क्या आपको पता है कौन हैं नैनीताल के पहले ओलंपियन ?


UR2YCD7HJ32gdD5eh1TJ43UQऑस्ट्रेलिया के लिये खेले नैनीताल के पहले ओलंपियन रेमंड, यह ऑस्ट्रेलिया का हॉकी में पदार्पण ओलंपिक भी था 

-कहा-शेरवुड से मिले हॉकी खेलने के ज्ञान और प्रोत्साहन से ही खेल पाये ऑस्ट्रेलिया का हॉकी में पहला ओलंपिक

रेमंड वाइटफील्ड व कोलीन.

सहारा न्यूज ब्यूरो। नैनीताल। बुधवार का दिन शेरवुड कॉलेज के साथ ही यहां के 1941 से 1947 तक छात्र रहे आस्ट्रेलिया के उद्योगपति व पूर्व में देश के लिये हॉकी में पहला ओलंपिक खेली टीम के सदस्य रहे रे ह्वाइटफील्ड के लिये स्मरणीय दिन रहा। अपनी जड़ों को खोजते हुए पत्नी कोलीन के साथ रे के अपने विद्यालय पहुंचने से खुलासा हुआ कि वास्तव में रे नैनीताल से निकले पहले ओलंपिक खिलाड़ी थे, जो आस्ट्रेलिया के लिये हॉकी में पहले ओलंपिक मैच के खिलाड़ी रहे थे। उन्होंने कहा कि उस दौर में हॉकी के विश्व विजेता, लगातार आठ स्वर्ण पदक हासिल करने वाले भारत की इस धरती से ही उनके भीतर हॉकी का प्रवेश हुआ था, जिसे उन्होंने आस्ट्रेलिया जाकर आगे बढ़ाया और इस मुकाम पर पहुंचे। उल्लेखनीय है कि नैनीताल ने बाद के वर्षों में दो ओर ओलंपियन राजेंद्र रावत और सैयद अली देश को (दोनों हॉकी में ही) दिये।

1932 में तत्कालीन संयुक्त भारत के लाहौर में पैदा हुए 85 वर्षीय रे ने बताया कि उनके चचेरे भाई शेरवुड में पढ़ते थे, इसलिये रेलवे में कार्यरत उनके पिता एरिक ह्वाइटफील्ड ने लाहौर से ढाई दिन की रेल व बस से यात्रा कराकर उन्हें भी आठ वर्ष की उम्र में तीसरी कक्षा में शेरवुड में भर्ती कराया। यहां वे लिटिल जॉन हाउस की हॉकी टीम के सदस्य थे, साथ ही बॉक्सिंग, जिम्नास्टिक व एथलेटिक्स तथा समूह गान आदि प्रतियोगिताओं में भी शामिल रहते थे, तथा पढ़ाई में भी अच्छे थे। देश की आजादी के बाद दिसंबर 1947 में उनका परिवार आस्ट्रेलिया चला गया। आस्ट्रेलिया जाकर भी वे विश्व चैंपियन भारत से मिले हॉकी के ज्ञान को आगे बढ़ाकर हॉकी खेलते रहे, और 1950 में आस्ट्रेलिया के विक्टोरिया प्रांत की जूनियर और 1951 में सीनियर टीम में राइट विंग के खिलाड़ी के रूप में शामिल हुए, और आगे 1956 में जब आस्ट्रेलिया पहली बार हॉकी के खेल में ओलंपिक में शामिल हुआ, तब रे भी उस टीम में राइट हाफ की भूमिका में शामिल थे। रे ने बताया कि अपना पहला ओलंपिक खेल रहा आस्ट्रेलिया ग्रेट ब्रिटेन के बाद पांचवे स्थान पर रहा, जबकि भारत पाकिस्तान को हराकर चैंपियन बना। आगे वे आस्ट्रेलिया में आईबीएम, जीई, हनीवेल व टेन्डम कम्प्यूटर्स के एमडी रहने के बाद सेवानिवृत्त हुए हैं। नैनीताल के शेरवुड कॉलेज व नैनीताल को उन्होंने ‘जादुई स्थान” बताया, कहा यहां बिताये पल जीवन के सबसे अनमोल पल थे। झील में नहाने, तैरने, घुड़सवारी आदि की कोई रोक-टोक नहीं थी। अलबत्ता सेंट जोसफ या अन्य स्कूलों से भी प्रतिस्पर्धात्मक प्रतियोगिताएं नहीं होती थीं। कहा, अब भी नैनीताल भवनों और सड़कों पर वाहनों के बड़े दबाव के बावजूद लाहौर व जयपुर जैसे शहरों से काफी बेहतर है। विद्यालय में पहुंचने पर प्रधानाचार्य अमनदीप संधू, उप प्रधानाचार्य हरीश चंद्र पांडे, बर्सर वासु साह सहित अनेक शिक्षकों आदि ने उनका स्वागत किया।

