विश्व व भारत में रेडियो-टेलीविज़न का इतिहास


रेडियो के इतिहास पर निगाह डालें तो 1896 में इलेक्ट्रिकल इंजिनियर गुगलियेल्मो मार्कोनी ने पहली बार विद्युत चुंबकीय तरंगो द्वारा दो मील की दूरी तक एक सन्देश भेजने में सफलता प्राप्त की थी, लिहाजा रेडियो के विकास में उनका नाम शुरुवात में लिया जाता है। उन्हें 2 जून 1896 को उन्हें वायरलेस का पेटेंट मिला। आगे उन्होंने ही 1919 में चेम्बर्सफोर्ड में पहला रेडियो प्रसारण का ट्रांसमीटर भी स्थापित किया था।

old-phoneमनुष्य में अपनी आवाज को दूर तक पहुँचाने की चाह न जाने कब से रही है, और न जाने कब से लोग, बच्चे माचिस की डिब्बियों से धागा बांधकर आवाज को अधिक दूर पहुँचाने के लिए वॉकी-टोकी बनाने जैसे प्रयोग करते रहे हैं, अलबत्ता करीब 1200 वर्ष पूर्व नौवीं शताब्दी में पेरू के चान-चान के खंडहरों से ऐसे ‘चामू डिवाइस’ कहे जा रहे प्रयोग (जिसे दुनिया का सबसे पुराने फोन की संज्ञा दी गयी है) मिले भी हैं। इसके आगे 1439 में खोजे जा चुके छापेखानों से प्रकाशित हो रहे समाचार पत्रों के लिए दूर के समाचार प्राप्त करने की समस्या को दूर करने के लिए वैज्ञानिक आज से करीब दो शताब्दी पूर्व यानी 19वीं शताब्दी से पूर्व ही विद्युत् की शक्ति से समाचारों-संदेशों को दूर भेजने के प्रयास करने लगे थे। और रेडियो के आविष्कार की कहानी मूलतः ‘टेलीग्राफ’ के आविष्कार से शुरू हुई थी।

सर्वप्रथम 1753 में स्कॉटलैंड के वैज्ञानिक डा. माडीसन ने तार से एक से दूसरे स्थान पर खबरें भेजने के प्रयास शुरू किये, जबकि 1838 में ब्रिटिश वैज्ञानिक रोनाल्ड ने तार से ख़बरें भेजने को संभव कर दिखाया। अलबत्ता तारयन्त्र का आविष्कार अमेरिकी वैज्ञानिक सैमुअल एफबी मार्श ने 1844 में वाशिंगटन और वौल्टीमोर के बीच तार से ख़बरें भेजकर सार्वजनिक प्रदर्शन करते हुए किया।

कहते हैं कि मारकोनी से पहले जगदीश चन्द्र बसु/बोस ने भारत में भी इसमें सफलता प्राप्त कर ली थी। (वे भारत के पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने एक अमरीकन पेटेंट प्राप्त किया। उन्हें रेडियो विज्ञान का पिता माना जाता है। इन्होंने बेतार के संकेत भेजने में असाधारण प्रगति की और सबसे पहले रेडियो संदेशों को पकड़ने के लिए अर्धचालकों का प्रयोग करना शुरु किया। लेकिन अपनी खोजों से व्यावसायिक लाभ उठाने की जगह इन्होंने इन्हें सार्वजनिक रूप से प्रकाशित कर दिया ताकि अन्य शोधकर्त्ता इन पर आगे काम कर सकें। 1893 में, निकोला टेस्ला ने पहले सार्वजनिक रेडियो संचार का प्रदर्शन किया। एक साल बाद, कोलकाता में नवम्बर 1894  (या 1895) में एक सार्वजनिक प्रदर्शन के दौरान बोस ने एक मिलीमीटर रेंज की माइक्रोवेव तरंग का उपयोग काफी दूरी पर बारूद प्रज्वलित करने और घंटी बजाने में किया। उन्होंने एक बंगाली निबंध, ‘अदृश्य आलोक’ में लिखा था, “अदृश्य प्रकाश आसानी से ईंट की दीवारों, भवनों आदि के भीतर से जा सकती है, इसलिए तार की बिना प्रकाश के माध्यम से संदेश संचारित हो सकता है।” कहते हैं की बसु/बोस ने बोस (BOSE) नाम की एक कम्पनी भी स्थापित की थी, जो वर्तमान में ऑडियो सिस्टम व स्पीकर्स आदि की एक नामी अमेरिकी कम्पनी है। आगे रूस में पोपोव ने भी ऐसा ही एक प्रयोग किया।) 

आगे एक से अधिक व्यक्तियों को एक साथ संदेश भेजने या ब्रॉडकास्टिंग की शुरुआत 24 दिसम्बर 1906 की शाम कनाडाई वैज्ञानिक रेगिनाल्ड फेसेंडेन ने की। उन्होंने अपना वॉयलिन बजाया जिसके संगीत को अटलांटिक महासागर में तैर रहे तमाम जहाजों के रेडियो ऑपरेटरों ने अपने रेडियो सेट पर सुना, वह दुनिया में रेडियो प्रसारण की शुरुआत थी।

इस दौरान प्रथम विश्व युद्ध की वजह से रेडियो स्टेशन पर प्रतिबन्ध भी लगते रहे। 1917 में प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत के बाद किसी भी गैर फौज़ी के लिये रेडियो का प्रयोग निषिद्ध कर दिया गया।

आगे ‘ली द फोरेस्ट’ और ‘चार्ल्स हेरॉल्ड’ आदि ने रेडियो प्रसारण के प्रयोग करने शुरु किए। तब तक रेडियो का प्रयोग सिर्फ नौसेना तक ही सीमित था। 1918 में ली द फोरेस्ट ने न्यू यॉर्क के हाईब्रिज इलाके में दुनिया का पहला रेडियो स्टेशन शुरु किया। पर कुछ दिनों बाद ही पुलिस को ख़बर लग गई और रेडियो स्टेशन बंद करा दिया गया। एक साल बाद ली द फोरेस्ट ने 1919 में सैन फ्रैंसिस्को में एक और रेडियो स्टेशन शुरु कर दिया।

नवंबर 1920 में नौसेना के रेडियो विभाग में काम कर चुके फ्रैंक कॉनार्ड को दुनिया में पहली बार क़ानूनी तौर पर रेडियो स्टेशन शुरु करने की अनुमति मिली।

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान रेडियो का वास्तविक विकास हुआ और 1920 में अमेरिका ने रेडियो पर संगीत कार्यक्रमों का मजा लेना शुरू कर दिया था। 1921 में यूरोप में रेडियो प्रसारण शुरू हो गया। कुछ ही सालों में देखते ही देखते दुनिया भर में सैकड़ों रेडियो स्टेशनों ने काम करना शुरु कर दिया। 1923 के मध्य तक अमेरिका में करीब 450 रेडियो स्टेशन स्थापित हो चुके थे।

रेडियो में विज्ञापन की शुरुआत 1923 में हुई। इसके बाद ब्रिटेन में बीबीसी और अमरीका में सीबीएस और एनबीसी जैसे सरकारी रेडियो स्टेशनों की शुरुआत हुई।

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भारत में रेडियो:

  • रेडियो को भारत आने में अधिक समय नहीं लगा। यहाँ पहली बार रेडियो का प्रसारण 1923 में पहले कोलकाता के एक क्लब द्वारा और फिर जून, 1923 में टाइम्स ऑफ़ इंडिया व डाक व तार विभाग के संयुक्त प्रयास से मुंबई के एक रेडियो क्लब द्वारा किया गया। आगे 31 जुलाई 1924 को मद्रास प्रेसीडेंसी रेडियो क्लब अपने सदस्यों के लिए हलके-फुल्के मनोरंजक कार्यक्रम प्रस्तुत करने लगा। इसके बाद 1 मार्च 1926 में एक एग्रीमेंट के तहत ‘इंडियन ब्रॉडकॉस्टिंग कंपनी’ को रेडियो स्टेशन शुरू करने अनुमति मिली।
  • लेकिन भारत में रेडियो की विधिवत शुरुआत 23 जुलाई, 1927 से मानी जाती है, जब मुंबई में पहले रेडियो स्टेशन का तत्कालीन वाईसरॉय लार्ड इरविन ने उद्घाटन किया। इसी क्रम में 26 अगस्त, 1927 को कोलकाता स्टेशन की शुरुवात हुई तथा आगे और भी कई रेडियो क्लबों की शुरुआत हुई। 
  • 1930 में इंडियन ब्रॉडकॉस्टिंग कंपनी दिवालिया हो गई, इस कारण सरकार ने इसे अपने नियंत्रण में ले लिया और ‘भारतीय प्रसारण सेवा’ (इन्डियन स्टेट ब्राडकास्टिंग सर्विस-ISBS) के नाम से उन्‍हें परिचालित करना आरंभ कर दिया। 5 मई 1932 को इसे सुचारू तरीके से चलाने के लिए ‘इन्डियन वायरलेस टेलीग्राफी एक्ट’ लागू किया।
  • आगे आठ जून 1936 को इसका नाम बदलकर ‘ऑल इंडिया रेडियो’ (AIR) कर दिया गया। धीरे-धीरे करके भारत के प्रमुख शहरों में रेडियो केंद्र खोले गये। 1936 से ही देश में दैनिक समाचार बुलेटिनों का प्रसारण प्रारंभ हुआ।
  • 1936 में दिल्ली, 1937 में पेशावर और लाहौर, 1938 में लखनऊ और मद्रास आदि नये केंद्र खोले गये। इस तरह रेडियो के केंद्रों को एक-एक कर बढ़ाया गया और साथ साथ कुछ और बदलाव होते रहे। 
  • 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध की शुरुआत होने पर देश में रेडियो के सारे लाइसेंस रद्द कर दिए गए और ट्रांसमीटरों को सरकार के पास जमा करने के आदेश दे दिए गए।
  • कांग्रेस के कुछ नेताओं के अनुरोध पर रेडियो इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त बॉम्बे टेक्निकल इंस्टीट्यूट बायकुला के प्रिंसिपल नरीमन प्रिंटर ने लाइसेंस रद्द होने की ख़बर सुनते ही उन्होंने अपने रेडियो ट्रांसमीटर को खोल दिया और उसके पुर्जे अलग-अलग जगह पर छुपा दिए। पहला ट्रांसमीटर 10 किलोवाट का था जिसे शीघ्र ही नरीमन प्रिंटर ने और सामान जोड़कर सौ किलोवाट का कर दिया। अंग्रेज़ पुलिस की नज़र से बचने के लिए ट्रांसमीटर को तीन महीने के भीतर ही सात अलग अलग स्थानों पर ले जाया गया। माइक जैसे कुछ सामान की कमी थी जो शिकागो रेडियो के मालिक नानक मोटवानी की दुकान से मिल गई और मुंबई के चौपाटी इलाक़े के सी व्यू बिल्डिंग से 14 या 27 अगस्त 1942 से उषा मेहता ने नरीमन प्रिंटर व अन्य लोगों ने ‘नेशनल कांग्रेस रेडियो’ का प्रसारण शुरु किया। इस रेडियो से अपने पहले प्रसारण में उद्घोषक उषा मेहता ने कहा, “41.78 मीटर पर एक अनजान जगह से यह नेशनल कांग्रेस रेडियो है।” (उल्लेखनीय है कि यह ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का दौर था। इस दौरान ही गांधी जी समेत तमाम नेता 9 अगस्त 1942 को गिरफ़्तार कर लिए गए थे और प्रेस पर पाबंदी लगा दी गई थी ।)
  • ‘नेशनल कांग्रेस रेडियो’ लगभग हर दिन अपनी जगह बदलता था, ताकि अंग्रेज अधिकारी उसे पकड़ न सकें। इस खुफिया रेडियो को डॉ॰ राममनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्धन सहित कई प्रमुख नेताओं ने सहयोग दिया। रेडियो पर महात्मा गांधी सहित देश के प्रमुख नेताओं के रिकार्ड किए गए संदेश बजाए जाते थे।  इस गुप्त रेडियो से अल्मोड़ा की कुंती देवी के भी जुड़े होने की बात कही जाती है। एक जगह जिक्र आता है कि कुंती देवी ने गुप्त रेडियो पर आजादी का जयघोष किया था। 
  • इस रेडियो ने  मेरठ में 300 सैनिकों के मारे जाने की ख़बर, कुछ महिलाओं के साथ अंग्रेज़ों के दुराचार जैसी ख़बरों का प्रसारण किया था जिसे समाचारपत्रों में सेंसर के कारण प्रकाशित नहीं किया गया था।
  • तीन माह तक प्रसारण के बाद अंतत: अंग्रेज सरकार ने 12 नवम्बर 1942 को नरीमन प्रिंटर और उषा मेहता को गिरफ़्तार कर लिया और नेशनल कांग्रेस रेडियो की कहानी यहीं ख़त्म हो गई।
  • इस दौरान ही नवंबर 1941 को सुभाष चंद्र बोस ने रेडियो जर्मनी से भारतवासियों के नाम संदेश भारत में रेडियो से सन्देश देते हुए कहा था, “तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा।”
  • इसके बाद 1942 में “आज़ाद हिंद रेडियो” की स्थापना जर्मनी से हुई, जो आगे सिंगापुर और बाद में रंगून से भारतीयों के लिये समाचार प्रसारित करता रहा।
  • 1946 में द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद AIR को सूचना व प्रसारण विभाग के अधीन कर दिया गया।
  • 1947 में आजादी के समय भारत में कुल 6 रेडियो स्टेशन मुम्बई, कोलकाता, दिल्ली, चेन्नई, लखनऊ और चंडीगढ़ काम कर रहे थे।
  • तीन अक्टूबर 1957 को विविध भारती का आगमन हुआ। वर्तमान में विविध भारती के 43 केन्द्र है।
  • 1957 से ऑल इंडिया रेडियो को आकाशवाणी  के नाम से भी पुकारा जाने लगा।
  • आज रेडियो स्टेशन की संख्या 200 से अधिक हो गयी है। इस समय रेडियो की पहुंच 92 फीसदी भारतीय भू भाग और 98 फीसदी भारतीय जनता तक है।
  • 1959 में टेलीविजन के शुरुआत होने के पहले तक भारत में रेडियो ही सबसे अधिक पहुंच वाला सर्वसुलभ जनमाध्यम था।
  • 1997 में आकाशवाणी को टेलीविज़न के साथ प्रसार भारती के अधीन कर दिया गया।

स्वतन्त्रता के पश्चात:

  • स्वतन्त्रता के पश्चात से 16 नवम्बर 2006 तक रेडियो केवल सरकार के अधिकार में था।
  • सरकारी संरक्षण में रेडियो का काफी प्रसार हुआ। 1947 में आकाशवाणी के पास छह रेडियो स्टेशन थे और उसकी पहुंच 11 प्रतिशत लोगों तक ही थी। आज आकाशवाणी के पास 223 रेडियो स्टेशन हैं और उसकी पहुंच 99.1 फ़ीसदी भारतीयों तक है।
  • टेलीविज़न के आगमन के बाद शहरों में रेडियो के श्रोता कम होते गए, पर एफएम रेडियो के आगमन के बाद अब शहरों में भी रेडियो के श्रोता बढ़ने लगे हैं। पर गैरसरकारी रेडियो में अब भी समाचार या समसामयिक विषयों की चर्चा पर पाबंदी है।
  • रेडियो का दुरुपयोग न हो इसलिए सरकार इसे चलाने की अनुमति आम जनता को नहीं देना चाहती थी। इस बीच आम जनता को रेडियो स्टेशन चलाने देने की अनुमति के लिए सरकार पर दबाव बढ़ता रहा है।
  • 1977 में एफएम रेडियो का सर्वप्रथम प्रसारण मद्रास रेडियो से, और दूसरा महत्वपूर्ण प्रसारण 1992 में जालंधर रेडियो स्टेशन से हुआ। 1993 से निजी कम्पनियों को लीज पर ‘टाइम स्लॉट’ देने की शुरुवात हुई। 15 अगस्त 1993 में देश में मुम्बई से एफएम चैनल की शुरुवात हुई।
  • 1995 में भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि रेडियो तरंगों पर सरकार का एकाधिकार नहीं है। वर्ष 2002 में एनडीए सरकार ने शिक्षण संस्थाओं को कैंपस रेडियो स्टेशन खोलने की अनुमति दी। 16 नवम्बर 2006 को यूपीए सरकार ने स्वयंसेवी संस्थाओं को रेडियो स्टेशन खोलने की इज़ाज़त दी है।
  • इन रेडियो स्टेशनों में भी समाचार या समसामयिक विषयों की चर्चा पर पाबंदी है, पर इसे रेडियो जैसे जन माध्यम के लोकतंत्रीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण क़दम माना जा रहा है।

