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उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2017 : अबकी बार किसकी सरकार ?


राजनीतिक दलों पर मेरे विचार:

किसी भी संगठन के राजनीतिक दल होने के लिये एक प्रमुख शर्त है, उसका चुनाव लड़ना। यदि कोई राजनीतिक दल चुनाव नहीं लड़ता है तो वह राजनीतिक दल ही नहीं है, वरन केवल एक संगठन है। दूसरी बात, लोकतंत्र में किसी राजनीतिक दल की असली परीक्षा उसकी चुनाव में जीत या हार से ही तय होती है। क्योंकि इसी से तय होता है कि उस दल की विचारधारा का कितनी जनता समर्थन या विरोध करती है। यदि कोई राजनीतिक दल बहुत अच्छी विचारधारा व सिद्धांतों वाला है, किंतु वह चुनाव नहीं जीत पाता है, तो उसका कोई मूल्य नहीं। एक और बात, हर राजनीतिक दल की कोई एक विचार धारा या सिद्धांत होते हैं। लेकिन मेरे विचार से उस दल के विचार या सिद्धांत उसके सत्ता में आने पर किये गये कार्यों से देखे और आंके जाने चाहिये, केवल चुनाव के दौरान वादों, वादों और दावों से नहीं। चुनाव के दौरान कई राजनीतिक नेता और जनता के लोग भी अपना दल या निष्ठा बदलते हैं। मेरे विचार से इसमें कुछ बुरा नहीं है। क्योंकि यही समय होता है जब लोकतंत्र में नेता हों अथवा जनता, किसी दल के पिछले कार्यकाल का मूल्यांकन कर सकते हैं, और दलीय निष्ठा बदल सकते हैं। बेशक, इसमें लोगों अथवा राजनीतिक नेताओं का स्वार्थ, राजनीतिक नफा-नुकसान छुपा हुआ हो।इसलिये मेरा मानना है कि चुनाव के दौरान जनता को राजनीतिक दलों के द्वारा अपने अथवा प्रतिद्वंद्वी दलों के लिये फैलाये जाने वाले भ्रम से भ्रमित नहीं होना चाहिये, वरन उस दल के पिछले कार्यकाल के आधार पर ही उसका वास्तविक आंकलन करना चाहिये। कौन उस दल में आया, अथवा गया, इससे भ्रमित नहीं होना चाहिये….। प्रत्याशी से अधिक उसका राजनीतिक दल महत्वपूर्ण है। क्योंकि एक अच्छा प्रत्याशी यदि एक बुरे दल में चला जाये या एक बुरा प्रत्याशी एक अच्छे दल में चला जाये तो इससे उस दल में बदलाव नहीं आता, बल्कि उस प्रत्याशी को उस दल के अनुरूप बदलना होता है। और यदि वह वहाँ उस दल की विचारधारा में नहीं ढल पाएगा, तो जल्दी ही उसे उस दल से वापस बाहर निकलना ही पड़ेगा।

कैसे लगे आपको मेरे विचार, मंथन हेतु गहन-गंभीर विचारों का स्वागत है।

उत्तराखंड: जनता को पहाड़ चढ़ाने वाले नेता ही ‘रणछोड़’ बन कर गये ‘पलायन’

palayan-मौजूदा विस चुनाव में ‘रणछोड़’ नेताओं में सीएम हरीश रावत, किशोर उपाध्याय  और मुख्यमंत्री के सर्वाधिक निकटस्थ व राजनीतिक सलाहकार रणजीत रावत प्रमुख रूप से शामिल -कोश्यारी, बहुगुणा, निशंक, हरक, अमृता भी कर चुके हैं अपनी पर्वतीय सीटों से मैदानों की ओर पलायन -एक दौर में यूपी के सीएम चंद्रभान गुप्ता ने पहाड़ की रानीखेत विधानसभा से लड़ा था चुनाव -अब जनता पर कि ‘रणछोड़” नेताओं को सबक सिखाती है कि स्वयं भी पहाड़ से पलायन कर पहाड़ की ‘नराई’ ही लगाती रहती है

नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने नैनीताल उच्च न्यायालय में हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के एक कार्यक्रम में 12 नवंबर 2014 को अधिवक्ताओं के बीच पलायन पर गहरी चिंता प्रकट करते हुए कहा था, ‘तो क्या पहाड़ पर बुल्डोजर चला दूं। प्रदेश के अधिकारी-कर्मचारी पहाड़ पर तैनाती के आदेशों पर ऐसी प्रतिक्रिया करते हैं, मानो किसी ने उनके मुंह में नींबू डाल दिया हो…” उनका

चंद्रभान गुप्ता

तात्पर्य पहाड़ों पर बुल्डोजर चलाकर उन्हें मैदान कर देने से था, ताकि पहाड़-मैदान में असुविधाओं का भेद मिट जाये। लेकिन इस वक्तव्य के करीब सवा दो वर्ष बाद ही उनकी अगुवाई में ही जब उनकी पार्टी के प्रत्याशियों की सूची जारी हुई तो स्वयं रावत ही अपनी धारचूला सीट छोड़कर दो-दो मैदानी सीटों-किच्छा और हरिद्वार ग्रामीण सीटों पर पलायन कर गये हैं। यही नहीं उनकी पार्टी के प्रमुख किशोर उपाध्याय भी अपनी, दो बार 2002 व 2007 में विजय दिलाने वाली पहाड़ की परंपरागत टिहरी सीट छोड़कर सहसपुर उतरते हुए पहाड़ों के ‘रणछोड़’ साबित हुये हैं। साथ ही मुख्यमंत्री के सर्वाधिक निकटस्थ व राजनीतिक सलाहकार रणजीत रावत भी अपनी परंपरागत साल्ट सीट छोड़कर रामनगर उतर आये हैं। जबकि एक दौर में पूर्ववर्ती राज्य यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रभान गुप्ता (1967 में) पहाड़ की रानीखेत सीट से चुनाव लड़े और जीते थे, और अकबर अहमद डम्पी जैसी मैदानी नेता भी राज्य बनने से पूर्व पहाड़ से चुनाव लड़ने से गुरेज नहीं करते थे। जबकि अपने गोविन्द बल्लभ पन्त बरेली,  हेमवती नन्दन बहुगुणा बारा और नारायण दत्त तिवारी काशीपुर की मैदानी सीटों से चुनाव लड़ते रहे।

गौरतलब है कि उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन में जनाक्रोश भड़कने और लोगों के आंदोलित होने में पलायन की गंभीर समस्या सर्वप्रमुख थी। लेकिन पलायन का मुद्दा राज्य बनने के बाद पहली बार 2001 में हुई जनगणना में ही पहाड़ की जनसंख्या के बड़े पैमाने पर मैदानों की ओर पलायन करने से हाशिये पर आना शुरू गया। यहां तक कि राज्य में 2002 के बाद पांच वर्ष के भीतर ही 2007 में दूसरी बार विस सीटों का परिसीमन न केवल बिना किसी खास विरोध के हो गया, वरन नेता मौका देख कर स्वयं ही नीचे मैदानों की ओर सीटें तलाशने लगे। 2007 के नये परिसीमन के तहत पहाड़ों का पिछड़ेपन, भौगोलिक व सामाजिक स्थिति की वजह से मिली छूटें छीन ली गयीं, और पहाड़ की छह विस सीटें घटाकर मैदान की बढ़ा दी गयीं। पहली बार नये परिसीमन पर हुए 2012 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस (अब भाजपा) नेता डा. हरक सिंह रावत व अमृता रावत सहित कई नेता पहाड़ छोड़कर मैदानी सीटों पर ‘भाग’ आये।

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इस सूची में यशपाल आर्य भी शामिल हो मुक्तेश्वर छोड़ बाजपुर आ गये, अलबत्ता इस बार पुत्र संजीव आर्य को नैनीताल भेजकर उन्होंने एक तरह से पहाड़ के प्रति कुछ हद तक सम्मान का परिचय दिया है। अमृता के पति सतपाल महाराज भी कुछ इसी तरह पहाड चढ़ गये हैं। इस बीच भाजपा नेता प्रकाश पंत भी पिथौरागढ़ के साथ मैदान पर उतरे तत्कालीन सीएम विजय बहुगुणा से भिड़ने के नाम पर सितारगंज उतर आये थे, और आगे लालकुआ में भी करीब दो वर्ष ‘राजनीतिक जमीन’ तलाशने में नाकामी के बाद वापस पिथौरागढ़ लौटने को मजबूर हुए हैं, जबकि बहुगुणा ने बेटे सौरभ के साथ सितारगंज में ही जड़े गहरी करने की ठानी है। बहरहाल, अब जनता को तय करना है कि वे अपने पहाड़ के इन ‘रणछोड़’ नेताओं का क्या भविश्य तय करती है। याकि स्वयं भी पहाड़ से पलायन कर पहाड़ की ‘नराई’ ही लगाती रहती है।

बड़े नेता भी पीछे नहीं रहे पहाड़ की उपेक्षा करने में

नैनीताल। पहाड़ की उपेक्षा करने में पहाड़ के बड़े नेता भी पीछे नहीं रहे। यहां तक कहा जाता है कि पहाड़ के कई बड़े नेता अलग पर्वतीय राज्य का इसलिये विरोध करते थे कि इससे कहीं उनकी पहचान भी छोटे राज्य की तरह सिमट न जाये। वहीं लोक सभा चुनावों में भी कांग्रेस के बड़े हरीश रावत से लेकर दूसरे पूर्व सीएम डा. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ अपनी परंपरागत सीट छोड़कर हरिद्वार तो भाजपा के पूर्व सीएम भगत सिंह कोश्यारी व पूर्व केंद्रीय मंत्री बची सिंह रावत को नैनीताल-ऊधमसिंह नगर सीट पर उतरने से कोई गुरेज नहीं रहा। वहीं एक अन्य पूर्व सीएम नारायण दत्त तिवारी पहाड़ के होते हुए भी कमोबेश हमेशा ही मैदानी सीटों से चुनाव लड़े। कुछ इसी तरह पर्वत पुत्र कहे जाने वाले हेमवती नंदन बहुगुणा को भी पहाड़ की बजाय मैदानी सीटें ही अधिक रास आर्इं।

सियासत की दौड़: चुनाव के दौरांन उड़ते हुए भी सितारे नहीं चढ़ पाये ‘पहाड़’

दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में ‘‘चुनावी पर्यटन’ के लिये भी नहीं पहुंच पाये राजनेता, मोदी, शाह, राजनाथ, गडकरी, हेमामालिनी और राहुल ने ही कीं एक-दो सभायें
नवीन जोशी/नैनीताल।अलग राज्य बनने के बाद भी लगातार बढ़ते पलायन के कारण ‘उड़ता उत्तराखंड’ तक कहे जा रहे राज्य के दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में स्टार प्रचारक ‘चुनावी पर्यटन’ के लिये हेलीकॉप्टरों से भी नहीं पहुंच पाये। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, गृह मंत्री राजनाथ सिंह और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के एक-दो कार्यक्रमों को छोड़ दें तो प्रदेश के चुनाव स्टार प्रचारकों कांग्रेस से मुख्यमंत्री हरीश रावत और भाजपा से कोश्यारी आदि को ही यह जिम्मेदारी संभालनी पड़ी, लेकिन बीसी खंडूड़ी, सतपाल महाराज, डा. रमेश पोखरियाल निशंक, विजय बहुगुणा, डा. हरक सिंह रावत, अजय भट्ट, डा. इंदिरा हृदयेश व किशोर उपाध्याय आदि भी कमोबेश अपने ‘घरों’ में ही कैद होकर रह गये। पहाड़ों में केवल मोदी की 12 फरवरी को पिथौरागढ़ व इससे पूर्व श्रीनगर तथा इससे पूर्व राहुल गांधी की अल्मोड़ा के सोमेश्वर, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की बागेश्वर व केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह की दन्या-अल्मोड़ा में ही जनसभा हो पायीं। वह भी नैनीताल के रामनगर से ऊपर नहीं चढ़ पाये। वहीं अन्य स्टार प्रचारकों में भाजपा की हेमामालिनी केवल चौखुटिया व सल्ट ही पहुंचीं पर फिल्म शोले का ‘प्लॉट’ रामगढ़ अपनी ‘बसंती’ के बड़े हेलीकॉप्टर के लिये छोटा पड़ गया, और वह यहां नहीं उतर पायीं। इस तरह पूरे नैनीताल जनपद के पर्वतीय क्षेत्रों और यहां तक कि नैनीताल मुख्यालय में किसी भी चुनावी सितारे के पूरे चुनावी प्रचार अभियान के बीच नहीं पहुंचने का संभवतया पहली बार नया ‘दुर्योग’ भी जुड़ गया। यहां केवल कोश्यारी, यशपाल और हरीश रावत की ही एक-एक जनसभाएं हुई और आखिरी दिन भी भाजपा की रैली के अलावा चुनाव प्रचार अभियान का कोई बड़ा कार्यक्रम तय नहीं है। भीमताल में तो इस बार हरीश रावत को छोड़कर कोश्यारी सहित एक भी सितारा नहीं पहुंचा। भाजपा के स्वामी आदित्यनाथ जोशीमठ, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के गंगोत्री व चंपावत तथा स्मृति ईरानी के कपकोट, रानीखेत व अल्मोड़ा के कार्यक्रम बने। वहीं भाजपा व कांग्रेस के अन्य केंद्रीय नेताओं के उत्तराखंड में चुनावी पर्यटन दौरे केवल मैदानी क्षेत्रों और देहरादून में पत्रकार वार्ताओं तक ही सीमित रहे। 

पहाड़ के छह फीसद गांव खाली, 32 लाख लोग कर चुके पलायन, तीन हजार से अधिक गांव 2,57,875 घरों में ताले लटकने से वीरान

नैनीताल। उत्तराखंड प्रदेश में ‘विकास’ के लिये 409 अरब रुपये कर्ज लेने के बाद भी राज्य की अवधारणा के अनुरूप पलायन नहीं रुका है। 2011 की ताजा जनगणना के अनुसार प्रदेश के 17,793 गांवों में 1,053 यानी करीब छह फीसद गांव खाली हो चुके हैं, बल्कि इन्हें ‘भुतहा गांव’ (घोस्ट विलेज) कहा जा रहा है। वहीं कुल मिलाकर करीब एक करोड़ की आबादी वाले इस राज्य की पर्वतीय क्षेत्र में रहने वाली 60 लाख की आबादी में से 32 लाख लोगों का पलायन हो चुका है। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय एकीकृत विकास केंद्र के एक अध्ययन के अनुसार तो प्रदेश के तीन हजार से अधिक गांव 2,57,875 घरों में ताले लटकने से वीरान हो गये हैं। इनमें से 42 फीसद ने रोजगार, 30 फीसद ने मूल सुविधाओं और 26 फीसद ने शिक्षा के अवसरों के अभाव अपने गांव छोड़े हैं। प्रदेश के अधिकांश बड़े राजनेताओं (कोश्यारी, बहुगुणा, निशंक, यशपाल आर्य) ने भी अपने लिये मैदानी क्षेत्रों की सीटें तलाश ली हैं। यही नहीं पहाड़ के भूमिया, ऐड़ी, गोलज्यू, छुरमल, ऐड़ी, अजिटियां, नारायण व कोटगाड़ी सहित पहाड़ों के कई कुल व ईष्ट देवताओं के मंदिरों को मैदानों पर स्थापित कर एक तरह से उनका भी पलायन कर दिया गया है।

राजनीतिक मौसम देखकर दल बदलने वाले ‘मौसम विज्ञानी दल बदलुओं’ का लंबा इतिहास रहा है उत्तराखंड में

-बदले दलों में स्वीकार्य भी रहे हैं दलबदलू

नवीन जोशी। नैनीताल। उत्तराखंड में दल-बदल आज की तिथि जनता के बीच सबसे बड़ा ‘हॉट इश्यू’ है। प्रदेश में राजनीतिक मौसम देखकर दल बदलने वाले ‘मौसम विज्ञानी दल बदलुओं’ का लंबा इतिहास रहा है। बीते वर्ष मार्च माह के बाद से प्रदेश में शुरू हुए बल-बदल का सिलसिला एक दिन पूर्व कांग्रेस के दो बार प्रदेश अध्यक्ष रहे और मौजूदा काबीना मंत्री यशपाल आर्य और उनके पुत्र संजीव आर्य के भाजपा का दामन थामने, तथा तुरंत ही राज्य के राजनीतिक इतिहास में संभवतया पहली बार पिता-पुत्र दोनों को तथा भाजपा द्वारा जारी हुई ६४ प्रत्याशियों की घोषणा में दूसरे दल से आये १४ लोगों को टिकट मिलने के साथ राज्य के हर विचारवान व्यक्ति की जुबान पर है। सोशल मीडिया पर भी यही विषय छाया हुआ है। ऐसे में उत्तराखंड में दल-बदल का इतिहास खंगालें तो इसकी जड़ें काफी गहरी नजर आती हैं। राज्य के छोटे नेता ही नहीं, बड़े-बड़े दिग्गज भी मौका मिलने पर दल-बदल करते रहे हैं। इनमें पर्वत पुत्र कहे जाने वाले हेमवती नंदन बहुगुणा से लेकर नारायण दत्त तिवारी तक शामिल रहे हैं। मूलत: कांग्रेस की राजनीति करने वाले यूपी के मुख्यमंत्री व केंद्र में मंत्री रहे बहुगुणा 1976-77 में कांग्रेस छोड़कर ‘कांग्रेस फार डेमोक्रेसी’ यानी लोकतान्त्रिक कांग्रेस से लेकर निर्दलीय चुनाव लड़ने से भी नहीं चूके तो लाल टोपी वाली प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से राजनीतिक पारी शुरू करने वाले तिवारी ने पहले कांग्रेस में लंबी पारी खेली तो शीर्ष नेतृत्व से उपेक्षा के बीच अपनी तिवारी कांग्रेस बनाने से भी गुरेज नहीं किया और वापस कांग्रेस से यूपी व उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहने के बाद इधर एक बार फिर उनके पुत्र रोहित शेखर के लिये भाजपा में जाने की जोरों से चर्चाएं हैं। इनके अलावा भी दल-बदलने वाले नेताओं में यूपी में वन मंत्री रहे नैनीताल के भाजपा नेता श्रीचंद का नाम भी शुमार है, जो कांग्रेस, बसपा, सपा होते हुए भाजपा से पिछली बार चुनाव लड़े। तिलक राज बेहड़ भाजपा से कांग्रेस में, प्रदीप टम्टा व पूर्व विधायक स्वर्गीय प्रताप बिष्ट उक्रांद से कांग्रेस में शामिल हुए थे। वहीं मौजूदा विधानसभा में शक्तिफार्म से भाजपा विधायक किरन मंडल ने तत्कालीन सीएम विजय बहुगुणा के लिये विधायकी व पार्टी से इस्तीफा देकर कांग्रेस का दामन थामा था, और केएमवीएन के अध्यक्ष बनाये गये। इस प्रकार इन नेताओं को एक तरह से बदले हुए दलों में भी सफल कहा जा सकता है।

