आपातकाल के लोकतंत्र सेनानी: देर से ली गयी सुध, लाभ मिलना मुश्किल


Loktantra Senaniनवीन जोशी, नैनीताल। लगता है कि उत्तराखंड सरकार ने 1975-77 के दौर में लगे आपातकाल के दौर में जेलों में ठूंस दिये गये ‘लोकतंत्र सेनानियों’ की सुध लेने में देर कर दी है। कमोबेश बिना कारण झेली गयी उन भयावह यातनाओं को चार दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद उत्तराखंड सरकार ने ‘लोकतंत्र सेनानियों’ को प्रतिमाह 16 हजार रुपये की पेंशन देने की घोषणा की है, किंतु यह लाभ लेने के लिये या तो सेनानी जीवित ही नहीं बचे हैं, या उस ठौर पर नहीं हैं, जहां उन्हें ढूंढा जा सके।

उल्लेखनीय है कि 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 के बीच देश में लगे आपातकाल के दौर में देश भर के साथ उत्तराखंड राज्य के लोगों को भी तत्कालीन इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार के आंखों में वैचारिक तौर पर खटकने भर से जेलों में ठूंस दिया गया था। इधर राज्य सरकार ने आपातकाल के दौरान डीआईआर से इतर मीसा में जेल गये ‘लोकतंत्र सेनानियों’ को प्रतिमाह 16 हजार रुपये की पेंशन देने की घोषणा की है। इस पर नैनीताल जनपद में ऐसे लोगों की पड़ताल की गयी, तो तत्कालीन नैनीताल जिले के कुल 10 लोगों की पहचान हुई, जिनमें से पांच लोग वर्तमान में भी नैनीताल जिले और शेष पांच अब झ धम सिंह नगर के हिस्से के निवासी हैं। सरकारी रिपोर्टों के अनुसा नैनीताल जिले के मौजूदा निवासी बताये गये पांच में से तीन की मृत्यु हो चुकी है, जबकि शेष दो अपने पतों पर मिल नहीं पाये हैं। लिहाजा नैनीताल जनपद से किसी भी लोकतंत्र सेनानी को पेंशन का लाभ मिलने पर फिलहाल संदेह है। पूछे जाने पर डीएम दीपेंद्र कुमार चौधरी ने कहा कि वे एक बार पुनः संबंधित व्यक्तियों की पड़ताल करवाने का प्रयास करेंगे।

नैनीताल जनपद के यह 10 हैं लोकतंत्र सेनानी

नैनीताल। नैनीताल जनपद के पांच लोग-नवाब जान पुत्र नबी जान निवासी बनभूलपुरा हल्द्वानी, संतोष सिंह पुत्र देवीदयाल निवासी धर्मपुर हल्द्वानी, निर्मल सिंह पुत्र चंदन सिंह निवासी हल्द्वानी, जोगेंद्र कुमार पुत्र सीता राम व शिवशंकर पुत्र होदी लाल निवासी बरेली रोड वर्तमान में भी नैनीताल जिले के निवासी हैं। अलबत्ता इनमें से निर्मल सिंह के पते में जहां केवल थाना एवं स्थान हल्द्वानी लिखा होने की वजह से पता अस्पष्ट है, वहीं शिव शंकर नाम के व्यक्ति बरेली रोड हल्द्वानी में मिल नहीं पाये हैं, जबकि एलआईयू एवं राजस्व पुलिस की रिपोर्टों के अनुसार अन्य तीन लोगों की मृत्यु हो गयी है। वहीं तत्कालीन नैनीताल जनपद के शेष अन्य पांच लोग-सुभाष चर्तुवेदी पुत्र राधे श्याम निवासी खेड़ा रुद्रपुर, अजीत सिंह पुत्र मान सिंह निवासी बन्ना खेड़ा बाजपुर, सुरजीत सिंह पुत्र पूरन सिंह निवासी रोशनपुर गदरपुर, दीवान सिंह पुत्र धान सिंह निवासी मनाउ पाडला खटीमा अब नैनीताल जनपद से अलग हो चुके ऊधम सिंह नगर जनपद के हैं। उनके बारे में ऊधम सिंह नगर जिला प्रशासन पड़ताल कर रहा है।