आकाशवाणी या ऑल इंडिया रेडियो :

आकाशवाणी या ऑल इंडिया रेडियो भारत की वर्तमान में 419 रेडियो स्टेशनों से युक्त एवं 92.00% क्षेत्रफल व 99.20% आबादी तक पहुँच रखने वाली सरकारी रेडियो सेवा है। भारत में रेडियो प्रसारण की शुरूआत 1920 के दशक में हुई। पहला कार्यक्रम 1923 में मुंबई के रेडियो क्‍लब द्वारा प्रसारित किया गया। इसके बाद 1927 में मुंबई और कोलकाता में निजी स्‍वामित्‍व वाले दो ट्रांसमीटरों से प्रसारण सेवा की स्‍थापना हुई। सन् 1930 में सरकार ने इन ट्रांसमीटरों को अपने नियंत्रण में ले लिया और भारतीय प्रसारण सेवा के नाम से उन्‍हें परिचालित करना आरंभ कर दिया। 1936 में इसका नाम बदलकर ऑल इंडिया रेडियो कर दिया और 1957 में आकाशवाणी के नाम से पुकारा जाने लगा।

आकाशवाणी का महानिदेशालय प्रसार भारती के तहत प्रसार भारती अधिनियम, 1990 के नियमों से कार्य करता है। इसके कार्यपालक सदस्‍य निगम के मुख्‍य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) के रूप में मंडल के नियंत्रण और पर्यवेक्षण हेतु कार्य करते हैं। सीईओ, सदस्‍य (वित्त) और सदस्‍य, (कार्मिक) प्रसार भारती मुख्‍यालय, द्वितीय तल, पीटीआई भवन, संसद मार्ग, नई दिल्‍ली-110001 से अपने कार्यों का निष्‍पादन करते हैं।

वित्त, प्रशासन और कार्मिकों से संबंधित सभी महत्‍वपूर्ण नीतिगत मामले सीईओ के पास भेजे जाते हैं और आवश्‍यकतानुसार सदस्‍य (वित्त) और सदस्‍य (कार्मिक) के माध्‍यम से मंडल को भेजे जाते हैं, ताकि सलाह, प्रस्‍तावों का कार्यान्‍वयन और उन पर निर्णय लिए जा सके। प्रसार भारती सचिवालय में कार्यरत विभिन्‍न विषयों के अधिकारी सीईओ, सदस्‍य (वित्त) और सदस्‍य (कार्मिक) को कार्रवाई, प्रचालन, योजना और नीति कार्यान्‍वयन के समेकन में सहायता देते हैं और साथ ही निगम के बजट, लेखा और सामान्‍य वित्तीय मामलों की देखभाल करते हैं। प्रसार भारती में मुख्‍य सतर्कता अधिकारी के नेतृत्‍व में मुख्‍यालय के एक एकीकृत सतर्कता व्‍यवस्‍था भी है।

आकाशवाणी के महानिदेशालय का नेतृत्‍व महानिदेशक करते हैं। वे सीईओ सदस्‍य (वित्त) और सदस्‍य (कार्मिक) के सहयोग से आकाशवाणी के दैनिक मामलों का निपटान करते हैं। आकाशवाणी में मोटे तौर पर पांच अलग अलग विंग हैं जो विशिष्‍ट गतिविधियों के लिए उत्तरदायी हैं जैसे कार्यक्रम, अभियांत्रिकी, प्रशासन, वित्त और समाचार।

समाचार सेवा प्रभाग 24 घण्‍टे कार्य करता है और यह स्‍वदेशी तथा बाह्य सेवाओं में 500 से अधिक समाचार बुलेटिन का प्रसारण करता है। ये बुलेटिन भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में होते हैं। इसका नेतृत्‍व महानिदेशक, समाचार सेवा करते हैं। यहां 44 क्षेत्रीय समाचार इकाइयां हैं।

समाचार सेवा प्रभाग के प्रसारणों को मोटे तौर पर समाचार बुलेटिन और ताजा मामलों के कार्यक्रमों में बांटा जा सकता है। इसमें नई दिल्‍ली स्थिति मुख्‍यालय से 52 घण्‍टों से अधिक की अवधि के लिए 82 भाषाओं/बोलियों (भारतीय और विदेशी) में 500 से अधिक समाचार बुलेटिन और देश भर में 44 क्षेत्रीय समाचार इकाइयों द्वारा प्रसारण किया जाता है। ये समाचार बुलेटिन प्राथमिक, एफएम और आकाशवाणी के डीटीएच चैनलों पर प्रसारित किए जाते हैं। इस समाचार प्रसारण में भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल 22 आधिकारिक भाषाओं और 18 विदेशी भाषाओं के अलावा अन्‍य भाषाओं/बोलियों में किया जाने वाला प्रसारण शामिल है। घरेलू सेवा में दिल्‍ली से 89 समाचार बुलेटिन प्रसारित किए जाते हैं। ये समाचार बुलेटिन एफएम गोल्‍ड पर प्रत्‍येक घण्‍टे प्रसारित किए जाते हैं। क्षेत्रीय समाचार इकाइयों द्वारा प्राथमिक चैनल, एफएम और विदेशी सेवा पर प्रतिदिन 67 भाषाओं/बोलियों में 355 से अधिक समाचार बुलेटिन प्रसारित किए जाते हैं। एनएसडी और इसके आरएनयू द्वारा प्रसारण कुल 9 घण्‍टे की अवधि के लिए 26 भाषाओं (भारतीय और विदेशी) में 66 समाचार बुलेटिन एवं विदेशी सेवाओं का 13 मिनट का प्रसारण किया जाता है।

आकाशवाणी का विदेशी सेवा प्रभाग वॉइस ऑफ द नेशन के रूप में भारत के विषय में दुनिया के लिए एक विश्‍वसनीय समाचार स्रोत है। दुनिया में भारत के बढ़ते महत्‍व को देखते हुए आने वाले समय में विदेशी प्रसारण के लिए इसकी एक महत्‍वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। आकाशवाणी का विदेशी सेवा प्रभाग 16 विदेशी भाषाओं और 11 भारतीय भाषाओं में एक दिन में लगभग 100 से अधिक देशों में 72 घण्‍टे की अवधि का प्रसारण करता है।

आकाशवाणी विदेश सेवा प्रभाग का विश्‍व के विदेशी रेडियो नेटवर्क में ऊंचा स्‍थान है। यह 100 देशों के लिए 27 भाषाओं जिनमें 16 विदेशी तथा 11 भारतीय हैं, में रोजाना 70 घंटे 30 मिनट का प्रसारण करता है। आकाशावाणी अपने विदेशी प्रसारणों से विदेशी श्रोताओं को खुले समाज के रूप में भारत के विचारों और उपलब्धियों को उजागर कर भारत के संस्‍कार और भारतीय वस्‍तुओं से जोड़े रखता है।

विदेशी भाषाएं हैं: अरबी (3 घंटे 15 मिनट) बलूची (1 घंटा) बर्मी (1 घंटा मिनट) चीनी (1 घंटा 30 मिनट) दारी (i घंटा 45 मिनट) फ्रेंच (45 मिनट) इंडोशियन (1 घंटा) नेपाली (4 घंटे) फारसी (1 घंटा 45 मिनट) (पुश्‍तू (2 घंटे) रूसी (1 घंटा) सिंहला (2 घंटे 30 मिनट. स्‍वाहिली (1 घंटा) थाई (45 मिनट) तिब्‍बती (1 घंटे 15 मिनट) और अंग्रेजी (जीओएस) (8 घंटे 15 मिनट)

भारतीय भाषाएं हैं – हिन्‍दी (5 घंटे 15 मिनट), तमिल (5 घंटे 30 मिनट), तेलुगु (30 मिनट), बंगाली (6 घंटे 30 मिनट), गुजराती (30 मिनट), पंजाबी (2 घंटे), सिंधी (3 घंटे 36 मिनट), उर्दू (12 घंटे 15 मिनट), सरायकी (30 मिनट), मलयालम (1 घंटा), कन्‍नड़ (1 घंटा) यह प्रसारण मिश्रित भागीदारों के लिए किया जाता है और आम तौर पर इसमें समाचार बुलेटिन, कमेंटरी, ताजा मामले और भारतीय प्रेस की समीक्षा को शामिल किया जाता है। न्‍यूज़ रील पत्रिका कार्यक्रम के अलावा खेल और साहित्‍य पर कार्यक्रम, वार्ताएं और सामाजिक – आर्थिक, राजनैतिक, ऐतिहासिक, वैज्ञानिक और सांस्‍कृतिक विषयों पर चर्चाएं, विकास संबंधी गतिविधियों पर कार्यक्रम, महत्‍वपूर्ण आयोजन और संस्‍थान, भारत के विविध क्षेत्रों से लोक और आधुनिक संगीत संपूर्ण कार्यक्रम प्रसारण का बड़ा हिस्‍सा बनाते हैं।

यहां 40 विविध भारतीय और वाणिज्यिक प्रसारण सेवा (सीबीएस) केन्‍द्रों के साथ 3 विशिष्‍ट वीबी केन्‍द्र हैं। सीबीएस से संबंधित कार्य दो विंग में किया जाता है अर्थात बिक्री और निर्माण। केन्‍द्रीय बिक्री इकाई के नाम से ज्ञात एक पृथक स्‍वतंत्र कार्यालय 15 मुख्‍य सीबीएस केन्‍द्रों के साथ प्रसारण समय के विपणन की देखभाल करता है। वाराणसी और कोच्चि में दो और विविध भारती केन्‍द्र हैं।

वर्तमान में 231 रेडियो स्‍टेशन हैं। इनमें से प्रत्‍येक रेडियो स्‍टेशन आकाशवाणी के अधीनस्‍थ कार्यालय के रूप में कार्य करता है। आकाशवाणी की विदेश, स्‍वदेशी और समाचार सेवाओं के प्रसारण के लिए 8 बृहत वायवीय प्रणालियों सहित शॉर्ट वेव/मीडियम वेव ट्रांसमीटर के साथ सज्जित उच्‍च शक्ति वाले ट्रांसमीटर हैं। इन केन्‍द्रों का मुख्‍य कार्य आस पास के स्‍टेशनों पर बनाए गए कार्यक्रमों का प्रसारण करना साथ ही दिल्‍ली के स्‍टूडियो से प्रसारण करना है। वर्तमान में आकाशवाणी दुनिया के सबसे बड़े प्रसारण नेटवर्कों में से एक बन गया है। स्‍वतंत्रता के समय भारत में 6 रेडियो स्‍टेशन और 18 ट्रांसमीटर थे, जिनसे 11% आबादी और देश का 2.5 % भाग कवर होता है। दिसम्‍बर, 2007 इस नेटवर्क में 231 स्‍टेशन और 373 ट्रांसमीटर हैं जो देश की 99.14% आबादी और 91.79% क्षेत्रफल तक पहुंचता है। जबकि अब श्रोता हिंदी और अंग्रेजी में अपने टेलीफोन पर आकाशवाणी की समाचार झलकें केवल एक विशिष्‍ट नंबर को डायल करके सुन सकते हैं, यह सेवा दुनिया के किसी भी भाग में और किसी भी समय उपलब्‍ध है। आकाशवाणी की न्‍यूज ऑन फोन सर्विस वर्तमान में 14 स्‍थानों पर कार्यरत है, जो हैं दिल्‍ली, मुम्‍बई, चेन्‍नई, पटना, हैदराबाद, अहमदाबाद, जयपुर, बैंगलोर, तिरुवनंतपुरम, इम्‍फाल, लखनऊ, शिमला, गुवाहाटी और रायपुर। यह कोलकाता में भी कार्यान्‍वयन अधीन है।

आकाशवाणी में परामर्श और प्रसारण के क्षेत्र में संपूर्ण समाधान प्रदान करने के लिए इसकी एक वाणिज्यिक शाखा के रूप में ‘आकाशवाणी संसाधन’ को आरंभ किया गया। इसकी वर्तमान गतिविधियों में निम्‍नलिखित शामिल है।

आकाशवाणी इंदिरा गांधी मुक्‍त राष्‍ट्रीय विश्‍वविद्यालय को उनके 26 ज्ञान वाणी स्‍टेशनों के एफएम ट्रांसमीटरों हेतु देश के 40 स्‍थानों पर संपूर्ण समाधान प्रदान करता है।

टेलीविज़न का इतिहास :

आज हमारी जिंदगी का अभिन्न हिस्सा-टेलीविजन ग्रीक प्रीफिक्स ‘टेले’ और लैटिन वर्ड ‘विजिओ’ से मिल कर बना है। टेलीविजन के आविष्कार श्रेय जॉन लोगी बेयर्ड को दिया जाता है, जिन्होंने 1925 में लंदन में अपनी खोज का प्रदर्शन किया था। जॉन लोगी बेयर्ड बचपन के दिनों में बीमार रहा करते थे, इसलिए स्कूल नहीं जा पाते थे। 13 अगस्त 1888 को स्कॉटलैंड में पैदा हुए बेयर्ड के मन में बचपन से ही काल्पनिक टेलीफोन ऐसे घर कर बैठा था कि 12 वर्ष की उम्र में यानी वर्ष 1900 में उन्होंने खुद ही अपना टेलीफोन बना लिया। साथ ही बेयर्ड यह भी सोचा करते थे कि एक दिन ऐसा भी आएगा, जब लोग हवा के माध्यम से तस्वीरें भेज सकेंगे। बेयर्ड ने वर्ष 1924 में बक्से, बिस्कुट के टिन, सिलाई की सूई, कार्ड और बिजली के पंखे से मोटर का इस्तेमाल कर पहला टेलीविजन बनाया था।

इसके बाद दुनिया के पहले वर्किग टेलीविजन का निर्माण 1927 में फिलो फा‌र्न्सवर्थ ने किया था, जिसे 1 सितंबर 1928 को प्रेस के सामने पेश किया गया। आगे बेयर्ड ने ही कलर टेलीविजन का आविष्कार 1928 में किया था, जिसकी पब्लिक ब्रॉडकास्टिंग 1940 में हुई थी, और इसे लोगों ने 60 के दशक में अपनाना शुरू कर दिया था।

  • हालांकि टेलीविज़न को बनाने पर कार्य 1830 से शुरू हो गया था, जब ग्राहम बेल और थॉमस एडिसन ने आवाज और फोटो को ट्रांसफर करके दिखाया था। इसके बाद पॉल निप्को रोटेटिंग डिस्क से मैकेनिकल स्कैनर बनाने वाले पहले व्यक्ति थे। जिससे मैकेनिकल टीवी का आविष्कार संभव हो पाया।
  • शुरुआती दौर में टेलीविजन के आविष्कार में पोल निप्कोओ, बोरिस रोसिंग, व्लादिमीर ज्वोर्किन, जॉन लोगी बेयर्ड, फिलो फर्नसवॉर्थ, चा‌र्ल्स फ्रांसिस जेनकिंस और विलियम बेल आदि की भी प्रमुख भूमिका रही।
  • वर्ष 1831 में जोसेफ हेनरी और माइकल फैराडे ने इलेक्ट्रॉनिक क्षेत्र में विद्युत की खोज की। इसके अलावा 1897 में मारकोनी ने वायरलेस के बाद टेलीग्राफ का भी सफल आविष्कार किया, जिसकी मदद से किसी भी तरह की छवियों और ध्वनियों को बिना तार के एक से दूसरे स्थान पर भेजा जा सकता था।

    फोटोग्राफी : इस बीच 1839 में कैमरे से स्थिर फोटो खींचने का भी आविष्कार हो गया। फ्रांसीसी वैज्ञानिक लुईस जेकस तथा मेंडे डाग्युरे ने इसी वर्ष फोटो तत्व को खोजने का दावा किया था। इसी वर्ष फ्रांसीसी वैज्ञानिक आर्गो द्वारा 9 जनवरी 1839 को फ्रेंच अकादमी ऑफ साइंस के लिए तैयार की गयी “डाग्युरे टाइप प्रोसेस” रिपोर्ट को फ्रांस सरकार ने खरीदकर उसे आम लोगों के लिए 19 अगस्त 1939 को फ्री घोषित किया, और इस आविष्कार को ‘विश्व को मुफ्त’ मुहैया कराते हुए इसका पेटेंट खरीदा था। यही कारण है कि 19 अगस्त को विश्व फोटोग्राफी दिवस मनाया जाता है। हालांकि इससे पूर्व 1826 में नाइसफोर ने हेलियोग्राफी के तौर पर पहले ज्ञात स्थायी इमेज को कैद किया था, और ब्रिटिश वैज्ञानिक विलियम हेनरी फॉक्सटेल बोट ने नेगेटिव-पॉजीटिव प्रोसेस ढूँढ लिया था। 1834 में टेल बॉट ने लाइट सेंसेटिव पेपर का आविष्कार किया जिससे खींचे चित्र को स्थायी रूप में रखने की सुविधा प्राप्त हुई। 1839 में ही वैज्ञानिक सर जॉन एफ डब्ल्यू हश्रेल ने पहली बार ‘फोटोग्राफी’ शब्द का इस्तेमाल किया था।

