कला की नगरी नैनीताल में नाटक परंपरा का इतिहास


आगे 1938 में चंद्र लाल साह के द्वारा नगर में आधुनिक रंगमंचीय परंपरा की नींव के रूप में शारदा संघ की स्थापना की गयी। शारदा संघ के द्वारा 1938 से 1948 तक प्रतिवर्ष श्रीराम सेवक सभा के रंगमंच पर रामलीला के बाद एक नाटक का मंचन किया जाता था। 1951 में संघ ने शैले हॉल में वर्तमान शारदा संघ भवन के निर्माण के लिये टिकट लगाकर भक्त अंबरीश नाटक का मंचन किया। इसी दौरान 1952 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री गोविंद बल्लभ पंत के सुझाव पर तत्कालीन नगर पालिकाध्यक्ष जसोद सिंह बिष्ट ने शरदोत्सव मनाने का निर्णय किया तो बेहद कम समय की उपलब्धता के बीच शारदा संघ को शरदोत्सव के तहत एकांकी नाटक प्रतियोगिता कराने का जिम्मा सौंपा। 1952 की पहली एकांकी नाटक प्रतियोगिता में नैनीताल की पांच व अल्मोड़ा की एक टीम आई। पहला पुरस्कार यूनाइटेड आर्टिस्ट अल्मोड़ा के नाटक चौराहे की आत्मा को मिला, जिसमें मोहन उप्रेती, बृज मोहन साह, लेनिन पंत व नईमा उप्रेती प्रमुख भूमिकाओं में थे। बाद में ये सभी अखिल भारतीय रंगमंच के प्रतिष्ठित नाम बने।
आगे 1953 में नौ टीमों की प्रतिभागिता के बीच बैचलर्स क्लब नैनीताल के नाटक लक्ष्मी का स्वागत को प्रथम, सीआरएसटी इंटर कॉलेज के झरोखे पार को द्वितीय व यूनाइटेड आर्टिस्ट अल्मोड़ा के ‘दादा का निधन’ को तृतीय पुरस्कार मिला। प्रतियोगिता में शेरवुड कॉलेज नैनीताल के मर्च परिवार द्वारा अंग्रेजी नाटक-कैंडिल स्टिक प्रस्तुत किया गया, मारकस मर्च द्वारा बिशप का किरदार उल्लेखनीय रहा। 1954 में 12 टीमों की प्रतिभागिता के बीच सीआरएसटी ओल्ड ब्वॉइज एसोसिएशन का नाटक ‘रुपया’ प्रथम रहा। इस नाटक के लिये बाद में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्र के साथ ही निदेशक भी बने बृजमोहन साह को ‘धीरज’ नाम के किरदार के लिये अपने जीवन का पहला पुरस्कार मिला। उन्होंने यहां 1975 में ‘सुना जनमेजय’ तथा आगे ‘युद्धमन’ व ‘त्रिशंकु’ नाम के नाटक भी पेश किये। 1955 में नैनीताल नाटक समाज के नाटक पैसे का पुत्र, बैचलर्स क्लब के ‘चिता’ और न्यू आर्टिस्ट नैनीताल के ‘रोटी का टुकड़ा’ खास रहे। 1956 में नैनीताल से बाहर की टीमें भी आने लगीं। कुल 18 टीमों ने प्रतिभाग किया, जिनमें से बैचलर्स क्लब नैनीताल के नाटक ‘अतृप्त’ ने पहला, नैनीताल आर्टिस्ट के ‘पागल की डायरी’ को दूसरा व लखनऊ विश्वविद्यालय के नाटक ने पांचवा स्थान प्राप्त किया।
1957 से 1959 तक लखनऊ विश्वविद्यालय का दबदबा रहा। 1957 में रिकार्ड 29 टीमों के बीच लखनऊ विश्वविद्यालय के ‘लघुकेशिनी त्रिवल्लुमिदम’ ने पहला, नैनी वान्डरर्स के ‘ईमान’ ने दूसरा व बैचलर्स क्लब के ‘अभियुक्ति’ ने तीसरा, 1958 में 14 टीमों के बीच लखनऊ विश्वविद्यालय के ‘रीढ़ की हड्डी’ ने पहला, सीआरएसटी ओल्ड ब्वॉइज के ‘महाश्वेता’ ने दूसरा पुरस्कार जीता। कला भारती अल्मोड़ा के लोकगाथा पर आधारित ‘रितुरैंणा’ इस वर्ष की विशेष उपलब्धि रही। 1959 में भी लखनऊ विश्वविद्यालय ने ‘ढोंग’ से प्रथम पुरस्कार जीता। कला मंदिर ग्वालियर के ‘शोहदा’ को द्वितीय व सीआरएसटी ओल्ड ब्वॉइज के ‘बैर का बदला’ को तृतीय पुरस्कार मिला।
1960 में बैचलर्स क्लब ने वापसी करते हुए मोपासा की कहानी ‘मंकीज पौ’ के रूपांतर ‘तीन अभिलाषाएं’ से पहला, नैनी वान्डरर्स ने दूसरा, कला केंद्र हल्द्वानी के ‘नींव का पत्थर’ ने तीसरा, ग्वालियर के ‘रास्ते मोड़ और पगडंडी’ ने चौथा व लखनऊ विश्वविद्यालय के ‘उलझन’ ने पांचवा पुरस्कार जीता। इसी तरह 61 में ‘समय की शिला पर’ से गोरखपुर व 62 में सीआरएसटी ओल्ड ब्वॉइज ने ‘लड़का सात लड़की तीन’ से पहले पुरस्कार जीते। 1963 से 73 तक नाटक परम्परा दूसरी संस्था के हाथों में जाकर कुछ शिथिल हुई तो 74 में वापस शारदा संघ को शरदोत्सव समिति से नाटक कराने का जिम्मा मिल गया। इस समय तक नाटकों में यथार्थवाद के साथ प्रतीकात्मकता का दौर भी शुरू हो चुका था। इस दौरान रस गंधर्व, एक और द्रोणाचार्य, त्रिशंकु और सृष्टि का आखरी आदमी जैसे नाटक मंचित हुए जो आम दर्शकों की समझ से कुछ हद तक बाहर थे। 1976 में शरदोत्सव समिति की खुले रंगमंच में नाटक कराने की शर्त रखे जाने पर शारदा संघ का रंगमंच से नाता ही टूट गया। आगे 1976 से 86 तक नैनी जागृति संघ के द्वारा यह जिम्मेदारी निभाई गयी। 1986 में इस दौरान ही एक युवक की हत्या हो जाने के बाद यह प्रतियोगिता समाप्त हो गयी.
उल्लेखनीय है कि 1952 से 62 तक नगर में करीब 150 नाटकों का मंचन किया गया। इनमें लिटिल थियेटर ग्रुप बरेली द्वारा प्रसिद्ध सिने कलाकार उत्पल दत्त के नाटक का हिंदी रूपांतर ‘रात का अतिथि’, कल्चरल सोसायटी बरेली के ‘रक्त चंदन’, पापी कौन, ग्वालियर के नाटक ‘माटी का करज’ व ‘इतिहास चक्र’ व ‘विटामिन एम’ के अलावा नैनीताल के राजन सेठ के नाम से विख्यात राजेंद्र साह के नाटक ‘जौंक’ की प्रस्तुतियां प्रमुख थीं। जौंक तो इतना प्रसिद्ध हुआ कि इसके मुख्य पात्र के नाम पर शारदा संघ को नाटक प्रतियोगिता के अंत में ‘लीडर जी’ नाम से एक नया अध्याय ही आरंभ करना पड़ा, जिसके तहत लीडर जी, लीडर जी स्वर्ग में और लीडर जी का स्टैच्यू आदि नाटक प्रस्तुत किये गये। 1956 में पागल की डायरी नाटक के लिये प्रथम पुरस्कार प्राप्त करने जगदम्बा प्रसाद जोशी ने पागल का अभिनय जीवंत करने के लिये एक माह तक एक पागल का पीछा किया। बैचलर्स क्लब के हरेंद्र बिष्ट, केपी गुप्ता व किशन लाल साह के अलावा श्याम लाल साह, जीवन लाल साह, मोहन जोशी व हरीश गुरुरानी आदि नगर के कलाकारों ने भी अभिनय को नयी ऊंचाइयां दीं।
आगे 1976 में ‘युगमंच’व ‘आयाम’ मंच का गठन हुआ। इस दौरान तत्कालीन डीएसबी राजकीय स्नातकोत्तर कॉलेज में युवाओं की अंतरविभागीय नाटक प्रतियोगिताएं आयोजित होने लगी थीं, जिनमें 18 टीमें तक भाग लेती थीं, वहीं सीआरएसटी इंटर कॉलेज में भी सात-आठ टीमों की प्रतिभागिता के साथ नाटक प्रतियोगिता आयोजित की जाती थी। 100 से अधिक नाटक कर चुकी युगमंच के लिये 1976 में गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ व केपी साह द्वारा निर्देशित ‘अंधेर नगरी’, 1986 में जहूर आलम द्वारा निर्देशित ‘नाटक जारी है’, 1994 में निर्मल पांडे द्वारा ‘जिन लाहौर नई देख्या’ व 2000 में जगमोहन जोशी मंटू द्वारा निर्देशित नाटक ‘बड़ा साहब’ प्रमुख रहे। युगमंच ने बॉलीवुड को भी ललित तिवारइी, नीरज साह, सुनीता अवस्थी, निर्मल पांडे, इदरीश मलिक आदि कलाकार उपलब्ध कराये।
इधर हाल के वर्षों में युगमंच, मंच, का अंश, नैनीताल आर्ट्स व प्रयोगांक आदि संस्थाओं के द्वारा तुगलक, हैमलेट, लहरों के राजहंस, आषाड़ का एक दिन, भोलानाथ का जीव, उरुभंगम व डेढ़ इंच ऊपर आदि नाटकों का मंचन भी दर्शनीय रहा है। दो अक्टूबर से नगर के सेंट जोसफ कालेज के 125वें स्थापना दिवस के अवसर पर करन जौहर के ग्रुप द्वारा विद्यालय के करीब 400 छात्रों को लेकर तैयार किया गया नाटक-‘लायन किंग” खासा पसंद किया गया।

