगल में पिकनिक या ऐश-तफरी करने वाले युवा भी कई बार आग लगा देते हैं। वहीं ग्रामीणों पर बेहतर घास उगने की संभावना के मद्देनजर और वन महकमे के कर्मियों पर पौधारोपण की कमियों को छुपाने व कभी लीसे के नुकसान को बड़ा दिखाने की नीयत से आग लगाने के आरोप भी लगते हैं।
बहरहाल, इस बार दुनिया की सर्वाधिक भयावह आगों में शुमार-दावानल की श्रेणी में लगी वनाग्नि की घटना के लिए शुरुआत में आग शुरू होने के लिए पूरी तरह मानव जनित और बाद में आग के भड़कने के लिए प्राकृतिक कारणों को दोषी माना जा रहा है। आग बुझाने के लिए अनेक लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है, लेकिन अधिकांश के साजिशन आग लगाने की संभावनों की पुष्टि नहीं हो रही है। डीएम दीपक रावत ने माना कि आग लोगों के द्वारा लगाए जाने की बात को वह पूरी तरह स्वीकार करते हैं। ऐसा हो रहा है कि किसी ओर जाते हुए आग नहीं होती है, और लौटने तक आग लग जाती है। यानी इस बीच में किसी ने आग लगाई है। वहीं कमोबेश सभी आग किसी न किसी सड़क या पैदल मार्ग के पास से ही शुरू हुई हैं। अलबत्ता उन्होंने किसी तरह साजिशन आग लगाए जाने का कोई सबूत न होने की बात कही।
वहीं डीएफओ डा. तेजस्विनी अरविंद पाटिल ने कहा कि पिछले वर्ष अगस्त माह से अच्छी बारिश न होने की वजह से बीती 26 अप्रैल से 28-29 तक आर्द्रता 20 डिग्री के स्तर तक आ गई थी। वहीं हवाएं अत्यधिक तेज व घुमावदार थीं। इस कारण यहां मुख्यालय के निकट ही खुर्पाताल क्षेत्र में 29 की शाम से रात्रि तक दावानल जैसी स्थिति रही। इस दौरान सैकड़ों फीट ऊंचे चीड़ के पेड़ की ‘केनोपी’ यानी शीर्ष भाग धू-धू कर जले और यहां तक कि आग करीब 70-80 फीट चौड़े निहाल नाले के इस पार से उस पार भी बिना किसी प्रतिरोध के पहुंच गई। अलबत्ता, उन्होंने भी आग को लकड़ी माफिया द्वारा या किसी के द्वारा साजिशन जलाए जाने की संभावना से इंकार किया। कहा कि आग से हुए नुकसान से और खासकर यदि चीड़ के पेड़ जल कर बहुतायत में जमीन पर गिर भी जाते हैं तो इसे लकड़ी माफिया को अच्छी गुणवत्ता की लकड़ी प्राप्त नहीं होती है।

जनसहभागिता की कमी व वन्य जीवों से होने वाला नुकसान भी जिम्मेदार

नैनीताल। वनाग्नि के अधिक तेजी से भड़कने के पीछे वन विभाग को स्थानीय जनता का साथ यानी सहभागिता न मिलने को भी बड़ा व प्रमुख कारण माना जा रहा है। जानकारों के अनुसार उचित मात्रा में बुनियादी हक-हुकूक न मिलने, वन विभाग की वजह से कई बार विकास कार्यों, खासकर पहुंच मार्गों के निर्माण की अनुमति न मिलने तथा योजनाओं में स्थानीय जनता को उचित प्रतिनिधित्व, काम न मिलने से ग्रामीणों एवं वन विभाग व वनों के पूर्व की तरह आत्मीय रिस्ता कमजोर हुआ है। इस वजह से लोगों में आग की घटना होते ही इस बुझाने को स्वत: आगे आने या विभाग को जानकारी देने के प्रति लापरवाही दिखती है। इधर यह भी देखने में आया है कि ग्रामीण वन्य जीवों के द्वारा खेती को नुकसान पहुंचाने की वजह भी वनों को मानते हैं तथा वन्य जीवों से होने वाली जन-धन की क्षति में वन विभाग पर अपेक्षित सहयोग, मुआवजा आदि देने में कंजूसी बरतने के आरोप भी लगाते हैं। वनों में गश्त करने वाले पतरौलों की कमी भी बड़ा कारण है। जिस वजह से राज्य में अंग्रेजी दौर में बनी चार-पांच फीट चौड़ी व एक फीट करीब गहरी फायर लाइन कही जाने वाली करीब 8447 किमी लंबी खाइयों में से आधे से अधिक से पिरूल व लकड़ी आदि ज्वलनशील पदार्थो की सफाई नहीं हो पाई थी। 1981 से प्रदेश में एक हजार मीटर से अधिक ऊंचाई के वनों में हरे वृक्षों के पातन पर लगी रोक को भी वनाग्नि की घटनाओं के बढ़ने का एक प्रमुख कारण बताया जा रहा है।