  • आगे जर्मन तकनीशियन और आविष्कारक पॉल निप्कोओ वर्ष 1884 में पहली बार 18 हॉरिजेंटल लाइनों से स्थिर चित्रों को अन्यत्र भेजने में कामयाब रहे। इसके बाद उनके द्वारा बनाई गई ‘इलेक्ट्रिक टेलीस्कोप’ जल्दी ही भविष्य के कई मैकेनिकल टेलीविजन डिजाइन के आधार बनी।
  • वर्ष 1900 में पेरिस में हुए ‘व‌र्ल्ड फेयर’ के पहले ‘इंटरनेशनल कांग्रेस ऑफ इलेक्ट्रिसिटी’ में रूस के वैज्ञानिक कॉन्सटेंटिन पर्सकेई ने पहली बार ‘टेलीविजन’ शब्द का इस्तेमाल किया।
  • आगे 1924-26 में स्कॉटलैंड के इंजीनियर चा‌र्ल्स फ्रांसिस जेनकिंस और जॉन लोगी बेयर्ड ‘इमेज ट्रांसमिटेड मैथड’ यानी चित्रों को यांत्रिक और इलेक्ट्रिकल दोनों रूपों में प्रदर्शित करने में सफल रहे थे।
  • पहली बार 1927 में फिलो फा‌र्न्सवर्थ ने अपने इलेक्ट्रॉनिक टेलीविजन सिस्टम का पेटेंट करवाया था।
  • अमेरिका में टीवी का लाइसेंस पहली बार 1928 में चा‌र्ल्स फ्रांसिस जेनकिंस को दिया गया। चार्ल्स ने मोशन पिक्चर प्रोजेक्टर और टेलीविजन पर काफी काम किया। 1928 में उन्होंने जेनकिंस टेलीविजन कॉरपोरेशन खोला, जहां से यूएस में W3XK नाम से पहला टेलीविजन ब्रॉडकास्ट 2 जुलाई 1928 को ऑन एयर किया गया था। यानी पहले अमेरिकी टेलीविजन स्टेशन ने वर्ष 1928 में काम शुरू किया था। चा‌र्ल्स ने पहला कॉमर्शियल टेलीविजन कार्यक्रम भी वर्ष 1930 में प्रसारित किया था। बीबीसी का प्रसारण भी 1930 में शुरू हुआ था।
  • पहला टीवी सैटेलाइट ‘टेलस्टार’ एटीएेंडटी द्वारा 1962 में लॉन्च किया गया।
  • वर्ष 1969 में 600 मिलियन लोगों ने चंद्रमा पर पहले मानव लैंडिंग का लाइव प्रसारण देखा।
  • सोनी कंपनी ने पहली बार 1967 में होम वीडियो सिस्टम पेश किया।
  • 1981 में पहली बार जापानी टीवी कंपनी एनएचके ने एचडी (हाई डेफिनिशन) टेलीविजन (1125 लाइन ऑफ हॉरिजेंटल रिजॉल्यूशन) पेश किया।

रिमोट से टीवी :टेलीविजन के रिमोट कंट्रोल का आविष्कार यूजीन पोली ने किया था। यूजीन पोली का जन्म 1915 में शिकागो में हुआ था। वे जेनिथ इलेक्ट्रॉनिक में काम करते थे। वर्ष 1955 में उन्होंने फ्लैश मैटिक का आविष्कार किया था।

दूरदर्शन का इतिहास :

 भारत में सर्वप्रथम टेलीविजन प्रसारण की शुरुआत 15 सितम्बर, 1959 को प्रयोगात्‍मक आधार पर आधे घण्‍टे के लिए शैक्षिक और विकास कार्यक्रमों के रूप में दिल्ली में दूरदर्शन केन्द्र की स्थापना के साथ हुआ।  उस समय दूरदर्शन का प्रसारण सप्ताह में सिर्फ तीन दिन आधा-आधा घंटे होता था। तब इसको ‘टेलीविजन इंडिया’ नाम दिया गया था। शुरुआती दिनों में दूरदर्शन यानी टीवी दिल्ली और आसपास के कुछ क्षेत्रों में ही देखा जाता था। पूरे दिल्ली में 18 टेलीविजन सेट और एक बड़ा ट्रांसमीटर ही था। तब दिल्ली में लोग इसको कुतुहल और आश्चर्य के साथ देखते थे। इसके बाद दूरदर्शन ने धीरे धीरे अपने पैर पसारे और दिल्‍ली (1965), मुम्‍बई (1972), अमृतसर (1972) कोलकाता (1975), चेन्‍नई (1975) में इसके प्रसारण की शुरुआत हुई। 1975 तक भारत के केवल सात शहरों में ही टेलीविजन की सेवा शुरू हो पाई थी।1975 में ही इसका हिन्दी नामकरण ‘दूरदर्शन’ नाम से किया गया। दूरदर्शन नाम इतना लोकप्रिय हुआ कि टीवी का हिंदी पर्याय बन गया। आगे दूरदर्शन को देश भर के शहरों में पहुँचाने की शुरुआत 80 के दशक में हुई और इसकी वजह 1982 में दिल्ली में आयोजित किए जाने वाले एशियाई खेल थे। भारत में कलर टीवी और राष्ट्रीय प्रसारण की शुरुआत 1982 में हुई। एशियाई खेलों के दिल्ली में होने का एक लाभ यह संभव हुआ।

फिर दूरदर्शन पर शुरु हुआ पारिवारिक कार्यक्रम हम लोग जिसने लोकप्रियता के तमाम रेकॉर्ड तोड़ दिए। 1984 में देश के गाँव-गाँव में दूरदर्शन पहुँचाने के लिए देश में लगभग हर दिन एक ट्रांसमीटर लगाया गया। इसके बाद आया भारत और पाकिस्तान के विभाजन की कहानी पर बना बुनियाद जिसने विभाजन की त्रासदी को उस दौर की पीढ़ी से परिचित कराया। इस धारावाहिक के सभी किरदार आलोक नाथ (मास्टर जी), अनीता कंवर (लाजो जी), विनोद नागपाल, दिव्या सेठ घर घर में लोकप्रिय हो चुके थे। फिर तो एक के बाद एक बेहतरीन और शानदार धारवाहिकों ने दूरदर्शन को घर घर में पहचान दे दी। दूरदर्शन पर 1980 के दशक में प्रसारित होने वाले मालगुडी डेज़, ये जो है जिन्दगी, रजनी, ही मैन, वाहः जनाब, तमस, बुधवार और शुक्रवार को 8 बजे दिखाया जाने वाला फिल्मी गानों पर आधारित चित्रहार, भारत एक खोज, व्योमकेश बक्शी, विक्रम बेताल, टर्निंग प्वाइंट, अलिफ लैला, शाहरुख़ खान का फौजी, रामायण, महाभारत, देख भाई देख ने देश भर में अपना एक खास दर्शक वर्ग ही नहीं तैयार कर लिया था बल्कि गैर हिन्दी भाषी राज्यों में भी इन धारवाहिकों को ज़बर्दस्त लोकप्रियता मिली।

रामायण और महाभारत जैसे धार्मिक धारावाहिकों ने तो सफलता के तमाम कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए थे, 1986 में शुरु हुए रामायण और इसके बाद शुरु हुए महाभारत के प्रसारण के दौरान रविवार को सुबह देश भर की सड़कों पर कर्फ्यू जैसा सन्नाटा पसर जाता था और लोग अपने महत्वपूर्ण कार्यक्रमों से लेकर अपनी यात्रा तक इस समय पर नहीं करते थे। रामायण की लोकप्रियता का आलम तो ये था कि लोग अपने घरों को साफ-सुथरा करके अगरबत्ती और दीपक जलाकर रामायण का इंतजार करते थे और एपिसोड के खत्म होने पर बकायदा प्रसाद बाँटी जाती थी।

वर्तमान में दूरदर्शन की पहुँच 86% लोगों तक है जो इसके माध्यम से अपना मनोरंजन करते हैं।

दूरदर्शन की यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव :

  • (9 अगस्‍त 1984) दिल्‍ली , मुम्‍बई (1 मई 1985), चेन्‍नई (19 नवम्‍बर 1987), कोलकात्ता (1 जुलाई 1988)
  • 26 जनवरी 1993: मेट्रो चैनल शुरू करने के लिए एक दूसरे चैनल की नेटवर्किंग
  • 14 मार्च 1995: अंतर्राष्‍ट्रीय चैनल डीडी इंडिया की शुरूआत
  • 23 नवम्‍बर 1997 : प्रसार भारती का गठन (भारतीय प्रसारण निगम)
  • 18 मार्च 1999: खेल चैनल डीडी स्‍पोर्ट्स की शुरूआत
  • 26 जनवरी 2002: संवर्धन/सांस्‍कृतिक चैनल की शुरूआत
  • 3 नवम्‍बर 2002 : 24 घण्‍टे के समाचार चैनल डीडी न्‍यूज की शुरूआत
  • 16 दिसम्‍बर 2004 : निशुल्‍क डीटीएच सेवा डीडी डाइरेक्‍ट की शुरूआत

    भारत में टेलीविजन पर हिंदी समाचार चैनलों की विकास यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव :

    Hindi News Channel in India

    • 15 सितम्बर, 1959 को भारत में सर्वप्रथम प्रयोगात्‍मक आधार पर आधे घण्‍टे के टेलीविजन प्रसारण की शुरुआत दूरदर्शन के दिल्ली केंद्र से।
    • 1965 में 15 अगस्त को पहले बुलेटिन का प्रसारण हुआ।
    • 1982 में देश में एशियाई खेलों के आयोजन के समय रंगीन टीवी प्रसारण और दूरदर्शन के ‘राष्ट्रीय प्रसारण’ की शुरुवात हुई।
    • 1984 में दूरदर्शन के दूसरे चैनल डीडी-मेट्रो की शुरुवात हुई।
    • 1988 में देश के पहले निजी मीडिया हाउस एनडीटीवी (New Delhi Television Limited) की स्थापना, नवंबर 1988 से डॉ. प्रणय रॉय की अगुवाई में ‘The World This Week’ (विश्वभारत) न्यूज़ मैगजीन दूरदर्शन पर शुरू।
    • 1 अक्टूबर 1992 को सुभाष चंद्रा ने स्टार ग्रुप के साथ भारत का पहला हिन्दी केबल चैनल ज़ी टीवी स्थापित और 2 अक्टूबर 1992 से शुरू किया।
    • 1992 से ही रजत शर्मा ने ज़ी टीवी से (अब इंडिया टीवी के) चर्चित टॉक शो ‘आपकी अदालत’ की शुरुआत की।
    • मार्च 1995 में स्टार ग्रुप को एक अमेरिकी कंपनी द्वारा खरीद लिये जाने पर सुभाष चंद्रा ने इंग्लैंड और 15 जुलाई 1998 में अमेरिका से ज़ी टीवी स्थापित किया।
    • ज़ी टीवी का समाचार चैनल ज़ी न्यूज 1995 में स्थापित हुआ।
    • 1995 में रजत शर्मा ने भारत के पहले निजी चैनल पर पहली बार न्यूज़ बुलेटिन शुरु करके एक तरह से इतिहास रच दिया।
    • 1995 से दूरदर्शन के मेट्रो चैनल पर टीवी टुडे का ‘आज तक’ कार्यक्रम प्रसारित होना शुरू हुआ। 
    • फ़रवरी 1998 में स्टार ग्रुप ने डॉ. प्रणय रॉय से हाथ मिलकर उन्हें कंटेंट उपलब्ध करना शुरू किया। इस तरह 18 फरवरी 1998 में ‘स्टार न्यूज़’ की शुरुवात हुयी, जो शुरुवात में हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओ में समाचार दिखाता था।
    • 1998 में इंडिया टीवी की स्वतंत्र न्यूज सर्विस के रूप में शुरुवात हुई ।
    • 1998 में पहले स्टार ग्रुप और फिर ज़ीटीवी ने पूरी तरह 24 घंटे के समाचार चैनल लेकर अपनी पारियां शुरु कीं
    • 2000 में सहारा टीवी की शुरुआत।
    • 31 दिसंबर 2000 को 24 घंटे के समाचार चैनल के रूप में वजूद में आया ‘आज तक’
    • 2002 -2003 में सहारा टीवी का समाचार के लिए अलग चैनल ‘सहारा समय’ नाम से शुरू।
    • फ़रवरी 2003 में स्टार ने एनडीटीवी से हाथ खींचकर अपने बलबूते समाचार चैनल उतारा और एनडीटीवी ने भी हिंदी और अंग्रेजी में 2 समाचार चैनल उतारे।
    • 3 नंवबर 2003 को मेट्रो चैनल के प्लेटफॉर्म पर ही 24 घंटे के समाचार चैनल ‘डीडी न्‍यूज’ की शुरूआत की गई।
    • 20 मई 2004 को इंडिया टीवी चैनल की शुरुवात
    • अप्रैल 2005 में मौजूदा न्यूज़ 18 इंडिया चैनल की चैनल 7 के नाम से शुरुआत।
    • 2005 में लांच किया गया आज तक का ‘तेज़’ चैनल। 
    • 15 अगस्त 2006 से चैनल-7 का नाम ‘आईबीएन-7’।
    • 1 जून 2012 से स्टार न्यूज़ चैनल-एबीपी न्यूज़ के रूप में काम करने लगा।

    भारत में टेलीविजन पर हिंदी समाचारों की शुरुआत और इसका विकास पत्रकारिता के स्वरूप में बदलाव का गवाह रहे हैं। देश में टेलीविजन की शुरुआत सूचना और शिक्षा के माध्यम के तौर पर शुरु हुई थी और 50 साल बीत जाने पर न सिर्फ अब ये संगीत के साथ समाचार देने वाला मनोरंजन युक्त समाचारों (इन्फोटेंमेन्ट) का न केवल बड़ा माध्यम, बल्कि बड़ा कारोबार भी बन चुका है। खासकर समाचार चैनलों के विस्तार और इसमें निजी क्षेत्र के आने के बाद प्रतियोगिता और प्रतिद्वंद्विता बढ़ी है जिसकी वजह से समाचार प्रसारण के तौर-तरीके काफी बदले हैं जिसके अच्छे और बुरे दोनों ही पहलू हैं। लोकतंत्र के चौथे खंबे के रूप में मीडिया को स्थापित करने में टीवी के समाचार चैनलों की अहम भूमिका साबित हुई है क्योंकि खबरें दिखाते हुए ये जनता की आवाज भी बन चुके हैं। कुछ चैनलों पर निहित स्वार्थ के लिए कवरेज या पक्षपातपूर्ण कवरेज के भी आरोप लगते हैं, लेकिन अब चैनलों की इतनी बाढ़ आ चुकी है कि दर्शकों के सामने खबरें देखने और खबरों का हर पक्ष जानने के लिए चैनल बदलकर देखने का विकल्प भी मौजूद है।

    हालांकि ज़ीटीवी पर समाचारों की शुरुआत पहले हो चुकी थी, लेकिन पूरी तरह 24 घंटे के समाचार चैनल लेकर पहले स्टार ग्रुप और फिर ज़ीटीवी ने 1998 में अपनी पारियां शुरु कीं। स्टार ग्रुप 1991 से केबल नेटवर्क का काम कर रहा था (जीटीवी का सीटी केबल था)। 1998 में स्टार चैनल ने भारत के मशहूर टीवी प्रस्तोता डॉ. प्रणय रॉय से हाथ मिलाया और उनकी कंपनी एनडीटीवी स्टार के न्यूज़ चैनल के लिए कंटेंट मुहैया कराने लगी। फरवरी 1998 से शुरु हुआ स्टार-एनडीटीवी का सिलसिला 2003 तक चला जब स्टार अपने बलबूते भारत में समाचार चैनल लेकर आया और एनडीटीवी ने भी हिंदी और अंग्रेजी में 2 समाचार चैनल उतार दिए।