रे के पिता एरिक भी थे ओलंपियन

नैनीताल। रे नेबताया कि उनके पिता एरिक भी 1936 के बर्लिन ओलंपिक में भारत के लिये 100 व 200 मीटर की दौड़ दौड़े थे। इस ओलपिंक में भारत के हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यान चंद भी देश की टीम में उनके साथ थे, जबकि अमेरिकी नीग्रो अश्वेत खिलाड़ी जेसी ओवेंस ने इस ओलंपिक में 100, 200 तथा चार गुणा 100 मीटर की रिले दौड़ व लंबी कूद के विश्व रिकार्ड बनाते हुए चार स्वर्ण पदक हासिल किये थे। बर्लिन यानी जर्मनी में तब हिटलर का शासन था, और हिटलर ने ध्यान चंद को अपने देश में ही रहने को कहा था।

दर्द से कहीं बड़ी होती है देश को जिताने की खुशी

आज भी बच्चों को प्रेरित करने के लिए समर्पित है ओलंपियन राजेंद्र रावत का जीवन

राजेंद्र रावत

वह प्रतिष्ठित अजलान शाह हॉकी टूर्नामेंट के पहले संस्करण का मलेशिया में हो रहा फाइनल मुकाबला था। जर्मनी के फुल बैक खिलाड़ी ने पेनाल्टी कार्नर से गेंद भारतीय गोल पोस्ट की ओर पूरे वेग से दागी। गोली की गति से गेंद भारतीय गोलकीपर के घुटने की हड्डी पर टकराई और मैदान से बाहर निकल गई। गोलकीपर के दर्द की कोई सीमा न थी, लेकिन वह दर्द के बजाय खुशी से उछल रहा था, कारण भारत वह फाइनल और प्रतियोगिता का स्वर्ण पदक जीत चुका था।