प्रयोगांक के ‘उरुभंगम’ ने जीती नैनीताल शीतोत्सव नाट्य प्रतियोगिता

नवीन जोशी, नैनीताल। नैनीताल विंटर कार्निवाल यानी नैनीताल शीतोत्सव के तहत 1986 के बाद एक बार फिर आयोजित नाट्य प्रतियोगिता का बेहद सुंदर व स्तरीय आयोजन किया गया। देर शाम जूम लैंड यानी रिंक हॉल में आयोजित हुई नाट्य प्रतियोगिता की आखिरी प्रस्तुति रहे प्रयोगांक संस्था के नाटक ‘उरुभंगम’ को 50 हजार रुपये के प्रथम पुरस्कार से नवाजा गया। वहीं हल्द्वानी के अस्तित्व कला केंद्र द्वारा प्रस्तुत नाटक-दो दुःखों का एक सुख को 30 हजार रुपये के द्वितीय तथा अल्मोड़ा की विहान सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्था के द्वारा कुमाऊं के द्वारा प्रस्तुत लोकदेवता गंगनाथ और प्रसिद्ध लोकगाथा भाना-गंगनाथ पर आधारित कुमाउनी नाटक – भाना गंगनाथ को 20 हजार रुपये के तृतीय पुरस्कार से नवाजा गया।
महाकवि भास द्वारा ईसा से दो से तीन हजार वर्ष पूर्व संस्कृत भाषा में रचित कालजयी नाटक उरुभंगम अपने दिनों के गिने-चुने दुःखांत नाटकों में शामिल है। यह द्वापर युग में घटित महाभारत के युद्ध के आखिरी पलों की अलग तरह से व्याख्या करता हुआ दुर्योधन को सुयोधन के रूप में दिखाने का प्रयास करता है। भारतेन्दु नाट्य अकादमी से स्नातक मदन मेहरा द्वारा निर्देशित नाटक में कलाकारों की वेष-भूषा, मो. जावेद हुसैन द्वारा तैयार किये गये अस्त्र-शस्त्रों, खासकर दुर्योधन व भीमसेन की गदाओं, बलराम के हल, सैनिकों के ढाल व तलवार, अश्वत्थामा के धनुष व अभिमन्यु के हाथों में रथ के पहिये के प्रयोग तथा उनके हाव-भावों में प्रयोगधर्मिता के बावजूद बिना किसी मिलावट के महाभारत के दौर के ही दर्शन हुए। चरित्रों की अदायगी में खासकर दुर्योधन के रूप में रोहित वर्मा, अश्वत्थामा व भीम के रूप में संतोख बिष्ट, बलराम के रूप में कौशल साह जगाती, गांधारी प्राची बिष्ट, मालती सोनी जंतवाल, सैनिक मो.जावेद, पवन कुमार व अनवर रजा, सूत्रधार चारु तिवारी व उमेश कांडपाल, दुर्जय वैभव जोशी व अभिमन्यु नीरज सुयाल आदि ने अपने अभिनय की छाप छोड़ी, जिसके फलस्वरूप ही नाटक दो दुःखों का एक सुख व भाना गंगनाथ को पीछे छोड़कर चौंपियन घोषित हुआ, और इसे प्रख्यात रंगकर्मी सुमन वैद्य ने ‘राष्ट्रीय स्तर का नाटक’ करार दिया। हालांकि इससे पूर्व युगमंच संस्था की ओर से भोलानाथ का जीव भी प्रदर्षित हुआ, परंतु इसमें अति समसामयिकता, व्यंग्य और प्रयोग के चक्कर में मूल कहानी से अत्यधिक छेड़छाड़ करते हुए अपने कथानक के अनुरूप ‘वनज’ नजर नहीं आया। नाटक में यमराज, चित्रगुप्त, यमदूत और महर्षि नारद जैसे बड़े चरित्र भी मशखरे अधिक नजर आये, लगा मानो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 500 और एक हजार के नोट बंद करने तथा उत्तराखंड में व्याप्त भ्रष्टाचार की धमक यमलोक तक पहुंच गयी हो। अलबत्ता भोलानाथ, यूके दाज्यू और मालवीय के रूप में भाष्कर बिष्ट ने जरूर अपने अभिनय से तालियां बटोरीं। कुमाऊं विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डा. लक्ष्मण सिंह बिष्ट ‘बटरोही’, वरिष्ठ रंगकर्मी सुरेश गुरुरानी और कुमाउनी फिल्म मधुली के नायक रहे पंकज चौधरी ने निर्णायक तथा हेमंत बिष्ट व नवीन पांडे ने संचालन में योगदान दिया। हालांकि दर्शक एक-दो निर्णायकों में नाटकों की समझ और उनके खासकर भाना गंगनाथ को तीसरे स्थान पर करने के निर्णय पर सवाल उठाते भी दिखाई दिये।