    इससे पहले ये बता देना जरूरी होगा कि एनडीटीवी के कंटेंट पर आधारित स्टार के न्यूज़ चैनल और ज़ीटीवी के समाचार चैनलों पर शुरुआती दौर में अंग्रेजी का प्रभुत्व था और अंग्रेजी के ज्यादा बुलेटिन प्रसारित होते थे। इन दोनों चैनलों के कंटेंट भले ही देश में तैयार होते थे, लेकिन इनका प्रसारण विदेशों से यानी हांगकांग और सिंगापुर से होता था क्योंकि भारत से अपलिंकिंग की अनुमति इन्हें नहीं थी। ज़ीटीवी में समूची पूंजी भारतीय होने की वजह से उसे पहले देसी धरती से अपलिंकिंग की अनुमति मिल गई थी, किन्तु स्टार ग्रुप को विदेशी समूह होने के चलते अपलिंकिंग की अनुमति मिलने में और देर लगी। लेकिन बाद में हिंदी के बुलेटिनों की संख्या बढ़ी और तकरीबन आधे घंटे अंग्रेजी और आधे घंटे हिंदी के बुलेटिन्स का फ़ॉर्मेट दोनों चैनलों में चलने लगा। ज़ी के हिंदी बुलेटिन में अंग्रेजी-मिश्रित हिंदी यानी ‘हिंग्लिश’ का ज्यादा इस्तेमाल था, तो स्टार-एनडीटीवी के बुलेटिन की उर्दू-मिश्रित भाषा उसकी खासियत थी।

    डीडी न्यूज :

    DD News Hindi News Channelबहरहाल, बात समाचार चैनलों की विकास यात्रा पर शुरु हुई थी, तो ये देखना होगा कि देश में टेलीविजन की शुरुआत सरकारी हाथों से दूरदर्शन के जरिए हुई और 1965 में 15 अगस्त को पहले बुलेटिन का प्रसारण हुआ। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के अध्येता डॉ. देवव्रत सिंह इसे भारतीय पत्रकारिता का ‘प्रयोगवादी दौर’ मानते हैं क्योंकि उस दौर में संसाधन बेहद सीमित, या यूं कहें कि नहीं के बराबर थे। दूरदर्शन को खबरों के लिए आकाशवाणी के संसाधनों पर निर्भर रहना पड़ता था। लेकिन प्रयोग के इस दौर से समाचार प्रसारण के फलक का विस्तार हुआ। 1982 में देश में एशियाई खेलों के आयोजन के समय रंगीन टीवी प्रसारण और दूरदर्शन के ‘राष्ट्रीय प्रसारण’ की तथा आगे 1984 में दूरदर्शन के दूसरे चैनल डीडी-मेट्रो की शुरुवात हुई, 1995 में एशिया, यूरोप व अफ्रीका के 50 देशों तक पहुँच वाले दूरदर्शन का अंतर्राष्ट्रीय चैनल-दूरदर्शन इंडिया शुरू हुआ।

    दूरदर्शन के समाचारों में इतनी सादगी होती थी कि आप 1 घंटे तक समाचार देखकर भी बोर नही होते थे और उससमय आपको अधिक विज्ञापन भी नही झेलने पड़ते थे। शुरुवात में दूरदर्शन पर पूरे दिन समाचार आते रहते थे, लेकिन बाद में धारावाहिको के प्रचलन के बाद शाम को 7 बजे से 8 बजे के प्राइम टाइम पर दिन भर के समाचार दिखाए जाते थे। इन एक घंटे के समाचार में आधे घंटे अंग्रेजी में और आधे घंटे हिंदी में समाचार आते थे | इसके बाद 90 के दशक में दूरदर्शन पर समाचार आधे घंटे के कर दिए गये जिसमे 15 मिनट हिंदी और 15 मिनट अंग्रेजी में समाचार आते थे।

    देश में निजी समाचार चैनलों की दुनिया का विस्तार 2002 के बाद से बड़ी तेज़ी से हुआ। दूरदर्शन के डीडी-मेट्रो चैनल से 2000 में ‘आज तक’ कार्यक्रम की विदाई के बाद दूरदर्शन को भी एक 24 घंटे के समाचार चैनल की जरूरत महसूस हुई। इस पर दूरदर्शन पर बढ़ते धारावाहिकों के चलते 3 नंवबर 2003 को मेट्रो चैनल के प्लेटफॉर्म पर ही 24 घंटे के समाचार चैनल डीडी न्‍यूज की शुरूआत की गई, जिसकी कमान सरकारी लोगों के हाथ में होने के अलावा ‘आज तक’ से अपनी पहचान बनानेवाले प्रमुख टीवी पत्रकार दीपक चौरसिया को भी सौंपी गई थी। हालांकि बाद में वो इस चैनल से अलग हो गए, लेकिन डीडी न्यूज़ अपनी खास पहचान बनाने में जरूर कामयाब हुआ है। 2013 में इसे नई ब्रैंडिंग और लोगो के साथ पेश किया गया है और BBC के पूर्व भारत संपादक संजीव श्रीवास्तव की अगुवाई में चलनेवाले इसके प्राइम टाइम शो न्यूज़ नाइट ने तो टीआरपी की होड़ में भी अहम उपलब्धि हासिल करके चैनल को टीआरपी चार्ट में ऐतिहासिक स्तर तक पहुंचा दिया। डीडी न्यूज चैनल भारत की लगभग 50 प्रतिशत जनता तक पहुचता है क्योंकि दूरदर्शन के सभी चैनल Free-to-Air है। भारत में जिन लोगो के पास सेट टॉप बॉक्स या केबल की सुविधा नही है, उनके लिए डीडी न्यूज ही समाचारों का एकमात्र माध्यम है। डीडी न्यूज पर ना केवल हिंदी बल्कि अंगरेजी, उर्दू और संस्कृत भाषा में भी समाचार आते है। 2015 में डीडी न्यूज की मोबाइल ऐप्प भी शुरू की गयी।

    दूरदर्शन के करीब 33 साल के एकछत्र राज के बाद यानी 1998 तक भारत में टीवी पत्रकारिता के एक नए युग की शुरुआत हुई, जब निजी चैनलों के खिलाड़ी इस क्षेत्र में पूरी तरह से उतरे।

    जैन टीवी :

     भले कम लोग ही परिचित हों, पर जैन टीवी को भारत का पहला 24 घंटे चलने वाला राष्ट्रीय समाचार और समसामयिक मुद्दों को प्रसारित करने वाला चैनल होने का गौरव प्राप्त है। इस ग्रुप का 1984 में स्थापित स्टूडियो- जैन स्टूडियो लिमिटेड-JSL देश का पहला निजी टेलीविज़न स्टूडियो था, और यह डा. प्रणॉय रॉय, सिद्दार्थ बासु, राघव बहल व नलिनी सिंह जैसे देश के प्रारंभिक टीवी प्रस्तोताओं के लिए लांच पैड साबित हुआ।

    जी न्यूज :

    Zee News‘भारत के मीडिया मुग़ल’ कहे जाने वाले सुभाष चंद्रा ने पहले 1 अक्टूबर 1992 में मुंबई से स्टार टीवी के साथ मिलकर एक हिन्दी चैनल के रूप में ज़ी टीवी की शुरुआत की थी। लेकिन स्टार टीवी को एक अमेरिकी कंपनी ने खरीद लिया तो यह पूरी तरह से समाप्त हो गया। उसके बाद ज़ी ने अपना चैनल मार्च 1995 में इंग्लैंड और 15 जुलाई 1998 में अमेरिका में स्थापित किया। यह पहला भारतीय चैनल था जो यूरोप में भी दिखाया गया। इसके कुछ कार्यक्रम और विज्ञापन अमेरिका में अँग्रेजी में दिखाये जाते हैं। इसका एचडी संस्करण पहले भारत में दिखाया गया। 5 सितम्बर 2012 को अमेरिका में डिश नेटवर्क के द्वारा इसका एचडी संस्करण दिखाया गया था।

    ज़ी टीवी का समाचार चैनल ज़ी न्यूज 1995 में स्थापित हुआ। प्रारम्भ में इसमें अधिकतर प्रोग्राम अंग्रेज़ी भाषा में प्रसारित होते थे। 2003 में ज़ी न्यूज पूर्णतः हिन्दी समाचार चैनल में परिवर्तित हो गया।

    अपनी खास पहचान बनाने वाले ज़ी न्यूज़ को दिल्ली, उत्तर-पश्चिम भारत और गुजरात में अपने बड़े दर्शक वर्ग का हमेशा फायदा मिलता रहा। ज़ी न्यूज़ चैनल को स्थापित करने वालों में शैलेष, आलोक वर्मा, उमेश उपाध्याय, रजत शर्मा से लेकर शाजी ज़मां, संजय पुगलिया, विनोद कापड़ी, विष्णु शंकर, सतीश के सिंह, अलका सक्सेना से लेकर सुधीर चौधरी तक अनेक जाने-माने टीवी पत्रकार संपादक बने और चैनल को बड़े मुकाम तक पहुंचाने की कोशिश करते रहे। लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद ये चैनल टीआरपी की होड़ में चौथे नंबर से ऊपर नहीं चढ़ सका, एक-दो मौके अपवाद हो सकते हैं।

    जी न्यूज ने अपनी बढ़ती लोकप्रियता के चलते Zee Business, Zee Punjab Haryana Himachal, Zee Sangam, Zee Madhya Pradesh-Chhattisgarh और Zee Rajasthan News जैसे प्रादेशिक न्यूज चैनल भी शुरू किये, वर्तमान में इसका क्षेत्रीय चैनल ‘इंडिया 24X7’ नाम से भी चल रहा है।

    स्टार-एबीपी न्यूज़ :

    ABP News

    पूर्व में केबल के कारोबार में रहे आस्ट्रेलियाई मीडिया मुग़ल रुपर्ट मर्डोक के द्वारा एनडीटीवी के साथ कॉन्ट्रैक्ट करते हुए स्टार न्यूज़ की शुरुवात 18 फरवरी 1998 को की गयी थी, जो शुरुवात में हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओ में समाचार दिखाता था। लेकिन 2003 में एनडीटीवी के साथ कॉन्ट्रैक्ट समाप्त होने के बाद स्टार स्टार ग्रुप ने मुंबई से बेहद तड़क-भड़क के साथ ‘आपको रखे आगे’ की टैगलाइन के साथ अपना अलग से पूर्णतया हिंदी समाचार चैनल लांच किया। तब इसकी सीईओ रवीना राज कोहली और संपादक संजय पुगलिया थे, जो पहले ‘आज तक’ के भी जाने-माने एंकर रह चुके थे और इसके बाद ज़ी न्यूज़ को भी ‘आज तक’ के लांच होने के बाद झटकों से उबारने में काफी कामयाब रहे थे।

    स्टार ग्रुप ने एनडीटीवी से अलग होकर अपना चैनल लांच करने की तैयारियां 2002 में ही शुरु कर दी थीं। पूरी तरह विदेशी पूंजी वाले स्टार न्यूज़ ने टीवी समाचार के कारोबार को नया कलेवर देने की कोशिश शुरु की, लेकिन उसकी कोशिशों को तब ग्रहण लगने लगा, जब देश में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में शत-प्रतिशत विदेशी पूंजी का कड़ा विरोध शुरु हो गया। चूंकि प्रिंट मीडिया में सिर्फ 26 फीसदी विदेशी पूंजी लगाने की ही अनुमति थी, लिहाजा केंद्र सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर भी यही पाबंदी लगानी पड़ी। इसके बाद सितंबर 2003 में स्टार न्यूज़ को चालू रखने के लिए नए सिरे से MCCS नाम की कंपनी बनाई गई और 74 फीसदी हिस्सेदारी के लिए कोलकाता के आनंद बाजार पत्रिका समूह को कंपनी से जोड़ा गया। मार्च 2004 से स्टार न्यूज़ स्टार ग्रुप और ABP ग्रुप की हिस्सेदारी में आधिकारिक रूप से शुरु हुआ। स्टार और आनंद बाजार पत्रिका समूह यानी ABP का साथ करीब 8 साल चला और 16 अप्रैल 2012 से ABP ने स्टार से 8 साल का नाता तोडकर एक स्वतंत्र न्यूज़ चैनल ABP न्यूज़ में बदल दिया। इसके बाद 1 जून 2012 से ये चैनल एबीपी न्यूज़ के रूप में काम करने लगा। MCCS के तहत बांग्ला और मराठी के भी दो चैनल और एक बांग्ला एंटरटेनमेंट चैनल ABP Ananda , ABP Majha ,ABP Sanjha लांच किये गए, जो अब स्टार की जगह एबीपी की ब्रांडिंग से जाने जाते हैं।

    ‘आज तक’ और स्टार न्यूज़ ( अब ABP न्यूज़) में शुरुआती समानता ये थी कि तमाम ऐसे कर्मचारी उसमें काम कर रहे थे, जो ‘आज तक’ में भी काम कर चुके थे। साथ ही ज़ी न्यूज़ के भी चुने हुए धुरंधर संजय पुगलिया की टीम में शामिल होकर स्टार न्यूज़ के सदस्य बने। चूंकि स्टार की प्रतिद्वंद्विता मुख्य रूप से ‘आज तक’ से थी, लिहाजा चैनल के लिए कर्मचारियों की टीम बनाते हुए इस बात का खास ख्याल रखा गया कि जो लोग ‘आज तक’ की खबरिया मानसिकता से वाकिफ हों, वही उसकी काट हो सकते हैं। स्टार न्यूज़ को चलाने के लिए MCCS नाम की कंपनी बनने के बाद संपादकीय परिवर्तन भी हुए और संजय पुगलिया की जगह उदय शंकर ने ले ली, जो तब तक ‘आज तक’ के न्यूज़ डायरेक्टर हुआ करते थे। स्टार न्यूज़ में आने के बाद उदय शंकर ने भी नई ऊंचाइयां छुईं। रूपर्ट मर्डोक परिवार ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और शायद पहली बार एक भारतीय पत्रकार को विदेशी मीडिय़ा समूह के टॉप मैनेजमेंट में शामिल होने का गौरव हासिल हुआ। 2007 में उदय शंकर स्टार इंडिया के हेड बना दिए गए। उदय शंकर के बाद से शाजी ज़मां ने स्टार न्यूज़ (अब एबीपी न्यूज़) की कमान संभाली। स्टार न्यूज़ ने लांचिंग के बाद मुंबई में हुई भीषण बारिश के दौरान जोरदार कवरेज की और ‘आज तक’ समेत तमाम चैनलों को पीछे छोड़ दिया।

    आज तक  :

    Aaj tak

    भारत में समाचार के कारोबार में तेजी 2000 में आई, जब इंडिया टुडे ग्रुप के टीवी सेक्शन टीवी टुडे का चैनल ‘आज तक’ दिल्ली से लांच किया गया। इससे पहले दूरदर्शन के मेट्रो चैनल पर 1995 से प्रसारित होने वाला टीवी टुडे का ‘आज तक’ कार्यक्रम दर्शकों में अपनी खास पहचान बना चुका था, जिसका चैनल को जबर्दस्त फायदा मिला और 24 घंटे के समाचार के बाजार में ‘आज तक’ को अपना पांव जमाते देर नहीं लगी। समाचार चैनल के रूप में ये 31 दिसंबर 2000 को वजूद में आया और छ: महीनों के अंदर ही हिंदी में चौबीस घण्टे प्रसारित होने वाला देश के पहले के साथ ही देश का नंबर वन समाचार चैनल भी बन गया। इसे 1 साल के भीतर ही इंडिया टेलीविजन अकादमी द्वारा आज तक को बेस्ट न्यूज़ चैनल का ख़िताब मिला। इसके साथ ही यह चैनल शुरुवात में ही देश के 50 लाख घरों तक पहुच गया,और आज भारत की 3 करोड़ से भी जनता के घरों में इसकी पहुँच है।