बाम्बी बकेट ने नागालेंड के बाद उत्तराखंड में साबित की उपयोगिता :

वनाग्नि बुझाने में भारतीय वायु सेना के एमआई-17 द्वारा जिन बाम्बी बकेट का इस्तेमाल किया जा रहा है। उसके बारे में बताया गया है कि इन्हें रूस से लाया गया है। आग बुझाने के लिए एक बार में 5000 लीटर पानी या फोम ले जाने की सुविधा युक्त बाम्बी बकेट का इससे पूर्व इस्तेमाल नागालैंड में किया था। यह आग पर तेज बारिश जैसी फुहारें डालकर इसे बुझाने में खासी कारगर है। बताया गया है कि हल्द्वानी से संचालित एमआई-17 इस बाम्बी बकेट की सहायता से आग बुझाने में करीब 40 फेरे लगा चुका है। मंगलवार को इसने रामगढ़ के हरतोला क्षेत्र में लगी आग एक दर्जन और क्वैदल में लगी आग पर आधा दर्जन बार चक्कर लगाकर आग बुझाई।

2009 के बाद की सबसे बड़ी आग :

इस वर्ष लगी आग को वर्ष 2009 के बाद की सबसे बड़ी आग बताया गया है। वन विभाग से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार करीब 71 फीसद वनों से आच्छादित राज्य उत्तराखंड में इस वर्ष अभी तक करीब 3466 हैक्टेयर वन भूमि में आग लग चुकी है, जबकि इससे पूर्व 4115 हैक्टेयर वन भूमि में आग लगी थी, जबकि 2012 का 2,824 हैक्टेयर में आग लगने का रिकार्ड इस वर्ष टूट चुका है। अपर मुख्य सचिव एस रामास्वामी ने बताया कि इस फायर सीजन में अब तक 1591 वनाग्नि की घटनाएं हो चुकी हैं। आग बुझाने में भारतीय वायु सेना के एमआई-17 हेलीकाप्टर, राज्य सरकार के 11,160 कर्मचारियों के साथ ही एनडीआरएफ व एसडीआरएफ के लोग भी जुटे हैं। अभी तक आग लगाने के कुल 46 मामले दर्ज किए गए है। आग से कुल 4 जनहानि दर्ज की गई है जबकि 16 व्यक्ति घायल हुए हैं।

‘अग्नि परीक्षा’ पास करने की ओर :

तीन-चार दिनों की कड़ी मशक्कत के बाद आखिर भारतीय वायु सेवा, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, वन, अग्निशमन एवं राजस्व आदि विभाग वनाग्नि को बुझाने की राह पर हैं। बताया गया है कि मंगलवार को केवल 11 स्थानों पर ही आग लगी होने की सूचना आई। इनमें से पांच स्थानों पर आग को दोपहर तक बुझा लिया गया था। शेष 6 स्थानों की आग को बुझाने में तेजी से कार्य हो रहा है, और इन्हें भी जल्द बुझा लिए जाने का भरोसा है।