कोश्यारी, त्रिपाठी, शर्मा सहित उत्तराखंड के 325 सेनानी गये आपातकाल में जेल

नैनीताल। भारतीय लोकतंत्र के इस सर्वाधिक काले इतिहास की भेंट चढ़ने वालों में उत्तराखंड के 325 लोगों को डीआईआर यानी ‘डिफेंस इंडिया रूल्स’ एवं मीसा यानी ‘मेन्टीनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट’ के जेलों में ठूंसा गया। इनमें पूर्व मुख्यमंत्री व मौजूदा नैनीताल ऊधम सिंह नगर संसदीय सीट से सांसद भगत सिंह कोश्यारी, पूर्व विधायक अधिवक्ता गोविंद सिंह, भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष पूरन चंद्र शर्मा, उत्तराखंड क्रांति दल के संस्थापक सदस्य व विधायक विपिन चंद्र त्रिपाठी जैसे वरिष्ठ नेता भी शामिल रहे।

सर्वाधिक 116 सेनानी ठूंसे गये हल्द्वानी जेल में

नैनीताल। आपातकाल के दौरान उत्तराखंड के जिन 325 लोगों को जेलों में ठूंसा गया, उनमें से सर्वाधिक 116 को नैनीताल जिले के हल्द्वानी उप कारागार में, 81 को नैनीताल जिला कारागार में, 52 को देहरादून की जेल में, 39 को अल्मोड़ा जिला जेल में, 29 को रुड़की जेल में और चार को टिहरी जेल में डाला गया।

आपातकाल-संदर्भ :