    चैनल के रूप में लांच होने के बाद ‘आज तक’ ने सबसे पहले 2001 के गुजरात भूकंप की जबर्दस्त कवरेज की। इसके बाद तो एक से बढ़कर एक मामलों की कवरेज और प्रसारण इसके नाम हो गए। शुरुआत में चैनल के रूप में लांच होने पर ‘आज तक’ का संपादकीय नेतृत्व उदय शंकर के हाथों में था, लेकिन ‘आज तक’ की खास पहचान बनाने वालों में पत्रकार कमर वहीद नकवी प्रमुख थे, जिन्होंने पर्दे के पीछे रहते हुए शो को बखूबी अंजाम तक पहुंचाया। हालांकि वो शुरुआत में चैनल का हिस्सा नहीं रहे, लेकिन 2003 में जब उदय शंकर स्टार न्यूज़ की टीम में शामिल हो गए तो ‘आज तक’ को चलाने के लिए फिर नकवी को बुलाया गया। नकवी ने ‘आज तक’ में 2012 तक लंबी पारी खेली। यहां बता दें कि ‘आज तक’ जब डीडी मेट्रो चैनल का कार्यक्रम था, तो दिल्ली के कनॉट प्लेस में उसका दफ्तर हुआ करता था। चैनल की लांचिंग दिल्ली के झंडेवालान एक्सटेंशन में स्थिति वीडियोकॉन टॉवर से हुई और 2012 के सितंबर में ये चैनल नोएडा की फिल्म सिटी में अपने नए दफ्तर इंडिया टुडे मीडिया प्लेक्स में आ गया। चैनल के नोएडा आने से पहले नकवी इससे विदा हो चुके थे और कमान सुप्रिय प्रसाद ने संभाली जो टीवी टुडे ग्रुप के सबसे अनुभवी लोगों में से हैं। ‘आज तक’ के 12 साल के सफर के दौरान टीवी टुडे ने 3 और समाचार चैनल लांच किए।  एक चैनल अंग्रेजी समाचारों का है- हेडलाइंस टुडे । हिंदी में एक और चैनल 2005 में लांच किया गया-तेज़ जिसका मकसद था फटाफट अंदाज में खबरों को पेश करना। इसके अलावा 2008 में दिल्ली-एनसीआर की खबरों के लिए ‘दिल्ली आज तक’ को लांच किया गया। इस तरह अब टीवी टुडे के 4 चैनल एक साथ चल रहे हैं। आज देश की 50 प्रतिशत से भी ज्यादा जनता आज तक न्यूज चैनल को देखती है। अब यह चैनल भारत में Free-to-Air भी है लेकिन अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर यह पैसे लेता है। आज तक ने लगातार 16 सालो तक Indian Television Academy Award से Best News Channel का अवार्ड मिला है।

    ‘आजतक’ के आने से सबसे बड़ा झटका ज़ीटीवी के न्यूज़ चैनल ‘ज़ी न्यूज़’ और ‘स्टार-एनडीटीवी’ के चैनल को लगा और इसी के साथ नए-नए प्राइवेट समाचार चैनलों की शुरुआत का रास्ता भी प्रशस्त हो गया।

    एनडीटीवी :

    1988 में स्थापित एनडीटीवी (New Delhi Television Limited) एक तरह से देश का सबसे पुराना मीडिया हाउस है। दूरदर्शन के लिए नवंबर 1988 से डॉ. प्रणय रॉय की अगुवाई में ‘The World This Week’ न्यूज़ मैगजीन की प्रस्तुति और कंटेंट तैयार करने के बाद इस मीडिया हाउस ने स्टार ग्रुप के साथ हाथ मिलाया और करीब 9-10 साल उन्हें 24 घंटे के चैनल के लिए कंटेंट उपलब्ध कराते रहे। 2003 में स्टार ग्रुप का साथ छूटने के बाद एनडीटीवी ने सफलतापूर्वक 2 चैनल लांच कर दिए। हिंदी चैनल के लांच के लिए ‘आज तक’ के ही मशहूर चेहरे दिबांग को अपने साथ जोड़ा। ‘खबर वही सो सच दिखाए’ की टैगलाइन के साथ शुरु हुए हिंदी चैनल ‘एनडीटीवी इंडिया’ ने खबरों के प्रसारण के मामले में तो अलग संपादकीय लाइन की वजह से अपनी खास पहचान बनाए रखी, लेकिन टीआरपी की होड़ में ये चैनल पीछे ही रहा। दिबांग के आक्रामक तेवर पर कई बार डॉ. प्रणय रॉय की संपादकीय नीतियां भारी पड़ती दिखीं जिसकी वजह से खबर देखने वालों के लिए तो ‘एनडीटीवी इंडिया’ पसंदीदा चैनल बना रहा, लेकिन मिक्स-मसाला के तौर पर खबरें परोसे जाने में फिसड्डी ही साबित हुआ। और  अंग्रेजी में NDTV 24×7 को भी दर्शक सटीक खबरों के लिए पसंद करते है। 2012-13 में इसके 25 साल पूरे हो चुके हैं। आजकल (2013) अनिंद्यो चक्रवर्ती इसके हिंदी चैनल ‘एनडीटीवी इंडिया’ के प्रमुख हैं, जबकि सुनील सैनी, मनोरंजन भारती, रवीश कुमार, मनीष कुमार, अभिषेक शर्मा, निधि कुलपति इसके जानेमाने संपादकीय चेहरे और प्रस्तोता हैं। मशहूर टीवी प्रस्तोता विनोद दुआ भी एनडीटीवी इंडिया पर खास करंट अफेयर्स कार्यक्रम पेश करते हैं।

    इंडिया टीवी :

    India TVइंडिया टीवी चैनल की शुरुवात 20 मई 2004 को प्रोडक्शन हाउस ‘इंडिपेंडेंट न्यूज़ सर्विसेज़ प्राइवेट लिमिटेड’ के द्वारा रजत शर्मा और उनकी पत्नी रितु धवन ने ‘आपकी आवाज’ की टैगलाइन के साथ की थी। इस चैनल ने स्वतंत्र न्यूज सर्विस के रूप में 1998 में ही शुरुवात कर दी थी, जिसे बाद में इंडिया टीवी नाम दिया गया। उल्लेखनीय है कि 1992 से ही रजत शर्मा ज़ी टीवी से अपने खास टॉक शो ‘आपकी अदालत’ के साथ जुड़े और ज़ी के डायरेक्टर भी रहे। ज़ी से अलग होने के बाद एनडीटीवी के साथ चल रहे स्टार न्यूज़ में भी ‘जनता की अदालत’ शो जारी रखा। 1997 में रजत शर्मा ने पत्नी ऋतु शर्मा के साथ ‘इंडिपेंडेंट न्यूज़ सर्विस’ की स्थापना की, जो इंडिया टीवी की पितृ कंपनी है। शर्मा चूंकि ‘आप की अदालत’ से काफी लोकप्रिय हो चुके थे जिसके कारण इस चैनल की पहुच भी काफी घरों तक पहुची।

    इंडिया टीवी चैनल ने शुरुआत में तो बॉलीवुड के कास्टिंग काउच और नेताओं के सेक्स स्कैंडल दिखाकर लोकप्रियता बटोरने की कोशिश की, लेकिन लंबे समय तक खबरिया हथकंडों में कामयाबी नहीं मिली, और ना ही रजत शर्मा को अपने चेहरे की ब्रांडिंग का कोई फायदा मिला तो उन्होंने आखिरकार खांटी खबरिया संपादक औऱ ज़ी न्यूज़ में अपने सहयोगी रहे विनोद कापड़ी को अपने साथ जोड़ा। विनोद कापड़ी की अगुवाई में इंडिया टीवी ने कम वक्त में ही बुलंदियां हासिल कर ली और लगातार वो टीआरपी के चार्ट में पहले से तीसरे नंबर तक अपनी जगह बनाने में कामयाब रहा। इंडिया टीवी का न्यूज़ स्टूडियो एशिया का सबसे बड़ा स्टूडियो है जो दिल्ली के नॉएडा में स्थित है। इंडिया टीवी वर्तमान में 800 करोड़ का न्यूज चैनल है।

     सहारा समय :

    सहारा समय भी हिंदी का 24×7 चलने वाला है जिसकी शुरुवात सहारा इंडिया परिवार ने की थी। ये भी भारत के टॉप 10 न्यूज चैनलों में से एक गिना जाता है। वित्तीय और मीडिया सहित कई और क्षेत्रों में हाथ आजमाने वाली कंपनी सहारा इंडिया ने भी सन 2000 में इलेक्ट्रानिक मीडिया में कदम रखा और सन 2000 में सहारा टीवी लेकर आए, जिस पर शुरुआत में समाचार भी चलते थे और एंटरटेनमेंट प्रोग्राम भी। मशहूर पत्रकार विनोद दुआ इस चैनल पर रोजाना अपना समाचार आधारित कार्यक्रम ‘प्रतिदिन’ और शनिवार को अपना साप्ताहिक समाचार आधारित कार्यक्रम ‘परख’ लेकर आते थे। सहारा ग्रुप ने 2002 -2003 में समाचार के लिए ‘सहारा समय’ नाम से अलग से चैनल लांच कर दिया और मनोरंजन चैनल को भी अलग कर दिय़ा गया। 2004 में मनोरंजन चैनल को सहारा वन नाम दे दिया गया और फिल्मों के लिए भी 2 और चैनल लांच कर दिए गए। सहारा इंडिय़ा के समाचार चैनल सहारा समय के साथ-साथ कई और क्षेत्रीय चैनल भी लांच किए गए, जो मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़, यूपी-उत्तराखंड, बिहार-झारखंड, राजस्थान, दिल्ली-एनसीआर, मुंबई वगैरह की खबरें दिखाते हैं। सहारा के समाचार चैनलों की कमान बदलती रही है। शुरुआती दौर में ‘राष्ट्रीय सहारा’ अखबार से जुड़े विभांशु दिव्याल और फिर प्रभात डबराल ने काफी समय तक इसका संचालन किय़ा। इसके बाद अरुप घोष-शीरीन की जोड़ी इसे चलाती रही। ‘आज तक’ के जाने माने चेहरे पुण्य प्रसून वाजपेयी को भी इसकी कमान दी गई जिन्होंने इसका नाम सिर्फ ‘समय’ कर दिया। इसके बाद स्टार न्यूज़ से जुड़े रहे उपेंद्र राय को भी इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई। संपादक आते-जाते रहे लेकिन ये चैनल काफी विश्वसनीयता के साथ आगे बढ़ता जा रहा है।

    चैनल-7/आईबीएन-7 / न्यूज़-18 इंडिया:

    निजी समाचार चैनलों की देश में शुरुआत हुई, तो अखबार निकालनेवाले समूहों ने भी इसमें हाथ आजमाना शुरु किया। टाइम्स ग्रुप ने तो अंग्रेजी में समाचार चैनल लांच किया, लेकिन दैनिक जागरण के प्रकाशन समूह ने हिंदी चैनल लाने की योजना बनाई और अप्रैल 2005 में चैनल 7 के नाम से चैनल लांच भी कर दिया। लेकिन जागरण ग्रुप इस चैनल को लंबे समय तक चलाने में नाकाम रहा और आखिरकार 15 अगस्त 2006 को में इस चैनल की बड़ी हिस्सेदारी नेटवर्क 18 और राजदीप सरदेसाई के नेतृत्व वाले Global Broadcast News Ltd. (GBN) ग्रुप ने खरीद ली। इसके बाद IBN18 Broadcast Limited कम्पनी के तहत चैनल का नाम ‘आईबीएन-7’ (IBN – Indian Broadcast Network) ) हो गया और अब इस चैनल की टैगलाइन है- ‘खबर हर कीमत पर’। इस तरह ये चैनल बिजनेस चैनल और अंग्रेजी समाचार चैनल चलानेवाले TV 18-नेटवर्क 18 ग्रुप में हिंदी समाचार चैनल के रूप में शामिल हो गया। शुरुआत में इस चैनल की कमान जाने माने एंकर अरूप घोष के हाथों में थी, इसके बाद अजीत साही और फिर ‘आज तक’ से आए आशुतोष ने मैनेजिंग एडिटर के रूप में इसका संचालन संभाला। संजीव पालीवाल इसके प्रमुख कार्यकारी संपादक हैं। हार्डकोर खबरों और उनके विश्लेषण पर केंद्रित रहना इस चैनल की खासियत है। चर्चित पत्रकारों राजदीप सरदेसाई, आशुतोष (जिन्होंने बाद में आप पार्टी ज्वाइन कर ली), संदीप चौधरी की अगुवाई में ये चैनल सार्थक खबरिया पत्रकारिता की राह में आगे बढ़ा। 2014 में इस चैनल ने अपना स्लोगन बदलकर ‘हौसला है ‘ रख दिया। 2015 में IBN-7 भारत के टॉप-3 हिंदी न्यूज़ चैनल में से एक गिना जाने लगा। इधर 1 जनवरी 2017 से इसका नाम ‘न्यूज़ 18 इंडिया’ के रूप में परिवर्तित हो गया है।

    न्यूज़ 24 :

    मशहूर पत्रकार अनुराधा प्रसाद और पत्रकार से राजनेता बने राजीव शुक्ल की ओर से 1993 से चलाए जा रहे प्रॉडक्शन हाउस BAG फिल्म्स भी 2007 में ‘न्यूज़ 24’ समाचार चैनल ‘हर खबर पर नज़र’ टैगलाइन के साथ खबरों के बाजार में उतरा। अपनी प्रस्तुति की वजह से लांच होने के चार साल के अंदर ये चैनल टीआरपी की होड़ में कई चैनलों को पीछे छोड़ चुका है। इसका संपादकीय नेतृत्व अजीत अंजुम के हाथों में है। न्यूज़ 24 भी एक free-to-air चैनल है। इस चैनल को अजित अंजुम, अनुराधा मिश्रा और अनुराधा प्रसाद चलाते है।

    इंडिया न्यूज़ :

    समाचार चैनलों में सियासी हस्तियों की दिलचस्पी जगजाहिर है। 11 फरवरी 2008 को दिल्ली के ITV यानी Indian company Information TV (ITV) Media Group मीडिय़ा ग्रुप ने ‘देश की धड़कन’ की टैग लाइन से ‘इंडिया न्यूज़’ लांच किया जिसके कर्ता धर्ता कार्तिकेय शर्मा हरियाणा के कांग्रेस नेता विनोद शर्मा के बेटे हैं। विनोद शर्मा के दूसरे बेटे मनु शर्मा दिल्ली के जेसिका लाल हत्याकांड में सज़ायाफ्ता हैं। इस चैनल से 2013 में मशहूर पत्रकार दीपक चौरसिया भी जुड़ चुके हैं और चैनल को नई पहचान देने में जुटे हैं। इस चैनल का स्लोगन ‘देश की धडकन’ है। इस चैनल से जुड़े कई क्षेत्रीय चैनल भी हैं- इंडिया न्यूज़ हरियाणा, इंडिया न्यूज़ मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़, इंडिया न्यूज़ बिहार। साथ ही इस चैनल ने अंग्रेजी चैनल न्य़ूज़ एक्स को भी खरीद लिया है। इस तरह ये एक बड़े मीडिया ग्रुप के रूप में उभर रहा है।

    राज्यसभा टीवी :

    समाचारों का प्रसारण राज्यसभा टीवी पर भी होता है, जिसे 2011 में लांच किया गया, हालांकि इसकी कोई कारोबारी मानसिकता नहीं है और खबरों के चयन का तरीका आम चैनलों से अलग है। लेकिन कम वक्त में ही ये चैनल करंट अफेयर्स चैनलों में अपनी खास पहचान बनाने में सफल हुआ है। चैनल की कमान गुरदीप सिंह सप्पल और राजेश बादल के हाथों में है।

    न्यूज़ नेशन :

    राष्ट्रीय समाचार चैनलों में नवीनतम नाम ‘न्यूज़ नेशन’ का है, जिसे 2013 में ही लांच किया गया है। चैनल की अगुवाई वरिष्ठ पत्रकार शैलेष कर रहे हैं, जो ज़ी न्यूज़, आज तक जैसे चैनलों में लंबी पारी खेल चुके हैं। साथ ही आज तक और स्टार न्यूज़ के नामी एंकर अजय कुमार भी इससे जुड़े हुए हैं। इसके संपादकीय विभाग में वरिष्ठ पत्रकार सर्वेश तिवारी भी हैं। रोजगार पर खतरे के संकट से गुजर रहे टीवी में काम करनेवाले तमाम युवाओं के लिए य़े चैनल आशा की किरण बन कर लांच हुआ। चैनल से काफी उम्मीदें हैं बशर्ते ये सुचारू रूप से चलता रहे।