इससे पूर्व प्रतियोगिता की दूसरी शाम कुमाऊं के लोकदेवता गंगनाथ और प्रसिद्ध लोकगाथा भाना-गंगनाथ पर आधारित कुमाउनी नाटक – भाना गंगनाथ ने साबित किया कि क्यों अल्मोड़ा को प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी कहते हैं। कुमाउनी लोक भाषा में प्रस्तुत नाटक में तत्कालीन नेपाल और कुमाऊं की सांस्कृतिक साझी संस्कृति को कलाकारों के परिधानों से लेकर अभिनय तक में बेहद रोचक, दर्शनीय तरीके से प्रस्तुत किया गया। लोक गीत-संगीत के बेहद मजबूत कलापक्ष ने दर्शकों को एक से दूसरे अंक में जाने का अहसास तक नहीं होने दिया। नाटक में भावनाओं की ऐसी विविधता और दृश्यों का ऐसा तेज प्रवाह दिखा कि नाटक, एक नाटक से अधिक एक चलचित्र की भांति दर्शकों के मन पर अपनी छाप बना गया। नाटक के आखिर में महिला पात्रों के द्वारा सतयुग, द्वापर से लेकर त्रेता और कलयुग में महिलाओं की उपेक्षित दशा के प्रश्न उठाकर एक जरूरी संदेश भी दिया। गंगनाथ के रूप में प्रदीप आर्या, भाना के रूप में ममता वाणी भट्ट, राजा भवैचंद बने जावेद सुहेल, प्युला रानी बनी तूलिका कनवाल, जेठ कृष्णानंद व वैद्य देवेंद्र भट्ट के साथ ही उमा शंकर, मोहित पांडे, पवन तिवारी, महेंद्र महरा व विजय उप्रेती आदि कलाकारों ने भी अपनी पूरी छाप छोड़ी, अलबत्ता सूत्रधार के रूप में सोनी आर्या जरूर अपने कुमाउनी संवादों में कमजोर रहीं। हारमोनियम वादक व गायक के रूप में शेखर सिजवाली व गायिका अंकिता भट्ट तथा बांशुरी वादक संतोष कुमार ने नाटक में चार चांद लगा दिये।
वहीं इससे पूर्व ‘नैनीताल आर्ट्स समिति’ के तत्वावधान में कालिदास और उनकी प्रेयसी मल्लिका पर आधारित प्रसिद्ध नाटककार मोहन राकेश का नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ अपने नाम के अनुरूप आषाढ़ के एक दिन कालीदास और मल्लिका के बीच एक घायल मृग शावक के दुलार के दृश्यों से शुरू होकर वर्षों बाद आषाढ़ मास के ही एक अन्य दिन पर खत्म हुआ। अमर उजाला के छायाचित्रकार रितेश सागर द्वारा निर्देषित इस नाटक में स्वयं विलोम बने रितेश, मल्लिका बनीं तनूजा आर्या, अम्बिका बनी लता त्रिपाठी और प्रियंगुमंजरी यानी महिला पात्र निभाते कलाकार तुषार पंत के साथ ही छोटी भूमिका में भी मातुल यानी नवीन जोशी ने प्रभावित किया। परंतु कहानी का प्रमुख पात्र होते हुए भी कालिदास के चरित्र दीपक सहदेव को नाटक में अपेक्षित विस्तार नहीं मिला। संगीत में सतीश पांडेय व बांसुरी में महेश लसपाल ने नाटक को दर्शनीय के साथ ही स्मरणीण बनाने में काफी मेहनत की, लेकिन ‘फोकस्ड लाइट’ के बावजूद धीमे संवादों के साथ बहुतेरे दर्शकों की शिकायत रही कि नाटक की कहानी आसानी से समझ में नहीं आयी और वे इसका अपेक्षित आनंद नहीं उठा पाये। नाटक के फोल्डर में बताया गया था कि कालिदास नाटक में पुरुष के दंभ का परिचायक है, परंतु नाटक में उसकी विवशता ही अधिक नजर आयी। वहीं नाटक प्रतियोगिता के दौरान दर्शकों की कम संख्या प्रतियोगिता के आयोजन में प्रचार-प्रसार की कमी को साफ तौर पर उजागर कर गयी। यहां तक कि कई प्रेस के प्रतिनिधियों को भी प्रतियोगिता की ठीक-ठीक जानकारी नहीं दी गयी थी। प्रतियोगिता में प्रस्तुत नाटकों का फोल्डर भी कम ही लोगों को प्राप्त हो पाया।

रंगशाला के लिये अब कानों में चीखने की जरूरत

नैनीताल। नाट्य प्रतियोगिता के पुरस्कार वितरण के दौरान प्रतियोगिता के संयोजक जहूर आलम ने इस बात पर नाराजगी जताई कि कई वर्ष से रंगकर्मियों के आंदोलन के बावजूद शासन-प्रशासन व सरकार के कानों पर जूं भी नहीं रैंग रही। कलाकारों की शक्ति नाटकों के लिये लाइट और साउंड की व्यवस्था करने में जाया हो रही है। लिहाजा अब ऐसे कानों पर चीखने की जरूरत आ पड़ी है। कहा कि ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भी नैनीताल के रंगकर्मियों ने नाटक करके साबित कर दिया है कि नाटक क्या होता है, और नाटक करने वाले कैसे होते हैं। वे ‘रंगकर्म को जीते हैं।’ कहा कि रंगीन मंच के बीच में नाटकों के इस कार्यक्रम को करीब-करीब छीनकर लाया गया। वहीं निर्णायक सुरेश गुरुरानी ने कहा कि कोई भी नाट्य प्रतियोगिता के लिये तैयार नहीं था, क्योंकि नाटक अलग-अलग विधाओं के होते हैं, और उनमें प्रतियोगिता कमोबेश संभव नहीं है। निर्णायक के रूप में डा.बटरोही ने कहा कि कई वर्षों के बाद इस तरह नाटक देखने का मौका मिला, वहीं निर्णय सुनाने से पूर्व दूसरे निर्णायक पंकज चौधरी इतना ही कह पाये कि अब तक ‘मौन’ नजर आ रहे दर्शक कहीं निर्णय सुनने के बाद उनके खिलाफ पहाड़ी ‘मौन’ न बन जायें।