पर्यटन व्यवसायी राष्ट्रीय मीडिया से नाराज

02NTL-4-पर्यटन के प्रभावित होने संबंधी खबरों से हैं नाराज, इस तरह पर्यटन के वास्तव में प्रभावित हो जाने की जता रहे आशंका
नैनीताल :नगर के वरिष्ठ पर्यटन व्यवसायी।
नैनीताल। कुछ राष्ट्रीय मीडिया चैनलों पर वनाग्नि की घटनाओं से अनेक पर्यटकों द्वारा अपनी बुकिंग निरस्त करने एवं इस कारण उत्तराखंड का पर्यटन बुरी तरह से प्रभावित होने की खबरें कथित तौर पर चलाई जा रही हैं। इससे नगर के पर्यटन व्यवसायी बेहद नाराज हैं। उनका मानना है कि इस तरह की खबरें चलती रहीं तो प्रदेश का पर्यटन वास्तव में प्रभावित हो सकता है। वहीं कांग्रेस के प्रदेश सचिव त्रिभुवन फत्र्याल ने कहा कि वनाग्नि की घटनाओं से उत्तराखंड राष्ट्रीय मीडिया में जिस तरह से आ रहा है, इससे प्रदेश की छवि को आघात पहुंच रहा है। पर्यटकों में यहां आने को लेकर असुरक्षा की भावना घर कर रही है। राज्यपाल को मीडिया एवं अन्य माध्यमों से देश-विदेश में पर्यटन की दृष्टि से उतराखंड के सुरक्षित होने का संदेश देने की मांग की है, ताकि पर्यटन व्यवसायियों के सम्मुख आर्थिक संकट उत्पन्न न हो।

इस संबंध में नगर के पर्यटन व्यवसायियों का मन जानने का प्रयास किया तो पर्यटन व्यवसायी खासकर राष्ट्रीय मीडिया चैनलों की भूमिका पर नाराज नजर आए। नैनीताल होटल रेस्टोरेंट एसोसिएशन के अध्यक्ष दिनेश साह, उत्तर भारत होटल एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन के कार्यकारिणी सदस्य प्रवीण शर्मा, शेरवानी हिल टॉप के प्रबंधक गोपाल सुयाल, प्रशांत होटल के स्वामी अतुल साह, प्रिमरोज होटल स्वामी चंद्रमोहन बिष्ट व दिग्विजय बिष्ट, मनु महारानी होटल के वरिष्ठ प्रबंधक प्रमोद बिष्ट सहित अनेक होटल व्यवसायियों ने इस बात का पुरजोर तरीके से खंडन किया कि एक भी पर्यटक ने अपनी बुकिंग अभी तक वनाग्नि की वजह से निरस्त कराई है। वनाग्नि नियंतण्रमें है। इससे सैलानियों को नुकसान नहीं होने वाला है। पेयजल संकट को लेकर खबरें आई थीं। इन पर भी होटल व्यवसायियों का कहना था कि जल संस्थान एवं जिला प्रशासन ने उन्हें जल संकट न होने देने के प्रति आास्त किया है। आगे अच्छा मानसून होने की उम्मीद है।

दावानल से दृश्यता, जैव विविधता, भूजल व नदियों के प्रवाह में भी आई कमी

नैनीताल। सहारा न्यूज ब्यूरो। वनाग्नि की घटनाओं की वजह से दृश्यता में तो भारी कमी आई ही है, साथ ही जैव विविधता को भी भारी नुकसान पहुंचा है। खासकर पक्षियों के इस प्रजनन के मौसम में वनाग्नि के बजाय खासकर खुर्पाताल सहित अनेक क्षेत्रों में नन्हे पशु-पक्षी, उनके घोंसले व अंडे नष्ट हो गए हैं, साथ ही आहार श्रृंखला में उनका भोजन बनने वाले भू सतह पर रहने वाले सरीसृप वर्ग के नन्हे जीव व कीट-पतंगे भी नष्ट हो गए हैं। लिहाजा जहां बड़ी संख्या में परिंदों और जीव-जंतुओं ने इस दौरान प्राण गंवाए हैं, वहीं बड़े जीव-जंतुओं का आहार भी समाप्त हो गया है। साथ ही बांज-बुरांश व काफल जैसी चौड़ी पत्ती व जल संरक्षण के लिए जरूरी मानी जाने वाली प्रजातियों के वनों को भी अत्यधिक नुकसान पहुंचा है। परेशानी यह है कि सामान्यतया इन प्रजातियों के पौधों का रोपण भी नहीं किया जाता। नगर के सीआरएसटी इंटर कॉलेज के जंतु विज्ञान प्रवक्ता कमलेश चंद्र पांडेय ने कहा कि दावानल से हुए नुकसान की भरपाई दशकों में भी होनी मुश्किल बताई जा रही है। स्थानीय आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान यानी एरीज के वायुमंडलीय वैज्ञानिक डा. मनीश नाजा ने इस वजह से वायु प्रदूषण में भी पांच से 10 गुना तक की वृद्धि हो गई है। साथ ही तापमान में भी 0.8 डिग्री केल्विन की भी प्रतिदिन वृद्धि हो रही है। इसके अलावा इसी वजह से प्राकृतिक जल श्रोतों को भी भारी नुकसान पहुंचा है। इसके अलावा वैज्ञानिक दावानल व इस वर्ष शीतकालीन वर्षा न होने की वजह से प्रदेश में 50 फीसद जल श्रोतों के सूखने तथा नदियों में पानी के प्रवाह में 20 फीसद की गिरावट आने का दावा कर रहे हैं। इसका प्रभाव ग्लेशियरों के पिघलने पर भी पड़ने का अंदेशा जताया जा रहा है।