    अन्य चैनल : लाइव इंडिया, जनमत आदि

    एक और समाचार चैनल जो टीआरपी चार्ट में अपनी जगह के उतार-चढ़ाव को लेकर चर्चा में रहा- वो है – ‘लाइव इंडिया’। पहले पहल श्री अधिकारी ब्रदर्स ने 2005 के आसपास ‘जनमत’ नाम से इस चैनल को लांच किया था। इसके बाद इसकी हिस्सेदारी बिल्डर कंपनी HDIL को बिक गई और तब इसका नामकरण ‘लाइव इंडिया’ हुआ। एक स्टिंग ऑपरेशन को लेकर हुए विवाद को लेकर 2007 में इस पर पाबंदी भी लगी। इसके बाद इस चैनल ने नए सिरे से अपनी पहचान बनानी शुरु की, लेकिन अंदरूनी खस्ताहाली ने इसे एक बार फिर बिकने को मजबूर कर दिया। अब इसके मालिकान पुणे के कारोबारी हैं। शुरुआत में इस चैनल के साथ हरीश गुप्ता, उमेश उपाध्याय जैसे पत्रकार जुड़े थे, बाद में सुधीर चौधरी इसके संपादक बने और फिर सतीश के सिंह को इसकी कमान मिली।

    स्थानीय चैनल- ई टीवी, टोटल टीवी, साधना न्यूज़, टोटल टीवी व साधना न्यूज़ :

    देश में समाचार चैनलों की होड़ में क्षेत्रीय चैनल भी काफी तेजी से शामिल हुए। इसकी शुरुआत तो सबसे पहले हैदराबाद के इनाडु ग्रुप ने ही कर दी थी, जिसके नेटवर्क में पहले दक्षिण भारतीय भाषाओं के और फिर ओडिशा, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड, बिहार/झारखंड, मध्य प्रदेश/ छत्तीसगढ़ और राजस्थान के लिए भी अलग-अलग चैनल आ गए जिन पर समाचारों के अलावा मनोरंजन और करंट अफेयर्स के कार्यक्रम भी प्रसारित होते हैं। इनाडु ग्रुप के मालिक रामोजी राव की अगुवाई में शुरु ये नेटवर्क अब टीवी 18 ग्रुप का हिस्सा बन चुका है।

    दिल्ली-एनसीआर की खबरों पर केंद्रित चैनलों में ‘टोटल टीवी’ का भी नाम आता है, जो 2005 में लांच हुआ। टोटल टीवी यूं तो पहला ऐसा सैटेलाइट चैनल है जो किसी शहर पर केंद्रित हो, हालांकि अभी तक ये अपनी बड़ी पहचान बनाने में विफल रहा है।

    क्षेत्रीय समाचार चैनलों में साधना न्यूज़ भी है जिसका मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ चैनल सबसे ज्यादा चर्चा में है। पहले एनके सिंह, फिर एसएन विनोद और अब अंशुमान त्रिपाठी इसकी कमान संभाल रहे हैं।

    बंद हो चुके समाचार चैनल-वॉयस ऑफ इंडिया,एस-1, पी 7 व महुआ न्यूज़ :

    देश में समाचार प्रसारण  को कारोबार बनाने के लालच ने कुछ ऐसे संगठनों और लोगों को भी समाचार चैनल लांच करने का मौका दे दिया, जिन्होंने बड़ी संख्या में लोगों के रोजगार के साथ खिलवाड़ किया। ऐसा ही एक चैनल था ‘वॉयस ऑफ इंडिया’ जो ब़ड़े ताम-झाम से 2007-2008 के दौरान लांच हुआ था, लेकिन चल नहीं सका और इसमें काम शुरु करनेवाले काफी लोग महीनों बेकार रहने को मजबूर हो गए। इसी तरह एस-1 टेलीविजन के नाम से Senior Media Limited नाम के संगठन ने अगस्त 2005 में नोएडा से चैनल लांच किया था और विस्तार के बड़े-बड़े दावे किए गए थे, जो टांय-टांय फिस्स साबित हुए और कर्मचारियों को दिक्कतें झेलनी पड़ी। ये ऐसे संगठन थे, जिनका समाचार से या मीडिया से कोई खास लेना-देना नहीं था और किराने के कारोबार की तरह जल्दी-जल्दी मुनाफा हासिल करना चाहते थे। समाचार चैनलों में एक नया नाम ‘पी 7’ न्यूज़ का भी जुड़ा। ‘सच जरूरी है’ की टैगलाइन से 24 घंटे के इस चैनल को Pearls Broadcasting Corporation Limited की ओर से नवंबर 2008 में ‘पी 7’ न्यूज़ नोएडा से लांच किया गया। टीआरपी चार्ट में तो ये चैनल करीब चार साल चलने के बाद अपनी कंपनी की बुरी आर्थिक स्थिति की वजह से 2015 में बंद हो गया। इससे पूर्व 2013 में तो इस ग्रुप की ओर से 2 और चैनल – एक दिल्ली-एनसीआर के लिए और एक मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ के लिए – लांच कर दिए गए।

    ऐसा ही हाल फिल्मों की दुनिया से जुड़े एक बड़े ग्रुप का भी हुआ। ग्रुप ने भोजपुरी दर्शकों पर केंद्रित चैनल शुरु किए जिनमें एंटरटेनमेंट आधारित महुआ टीवी तो बखूबी चल रहा है, लेकिन इसका समाचार चैनल- महुआ न्यूज़ चाहे जिस वजह से हो, नहीं चल सका। ऐसे कई चैनलों के आगाज और अंत ने समाचार के कारोबार में कूदने वालों को बड़ा सबक दिया है, साथ ही टीवी समाचार चैनलों की तड़क-भड़क के वशीभूत होकर उनमें काम करने की इच्छा रखनेवालों को भी पेशे को अपनाने के बारे में सोचने का मौका दिया है।

    टेलीविज़न पत्रकारिता :

    आधुनिक समाज के निर्माण में संचार की अहम भूमिका है सूचनाओं के आदान प्रदान की प्रवृत्ति के साथ साथ इसका दायरा बढना भी विकास के आधारभूत तत्वों में से एक है सामान्य तौर पर एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति का सूचना साझा करना भी संचार है किंतु जब यही प्रवृत्ति एक व्यापक जनसमुदाय और विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र तक विस्तार पाती है इस जनसंचार कहा जाता है संचार के विभिन्न साधनों का विकास मानव सभ्यता के विकास के समानांतर चलता रहा है यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि यह दोनों बातें एक दूसरे की समानार्थी ही हैं संचार के अभाव में सभ्यता के वर्तमान विकसित स्वरूप की कल्पना नहीं की जा सकती थी सूचना के महत्व से मनुष्य समाज भली भांति परिचित है, और इन सूचनाओं का संप्रेषण ही उसे निरंतर नए विचार की ओर अग्रसर करता है हम यह कह सकते हैं कि आधुनिक सभ्यता में सूचना से अधिक शक्तिशाली कोई परमाणु हथियार भी नहीं हो सकता पुरानी व्यवस्थाओं को बदलने से लेकर  नए नए वैज्ञानिक आविष्कारों तक सभी प्रकार के परिवर्तनों में सूचनाओं के आदान प्रदान का अहम स्थान है सूचनाओं के आदान प्रदान की इसी प्रक्रिया को संचार कहा गया है अनेक माध्यमों से जब सूचनाओं के संचार का क्षेत्र व्यापक हो जाता है तो इसे जनसंचार कहा जाता है जनसंचार के इस व्यापक उद्देश्य को प्राप्त करने में इलैक्ट्रॉनिक माध्यमों का बड़ा योगदान है 

                      उद्योग और व्यापार के क्षेत्र में जब तकनीक का विकास हुआ, नए नए आविष्कार हुए तो संचार ने भी नए आयामों की तरफ कदम बढाए अब तक गांव या कबीले तक सीमित संचार व्यापक क्षेत्र और व्यापक जनसमुदाय तक विस्तार पा गया  छापेखाने के आविष्कार से शुरु हुई संचार क्रांति फोटोग्राफी,टेलीग्राफी,रेडियो और टेलीविज़न के आविष्कारों से समृद्ध होते हुए इंटरनेट तक पहुंच गई है इंटरनेट से पहले रेडियो और टेलीविज़न ने ही वास्तविक संचार क्रांति को जन्म दिया अनेक प्रकार की आधुनिक प्रसारण तकनीकों के आविष्कार के कारण रेडियो और टेलीविजन ने सारी दुनिया को एक इकाई के रूप में तब्दील कर दिया सूचनाओं और विचारों का आदान प्रदान सबसे सशक्त रूप में द्रुत गति से संभव हुआ रेडियो ने जहां आवाज़ के माध्यम से सूचनाओं को पंख लगाए वहीं टेलीविजन ने इस संचार को दृश्यात्मकता से जोड़कर आंखें प्रदान की

                   समाचार , विचार, शिक्षा और मनोरंजन संचार के क्षेत्र में टेलीविज़न ने अभूतपूर्व कार्य किया है दरअसल टेलीविजन ने समाचारों में दृश्यों के माध्यम से विश्वसनीयता को सुनिश्चित किया कहा जाता है कि आंखों से  देखी गई घटनाओं या वस्तुओं पर विश्वास करना चाहिए टेलीविजन ने घटनाओं का विवरण प्रस्तुत करते हुए इसी कहावत जैसा विश्वास दर्शकों के मन में पैदा किया कि दिखाई दे रहा है, इसलिए टेलीविज़न पर दिया गया विवरण या जानकारी सत्य है टेलीविज़न ने मुद्रित माध्यम की साक्षर होने की शर्त को भी अनावश्यक प्रमाणित कर दिया टेलीविज़न ने मनोरंजन के क्षेत्र में जबरदस्त क्रांति की और लगभग एक समय दुनियाभर में सिनेमा उद्योग को कड़ी चुनौती पेश की आज भी यदि भारतीय संदर्भ में भी देखा जाए तो सिनेमा उद्योग भी अपनी फिल्मों के प्रमोशन से लेकर रिएलिटी शोज़ तक टेलीविज़न की तरफ दौड़ता हुआ नजर आता है

                            समाचार माध्यम के रूप में दुनियाभर में टेलीविज़न ने अपनी उपयोगिता सिद्ध की है विशेष तौर पर प्रकृतिक आपदाओं, युद्धकाल और मानवाधिकारों के क्षेत्र में टेलीविजन समाचारों ने एक सक्षम परिवर्तनकारी शक्ति के रूप में कार्य किया है वियतनाम और खाड़ी युद्धों के समाचार कवरेज के दौरान दिखाए गए दृश्यों का दुनिया में युद्ध विरोधी माहौल बनाने में खासा योगदान रहा भारत में टेलीविज़न फत्रकारिता का इतिहास बहुत पुराना नहीं है हालांकि भारत में टेलीविज़न प्रसारण 1959 में शुरु हुआ किंतु इसका विकास काफी धीमी गति से हुआ सरकारी सहायता से चलने वाले दूरदर्शन का ही लगभग तीन दशक तक एकाधिकार रहा बीसवीं सदी के आखिरी दशक में केबल टीवी के विस्तार और प्राइवेट चैनलों के आने से वास्तव में इसका मौजूदा विकसित रूप में आना संभव हो पाया  देश में प्राइवेट चैनलों पर समाचार की शुरुआत और फिर चौबीस घंटे के समाचार चैनलों की शुरुआत को अभी (2015) करीब दो दशक ही हुए हैं अत: भारतीय संदर्भों में टेलीविज़न पत्रकारिता की चर्चा करते समय इस बात को ध्यान में रखना बेहद आवश्यक है कि इसकी यात्रा करीब बीस साल की ही है 

    टेलीविज़न पत्रकारिता का अध्ययन करने के लिए सबसे पहले एक समाचार चैनल की कार्यप्रणाली को समझना आवश्यक है हमारे देश में टेलीविजन समाचार चैनलों का इतिहास बहुत पुराना नहीं है किंतु फिर कम समय में चैनलों ने एक कारगर कार्यप्रणाली विकसित की है एक समाचार चैनल के विभिन्न विभागों को निम्न प्रकार से बांटा जा सकता है

    (1) संपादकीय विभाग, (2) तकनीकी विभाग(3) विपणन विभाग, (4) वितरण विभाग, (4) मानव संसाधन एवं प्रशासन,

टेलीविजन पत्रकारिता के अध्ययन में मुख्य रूप से एक समाचार चैनल के संपादकीय विभाग की जानकारी आवश्यक होगी, किंतु शेष विभागों के बारे में भी जानकारी होना जरूरी है संपादकीय विभाग के बारे में विस्तार से बात करने से पहले हम इन तीनों विभागों के बारे में सामान्य जानकारी साझा करेंगे

तकनीकी विभाग टेलीविज़न चैनल में समाचारों के लिए दृश्य सामग्री जुटाने के कार्य से लेकर इसके प्रसारण तक के कार्य में तमाम तरह के तकनीकी कार्य तथा इस प्रक्रिया में उपयोग किए जाने वाले उपकरणों की देखभाल का कार्य यह विभाग करता है इसमें कैमरा, वीडियो एडिटिंग, ग्राफिक्स, पीसीआर , एमसीआर , स्टूडियो ऑपरेशन्स , सरवर रूम , ओबी वैन जैसे अंग प्रमुख हैं इस विभाग से संपादकीय विभाग का सीधा संबंध होता है यहां तक कि कैमरा, वीडियो एडिटिंग, ग्रफिक्स और पीसीआर जैसे विभागों को तो अर्धसंपादकीय, अर्धतकनीकी विभाग माना जाता है उम्मीद की जाती है कि इन विभागों में करने वाले लोगों को संपादकीय और पत्रकारीय समझ होनी चाहिए

विपणन विभाग इस विभाग के अन्तर्गत चैनल के लिए विज्ञापन जुटाने का कार्य होता है इसका संपादकीय विभाग से सीधा सीधा कोई संबंध नहीं होता है चैनल में चलने वाले विज्ञापनों की दरें, समय और अवधि तय करने के अतिरिक्त इस विभाग का संपादकीय सामग्री के चयन के मामले में कोई दखल नहीं होता

वितरण विभागकिसी टेलीविज़न चैनल का यह महत्वपूर्ण विभाग होता है टीवी चैनल को अधिकांश दर्शकों के घरों में दिखाने का दायित्व इस विभाग का होता है इस विभाग के लोग केबल नेटवर्क और विभिन्न डीटीएच नेटवर्क के माध्यम से टीवी चैनल के प्रदर्शन को सुनिश्चित करते हैं

मानव संसाधन एवं प्रशासन मानव संसाधन विभाग चैनल में सभी विभागों में काम करने वाले लोगों की नियुक्तियों, इन्क्रीमेंट्स, छुट्टियों तथा निष्कासन आदि कार्य करता है इसके अतिरिक्त कर्मचारियों के साथ संवाद, उनकी सुविधाओं और समस्याओं का ध्यान रखना भी मानव संसाधन विभाग के कामों में शामिल है इसके अलावा प्रशासन के तहत कार्यालय में मूलभूत सुविधाओं को सुनिश्चित करना तथा किसी भी प्रकार के आयोजन के प्रबंध की जिम्मेदारी होती है

                           एक टेलीविज़न चैनल को संचालित करने में इन सभी विभागों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है लेकिन एक समाचार चैनल में सबसे प्राथमिक और महत्वपूर्ण विभाग संपादकीय विभाग होता है इसका कारण यह है कि समाचार चैनल की पहचान उस पर प्रसारित समाचारों की गुणवत्ता और महत्ता से होती है टेलीविज़न पत्रकारिता की पहचान स्थापित करने का सारा दारोमदार संपादकीय विभाग पर होता है दूसरे शब्दों में कहें तो संपादकीय विभाग में होने वाला समस्त कार्य टेलीविजन पत्रकारिता के अन्तर्गत आता है इस विभाग का प्रमुख चैनल का मुख्य संपादक या संपादक होता है   

                      संपादकीय विभाग को दो प्रमुख विभागों में बांटा जा सकता है   1. इनपुट     2. आउटपुट

इनपुट जैसा कि नाम से ही जाहिर है, एक समाचार चैनल में प्रसारित की जाने वाली सामग्री का प्राथमिक स्वरूप में संग्रहण या संकलन करना इस विभाग का कार्य है जैसे किसी चैनल पर भूमि अधिग्रहण बिल पर आधे घंटे का कार्यक्रम प्रसारित होता है इस कार्यक्रम में चलने वाली खबर, इस चर्चा में इस्तेमाल की गई शोधपरक जानकारियां, और कार्यक्रम में  चर्चा के लिए अतिथि तक सभी उपलब्ध करवाना इनपुट विभाग की जिम्मेदारी है  प्रमुख रूप से इस विभाग के चार हिस्से होते हैं