नैनीताल में अमिताभ को रोक दिया गया था नाटक करने से

-बावजूद कहते हैं, उनके रोम-रोम में बसा है यहां का शेरवुड कालेज
-2008 में यहां आये तो कहा, यहां बिताये तीन दिन तीन वर्षों जैसे लगे
नवीन जोशी, नैनीताल। देश ही नहीं दुनिया में अभिनय के बेताज बादशाह कहे जाने वाले और सदी के महानायक तथा बिग बी जैसे नामों से पुकारे जाने वाले अमिताभ हरिवंश बच्चन के बारे में कम ही लोग जानते होंगे कि उनकी अभिनय कला नैनीताल में ही अंकुरित हुई थी। और यहीं के शेरवुड कालेज में प्रधानाचार्य ने भविष्य के अभिनय के शहंशाह को नाटक में अभिनय करने से रोक दिया था। उन्होंने यहां के अलावा कई अन्य स्कूल-कालेजों में पढ़ा। बावजूद नैनीताल और शेरवुड को वह दिल से इस तरह प्यार करते हैं कि उन्हें यह कहने में भी संकोच नहीं होता कि वह आज जो कुछ भी हैं-शेरवुड की वजह से हैं। वर्ष 2008 में वह शेरवुड के तीन दिवसीय वार्षिकोत्सव में शामिल हुऐ तो लौटकर अपने ब्लॉग में लिखा-शेरवुड में बिताये तीन दिन उनके लिये तीन वर्षों जैसे हैं।
अमिताभ को 1956 में जब पहली बार उनके पिता प्रख्यात कवि हरिवंश राय बच्चन ने नैनीताल के शेरवुड कालेज में नौवीं कक्षा में दाखिला कराया था, तब वह महज 14 वर्ष के किशोर थे। उनके छोटे भाई अजिताभ उनसे पहले शेरवुड में प्रवेश पा चुके थे। इन्ही दिनों अमिताभ में अभिनय के बीज अंकुरित हो रहे थे। यहीं वह अन्य सहपाठियों की तरह हास्टल से छुपकर फिल्में देखने भी जाने लगे थे। यहीं उन्होंने शैक्सपीयर के नाटक में अभिनय कर ‘ज्योफ्रे केंडल कप’ का पुरस्कार भी हासिल किया, जो उनके जीवन का पहला नाटक और पहला पुरस्कार भी कहा जाता है। इसी दौरान एक अनोखी घटना भी घटित हुई, जिसे अमिताभ आज भी याद रखते हैं। शेरवुड के तत्कालीन प्रधानाचार्य रेवरन आरसी लिवैलिन जिन्हें छात्र ‘लू’ भी कहा करते थे, ने अमिताभ को बीमार होने के कारण नाटक में अभिनय करने से रोक दिया था। अमिताभ इस घटना को याद करते हुऐ अपने ब्लॉग में लिखते हैं, वह स्कूल के चिकित्सालय में बेड पर बीमार पड़े हुऐ थे, तब उन्हें अपने बाबूजी की कविता की पंक्तियां याद आर्इं-मन का हो तो अच्छा, मन का ना हो तो और भी अच्छा। बस इन्हीं पंक्तियांे ने न केवल तब उन्हें आत्मिक ऊर्जा दी वरन हमेशा उन्हें जीवन में आगे बढ़ने को प्रेरित किया। इधर जून 2008 में उन्हें जब शेरवुड के तीन दिवसीय वार्षिकोत्सव कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया तो वह अपने पूरे परिवार, पत्नी जया, पुत्र अभिषेक व पुत्रबधु ऐश्वर्या के साथ पारिवारिक मित्र अमर सिंह के साथ यहां पहुंचे। यहां के बाद उन्हें तत्काल अपनी ‘सरकार राज’ फिल्म के प्रमोशन एवं आईफा के कार्यक्रम में बेंकाक जाना था। वह नौ जून को दिल्ली ही पहुंचे थे कि अपने ब्लॉग में नैनीताल की यादों को संजोना नहीं भूले। उन्होंने लिखा, वह शेरवुड में बिताये तीन दिनों से स्वयं को अलग नहीं कर पा रहे हैं। वह तीन दिन नहीं थे, उनके जीवन के तीन सर्वाधिक प्रसन्न वर्षों जैसे थे।

पंत ने दिया था ‘अमिताभ’ नाम

नैनीताल। अमिताभ बच्चन का पहाड़ से नाता उनके जन्म से ही जुड़ा था। 11 अक्टूबर 1942 को जब वह पैदा हुऐ थे, वह भारत छोड़ो आंदोलन का दौर था। ऐसे में उनके पिता हरिवंश राय के एक प्राध्यापक मित्र अमरनाथ झा ने उनका नाम ‘इंकलाब राय” रखने का सुझाव दिया था। लेकिन उनके पिता के छायावादी कवि मित्र सुमित्रानंदन पंत उन दिनों सर्दियों के दिन होने के कारण अल्मोड़ा से इलाहाबाद ही आये हुऐ थे। पंत ने नर्सिंग होम में ही नवजात शिशु की ओर इशारा करते हुऐ कहा था-देखो कितना शांत बालक है, मानो ध्यानस्थ अमिताभ। कहते हैं तभी बच्चन दंपति ने उनका नाम नामकरण संस्कार से पूर्व ही अमिताभ रख दिया।