उत्तराखंड में ‘दावानल’ राष्ट्रीय आपदा घोषित, पीएमओ सक्रिय, सेना-एनडीआरएफ तैनात

-2000 हेक्टेयर वन फुके, 15 सौ गांवों को खतरा, 7 मरे, नैनीताल में भड़का दावानल, ऊंचे पेड़ों की ‘केनोपी” भी जलीं, आर्द्रता 20 फीसद से भी कम रह गई है
-करीब 12 घंटे में चला 10 किमी वन क्षेत्र, शेड्यूल-1 के चीड़ फीजेंट सहित अनेकों पक्षी, सरीसृप,कीट-पतंगे आदि जंतु प्रजातियां भी जलीं
-1998 के बाद बताई जा रही सबसे भयावह आग, रात भर सोये नहीं खुर्पाताल क्षेत्र के ग्रामीण, किसी तरह गांव को बचाया
नवीन जोशी, नैनीताल। दावानल को दुनिया की सबसे भयावह आगों में शुमार किया जाता है। वनाग्नि की श्रेणी से कहीं बड़ा दावानल से उत्तराखंड में 1900 हेक्टेयर से अधिक जंगल वनाग्नि की वजह से राख हो गए हैं, और 1500 गांवों को खतरा उत्पन्न हो गया है। प्रदेश में अग्निकांड की घटनाओं का स्कोर करीब एक हजार तक पहुंच गया है। इनमें करीब 600 घटनाएं गढ़वाल और 400 कुमाऊं में  बताई जा रही हैं।  इसमें 7 लोगों की जानें गई हैं, जिनमें 3 महिलाओं सहित एक बच्चा भी शामिल है। साथ ही एक दर्जन से अधिक मवेशियों की भी मौत हो चुकी है। इस पर प्रधानमंत्री कार्यालय भी सक्रिय हो गया है। भारतीय सेना और एनडीआरएफ की तीन टीमों को भी आग बुझाने के लिए भेज दिया गया है। साथ ही  एसडीआरएफ को भी आग बुझाने के काम में लगा दिया गया है।

कालागढ़ और कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में भी आग की 48 घटनाएं रिपोर्ट की गई हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए उत्तराखंड के राज्यपाल केके पॉल ने NDRF की 3 टीमों को लगाया है। NDRF के 135 लोग राज्य के अलग-अलग जिलों में आग बुझाने का काम कर रहे हैं। राज्य के 4500 वन्य कर्मचारी आग की घटनाओं पर नजर बनाए हुए हैं। प्रदेश के सभी 11 पहाड़ी जिलों में हाई अलर्ट जारी कर दिया गया है। वनाग्नि की इन घटनाओं के लिए शरारती तत्वों तथा धूम्रपान तथा घरों के पास सफाई आदि के लिए आग लगाने वालों के साथ ही वन माफिया को भी जिम्मेदार बताया जा रहा है।