1. समाचार ब्यूरो या संवाददाता किसी भी समाचार चैनल की सबसे अहम और प्रथम कड़ी होती है उसका संवाददाता संवाददाता या रिपोर्टर औपचारिक और अनौपचारिक सूत्रों से सूचनाओं का संकलन करता है इन सूचनाओं को अपनी संपादकीय समझ से एक समाचार के रूप में विकसित करता है और चैनल तक पहुंचाता है चैनल के मुख्यालय के अतिरिक्त जब रिपोर्टर्स किसी राज्य की राजधानी या महत्वपूर्ण स्थान पर रोजाना रिपोर्ट करते हैं तो चैनल की कार्यप्रणाली में इसे ब्यूरो कहा जाता है   

2. असाइनमेंट डेस्कयह किसी भी समाचार चैनल में सबसे अधिक हलचल और भागदौड़ वाला विभाग होता है आमतौर पर यहां किसी छोटे शेयर बाज़ार जैसा माहौल होता है दरअसल यह कई विभागों के बीच समन्वय स्थापित करने वाला विभाग है। मुख्य रूप से यह विभाग रिपोर्टर्स से आने वाली सूचनाओं एवं समाचारों को आउटपुट विभाग तक पहुंचाता है, और आउटपुट की ओर से मांगी गई सूचनाओं, समाचारों की उपलब्धता को सुनिश्चित करता है रिपोर्टर्स को फील्ड में तकनीकी या अन्य सहयोग पहुंचाना और लाइव प्रसारण इत्यादि व्यवस्थाओं की निगरानी करना भी इसी विभाग का काम होता है

3. रिसर्च विभागकिसी भी विषय पर कार्यक्रम बनाने के लिए प्रोड्यूसर को, किसी कार्यक्रम को प्रस्तुत करते हुए एंकर को और खबरों को कवर करते हुए रिपोर्टर्स को कई विषयों के बारे में बहुत सारी जानकारी की जरूरत पड़ती है यह तमाम शोधपरक जानकारी उपलब्ध कराने का कार्य रिसर्च विभाग करता है

4. गेस्ट कॉर्डिनेशन विभागएक चौबीस घंटे के समाचार चैनल में कई प्रकार के प्रासंगिक राजनीतिक, मानवीय, सामाजिक, स्वास्थ्य या कई ताज़ा विवादित विषयों पर कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं इन कार्यक्रमों में विशेषज्ञ वक्ताओं या विभिन्न पक्षों के प्रवक्ताओं को शामिल करना आवश्यक होता है इन अतिथियों को सही कार्यक्रम में सही समय पर लाना इस विभाग का कार्य होता है इसके अतिरिक्त मेहमानों के साथ चैनल के रिश्ते सद्भावनापूर्ण रहे इसको सुनिश्चित करना भी इसी विभाग का काम होता है

आउटपुट  संपादकीय विभाग का यह दूसरा स्तंभ है पूरा संपादकीय विभाग इनपुट और आउटपुट नामक स्तंभों पर ही खड़ा होता है इनपुट विभाग से प्राप्त होने वाली प्राथमिक सामग्री ( Primary content) को संपादन के ज़रिए प्रसारण के लिए उपयुक्त स्वरूप में तैयार करने का कार्य आउटपुट विभाग करता है इस विभाग के भी विभिन्न अंग हैं

1. कॉपी लेखन एवं संपादन  रिपोर्टर से प्राप्त सूचना अथवा प्राथमिक स्क्रिप्ट जब असाइनमेंट द्वारा आउटपुट को दी जाती है तो उसको एक प्रसारण योग्य स्क्रिप्ट में बदलने के लिए कॉपी डेस्क के हवाले किया जाता है कॉपी राइटर समाचार के साथ प्राप्त दृश्यों को देखकर और प्राथमिक जानकारी को लेकर स्टोरी की स्क्रिप्ट लिखता है, और फिर कॉपी संपादक उसका संपादन करता है इसी स्क्रिप्ट पर आधारित एक टेलीविज़न स्टोरी कई चरणों से गुजर कर प्रसारित होती है

2. प्रोडक्शन कॉपी डेस्क द्वारा तैयार की गई लिखित स्क्रिप्ट को टेलीविज़न प्रसारण के योग्य बनाने के लिए उसके अनुसार दृश्य संपादन (video editing) की आवश्यकता होती है इस स्क्रिप्ट में यदि फॉर्मेट की मांग है तो वॉइस ओवर करवाकर दृश्य संपादन पूरा करने के लिए दिया जाता है इस सारी प्रक्रिया को संपन्न करवाने का कार्य प्रोडक्शन विभाग का होता है प्रोडक्शन से जुड़े प्रोफेशनल्स पर एक स्टोरी के प्रसारण योग्य अंतिम स्वरूप में पहुंचने तक सारी प्रक्रिया की देखरेख करनी होती है, तथा इसके बाद इसे उचित स्थान पर भेजना होता है

3. रनडाउन यह वह स्थान है जहां एक समाचार बुलेटिन या कार्यक्रम में चलने वाली सभी स्टोरीज़ तथा सामग्री इकट्ठा होती है, और उन्हें प्रसारण की योजना के अनुसार व्यवस्थित किया जाता है एक प्रकार से यहा एक कार्यक्रम या बुलेटिन का ढांचा खड़ा होता है जो प्रोडक्शन कंट्रोल रूम यानि पीसीआर को भेजा जाता है रनडाउन प्रसारण के लिए तैयार स्टोरीज के उस व्यवस्थित क्रम को कहते हैं जिसमें विजुअल, ग्राफिक्स इनपुट के साथ साथ लाइव इत्यादि की योजना भी स्पष्ट होती है इस डेस्क से जुड़े लोग प्रत्येक बुलेटिन के अंतिम प्रारूप के उत्तरदायी होते हैं

4. अपडेट और मॉनीटरिंग डेस्क ये विभाग चैनल की स्क्रीन पर ग्राफिक्स द्वारा चलने वाले लगातार अपडेट को संपन्न करता है, तथा अलग अलग चैनलों पर चलने वाली खबरों को मॉनीटर भी करता है कई चैनलों में इन्हे कुछ दूसरे विभागों के साथ ही जोड़ दिया जाता है लगातार चलने वाले ग्राफिक अपडेट को टिकर, स्क्रॉल इत्यादि कहा जाता है

मुख्य रूप से चैनल इन विभागों के तहत ही संपादकीय कार्य होता है, लेकिन पीसीआर , ग्राफिक्स, और कैमरा विभागों को भी संपादकीय विभाग से जुड़ा माना जाता है इन विभागों से जुड़े प्रशासनिक मसले तकनीकी विभाग देखता है, किंतु इनकी जवाबदेही संपादकीय विभाग के प्रति अधिक होती है इन विभागों में काम करने वाले प्रोफेशनल्स से पत्रकारीय एवं संपादकीय समझ की अपेक्षा की जाती है मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि संपादकीय विभाग के विभिन्न अंगों से जुड़े लोगों के साथ साथ इन प्रोफेशनल्स को भी टेलीविज़न पत्रकारिता का अंग माना जा सकता है       

टेलीविज़न पत्रकारिता का अध्ययन करते हुए हम इसे कुछ प्रश्नों और उनके उत्तर के आधार पर समझ सकते हैं

  • सबसे पहला प्रश्न यह है कि पत्रकारिता को टेलीविज़न या रेडियो या प्रिंट पत्रकारिता कहने की आवश्यकता क्या है ?

इस प्रश्न के उत्तर को हम एक उदाहरण के रूप में समझ सकते हैं कि जैसे पानी पर चलने वाले जहाज, सड़क पर चलने वाली कार और हवा में उड़ने वाले हवाई जहाज को अलग अलग करके देखने तथा अलग अलग नाम देने की आवश्यकता होती है जबकि तीनों का ही प्रथमिक उद्देश्य परिवहन है उसी प्रकार अलग अलग माध्यमों के द्वारा की जा रही पत्रकारिता को उन माध्यमों की पहचान के साथ जोड़कर समझना बेहद आवश्यक है पत्रकारिता के प्राथमिक उद्देश्य के अतिरिक्त प्रत्येक माध्यम की अपनी आवश्यकताएं, सीमाएं तथा शक्तियां हैं

  • टेलीविज़न पत्रकारिता को किस प्रकार परिभाषित करेंगे ?

‘इनसाइक्लोपीडिया ऑफ ब्रिटेनिका’ के आधार पर किए गए एक विश्लेषण के अनुसार पत्रकारिता के लिए अंग्रेज़ी में जर्नलिज्म शब्द का प्रयोग किया जाता है जो जर्नल से निकला है इसका शाब्दिक अर्थ है दैनिक दिन प्रतिदिन के क्रियाकलापों सरकारी बैठकों आदि का विवरण जर्नल में रहता था एक दूसरे संदर्भ के मुताबिक जर्नलिज्म शब्द फ्रैंच भाषा के शब्द जर्नी से निकला है जिसका अर्थ रोजमर्रा के कामों या घटनाओं का विवरण प्रस्तुत करना एक शब्द के रूप में पत्रकारिता या जर्नलिज्म शब्द का अर्थ दिन प्रतिदिन की घटनाओं की तथ्यात्मक सूचनाओं का संकलन और संप्रेषण ही है लेकिन  धीरे धीरे व्यवहार रूप में पत्रकारिता की इस परिभाषा का विस्तार होता चला गया और सूचनाओं के संकलन से आगे बढकर यह सूचनाओं के अन्वेषण तथा विश्लेषण तक पहुंच गया जब पत्रकारिता को टेलीविज़न के साथ जोड़ते हैं तो शाब्दिक अर्थ के अनुसार सूचनाओं अथवा समाचारों का सदृश्य विवरण तथा विश्लेषण प्रस्तुत करना ही टेलीविज़न पत्रकारिता है

  • दूसरे माध्यमों की तुलना में टेलीविजन पत्रकारिता की ताकत क्या है ?

1.   दृश्य टेलीविजन पत्रकारिता की परिभाषा का जिक्र करते हुए हमने सूचनात्मक विवरण के साथ दृश्य की अनिवार्यता को समझा है एक पुरानी कहावत के अनुसार आंखों से देखी गई घटना में सत्य की सर्वाधिक संभावना होती है इसलिए यह दर्शकों का यही आखों देखा वाला विश्वास टेलीविज़न पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत है टेलीविजन पत्रकारिता में दृश्य सहित विवरण के कारण दर्शकों का उसमें ना केवल विश्वास बढ़ता है, बल्कि समाचारों के प्रति उनकी रुचि, उत्साह और रोमांच भी बढ़ता है

2. शीघ्र या तत्काल संप्रेषण  टेलीविज़न पत्रकारिता में सूचनाओं का प्रसारण शीघ्रता से होता है तकनीक के प्रभाव और इस माध्यम के स्वभाव के कारण संकलन के साथ ही अथवा संकलन के तत्काल बाद समाचार का प्रसारण टेलीविज़न पत्रकारिता की प्राथमिकता है जैसे ही किसी संवाददाता को किसी घटना की जानकारी मिलती है वह उसे सबसे कम समय में प्रसारित किए जा सकने वाले फॉर्मेट में प्रसारित करवाने की कोशिश करता है उदाहरण के तौर पर दिल्ली के समीप गाज़ियाबाद में किसी ट्रेन का एक्सीडेंट हुआ है, और संवाददाता घटनास्थल से दूर है, किंतु उसे उसके स्रोत से जानकारी मिली है इस जानकारी के बाद प्रिंट माध्यम का पत्रकार घटनास्थल के लिए रवाना होगा और पूरे इत्मिनान के साथ सूचनाएं जुटाएगा तथा रात तक अपनी पूरी खबर प्रकाशन के लिए दे देगा जो कि अगले दिन समाचार पत्र में प्रकाशित होगी लेकिन दूसरी ओर टेलीविजन रिपोर्टर को खबर मिलते ही वह घटनास्थल के लिए निकलने के साथ साथ अपने न्यूज़ रूम को जानकारी देगा और सर्वप्रथम फोन के द्वारा ही इस समाचार को प्रसारित करवाएगा इसके बाद चैनल से घटना के लाइव कवरेज की व्यवस्था की जाएगी और लगभग घटनास्थल पर रिपोर्टर के पहुंचने साथ ही दृश्यों सहित खबर का प्रसारण सुनिश्चित हो जाएगा अत: टेलीविज़न पत्रकारिता में यह तात्कालिकता और लाइव तत्व उसकी बड़ी ताकत हैं 

3. सरल संप्रेषण मुद्रित माध्यम की पत्रकारिता में पाठक के लिए पहली शर्त यह होती है कि वह पढ़ा लिखा होना चाहिए ताकि शब्दों को पढकर समझ सके टेलीविज़न पत्रकारिता की यह ताकत है कि बिना पढ़ा लिखा व्यक्ति भी दृश्यों और ध्वनि के इस संगम से देख सुनकर समाचार अथवा सूचना को समझ सकता है उदाहरण के लिए मौसम विभाग की ओर से किसी क्षेत्र में समुद्री तूफान की आशंका जताई गई है, और मछुआरों को कुछ दिनों तक समुद्र में ना जाने की चेतावनी दी गई है समाचार पत्रों में प्रकाशित इस सामग्री को पढ़कर सभी मछुआरों तक कम समय में इस पूरी जानकारी का पहुंचना मुश्किल होगा लेकिन यदि टोलीविजन रिपोर्टर इस आशंका पर दृश्यों और मौसम विभाग के बयान (बाइट) सहित खबर दिखाएगा तो इसका तुरंत असर होगा अत: टेलीविज़न अत्य़धिक आधुनिक तकनीक वाला माध्यम होते हुए भी जन साधारण के लिए अधिक सुविधाजनक है

4. रुचि जगाने वाला माध्यम – आमतौर पर किसी गांव या कस्बे या शहर में समाचारों के प्रति रुचि रखने वाले और पूरे समाचार पत्र को गंभीरता से पढ़ने वाले लोग कम होते हैं खास तौर पर भागमभाग  वाली अतिव्यस्त और धन केन्द्रित जीवन शैली में पूरा समय लगाकर समाचारों को पढना और समझना कठिन हो रहा है ऐसे में टेलीविज़न पत्रकारिता के द्वारा समाचारों के संपर्क में रहना और अपने ज़रूरी काम निपटाते हुए भी इस माध्यम से जानकारियां जुटाना सबसे आसान है आप सुबह का नाश्ता करते हुए, दफ्तर में कुछ ज़रूरी फाइलें निपटाते हुए, शाम को दोस्तों के साथ चाय पीते हुए कहीं भी चौबीस घंटे टेलीविजन समाचार देख सकते हैं अर्थात सूचनाओं और समाचारों के लिए आपका कम से कम समय खर्च करवाने की सुविधा टेलीविज़न पत्रकारिता की एक और महत्वपूर्ण ताकत है 

  • टेलीविज़न पत्रकारिता की सीमाएं क्या हैं ?