बड़े शौक से सुन रहा था जमाना, तुम ही सो गए दास्तां कहते-कहते…

-नगर के नर्सरी स्कूल से हॉलीवुड तक का कठिन सफर तय किया था निर्मल ने
नवीन जोशी, नैनीताल। नैनीताल के माल रोड स्थित नगर पालिका संचालित नर्सरी किंडर गार्डन स्कूल व सीआरएसटी इंटर कालेज से हिन्दी में ककहरा सीखने वाला एक बालक 47 वर्ष की अल्पायु में ही बॉलीवुड में छाने के बाद न केवल लन्दन में फर्राटेदार अंग्रेजी बोलता हुआ नाटक करने लगा, वरन हॉलीवुड की फिल्मों में भी दिखाई दिया, और एक पुरुष कलाकार होते हुऐ सात समुन्दर पार फ्रांस के केन्स फिल्मोत्सव में सर्वश्रेठ अभिनेत्री का पुरस्कार प्राप्त करने जैसा कारनामा कर आया। उसकी इस प्रगति यात्रा को उसके नगर, प्रान्त और देश वासी और अधिक लंबा देखना-सुनना चाहते थे, लेकिन दो वर्ष पूर्व आज ही के दिन दुनिया के निर्मल और नैनीताल के नानू इस कहानी को आधा अधूरा छोड़ कर हमेशा के लिए विदा हो गऐ।
निर्मल की 47 वर्षों की छोटी जीवन यात्रा में उनके स्टार बनने के बाद की कहानी तो शायद सबको पता हो, लेकिन इससे पीछे की कहानी थोटे शहरों में बड़े सपने देखने वाले किसी भी युवक के लिऐ प्रेरणास्पद हो सकती है। नानू के पास अगर कुछ था, तो वह थी विरासत में मिली अभिनय की प्रतिभा। उनके नाना जय दत्त पाण्डे मशहूर कथावाचक थे, जबकि योजना विभाग में बड़े बाबू पिता हरीश चन्द्र पांडे एवं माता रेवा पांडे की भी संगीत में गहरी रुचि थी। नर्सरी किंडर गार्डन स्कूल से निकलकर नगर के सीआरएसटी इंटर कालेज में पहुंचते निर्मल के भीतर का कलाकार बाहर आ गया। विद्यालय के पूर्व प्रधानाचार्य मोहन लाल साह बताते हैं सीआरएसटी से ही निर्मल ने 1978 में तारा दत्त सती के निर्देशन में स्कूल के रामलीला वैले से बड़े भाई मिथिलेश के साथ राम-लक्ष्मण की भूमिका अदा कर अभिनय की शुरूआत की थी। इसे देख स्कूल के सांस्कृतिक क्लब के अध्यक्ष मरहूम जाकिर हुसैन साहब निर्मल से इतने प्रभावित हुऐ कि इस नन्हे बालक को क्लब का सचिव बना दिया। 80 में निर्मल युगमंच संस्था से जुड़े और डीएसबी से एम-कॉम करने लगे। इस दौरान ही उन्होंने सीआरएसटी में ‘राजा का बाजा” नाटक किया। इससे पूर्व उन्होंने नगर के ही इदरीश मलिक के निर्देशन में ‘हैमलेट” नाटक से अभिनय को नऐ आयाम दिऐ।
युगमंच के लिए ‘अनारो’ उनका पहला नाटक था। पहले प्रयास में ही 86 में वह एनएसडी में चुन लिये गऐ, और एनएसडी के लिए कुमाऊं के फोक पर आधारित ‘अजुवा बफौल’ सहित कई नाटक किऐ। 89 में एनएसडी ग्रेजुऐट होते ही वह लन्दन की तारा आर्ट्स संस्था से जुडे़, और संस्था के लिए सैक्सपियर के कई अंग्रेजी नाटक किऐ। इसी दौरान उन्होंने विश्व भ्रमण भी किया। इसी दौरान के प्रदर्शन के आधार पर शेखर कपूर ने उन्हें ृबैण्डिट क्वीन फिल्म में ब्रेक दिया, जिसके बाद उन्होंने रुपहले पर्दे पर पीछे मुड़ कर नहीं देखा। ‘दायरा’ फिल्म में महिला के रोल के लिए उन्हें केन्स फिल्म समारोह में फ्रांस का सर्वश्रेठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला, जो दुनिया में पहली बार किसी पुरुष कलाकार को मिला था। अपने आखिरी दिनों में उन्होंने ‘लाहौर’ फिल्म पूरी की थी। टे्रन टु पाकिस्तान व गॉडमदर जैसी कई ऑफबीट फिल्में भी उनके खाते में दर्ज हैं। उनसे प्रेरणा पाकर नगर के सुवर्ण रावत, योगेश पन्त, ज्ञान प्रकाश, सुमन वैद्य, सुनीता चन्द, ममता भट्ट, गोपाल तिवारी, हेमा बिष्ट सहित कई कलाकारों ने एनएसडी का रुख किया, इनमें से कई बॉलीवुड में स्थापित भी हुऐ हैं। शायद इसीलिऐ आज उनकी दूसरी पुण्यतिथि पर भी उनके नगर के लोग उन्हें इस तरह याद करते हैं, मानो वह गये ही नहीं। सीआरएसटी के प्रधानाचार्य मनोज पांडे कहते हैं, पहाड़ उन्हें बड़ी उम्मीदों से बहुत आगे जाता देख रहा था, अफसोस वह ही सो गऐ दास्तां कहते कहते…।

जब चाहो तब बज उठेंगे ‘गिरदा” के ‘खामोश नगाड़े’

-केएमवीएन के डीएमटी डीके शर्मा की प्रस्तुति पर देर तक बजी तालियां
नवीन जोशी, नैनीताल। “कि जागो रे, कि धरती माता तुम्हारा ध्यान जगे, ऊंचे आकाश तुम्हारा ध्यान जगे, दिन के सूर्य, रात्रि के चन्द्रमा, तुम्हारा ध्यान जगे, पूरब की कालिका, पश्चिम की मालिका, उत्तर की हिऊंला, दक्षिण की वैष्णवी माता तुम्हारा ध्यान जगे, कि आज इस कथा बेला में हम तुम्हें जगाते हैं रे, कि राख के मनखियो तुम्हारा ध्यान जगे। और उस सत्य को शीश नवाते हैं-कि तुम्हारा ध्यान जगे, जिसने इण्ड से पिण्ड और पिण्ड से ब्रह्माण्ड रचा, क्या किया, कि सुनहरे-रुपहले नर और मादा गरुड़ों की सर्जना की, कि जिसका अण्ड फूटने से ब्रह्माण्ड की रचना हुई, कि आधा भाग ऊपर नौखण्डी आकाश बना, कि मध्य भाग, केसर से, अमृत लोक बना, और निचले भाग से तीन ताल धरती बनी, और फिर धरती में राख का मनुष्य बना। राख की बात क्या, राख की करामात क्या, कि राख का मनुष्य-खाक का भी है, कि लाख का भी है! कि लाख को भी खाक, खाक को भी लाख करता है! सोता है तो गनेलों की तरह- और जागता है तो ब्रह्माण्ड हिला देता है।….” इसके साथ ही नगाड़ों के बजाये तबले व नाल जैसे हल्के वाद्य यंत्रों के स्वर जागर की तर्ज पर लगातार तीव्र होते चले जाते हैं, और शर्मा डंगरिये की तरह झूमकर दर्शकों को भी झंकृत कर देते हैं। ऐसा लगता है मानो गिरदा के साथ खामोश हुऐ नगाड़े फिर से बज उठे हैं। इसके साथ ही यह विश्वास पक्का हो जाता है, गिरदा के नगाड़े कभी खामोश नहीं होंगे, जब भी गिरदा की रचनाएें पढ़ी-मंचित की जाएेंगी, नगाड़ों के साथ गिरदा भी बोल पड़ेंगे। जब चाहो तब गिरदा के खामोश नगाड़े बज उठेंगे।
नगर के शैले हॉल प्रेक्षागृह में युगमंच द्वारा प्रदेश के दिवंगत जनकवि गिरीश तिवारी ‘गिरदा’ को समर्पित कार्यक्रम में कुमाऊं मंडल विकास निगम के मंडलीय प्रबंधक-पर्यटन डीके शर्मा की प्रस्तुति ‘नगाड़े खामोश हैं’ को जिसने भी देखा, उसके मन में यह विश्वास पक्का हो गया कि रचनाकार कभी मरते नहीं। शर्मा ने गिरदा द्वारा निर्देशित धर्मवीर भारती के नाटक ‘अंधा युग’ में निभाये गये पात्र युयुत्सु, ‘अंधेर नगरी’ में गोवर्धन दास सहित आठ किरदारों तथा ‘नाटक जारी है’ के कुछ दृश्यों का भावपूर्ण मंचन करके भी गिरदा के दर्शन कराये। गिरदा के मित्र रहे इतिहासकार पद्मश्री डा. शेखर पाठक भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि गिरदा मरा नहीं है। उसके जाने का भी एक वर्ष बाद भी विश्वास नहीं हो रहा है, क्योंकि वह अपनी कविताओं, रचनाओं के रूप में जिंदा है। दिल्ली में चल रहे अन्ना हजारे की तरह ही आदि विद्रोही रहे गिरदा के ओजस्वी गीतों के बगैर हर संघर्ष, आंदोलन अधूरा रहेगा। श्री पाठक मानते हैं कि गिरदा के जाने से कई मायनों में एक युग का समापन हो गया है। वह होते तो बीते एक वर्ष में ही वर्तमान हालातों पर नजाने क्या-कुछ न कह गये होते। शायद इसी लिये आज उनकी पुण्य तिथि पर लोग उनका स्मरण करेंगे तो सबके मन में उनकी अलग-अलग स्मृतियां, उनके बहुआयामी व विराट व्यक्तित्व में समाये एक आदि विद्रोही, आंदोलनकारी, कवि, लेखक, नाटककार, निर्देशक, कलाकार, होल्यार, ओजस्वी वक्ता व गायक, वक्त की नब्ज को पहचानने वाले फक्कड़ साधु जैसे युगदृष्टा तथा देश-प्रदेश की भौगोलिक व सांस्कृतिक जानकारियों के ‘इनसाइक्लोपीडिया’, संस्कृतिकर्मी के रूप में हमेशा जीवंत रहेंगी।