इधर नैनीताल के निकटवर्ती जंगलों में देर रात्रि तक कहर ढाता रहा। यहां निकटवर्ती वजून में भी तीन मवेशी आग की वजह से जिंदा जल गए। गढ़वाल और कुमाऊं मंडल के जंगल अभी हफ्ते भर पहले फिर आग से प्रभावित हुए हैं। वन कर्मियों सहित किसी की हिम्मत नहीं हुई कि इसे बचाने को कुछ किया जा सके। आखिर ग्रामीण ही रात भर अपने गांव व घरों को इसकी चपेट में आने से बचाने के लिए रात भर जूझे, और किसी तरह गांव के चारों ओर के बड़े क्षेत्र पर ‘फायर लाइन’ काटकर किसी तरह दावानल से गांव को बचा लिया गया। दावानल की विभीषिका इतनी भयावह थी कि आग सैकड़ों फीट ऊंचे चीड़ के पेड़ों की ‘केनोपी’ यानी शीर्ष भाग भी धू-धू कर जलते रहे। आग में पेड़-पौधों के साथ ही व्यापक स्तर पर वन्य जीव-जंतुओं को अपनी जान गंवानी पड़ी है। क्षेत्र में ऐसे जले-भुने जीव जंतुओं के शवों की भरमार है।

मुख्यालय के निकटवर्ती क्षेत्रों के जंगलों में हालांकि सप्ताह भर से आग धधकी हुई है। लेकिन बताया गया है कि खुर्पाताल क्षेत्र में बृहस्पतिवार अपराह्न और देर शाम से लेकर रात्रि आग ने दावानल का रूप ले लिया। दावानल का यह नजारा बेहद डरावना था। प्रत्यक्षदर्शी एवं भुक्तभोगी रहे मल्ला बजून के ग्राम निवासी नगर के सीआरएसटी इंटर कॉलेज में जीव विज्ञान प्रवक्ता कमलेश चंद्र पांडेय ने बताया कि रात्रि तीन बजे तक ग्रामीण अपने गांव को बचाने के लिए गांव के गिर्द स्वयं फायर लाइन बनाने में जुटे रहे। इस दौरान चीड़ के सैकड़ों फीट ऊंचे पेड़ों की ‘केनोपी” धू-धू कर जल रही थी, और आग तेजी से गांव की ओर आ रही थी। ग्रामीणों को अपनी जान जाने का भय सता रहा था। आग में करीब 10 किमी क्षेत्र में खुर्पाताल में झील के चारों ओर को जलाने के साथ ही घिंघारी, बजून आदि गांवों से लेकर नैनीताल राजभवन के पीछे की पहाड़ी व नैनीताल बाईपास का क्षेत्र आग से खाक हो गया। इससे पूर्व बुधवार को पाटियाखान, सैमाधार, फगुनियाखेत व अधौड़ा के तथा मंगलवार को पटवाडांगर, नैना गांव व बेलुवाखान के जंगल पूरी तरह स्वाहा हो चुके हैं। इस आग में चीड़ के साथ ही राज्य वृक्ष होने के साथ ही जूस-स्क्वैश बनाने के लिए उपयोगी लोगों की आजीविका से जुड़े बुरांश, काफल व बांज के जंगल भी तबाह हो गए हैं। साथ ही स्थानीयों के साथ ही इन दिनों गर्म मैदानी क्षेत्रों से पहाड़ों के प्रवास पर आए प्रवासी पक्षी और ‘ब्रीडिंग सीजन” में नई संतति उत्पन्न कर रहे पक्षी, उनके अंडे और नन्हे बच्चे तथा रेंगने वाले सरीसृप वर्ग के एवं शाही जैसे छोटे वन्य जीव भी आग में भश्म हो गए हैं। इस दावानल से क्षेत्र ही नहीं नैनीताल नगर का वायुमंडल भी शुक्रवार को पूरे दिन धुंवे की गिरफ्त में रहा, और धूप ठीक से नहीं निकल पाई। उधर आग अब नगर के नारायणनगर वार्ड की ओर आगे बड़ गई है। ग्रामीणों के अनुसार दावानल के भड़कने के लिए वन विभाग के जिम्मेदार कर्मियों के द्वारा इस वर्ष अग्नि जागरूकता के कार्यक्रम, कंट्रोल बर्निंग व अंग्रेजी दौर से बनी फायर लाइनों को भी साफ न करने को भी महत्वपूर्ण कारण बताया जा रहा है।