1.   दृश्यों की अनिवार्यता – टेलीविज़न समाचार की सबसे बड़ी ताकत ही टेलीविजन पत्रकारिता की सबसे बड़ी सीमा भी बन जाती है टेलीविज़न समाचार बाकी माध्यमों के मुकाबले दृश्यों की उपलब्धता के कारण सबसे अधिक प्रभावी है टेलीविजन पत्रकारिता के लिए यह ताकत कई बार एक चुनौती के रूप में सामने आती है किसी और माध्यम में पत्रकार को सूचना या जानकारी मिलने पर वह खबर लिखना शुरु करता है और उसे अपने पाठक या श्रोता तक पहुंचाता है टेलीविजन पत्रकार के लिए महज सूचना या जानकारी मिलने पर काम पूरा नहीं होता अपितु यह कहना चाहिए कि सूचना मिलने के बाद उसका काम शुरु होता है टेलीविजन समाचार की दृश्य की शर्त को पूरा करने के लिए टेलीविज़न पत्रकार को समय और शक्ति लगानी पड़ती है

                            समाचार की सामग्री के अनुसार दृश्यों को जुटाना कई बार बेहद कठिन कार्य हो जाता है साथ ही दृश्यों के साथ साथ संबंधित लोगों के बयान (बाइट) लेना भी आवश्यक होता है ऐसे में आमतौर पर समाचार पत्रों के पत्रकारों का फोन पर बात करने से काम चल जाता है लेकिन टेलीविजन पत्रकार के लिए यह पर्याप्त नहीं है संबंधित व्यक्ति कहां, किस वक्त उपलब्ध होगा यह तय करने में बड़ी मशक्कत करनी पड़ती है जिस व्यक्ति के लिए समाचार नकारात्मक होता है वह बयान(बाइट) देने से बचने की कोशिश करता है जिस व्यक्ति से बयान लेना समाचार की दृष्टि से अत्यंत आवश्यक होता है, उसको बाइट के लिए तैयार करना तथा उसके अनुसार तय किए गए समय एवं स्थान पर पहुंचना पड़ता है इस कवायद के साथ साथ खबर की विस्तृत जानकारी जुटाना, दृश्यों को शूट करना तथा उपलब्ध जानकारी को न्यूज़ रूम के साथ साझा करना भी जारी रहता है इसलिए जानकारियों के साथ साथ दृश्यों और बयानों को जुटाने का कार्य काफी चुनौतीपूर्ण होता है

                        कई बार कुछ दस्तावेज आधारित या सूत्र आधारित खबरों में यह समस्या और दुष्कर होती है जब बयान और दृश्य दोनों मिलना असंभव हो जाता है ऐसे में संवाददाता को तमाम जानकारी के बावजूद खबर को छोड़ना पड़ता है, या फिर कुछ समय के लिए स्थगित करना पड़ता है उदाहरण के तौर पर किसी संवेदनशील सरकारी विभाग में कोई घोटाला चल रहा है आपका अपना सूत्र इसकी जानकारी आपको दे रहा है लेकिन वह इतना सक्षम नहीं है कि इसके दृश्य आपको शूट करवा सके प्रिंट माध्यम में संवाददाता सूत्र की जानकारी को आधार बनाकर समाचार लिख सकते हैं और सक्षम अधिकारी से उसका बयान भी फोन पर या मिलकर ले सकते हैं लेकिन टेलीविजन पत्रकार के लिए संबंधित दृश्य और दस्तावेज जुटाए बिना समाचार चला पाना कठिन होगा सक्षम अधिकारी से भी कैमरे समक्ष बयान लेने के लिए अतिरिक्त प्रयास की जरूरत होगी अत: टेलीविजन समाचार में जो दृश्य तत्व उसे प्रभावी बनाता है, उसी दृश्य तत्व की अनिवार्यता कई बार टेलीविजन पत्रकारिता की सीमा बन जाती है

2. समयबद्धता की सीमा – किसी अन्य माध्यम की तुलना में टेलीविज़न के लिए समाचार  जुटाने में जहां अधिक मेहनत की आवश्यकता होती है, वहीं इस अधिक मेहनत के लिए समयबद्धता भी एक चुनौती होती है टेलीविजन पत्रकार के पास समाचार पत्र पत्रिका के संवाददाता की तरह यह सुविधा नहीं होती कि खबर की जानकारी किसी भी समय मिले लेकिन पत्र पत्रिका के प्रकाशन के लिए जाने से पहले तक का समय उसके पास हो टेलीविजन पत्रकार को तो पहली सूचना के साथ ही अलग अलग फॉर्मेट में खबर चलाते रहना होता है और इसके साथ साथ विस्तृत जानकारी तथा संबंधित दृश्य, बयान भी जुटाने होते हैं यदि टेलीविज़न पत्रकार समाचार के प्रसारण में समयबद्धता का ध्यान नहीं रखता तो उस समाचार के निष्प्रभावी हो जाने का खतरा बना रहता है इसके साथ ही अनेक समाचार चैनलों के बीच सबसे पहले खबर दिखाने की स्पर्धा का भी टेलीविज़न पत्रकार की खबर के लिए समय सीमा पर दबाव रहता है एक टेलीविजन पत्रकार खबर को रोककर उस पर विचार करने का समय नहीं होता क्योंकि तब तक किसी और चैनल के द्वारा खबर दिखाए जाने का डर हमेशा बना रहता है   

3. तकनीक और व्यक्तियों के साथ समन्वय की सीमा – एक टेलीविज़न पत्रकार अकेला कुछ नहीं कर सकता एक समाचार को संपूर्णता के स्वरूप में लाने के लिए उसकी निर्भरता व्यक्तियों और तकनीक पर रहती है सामान्य तौर पर एक समाचार का सारा दारोमदार एक पत्रकार पर ही रहता है वह औपचारिक अथवा अनौपचारिक सूत्रों के द्वारा सूचनाएं जुटाता है और उनके आधार पर समाचार बनाता है लेकिन टेलीविजन में ऐसा नहीं है सूचनाएं जुटाने, संपूर्ण समाचार की योजना बनाने या लिखने का काम टेलीविज़न पत्रकार को करना ही होता है परंतु इसके अतिरिक्त उसको अपनी टीम और तकनीक का समन्वय भी करना पड़ता है एक टेलीविज़न पत्रकार को कैमरामैन, कैमरा असिस्टेंट, असाइनमेंट के साथी और लाइव प्रसारण करने वाली ओबी वैन के इंजीनियर्स के साथ लगातार समन्वय स्थापित करना जरूरी होता है किसी भी समाचार को कवर करते समय रिपोर्टर अपने कैमरामैन के साथ यदि अपना नजरिया या कहें खबर का एंगल साझा नहीं करता है तो कभी भी एक प्रभावी और प्रासंगिक दृश्य वाली खबर बनना संभव नहीं होगा खबर की सामग्री के अलावा उसकी अवधि का ख्याल रखना और अपनी टीम को इसकी जानकारी देना टेलीविजन पत्रकार के लिए जरूरी हो जाता है किसी महत्वपूर्ण या आकस्मिक सूचना मिलने पर उसका शीघ्रता से या लाइव कवरेज करने की योजना बनाने के लिए ओबी वैन के इंजीनियर्स के साथ समन्वय करना होता है टीम वर्क और टीम कॉर्डिनेशन के बिना एक टेलीविज़न पत्रकार के लिए अच्छी रिपोर्ट बनाना संभव नहीं है व्यक्तियों के साथ साथ एक टेलीविजन पत्रकार को कार्य करते समय अपने तकनीकी उपकरणों की उपलब्धता और कार्यशीलता सुनिश्चित करनी चाहिए उदाहरण के तौर पर एक बहुत महत्वपूर्ण समाचार को कवर करते समय यदि कैमरे की बैट्री खत्म हो जाए तो टेलीविज़न रिपोर्टर की पूरी मेहनत बेकार हो जाएगी इसलिए खबर कवर करने के लिए निकलते समय ही सभी उपकरणों की जांच ज़रूरी है सभी उपकरण ठीक हों और आपके कैमरामैन को आपकी स्टोरी के ज़रूरी दृश्यों की जानकारी ना हो तो भी पूरी स्टोरी के खराब होने की आशंका बनी रहेगी अत: टेलीविजन पत्रकार के लिए स्वंय की योग्यता, जानकारी, प्रतिभा के अतिरिक्त दूसरे व्यक्तियों एवं उपकरणों की सक्षमता भी बेहद जरूरी है 

  • टेलीविजन पत्रकारिता को समझने के लिए समाचार चैनल की कार्यप्रणाली से परिचय कितना जरूरी है और इसे किस प्रकार समझा जा सकता है ?

किसी भी माध्यम के लिए पत्रकारिता करते समय उस माध्यम की सामान्य जानकारी आवश्यक है लेकिन टेलीविज़न पत्रकारिता  के लिए टेलीविज़न समाचार चैनल की कार्यप्रणाली की अच्छी समझ जरूरी है जैसे एक समाचार पत्र के लिए काम करने वाले पत्रकार को यह जानना ज़रूरी नहीं है उस अख़बार की प्रिंटिंग कहां होती है और कौन करता है, लेकिन किसी चैनल में काम करने वाले रिपोर्टर को यह पता होना चाहिए चैनल का फाइनल आउटपुट कहां से जाता है उसे चैनल के अलग अलग विभागों और उनमें काम करने वाले लोगों की जानकारी होनी चाहिए क्योंकि एक टेलीविज़न पत्रकार को खबर कवर करने के साथ साथ उसके प्रोडक्शन पार्ट का भी हिस्सा बनना होता है जैसे रिपोर्टर अपनी खबर के दृश्यों का प्रीव्यू करता है, उसकी वीडियो एडिटिंग और स्क्रिप्टिंग में सहयोग करता है खबर कवर करने के बाद भी उसे खबर के प्रसारण के साथ विभिन्न भूमिकाओं में उपस्थित रहना पड़ता है खबर के फॉलोअप के लिए उसका लाइव इनपुट लिया जा सकता है एक टेलीविज़न पत्रकार के लिए खबर एक बच्चे की तरह होती है, प्रत्येक स्तर पर जिसकी ठीक परवरिश को सुनिश्चित करना उसकी जिम्मेदारी होती है जैसे बच्चे को स्कूल तो भेजा जाता है लेकिन सिर्फ टीचर के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता वैसे ही टेलीविजन रिपोर्टर अपनी स्टोरी को किसी वीडियो एडिटर, स्क्रिप्ट राइटर या फिर अंत में एंकर के भरोसे नहीं छोड़ सकता उसे हर विभाग और हर प्रकार के व्यक्ति से समन्वय स्थापित करते हुए स्टोरी के सफल प्रसारण को संभव बनाना पड़ता है

  • टेलीविजन पत्रकारिता में उपयोग होने वाले महत्वपूर्ण तकनीकी शब्द एवं विभिन्न जिम्मेदारियों के  अनुसार पदनाम क्या हैं ?

टेलीविजन पत्रकारिता में रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाले शब्द इस प्रकार हैं – स्टोरी कवरेज, इनजस्ट, शूट , ट्राइपॉड, पोटा किट, लाइव, पीटीसी, वॉक थ्रू, वॉक्सपॉप, पैकेज, बाइट, पीसीआर, एमसीआर, सिमसैट, एंकर रीड, वॉइस ओवर, रिकॉर्डिंग, ब्रेक, क्लोज़िंग, रनऑर्डर, रनडाउन इत्यादि

समाचार चैनल में विभिन्न जिम्मेदारियों के लिए पदनाम इस प्रकार हैं – एडिटर इन चीफ , एक्जीक्यूटिव एडिटर , टेक्नीकल हेड , आउटपुट एडिटर, इनपुट एडिटर , एक्ज़ीक्यूटिव प्रोड्यूसर, सीनियर प्रोड्यूसर, प्रोटरड्यूसर, एसोसिएट प्रोड्यूसर, असिस्टेंट प्रोड्यूसर, प्रोडक्शन एक्ज़िक्यूटिव, वीडियो एडिटर, ग्राफिक आर्टिस्ट, कैमरा मैन, पैनल प्रोड्यूसर या स्टूडियो डायरेक्टर, ऑनलाइन एडिटर, ऑडियो मैनेजर आदि

हम जनसंचार माध्यम के रूप में टेलीविजन की भूमिका की चर्चा करें इससे पूर्व संचार के इतिहास को विभिन्न परिभाषाओं के माध्यम से संक्षिप्त में समझने का प्रयास करेंगे

                            संचार का शाब्दिक अर्थ होता हैकिसी सूचना या संदेश को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुंचाना या सम्प्रेषित करना। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति तक अपनी बात या विचार तभी संप्रषित कर सकता है, जब वे एक दूसरे के लिए परिचित संकेतों या भाषा का प्रयोग करें सामान्य प्रवृत्ति के रूप में संचार प्रक्रियाओं का विकास निरंतर होता रहा किंतु एक विषय के रूप में इस पर अध्ययन काफी देर से शुरु हुआ फिर भी अनेक विद्वानों ने अपने अपने अध्ययन और शोध के आधार पर संचार को परिभाषित करने का प्रयास किया है संचार का मूल तत्व विचारों अथवा सूचनाओं का संप्रेषण और उनकी प्राप्ति है इसमें कोई संदेह नहीं है, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया अगल अलग दृष्टि से व्याख्यायित किया जाता रहा है और इस प्रकार के अध्ययन अब भी लगातार जारी हैं अत: निम्न लिखित परिभाषाओं को संचार के विषय में हम अपनी समझ को अधिक परिष्कृत करने में उपयोग कर सकते हैं   

  • विचारों, जानकारी वगैरह का विनिमय, किसी और तक पहुंचाना या  बांटना, चाहे वह लिखित, मौखिक या सांकेतिक हो, संचार है।ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी 
  • संचार उन सभी क्रियाओं का योग है जिनके द्वारा एक व्यक्ति दूसरे के साथ समझदारी स्थापित करना चाहता है। संचार अर्थों का एक पुल है। इसमें कहने, सुनने और समझने की एक व्यवस्थित तथा नियमित प्रक्रिया शामिल है।लुईस ए एलेन
  • एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को सूचना भेजने तथा समझने की विधि है। यह आवश्यक तौर पर लोगों में अर्थ का एक पुल है। पुल का प्रयोग करके एक व्यक्ति आराम से गलत समझने की नदी को पार कर सकता है।कैथ डैविस 
  • संचार से तात्पर्य उन समस्त तरीकों से है, जिनको एक व्यक्ति अपनी विचारधारा को दूसरे व्यक्ति की मस्तिष्क में डालने या समझाने के लिए अपनाता है। यह वास्तव में दो व्यक्तियों के मस्तिष्क के बीच की खाई को पाटने वाला सेतु है। इसके अंतर्गत कहने, सुनने तथा समझने की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया सदैव चालू रहती है।ऐलन 
  • मनोवैज्ञानिक दृष्टि से संचार से तात्पर्य व्यक्तियों के बीच विचारों और अभिव्यक्तियों के आदानप्रदान से है।मैकडेविड और हरारी 
  • आम तौर पर संचार तब होता है, जब एक सिस्टम या स्रोत किसी दूसरे या गंतव्य को विभिन्न प्रकार के संकेतों के माध्यम से प्रभावित करेंचार्ल्स ई. ऑसगुड  

उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि संचार प्रक्रिया में चार अंग प्रमुख हैं – 1.प्रेषक अर्थात संदेश भेजने वाला, 2. संदेश, 3.माध्यम, 4.प्राप्तकर्ता    

इन चारों अंगों की भूमिका के द्वारा संचार प्रक्रिया को निम्न प्रकार समझा जा सकता है – प्रेषक—-संदेश—-माध्यम—–प्राप्तकर्ता

इस रूप में संचार प्रक्रिया सम्पन्न होती है लेकिन इसमें कुछ बातों का विचार और आवश्यक है सफल संचार वही है जिसमें प्रेषक द्वारा दिए गए संदेश का वही अर्थ प्राप्तकर्ता प्राप्त कर सके जो प्रेषक प्रषित करना चाहता है इसके लिए संदेश की कोडिंग और डिकोडिंग को समझना आवश्यक है इसका अर्थ यह है कि संचार के लिए प्रेषक और प्राप्तकर्ता के बीच समान अनुभूति या समझ का होना आवश्यक है यह समान समझ की सबसे अधिक संभावना भाषा औऱ शब्दों के द्वारा संभव है उदाहरण के तौर पर प्रेषक किसी वस्तु को ‘कम्प्यूटर’ कहता है तो प्राप्तकर्ता के लिए उसके शब्द का अर्थ समझने के लिए पहले इस कोड अर्थात भाषा से परिचय जरूरी है कोडिंग और डिकोडिंग के आधार पर ही संचार के इतिहास को भी समझा जा सकता है मनुष्य आदिमानव था तो अनेक प्रकार की समान अनुभूतियों को संकेतों में एक दूसरे से बांटता था धीरे धीरे भाषाओं और लिपियों का विकास हुआ और संचार एक व्यवस्थित रूप में संभव हुआ इससे अधिकांश अन्तरवैयक्तिक संचार ही संभव हुआ उद्योग और व्यापार के क्षेत्र में जब तकनीक का विकास हुआ, नए नए आविष्कार हुए तो संचार ने भी नए आयामों की तरफ कदम बढाए अब तक गांव या कबीले तक सीमित संचार व्यापक क्षेत्र और व्यापक जनसमुदाय तक विस्तार पा गया  छापेखाने के आविष्कार से शुरु हुई संचार क्रांति फोटोग्राफीटेलीग्राफीरेडियो और टेलीविज़न के आविष्कारों से समृद्ध होते हुए इंटरनेट तक पहुंच गई है इंटरनेट से पहले रेडियो और टेलीविज़न ने ही वास्तविक संचार क्रांति को जन्म दिया अनेक प्रकार की आधुनिक प्रसारण तकनीकों के आविष्कार के कारण रेडियो और टेलीविजन ने सारी दुनिया को एक इकाई के रूप में तब्दील कर दिया सूचनाओं और विचारों का आदान प्रदान सबसे सशक्त रूप में द्रुत गति से संभव हुआ रेडियो ने जहां आवाज़ के माध्यम से सूचनाओं को पंख लगाए वहीं टेलीविजन ने इस संचार को दृश्यात्मकता से जोड़कर आंखें प्रदान की

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