पहली अजलान शाह हॉकी प्रतियोगिता में भारत की जीत के वह हीरो गोलकीपर राजेंद्र सिंह रावत उत्तराखंड की धरती के हैं। देश के राष्ट्रीय खेल के प्रति जोश और जुनून का जज्बा उन्हें आगे चलकर 1988 के सियोल ओलंपिक तक ले गया। कभी नैनीताल के मल्लीताल जय लाल साह बाजार में पट्ठों के पैड और नगर के रेतीले खेल मैदान फ्लैट्स में नंगे पांव हॉकी खेलने वाला यह गुदड़ी का लाल नगर के सीआरएसटी इंटर कॉलेज में पढ़ने के दौरान जिले की टीम में क्या चुना गया, उसके बाद उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज भी उनमें खेल के प्रति वही जोश व जज्बा उसी फ्लैट्स मैदान पर 40-50 बच्चों को अपनी नैनीताल हॉकी अकादमी में हॉकी सिखाते हुए देखा जा सकता है। वह अभी हाल में यहां ऐतिहासिक 1880 में स्थापित नैनीताल जिमखाना एवं जिला क्रीड़ा संघ के प्रतिष्ठित अवैतनिक महासचिव के पद पर भी चुने गए हैं। पुराने दिनों को याद कर रावत बताते हैं कि उनके पिता स्वर्गीय देव सिंह रावत नगर के जय लाल साह बाजार में मिठाई की छोटी सी दुकान चलाते थे। यहीं से अभावों के बीच वह पहले सीआरएसटी और फिर जिले की टीम में चुने गए। इसके बाद उन्हें पहले स्पोर्ट्स हॉस्टल मेरठ और फिर लखनऊ में प्रशिक्षण का मौका मिल गया। इंग्लैंड के उस दौर के सर्वश्रेष्ठ गोलकीपर एलन को बिना देखे अपना गुरु मानकर वह आगे बढ़े। दिल में था, नाम भले कैप्टन का हो लेकिन गोलकीपर की सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए गोल बचाएंगे और देश को मैच जिताएंगे। 1982 में वह भारतीय जूनियर हॉकी टीम का हिस्सा बन गए और क्वालालंपुर में जूनियर वर्ल्ड कप खेले। 85 के जूनियर वर्ल्ड कप में उन्हें टीम का उप कप्तान बनाया गया। 1985 में देश की सीनियर टीम में आकर हांगकांग में 10वीं नेशन हॉकी टूर्नामेंट में खेले। इसी वर्ष दुबई में हुए चार देशों के टूर्नामेंट में वह प्रतियोगिता के सर्वश्रेष्ठ गोलकीपर चुने गए। भारत ने यह प्रतियोगिता अपने नाम की। 1986 में लंदन में हुए छठे विश्व कप में वह प्रतियोगिता के साथ दुनिया के सर्वश्रेष्ठ गोलकीपर चुने गए। इस प्रतियोगिता के फाइनल मुकाबले में उनके द्वारा इंग्लैंड के विरुद्ध रोके गए दो पेनल्टी स्ट्रोकों को आज भी याद किया जाता है। रावत बताते हैं कि हॉकी के जादूगर ध्यान चंद के दौर में पूरी दुनिया में घास के मैदानों में ही हॉकी खेली जाती थी, तब इस खेल में भारत का डंका बजता था। लेकिन 1976 के बाद विदेशों में आए एस्ट्रो टर्फ के मैदानों और अन्य सुविधाओं की वजह से भारत की हॉकी पिछड़ती चली गई। वह बताते हैं, उस दौर में देश में पटियाला में इकलौता केवल 25 गज का एस्ट्रो टर्फ का मैदान हुआ करता था, जबकि हालैंड जैसे छोटे से देश में ऐसे 120 बड़े मैदान थे। भारतीय खिलाड़ियों के पास हेलमेट, पैड, गार्ड आदि नहीं हुआ करते थे। भारत और पाकिस्तान में ही हॉकी स्टिक बनती थीं, इसलिए भारतीय खिलाड़ी अपनी हॉकी देकर विदेशी खिलाड़ियों से हेलमेट खरीदकर मैच खेलते थे। भारतीय खिलाड़ियों के पैड रुई के बने होते थे, जो एस्ट्रो टर्फ के पानी युक्त मैदानों में भीग जाते थे और उन्हें पंखों से सुखाना पड़ता था। फाइबर के पैडों से खेलने वाले विदेशी खिलाड़ियों के साथ यह समस्या नहीं थी।

सीआरएसटी में गूंजा ‘अली दा पहला नंबर…’

40 वर्ष बाद वापस लौटने पर अली का सीआरएसटी में भव्य स्वागत
नैनीताल। देश की राष्ट्रीय हॉकी टीम के सलेक्टर,