वन विभाग ने वनाग्नि बुझाने से खड़े किए हाथ, कहा गांवों को बचाना प्राथमिकता

नैनीताल। नैनीताल में आग की विभीषिका इतनी भयावह हो गई है कि वन विभाग ने कमोबेश आग बुझाने से हाथ खड़े कर दिए हैं। डीएफओ तेजस्विनी अरविंद पाटिल ने कहा कि पिछले वर्ष अगस्त माह से वर्षा न होने और गर्मी बढ़ने से आर्द्रता 20 फीसद से भी कम रह गई है। आग से गत दिवस नगर का निकटवर्ती नैना गांव तबाह हो चुका है। साथ ही बीते दो दिनों में आग की वजह से तीन वृद्धों और कई घरेलू मवेशियों की मौत हो चुकी है। इसलिए डीएफओ ने ग्रामीणों से और खास तौर पर बच्चों और वृद्धों से वनों की आग बुझाने के लिए न जाने की अपील की है। ग्रामीणों से भी केवल अपने गांवों को आग से बचाने के लिए ‘फायर लाइन” बनाने में सहयोग करने और अपने घरों के पास कूड़ा जलाने या मवेशियों को मच्छरों से बचाने के लिए धुंवा न लगाने की अपील की है। वहीं डीएम दीपक रावत ने कहा कि जिले में अब तक 14 हैक्टेयर वन क्षेत्र जल गया है, और अभी भी 14 से अधिक स्थानों पर वनाग्नि लगी हुई है। ऐसे में जिले में वनाग्नि को आपदा घोषित कर दिया गया है।

जनपद में दावानल की बढ़ती घटनाओं के मद्देनजर डीएम दीपक रावत ने शुक्रवार को पत्रकार वार्ता बुलाई और दावानल को आपदा बताते हुए कहा कि एसडीएम सहित राजस्व व ग्राम्य विकास विभाग के सभी फील्ड स्तरीय अधिकारियों, तहसीलदार, नायब तहसीलदार, कानूनगो तथा पटवारी आदि को जिले की सभी 30 न्याय पंचायतों का प्रभारी बनाते हुए वनाग्नि की घटनाएं रोकने के आदेश दे दिए हैं। सूचनाएं देने के लिए जिला आपदा कंट्रोल रूम के 24 घंटे खुले टौल फ्री नंबर 1077 के साथ ही डीएम ने अपने ह्वाट्सएप नंबर 945897777 व 9997655555 तथा वन विभाग के क्रूस्टेशनों, वन चौकियों, वनाधिकारियों, 100 नंबर आदि को भी सक्रिय कर दिया गया है।
इन अधिकारियों से वन संपदा से घिरे ग्रामों, मोहल्लों आदि को पूर्व से चिन्हित करते हुये उनके आस-पास फायर लाइन तैयार करने, आग रोकने हेतु संसाधन का प्रबंध और उपयोग करने आदि को कहा है। कहा कि वे स्वयं भी अग्नि प्रभावित क्षेत्रों का औचक निरीक्षण करेंगे। उन्होंने सभी अग्नि घटनाओं को मानव जनित बताते हुए साक्ष्य सहित आग लगाने वालों की सूचना देने वालों को अपनी ओर से पांच हजार रुपए का इनाम देने की घोषणा भी की।

जिले को एसडीआरएफ की दो टीमें और 150 होमगार्ड मिलेंगे

नैनीताल। डीएफओ तेजस्विनी अरविंद पाटिल ने बताया कि जिले में 68 क्रू स्टेशनों पर पांच-पांच यानी 350 के करीब वन कर्मियों की जरूरत है, जबकि इससे आधे से भी कम, करीब 170 ही कार्यरत हैं। आगे उन्होंने शासन से एसडीआरएफ की दो टीमें और 150 होमगार्ड शीघ्र मिलने का विश्वास जताया। बताया कि इन कर्मियों को क्रू स्टेशनों और प्रभारी अधिकारियों के साथ रखा जाएगा।

