उत्तराखंड के छह फीसद गांव हो गये ‘भुतहा’, नेताओं, देवी-देवताओं ने भी कर दिया पलायन


पहाड़ के एक गाँव में पलायन के बाद वीरान पड़ा एक संभ्रांत परिवार का घर और मंदिर

पहाड़ के एक गाँव में पलायन के बाद वीरान पड़ा एक संभ्रांत परिवार का घर और मंदिर

-60 लाख पर्वतीय आबादी में से 32 लाख लोगों ने किया पलायन, 17,793 गांवों में 1,053 गांव हो गये खाली

नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड प्रदेश में ‘विकास’ के लिये 409 अरब रुपये कर्ज लेने के बाद भी राज्य की अवधारणा के अनुरूप पलायन नहीं रुका है। 2011 की ताजा जनगणना के अनुसार प्रदेश के 17,793 गांवों में 1,053 यानी करीब छह फीसद गांव खाली हो चुके हैं, बल्कि इन्हें ‘भुतहा गांव’ (घोस्ट विलेज) कहा जा रहा है। वहीं कुल मिलाकर करीब एक करोड़ की आबादी वाले इस राज्य की पर्वतीय क्षेत्र में रहने वाली 60 लाख की आबादी में से 32 लाख लोगों का पलायन हो चुका है। प्रदेश के अधिकांश बड़े राजनेताओं (कोश्यारी, बहुगुणा, निशंक, यशपाल आर्य) ने भी अपने लिये मैदानी क्षेत्रों की सीटें तलाश ली हैं, वहीं भूमिया, ऐड़ी, गोलज्यू, छुरमल, ऐड़ी, अजिटियां, नारायण व कोटगाड़ी सहित कई देवताओं ने भी पहाड़ों से मैदानों में पलायन कर दिया है।

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उत्तराखंड राज्य की वर्ष 2011 में हुई जनगणना में आबादी एक करोड़ एक लाख 16 हजार 752 है, लेकिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का दावा है कि इससे तीन गुना उत्तराखंडी पलायन कर चुके हैं। संघ के अनुसार 30-35 लाख उत्तराखंडी प्रवासी तो अकेले दिल्ली में ही हैं, जबकि अमेरिका, जापान, यूएई सहित दुनिया भर में फैले हुए हैं। जापान जैसे छोटे देश में भी संघ के अनुसार करीब 35 हजार उत्तराखंडी रहते हैं। संघ अब इन लोगों को वर्ष में कम से कम एक बार सप्ताह भर के लिए अपने मूल गांव वापस लाने का खाका बुन रहा है। इस हेतु संघ ने प्रदेश की 670 न्याय पंचायतों में ‘मेरा गांव-मेरा तीर्थ’ योजना शुरू की है। विस्तार से पढ़ें यहाँ….

प्रदेश के खासकर सीमांत क्षेत्रों उत्तरकाशी से लेकर चंपावत तक नेपाल-तिब्बत (चीन) से जुड़ी सरहद मानव विहीन होने की स्थिति में पहुंच गई है और यह इलाका एक बार फिर इतिहास दोहराने की स्थिति में आ गया है। कई सौ साल पहले मुगल और दूसरे राजाओं के उत्पीड़न से नेपाल समेत भारत के विभिन्न हिस्सों से लोगों ने कुमाऊं और गढ़वाल की शांत वादियों में बसेरा बनाया था। लेकिन आजादी के बाद सरकारें इन गांवों तक बुनियादी सुविधाएं देने में नाकाम रहीं, जिस कारण पलायन ने गति पकड़ी, और सरकारी आंकड़ों के अनुसार ही पहाड़ के 1,053 पर्वतीय गांव खाली हो गये। जबकि वास्तविकता यह है कि अकेले कुमाऊं में ही पांच हजार से अधिक गांव वीरान हो गये हैं। खासतौर पर नेपाल और तिब्बत सीमा से लगे गांवों से अधिक पलायन हुआ है, और हजारों एकड़ भूमि बंजर हो गई है। पलायन की गति 1980 के दशक से बढ़ी मानी जाती है। उस दौर में शहरों की ओर निकले लोग अब वृद्ध होने की स्थिति में स्वयं को पहाड़ की बजाय मैदानों में ही स्वयं को सुरक्षित मान रहे हैं, और वे हर साल पहाड़ आने से बचने के लिये अपने ग्राम व ईष्ट देवी-देवताओं को भी साथ मैदानों की ओर ले गये हैं।