भाजपा से इन दल-बदलुओं को मिला है टिकट

नैनीताल। इस विधानसभा चुनाव में भाजपा से कोटद्वार से टिकट प्राप्त करने वाले डा. हरक सिंह रावत भाजपा से शुरुआत करने के बाद बसपा व कांग्रेस होते हुए भाजपा में लौटे हैं। भगवानपुर से कांग्रेस से भाजपा में आये सुबोध राकेश को टिकट मिला है। इसी तरह सोमेश्वर से चुनाव लड़ रही रेखा आर्य भी भाजपा से कांग्रेस होते हुए वापस भाजपा में लौटी हैं। इनके अलावा शैलारानी रावत, सुबोध उनियाल, सतपाल महाराज, उमेश शर्मा काउ, प्रदीप बत्रा, डा. शैलेंद्र मोहन सिंघल तथा यशपाल आर्य व संजीव आर्य आदि ने कांग्रेस से आकर भाजपा से टिकट हासिल किया है। वहीं सितारगंज से सौरभ गुणा को टिकट कांग्रेस से भाजपा में आये पिता विजय बहुगुणा की वजह से मिला है तो देवप्रयाग से विनोद कंडारी को टिकट भाजपा से कांग्रेस होते हुए वापस लौटे मातबर सिंह कंडारी की वजह से मिला है। इनके अतिरिक्त भी रुद्रपुर से प्रत्याशी राजकुमार ठुकराल पूर्व में भाजपा से एक बार कांग्रेस में जाकर लौटे हैं, जबकि किच्छा से प्रत्याशी राजेश शुक्ला मूलत: समाजवादी पार्टी से तथा काशीपुर से हरभजन सिंह चीमा अकाली दल से भाजपा में आये हुए नेता हैं।

हरीश रावत ने दिया “उत्तराखंडियत” का नारा

भाजपा पर उनके कायरे को ही अपने विजन डॉक्यूमेंट में शामिल करने का आरोप
कहा-वे विजन के साथ ही कर रहे हैं विकास कार्य
मुख्यमंत्री हरीश रावत ने ‘उत्तराखंडियत’ का नया नारा दिया और कहा कि मुकाबला उनकी ‘उत्तराखंडियत’ और ‘‘दिल्ली वाले बाबा’ के खोखले जुमलों के बीच है। कई बार कहा-वे 58 इंच की छाती में 108 इंच का हृदय रखने वालों से बहुत छोटे हैं और उत्तराखंड के मंडुवा, रामबांश के रेशों व झंगोरा, सिसोंण जैसे धरती के ‘सत्वों’ को अंतरराष्ट्रीय ब्रांड और एक्सपोर्ट योग्य उत्पाद बनाने जैसे कायरे के साथ 2014 के बकौल उनके ‘लस्त-पस्त’ उत्तराखंड को 2022 में समुन्नत व स्वावलंबी उत्तराखंड बनाने जा रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि ढाई वर्ष से किये जा रहे उनके कायरे को ही भाजपा ने अपने ‘‘विजन डॉक्यूमेंट’ में स्थान दिया है। उनकी यह कोशिश पूरे प्रदेश और खासकर नैनीताल सीट पर उत्तराखंड क्रांति दल का प्रत्याशी न होने की वजह से विकल्पविहीन हुए वोटरों को रिझाने के रूप में देखी जा रही है। रावत ने दावा किया कि उनके प्रयास से चार रुपये प्रति किग्राके भाव बिकने वाले मंडुवा देहरादून में 50 रुपये के भाव भी नहीं मिल रहा है। झंगोरा राजभवन और राष्ट्रपति भवन के मीनू में शामिल हो गया है। चौलाई व रामदाना यूरोप व अमेरिका को निर्यात हो रहा है। ऐपण बनाने में 50 हजार लोग कार्य कर रहे हैं। 300 ग्रामीणों को रोजगार के लिए तीन बकरी व एक बकरा दिये, आगे तीन हजार लोगों को यह देने की योजना है। उत्तराखंड की धौली गाय को बद्री गाय में बदला जा रहा है। उत्तराखंड दुग्ध बोनस देने वाला पहला राज्य है। यहां भांग की वाणिज्यिक खेती को बढ़ावा देने के साथ गेठी, तुन, तिमूर व भिमुवा के पेड़ लगाने वालों को भी 300 रुपये प्रति पेड़ बोनस दिया जा रहा है। तेजपत्ता उत्पादन के क्लस्टर बनाये गये हैं। आगे बरसात के 30 फीसद पानी को पहाड़ पर ही रोककर उत्तराखंड को जलशक्ति बनाने की योजना है।हरीश रावत ने अपने संबोधन में कई बार प्रधानमंत्री मोदी का नाम लेने की जगह उन्हें ‘‘दिल्ली वाले बाबा’ कहते हुए आरोप लगाया कि उन्होंने दो करोड़ युवाओं को रोजगार देने का वादा कर हमारी एचएमटी फैक्टरी ही बंद कर दी। आपदा से पुनर्निर्माण को कैबिनेट कमेटी ऑन उत्तराखंड ने 8000 करोड़ देने को कहा था, लेकिन यूपीए के 1800 करोड़ के अलावा कुछ नहीं मिला। दावा किया कि 2007 से 12 के बीच प्रदेश में भाजपा की सरकार के दौरान 343 सड़कों पर काम शुरू हुआ था, जबकि उनके ढाई वर्ष के कार्यकाल में 1343 सड़कों पर काम शुरू और 2017-18 तक दो हजार पर कार्य करने का रोडमैप तैयार है, और राज्य की सड़कें देश में सबसे अच्छी हैं। उत्तराखंड में प्रति 100 छात्रों में से देश में सर्वाधिक, केरल (26) से भी अधिक 36 छात्र स्नातक की पढ़ाई कर रहे हैं।
नैनीताल :जनसभा को संबोधित करते मुख्यमंत्री हरीश रावत।

भाजपा-कांग्रेस के पास हैं छह-छह अभेद्य किले !

  • इस बार कांग्रेस से बड़े नेताओं के भाजपा की ओर हुए ‘‘पलायन’ से समीकरण बदलने के आसार
  • दो तिहाई सीटों पर दोनों दलों के बागी,  निर्दलीय बसपा व उक्रांद प्रत्याशी दे रहे कांटे की टक्कर

नवीन जोशी/नैनीताल। उत्तराखंड में कमोबेश सभी 70 सीटों पर भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के प्रत्याशी ही आमने-सामने के मुकाबले में दिख रहे हैं और दो तिहाई सीटों पर इनके बागी, निर्दलीय अथवा बसपा और उक्रांद के प्रत्याशी त्रिकोण या चतुष्कोण बना रहे हैं। इसके साथ ही यह भी सही है कि करीब दो-तिहाई विस सीटों पर अब तक भाजपा और कांग्रेस के अलावा किसी भी दल के प्रत्याशी चुनाव नहीं जीते सके, और दोनों ही दलों के अपने ऐसे छह-छह अभेद्य किले भी हैं, जहां राज्य बनने के बाद और कई पर राज्य बनने से पूर्व से ही उनका कब्जा रहा है। हालांकि इस बार कांग्रेस से बड़े स्तर पर नेताओं के भाजपा की ओर हुए ‘पलायन’ के बाद इनमें से अधिकांश अभेद्य किलों के समीकरण बदलने की संभावना भी दिख रही है। राज्य बनने के बाद हुए तीनों चुनावों में अल्मोड़ा जिले की जागेश्वर सीट पर विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल, धर्मपुर में काबीना मंत्री दिनेश अग्रवाल और चकराता पर काबीना मंत्री प्रीतम सिंह हैट्रिक जमा चुके हैं, और जीत का चौका मारने की फिराक में हैं। इसी तरह टिहरी, देवप्रयाग, पौड़ी भी कांग्रेस के अभेद्य किले हैं। अलबत्ता टिहरी सीट से कांग्रेस ने अपने प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय से ‘छीनकर’ निर्दलीय दिनेश धने को सौंप दी है। वहीं पिथौरागढ़ जिले की धारचूला सीट पर पहले निर्दलीय गगन सिंह रजवार चुनाव जीते थे, और इधर कांग्रेस के हरीश धामी और उपचुनाव में सीएम हरीश रावत चुनाव जीते। यानी ऐसी भी कई सीटें हैं जिन पर भाजपा कभी नहीं जीत पायी है। वहीँ भाजपा के अभेद्य किलों की बात करें तो पूर्व में नैनीताल सीट के अंतर्गत रही कालाढुंगी में कांग्रेस पिछले 26 वर्षो में नहीं जीत पायी है, और भाजपाई लगातार जीतते रहे हैं। वहीँ देहरादून की कैंट सीट पर भाजपा के पूर्व विस अध्यक्ष हरबंस कपूर पिछले तीन चुनाव जीतने के साथ ही वर्ष 1989 से यानी पिछले 28 वर्षो से चुनाव नहीं हारे हैं। इसी तरह हरिद्वार शहर सीट पर पूर्व काबीना मंत्री मदन कौशिक और पिथौरागढ़ की डीडीहाट सीट पर पूर्व भाजपा अध्यक्ष बिशन सिंह चुफाल जीत की हैट्रिक मार चुके हैं और लगातार चौथी जीत के लिये चुनाव मैदान में हैं। ऊधमसिंह नगर की काशीपुर सीट और यमकेश्वर भी भाजपा का अजेय गढ़ रही हैं। काशीपुर से हरभजन सिंह चीमा पहले शिरोमणि अकाली दल से और दो बार भाजपा से चुनाव जीते हैं, और इस बार भी हैट-ट्रिक के लिए मैदान में हैं। जसपुर भी अब तक के तीनों चुनावों में एक ही प्रत्याशी डा. शैलेंद्र मोहन सिंघल ने एक बार निर्दलीय और दो बार कांग्रेस के टिकट पर हैट्रिक जमाई है, और लगातार चौथी जीत के लिये ये दोनों इस बार भाजपा के टिकट पर अपनी परंपरागत सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं। वहीं हरिद्वार जिले की मंगलौर, लंढौरा और झबरेड़ा ऐसी सीटें हैं, जिन में से दो बसपा के अभेद्य किले रहे हैं और कभी भी भाजपा और कांग्रेस के प्रत्याशी चुनाव नहीं जीत पाये हैं। इनके अलावा प्रदेश में डा. हरक सिंह रावत जैसे नेता भी हैं, जिन्होंने हर बार सीट बदली और इसके बावजूद हर चुनाव जीतने का अनूठा रिकॉर्ड बनाया है। 

कौन कहां भारी 

  • भाजपा के किले : कालाढुंगी, काशीपुर, हरिद्वार शहर, देहरादून कैंट, डीडीहाट और यमकेश्वर।
  • कांग्रेस के गढ़ : जागेश्वर, टिहरी, पौड़ी, धर्मपुर, चकराता और धर्मपुर।
  • भाजपा-कांग्रेस के ‘दर्द’ : मंगलौर, लंढौरा और झबरेड़ा।

ग्यारह प्रत्याशी ‘चौका’ लगाने के लिए हैं चुनाव मैदान में 

2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के तीन प्रत्यासी गोविंद सिंह कुंजवाल, प्रीतम सिंह व दिनेश अग्रवाल के साथ ही अब भाजपा में शामिल हो गए कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन, डॉ. हरक सिंह रावत, यशपाल आर्य व डॉ. शैलेन्द्र मोहन सिंघल, तथा भाजपा के हरबंस कपूर, मदन कौशिक, बिशन सिंह चुफाल व अरविंद पांडे सहित कुल 8 भाजपा प्रत्यासी जीत की हैट्रिक जमाने के बाद अब चौका लगाने की कोशिश में चुनाव मैदान में हैं।

भाजपा के स्टार प्रचारक हो सकते हैं एनडी !

  • लखनऊ स्थित आवास पर की प्रधानमंत्री मोदी के कार्यों और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की तारीफ, अभी नहीं ली भाजपा की सदस्यता
  • बीते माह दिल्ली में राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से मुलाकात के दिन ही बन गयी थी सहमति, पर पुत्र रोहित के हल्द्वानी से चुनाव लड़ने में मना करने के बाद बन गयी थी संशय की स्थिति
  • पूर्व सीएम कोश्यारी, बहुगुणा और भाजपा अध्यक्ष भट्ट ने हल्द्वानी में बात करने के बावजूद राष्ट्रीय अध्यक्ष को नहीं थी तिवारी की मंशा के बारे में जानकारी

नवीन जोशी, नैनीताल। आखिर पिछले करीब एक माह की असमंजसपूर्ण स्थिति के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पंडित नारायण दत्त तिवारी ने ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कायरे का पूरे हृदय से समर्थन’ और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की ‘लगन और समर्पित भाव’ की प्रशंसा कर दी है। इसके साथ ही साफ हो गया है कि आज के चुनावी समर में तिवारी किस ओर यानी भाजपा के साथ हैं। हालांकि अभी भी उन्होंने अथवा उनके पुत्र व पत्नी ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण नहीं की है परंतु पं. तिवारी से जुड़े विश्वस्त सूत्रों पर यकीन करें तो उनके आज अपने लखनऊ के माल एवेन्यू स्थित आवास में आयोजित पत्रकार वार्ता में किये गये इस ऐलान की पटकथा बीती 18 जनवरी को दिल्ली में अमित शाह के आवास पर भेंट के दौरान ही लिख ली गयी थी। किंतु तब उनके पुत्र रोहित शेखर के रुख से मामला फंस गया था। लेकिन अब चीजें साफ हो गयी हैं और जल्द ही भाजपा तिवारी को अपने स्टार प्रचारक होने का ऐलान और उनका उपयोग उनके प्रभाव वाले उत्तराखंड और यूपी में कर सकती है। अलबत्ता, सूत्रों पर यकीन करें तो इस मामले में उत्तराखंड भाजपा के तीन नेताओं के बारे में कहा गया है कि उन्होंने राष्ट्रीय अध्यक्ष को इस बाबत जानकारी नहीं दी। अथवा हो सकता है कि ऐसा किसी रणनीति के तहत किया गया हो।विदित हो कि पंडित तिवारी के अक्टूबर माह में जन्मदिवस कार्यक्रम के बहाने हुए हल्द्वानी प्रवास के दौरान भाजपा के स्थानीय सांसद भगत सिंह कोश्यारी, पूर्व सीएम विजय बहुगुणा और प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट ने भी मुलाकातें की थीं। तब बताया जा रहा था कि तिवारी की ओर से पुत्र रोहित शेखर को लालकुआ से टिकट दिलाये जाने की इच्छा जतायी गयी थी लेकिन यह जानकारी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह तक नहीं पहुंची थी। इसलिए लालकुंआ सीट से टिकट की घोषणा होते ही तिवारी अपनी पत्नी व पुत्र के साथ दिल्ली में शाह से उनके आवास पर मिले। सूत्रों के अनुसार यह मुलाकात करीब पौने घंटे की हुई, जबकि शाह बड़े कद के नेताओं को भी 10-15 मिनट से अधिक समय नहीं दे पाते हैं। इस मुलाकात में शाह ने तिवारी की इच्छा जानी और लालकुंआ के बाबत उन्हें जानकारी न होने, अब टिकट दे दिये जाने आदि का हवाला देते हुए रोहित को हल्द्वानी सीट से टिकट देने की पेशकश की। किंतु रोहित इसकी हिम्मत नहीं जुटा पाये। इसके बाद रोहित की ओर से भाजपा में सदस्यता न लिये जाने संबंधित बयान भी आये, जिसमें उनकी नाराजगी भी दिखी थी। लेकिन इधर सूत्रों की मानें तो रोहित नफा-नुकसान का आंकलन कर चुके हैं कि उनके पिता एनडी के भाजपा का स्टार प्रचारक होने के बाद उनके लिए भाजपा भविष्य के लिहाज से सुरक्षित राजनीतिक आशियाना साबित हो सकता है।

कांग्रेस से इन दलबदलुओं को मिला टिकट

देहरादून कैंट से सूर्यकांत धस्माना (समाजवादी पार्टी), पुरोला (सुरक्षित) राजकुमार, बद्रीनाथ राजेन्द्र सिंह भंडारी (भाजपा), घनशाली(सुरक्षित) भीमलाल आर्य (भाजपा), देवप्रयाग मंत्री प्रसाद नैथानी (निर्दलीय/पीडीऍफ़), रानीपुर अंबरीश कुमार (समाजवादी पार्टी), पीरान कलियर फुरकान  (बसपा) अहमद, रुड़की सुरेश चंद जैन (भाजपा), खानपुर चौधरी यशवीर सिंह, मंगलौर काजी मो. निजामुद्दीन (बसपा), लक्सर हाजी तस्लीम अहमद, यमकेश्वर शैलेन्द्र सिंह रावत (भाजपा), लैंसडाउन ले. जनरल टीपीएस रावत (भाजपा, उत्तराखंड रक्षा मोर्चा), लालकुंआ हरीश चंद्र दुर्गापाल (निर्दलीय/पीडीऍफ़), भीमताल दान सिंह भंडारी  (भाजपा)और बाजपुर (सुरक्षित) सुनीता बाजवा (भाजपा), रुद्रपुर तिलकराज बेहड़ (भाजपा), जसपुर आदेश चौहान (भाजपा), सोमेश्वर राजेंद्र बाराकोटी (भाजपा)।

इन दल-बदलुओं को चौपट हुआ भविष्य नैनीताल। कांग्रेस नेता जनरल टीपीएस रावत ने तत्कालीन सीएम खंडूड़ी के लिये पार्टी व विधायकी से इस्तीफा देकर भाजपा का दामन थापा था, किंतु भाजपा में बहुत छोटी पारी खेलने के बाद उन्होंने उत्तराखंड रक्षा मोर्चा बनाया, और अब कांग्रेस में हैं। वहीं भाजपा नेता मातबर सिंह कंडारी कुछ दिनों के लिये कांग्रेस में जाकर वापस भी लौट आये तो यथोचित सम्मान व स्थान प्राप्त नहीं कर पाये।

बी कॉम आनर्श व एमबीए हैं भाजपा प्रत्याशी संजीव आर्य

-3.15 करोड़ की संपत्तियों के मालिक हैं संजीव और पत्नी 1.85 करोड़ की मालकिन

संजीव आर्य
संजीव आर्य

नैनीताल। नैनीताल सुरक्षित सीट से भाजपा के प्रत्याशी 38 वर्षीय संजीव आर्य दिल्ली के श्रीराम कॉलेज से बीकॉम आनर्श एवं एमबीए हैं। नामांकन पत्र के माध्यम से चुनाव आयोग को दी गयी जानकारियों के अनुसार उनके पास स्वयं करीब 3.15 करोड़ की संपत्ति है, जबकि परामर्शदात्री के रूप में आय-अर्जन करने वाली धर्मपत्नी 1.85 करोड़ की संपत्तियों की मालकिन हैं। ब्यौरे के अनुसार संजीव के पास 85 हजार व पत्नी के पास 32 हजार रुपये की नगदी, उनके दो बैंक खातों में 23.52 लाख व 22.11 लाख व पत्नी के खाते में 20.97 लाख, संजीव की 2.15 लाख की व पत्नी की एक लाख रुपये की एलआईसी, संजीव के पास 1.4 लाख रुपये मूल्य के करीब पांच तोला सोने के जेवहरात, जबकि पत्नी के पास 4.48 लाख के 16 तोला सोने के जेवहरात हैं, साथ ही संजीव ने करीब 2.5 लाख रुपये के ऋ ण भी दिये हैं। इसके अलावा संजीव के पास 1.75 करोड़ रुपये की भूमि एवं 1.88 करोड़ का आवासीय भवन भी है, जबकि पत्नी के नाम 1.58 करोड़ रुपये का आवासीय भवन है। वहीं संजीव पर बैंकों का 1.495 करोड़ का और पत्नी पर 1.0036 करोड़ के ऋण भी हैं।