समग्र क्रान्ति का सपना अधूरा है : नानाजी देशमुख

इमरजंसी का सन्दर्भ दो नजरियों से माना जाता है। एक ? दृष्टि यह थी कि 12 जून को इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आया था उसके बाद इन्दिरा गांधी को प्रधानमन्त्री पद से इस्तीफा दे देना चाहिए, मगर उन्होने दिया नहीं। जब देश मे उनके इस्तीफे की आवाज उठने लगी तो उन्हे उसे कुचलना ही था। हाईकोर्ट के फैसले के अगले दिन याने 13 जून को ज़्यादातर विरोधी दलों के बड़े नेता दिल्ली से बाहर थे, अपनी-अपनी बैठको में। मे उस दिन दिल्ली में था। पहल कर पीलू मोदी (स्वतंत्र पार्टी), सिकन्दर बख़्त(संगठन कांग्रेस) और रविराय (सपा) से मिलने गया। मैंने तीनों से कहा की मामला गड़बड़ हो गया है। इन्दिरा गांधी इस्तीफा नहीं दे रही हैं। लगता है देश में तानाशाही आएगी। हमने इन्दिरा गांधी के इस्तीफे की मांग के लिए राष्ट्रपति भवन में धरने का निर्णय लिया। राष्ट्रपति तब कश्मीर में थे फिर भी हमने एक तरफ तो धरना शुरू कर दिया दूसरी तरफ प्रमुख विपक्षी नेताओं को तार भेजकर तुरंत दिल्ली पहुँचने को कहा। वे 15 जून को वहाँ पहूंचे। मोरारजी देसाई की अध्यक्षता में सर्वदलीय बैठक हुई । तानाशाही का रास्ता साफ दिख रहा था। इसी बैठक में एक संघर्ष समिति बनी। मुझे महासचिव बनाया गया। अशोक मेहता इसके कोषाध्यक्ष थे।
इमरजंसी लगने की जानकारी मुझे 25 जून को रात में साढ़े नौ बजे ही लग चुकी थी । दूसरों को शायद यह खबर नहीं थी। मुझे मेरे सूत्रो ने यह भी बता दिया था कि इमरजंसी की घोषणा आधी रात को होगी और उसके बाद सभी बड़े विपक्षी नेताओ को गिरफ्तार कर लिया जाएगा। चूंकि में संघर्ष समिति का महासचिव था सो मुझे गिरफ्तारी से बचना ही था। मै रात मै ही एक परिचित के घर जा छिपा। मैंने रात में ही सुब्रमण्यम स्वामी को जेपी के पास भेजा। यह बताने कि इमरजंसी लागू होने वाली है। और उन्हे गिरफ्तार किया जाएगा। लेकिन तब जेपी को मेरी बात का यकीन नहीं हुआ। वे मानते थे कि उन्हे गिरफ्तार किया गया तो देश में आग लग जाएगी। मैंने भूमिगत रहकर देश भर का दौरा किया । कार्यकर्ताओ से छिपकर मिलता रहा। और इमरजंसी के खिलाफ संघर्ष जारी रखा। मुझे पूरा यकीन था कि इमरजंसी स्थायी नहीं है। कार्यकर्ताओ से भी मै यही कहता था कि घबराने कि जरूरत नहीं है। लेकिन 18 अगस्त को दिल्ली मे मुझे पकड़ लिया गया। कुछ दिन दिल्ली कि जेल मे रखने के बाद फिर अंबाला भेज दिया गया। दिल्ली मे ही चौधरी चरण सिंह और प्रकाश सिंह बादल भी थे। चौधरी काफी घबराए हुए थे । उन्हे आशंका थी कि इन्दिरा गांधी उनके समेत तमाम विरोधियों को एक कतार में खड़ा कर गोली से उड़वा देगी। लेकिन मैंने उन्हे हिम्मत बंधाई।
इमरजंसी का इस तरह एक संदर्भ तो इसके खिलाफ संघर्ष था। दूसरा संदर्भ बिहार आंदोलन है। जेपी ने इस आंदोलन को समग्र क्रान्ति नाम दिया था जो बाद में इमरजंसी से जुड़ गया। जेल मे रहकर ही मुझे ख्याल आया कि इन्दिरा गांधी की तानाशाही के मुक़ाबले के लिए सभी दलों को एक साथ आना चाहिए। मैंने सबको तैयार किया और यह भी कि इसका नेतृत्व जेपी करेंगे तभी चल पायेगा। शुरू मे जेपी इन्दिरा गांधी के खिलाफ आंदोलन को राजी नहीं थे, यह इमरजंसी से पहले का संदर्भ है। वे इन्दिरा को अपनी बेटी मानते थे मगर भुवनेश्वर में जब पत्थर इन्दिरा गांधी कि नाक पर लगा और वहीं उन्होने नाम लिए बिना जयप्रकाश नारायण को पूँजीपतियों का हिमायती कह कर हमला किया तो जेपी की आँख खुली। जेपी मुझ पर समाजवादियों से ज्यादा भरोसा करने लगे थे।
जहां तक इमरजंसी की स्मृति का सवाल है, वह मेरे मानस पटल पर स्थायी है मगर दुख के साथ। असली दुख यह भी है कि इमरजंसी के बाद जो सरकार आई वह चल नहीं पाई। समग्र क्रान्ति कि बात धरी रह गई। नेता सत्ता के लिए लड़ने लगे। झगड़ा तो प्रधानमंत्री पद को लेकर सरकार बनते ही सामने आ गया था। मोरारजी देसाई, जगजीवन राम और चरण सिंह तीनों ही इच्छुक थे। इसलिए मैंने कहा था कि 60 वर्ष की आयु होते ही राजनीतिकों को सक्रिय राजनीति से अलग हो जाना चाइए। मै खुद भी अलग हो गया था, मगर किसी पर मेरी बात का असर नहीं हुआ।
इमरजंसी की दुखद स्मृति यही है कि हमने जिस उद्देश्य के लिए आंदोलन किया और कष्ट सहे, उसे सत्ता के लिए भुला दिया। सत्ता के लिए आपस मे लड़ने लगे। इमरजंसी की सुखद स्मृति तो खैर हो ही नहीं सकती। इमरजंसी किसी भी रूप मे अच्छी थी, ऐसी मेरी धारणा कभी नहीं रही न ऐसी धारणा रखने वालो से मेरी कोई सहमति हो सकती है। मैंने मोरारजी देसाई को पत्र लिखकर सुझाव दिया था कि वे प्रधानमंत्री पद छोड़ दें मगर वे नहीं माने। आखिर उन्हें हटाया गया।
मैं जनता पार्टी की सरकार बनने के अध्याय को दूसरी आजादी नहीं मानता। आजादी तब होती अगर जनता पार्टी के लोग मिलजुल कर ईमानदारी से सरकार चलाते। मगर सत्ता के लिए आज भी लोग आपस में लड़ रहें है। इसलिए देश में अस्थिरता है। इमरजंसी का सबक मेरी राय में यहीं है कि सत्ता के लिए अनीति अख़्तियार नहीं करनी चाइए। आखिर इमरजंसी हटते ही इन्दिरा गांधी को भी हटना पड़ा, मगर अफसोस की बात है। कि सत्ता के उसी फेर में सब अभी भी उसी तरह फसें है। इमरजंसी का एक सबक यह भी है कि सत्ता को तरजीह नहीं दी जानी चाहिए। जहां तक इमरजंसी के फिर कभी लागू होने कि आशंका का सवाल, जो सरकार खुद अस्थिर हो, वह कभी इमरजंसी नहीं लगा सकती। यह अधिनायकवादी कदम मजबूत सरकार ही उठा सकती है। (साभार- क्रान्ति पथ)