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राज्य बनने के बाद पलायन पहाड़ से पलायन अपने ही राज्य में तराई-भावर की ओर अधिक हुआ है। राज्य बनने के बाद अकेले पिथौरागढ़ जिले से लगभग 17 हजार परिवार पलायन कर चुके हैं। इनमें से अधिकांश हल्द्वानी या तराई के इलाकों में बस गए हैं, और यहीं तीन से चार हजार तक विभिन्न पर्वतीय देवी-देवताओं नामों के देवी देवताओं के मंदिर भी बन गये हैं। पलायन के कारणों की पड़ताल करें तो पहाड़ों में 0.68 हेक्टेयर औसत भूमि स्वामित्व है, जो कि बहुत कम है। वहीं कभी कभी 60 फीसद से अधिक ग्रामीण रोजगार देने वाली पहाड़ की खेती जंगली जानवरों के प्रकोप, घर के पुरुषों के पलायन से हल जोतने वाले हाथों के अभाव जैसे कारणों से बंजर हो चुकी है, फलस्वरूप खाली हो चुके गांवों में लेंटाना (कुरी) घास की झाडि़यां और बंजर हो चुके उपजाऊ खेत ही देखने को मिलते हैं। सशस्त्र सुरक्षा बल के आंकड़ों के अनुसार अब लोग खेती के लिए नेपाली मजदूरों को भूमि सौंपने लगे है। 128 नेपाली परिवार दोहरी नागरिकता लेकर पहाड़ी किसान बन चुके हैं। वहीं कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2001 में 7,69,944 हेक्टेयर कृषि भूमि में से खेती घटकर 2014-15 तक मात्र 7,01,030 हेक्टेयर में सिमट गयी है। ग्रामीण अब कृषि की जगह मनरेगा से रोजगार प्राप्त करते हुए मजदूर बन गये हैं। सरकार की खाद्य सुरक्षा योजना के अनुसार एक से तीन रूपये की कीमत पर राशन मिल जाने से भी उनमें मेहनत करने की भावना खत्म हो रही है। जहां सबसे पहले सड़क आयी, वहीं सबसे अधिक पलायन नैनीताल। संगोष्ठी में श्रमयोग्य पत्र के संपादक अजय कुमार ने दिलचस्प तथ्य पेश करते हुए बताया कि 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तराखंड के पौड़ी व अल्मोड़ा जिलों में जनसंख्या 2001 के मुकाबले घटी है, और इन जिलों के नैनीडांडा और सल्ट ब्लॉकों से सर्वाधिक पलायन हुआ है। अब यह संयोग है अथवा कुछ और कि इन्हीं दो ब्लॉकों में प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों के लिहाज से सबसे पहले सड़क आयीं। यानी सड़कें विकास को गांवों में लाने का माध्यम बनने की जगह ग्रामीणों को पलायन कर शहर ले जाने का माध्यम भी अधिक बनी हैं।

वहीँ पलायन कर दूर देश में रह रहे प्रवासी उत्तराखंडियों की भूमिका दूर बैठकर ‘नराई’ लगाने या दूर से ही ‘उपदेश’ देने तक ही सीमित हो गयी है। किसी में वहां के ‘सुख’ छोड़कर पहाड़ आने, अपनी म्हणत से दूसरों के बजाय अपना घर सजाने-संवारने का साहस नहीं है…. है क्या ???