पांच वर्ष में आठ गुना बढ़ गयी सरिता की संपत्ति

नैनीताल। स्थानीय विधायक व कांग्रेस प्रत्याशी ५४ वर्षीया सरिता आर्य की संपत्ति बीते पांच वर्षों में करीब आठ गुना बढ़ गयी है। वर्ष २०१२ में इसी सीट से अपना पहला विधानसभा चुनाव लड़ते हुए श्रीमती आर्य ने स्वयं ५.५ लाख रुपये की चल एवं करीब निकटवर्ती ग्राम भूमियाधार में करीब दो लाख रुपये की अचल संपत्ति, दोनों पुत्रों मोहित व रोहित की एक-एक लाख की चल व नौ-नौ लाख की अचल संपत्तियों, करीब साढ़े पांच लाख की २००७ मॉडल स्विफ्ट कार, ८० तोला जेवहरात की घोषणा की थी। वहीं इस बार अपने नामांकन के साथ दाखिल किये गये शपथ पत्र में उन्होंने स्वयं की दो कारें स्कॉर्पियों व स्विफ्ट, करीब २२ लाख का ८० तोला सोना सहित ४२.१३ लाख की चल संपत्ति, पुत्र मोहित की ३.०६ लाख व रोहित की ५.०५ लाख की संपत्तियां, रोहित के पास एक स्कॉर्पियो कार, स्वयं तथा पुत्र मोहित के पास भूमियाधार के ग्राम कुरियागांव में करीब १२ लाख रुपये मूल्य की विरासतन १ नाली १० मुट्ठी व दो नाली भूमि, दोनों पुत्रों रोहित व मोहित के संयुक्त नाम पर मुख्यालय के अयारपाटा स्ट्रॉबेरी लॉज में करीब ३३ लाख की संपत्ति के फ्लैट हैं। साथ ही उन्होंने एसबीआई से स्कॉर्पियो कार का करीब एक लाख का ऋ ण शेष होना भी दर्शाया है। अलबत्ता वे ७.२ लाख रुपये की आयकर विवरणी में प्रदर्शित करती हैं, जबकि दोनों पुत्र कोई आय नहीं दिखाते हैं।

६२.५ लाख के ऋण हैं भाजपा के बागी करोड़पति हेम आर्य पर

नैनीताल। २०१२ के विधानसभा चुनाव में भाजपा के प्रत्याशी रहे हेम आर्य पर उत्तराखंड ग्रामीण बैंक, यूनियन बैंक और पंजाब नेशनल बैंक के ६२.५ लाख रुपये के ऋण हैं। अलबत्ता उनके पास ८.३१ लाख की चल एवं ग्राम डोब में २१०० वर्ग फीट में व मल्लीताल में १००० वर्ग फीट में मकान तथा डोब ल्वेशाल में २० लाख रुपये की १२ नाली व जिलिंग स्टेट पदमपुरी में २३८ नाली व १२ नाली विरासतन भूमि सहित कुल १३५.४७५ लाख रुपये की २००८ में खरीदी गयी यानी स्व अर्जित एवं पांच लाख रुपये की विरासतन प्राप्त अचल संपत्तियां भी हैं। इसके अलावा उनकी पत्नी के पास १० तोला सोना सहित ४.५४ लाख तथा पुत्र शुभम व सारांश के १.३-१.३ लाख रुपये की संपत्तियां भी हैं। वहीं उन्होंने इस वर्ष अपनी आयकर विवरणी में ४.४५ लाख एवं जिपं सदस्य पत्नी नीमा आर्य की २०१४-१५ में आय २.४३ लाख प्रदर्शित की है। जबकि इससे पूर्व पिछला चुनाव लड़ते समय उन्होंने वर्ष २०१०-११ के लिये स्वयं ५.६८ लाख व पत्नी की २.६१ लाख की आयकर विवरणी दाखिल की थी। साथ ही तब उनकी सकल चल संपत्ति २१.८१ लाख, पत्नी की ५.७७ लाख तथा पुत्रों शुभम व सारांश की १.६१-१.६१ लाख की चल संपत्ति, स्वयं की ८० लाख की अचल संपत्तियां तथा यूनियन बैंक से ११ लाख रुपये के ऋ णों का खुलासा किया था। यानी उनकी संपत्ति की कीमत तो आनुपातिक तौर पर बढ़ी है, किंतु ऋ ण करीब छह गुना बढ़ गये हैं।

यक्ष प्रश्नः नैनीताल में पिछली विधानसभा के आंकड़ों में उलझेगी या लोक सभा के आंकड़ों को छुएगी भाजपा ?

नवीन जोशी, नैनीताल। भाजपा ने 2014 के लोक सभा चुनावों में रिकार्ड 55.30 प्रतिशत मत प्राप्त कर राज्य की पांचों सीटें जीतकर कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया था, बावजूद उत्तराखंड राज्य गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली यह पार्टी विधानसभा चुनावों में अपना मत प्रतिशत नहीं बढ़ा पाई है। वहीं 2014 के लोक सभा चुनाव में केवल 34 प्रतिशत मत प्राप्त करने वाली कांग्रेस राज्य के विधानसभा चुनावों में खासकर सपा और कुछ हद तक बसपा के गिरे जनाधार को लपककर हर विधानसभा चुनाव में और अधिक मजबूत होती चली गयी है। आसन्न विधानसभा चुनाव में देखने वाली बात होगी 2012 की कमोबेश एक तिहाई कांग्रेस को स्वयं में समाहित कर चुकी भाजपा इस तिलिस्म को क्या ‘मोदी लहर’ के बल पर बढ़े मनोबल के साथ 2014 के लोक सभा चुनावों के अपने स्तर के करीब पहुंच कर तोड़ पाती है, या कि विधानसभा चुनावों के पुराने आंकड़ों में ही उलझ कर रह जाती है। यह सर्वमान्य तथ्य है कि तत्कालीन यूपी एवं केंद्र में भाजपा की सरकार रहते ही उत्तराखंड राज्य का दशकों लंबे संघर्ष के बाद जन्म हुआ। लेकिन यही पार्टी राज्य गठन के बाद पहले विधानसभा चुनावों में न केवल हार गयी, वरन उनका मत प्रतिशत इससे पूर्व के यानी 1996 के विधानसभा चुनावों के 32.52 प्रतिशत के मुकाबले सात प्रतिशत से अधिक गिर कर 25.45 प्रतिशत रह गया। आगे 2007 के चुनावों में उसने 34 प्रतिशत मत लाकर वापसी जरूर की, किंतु 2012 आते ‘खंडूड़ी है जरूरी’ नारे के बीच उसने अपने करीब छह प्रतिशत मतदाताओं के साथ राज्य की सत्ता भी गंवा दी। वहीं 1996 में केवल 8.35 मत लाने वाली कांग्रेस पार्टी 2002 में 26.91 प्रतिशत मत लाकर नारायण दत्त तिवारी की अगुवाई में सत्तासीन हो गयी। उसे मिला यह करीब 18 प्रतिशत से अधिक जनसमर्थन सपा के 21.8 प्रतिशत से 6.24 प्रतिशत पर और बसपा के 19.64 प्रतिशत से 10.93 प्रतिशत पर आ गिरने के फलस्वरूप मिला। आगे 2007 में कांग्रेस ने सत्ता जरूर गंवाई, बावजूद अपने मतदाताओं को करीब तीन प्रतिशत की बढ़ोत्तरी के साथ 29.6 प्रतिशत कर दिया। वहीं 2012 में वह और चार प्रतिशत मत बढ़ाकर 33.79 प्रतिशत मतों के साथ राज्य की सत्ता में लौट आई।

उत्तराखंड में विभिन्न दलों को मिले मत प्रतिशत में: 

वर्ष        कांग्रेस   भाजपा     सपा       बसपा

1996    8.35     32.52     21.80    19.64

2002   26.91  25.45      06.24    10.93

2007   29.60  34.00     05.00    11.08

2012   33.79   33.15      01.45     12.19

 उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2017 के लिए भाजपा-कांग्रेस के उम्मीदवारों के नाम :

सीट संख्या    नाम     भाजपा            कांग्रेस 

  1. पुरोला (सुरक्षित) -मालचंद – राजकुमार
  2. यमुनोत्री-केदार सिंह रावत – संजय डोभाल
  3. गंगोत्री-गोपाल सिंह रावत – विजयपाल सिंह सजवाण
  4. बद्रीनाथ-महेन्द्र भट्ट – राजेन्द्र सिंह भंडारी
  5. थराली (सुरक्षित) -मगनलाल शाह- डा. जीत राम
  6. कर्णप्रयाग-सुरेन्द्र सिंह नेगी – डा. अनसुया प्रसाद मैखुरी
  7. केदारनाथ-शैलारानी रावत – मनोज रावत
  8. रुद्रप्रयाग-भरत सिंह चौधरी – लक्ष्मी राणा
  9. घनसाली(सुरक्षित) -शक्तिलाल – भीमलाल आर्य
  10. देवप्रयाग-विनोद कण्डारी – मंत्री प्रसाद नैथानी
  11. नरेन्द्रनगर-सुबोध उनियाल – हिमांशु बिजल्वाण
  12. प्रतापनगर-विजय पंवार(गुड्डू) – विक्रम सिंह नेगी
  13. टिहरी-धन सिंह नेगी- नरेन्द्र चन्द्र रमोला
  14. धनोल्टी-नारायण सिंह राणा – मनमोहन मल्ल
  15. चकराता-मधु चौहान – प्रीतम सिंह
  16. विकासनगर- मुन्ना सिंह चौहान – नव प्रभात
  17. सहसपुर-सहदेव पुण्डीर – किशोर उपाध्याय
  18. धर्मपुर- विनोद चमोली – दिनेश अग्रवाल
  19. रायपुर-उमेश शर्मा (काऊ) – प्रभु लाल बहुगुणा
  20. राजपुर रोड (सुरक्षित -खजानदास – राजकुमार
  21. देहरादून कैंट-हरबंश कपूर – सूर्यकांत धस्माना
  22. मसूरी-गणेश जोशी – गोदावरी थापली
  23. डोईवाला-त्रिवेन्द्र सिंह रावत – हीरा सिंह बिष्ट
  24. ऋषिकेश-प्रेमचंद अग्रवाल – राजपाल खरोला
  25. हरिद्वार-मदन कौशिक – ब्रह्मस्वरूप ब्रहमचारी
  26. बीएचईएल रानीपुर-आदेश चौहान – अंबरीश कुमार
  27. ज्वालापुर/हरिद्वार ग्रामीण-सुरेश राठौर- हरीश रावत
  28. भगवानपुर-सुबोध राकेश- ममता राकेश
  29. झबरेड़ा (सुरक्षित) -देशराज कर्नवाल – राजपाल सिंह
  30. पिरानकलियर-जयभगवान सैनी – फुरकान अहमद
  31. रुड़की-प्रदीप बत्रा – सुरेश चंद जैन
  32. खानपुर-कुंवर प्रणव चैम्पियन – चौधरी यशवीर सिंह
  33. मंगलौर-ऋषि बालियान – काजी मो. निजामुद्दीन
  34. लक्सर-संजय गुप्ता – हाजी तस्लीम अहमद
  35. हरिद्वार ग्रामीण-स्वामी यतीश्वरानन्द
  36. यमकेश्वर-ऋतु खण्डूड़ी – शैलेन्द्र सिंह रावत
  37. पौड़ी (सुरक्षित) -मुकेश कोली – नवल किशोर
  38. श्रीनगर-धनसिंह रावत – गणेश गोदियाल
  39. चौबट्टा खाल-सतपाल महाराज – राजपाल सिंह बिष्ट
  40. लैंसडाउन-दलीप रावत – ले. जनरल टीपीएस रावत
  41. कोटद्वार-डा. हरक सिंह – सुरेन्द्र सिंह नेगी
  42. धारचूला-दीपेन्द्र पाल – हरीश धामी
  43. डीडीहाट-बिशनसिंह चुफाल – प्रदीप सिंह पाल
  44. पिथौरागढ-प्रकाश पंत – मयूख महर
  45. गंगोलीहाट (सुरक्षित) -मीना गंगोला -नारायण राम आर्य
  46. कपकोट-बलवन्त सिंह भौर्याल – ललित फरस्वाण
  47. बागेश्वर (सुरक्षित) -चंदनदास – बाल किशन
  48. द्वाराहाट-महेश नेगी – मदन सिंह बिष्ट
  49. सल्ट-सुरेन्द्र सिंह जीना – गंगा पंचोली
  50. रानीखेत-अजय भट्ट – करन मेहरा
  51. सोमेश्वर-रेखा आर्य – राजेन्द्र बाराकोटी
  52. अल्मोड़ा-रघुनाथ सिंह चौहान – मनोज तिवारी
  53. जागेश्वर-सुभाष पाण्डे – गोविन्द सिंह कुंजवाल
  54. लोहाघाट-पूरन फर्त्याल – खुशहाल सिंह अधिकारी
  55. चंपावत-कैलाश गहतोड़ी – हेमेश खर्कवाल
  56. लालकुआं- नवीन दुमका – हरीश चंद्र दुर्गापाल
  57. भीमताल- गोविन्द सिंह बिष्ट – दान सिंह भंडारी
  58. नैनीताल(सुरक्षित) -संजीव आर्य – सरिता आर्य
  59. हल्द्वानी- जोगेंद्र सिंह रौतेला – डा. इंदिरा ह्दयेश
  60. कालाढूंगी-बंशीधर भगत – प्रकाश जोशी
  61. रामनगर- दीवान सिंह बिष्ट – रणजीत रावत
  62. जसपुर-डा. शैलेन्द्र मोहन सिंघल – आदेश चौहान
  63. काशीपुर-हरभजन सिंह चीमा – मनोज जोशी
  64. बाजपुर (सुरक्षित) -यशपाल आर्य- सुनीता बाजवा टम्टा
  65. गदरपुर-अरविन्द पाण्डे – राजेन्द्र सिंह
  66. रुद्रपुर-राजकुमार ठुकराल – तिलकराज बेहड़
  67. किच्छा-राजेश शुक्ला – हरीश रावत
  68. सितारगंज-सौरभ बहुगुणा – मालती बिश्वास
  69. नानकमत्ता (एसटी) -प्रेम सिंह राणा – गोपाल सिंह राणा
  70. खटीमा-पुष्कर सिंह धामी – भुवन कापड़ी

उत्तराखंड में विधानसभावार मतदाताओं की संख्या :

uttarakhandमुख्य निर्वाचन अधिकारी राधा रतूड़ी के द्वारा 10 जनवरी को जारी उत्तराखंड की विधानसभावार मतदाताओं की अनंतिम सूची के अनुसार आगामी विधानसभा चुनाव में प्रदेश में कुल 74,95, 672 मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। इनमें महिला मतदाताओं की संख्या 35,72,029 व पुरुष मतदाताओं की संख्या 39,23492 है। सूची के अनुसार उत्तरकाशी के पुरोला विधानसभा में सबसे कम 67,031 मतदाता हैं, जबकि देहरादून के धर्मपुर विधानसभा क्षेत्र में सर्वाधिक 1,82,919 मतदाता हैं। वहीँ सर्वाधिक मतदाता वाले जिले में देहरादून 13,68,225 मतदाताओं के साथ शीर्ष पर है, जबकि 1,78, 778 मतदाताओं के साथ रुद्र प्रयाग सबसे कम मतदाता वाला जिला है।

विस्तृत जानकारी टेबल में :

Name Of District Assembly Constituency TOTAL ELECTORS Total Polling Station
No Name Male Female T. G. Total Urban Rural Total
1 2 3 7 8 9 10 11 12
UTTARKASHI 1 PUROLA (SC) 34775 32256 0 67031 6 172 178
2 YAMUNOTRI 35573 33623 0 69196 14 145 159
3 GANGOTRI 41637 38761 0 80398 11 154 165
District Total 111985 104640 0 216625 31 471 502
CHAMOLI 4 BADRINATH 51181 47409 6 98596 35 170 205
5 THARALI (SC) 50621 47738 0 98359 1 177 178
6 KARANPRAYAG 45835 45132 1 90968 20 149 169
District Total 147637 140279 7 287923 56 496 552
RUDRAPRAYAG 7 KEDARNATH 40630 41941 0 82571 7 142 149
8 RUDRAPRAYAG 48400 47807 0 96207 5 157 162
District Total 89030 89748 0 178778 12 299 311
TEHRI GARHWAL 9 GHANSALI (SC) 46344 44367 0 90711 0 152 152
10 DEOPRAYAG 40907 39528 0 80435 3 136 139
11 NARENDRANAGAR 43963 39472 0 83435 10 153 163
12 PRATAPNAGAR 40836 39075 0 79911 0 143 143
13 TEHRI 41454 38506 4 79964 24 126 150
14 DHANOLTI 39808 36534 1 76343 0 167 167
District Total 253312 237482 5 490799 37 877 914
DEHRADUN 15 CHAKRATA (ST) 54198 44929 2 99129 0 216 216
16 VIKASNAGAR 57749 50814 4 108567 27 108 135
17 SAHASPUR 77322 70444 4 147770 10 174 184
18 DHARAMPUR 99547 83371 1 182919 123 71 194
19 RAIPUR 86548 77042 1 163591 109 80 189
20 RAJPUR ROAD SC) 63296 55939 8 119243 150 0 150
21 DEHRADUN CANT 67719 58941 2 126662 137 0 137
22 MUSSOORIE 67658 60528 3 128189 111 53 164
23 DOIWWALA 73162 68026 1 141189 10 163 173
24 RISHIKESH 79232 71761 3 150996 68 112 180
District Total 726431 641795 29 1368255 745 977 1722
HARIDWAR 25 HARIDWAR 79114 64230 9 143353 175 0 175
26 BHEL RANIPUR 78585 68091 12 146688 109 68 177
27 JWALAPUR (SC) 58419 50354 14 108787 0 143 143
28 BHAGWANPUR SC) 62725 53551 2 116278 13 136 149
29 JHABRERA (SC) 59839 50587 2 110428 23 128 151
30 PIRANKALIYAR 59353 51595 5 110953 55 78 133
31 ROORKEE 59430 52786 6 112222 125 8 133
32 KHANPUR 72049 62967 7 135023 12 156 168
33 MANGLOR 56247 47336 19 103602 38 90 128
34 LAKSAR 51225 43952 6 95183 19 104 123
35 HARIDWAR RURAL 64073 55964 8 120045 0 153 153
District Total 701059 601413 90 1302562 569 1064 1633
PAURI GARHWAL 36 YAMKESHWAR 43919 39565 1 83485 4 163 167
37 PAURI (SC) 45659 45916 1 91576 18 136 154
38 SHRINAGAR 52109 50172 2 102283 15 140 155
39 CHAUBATAKHAL 43660 44332 0 87992 0 157 157
40 LANSDOWNE 40434 37920 0 78354 4 129 133
41 KOTDWAR 51036 49470 1 100507 27 86 113
District Total 276817 267375 5 544197 68 811 879
PITHORAGARH 42 DHARCHULA 41522 42217 0 83739 5 147 152
43 DIDIHAT 38634 41255 0 79889 4 128 132
44 PITHORAGARH 51272 51481 1 102754 40 99 139
45 GANGOLIHAT (SC) 50467 47627 0 98094 8 146 154
District Total 181895 182580 1 364476 57 520 577
BAGESHWAR 46 KAPKOT 47264 46354 0 93618 0 172 172
47 BAGESHWWAR 55883 53816 0 109699 6 171 177
District Total 103147 100170 0 203317 6 343 349
ALMORA 48 DWARAHAT 43416 46142 1 89559 0 144 144
49 SALT 48332 46710 0 95042 0 134 134
50 RANIKHET 40176 38305 0 78481 14 119 133
51 SOMESHWAR (SC) 43140 41343 0 84483 0 139 139
52 ALMORA 45149 42526 0 87675 31 109 140
53 JAGESHWAR 46808 42746 0 89554 0 173 173
District Total 267021 257772 1 524794 45 818 863
CHAMPAWAT 54 LOHAGHAT 52733 47645 0 100378 6 172 178
55 CHAMPAWAT 45619 41430 0 87049 38 104 142
District Total 98352 89075 0 187427 44 276 320
NAINITAL 56 LALKUWAN 58240 51913 1 110154 18 115 133
57 BHIMTAL 51464 44213 1 95678 7 144 151
58 NAINITAL (SC) 56925 50238 2 107165 42 110 152
59 HALDWANI 74091 65115 2 139208 163 0 163
60 KALADHUNGI 75304 70516 2 145822 7 176 183
61 RAMNAGAR 56719 51253 2 107974 43 89 132
District Total 372743 333248 10 706001 280 634 914
UDHAMSINGH NAGAR 62 JASPUR 62576 53013 0 115589 48 93 141
63 KASHIPUR 79358 71454 0 150812 98 72 170
64 BAZPUR (SC) 72057 63675 0 135732 35 117 152
65 GADARPUR 63975 56999 2 120976 31 113 144
66 RUDRAPUR 85859 73270 1 159130 127 55 182
67 KICHHA 63904 55407 0 119311 28 112 140
68 SITARGANJ 57145 49939 0 107084 28 97 125
69 NANAKMATA (ST) 55795 52051 0 107846 0 136 136
70 KHATIMA 53394 50644 0 104038 12 116 128
District Total 594063 526452 3 1120518 407 911 1318
TOTAL 3923492 3572029 151 7495672 2357 8497 10854