राजनीतिक उठापटक की वजह से बढ़ी दावाग्नि की घटनाएं: उक्रांद

नैनीताल। सहारा न्यूज ब्यूरो। उत्तराखंड क्रांति दल के पूर्व केंद्रीय अध्यक्ष डा. नारायण सिंह जंतवाल ने प्रदेश में दावाग्नि की घटनाओं के बढ़ने और इस कारण वन संपदा की भारी क्षति पर गहरा दु:ख जताया है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में राष्ट्रीय राजनीतिक दलों की सरकार बनाने-बिगाड़ने की कोशिश के बीच इधर ध्यान न जाने की वजह से यह घटनाएं बढ़ी हैं। कहा कि प्रदेश की पहचान यहां वनों से हैं, जोकि उनकी वजह से चर्चा में नहीं हैं। वनाग्नि में बड़ी संख्या में वन एवं वन्य जीव नष्ट हुए हैं, तथा अनेक स्थानों पर जन-धन की क्षति हुई है जो गंभीर चिंता का विषय है। इसकी भरपाई शायद दशकों में भी पूरी न हो सके। इस घटना से सबक लेते हुए प्राकृतिक धरोहरों को बचाने की नई नीतियां बनाई जानी चाहिए।

आग बुझाने में झुलसे पूर्व जिपं सदस्य की दिल्ली ले जाते हुए मौत

नैनीताल। बृहस्पतिवार को आग बुझाने के दौरान बुरी तरह से जल गए पूर्व जिला पंचायत सदस्य 75 वर्षीय जय सिंह बोरा ने दिल्ली ले जाते हुए रास्ते में दम तोड़ दिया है। उनके शव को वापस उनके गांव लाया जा रहा है। । बताया गया है कि इसके साथ ही प्रदेश में वनाग्नि से जलकर मरने वालों मी संख्या सात हो गई है।

कुछ सवाल – क्यों लगती है वनाग्नि ?

अक्सर वन विभाग की ओर से कहा जाता है कि आम लोग ही घास-चारे के लिए जंगलों में आग लगाते हैं। जबकि आम लोगों की इस बात में अधिक दम नजर आता है कि प्रतिवर्ष लाखों-करोड़ों रुपये से किये जाने वाले वृक्षारोपण की धांधलियों को छिपाने के लिए वन विभाग के कर्मचारी खुद ही जंगलों में आग लगा देते हैं। वन सम्पदा के माफिया प्रकृति के लोगों पर भी ऐसे आरोप लगते हैं। माना जाता है कि ग्रामीण वन पंचायतों के पास मौजूद 30 प्रतिशत सिविल सोयम की वन भूमि पर अपने परंपरागत अनुभव के आधार पर अच्छी घास की पैदावर के लिए आग लगाते हैं। इससे पेड़ों को नुकसान नहीं होता और अनावश्यक खर-पतवार भी नष्ट हो जाते हैं, तथा बरसात के बाद घास अच्छी उगती है। पहले पतरोल स्थानीय समाज से जुड़ा हुआ होता था। उसकी एक आवाज पर लोग जंगलों की आग बुझाने दौड़ पड़ते थे। उसे इस बात का भी अहसास रहता था कि आखिर वनों पर स्थानीय लोगों के भी हक-हकूक हैं। सवाल यह है कि आज क्यों नहीं लाइन काटने के स्थानीय लोगों के परंपरागत अनुभव का लाभ उठाया जाता है? इसका कारण यह भी है कि वनाग्नि बुझाने में यदि कोई ग्रामीण मर जाये तो वन विभाग उसे मुआवजा नहीं देता। ग्रामीणों को उनके हक़-हकूक की लकड़ी, चारा-पत्ती भी बिना हाथ जोड़े नहीं मिलती । दूसरे पहाड़ पर हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र में फैली चीड़ की पत्तियां गर्मियों के दिनों में सड़कों के किनारे एकत्रित हो जाती हैं। गलती से कोई राहगीर माचिस की जलती तिल्ली या बीड़ी-सिगरेट छोड़ दे तो ये पत्तियां आग पकड़ लेती हैं। इन पत्तियों को समय से उठाने, ‘कंट्रोल बर्निंग’ करने और ‘फायर लाइन’बनाने के प्राविधान हैं, किन्तु धन और कर्मियों की कमी बताकर वन विभाग अपने इन दायित्वों को पूरा नहीं करता, और परिणामस्वरूप जंगलों की आग बुझाने में स्थानीय लोगों की सहभागिता की सोच वातानुकूलित कमरों से धरातल तक नहीं पहुंच पाती है।

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s