विश्वमानवता के विकास की दिशा में मील का पत्थर था भूमिगत आंदोलन : अटल बिहारी वाजपेयी

”आपातस्थिति में जो भूमिगत आंदोलन चला, उसकी तुलना अफ्रीकी देशों, वियतनाम या बोलिविया अथवा और कहीं के भूमिगत गोरिल्ला संघर्षों से नहीं की जा सकती है। इसका सबसे बड़ा कारण है भारतीय भूमिगत आंदोलन का अहिंसक होना। जहाँ पूर्वोक्त क्रांतिकारियों की दार्शनिक प्रेरणा कहीं मार्क्स से जुड़ी थी, वहाँ भारत के इस भूमिगत आंदोलन की दार्शनिक प्रेरणा गांधी और जयप्रकाश की थी। एक अर्थ मे यह गांधीवादी संघर्ष सत्याग्रह तथा असहयोग की तकनीक का अगला विस्तार था। अहिंसक युद्ध के नये अवाम का आविष्कार था अहिंसक क्रान्ति होना इसकी नियति ही नहीं थी, बल्कि मानवमात्र के लिए पाशविक संघर्ष से शिष्ट संघर्ष की और बढ़ने के प्रयोगसिद्ध विकल्प की खोज भी थी।
……. इस अर्थ मे भारत के भूमिगत आंदोलन के परिणाम, मानवीय गरिमा, लोकतंत्र की सफलता, साम्राज्यवाद के अन्मूलन, दासता और शोषण के नये-पुराने रूपों को पराजित करने की जद्दोज़हद और समतामय विश्वमानवता के विकास की दिशा में मील का नया पत्थर है।” (साभार- क्रान्ति पथ)

दुनिया का सबसे बड़ा भूमिगत आंदोलन : दीनानाथ मिश्र

क्रान्तिकारी संख्याबल में बहुत कम होते हैं, और जनता उनसे मानसिक रूप से जुड़ी नहीं होती। किन्तु यहाँ संघर्ष से जुड़े कार्यकर्ताओं की संख्या लाखों में थी और आम जनता मानसिक रूप से भूमिगत कार्यकर्ताओं से सहानुभूति का अनुभव करती थी।प्रायः भूमिगत आंदोलन किसी न किसी विदेशी सरकार की मदद पर चलते है, पर भारत का यह भूमिगत आंदोलन सिर्फ स्वदेशी शक्त, साधन प्रेरणा से चलता रहा। मानवीय शक्ति और समर्थन के पैमाने पर भारत का भूमिगत आन्दोलन दुनिया का सबसे बड़ा भूमिगत आन्दोलन था।”

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