पलायन की दुखती रग

पहाड़ दूर से बहुत सुंदर लगते हैं। करीब जाइए तो उनकी हकीकत समझ में आती है। अपनी आंखों के सैलानीपन से बाहर आकर आप देखेंगे तो पाएंगे कि पहाड़ की जिंदगी कितने तरह के इम्तिहान लेती है। यह बदकिस्मती नहीं, विकास की बदनीयती है कि इन दिनों पहाड़ के संकट और बढ़ गए हैं। पहाड़ आज की तारीख में बेदखली, विस्थापन और सन्नाटे का नाम है। घरों पर ताले पड़े हुए हैं, दिलों में उदासी है, थके हुए पांव राहत नाम के किसी बुलावे की उम्मीद में पहाड़ों से उतरते हैं। आज पलायन उत्तराखंड के लिए एक गम्भीर प्रश्न बन गया है। हमें पलायन को रोकने के लिए कारणों का निवारण करना होगा। उच्च शिक्षा की बात करें तो देहरादून के अलावा उंगलियों में गिनने लायक ही अच्छे शिक्षा संस्थान हैं। कृषि योग्य भूमि का कम होना और साथ में परम्परागत अनाज को उसका उचित स्थान न मिलना भी पलायन का एक महत्त्वपूर्ण कारण है। उत्तराखंड के उन किसानों पर किसी का ध्यान नहीं जाता जो कभी जौ, बाजरा, कोदा, झंगोरा उगाते थे और उस खेती का सही लागत मूल्य न मिलने के कारण उन्होंने इसे उगाना ही छोड़ दिया। सरकार चाहे तो यहां के परम्परागत अनाज का सही लागत मूल्य जारी कर पलायन रोकने के लिए एक अच्छा कदम उठा सकती है। वर्ष 2011 की जनगणना में कहा गया था कि 2001 में पहाड़ी इलाकों में 53 प्रतिशत लोग थे। लेकिन 2011 में इन पहाड़ी इलाकों मात्र 48 प्रतिशत ही लोग रह गए। एनएसएसओ का 70वां सव्रे बताता है कि उत्तराखंड में कृषि उपज की कीमत राष्ट्रीय औसत से 3.4 गुना कम है। उत्तराखंड में औसत कृषि उपज कीमत 10,752 रुपये प्रति परिवार थी। जबकि कृषि उपज कीमत का राष्ट्रीय औसत 36,696 रुपये। अगर पड़ोसी राज्य हिमाचल की बात की जाए तो खेतिहर परिवार की आय हिमाचल से लगभग आधी है। उत्तराखंड में एक खेतिहर परिवार की औसत मासिक आय 4,701 रुपये थी। जबकि हिमाचल में खेतिहर परिवार की औसत मासिक आय 8,777 रुपये थी। कृषि प्रधान देश होने के नाते कई सीखें विरासत में हमें मिलीं, पर हम उनका सही से प्रयोग नहीं कर पा रहे हैं। हमारे खेत छोटे हैं, बिखरे पड़े हैं और जहां गांवों में पलायन हो चुका है वहां खेत बंजर और खाली पड़े हैं। पाली हाउस तकनीक से ज्यादा-से-ज्यादा सब्जियां उगाने पर ध्यान दिया जा सकता है। हिमाचल हमारे लिए एक उदाहरण है कि कैसे वहां कृषि को फलों की तरफ मोड़कर समृद्धि हासिल की गई। 2001 से 2011 के बीच ग्रामीण क्षेत्रों की 5.1 प्रतिशत आबादी घटी है। पहले कुल जनसंख्या का ज्यादातर अनुपात गांवों में रहता था, लेकिन पलायन की वजह से गांव के गांव खाली हो गए हैं। ग्रामीण आबादी शहरी क्षेत्र की तरफ सिमट रही है। स्वास्य की समस्या से पहाड़ जूझ रहा है। डॉक्टर तो हैं नहीं साथ ही पैरामेडिकल और फाम्रेसी स्टाफ की भी बेहद कमी है। 108 एंबुलेंस हमारे लिए जीवनदायनी जरूर साबित हुई पर पीपीपी मॉडल का यह खेल बहुत से सवाल भी छोड़ता है। तीर्थ स्थल गौरवान्वित महसूस कराते हैं, मगर यह पूरा सिस्टम इतना अव्यवस्थित है कि इससे अच्छा रोजगार नहीं जुटाया जा सका है। युवा पीढ़ी शिक्षा और रोजगार के लिए दूसरे शहरों में जाती है और वहीं की होकर रह जाती है। 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तराखंड के 17793 गांवों में से 1053 गांव पूरी तरह से वीरान हो चुके हैं। अन्य 405 गांवों में लगभग 10 से कम लोग निवास कर रहे हैं। 2013 में आई भीषण प्राकृतिक आपदा के बाद से गांवों से पलायन का ग्राफ बढ़ गया है। सरकार की योजना जुलाई अंत तक पर्वतीय क्षेत्रों में डक्टरों की तैनाती सुनिचित करने के लिए उत्तराखंड में 2700 डक्टर लाने की है। इसके लिए तमिलनाडु, उड़ीसा व महाराष्ट्र आदि राज्यों से डॉक्टर लेने की तैयारी चल रही है। इसके साथ ही पर्यटन के लिए 13 नये क्षेत्र खोले जा रहे हैं। आखिर क्या वजह है कि बहुत ही कम युवा आज की तारीख में गांवों की तरफ रुख कर रहे हैं? राज्य सरकार के पास ऐसी कोई नीति नहीं है, जिसके तहत यहां का युवा पहाड़ के विकास के लिए काम करे। आज उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में कठिन जिंदगी से मुक्ति की जिंदगी को पलायन का नाम दिया जाता है। यदि इसी प्रकार पलायन बढ़ता गया तो गांवों में इंसान नहीं जानवर देखने को मिलेंगे। पलायन को लेकर जो भी परिभाषाएं गढ़ी जाती हों, लेकिन हकीकत में इसी कठिन जीवन से मुक्ति का नाम है पलायन।                                                                ♦♦♦ आशीष रावत

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3 responses to “उत्तराखंड के छह फीसद गांव हो गये ‘भुतहा’, नेताओं, देवी-देवताओं ने भी कर दिया पलायन

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