सैयद अली

2013 में मेजर ध्यान चंद लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित तथा १९७६ के मांट्रियल कनाडा ओलंपिक व 1979 के मास्को प्री ओलंपिक हॉकी खिलाड़ी रहे नगर के मूल निवासी सैयद अली 40 वर्षों के बाद अपने व नगर के सबसे पुराने विद्यालय सीआरएसटी इंटर कालेज पहुंचे। यहां विद्यालय के छात्रों ने सूफी गीत ‘अली दा पहला नंबर…’ और नगर के विभिन्न विद्यालयों से पहुंचे छात्र-छात्राओं की तालियों की गूंज देर तलक गूंजती रही। विधायक सरिता आर्या, विद्यालय के प्रबंधक अंतर्राष्ट्रीय छायाकार अनूप साह व प्रधानाचार्य मनोज पांडे ने उन्हें सम्मानित किया। प्रधानाचार्य पांडे ने कहा कि अपने अली का वास्तव में आज ध्यान चंद पुरस्कार प्राप्त करने से पहला नंबर ही लगा है।
इस मौके पर श्री अली ने बच्चों को जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए उपयोगी टिप्स दिए। साथ ही अपने सीआरएसटी में पढ़ने के दौरान ही हॉकी से जुड़ने और स्कूल टीम के खेल के दौरान लगने वाले नारों ‘बक अप सीआरएसटी, गोल मारो सीआरएसटी” के नारों को याद किया। यहीं ओलंपिक हॉकी टीम के कप्तान केडी सिंह बाबू ने उनका खेल देखा था और 1972 में लखनऊ ले गए। पहाड़ से उन्हें बेहद प्रेम रहा, इसलिए जब घर की याद आती तो बाबू कहते, इसे पहाड़ियों की सूरत दिखाओ और कुमाऊं परिषद ले जाते। संचालन करते हुए शिक्षक कमलेश पांडे ने श्री अली का पूरा जीवन वृत्त पेश किया। बताया कि सीआरएसटी से ही उन्होंने हॉकी खेलना शुरू किया था। विधायक सहित अन्य वक्ताओं ने भी उनकी उपलब्धि की मुक्त कंठ से सराहना की।

सफलता को यह दिए टिप्स :

  • सफलता के लिए अनुशासन जरूरी।
  • सफलता पानी हो तो कष्ट सहना भी सीखिए।
  • कोई भी कार्य 100 फीसद दिए बिना नहीं हो सकता।
  • मेहनत के बाद भी असफलता मिले तो घबराएं नहीं, दुबारा गलतियां दूर कर प्रयास करें।
  • अत्यधिक अभ्यास करें, अभ्यास प्रतिभा और प्रदर्शन को निखारता है।
  • अपने कार्य से पागलपन की हद तक प्रेम जरूरी।

हॉकी प्रीमियर लीग से छंटेगा हॉकी पर छाया कुहासा: अली

नैनीताल। पूर्व ओलंपियन हॉकी खिलाड़ी सैयद अली ने उम्मीद जताई कि राष्ट्रीय खेल हॉकी पर छाया कुहासा शीघ्र छंट जाएगा। शनिवार को मेजर ध्यान चंद लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार प्राप्त करने के बाद पहली बाद गृहनगर पहुचे श्री अली ने कहा कि आईपीएल की तर्ज पर शुरू हुई हॉकी प्रीमियर लीग इसमें मदद करेगी। कहा कि खेल व खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करन के लिए उन्हें आजीविका के लिए अच्छी सरकारी नौकरी जैसी सुविधाएं देना जरूरी है, तभी वह खेल में आगे आएंगे। इसके साथ ही उन्होंने खेलों के लिए खिलाड़ियों को बुनियादी सुविधाएं दिए जाने की आवश्यकता भी जताई। कहा कि नैनीताल में बजरी और देश में अन्यत्र घसियाले मैदानों में खेलने के बाद विदेशों में एस्ट्रोटर्फ के मैदानों पर खेलने के दौरान सामंजस्य बैठाने में दिक्कत आती है। इसलिए यहां भी विश्वस्तरीय खेल मैदान बनने चाहिए।

प्रस्तुतकर्ता

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