लगातार जमीन खो रहा है उक्रांद

-2002 में चार, 2007 में तीन व 2012 में एक सीट जीती
-इस बार ५८ सीटों पर मैदान में, नैनीताल व भीमताल में घोषित प्रत्याशियों ने नहीं कराया नामांकन
नवीन जोशी, नैनीताल। कहते हैं इतिहास स्वयं को दोराता है, साथ ही यह भी एक सच्चाई है कि इतिहास से मिले सबकों से कोई सबक नहीं सीखता। राज्य के एकमात्र क्षेत्रीय दल बताये जाने वाले उत्तराखंड क्रांति दल यानी उक्रांद ने इतिहास को इसी रूप में सही साबित करते हुऐ अपनी गलती का इतिहास दोहरा दिया है। ऐसे में ऐसी कल्पना तक की जाने लगी है कि पिछली बार की तरह राज्य में समान विचार धारा वाले दलों को साथ लेकर न चलने वाला उक्रांद इस बार भी पिछली बार की तरह दल के बजाय अपने दम पर जीत मानने वाले कुछ विधायकों के साथ न सिमट जाये, और इस बार दो धड़ों में बंटने के बाद बमुश्किल क्षेत्रीय पार्टी के रूप में बचे अपने अस्तित्व को ही शून्य न कर दे।
यह आशंकाऐं उक्रांद के केवल 58 सीटों पर ही चुनाव लड़ने और, घोषित प्रत्याशियों के भी नामांकन न कराने की स्थितियों के बीच उठ खड़ी हुई हैं। ऐसी स्थितियों में ऐसा भी लगने लगा है कि उक्रांद ने टिकट वितरण से ही चुनाव चिन्ह कुर्सी वापस मिलने और दूसरे गुट के भी समर्थन में आ खड़ा होने से मिलने वाले राजनीतिक लाभ और राज्य की आंदोलनकारी शक्तियों का विश्वास भी खो दिया है। यहां तक कि न तो उक्रांद राज्य की सभी ७० सीटों पर टिकट ही दे पाया, और ना ही समान विचारधारा वाले दलों से समझौता ही कर पाया। वहीं कुमाऊं मंडल के मुख्यालय की सीट पर तो उसके घोषित प्रत्याशी, भारी बहुमत से नगर पालिका अध्यक्ष बने श्याम नारायण नामांकन पत्र खरीदने के बाद नामांकन ही नहीं कर पाये, और भीमताल सीट पर घोषित प्रत्याशी, पूर्व केंद्रीय अध्यक्ष व विधायक डा. नारायण सिंह जंतवाल ने भी स्वयं ही चुनाव लड़ने से मना कर दिया, और उनकी जगह किसी अन्य को चुनाव लड़ाना पड़ा। बताया गया है कि जंतवाल को उनके बिना पूछे पिछली सीट कालाढुंगी की बजाय भीमताल से और श्याम नारायण को बिना स्थानीय कार्यकर्ताओं से बात किये टिकट दे दिया गया था।
उक्रांद का राजनीतिक इतिहास
नैनीताल। २५ जुलाई १९७९ को कुमाऊं विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डा. डीडी पंत, उत्तराखंड के गांधी कहे जाने वाले इंद्रमणि बड़ौनी व विपिन त्रिपाठी सरीखे नेताओं के द्वारा स्थापना हुई थी। राज्य बनने से पूर्व प्रभावी भूमिका में रहे दल के प्रमुख चेहरे काशी सिंह ऐरी उत्तर प्रदेश विधानसभा में १९८५, १९८९ व १९९३ में यानी लगातार तीन बार चुनाव जीतकर विधायक रहे। लेकिन १९९४ के राज्य आंदोलन के चरम के दौर में १९९६ का लोक सभा चुनाव का बहिस्कार करने का बड़ा दाग भी उक्रांद पर लगा। वहीं राज्य बनने के बाद पहली निर्वाचित विधान सभा में उक्रांद के चार विधायक-ऐरी, जंतवाल, विपिन त्रिपाठी (उनकी मृत्यु के बाद उपचुनाव में पुत्र पुष्पेश त्रिपाठी) और त्रिवेंद्र पवार (बाद में अलग गुट बना लिया), २००७ में तीन विधायक-पुष्पेश, दिवाकर भट्ट और ओमगोपाल (दिवाकर और ओमगोपाल २०१२ के चुनाव में भाजपा से लड़े, इस बार निर्दलीय लड़ रहे हैं) और २०१२ में केवल एक विधायक प्रीतम सिंह पवार (कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे, अब निर्दलीय लड़ रहे) जीते, यानी लगातार उसकी विधायक संख्या एक-एक कर घटती चली गयी। यह भी रहा कि तीन में से दो बार दल ने वैचारिक भिन्नता के बावजूद कमोबेश बिना समर्थन मांगे भी सत्तारूढ़ दल से हाथ मिलाया, और उसके निर्वाचित विधायक अपने नेतृत्व के प्रति कमोबेश बेलगाम हुए, और पार्टी से अलग चलते रहे।
अपने गठन से गलती दर गलती करता रहा है उक्रांद
नैनीताल। उक्रांद में वर्तमान राजनीति के लिहाज से राजनीतिक चातुर्य या तिकड़मों की कमी मानें या कुछ और पर सच्चाई यह है कि वह अपने गठन से ही गलतियों पर गलतियां करता जा रहा है, और इन्हीं गलतियों का ही परिणाम कहा जाऐगा कि वह प्रदेश का एकमात्र क्षेत्रीय दल होने के बावजूद अब निर्दलीयों की भांति पिछली विधानसभा में एक विधायक पर सिमट गया, और वह एकमात्र विधायक भी दूसरी विधानसभा की तरह पार्टी के नियंत्रण से अलग रहे, व २००७ के दो विधायकों की तरह इस बार निर्दलीय चुनाव लड़ने की स्थिति में हैं। इस दल ने १९९६ के चुनावों का बहिस्कार कर अपनी पहली राजनीतिक गलती की थी। राज्य गठन के पूर्व उक्रांद के नेता सपा से सांठ-गांठ करते दिखे और अलग राज्य का विरोध कर रहे कांग्रेस-भाजपा जैसी राज्य विरोधी ताकतों को संघर्ष समिति की कमान सोंपकर हावी होने का मौका दिया। शायद यही कारण रहे कि राज्य बनने के बाद वह लगातार अपनी शक्ति खोता रहा। २००७ में उसने भाजपा सरकार को समर्थन दिया और फिर समर्थन वापस लेकर तथा और २०१२ में कांग्रेस सरकार को कमोबेश बिन मांगे समर्थन देकर अपनी राजनीतिक अनुभवहीनता का ही परिचय दिया। इस कवायद में दल दो टुकड़े भी हो गया। यही स्थिति २००७ में भी रही। ऐसे ही अतिवादी रवैये के कारण वह १९९५ में भी टूटा, और लगातार टूटना ही शायद उसकी नियति बन गया।

नैनीताल जनपद में 60 फीसद युवा मतदाता होंगे जीत की धुरी ! दलों की रहेगी ‘यूथ कैप्चरिंग’ की कोशिश

-प्रदेश विधानसभा के चुनावों में भी देश के लिये वोट देने और राज्य की राजनीति से व्यथित दिखे पहली बार मतदाता बने युवा

नवीन जोशी, नैनीताल। यूं तो पूरा भारत देश ही युवाओं का देश है, और युवा देश की राजनीति को बदलने की भी ताकत रखते हैं। लोक नायक जयप्रकाश के आंदोलन से लेकर अन्ना हजारे में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और इधर दिल्ली में अरविंद केजरीवाल और केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भाजपा सरकार को मिले ऐतिहासिक समर्थन में भी युवाओं की बड़ी भूमिका को निर्विवाद तौर पर स्वीकार किया जाता है। कुछ इसी तर्ज पर नैनीताल जनपद भी युवाओं के मामले में अपवाद नहीं है। जनपद में कुल ७,०५,८१७ मतदाताओं में से ४,०१,३१४ यानी ५६.८५ फीसद मतदाता ३९ वर्ष से कम उम्र के हैं, और यदि इनमें ४९ वर्ष तक के मतदाताओं को भी शामिल कर लें तो ५,३४,२०२ यानी ७५.८० फीसद से अधिक मतदाता ४९ वर्ष से कम उम्र के हैं। वहीं जिले में ११,१२३ मतदाता ऐसे हैं जो इसी वर्ष १८ वर्ष के हुए हैं, यानी अपने जीवन का पहला वोट देंगे। इन युवाओं में मतदान के प्रति कितना उत्साह है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बीते एक वर्ष में कुल ११,४८२ मतदाताओं ने अपना नाम मतदाता सूची में जुड़वाया है, जिनमें से करीब ९७ फीसद ये ही यानी पहली बार मतदाता बने युवा ही हैं। इसलिए उनके वोटों की “यूथ कैप्चरिंग” करने पर सभी दलों की कोशिश रहेगी।

नगर के युवाओं में जीवन का पहला वोट देने को लेकर खासा उत्साह दिखा। इस वर्ग के युवाओं में मतदान के प्रति तो पूरी यानी १०० फीसद जागरूकता दिखाई दी। उन्होंने कहा कि वे हर हाल में बिना किसी के बहकावे में आये १०० फीसद अपना वोट देंगे। वहीं वे अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति भी जागरूक नजर आये। उन्होंने जाति-धर्म से ऊपर उठकर, और कई ने तो अपनी उच्च शिक्षा, रोजगार जैसी समस्याओं को भी दरकिनार कर प्रदेश की विधानसभा के लिये हो रहे चुनाव में देश की बेहतरी के लिये वोट देने का जज्बा भी दिखाया। इसके अलावा कुछ राजनीति में सफाई, भाई-भतीजावाद से राजनीति को दूर रखने के भी हामी दिखे। कुछ ने ई-वोटिंग को भी आज के दौर की जरूरत बताया, ताकि समय की कमी के दौर में वे किसी गलती रहित व्यवस्था के जरिये घर बैठे भी अपना वोट दे पायें। अलबत्ता, ऐसे युवा राज्य में भ्रष्टाचार, जोड़-तोड़ की राजनीति, राजनीति में हल्केपन को लेकर भी चिंतित दिखाई दिये।

नैनीताल जनपद में पहली बार बने मतदाता :

विधानसभा पुरुष    महिला    कुल

लालकुआ    ९४४     ६००        १५४४

भीमताल    १३००    ७८९        २०८९

नैनीताल    १२४६    ७९५         २०४१

हल्द्वानी   ११२२    ८१६         १९३८

कालाढुंगी   ११३८   ८०८          २५११

रामनगर   ९३५      ६३०          १५६५

कुल         ६६८५     ४४३८        १११२३

नैनीताल जनपद में विभिन्न आयु वर्ग के मतदाता :

विधानसभा २० से २९  ३० से ३९  ४० से ४९  ५० से ५९  ६० से ६९  ७० से ८०  ८० से अधिक  कुल

लालकुआ    ३१८३५     २९८०५     २०९४०     १३५४५     ७९७२      ३४०२       ११११              १०८६१०

भीमताल     २७९४८     २४७००     १७३७६     ११६०८     ७४२३      ३५३४       ९९९                  ९३५८८

नैनीताल     २८७१६     २७९८१     २१२०९      १३८१४    ८२८३       ३९४३      ११७९               १०५१२५

हल्द्वानी    ४१८७७     ३८६३८     २५५७४      १६३५७    ९४३९       ४१९८      १२०५               १३७२८८

कालाढुंगी   ३८५०४     ३८५९०     २७९०३       १९३६५    १२४०१     ५४११      १७०१               १४३८७५

रामनगर    ३२८५३     २८७४४     १९८८६       १२६०८     ७९५९      ३२४७       ९११                 १०६२०८

कुल          २०१७३३    १८८४५८   १३२८८८     ८७२९७     ५३४७७    २३७३५     ७१०६            ६९४६९४

यक्ष प्रश्न : नैनीताल में 2012 दोहरायेगा या 2014, या लिखी जाएगी नयी इबारत

-२०१२ के विधानसभा चुनाव में नैनीताल विस में १४५ में से केवल ३० बूथों पर ही मामूली अंतर से आगे रही भाजपा, जबकि ११५ बूथों पर आगे रही थी कांग्रेस -वहीं २०१४ के लोकसभा चुनावों में १०५ बूथों पर भाजपा और ४० बूथों पर ही आगे रही थी कांग्रेस नवीन जोशी, नैनीताल। आजादी के बाद से विशुद्ध रूप से केवल एक और संयुक्त क्षेत्र होने पर दो बार ही भाजपा के खाते में गई नैनीताल विधानसभा में आसन्न चुनावों में पिछले दो चुनाव एक-दूसरे के बिलकुल उलट रहे थे। २०१२ के विस चुनावों में जहां नैनीताल विस की १४५ में से केवल ३० बूथों को छोड़कर शेष ११५ बूथों पर कांग्रेस आगे रही थी, वहीं २०१४ के लोक सभा चुनावों में यह आंकड़े कमोबेश पूरी तरह उलट गये थे और १०५ बूथों पर भाजपा जबकि केवल ४० बूथों पर कांग्रेस आगे रही थी। अब करीब ढाई वर्ष के बाद एक बार फिर बाजी मतदाताओं के हाथ में है कि वे नैनीताल विधानसभा में २०१२ का इतिहास दोहराते हैं कि २०१४ का, या कि कोई नयी इबारत ही लिखते हैं।

पहले २०१४ के लोक सभा चुनावों की बात करें तो इन चुनावों में मोदी की आंधी में नैनीताल विधानसभा क्षेत्र के १४६ में से करीब २० फीसद यानी ३० सीटों पर ही कांग्रेस प्रत्याशी केसी सिंह बाबा कहीं दो से लेकर अधिकतम १३२ वोटों की बढ़त ले पाए, जबकि भाजपा प्रत्याशी भगत सिंह कोश्यारी ने ८० फीसद यानी ११६ बूथों से अपनी बड़ी जीत की इबारत लिखी। वहीं नैनीताल विस के इतिहास की बात करें आजादी के बाद से भाजपा के लिए नैनीताल विधानसभा में कालाढुंगी का बड़ा हिस्सा जुड़ा होने के उत्तराखंड बनने से पहले के दौर में बंशीधर भगत चुनाव जीते थे। तब भी वर्तमान नैनीताल विस के क्षेत्र में भाजपा प्रत्याशी कमोबेश पिछड़ते ही रहते थे। उत्तराखंड बनने के बाद भाजपा के खड़क सिंह बोहरा २००७ में कोटाबाग और कालाढुंगी क्षेत्र में बढ़त लेकर बमुश्किल यहां से चुनाव जीत पाए थे। वहीं २०१२ के विधानसभा चुनावों में यहां से चुनाव के कुछ दिन पहले ही प्रत्याशी घोषित हुर्इं, और चुनाव क्षेत्र में ठीक से पहुंच भी न पार्इं सरिता आर्या ने २५५६३ वोट प्राप्त कर पांच वर्ष से दिन-रात चुनाव की तैयारी में जुटे भाजपा के हेम चंद्र आर्या को ६३५८ मतों के बड़े अंतर से हरा दिया था। लेकिन, दो वर्ष के भीतर ही हुए लोक सभा चुनावों में कांग्रेस यहां बुरी तरह से पस्त नजर आई। वहीं २०१४ के लोस चुनावों में नैनीताल विस से भाजपा को ३०१७३ व कांग्रेस को २१५७५ वोट मिले, और कांग्रेस ८५७८ वोटों से पीछे रही।

नैनीताल नगर में केवल दो बार ही कांग्रेस के तिलिस्म को तोड़ पायी है भाजपा

नैनीताल। नैनीताल विस के बाबत लोकसभा चुनावों के इतिहास की बात करें तो एकमात्र २००४ में भाजपा प्रत्याशी विजय बंसल नैनीताल मंडल से आगे रहे थे, पर तब भी उनके आगे रहने में खुर्पाताल के ग्रामीण क्षेत्रों का योगदान रहा था। जबकि २०१४ के लोस चुनाव में भाजपा को नैनीताल नगर के ३७ बूथों में इतिहास में सर्वाधिक ९१५४ वोट मिले, जबकि कांग्रेस ७०२१ वोटों के साथ २१३३ वोटों से पीछे रह गई है। नगर के नारायणनगर, हरिनगर, लोनिवि कार्यालय कक्ष नंबर और मल्लीताल के कुछ मुस्लिम, दलित व कर्मचारी बहुत क्षेत्रों के केवल नौ बूथों पर ही कांग्रेस अपनी साख बचा पाई। वहीं भाजपा ने नगर के राबाउप्रावि मल्लीताल में ४३९ मत प्राप्त कर विधानसभा में सर्वाधिक १८२ वोटों से बढ़त दर्ज की।

बसपा और उक्रांद के मतदाताओं के रुख पर टिका भाजपा और कांग्रेस के प्रत्याशियों का भविष्य

nainital-बसपा से कमजोर तो उक्रांद से प्रत्याशी ही न होने से इन दलों से जुड़े वोटर बनेंगे किंगमेकर