‘टोबा टेक सिंह’ ने विस्थापन का दर्द उकेर आंखें की नम

-गिरदा की बरसी पर आयोजित हुआ ‘टोबा टेक सिंह” का मंचन
नवीन जोशी, नैनीताल। प्रदेश के दिवंगत जनकवि गिरीश तिवारी ‘गिरदा’ की पहली बरसी पर नगर की सांस्कृतिक संस्था युगमंच द्वारा तीन दिवसीय कार्यक्रम के तहत साहित्यकार सदाअत हसन मंटो की कहानी ‘टोबा टेक सिंह’ पर आधारित नाटक कामंचन किया गया। नाटक के जरिये जहां कलाकारों ने उम्दा अदाकारी के जरिये देश के विभाजन और विस्थापन का दर्द उकेर कर कई आंखें नम कर दीं, वहीं वर्तमान हालातों पर भी गहरे कटाक्ष भी किये।
नैनीताल क्लब के शैले हॉल के सुविधाविहीन रंगमंच पर मंचित नाटक टोबा टेक सिंह नगर में हालिया दिनों में एक बार फिर से शुरु हुई रंगमंचीय परंपराओं को आगे बढ़ाता है, वहीं रंगमंच की नगरी कहे जाने वाले नगर में धरमवीर परमार, जितेंद्र बिष्ट व जहूर आलम जैसे लब्ध प्रतिष्ठ कलाकारों के बीच कमल जोशी, बृजेश जोशी, मनोज कुमार व गौरव जोशी जैसी नयी पौध के जरिये बेहतर भविष्य का इशारा भी करता है। नाटक में जहां 13 अप्रैल 1919 के जलियांवाला बाग के बेहद भावुक व हृदयविदारक दृश्य रंगमंच को न समझने वाले आम दर्शक को भी उद्वेलित करने में समर्थ रहे, वहीं यह भी कहना होगा कि संभवतया नाट्य रूपांतरण के कारण नाटक के पात्र अपने पागल किरदारों में हास्य के अतिरेक के बीच सूत्रधार की दोहरी जिम्मेदारी को निभाने के फेर में मूल कहानी में उलझ गये। फलस्वरूप नाटक एक साथ अनेक संदेश देता हुआ खासकर अपना मुख्य संदेश (बेहतरीन अभिनय के बावजूद प्रमुख पात्र बिशन सिंह का अपने गांव टोबा टेक सिंह जाने की तमन्ना के बीच भारत व पाकिस्तान के बजाय अलग कंटीली सीमा पर मरने) को प्रभावोत्पादक तरीके से नहीं कह पाया। नाटक के जरिये ‘आजादी ठीक तरीके से न मिली तो 60-70 वर्षों बाद देश कालाबाजारी-भ्रष्टाचार की गिरफ्त में होगा, काले अंग्रेज चले गये पर भूरे अंग्रेजों को छोड़ गये, विश्वास है कि इंकलाब आयेगा, खुदा व भगवान होते ही नहीं, उन्हें तो हुक्मरान लोगों को भरमाने के लिये रचते हैं’ सरीखे संवाद और ‘कौन आजाद हुआ, मादरे वतन के चेहरे पै उदासी है अभी’ सरीखी कव्वालियों युक्त संगीत पक्ष बेहद प्रभावी रहा। कहानीकार की देश विभाजन के दौरान भारत के पागलखानों में रह गये मुस्लिम पागलों को पाकिस्तान और पाकिस्तान के पागलखानों के हिंद पागलों की हिंदुस्तान भिजवाने की अदला-बदली के विचार तथा पात्रों के जरिये जिन्ना के साथ गांधी को भी दोषी ठहराने जैसी बेबाकी काबिल ए तारीफ है। हां जिन्ना के साथ भगत सिंह को भी पागल दिखाने का नाटक अंत तक जवाब नहीं देता है। लेकिन नगर से एनएसडी व मुंबइया फिल्म नगरी तक जाकर लौटे युवा निर्देशक सुभाष चंद्रा, संगीत निर्देशक दिनेश कृष्ण व उनके सहयोगियों के प्रयास उल्लेखनीय रहे। हां, एक अन्य प्रस्तुति के लिये युगमंच के संस्थापक सदस्यों में शुमार कुमाऊं मंडल विकास निगम के मंडलीय प्रबंधक पर्यटन डीके शर्मा को गिरदा के नाटकों में वर्षों पूर्व एक कलाकार के रूप में निभाई गई अपनी भूमिकाओं पर आधारित एकल प्रस्तुति पर प्राप्त की गई टिप्पणी रोचक रही कि उन्होंने पुराने चावलों का दम दिखा दिया।

‘मंच” पर मिली ‘शकुंतला की अंगूठी’

