उत्तराखंड में सरकार करेगी ‘विभाग बंदी’ ! एकीकरण होगा चुनौतीपूर्ण


उत्तराखंड की भाजपा सरकार भी कुछ-कुछ ‘नोट बंदी’ या ‘जीएसटी’ लागू करने सरीखा, आत्मघाती भी साबित हो सकने वाला, समान प्रकृति के विभागों के एकीकरण- आपस में विलय का ‘विभाग बंदी’ जैसा फैसला करने की तैयारी में है। इस फैसले के लागू होने के बाद उत्तराखंड के 101 विभाग घटकर आधे या एक तिहाई रह सकते हैं……।

विभागीय एकीकरणः सरकार के लिये सर्वमान्य फॉर्मूला निकालना चुनौती

New Doc 2017-07-20_1-पद एवं वेतनमान की बड़े स्तर पर हैं विभागों-निगमों में विसंगतियां
नवीन जोशी, नैनीताल। प्रदेश सरकार की केंद्र सरकार की तर्ज पर राज्य के 100 से अधिक विभागों को 31 में सिमटाने और केएमवीएन-जीएमवीएन व पर्यटन विकास परिषद, तथा जल संस्थान व पेयजल निगम, उद्यान और कृषि एवं सिंचाई, लघु सिंचाई व जलागम आदि समान प्रकृति के कार्यों वाले निगमों व विभागों के एकीकरण से लाभ जाने कितना हो, किंतु तात्कालिक तौर पर यह कदम पहले ही सातवें वेतन आयोग के बड़े बोझ तले दबे व बाजार से कर्ज लेकर कार्मिकों को वेतन देने को मजबूर राज्य सरकार के लिये आर्थिक बोझ बढ़ाने वाला हो सकता है। कारण, अलग-अलग विभागों के कार्मिकों के वेतनमानों में बड़ी विसंगतियां हैं। ऐसे में सही-गलत किसी भी तरह से लाभ में चल रहे कार्मिक तो कभी भी निचले पद या वेतनमान स्वीकार नहीं करेंगे, अलबत्ता निचले पदों या वेतनमान पर कार्यरत कार्मिक जरूर एकीकृत विभाग या निगम में आने पर समान पद व वेतनमान के लिये अड़ेंगे। विभागों में कार्मिकों की सेवा शर्तों, विभागीय ढांचा होने या न होने, स्थानांतरण नीति अलग-अलग होने तथा एसीपी के भुगतान आदि के मसले भी एकीकरण की राह में बाधा हैं। अन्यथा सरकार जिस बड़े स्तर पर एकीकरण की पहल शुरू कर रही है, ऐसे में राज्य लंबे कर्मचारी आंदोलनों की राह पर भी जा सकता है। ऐसे में सरकार के लिये सर्वमान्य फॉर्मूला निकालना बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने एकीकरण के बाबत अपने इरादे स्पष्ट कर चुके हैं। सरकार का मानना है कि एक जैसे विभागों के ही अलग-अलग होने से कई बार भ्रम की स्थितियां रहती हैं। उदाहरण के लिये उत्तराखंड में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिये विभिन्न पर्यटन मेलों में राज्य से केएमवीएम, जीएमवीएन व पर्यटन विकास परिषद यानी तीन इकाइयां जाती हैं। तीनों के अलग-अलग ब्रोशरों से समझाने से सैलानी व पर्यटन उद्यमी भी भ्रमित होते हैं, वहीं मुख्यमंत्री की मानें तो इससे राज्य के बजट का बड़ा हिस्सा गैर योजनागत मदों में भी चला जाता है। खरबों रुपये के कर्ज से दबा राज्य वैसे ही बड़े आर्थिक संकट में है। वहीं विभागीय कर्मी अपने हितों को लेकर सशंकित हो आंदोलन की राह पकड़ रहे हैं। संयुक्त उद्यान कार्मिक मोर्चा के संयोजक कमल जोशी का कहना है कि विभागों में कार्मिकों के 50 फीसद से अधिक पद पहले से रिक्त हैं, ऐसे में एकीकरण से सरकार को दीर्घकाल में कार्मिकों की छंटनी से भी कोई लाभ होने वाला नहीं है, अलबत्ता सरकार पर्वतीय राज्य में उद्यानिकी में बेहतरी की संभावनाएं खो देंगे। उद्यान कर्मी कृषि क्षेत्र का कोई अनुभव नहीं होने की वजह से वहां भी अपनी उपयोगिता नहीं दे पायेंगे। उधर केएमवीएन के कर्मचारी एकीकरण के बहुत खिलाफ भी नहीं हैं। कई कर्मचारियों ने बताया कि राज्य मुख्यालय से दूरी की वजह से केएमवीएन में काफी समस्याएं हैं, जबकि जीएमवीएन में उनके समकक्ष कर्मी वरिष्ठ पदों पर कार्य कर रहे हैं। यदि एकीकरण से उन्हें भी जीएमवीएन कर्मियों के समकक्ष खड़ा कर दिया जाता है, तो उन्हें एकीकरण से परेशानी नहीं है। लेकिन वे जानते हैं कि ऐसा करना सरकार के लिये आसान नहीं होगा, इसलिये वे आशंकित हैं। केएमवीएन-जीएमवीएन कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष दिनेश गुरुरानी का कहना है कि दोनों निगमों की वेतन विसंगतियां दूर हो जाये ंतो महासंघ विलय के लिये तैयार है। ऐसे में सरकार के एकीकरण के प्रयास शुरू होने के साथ ही उद्यान एवं कृषि विभाग के कार्मिक संयुक्त मोर्चा बनाकर आंदोलन की राह पकड़ चुके हैं। जल निगम एवं जल संस्थान के कार्मिक पूर्व से चल रहे ऐसे प्रयासों के तहत पहले से लामबंद हैं, वहीं केएमवीएन यानी कुमाऊं मंडल विकास निगम और जीएमवीएन यानी गढ़वाल मंडल विकास निगम के कर्मचारी भी दबाव बनाने को आंदोलन का मन बना रहे हैं। केएमवीएन के संयुक्त कर्मचारी परिषद ने निगम के एमडी को ज्ञापन सोंपकर दोनों निगमों के एकीकरण से पूर्व उनके हितों को ध्यान में रखने की एक तरह से चेतावनी दे डाली है।

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