-नैनीताल ने हर बार पार्टी बदलकर सबको देखा एक-एक बार, 2002 में उक्रांद, 2007 में भाजपा व 2012 में कांग्रेस प्रत्यासी पर जताया भरोसा 
नवीन जोशी/ नैनीताल। नैनीताल सुरक्षित विधानसभा सीट पर पहली बार अनूठी स्थिति नजर आ रही है। चुनाव में भाजपा और कांग्रेस मुख्य मुकाबले में हैं, परंतु उनके राजनीतिक भविष्य का निर्धारण बसपा और उक्रांद के मतदाताओं के रुख पर टिका है। राज्य गठन के बाद से इस सीट पर उक्रांद और बसपा के मतदाता ही निर्णायक स्थिति में रहे हैं। सबसे पहले विस चुनाव में उक्रांद प्रत्याशी यहां से चुनाव जीता और दूसरे चुनाव में मामूली अंतर से दूसरे स्थान पर रहा। वर्तमान में यहां उक्रांद के टिकट पर जीते व्यक्ति ही नगर पालिका के अध्यक्ष हैं। बसपा प्रत्याशी भी यहां वर्ष 2002 व 2012 के चुनावों में तीसरे स्थानों पर रहे, लेकिन इस बार जहां बसपा के प्रत्याशी अपेक्षाकृत कमजोर आंके जा रहे हैं, वहीं उक्रांद प्रत्याशी ने नाम घोषित होने और नामांकन पत्र लाने के बावजूद नामांकन ही नहीं किया। ऐसे में इन दोनों दलों के मतदाताओं के समक्ष भाजपा-कांग्रेस अथवा निर्दलीयों में से किसी को चुनने की विवशता दिखाई दे रही है।

वर्ष 2002 के पहले विस चुनाव में नैनीताल सीट से 17 उम्मीदवारों में से उक्रांद के डा. नारायण सिंह जंतवाल (10,864) जीते थे, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी जया बिष्ट (8,517) दूसरे, बसपा के डा. भूपाल सिंह भाकुनी (7,499) तीसरे और भाजपा की शांति मेहरा (6,936) चौथे स्थान पर रही थीं। शेष 13 प्रत्यासी केवल 6,807 मत ही ला पाए थे। वहीं 2007 के चुनाव में जंतवाल (11,980) को भाजपा के खड़क सिंह बोहरा (12,342) के हाथों केवल 367 मतों के अंतर से हार झेलनी पड़ी थी। उस चुनाव में कांग्रेस के बागी, एनसीपी यानी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से चुनाव लड़े डा. हरीश बिष्ट (6,267) वोट लाकर सभी दलों के समीकरण बदल दिये थे। फलस्वरूप कांग्रेस प्रत्याशी जया बिष्ट (11,164) तीसरे, हरीश बिष्ट चौथे और बसपा प्रत्याशी महेश भट्ट (6,079) पांचवें स्थान पर रहे थे। जबकि शेष पांच प्रत्यासी केवल 2,658 मत ही ला पाए थे। वर्ष 2012 में यह सीट नये परिसीमन में अनुसूचित वर्ग के लिये सुरक्षित होने के साथ ही मतदाताओं के लिहाज से बड़ी हुई तो प्रत्याशियों की संख्या कम हो गयी। ऐसे में कांग्रेस की सरिता आर्य ने नामांकन के बाद ही चुनाव की तैयारियां शुरू करने के बावजूद पांच वर्ष से तैयारी कर रहे भाजपा के हेम चंद्र आर्य (19,255) के मुकाबले 25,563 मत हासिल कर छह हजार से भी बड़े अंतर से जीत दर्ज कर ली। वहीं उक्रांद प्रत्याशी विनोद कुमार (763), सपा के देवेन्द्र देवा (503) व निर्दलीय पद्मा देवी (878) के कमजोर होने की परिस्थितियों के बीच बसपा प्रत्याशी पूर्व नगर पालिकाध्यक्ष संजय कुमार ‘‘संजू’ 4,460 वोट लाकर तीसरे स्थान पर रहे। मौजूदा विस चुनाव में कांग्रेस को छोड़कर पूरी तरह से मैदान बदल चुका है। हाल ही में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आये वरिष्ठ नेता यशपाल आर्य के पुत्र संजीव आर्य यहां से भाजपा प्रत्याशी हैं। टिकट न मिलने से नाराज पिछली बार के भाजपा प्रत्याशी हेम चंद्र आर्य बागी होकर निर्दलीय मैदान में हैं। वहीं बसपा से क्षेत्र पंचायत सदस्य सुंदर लाल आर्य और एक निर्दलीय प्रत्याशी केएल आर्य भी मैदान में हैं। इन परिस्थितियों में बसपा और उक्रांद के मतदाताओं के रुख पर दोनों राष्ट्रीय दलों के साथ ही निर्दलीयों की भी नजरें टिकी हैं।

नोटा दबा सकती है ‘प्रगतिशील स्येणियां’!

उक्रांद का विकल्प मौजूद न होने की परिस्थितियों में स्वयं को प्रगतिवादी-वामपंथी कहलाना पसंद करने वाली सैंणियां यानी महिलाएं ऊहापोह की स्थिति में हैं। ऐेसे में इन महिलाओं के उत्तराखंड महिला मंच, उत्तराखंड महिला एकता परिषद, विमर्श, सरल, प्रयास, सैंणियों का संगठन, माटी, मैत्री, सौहार्द्र जनसेवा संस्थान, प्रगतिशील महिला एकता केंद्र आदि दबाव समूह के रूप में संगठन एक छत के नीचे आकर अपनी बातें आगे कर रही हैं। उन्होंने कहा कि नैनीताल सीट पर उनकी विचारधारा का कोई भी प्रत्याशी चुनाव मैदान में नहीं है। इसलिये वे चुनाव में नोटा का बटन भी दबा सकती हैं।
नैनीताल सीट पर मतदाता : पुरुष 56,925 महिलाएं 50,238, कुल : 107165

पिछले 2012 के चुनाव में मिले मत : सरिता आर्य कांग्रेस : 25,563, हेम चंद्र आर्य भाजपा 19,255, संजय कुमार ‘संजू’ बसपा  4,460

मैदान में उतरे प्रत्याशी : भाजपा से संजीव आर्य, कांग्रेस से सरिता आर्य, बसपा से सुंदर लाल आर्य, निर्दलीय हेम चंद्र आर्य व केएल आर्य

मिथक-दुर्योग:हमेशा विपक्ष में बैठता रहा है रानीखेत का विधायक

ranikhet-gangotri-कांटे की टक्कर के लिये विख्यात रानीखेत में भाजपा-कांग्रेस दोनों की प्रतिष्ठा दांव पर
नवीन जोशी/ गिरीश पांडे। रानीखेत सीट की पहचान उत्तराखंड राज्य बनने के बाद से ऐसी सीट की बन गयी है, जहां हमेशा त्रिकोणीय संघर्ष होता है, तथा प्रत्याशियों में कांटे का मुकाबले के साथ विजेता व उपविजेता में जीत का अंतर बहुत कम होता है। ऐसा पिछले दो चुनावों में हुआ है। २००७ के चुनाव में जहां कांग्रेस प्रत्याशी करन माहरा ने भाजपा के अजय भट्ट को २०४ मतों के मामूली अंतर से हराया, वहीं पिछले चुनावों में भट्ट ने करन को केवल ७८ मतों के मामूली अंतर से हराकर हिसाब चुकता कर दिया। वहीं प्रदेश के मुख्यमंत्री का गृहक्षेत्र और कांग्रेस प्रत्याशी के उनके सगे साले होने तथा भाजपा प्रत्याशी के पार्टी अध्यक्ष तथा नेता प्रतिपक्ष होने से भी रानीखेत इस बार प्रदेश की हॉट सीटों में शुमार है तथा भाजपा-कांग्रेस दोनों की ही प्रतिष्ठा इस सीट पर दांव पर लगी हुई है। यूपी के दौर से अपने विधायक को सत्तापक्ष की बेंचों पर बैठाने वाली प्रदेश की गंगोत्री सीट के उलट रानीखेत सीट के साथ एक दुर्योग यह भी जुड़ा है कि यहां का विधायक हमेशा विपक्ष में रहा है।
रानीखेत के राजनीतिक इतिहास की बात करें तो छावनी परिषद के अंतर्गत आने वाले मुख्यालय और शेष ग्रामीण क्षेत्र में बंटी इस सीट पर राज्य बनने के बाद २००२ के पहले विधानसभा चुनाव में अंतरिम सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहे अजय भट्ट (१०,१९९) यूपी के पर्वतीय विकास मंत्री रहे गोविंद माहरा (मुख्यमंत्री हरीश रावत के श्वसुर) के पुत्र कांग्रेस प्रत्याशी पूरन सिंह माहरा (७,८९७) से करीब तीन हजार वोटों से जीते, जबकि राज्य में एनडी तिवारी के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार बनी। वहीं निर्दलीय नरेंद्र सिंह ३९९० मतों के साथ तीसरे और निर्दलीय रमेश चिलवाल चौथे स्थान पर रहे। ऐसी स्थितियों में कांग्रेस ने २००७ के चुनाव में पूर्व प्रत्याशी के छोटे भाई करन माहरा पर दांव खेला, जो सही बैठा। करन (१३,५०३) जीते तो, अलबत्ता अजय भट्ट (१३,२९८) पर जीत का अंतर केवल २०४ मतों का ही रहा। इस बार राज्य में भाजपा की सरकार बनी। इस चुनाव में राज्य के प्रमुख राज्य आंदोलनकारी पूरन सिंह डंगवाल बसपा के टिकट पर ६७३६ मतों के साथ तीसरे स्थान पर ले आये थे। इस चुनाव में रानीखेत वासियों ने प्रत्यक्ष तौर पर हाथी को पहाड़ पर चढ़ते हुए भी देखा। २०१२ में भी ये तीनों प्रत्याशी ही इस सीट पर त्रिकोणीय संघर्ष की परंपरा जारी रखे रहे। जिले और इस सीट के अंतर्गत आने वाली भिकियासेंण सीट के नये परिसीमन में समाप्त होने के बाद बढ़ी हुई मतदाता संख्या के साथ हुए इस चुनाव में अजय भट्ट को १४,०८९ और करन माहरा को १४,०११ मत मिले, तथा दोनों के बीच जीत का अंतर प्रदेश में सबसे कम, केवल ७८ मतों का रहा। इस बार राज्य में कांग्रेस की सरकार बनी। बसपा प्रत्याशी डंगवाल ने भी ९,३४६ मत प्राप्त कर अपनी ताकत दिखाई और वे तीसरे स्थान पर रहे। इधर इस चुनाव में हालात कुछ हद तक बदल गये हैं, बावजूद मुकाबला त्रिकोणीय ही अधिक नजर आ रहा है। पूरन डंगवाल का बीते दिनों स्वर्गवास हो चुका है, और उनके दोनों पुत्र भाजपा का दामन थाम चुके हैं, और लगातार चौथा चुनाव लड़ रहे भाजपा प्रत्याशी भट्ट के समर्थन में हैं। कांग्रेस ने भी लगातार तीसरी बार करन माहरा पर विश्वास जताया है। वहीं २००७ में सल्ट सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में ६,११५ वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे भाजपा नेता प्रमोद कुमार नैनवाल इस बार इस सीट पर लंबी तैयारियों के बाद बागी हो गये हैं। जबकि डंगवाल को कमोबेश अपनी मेहनत से मिले वोटों व सम्मान से बसपा का अंश थामने कृपाल राम तथा उक्रांद से प्रताप सिंह शाही भी चुनाव मैदान में उतर आये हैं।
गत चुनाव में रानीखेत में पड़े वोट : अजय भट्ट भाजपा १४,०८९,   करन माहरा कांग्रेस १४,०११, पूरन सिंह डंगवाल बसपा ९,३४६
रानीखेत सीट के मतदाता :  पुरुष ४०,१७६ महिला ३८,३०५ कुल मतदाता ८४,४८१
इनमें होगी चुनावी जंग: अजय भट्ट भाजपा, करन माहरा कांग्रेस, प्रमोद नैनवाल निर्दलीय

हाल-ए कालाढुंगी सीट : “जिम कॉर्बेट के घर” में फंसे भाजपा-कांग्रेस के “टाइगर”

kaladhungi-भाजपा से बंशीधर भगत, कांग्रेस से प्रकाश जोशी, बसपा से वरुण प्रताप सिंह भाकुनी, उक्रांद से डा. सुरेश डालाकोटी, निर्दलीय महेश शर्मा मैदान में 
नवीन जोशी/नैनीताल। पूर्व में नैनीताल सीट का हिस्सा रही कालाढुंगी विस सीट को यदि पिछले चुनाव से ही प्रदेश की सर्वाधिक फंसी हुई सीट कहें तो अतिशयोक्ति न होगी। वर्ष 2012 में अस्तित्व में आई कालाढुंगी विधानसभा सीट अपने पहले चुनाव में ही प्रदेश की सर्वाधिक दिलचस्प सीटों में शुमार रही। इस सीट पर 11 प्रत्याशी मैदान में थे और यहां सप्तकोणीय मुकाबला देखने को मिला। रामनगर से हल्द्वानी तक फैली इस सीट पर बीच में स्थित भाखड़ा नदी के दोनों ओर तथा ग्रामीण और शहरी मतदाताओं के अलग-अलग कोण भी हैं। जबकि हिंदू, मुस्लिम, सिख और इसाई यानी सभी वर्गों के मतदाता इस सीट में अनेक राजनीतिक रंग भरते हैं। साथ ही युवा वोटर भी एक अलग कोण बनाते हुए चुनाव को प्रभावित करते हैं। इस विस चुनाव में भी ‘जिम कॉर्बेट’ के घर ‘छोटी हल्द्वानी’ की इस धरती में कमोबेश पिछली बार की तरह ही भाजपा के पूर्व काबीना मंत्री बंशीधर भगत और कांग्रेस के प्रकाश जोशी जैसे ‘टाइगरों’ की साख फंसी हुई है।

कालाढुंगी सीट पर एक और दिलचस्प समीकरण यह है कि यहां एक लाख ४५ हजार ८२२ मतदाताओं में ३८,५०४ मतदाता २० से २९ की आयु के, करीब इतने ही यानी ३८५९० मतदाता ३० से ३९ के, २७,९०३ मतदाता ४० से ४९ के और १९३६५ मतदाता ५० से ५९ के हैं, यानी जीत की चाबी ६० फीसद से अधिक युवाओं के हाथ में है। इन्ही आंकड़ों के आधार पर कांग्रेस के युवा प्रत्याशी प्रकाश जोशी जोश में हैं। बसपा ने भी युवाओं के भरोसे सर्वाधिक युवा वरुण प्रताप सिंह भाकुनी को मैदान में आगे किया है। वहीं पिछली बार बहुकोणीय मुकाबले में 2370 मतों से जीत हासिल कर पाये भाजपा के बंशीधर भगत 2014 के लोकसभा चुनाव के आंकड़ों से उत्साहित हैं। जब इस सीट से भाजपा प्रत्याशी भगत सिंह कोश्यारी ने कांग्रेस के केसी सिंह बाबा पर 42,473 वोटों की बढ़त हासिल की थी। जबकि इससे पूर्व वर्ष 2009 के लोस चुनाव में यह अंतर भाजपा प्रत्याशी बची सिंह रावत के पक्ष में बाबा के खिलाफ ही केवल 7,043 वोटों का था। इस सीट के साथ अजीब दुर्योग है कि नाम कालाढुंगी होने के बावजूद इस सीट को हल्द्वानी महानगर के अंतर्गत यानी भाखड़ा नदी के दूसरी ओर रहने वाले 60 फीसद मतदाता निर्णायक स्थिति में हैं। इसलिये भाखड़ा के इस ओर के कालाढुंगीवासी अपने वोटों की ताकत दिखाने की जुगत में रहते हैं। पिछले चुनाव में भाखड़ा पार से ही भाजपा और दो मजबूत निर्दलीय प्रत्याशी महेश शर्मा व भाई जी के खड़े होने की स्थितियों में भाखड़ा पार के प्रत्याशियों ने कांग्रेस के जोशी और बसपा के दीवान पर अधिक भरोसा जताया।  फलस्वरूप जोशी कुल मिलाकर १४९ बूथों में से वह ५५ बूथों पर ही बढ़त बढ़ा पाने के बावजूद भाखड़ा वार के शुरुआती ४३ में से ३३ और ६७ में से ४२ बूथों पर आगे रहे थे। २०१२ में यहां भाजपा के बंशीधर भगत को २२७४४, कांग्रेस के प्रकाश जोशी को २०३७४, निर्दलीय महेश शर्मा को ११८०९, बसपा के दीवान सिंह ९८३६, निर्दलीय भूपेंद्र सिंह को ८९२५, उक्रांद के डा. नारायण सिंह जंतवाल २८४३ के अलावा अन्य पांच उम्मीदवारों को भी कुल पड़े ७८७२९ वोटों में से २३९८ वोट मिले थे। अब बदली परिस्थितियों में पिछली बार तीसरे स्थान पर रहे कांग्रेस के बागी महेश शर्मा इस बार कालाढुंगी विकास मंच बनाकर नये-नये भाजपाई हुये यशपाल आर्य के करीबी हैं तो चौथे स्थान पर रहे बसपा के दीवान भाजपा में और पांचवे स्थान पर रहे भाई जी कांग्रेस में आ चुके हैं, जबकि डा. जंतवाल की जगह उक्रांद से दूसरे डा. सुरेश डालाकोटी मैदान में हैं।

कालाढुंगी में विभिन्न आयु वर्ग के मतदाता : 20 से 29-38,504,  30 से 39 – 38,590,  40 से 49 – 27,903,  50 से 59 – 19,365, सभी वर्ग -1,45,822  

कालाढुंगी सीट पर मतदाता: पुरुष ७५३०४, महिलाएं ७०५१६, किन्नर २ कुल १४५८२२
कालाढुंगी सीट से प्रत्याशी : भाजपा बंशीधर भगत, कांग्रेस प्रकाश जोशी, बसपा वरुण प्रताप सिंह भाकुनी, उक्रांद डा. सुरेश डालाकोटी, निर्दलीय महेश शर्मा,
कालाढुंगी सीट पर पिछली बार पड़े वोट : भाजपा बंशीधर भगत २२७४४, कांग्रेस प्रकाश जोशी २०३७४, निर्दलीय महेश शर्मा ११८०९, बसपा दीवान सिंह ९८३६, निर्दलीय भूपेंद्र सिंह ८९२५, उक्रांद डा. नारायण सिंह जंतवाल-२८४३

26 सालों से जीत को तरस रही कांग्रेस
राज्य बनने से पूर्व कालाढुंगी सीट नैनीताल सीट का हिस्सा रही है। बीते 26 वर्षो से इस सीट पर कांग्रेस नहीं जीत पाई है। आखिरी बार वर्ष 1986 में चुनाव जीते किशन सिंह तड़ागी इस सीट से आखिरी कांग्रेसी विधायक रहे। वर्ष 2002 में डा. नारायण सिंह जंतवाल उक्रांद के टिकट पर यहां से जीते। वर्ष 2007 के विस चुनावों में भाजपा के खड़क सिंह बोहरा ने पुन: यह सीट हासिल कर भाजपा का एक बार पुन: नैनीताल से परचम फहराया और वर्ष 2012 में हल्द्वानी से लौटे बंशीधर भगत ने आकर यहां जीत दर्ज की।

जागेश्वर में इस बार आसान नहीं कुंजवाल का ‘चौका’