-कालीदास का अभिज्ञान शाकुंतल की समकालीन पुर्नव्याख्या का हुआ रोचक प्रस्तुतीकरण
नवीन जोशी, नैनीताल। बीते कुछ समय से भारत भवन व अनुपर खेर संगीत स्कूल के प्रधानाचार्य रहे आलोक चटर्जी ने ‘ऐसा भी होता है” व स्वयं अनुपम खेर द्वारा बीते सप्ताह दिल्ली में प्रस्तुत ‘कुछ भी हो सकता है’ की कड़ी में बुधवार को नैनीताल का नाम भी जुड़ गया। यह देश में विकसित हो रही नाटकों की नयी विधा है, जिसमें कलाकार मंच पर बिना किसी मेक-अप के दर्शकों सा ही जीवन जीता हुआ मंच पर आता है, और अपनी व्यक्तिगत कथा कहता हुआ ही घंटे-डेढ़ घंटे का नाटक दिखा देता है। नगर की मंच संस्था के ‘गैस चैंबर” में तब्दील नगर के शैले हॉल में आज नगर के एनएसडी स्नातक इदरीश मलिक निर्देशित व नाटककार सुरेंद्र वर्मा के नाटक ‘शकुंतला की अंगूठी’ का कुछ इसी अंदाज में प्रस्तुतीकरण किया गया।
नाटक में न केवल महर्षि कालीदास द्वारा चौथी शताब्दी ईसा पूर्व यानी आज से 2400 वर्ष पूर्व लिखे गये संस्कृत के गौरवग्रंथ कहे जाने वाली काजजयी रचना ‘अभिज्ञान शाकुंतल’ की समकालीन व ‘रियलिस्टिक” तरीके से पुर्नव्याख्या की गई, वरन इस बहाने बीसवीं सदी के आखिरी दिनों में नाटककार द्वारा लिखे गये नाटक के जरिये वर्तमान संवेदना विहीन परंतु भौतिकवाद से ग्रस्त मशीनी मानव के जीवन मूल्यों के अंर्तद्वंद्व को भी बखूबी प्रतिबिंबित किया गया। शायद इसी लिये ‘शकुंतला की अंगूठी’ से बढ़कर इसका पुर्नअन्वेषण व पुर्नव्याख्या हो गया। नाटक, नाटक की बजाय नाटक की रिहर्सल की नयी प्रविधि पर प्रदर्शित किया गया, जहां किरदार अपने वास्तविक नामों के साथ वर्तमान संदर्भों और यहां तक कि दर्शकों को भी नाटक का पात्र बनाते हुऐ न केवल उन्हें नाटक देखने समय पर आने की अपील करते हैं, वरन बीच में नाटक छोड़कर जाने वाले दर्शकों की खिंचाई भी करते हैं। यहां कलाकार तल्लीताल से मल्लीताल के बीच रिक्शे में सीजन की भीड़ में फंसने के कारण देर से पहुंच रहे हैं, तो नाटक के बीच नट-बोल्ट भी बेच रहे हैं। इस प्रकार नयी विधा में प्रस्तुत नाटक दर्शकों को हंसा कर लोट-पोट भी करता है, और कई विंदुओं पर सोचने को विवश भी करता है। निर्देशक के रूप में इदरीश मलिक तथा कलाकारों के रूप में रेहान अख्तर, पवन कुमार, गंगोत्री बिष्ट व आरती धामी प्रभावित करते हैं। संजय कुमार, अजय पवार,नीरज डालाकोटी, मुकेश धस्माना, रोहित वर्मा व जावेद हुसैन भी अच्छा प्रभाव छोड़ते हैं।

रोमियो-जूलियट: बेरोना से सरोवर नगरी में

-नगर में जारी है छोटे संसाधनों से बड़े नाटकों का प्रदर्शन
नवीन जोशी, नैनीताल। इटली के नगर बेरोना में प्रेम की किंवदंती बन चुके रोमियो और जूलियट का प्यार पला था, वही रोमियो और जूलियट इन दिनों दुनिया के महानतम नाटककार विलियम शैक्सपीयर के नाटक से निकलकर सरोवर नगरी के शैले हॉल सभागार में मौजूद हैं। यहां इन दो पात्रों की बेहद भावुक व दु:खांत काल्पनिक प्रेमगाथा का प्रदर्शन हो रहा है।
कहते हैं कि शेक्सपीयर एक डार्क लेडी नाम की महिला के प्रेम से वंचित थे, इसी लिये उन्हें अतृप्त कवि और नाटककार भी कहा जाता है। शायद इसी लिये वह 1594 में रोमियो-जूलियट के अतृप्त प्यार पर अपनी साहित्यिक शुरुआत में ही इतना सुंदर नाटक लिख पाऐ, जो अपने काल्पनिक पात्रों को कहानी के जरिये दुनिया के अन्य जीवंत प्रेमियों लैला-मजनू व शीरी-फरियाद से कहीं अधिक प्रसिद्धि दिला गये। शेक्सपीयर ने रोमियो-जूलियट में प्रेम को जिस ढंग से उतारा है, उसमें प्यार का पहला इज़हार ज़ुबां से नहीं आंखों से होता है। ज़ुबां का रिश्ता बुद्धि और तर्क के साथ जुड़ता है और प्यार में बुद्धि और तर्क के लिए कोई स्थान नहीं होता है। आंखों की भाषा मस्तिष्क, बुद्धि और तर्क से अलग होकर सीधे हृदय को छूती है, घायल करती है, और इतना घायल करती है कि दो हृदय विरह की आग में झुलसते रहते हैं। अंत में वर्जनाओं के कारण दोनों एक साथ मौत की माला गले में पहन लेते हैं। इस कशिश, भावनाओं के उद्वेग, भावों के विचारवान परिवर्तन को समझना बड़े कलाकारों के लिये भी आसान नहीं होता। आज से लगभग सात सौ वर्ष पूर्व लिखी गई यह कहानी शैले हॉल के रंगमंच पर उतारने का साहस करना भी कठिन होता है, किंतु नगर के ‘मंच एक्सपरिमेंटल रेपेटरी” ने युवा निर्देशक अजय पवार के निर्देशन में यह साहस दिखाया है। जूलियट के रूप में गंगोत्री बिष्ट, कप्यूलेट अनिल घिल्डियाल के साथ ही बैन्वोलियो संजय कुमार, सैंपसन नीरज डालाकोटी, पैरिस रोहित वर्मा व टाइबौलट अनवर रजा आदि कलाकारों ने बेहद प्रभावित किया। अन्य पात्रों मोहिनी रावत, धर्मवीर सिंह परमार व मो.जावेद हुसैन ने भी अच्छा अभिनय किया। निर्देशक अजय कुमार मुख्य चरित्र रोमियो के बजाय निर्देशन में अधिक प्रभावी दिखे। नगर में ऑडिटोरियम की कमी एक बार पुन: खली। प्रकाश व्यवस्था कई बार खासकर जूलियट के बेहोसी के दृश्यों में आने और उठकर जाने के दौरान कमजोर दिखी। बावजूद, अच्छी बात यह रही कि संसाधनों के बिना भी कभी थियेटर की नगरी कही जाने वाली सरोवरनगरी में युवा कलाकार व कला से जुड़े लोग नाटक को जिंदा किये हुऐ हैं, व पर्यटन नगरी में लगातार स्तरीय नाटक प्रदर्शित कर सिनेमाघरों की कमी को भी छुपाने में सफल हो रहे हैं।

इंसाफ की तलाश करता ‘कोर्ट मार्शल’

