गंगा-यमुना के बाद ग्लेशियर, नदी, नाले, झील, जंगल, चरागाह भी अब ‘जीवित मानव’


गंगा माता की आरती के लिए चित्र परिणाम-उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने एक और एतिहासिक फैसला देते हुए गंगा-यमुना के बाद गंगोत्री, यमुनोत्री सहित नदी, नालों, झीलों, जंगलों, चरागाहों को भी जीवित मानव का दर्जा दिया

– भारतीय मिथकों की कण-कण में ईश्वर होने की परिकल्पना पर लगी एक तरह से मुहर
नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने एक और एतिहासिक फैसला देते हुए गंगा और यमुना नदियों के बाद अब इनके उद्गम स्थलों-गंगोत्री व यमुनोत्री सहित ग्लेशियरों के साथ ही नदियों, छोटी नदियों, घाटियांे, जल धाराओं, ग्लेशियरों, झीलों, हवा, घास के मैदानों, जंगलों, जंगली जलराशियों व झरने इत्यादि को कानूनी वैधता, कानूनी तौर पर जीवित मनुष्य का दर्जा दे दिया है। इन्हें एक कानूनी तौर पर जीवित व्यक्ति की तरह सभी संबंधित मौलिक व कानूनी अधिकार होंगे, साथ ही इनके जीवित मनुष्य की तरह दायित्व और जिम्मेदारियां भी होंगी।

उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व उत्तराखंड उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राजीव शर्मा और न्यायमूर्ति आलोक सिंह की एक खंडपीठ ने हरिद्वार निवासी मोहम्मद सलीम द्वारा दायर की गयी एक जनहित याचिका पर बीती 20 मार्च को भी अपने एक ऐतिहासिक फैसले में देश की दो पवित्र नदियों गंगा और यमुना को जीवित मानव का दर्जा देने का आदेश दिया था। वहीं शुक्रवार को उत्तराखंड उच्च न्यायालय की इसी खंड पीठ ने ललित मिगलानी की एक अन्य याचिका पर सुनवाई के बाद पूर्ण फैसला देते हुए 66 पृष्ठ का यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। फैसले में केंद्र सरकार को 10 श्मशान घाटों को हटाकर इनकी जगह पप्रदूषण रहित श्मशान घाट बनाने की प्रक्रिया आठ सप्ताह एवं शेष 40 श्मशान घाटों की प्रक्रिया तीन माह में पूरी करने के आदेश दिये हैं।

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इसके साथ ही उत्तराखंड के मुख्य सचिव, नमामि गंगे प्रोजेक्ट के निदेशक प्रवीण कुमार व कानूनी सलाहकार ईश्वर सिंह, उत्तराखंड के महाधिवक्ता, चंडीगढ़ ज्यूडिशियल के निदेशक डा. बलराम के गुप्ता, सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता एमसी मेहता को इनके मानवीय चेहरे की तरह संरक्षण के लिये ‘लोको पैरेंट्स’ यानी कानूनी अभिभावक नियुक्त किया है, और उन्हें इनके संरक्षण व इनकी तय स्थिति को बहाल रखने के लिये एक मानवीय चेहरे की तरह कार्य करने को कहा है। यानी ये अधिकारी गंगा और यमुना के जीवित मानव का दर्जे को बरकरार रखने तथा इन नदियों के स्वास्थ्य और कुशलता को बढावा देने के लिये बाध्य होंगे। वहीं उत्तराखंड के मुख्य सचिव को प्रदेश के नदियों, झीलों व ग्लेशियरों आदि के शहरों, कस्बों व गांवों के सात या अधिक जन सामान्य के प्रतिनिधियों को चुनने की अनुमति दी है।

तो ‘ओ माई गॉड’ फिल्म की तरह इनके विरुद्ध भी दर्ज हो सकेंगे मुकदमे

मां नयना की नगरी नैनीताल में नंदा देवी महोत्सव-2013 के शुभ अवसर पर पर्वत पर उभरी पर्वत पुत्री माता नंदा की पर्वताकार प्रतिकृति…

नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने जिस तरह गंगा और यमुना के बाद अब अन्य प्राकृतिक चीजों को भी कानूनी तौर पर जीवित व्यक्ति माना है और इन्हें एक जीवित व्यक्ति के मौलिक अधिकारों के साथ ही एक जीवित व्यक्ति के कर्तव्यों के साथ ही दायित्व व जिम्मेदारियां भी दी हैं। आदेश में साफ कहा गया है कि उपरोक्त के द्वारा अन्य को पहुंचाये जाने वाले घाव, चोट या नुकसान पहुंचाने को एक जीवित मनुष्य की तरह ही माना जायेगा। उल्लेखनीय है कि बीते दिनों आई एक फिल्म-ओ माई गॉड में फिल्म का नायक भूकंप में अपनी दुकान नष्ट हो जाने पर अदालत के माध्यम से ईश्वर के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करवाता है। उल्लेखनीय है कि भारतीय मिथकों में भी प्रकृति के विविध अंगों नदी-नालों, पर्वतों, जंगलों आदि को जीवित महामानवों या ईश्वरों की तरह माना जाता है। उनका संरक्षण किया जाता है, उनसे अच्छा करने की प्रार्थना की जाती है, और कई बार बुरा होने पर उन्हें ही इसके लिये दोषी भी ठहराया जाता है।

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