नवीन जोशी। राज्य बनने के बाद से लगातार कांग्रेस नेता व विस अध्यक्ष रहे गोविंद सिंह कुंजवाल यहां से जीत की ‘‘हैट्रिक’ लगा चुके हैं। चौथी बार इस सीट से चुनाव लड़ रहे कुंजवाल की राह आसान नहीं है। उन्हें भाजपा से चुनौती मिल रही है। कुंजवाल ने 2002 के विस चुनाव में जहां 2322 मतों से जीत दर्ज की वहीं 2007 में जीत का अंतर 1127 पर सिमट गया। 2007 में जहां उन्होंने 18,154 मत प्राप्त किये थे, वहीं 2012 में जिले की भिकियासैंण सीट घटने के बाद करीब डेढ़ गुना हुई मतदाता संख्या के बावजूद उन्हें 18,175 मत मिले जो गत विस चुनाव में मिले वोटों से केवल 21 वोट ही अधिक थे। गौरतलब है कि वर्ष 2012 के विस चुनाव में भाजपा ने बची सिंह को टिकट देकर एक तरह से कुंजवाल को वॉकओवर दे दिया था। उक्रांद प्रत्याशी सुभाष पांडे ने 9,270 और बसपा प्रत्याशी तारा दत्त पांडे ने 2,830 मत प्राप्त कर कुंजवाल को मजबूत चुनौती पेश की थी। सुभाष पांडे ने 2002 में 5447 वोट प्राप्त किये थे। इस बार उन्होंने राजनीतिक माहौल भांपकर भाजपा का दामन थाम लिया। भाजपा ने अपने अन्य दावेदारों पूर्व जिलाध्यक्ष रमेश बहुगुणा व कुमाऊं विवि के नैनीताल परिसर से छात्रसंघ अध्यक्ष रहे नरेंद्र बिष्ट आदि पर तरजीह देते हुए उन्हें टिकट थमा दिया है।

कपकोट विस सीट : कोश्यारी की विरासत में पहली बार राजनीतिक ‘त्रिकोण’

  • लोक देवताओं की है देवस्थली
  • एक से दो दिन पैदल चलना ही नियति

कपकोट विधानसभा की पहचान पोथिंग के भगवती माता मंदिर, शिखर के मूल नारायण और सनगाड़ के नौलिंग आदि लोक देवताओं के देवस्थलों के लिये यानी सही अर्थो में देवभूमि के रूप में होती है। आज भी यहां कुछ बुजुर्ग मिल जायेंगे, जिन्होंने यहां के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में देव-दानू कहे जाने वाले सर्वज्ञ व जीवित देवी-देवताओं को देखा होगा। वहीं कपकोट विश्व प्रसिद्ध पिंडारी ग्लेशियर की धरती भी है, जहां दुनिया भर के सैलानी वर्ष भर आते रहते हैं।विकास के लिहाज से आज भी यह सीट प्रदेश में कमोबेश सबसे पीछे और 21वीं सदी में भी 19वीं सदी में ही ठहर गयी सी लगती है। कर्मी, द्वाली जैसे मल्ला दानपुर के दूरस्थ क्षेत्रों से एक से दो दिन लगातार पैदल चलकर डोलियों में बीमारों, गर्भवती महिलाओं को लेकर ग्रामीण तहसील मुख्यालय कपकोट आते हैं, पर उपचार नहीं मिल पाता। जहां कच्ची सड़कें बनी भी हैं, उन पर वर्ष के कुछ माह ही सैकड़ों फीट गहराई में बहती सरयू नदी के ऊपर जान हथेली में लेकर चलने वाली जीपें आवागमन का एकमात्र साधन होती हैं। देश की अंतरिम सरकार के मुख्यमंत्री रहे व नैनीताल-ऊधमसिंहनगर के मौजूदा सांसद भगत सिंह कोश्यारी की यह सीट राजनीतिक विरासत मानी जाती है। इस बार यहां बदले हालात में विस चुनाव में भाजपा के बलवंत सिंह भौर्याल और कांग्रेस के ललित फस्र्वाण के बीच मुकाबले में बसपा प्रत्याशी भूपेश उपाध्याय ने फच्चर (प्यूला) फंसा दिया है। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद दूसरे मुख्यमंत्री बने भगत सिंह कोश्यारी ने अपना कर्मक्षेत्र पिथौरागढ़ होने के बावजूद अपनी जन्मभूमि कपकोट से नये राज्य में अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की। अंतरिम सरकार के तत्कालीन सीएम होने की वजह से वर्ष 2002 में कोश्यारी कांग्रेस के चामू सिंह गस्याल से करीब 8500 वोटों के अंतर से जीते। वर्ष 2007 में कांग्रेस ने प्रत्याशी बदला और प्रताप सिंह को टिकट दिया तो यहां जम चुके कोश्यारी ने जीत का अंतर 9500 तक बढ़ा लिया। इन दोनों चुनावों में यहां करीब 30 हजार मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। वर्ष 2012 में बागेश्वर जिले की कांडा सीट का बड़ा हिस्सा भी नये परिसीमन में कपकोट और बागेश्वर में समा गया, वहीं कोश्यारी ने अपनी राजनीतिक विरासत कांडा सीट से विधायक तथा काबीना मंत्री रहे बलवंत सिंह भौर्याल को सौंप दी। कांग्रेस ने एक बार फिर प्रत्याशी बदलते हुए बागेश्वर विस के निवासी ललित फस्र्वाण पर दांव लगाया। इस चुनाव में कांग्रेस का दांव सही साबित हुआ और भौर्याल कुछ हद तक रही ‘‘एंटी इंकमबेंसी’ यानी सत्ता विरोधी लहर में फंसकर 1400 वोटों से चुनाव हार गये। ऐसे हालात में मौजूदा चुनाव में भाजपा-कांग्रेस दोनों ने ही अपने पूर्व प्रत्याशियों यानी भौर्याल और फस्र्वाण पर ही भरोसा जताया है। वहीं करीब एक वर्ष पूर्व ही भाजपा से कांग्रेस में जाकर वापस भाजपा में लौटे भूपेश उपाध्याय टिकट न मिलने पर बसपा के टिकट से चुनाव मैदान में उतर गये हैं। भूपेश इन दोनों के लिये चुनौती खड़ी कर सकते हैं। इस तरह यहां पहली बार बन रहे त्रिकोण पर ही कपकोट के भविष्य की राजनीतिक राह तय होगी।

कपकोट सीट के मतदाता : पुरुष 47,264  महिला 46,354   कुल वोटर 93,618 इनमें होगी चुनावी जंग :  ललित फर्स्वाण कांग्रेस, बलवंत भौर्याल भाजपा, भूपेशउपाध्याय बसपा गत चुनाव में कपकोट में पड़े वोट : ललित फर्स्वाण कांग्रेस 22,335  बलवंत भौर्याल भाजपा 20,966 कर्म सिंह दानू निर्दलीय 1,934

हमेशा विपक्ष में बैठता रहा है रानीखेत का विधायक

-कांटे की टक्कर के लिये विख्यात रानीखेत में भाजपा-कांग्रेस दोनों की प्रतिष्ठा दांव पर
नवीन जोशी। रानीखेत सीट की पहचान उत्तराखंड राज्य बनने के बाद से ऐसी सीट की बन गयी है, जहां हमेशा त्रिकोणीय संघर्ष होता है, तथा प्रत्याशियों में कांटे का मुकाबले के साथ विजेता व उपविजेता में जीत का अंतर बहुत कम होता है। ऐसा पिछले दो चुनावों में हुआ है। २००७ के चुनाव में जहां कांग्रेस प्रत्याशी करन माहरा ने भाजपा के अजय भट्ट को २०४ मतों के मामूली अंतर से हराया, वहीं पिछले चुनावों में भट्ट ने करन को केवल ७८ मतों के मामूली अंतर से हराकर हिसाब चुकता कर दिया। वहीं प्रदेश के मुख्यमंत्री का गृहक्षेत्र और कांग्रेस प्रत्याशी के उनके सगे साले होने तथा भाजपा प्रत्याशी के पार्टी अध्यक्ष तथा नेता प्रतिपक्ष होने से भी रानीखेत इस बार प्रदेश की हॉट सीटों में शुमार है तथा भाजपा-कांग्रेस दोनों की ही प्रतिष्ठा इस सीट पर दांव पर लगी हुई है। यूपी के दौर से अपने विधायक को सत्तापक्ष की बेंचों पर बैठाने वाली प्रदेश की गंगोत्री सीट के उलट रानीखेत सीट के साथ एक दुर्योग यह भी जुड़ा है कि यहां का विधायक हमेशा विपक्ष में रहा है।
रानीखेत के राजनीतिक इतिहास की बात करें तो छावनी परिषद के अंतर्गत आने वाले मुख्यालय और शेष ग्रामीण क्षेत्र में बंटी इस सीट पर राज्य बनने के बाद २००२ के पहले विधानसभा चुनाव में अंतरिम सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहे अजय भट्ट (१०,१९९) पूर्व मंत्री गोविंद माहरा के पुत्र कांग्रेस प्रत्याशी पूरन सिंह माहरा (७,८९७) से करीब तीन हजार वोटों से जीते, जबकि राज्य में एनडी तिवारी के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार बनी। वहीं निर्दलीय नरेंद्र सिंह ३९९० मतों के साथ तीसरे और निर्दलीय रमेश चिलवाल चौथे स्थान पर रहे। ऐसी स्थितियों में कांग्रेस ने २००७ के चुनाव में पूर्व प्रत्याशी के छोटे भाई करन माहरा पर दांव खेला, जो सही बैठा। करन (१३,५०३) जीते तो, अलबत्ता अजय भट्ट (१३,२९८) पर जीत का अंतर केवल २०४ मतों का ही रहा। इस बार राज्य में भाजपा की सरकार बनी। इस चुनाव में राज्य के प्रमुख राज्य आंदोलनकारी पूरन सिंह डंगवाल बसपा के टिकट पर ६७३६ मतों के साथ तीसरे स्थान पर ले आये थे। इस चुनाव में रानीखेत वासियों ने प्रत्यक्ष तौर पर हाथी को पहाड़ पर चढ़ते हुए भी देखा। २०१२ में भी ये तीनों प्रत्याशी ही इस सीट पर त्रिकोणीय संघर्ष की परंपरा जारी रखे रहे। जिले और इस सीट के अंतर्गत आने वाली भिकियासेंण सीट के नये परिसीमन में समाप्त होने के बाद बढ़ी हुई मतदाता संख्या के साथ हुए इस चुनाव में अजय भट्ट को १४,०८९ और करन माहरा को १४,०११ मत मिले, तथा दोनों के बीच जीत का अंतर प्रदेश में सबसे कम, केवल ७८ मतों का रहा। इस बार राज्य में कांग्रेस की सरकार बनी। बसपा प्रत्याशी डंगवाल ने भी ९,३४६ मत प्राप्त कर अपनी ताकत दिखाई और वे तीसरे स्थान पर रहे। इधर इस चुनाव में हालात कुछ हद तक बदल गये हैं, बावजूद मुकाबला त्रिकोणीय ही अधिक नजर आ रहा है। पूरन डंगवाल का बीते दिनों स्वर्गवास हो चुका है, और उनके दोनों पुत्र भाजपा का दामन थाम चुके हैं, और लगातार चौथा चुनाव लड़ रहे भाजपा प्रत्याशी भट्ट के समर्थन में हैं। कांग्रेस ने भी लगातार तीसरी बार करन माहरा पर विश्वास जताया है। वहीं २००७ में सल्ट सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में ६,११५ वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे भाजपा नेता प्रमोद कुमार नैनवाल इस बार इस सीट पर लंबी तैयारियों के बाद बागी हो गये हैं। जबकि डंगवाल को कमोबेश अपनी मेहनत से मिले वोटों व सम्मान से बसपा का अंश थामने कृपाल राम तथा उक्रांद से प्रताप सिंह शाही भी चुनाव मैदान में उतर आये हैं।
गत चुनाव में रानीखेत में पड़े वोट : अजय भट्ट भाजपा १४,०८९, करन माहरा कांग्रेस १४,०११, पूरन सिंह डंगवाल बसपा ९,३४६
रानीखेत सीट के मतदाता : पुरुष ४०,१७६   महिला ३८,३०५   कुल मतदाता ८४,४८१
इनमें होगी चुनावी जंग : अजय भट्ट भाजपा, करन माहरा कांग्रेस, प्रमोद नैनवाल निर्दलीय

भाजपा व कांग्रेस दोनों दलों को तराजू में तौलेगा सल्ट

अल्मोड़ा जनपद की गढ़वाल मंडल से लगी और कुमाऊं-गढ़वाल के मिले-जुले व कमोबेश पूरी तरह ग्रामीण परिवेश के मतदाताओं वाली सल्ट सीट पर भाजपा व कांग्रेस प्रत्याशियों के बीच ही जंग होती रही है। पहले दो विस चुनावों में इस सीट का प्रतिनिधित्व करने वाले मुख्यमंत्री के सलाहकार रणजीत रावत तीसरा चुनाव हारने के बाद इस बार स्वयं रामनगर को पलायन कर गए हैं। इस इस सीट से कांग्रेस से नयी उम्मीदवार गंगा पंचोली मैदान में उतरी हैं। भिकियासैंण सीट के परिसीमन में अस्तित्वविहीन हो जाने के बाद इस सीट पर आये भाजपा नेता सुरेंद्र सिंह जीना ने लगातार दूसरी जीत दर्ज की, और अब वे जीत की हैट्रिक लगाने की कोशिश में हैं। सल्ट विस सीट पर वर्ष 2002 के चुनाव में कांग्रेस से रणजीत रावत और भाजपा से ब्लॉक प्रमुख व बाद में सहकारी बैंक के अध्यक्ष रहे मोहन सिंह आमने सामने थे। रणजीत (11,982) ने यह चुनाव मोहन सिंह (8,436) से करीब ढाई हजार वोटों के अंतर से जीता। वर्ष 2007 में भाजपा ने प्रत्याशी बदलकर इस बार रानीखेत से ब्लॉक प्रमुख पत्नी हिमानी नैनवाल सहित निर्दलीय नामांकन करा चुके प्रमोद नैनवाल पर भरोसा जताया, जबकि भाजपा से दावेदार रहे दिनेश सिंह ने भी खम ठोंक दिया। वहीं कांग्रेस ने रणजीत को ही दुबारा मैदान में उतारा। भाजपा की अंदरूनी जंग में रणजीत (15,190) पुन: विजयी रहे, जबकि जबकि निर्दलीय प्रत्याशी दिनेश (8,075) दूसरे और भाजपा के नैनवाल (6,115) तीसरे स्थान पर रहे। 2012 में नये परिसीमन में भिकियासैंण सीट समाप्त हो गयी। वहां से भाजपा विधायक सुरेंद्र सिंह जीना सल्ट आ गये और उन्होंने रणजीत को साढ़े पांच हजार वोटों के अंतर से हरा दिया। इस चुनाव में जीना को 23,956 और रणजीत को 18,512 मत मिले। अन्य निर्दलीय निष्प्रभावी रहे। इस बार के चुनाव में जीना लगातार तीसरी जीत की कोशिश करते हुए मैदान में हैं, वहीं कांग्रेस से गंगा पंचोली मुकाबले में उतरी हैं। वहीं इस सीट पर उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी (उपपा) जिला पंचायत सदस्य नारायण सिंह रावत के जरिये अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश में है। 

इनमें होगा चुनावी मुकाबला : सुरेंद्र सिंह जीना भाजपा, गंगा पंचोली कांग्रेस, नारायण रावत उपपा

लकी सीट सोमेश्वर: दोनों पूर्व विधायक वर्तमान में हैं सांसद

देश के सर्वाधिक साक्षरता दर वाले अल्मोड़ा जनपद की सोमेश्वर विधानसभा जहां प्रदेश की कमोबेश पूरी तरह ग्रामीण पृष्ठभूमि की सीटों में शुमार है, वहीं इसकी पहचान अपने प्रतिनिधियों को ऊंचा राजनीतिक मुकाम दिलाने वाली सीट के रूप में भी पहचानी जाने लगी है। राज्य बनने के बाद इस अनुसूचित जाति के लिये सुरक्षित विधानसभा सीट के पहले दो निर्वाचित प्रतिनिधि-कांग्रेस के प्रदीप टम्टा और भाजपा के अजय टम्टा इस सीट से विधायक बनने के बाद वर्तमान में लोकसभा व राज्यसभा के सांसद हैं। इस बार यहां से भाजपा से रेखा आर्य, कांग्रेस से राज्य अनुसूचित जाति आयोग के उपाध्यक्ष राजेंद्र बाराकोटी और बसपा से हिमांशु कोहली चुनाव मैदान में हैं।उत्तराखंड राज्य बनने के बाद सोमेश्वर विधानसभा में विधानसभा के चार चुनाव हो चुके हैं। पहले वर्ष 2002 के चुनाव में कांग्रेस ने एक दौर के उत्तराखंड क्रांति दल के नेता रहे प्रदीप टम्टा को इस सीट से आगे किया तो उन्होंने भाजपा प्रत्याशी राजेश कुमार पर 883 मतों के अंतर से जीत दर्ज की। इस परिणाम से इतर इस चुनाव की खोज अजय टम्टा नाम के निर्दलीय प्रत्याशी रहे, जिन्होंने इस चुनाव में तो केवल 1286 मत ही प्राप्त किये थे। किंतु वर्ष 2007 के चुनाव में जब भाजपा ने उन्हें अपना प्रत्याशी बनाया तो उन्होंने कांग्रेस के सिटिंग विधायक प्रदीप टम्टा को 1523 मतों से हराकर भाजपा की उम्मीदों को परवान चढ़ा दिया। लिहाजा भाजपा ने उन्हें वर्ष 2012 में भी नि:संकोच टिकट थमा दिया। अजय इस बार भी उम्मीदों पर खरे उतरे और कांग्रेसी गढ़ रहे सोमेश्वर में कांग्रेसी प्रत्याशी राजेंद्र बाराकोटी को तीसरे स्थान पर धकेल कर भगवा फहरा दिया। अलबत्ता इस चुनाव में सर्वाधिक र्चचा निर्दलीय प्रत्याशी रेखा आर्य को मिलीं, जो अचानक किसी राजनीतिक धूमकेतु की तरह प्रकट होकर 14,597 मत अपनी झोली में बटोर ले गयीं और अजय टम्टा से 2691 वोटों से पीछे रहते हुए दूसरे स्थान पर रहीं। इस बीच अजय को लगातार दूसरी जीत का इनाम 2014 के लोकसभा चुनाव में अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ सुरक्षित सीट से भाजपा के प्रत्याशी के रूप में मिला। उन्होंने एक बार फिर इसी सीट के अपने प्रतिद्वंद्वी रहे कांग्रेस के प्रदीप टम्टा को हराकर दिल्ली का टिकट कटा लिया। इससे सोमेश्वर सीट पर उपचुनाव होना तय हुआ। रेखा भाजपा के करीब थीं, किंतु भाजपा उनके पति गिरधारी लाल साहू की छवि को देखते हुए उन्हें टिकट देने को तैयार नहीं हुई तो उन्हें कांग्रेस ने लपक लिया। इस उपचुनाव में रेखा ने 23,241 मत प्राप्त किये और भाजपा के मोहन राम आर्य को 10 हजार मतों के बड़े अंतर से हरा दिया। इधर राज्य में 18 मार्च के बाद बदले राजनीतिक हालात में रेखा अपनी विधायकी छोड़ कांग्रेस का दामन झटक भाजपा के पाले में आ गयीं तो भाजपा में भी उन्हें इस बार टिकट देने में कोई हिचक नहीं रही। कांग्रेस ने राज्य अनुसूचित जाति आयोग के उपाध्यक्ष राजेंद्र बाराकोटी पर दांव खेला है।  सोमेश्वर सीट के मतदाता : पुरुष 43,140    महिला 41,343   कुल वोटर 84,483 इनमें होगा चुनावी संग्राम : रेखा आर्य भाजपा, राजेंद्र बाराकोटी कांग्रेस, हिमांशु कोहली बसपा गत चुनाव में सोमश्वर में पड़े वोट : रेखा आर्य कांग्रेस 23,241    मोहन राम आर्य भाजपा 13,196

बागेश्वर में भाजपा-कांग्रेस दोनों बिन सेनापतियों के लड़ेंगे युद्ध !