-सीमित संसाधनों के बिना भी कलाकारों के अभिनय से छाप छोड़ने में सफल रहा नाटक
नवीन जोशी, नैनीताल। ‘जब दुनिया की कोई अदालत इंसाफ नहीं कर सकती, ऊपर वाला खुद इंसाफ कर देता है।’ यह वह अंतिम डायलॉग था, जिस पर नाटक ‘कोर्ट मार्शल’ का समापन हो जाता है। कुछ ऐसी ही उम्मीदों के साथ नगरवासी व यहां के रंगमंच से जुड़े लोग भी नगर में रंगमंचीय सुविधाओं के लिये सरकार से लाख असफल प्रयासों के बाद अब ईश्वर की ओर ही ताक रहे हैं।
थियेटर की नगरी कही जाने वाली सरोवरनगरी में हिंदी के सुप्रसिद्ध नाटककार स्वदेश दीपक के प्रख्यात नाटक ‘कोर्ट मार्शल’ की प्रस्तुति सीआरएसटी इंटर कालेज के सभागार में की गई। बकौल निर्देशक जहूर आलम नाटक को नैनीताल क्लब के शैले हॉल से इसलिये नीचे लाना पड़ा कि शैले हॉल का रंगमंचीय स्वरूप अब छिन चुका है। यहां आवाज फटने लगती है, ऐसे में दर्शक भी वहां कम जुटते हैं। कलाकारों का आरोप है कि पिछली कांग्रेस सरकार के दौर में इस थियेटर को कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन के दौरान ऐसा विकृत कर दिया कि अब वहां नाटक करने व देखने में आनंद नहीं आता है। बहरहाल, सीआरएसटी के मंच पर प्रदर्शित नाटक में कलाकारों ने असुविधाओं की कमी खलने नहीं दी। खासकर कैप्टन विकास राय के रूप में मनोज कुमार व कैप्टन बीडी कपूर के रूप में कमल जोशी ने बेहद प्रभावित किया। मेजर पुरी बने मासूम सी शक्लोसूरत के बृजेश जोशी ने रोल के अनुरूप आंखों में अंगारे भरकर प्रतिभा का प्रदर्शन किया। अच्छी शुरुआत के बाद कर्नल सूरत सिंह बने भाष्कर बिष्ट बीच में कुछ कमजोर लगे। छोटे से रोल में डा.गुप्ता यानी दीपक सहदेव, ले.कर्नल रावत बने मनीश कुमार, गार्ड गौरव जोशी व सलाहकार जज बने नवीन बेगाना ने भी छाप छोड़ी। अलबत्ता मुख्य किरदार में होने के बावजूद राम चंदर यानी मुख्तार अली संभावनाओं का पूरा उपयोग नहीं कर पाये। रियलिस्टिक नाटक होने के बावजूद थके हुऐ हैं हम पर घूम-घूम कर पहरा देते हैं, व जिंदगी को अपनी अंगुली पर नचाकर देखिऐ जैसे कोरस जबर्दस्ती ठूंसे हुऐ से नहीं लगे। जहूर आलम व जितेंद्र बिष्ट की निर्देशन के साथ ही सेट व अन्य कार्यों में की गई मेहनत खूब दिखाई दी। हां, रियलिस्टिक नाटक के नाम पर अभद्र व अशिष्ट जातिगत तथा गाली-गलौज के शब्दों के प्रयोग से बचा जा सकता था। नाटक में ‘कानून के राज में विद्रोह के लिये कोई स्थान नहीं होता’, ‘व्यवस्था कहती है, छोटे आदमी की शिकायत को वहीं दबा दो, और बड़े की शिकायत पर आंखें बंद कर लो’, ‘सच्चा व्यक्ति कभी अपनी मौत नहीं मरता, उसे दूसरों द्वारा मार दिया जाता है’ व ‘अंग्रेजों को गये तो बहुत दिन हो गये पर उनका हैंगओवर अभी तक नहीं गया’ जैसे चुटीले संवाद नाटक के कथ्य में सस्पेंस जैसा कुछ भी न होने के बावजूद दर्शकों को आखिर तक बांधे रहा। नाटक के माध्यम से समाज के जाति विभेद के कोढ़ को हर भारतीय के लिये गर्व की प्रतीक ‘भारतीय सेना” के माध्यम से कुरेदे जाने पर जरूर कुछ दर्शकों में लज्जा का भाव भी देखा गया। अच्छा होता यही बात किसी और माध्यम से कही जाती। अलबत्ता, नाटक के सफल मंचन के बीच दर्शकों व कलाकारों में नगर में एक अदद थियेटर की लंबे समय से उठाई जा रही मांग के पूरा न होने पर भी नाराजगी का भाव था।

रोमियो—जूलियट: बेरोना से सरोवर नगरी में

थियेटर की नगरी में जारी है छोटे संसाधनों से बड़े नाटकों का प्रदर्शन
नवीन जोशी, नैनीताल। इटली के नगर बेरोना में प्रेम की किंवदंती बन चुके रोमियो और जूलियट का प्यार पला था, वही रोमियो और जूलियट इन दिनों दुनिया के महानतम नाटककार विलियम शैक्सपीयर के नाटक से निकलकर सरोवर नगरी के शैले हॉल सभागार में मौजूद हैं। यहां इन दो पात्रों की बेहद भावुक व दु:खांत काल्पनिक प्रेमगाथा का प्रदर्शन हो रहा है। 
कहते हैं कि शेक्सपीयर एक डार्क लेडी नाम की महिला के प्रेम से वंचित थे, इसी लिये उन्हें अतृप्त कवि और नाटककार भी कहा जाता है। शायद इसी लिये वह 159४ में रोमियो—जूलियट के अतृप्त प्यार पर अपनी साहित्यिक शुरुआत में ही इतना सुंदर नाटक लिख पाए, जो अपने काल्पनिक पात्रों को कहानी के जरिये दुनिया के अन्य जीवंत प्रेमियों लैला—मजनू व शीरी—फरियाद से कहीं अधिक प्रसिद्धि दिला गये। शेक्सपीयर ने रोमियो—जूलियट में प्रेम को जिस ढंग से उतारा है, उसमें प्यार का पहला इजहार जुबां से नहीं आंखों से होता है। जुबां का रिश्ता बुद्धि और तर्क के साथ जुडता है और प्यार में बुद्धि और तर्क के लिए कोई स्थान नहीं होता है। आंखों की भाषा मस्तिष्क, बुद्धि और तर्क से अलग होकर सीधे हृदय को छूती है, घायल करती है, और इतना घायल करती है कि दो हृदय विरह की आग में झुलसते रहते हैं। अंत में वर्जनाओं के कारण दोनों एक साथ मौत की माला गले में पहन लेते हैं। इस कशिश, भावनाओं के उद्वेग, भावों के विचारवान परिवर्तन को समझना बड़े कलाकारों के लिये भी आसान नहीं होता। आज से लगभग सात सौ वर्ष पूर्व लिखी गई यह कहानी शैले हॉल के रंगमंच पर उतारने का साहस करना भी कठिन होता है, किंतु नगर के ‘मंच एक्सपरिमेंटल रेपेटरी’ ने युवा निर्देशक अजय पवार के निर्देशन में यह साहस दिखाया है। जूलियट के रूप में गंगोत्री बिष्ट, कप्यूलेट अनिल घिल्डियाल के साथ ही बैन्वोलियो संजय कुमार, सैंपसन नीरज डालाकोटी, पैरिस रोहित वर्मा व टाइबौलट अनवर रजा आदि कलाकारों ने बेहद प्रभावित किया। हाँ, कई पात्र बीते कुछ समय से लगातार्र शैक्सपीयर के पात्रो को जीते हुए ‘टाइप्ड’ होते भी प्रतीत हो रहे हैं अन्य पात्रों मोहिनी रावत, धर्मवीर सिंह परमार व मो.जावेद हुसैन ने भी अच्छा अभिनय किया। निर्देशक अजय कुमार मुख्य चरित्र रोमियो के बजाय निर्देशन में अधिक प्रभावी दिखे। नगर में ऑडिटोरियम की कमी एक बार पुन: खली। प्रकाश व्यवस्था कई बार खासकर जूलियट के बेहोसी के दृश्यों में आने और उठकर जाने के दौरान कमजोर दिखी। बावजूद, अच्छी बात यह रही कि संसाधनों के बिना भी कभी थियेटर की नगरी कही जाने वाली सरोवरनगरी में युवा कलाकार व कला से जुड़े लोग नाटक को जिंदा किये हुए हैं, व पर्यटन नगरी में लगातार स्तरीय नाटक प्रदर्शित कर सिनेमाघरों की कमी को भी छुपाने में सफल हो रहे हैं।
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