भाजपा और कांग्रेस में राजनीतिक परिवर्तन से रोचक हुई स्थिति दल-बदल ने बदली तस्वीर चुनावी दंगल के पहलवान : चंदन राम दास भाजपा, बाल कृष्ण कांग्रेस, बसंत कुमार बसपा नवीन जोशी, नैनीताल। राज्य बनने के बाद से बागेश्वर विधानसभा सीट पहले विस चुनाव में कांग्रेस और बाद के दोनों विस चुनावों में भाजपा के कब्जे में रही है। हालांकि बसपा का वोट प्रतिशत चुनाव दर चुनाव बढ़ता रहा है। इस विस क्षेत्र में भाजपा और कांग्रेस में हुए राजनीतिक परिवर्तन भी दिलचस्प स्थिति पैदा किये हुए हैं। यहां दोनों दलों के जिलाध्यक्ष सहित जिला कार्यकारिणी के कई सदस्य इस्तीफा देकर एक तरह से अपने मूल दलों को ‘‘सेनापति विहीन’ कर चुकी है। वहीं कांग्रेस की जिला इकाई भाजपा में आ चुकी है। ऐसे में यहां मतदान होने तक और भी कुछ रंग बदलने के आसार दिख रहे हैं। राज्य के पहले वर्ष 2002 के विस चुनाव में इस अनुसूचित जाति के प्रत्याशियों के लिये सुरक्षित सीट पर कांग्रेस के रामप्रसाद टम्टा को 12,419 वोट, भाजपा के प्रत्याशी नारायण राम दास को 10,242 वोट और बसपा के प्रत्याशी लछम राम को 4611 वोट मिले। टम्टा ने नारायण को करीब 2200 वोटों के अंतर से हराया। वर्ष 2007 के चुनावों में टम्टा को 11,724 वोट मिले और वह भाजपा प्रत्याशी चंदन राम दास (17,614) से करीब छह हजार वोटों के अंतर से हार गये। वर्ष 2012 में नये परिसीमन में कांडा विधानसभा का एक हिस्सा जुड़ जाने के बाद बागेश्वर विस सीट पर बसपा के बहादुर राम धौनी को 9,877 वोट मिले। भाजपा के चंदन राम दास लगातार दूसरी बार 23,396 मत लाकर जीते, जबकि कांग्रेस के राम प्रसाद टम्टा को 21,485 वोट लाकर भी हार झेलनी पड़ी। इस बार के विस चुनाव में जहां भाजपा ने दास को ‘‘हैट्रिक’ लगाने का मौका देते हुए मैदान में उतारा, वहीं कांग्रेस लगातार दो हार के बाद प्रत्याशी बदलने को मजबूर हो गयी। कांग्रेस में टिकट के दावेदारों पूर्व प्रत्याशी टम्टा और पूर्व मंत्री गोपाल राम दास के पुत्र तथा मुख्यमंत्री हरीश रावत के करीबी रंजीत दास की जंग में एक नये प्रत्याशी बालकृष्ण को दे दिया। जिससे कांग्रेस में भितरघात की आशंका बन गई है। वहीं बसपा प्रत्याशी बसंत कुमार ने भी अपने नामांकन कर मुश्किलें बढ़ा दी हैं।

अल्मोड़ा : भाजपा-कांग्रेस में ही शक्ति परीक्षण

चंद राजाओं की राजधानी और उत्तराखंड की सांस्कृतिक राजधानी कही जाने वाली अल्मोड़ा विधानसभा सीट पर जहां कांग्रेस के मनोज तिवारी वर्ष 2007 और 2012 में जीत के साथ हैट्रिक की उम्मीद से चौथी बार चुनाव मैदान में हैं, वहीं भाजपा के प्रत्याशी रघुनाथ सिंह चौहान भी लगातार पांचवीं बार चुनाव में उनके सामने डटे हैं।सीएम हरीश रावत के गृह जनपद की इस सीट पर दशकों से उनका दखल रहा है। वर्ष 2002 के पहले विस चुनाव में हार जाने के बावजूद तिवारी ने अगले दो विस चुनाव जीते। वर्ष 2007 में उन्होंने भाजपा के कैलाश शर्मा को करीब तीन हजार वोटों से हराया तो 2012 में भाजपा के रघुनाथ चौहान से उनकी जीत का अंतर केवल 1200 वोटों का रह गया।उधर भाजपा प्रत्याशी रघुनाथ सिंह चौहान ने राज्य बनने से पूर्व वर्ष 1997 के चुनाव में संयुक्त अल्मोड़ा सीट से चुनाव जीतने के बाद से वर्ष 2002 व 2007 में जागेश्वर सीट से दो बार हार का स्वाद चखा। इसके साथ ही वर्ष 2012 में अल्मोड़ा से चुनाव हारने के बावजूद वह फिर भाजपा का टिकट लेकर मैदान में हैं। उन्हें वर्ष 2002 में कांग्रेस प्रत्याशी मनोज तिवारी पर जीत दर्ज करने वाले कैलाश शर्मा पर तरजीह मिली है। इसके बावजूद पिछली बार कुछ ऐसी ही स्थितियों में निर्दलीय लड़े और 6582 वोट लेकर रघुनाथ चौहान की हार में बड़ी भूमिका निभाने वाले कैलाश शुरू में रूठने के बाद मान गये हैं। ऐसे में चौहान जहां वोटों का बिखराव न होने से पिछली बार के मुकाबले लाभ में दिखते हैं, वहीं कांग्रेस प्रत्याशी मनोज के पक्ष में भी यह बात जाती है कि पिछली बार उनके वोटों में सेंध लगाने वाले बसपा प्रत्याशी शेखर लखचौरा इस बार मैदान में नहीं हैं। इस प्रकार मुकाबला सीधे तौर पर कांग्रेस और भाजपा प्रत्याशियों के बीच ही होता दिख रहा है। गत चुनाव में अल्मोड़ा में पड़े वोट: पुरुष 45,149 महिला 42,526कुल वोटर 87,675 अल्मोड़ा सीट के मतदाता : मनोज तिवारी कांग्रेस 16,211   रघुनाथ चौहान भाजपा 15,030   कैलाश शर्मा निर्दलीय 6,582   शेखर लखचौरा बसपा 6,781 इनमें होगी चुनावी जंग : मनोज तिवारी कांग्रेस, रघुनाथ चौहान भाजपा

विधानसभा से जिला पंचायत तक जा सकता है यशपाल के पाला बदल का असर

-कांग्रेस के अनेक बड़े पदाधिकारी भी जा सकते हैं भाजपा में नवीन जोशी, नैनीताल। यशपाल आर्य सोमवार को अपने पुत्र संजीव आर्य तथा बाजपुर विधानसभा से जुड़े कुछ कांग्रेस पदाधिकारियों के साथ भाजपा में शामिल हुए हैं, जबकि आगे कांग्रेस के जिला के शीर्ष से लेकर विधानसभा क्षेत्र से जुड़े अनेक बड़े नेता शीघ्र ही यशपाल अथवा उनके पुत्र को नैनीताल से टिकट की घोषणा होने के बाद भाजपा का दामन थाम सकते हैं। इधर कांग्रेस की युवा इकाई- यूथ कांग्रेस से भी बड़ी संख्या में युवाओं के जल्द भाजपा में शामिल होने की आशंका व्यक्त की जा रही है।

पुत्र से अधिक मजबूत रहते यशपाल नैनीताल। यशपाल और पुत्र संजीव आर्य के भाजपा में शामिल होने के बाद सोमवार को मुख्यालय में वे ही चर्चा के प्रमुख केंद्र में रहे। इस बात पर ही गुणा-भाग होता रहा कि पिता-पुत्र में से किसके चुनाव लड़ने पर क्या परिणाम होता। अलबत्ता भाजपा, कांग्रेस सहित अन्य राजनीतिक दलों से जुड़े तथा गैर राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों में इस बात पर एका जरूर दिखा कि नैनीताल सीट से पुत्र संजीव आर्य को नहीं वरन यशपाल आर्य को टिकट मिलना चाहिए था। यशपाल की नैनीताल विस में गहरी पैठ है, किंतु संजीव का सामान्यतया कोई जुड़ाव नहीं रहा है। ऐसे में उनके लिए चुनाव जीतने की डगर कठिन भी हो सकती है।

जिला पंचायत में अनेक सदस्य हैं यशपाल के करीबी कांग्रेस में 41 वर्ष तक रहे वरिष्ठ नेता यशपाल आर्य ने सोमवार को भाजपा का दामन थाम लिया। इसकी आशंका ‘राष्ट्रीय सहारा’ ने पहले ही जता दी थी। सोमवार को ही यहां तक साफ कर दिया था कि यशपाल के कांग्रेस में रहते भी नैनीताल विधानसभा में मुख्य मुकाबला मुख्यमंत्री हरीश रावत और उनके ही सिपहसालार यशपाल आर्य के बीच होगा। अब जबकि यशपाल कांग्रेस से इस्तीफा दे चुके हैं, यह तो साफ हो ही चुका है कि रावत और आर्य आमने-सामने होंगे। वहीं आशंका यहां तक व्यक्त की जा रही है कि यशपाल के भाजपा में आने का असर विधानसभा चुनावों से इतर मौजूदा जिला पंचायत पर भी पड़ सकता है, जहां वर्तमान में कांग्रेस की जिला पंचायत अध्यक्ष सुमित्रा प्रसाद और पुष्कर नयाल उपाध्यक्ष हैं। यशपाल जनपद की राजनीति में ऊपर से लेकर नीचे तक खासा दखल रखते हैं। जिला पंचायत में भी कई यशपाल समर्थक सदस्य हैं। अध्यक्ष पद के चुनाव में यशपाल समर्थक सदस्यों की प्रबल दावेदारी के बावजूद तब काबीना मंत्री डा. इंदिरा हृदयेश ने भाजपा से तोड़कर सुमित्रा प्रसाद को अध्यक्ष बना दिया था।यह भी बेहद दिलचस्प तय है कि नैनीताल जिला पंचायत में न केवल अधिसंख्य सदस्य भाजपा के थे, वरन भाजपा के सदस्य ही कांग्रेस में शामिल होकर अध्यक्ष व उपाध्यक्ष बनाये गये। जबकि अध्यक्ष पद के लिये यशपाल के करीबी प्रताप गोरखा प्रबल दावेदार थे। प्रताप 2012 के विस चुनावों में भी कांग्रेस की ओर से नामांकन करा चुके थे, लेकिन आखिरी क्षणों में उनसे नाम वापस लिवा लिया गया था। इधर भी उन्होंने यशपाल के पक्ष में माहौल बनाने के लिये स्वयं की दावेदारी जता दी थी। वहीं जिपं में और भी कई यशपाल समर्थक सदस्य मौजूद हैं। ऐसे में एक जिपं सदस्य ने ‘‘राष्ट्रीय सहारा’ से कहा कि यशपाल के भाजपा का दामन थामने का असर जिपं में सत्ता संतुलन बदलने तक जा सकता है।  

पहले से ही तय था मुकाबला हरीश व यशपाल के बीच ही !

(यह पोस्ट यशपाल के भाजपा में आने से पूर्व लिखी गयी थी)

नवीन जोशी, नैनीताल। नैनीताल सुरक्षित सीट पर कांग्रेस से वर्तमान विधायक एवं महिला कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष सरिता आर्य को टिकट मिलना बकौल उनके, कमोबेश तय माना जा रहा है। यदि ऐसा होता है तो यहां मुकाबला सरिता और अन्य पार्टियों के दावेदारों में कम, वरन मुख्यमंत्री हरीश रावत और उनके ही एक सिपहसालार यानी काबीना मंत्री यशपाल आर्य के बीच हो सकता है। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनावों में नामांकन प्रक्रिया शुरू होने के कुछ ही दिन पहले, कमोबेश वर्तमान जैसे ही हालात में जब तय नहीं था कि कांग्रेस से किसे टिकट मिलेगा और यशपाल आर्य को टिकट मिलने के भी कयास लगाये जा रहे थे, अचानक आखिरी क्षणों में सरिता आर्य ने (परदे के पीछे रहे हरीश रावत के निकटस्थों ने) एक पत्रकार वार्ता बुलाई। जिसमें विस चुनाव के लिये बात करते हुए उन्होंने कहा था-‘‘कुछ बाहरी लोग कह रहे हैं, नैनीताल में पार्टी के पास प्रत्याशी ही नहीं है। (इसलिये वह यहां आना चाह रहे हैं) जबकि वह प्रत्याशी है और चुनाव लड़ने के लिये तैयार है।’ उनका इशारा यशपाल आर्य की ओर था। उस पत्रकार वार्ता के करीब दो दिन बाद ही सरिता आर्य का टिकट फाइनल हो गया था और यशपाल आर्य को परिसीमन में समाप्त और नैनीताल सीट के ही बेतालघाट क्षेत्र में रही मुक्तेश्वर को छोड़कर बाजपुर जाना पड़ा। उनके साथ ही यशपाल के करीबी प्रताप गोरखा ने भी नामांकन कराया था, किंतु सरिता का नामांकन सही पाये जाने के बाद उन्होंने नाम वापस ले लिया था। बाद में प्रताप जिला पंचायत अध्यक्ष पद के लिये भी दावेदार थे, किंतु आखिरी क्षणों में काबीना मंत्री डा. इंदिरा हृदयेश ने भाजपा से तोड़कर सुमित्रा प्रसाद को अध्यक्ष बना प्रताप के अरमानों को कुचल दिया। प्रताप इस बार भी दावेदारी कर चुके हैं।बहरहाल, सरिता चुनाव लड़ीं और भाजपा के हेम चंद्र आर्य को हराकर विधायक भी बन गयीं। वह पहले सीएम बनने के लिये पहले प्रयासरत और दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे हरीश रावत के साथ रहीं, किंतु विजय बहुगुणा सीएम बने तो उनके भी करीब हो गयीं और बहुगुणा हटे तो वापस हरीश रावत के साथ ही सत्ता के और निकट आ गयीं। इसके प्रतिफल में उन्हें संसदीय सचिव पद मिला। साथ ही रावत खेमे से निकटता के प्रतिफल में महिला कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष भी बनाया गया। दूसरी ओर यशपाल काबीना मंत्री बनने के बावजूद रूठने-मनाने की स्थिति में ही रहे और सरिता के बाद प्रदीप टम्टा को राज्यसभा भेजने के साथ हरीश रावत खेमे से यह संदेश भी दिया गया कि पूर्व में प्रदेश अध्यक्ष रहे यशपाल से इतर उनके पास सरिता और प्रदीप के रूप में दो अन्य दलित चेहरे भी हैं। इन स्थितियों के बीच मार्च 2016 में प्रदेश में हुए सियासी ड्रामे से पहले से ही यशपाल के कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाने जैसे स्वर भी सुनाई देने लगे। ऐसी स्थितियों के बीच किसी से छुपा नहीं है कि यशपाल आर्य नैनीताल सीट को अपनी विरासत यानी संजीव आर्य को सौंपना चाहते हैं। यह तभी संभव है, जब कांग्रेस संजीव को टिकट दे दे। अखिल भारतीय अनुसूचित जाति जनजाति महासंघ के अध्यक्ष व राज्य आंदोलनकारी केएल आर्य और प्रताप गोरखा की दावेदारी को इसी कोण से देखा जा रहा है। दूसरी ओर सरिता की जीत हरीश रावत खेमे के लिये भी प्रतिष्ठा का प्रश्न होगी। लिहाजा मुकाबला सरिता से इतर इन दोनों क्षत्रपों के बीच ही होगा। 

नैनीताल सुरक्षित विधानसभा सीट से उम्मीदवार

  • कांग्रेस- मौजूदा विधायक सरिता आर्य
  • भाजपा – संजीव आर्य
  • उक्रांद- श्याम नारायण
  • निर्दलीय- भाजपा के बागी हेम आर्य, कांग्रेस के बागी केएल आर्य,

नैनीताल विस क्षेत्र की समस्याएं : पार्किग की कमी व संकरी सड़कें, नगर और नैनी झील में फैली गंदगी, ग्रामीण क्षेत्रों में टूटीं फूटीं सड़कें, अस्पतालों में सुविधा व डॉक्टरों की कमी।

 सोशल मीडिया से कुछ रोचक :

आज कांग्रेस के लिए भाजपा को कोसने, भाजपा को ‘कांग्रेस युक्त भाजपा’ कह कर गम गल्प करने का नहीं, आत्म मंथन का दिन है, कि आखिर उनकी पार्टी से ही क्यों हो रहा है नेताओं का पलायन ? गलती पलायन करने वाले नेताओं की ही है याकि जिसकी वजह से वे गए….? कौन है जिम्मेदार ? …और भाजपाई सोचें, उनके होते क्यों सिद्धांतो की तिलांजलि देने को मजबूर हुई उनकी पार्टी? क्या वे बेहतर साबित होते घोषित प्रत्याशियों से? क्या नहीं (सभी पार्टियों के) अधिकांश कार्यकर्त्ता स्वार्थी और पदलोलुप होते हैं। वे पार्टियों में होते ही पदों के लिए हैं। पद मिला तो ठीक, वरना अपनी ही पार्टी को गलियाने में देर नहीं लगाते। बेहतर हो वे अपनी ही पार्टी के उन समर्थकों से कुछ सीखें, जो हर हाल में उनकी पार्टी का समर्थन करते हैं। कभी गंभीरता से सोचें, आपमें और दूसरी पार्टी के कार्यकर्ताओं में कोई अंतर है भी ? याकि दोनों मूल में ही #कांग्रेसयुक्तभाजपा या #भाजपायुक्तकांग्रेस हैं ? क्या प्यार, जंग और चुनाव में सब कुछ जायज है..? याकि नहीं है ? बड़ा सवाल कि विधानसभा का टिकट पाये 64 में से 14 हालिया कांग्रेसी भाजपा को #कांग्रेसयुक्तभाजपा बना डालेंगे, या कि खुद भाजपामय हो जायेंगे..? मुकाबला “डूबते जहाज” और “उगते सूरज” के बीच तो नहीं…?

एनडी तिवारी जैसे कोंग्रेसी के भाजपा में शामिल होने पर कुछ राष्ट्रवादी नाराज़ है, होना भी चाहिए।
लेकिन थोड़ा दिमाग से काम लो…
दुश्मन को कमजोर करने के लिए गट्ठर से 1 लकड़ी रोज निकालनी पड़ती है। फिर दल-बदलुओं को नैतिकता का पाठ भी पढ़ा लेंगे।
दुश्मन को परास्त करने के लिए अर्जुन को शिखंडी जैसों का सहारा भी लेना पड़ा था, और धर्मराज युधिस्थिर को झूठ भी बोलना पड़ा था। इसलिए इत्मीनान रखें। बड़े लक्ष्य के लिए ऐसे छोटे-छोटे समझौते करने पड़ते हैं।

नैनीतालः मिलजुल कर रहते हैं सभी जाति-धर्मों के लोग

नवीन जोशी। नैनीताल। कोई भी समाज सभी जाति-धर्मों के एक गुलदस्ते की तरह होता है। भारत देश की समृद्ध ‘विविधता में एकता‘ वाली सांस्कृतिक विविधता युक्त विरासत में सभी वर्गों की साझी झांकी पेश होती है। इसीलिये २०११ में सामाजिक यानी जाति व धर्मगत आधार पर भी जनगणना के आंकड़े भी एकत्र किये थे। किंतु यह आंकड़े किन्ही कारणों से सार्वजनिक नहीं किये गये थे। पहली बार एक्सक्लूसिव तौर पर श्राष्ट्रीय सहाराष् को प्राप्त, सांख्यिकी विभाग के पास मौजूद जनपद में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई के अलावा बौद्ध व जैन सहित अन्य अनेक धर्मों के लोग भी मिलजुलकर रहते हैं। इन आंकड़ों के अनुसार नैनीताल जनपद की २०११ की जनगणना के अनुसार कुल जनसंख्या नौ लाख ५४ हजार ६०५ में से अनुसूचित जाति की जनसंख्या एक लाख ९१ हजार २०६ यानी २०.०३ फीसद, अनुसूचित जनजाति की आबादी ७४९५ यानी महज ३.८५ फीसद है। इस प्रकार शेष सात लाख ५५ हजार ९०४ यानी ७९.१८ फीसद जनसंख्या सामान्य वर्ग की है। वहीं धार्मिक आधार पर बात करें तो सर्वाधिक आठ लाख ९७ हजार ७१७ यानी ८४.२२ फीसद हिंदू, एक लाख २० हजार ७४२ यानी १२.६५ फीसद मुस्लिम, १७ हजारर ४१९ यानी १.८२ फीसद सिख, पांच हजार ९१ यानी ०.५३ फीसद इसाई, ५७० यानी ०.०६ फीसद से भी कम बौद्ध, ३५६ यानी ०.०४ फीसद से भी कम जैन तथा ७१० यानी ०.०७ फीसद के करीब अन्य व अवर्णित धर्मों के लोग रहते हैं।

Image result for उत्तराखंड विधानसभा चुनावImage result for उत्तराखंड विधानसभा चुनावअनुसूचित जाति-जनजाति की ७२ फीसद से अधिक आबादी आज भी गांवों में

नैनीताल। भारत गांवों का देश कहा जाता है, लेकिन गांवों से शहरों की ओर अत्यधिक पलायन की खबरों के बीच यह आंकड़े चौंकाने वाले हो सकते हैं कि नैनीताल जनपद में अनुसूचित जाति-जनजाति की ७२ फीसद से अधिक आबादी आज भी गांवों में ही रह रही है। अनुसूचित जाति की जनसंख्या की बात करें तो इनमें से ९८ हजार ८२४ पुरुष व ९२ हजार ३८२ स्त्रियां हैं, जबकि अनुसूचित जाति की एक लाख ३७ हजार ९०६ यानी ७२ फीसद से अधिक आबादी गांवों में रहती है, जिनमें से ७१ हजार १३७ पुरुष व ६६ हजार ७६९ स्त्रियां हैं। वहीं अनुसूचित जनजाति की आबादी ७,४९५ में से ७७ फीसद से अधिक आबादी गांवों में रहती है। इनमें २,९३४ पुरुष व २,८४६ महिलाएं शामिल हैं। यानी अनुसूचित जाति व जनजाति के

2011 की जनगणना के अनुसार नैनीताल जनपद के जनसंख्या संबंधित आंकड़े:

अनुसूचित जाति की कुल जनसंख्या:१९१२०६, पुरुष ९८८२४, स्त्री ९२३८२ अनुसूचित जाति की ग्रामीण जनसंख्या १३७९०६, पुरुष ७११३७, स्त्री ६६७६९ अनुसूचित जनजाति की कुल जनसंख्या: ७४९५, पुरुष ३८०१, स्त्री ३६९४ अनुसूचित जनजाति की ग्रामीण जनसंख्या ५७८०, पुरुष २९३४,स्त्री २८४६ विभिन्न धर्मों की जनसंख्या: हिन्दू ८०९७१७, मुस्लिम १२०७४२, सिख १७४१९, इसाई ५०९१, बौद्ध ५७०, जैन ३५६, अन्य तथा अवर्णित धर्म ७१०

नैनीताल जिले में ११४२२ नयों सहित ७.०५ लाख मतदाता करेंगे फैसला

नवीन जोशी, नैनीताल। आसन्न विधानसभा चुनावों में नैनीताल जनपद में कुल ११,४२२ नये मतदाताओं के साथ मतदाताओं की कुल संख्या सात लाख पांच हजार ९९८ हो गयी है, जो कि आगामी १५ फरवरी को अगले पांच वर्षों के लिये जिले की कुल छह विधानसभा सीटों के लिये अपने नुमाइंदों का चुनाव करेंगे। जबकि इससे पूर्व गत वर्ष की इसी तिथि यानी १० जनवरी २०१६ को जनपद में कुल मतदाताओं की संख्या छह लाख ९४ हजार ५१६ थी। राज्य निर्वाचन विभाग द्वारा 10 जनवरी 2017 को मतदाताओं की ताजा संख्या युक्त मतदाता सूचियों का प्रकाशन भारत सरकार की वेबासाइट ईसीआई डॉट एनआईसी डॉट इन तथा राज्य सरकार की वेबसाइट यूकेसीईओ डॉट एनआईसी डॉट इन पर देखकर अपना नाम सूची में होने का पता लगाया जा सकता है। हालांकि यह सूची भी अंतिम नहीं है, क्योंकि नामांकन की नारीख तक भी मतदाता सूची में नाम जोड़े जा सकते हैं। जनपद की विधानसभाओं में बीते एक वर्ष में मतदाताओं की संख्या में सर्वाधिक वृद्धि हल्द्वानी विधानसभा में ३,४०१ मतदाताओं की हुई है, बावजूद पिछले विस चुनावों यानी २०१२ में ही अस्तित्व में आई कालाढुंगी विधानसभा ने अभी भी १,४५,८२१ मतदाताओं के साथ जिले की सबसे बड़ी विधानसभा का तमगा बरकरार रखा है। वहीं सबसे कम ७९२ मतदाता भीमताल सीट पर बढ़े हैं, तथा भीमताल ही ९५,६७७ मतदाताओं के साथ जिले की सबसे कम मतदाताओं वाली सीट बनी हुई है। वहीं सभी सीटों पर महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों के मुकाबले कम ही है।

विधानसभा

पुरुष        महिला    अन्य    कुल मतदाता     नये मतदाता

लालकुआ    ५८,२४०    ५१,९१३   १         १,१०,१५४          १,६३३

भीमताल     ५१,४६४    ४४,२१३  ०            ९५,६७७              ७९२

नैनीताल     ५६,९२७     ५०,२३८  १         १,०७,१६६          १,२१४

हल्द्वानी    ७४,०९१     ६५,११५  १         १,३९,२०७          ३,४०१

कालाढुंगी    ७५,३०४     ७०,५१६  १         १,४५,८२१          ३,३८८

रामनगर     ५६,७१९     ५१,२५३  १         १,०७,९७३           १,०५४

कुल          ३,७२,७४५  ३,३२,२५८ ५       ७,०५,९९८        ११,४८२

तृतीय लिंगी मतदाताओं की संख्या में काफी कमी

नैनीताल। मतदाताओं की संख्या में एक उल्लेखनीय तथ्य पुरुष व महिला मतदाताओं से इतर तृतीय लिंग के रूप में गिने जा रहे मतदाताओं की संख्या में भी नजर आता है। इस बार जिले की भीमताल विस को छोड़कर सभी सीटों पर एक-एक मतदाता इस वर्ग के भी प्रदर्शित किये गये हैं। इस प्रकार जिले में इस वर्ग के कुल मिलाकर पांच ही मतदाता होंगे, जबकि पिछले बार भीमताल विस क्षेत्र में भी दो ऐसे मतदाता थे, तथा ऐसे मतदाताओं की कुल संख्या ३५ थी। इनकी संख्या में इतनी अधिक कमी क्यों आई, इस प्रश्न का सही-सही उत्तर किसी के पास नहीं है। अलबत्ता जिला चुनाव कार्यालय के कर्मियों की मानें तो पिछली बार की संख्या गलत थी।

फ्लैश बैक: जब मंत्री ने खुद बिछाई दरी और खुद ही दिया भाषण

-२५ वर्ष की आयु में यूपी के सबसे कम उम्र के विधायक बने बाद में स्वास्थ्य मंत्री रहे नैनीताल के प्रताप भैया
-इस सभा में बाद में नेपाल के विदेश सचिव रहे उद्धव देव भट्ट भी एक युवा के रूप में थे मौजूद
-दर्जनों स्कूल खोल शिक्षा की अलख भी जलायी, जाति प्रथा के रहे विरोधी
नवीन जोशी। नैनीताल। आज के दौर में जबकि राजनेता अपना जन-धन-बाहु बल दिखाकर ही स्वयं को बड़ा नेता दिखाने की कोशिश करते हैं, वहीं २५ वर्ष की आयु में यूपी के सबसे कम उम्र के विधायक बनने का रिकार्ड बनाने वाले नैनीताल निवासी यूपी के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री रहे स्वर्गीय प्रताप भैय्या जैसे नेता भी रहे, जिनके कई किस्से आज भी लोगों की जुबान पर रहते हैं। उन्होंने खुद को दिखाने के लिये भीड़ जुटाने के बजाय खुद से पहल करते हुए क्षेत्र में शिक्षा की अलख जगाने के साथ ही जाति प्रथा के विरुद्ध भी ऐसे अनूठे कार्य किये, कि लोग खुद-ब-खुद उनके साथ होते चले गये।
२५ वर्षीय युवा प्रताप का उनके पहले 1957 के विधानसभा चुनाव का किस्सा आज के राजनेताओं के लिये अनुकरणीय हो सकता है। इस चुनाव में प्रताप लखनऊ विवि से पढ़ाई पूरी करके प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर घर से दूर, अनजान सी तत्कालीन संयुक्त नैनीताल जनपद की टनकपुर-जहानाबाद सीट से चुनाव लड़ रहे थे। वहां न उनकी पार्टी का ढांचा ही था, और ना बहुत समर्थक ही। इसकी परवाह किये बिना खटीमा में अपनी सभा से पूर्व उन्होंने दिन में खुद ही सभा स्थल पर दरी बिछायी और खुद ही घंटी बजाकर लोगों को अपनी सभा की जानकारी भी दी। ऐसे में शाम को जब वे सभा को संबोधित करने लगे तो हर कोई उनका मुरीद हो गया था कि सुबह यही लड़का सभास्थल पर दरी बिछा रहा था। इस चुनाव में एक और खास बात यह भी रही कि उनकी इस सभा की अध्यक्षता उस समय एक अनजान नेपाली युवक उद्धव देव भट्ट ने की थी, जोकि बाद में नेपाल के विदेश सचिव रहे। उनके जीवन के कई और भी दिलचस्प उदाहरण मिलते हैं। अपने जीवन के आखिरी दिनों तक वे विधि विचार गोष्ठी सहित कई गोष्ठियां करते थे, और इनमें कितने कम लोगों की उपस्थिति होती, इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था, और वे गोष्ठी शुरू करने के लिये किसी का इंतजार भी नहीं करते थे। एक बार तो उनकी गोष्ठी में उनके पुत्र, कुछ अन्य परिजन तथा जूनियर अधिवक्ता मिलाकर कुल पांच लोग ही गोष्ठी शुरू होने के समय तक पहुंचे थे। बावजूद उन्होंने यह कहकर गोष्ठी शुरू कर दी कि ये ही उनके ‘पंच परमेश्वर” हैं। उन्होंने नैनीताल के प्रतिष्ठित शहीद सैनिक विद्यालय सहित एक सौ से अधिक स्कूलों की स्थापना कर उन्होंने समाज में शिक्षा की ज्योति जलाई। उन्होंने स्वयं और पुत्र ज्योति प्रकाश के नाम के पीछे जाति न लिखकर अपने स्कूलों में छात्रों की जाति लिखने का नया प्राविधान भी बनाया, जो आज भी लागू है।

फ्लैश बैक:’रानी का दाग’ मिटाने रानीखेत से चुनाव लड़े थे यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री सीबी गुप्ता

राष्ट्रीय सहारा के सभी राष्ट्रीय संस्करणों में 7 फ़रवरी 2017 को प्रकाशित आलेख की कतरन

-यूपी के तत्कालीन सीएम चंद्रभान गुप्ता मामूली अंतर से जीतने के बावजूद तीन बार लड़े थे रानीखेत से चुनाव
नवीन जोशी। नैनीताल। अलग राज्य बनने के बाद भी पलायन की मार झेलने को मजबूर और इस लिहाजा से ‘उड़ता उत्तराखंड’ तक कहे जा रहे उत्तराखंड राज्य में जहां मुख्यमंत्री हरीश रावत (धारचूला से हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा), मुख्यमंत्री के सलाहकार रणजीत रावत (सल्ट से रामनगर) और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय (टिहरी से सहसपुर) तक पहाड़ की सीटों से पलायन कर मैदानी सीटों पर उतर आये हैं, और प्रदेश के स्वनामधन्य नेताओं भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत (बरेली), हेमवती नंदन बहुगुणा (बारा) और नारायण दत्त तिवारी (काशीपुर) भी पर्वतीय सीटों की बजाय मैदानी सीटों से चुनाव लड़ते रहे। वहीं पहाड़ों का ऐसा सुनहरा अतीत भी रहा कि पहाड़ों की रानी कही जाने वाली रानीखेत विधानसभा सीट से एक दौर में यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रभान गुप्ता ने एक नहीं तीन चुनाव लड़े और जीते थे।
चंद्रभान गुप्ता की रानीखेत सीट से चुनाव लड़ने की कहानी राजनीतिक ट्विस्ट युक्त है। कांग्रेस नेता गुप्ता १९५८ के उपचुनाव में मुख्यमंत्री रहते मौहदा सीट से राठ क्षेत्र के दीवान शत्रुघ्न सिंह की रानी राजेंद्र कुमारी से चुनाव हार गये थे। इस चुनाव में उनके विरुद्ध ठीक चुनाव के एक-दो दिन पहले यह दुष्प्रचार किया गया था कि वे चुनाव जीतने के बाद रानी का डोला उठाएंगे। इस अफवाह पर मतदाता भड़के और रानी के समर्थन में लामबंद होकर उन्हें जिता दिया। कहते हैं कि इस घटना से बेहद दु:खी होकर ही उन्होंने १९५९ के उपचुनाव में ‘रानी’ शब्द से शुरू होने वाली रानीखेत सीट से लड़ने का फैसला किया। रानीखेत तब संयुक्त उत्तर प्रदेश की बहुत बड़ी विधानसभा थी। इसमें उस दौर में अल्मोड़ा जिले की मौजूदा रानीखेत विधानसभा के अलावा मौजूदा अल्मोड़ा की सल्ट तथा नैनीताल जिले की नैनीताल व भीमताल सीटों के सल्ट, भिकियासैंण, तल्ला रामगढ़, मल्ला रामगढ़, मुक्तेश्वर, बेतालघाट व सुयालबाड़ी तक के क्षेत्र भी शामिल थे। बुजुर्ग बताते हैं कि उपचुनाव के लिये में रानीखेत से कांग्रेस विधायक लक्ष्मण सिंह अधिकारी ने इस्तीफा देकर गुप्ता के लिये सीट खाली की थी। जबकि उनके सामने पृथक पर्वतीय राज्य संगठन के प्रत्याशी, मौजूदा मुख्यमंत्री हरीश रावत के श्वसुर, उत्तर प्रदेश सरकार में पर्वतीय विकास मंत्री भी रहे स्वर्गीय गोविंद सिंह माहरा जैसे कद्दावर नेता थे। गुप्ता ने यह चुनाव लड़ा और जीते। इसके बाद तो वे रानीखेत के ऐसे मुरीद हो गये थे कि उन्होंने १९६१, १९६७ और १९६९ के आम चुनाव भी इसी सीट से माहरा के खिलाफ लड़े और जीते। १९६७ के चुनाव में पृथक पर्वतीय राज्य की मांग भी जोर पकड़ चुकी थी। इस दौरान रानीखेत यूपी की बेहद ‘हॉट सीट’ रही। इस चुनाव में मुख्यमंत्री के चुनाव मैदान में उतरने से रानीखेत में मुकाबला पहाड़ विरुद्ध लखनऊ के रंग में भी रंगा, और बीबीसी के पत्रकार मार्क टुली और ब्लिट्ज पत्रिका के पत्रकार भी एक महीने तक रानीखेत में रहे थे। इस चुनाव में गुप्ता केवल ४९ वोटों के अंतर से जीते थे। बावजूद वे १९६९ के चुनाव में भी इसी सीट से लड़े और जीते।

चुनावी मौसम में बसंत की बहार : तिरंगे दुरंगे पर भारी पिरंगा

  • पीले-बासंती रंग के झंडों का प्रयोग कर रहे जनपद के अधिकतर निर्दलीय प्रत्याशी
  • प्रकृति में भी छाया यह रंग चुनावी फिजा बदलने के साथ ही बदल सकता है उनका नसीब

नवीन जोशी/ नैनीताल। मुख्यमंत्री हरीश रावत ने सरोवरनगरी में कांग्रेस पार्टी के झंडे के लिये ‘तिरंगा’, विरोधी दल भाजपा का नाम लिये बिना उनके झंडे को ‘दुरंगा’ शब्दों का प्रयोग किया। दिलचस्प बात यह है कि नैनीताल में कई सीटों पर तिरंगे और दुरंगे पर ‘पिरंगा’ भारी पड़ता और उनके समीकरणों को प्रभावित करता नजर आ रहा है। प्रत्याशी पीले-बासंती रंग को बसंत के मौसम से भी जोड़ रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि इस मौसम में प्रकृति में भी छाया यह रंग उनकी चुनावी फिजा को आम जन से भी जोड़ सकता है। साथ ही भगवान विष्णु से भी संबंधित होने की वजह से यह रंग उनकी जीत की राह बना सकता है।पिरंगा शब्द का प्रयोग यहां पीले रंग के राजनीतिक झंडों के लिये किया जा रहा है। इसे संयोग कहें अथवा कुछ और, जनपद की अधिकांश सीटों पर प्रभावी तरीके से चुनाव लड़ रहे निर्दलीय प्रत्याशी पीले झंडों का प्रयोग कर रहे हैं। और यह कहना भी अतिशयोक्ति नहीं कि पीला-बासंती रंग जनपद में निर्दलीयों की पहचान बन गया है। नैनीताल मुख्यालय की सीट पर तो भाजपा-कांग्रेस दोनों के राजनीतिक समीकरणों को बिगाड़ रहे दो निर्दलीय प्रत्याशी, खासकर पिछली बार भाजपा से चुनाव लड़े बागी हेम चंद्र आर्य और कांग्रेस के बागी केएल आर्य चुनाव लड़ रहे हैं और दोनों ही पीले रंग के झंडे लेकर चल रहे हैं। यही स्थिति लालकुआं सीट पर भी है, जहां पिछली बार कांग्रेस के टिकट से चुनाव लड़े बागी हरेंद्र बोरा पीले रंग के झंडे के साथ ही पीले रंग की ही टोपी को अपने चुनाव अभियान की पहचान बनाकर चुनाव लड़ रहे हैं। ठीक यही स्थिति जिले की कालाढुंगी सीट पर भी है, जहां पिछले चुनाव में 11 हजार से अधिक मत लाकर तीसरे स्थान पर रहे कांग्रेस के बागी प्रत्याशी महेश शर्मा भी पीले रंग के ही झंडे और टोपी के साथ चुनाव मैदान में हैं। पीला रंग प्रदेश में और भी कई सीटों पर निर्दलीय प्रत्याशियों की पहली पसंद बताया जा रहा है। देखने वाली बात होगी कि पीले रंग का झंडा निर्दल प्रत्याशियों के जीत की राह में क्या भूमिका निभाता है।

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