पूरे एक गांव को कर दिया वोटर लिस्ट से बाहर, एसडीएम को हाईकोर्ट ने सोमवार को किया तलब


नवीन समाचार, नैनीताल, 26 सितंबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय में हल्द्वानी तहसील के ग्राम देवला तल्ला जाला निवासियों को पंचायत चुनाव में वोटर लिस्ट से बाहर करने के मामले में जनहित याचिका दायर की गयी है। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकलपीठ ने एसडीएम हल्द्वानी को सोमवार को व्यक्तिगत तौर पर कोर्ट में उपस्थित होने और यह बताने को कहा है कि डीएम व चुनाव आयोग के आदेश के बाद भी पूरे गांव को वोटर लिस्ट से क्यों हटाया गया।

उल्लेखनीय है कि हल्द्वानी के ग्राम देवला तल्ला जाला के गोपाल राम व अन्य ने इस मामले में हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। इसमें कहा है कि याचीगण व अन्य इस गांव में पिछले 60 सालों से रह रहे हैं। इससे पहले हर चुनाव में वोट देते आये हैं। 2014 के पंचायात चुनाव में गांव के लोगों ने मताधिकार का उपयोग किया था। लेकिन इस बार उनके गांव को वोटर लिस्ट से बाहर कर दिया गया है। प्रभावित ग्रामीणों ने डीएम नैनीताल व राज्य चुनाव आयोग से इसकी शिकायत की। दोनों की ओर से एसडीएम को ग्रामीणों को वोटर लिस्ट में शामिल करने के निर्देश दिए गए लेकिन एसडीएम ने इन निर्देशों का भी पालन नहीं किया है। गांव में 70 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जाति की है। एसडीएम की यह कार्रवाई सवर्ण जाति के उम्मीदवार को इसका लाभ पहुंचाने को कोशिश लगती है। एकलपीठ ने याचिका पर सुनवाई शुरू करते हुए एसडीएम को सोमवार को तलब किया है।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 25 सितंबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने जिला पंचायत व क्षेत्र पंचायत के चुनाव लड़ने के इच्छुक दो से अधिक बच्चों के माता-पिता को फिर झटका दिया है। अल्मोड़ा के पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष मोहन सिंह मेहरा की याचिका पर बुधवार को सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने एक बार पुनः राज्य सरकार द्वारा ‘जिला पंचायत और क्षेत्र पंचायत के सदस्य पद के लिए दो से अधिक बच्चे को लेकर लगाई गई पाबंदी’ पर रोक लगाने से इंकार कर दिया है, और राज्य सरकार को जवाब देने के लिए चार सप्ताह का समय दे दिया है। इस प्रकार जिला पंचायत व क्षेत्र पंचायत के चुनाव लड़ने के इच्छुक दो से अधिक बच्चों के माता-पिताओं के मामले में उत्तराखंड उच्च न्यायालय से करीब-करीब स्थिति साफ हो गई है कि वे चुनाव नहीं लड़ पाएंगे।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 24 सितंबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन और न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की संयुक्त खंडपीठ ने जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुख के पदों पर सीधे जनता से चुनाव कराने की देहरादून निवासी विपुल जैन की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया है।
यचिका में कहा गया है कि प्रदेश के त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुख का चुनाव निर्वाचित सदस्य करते हैं। जबकि अन्य पदों पर सीधे चुनाव होता है। अप्रत्यक्ष चुनाव के चलते जिला पंचायत सदस्य और बीडीसी सदस्यों की बकायदा बोली लगती है। सदस्यों को प्रलोभन देने के लिए देश विदेश की यात्रा तक कराई जाती है। कई बार अपने पक्ष में करने के लिए सदस्यों के अपहरण तक की शिकायत सामने आई हैं। यह चुनाव कानून व्यवस्था बनाये रखने में पुलिस के लिए परेशानी का कारण बनता है। राजनीतिक दबाव के चलते कई मामले रफा दफा कर दिए जाते हैं। याचिका में इन पदों में भी सीधे चुनाव के आदेश पारित करने की मांग की गई है। इधर पिछली सुनवाई में अदालत ने सरकार व चुनाव आयोग से इस मामले में जवाब मांगा था।

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नवीन समाचार, नई दिल्ली, 23 सितम्बर 2019। उत्तराखंड में पंचायत चुनाव में दो से अधिक बच्चों वाले उम्मीदवारों के नामांकन को अयोग्य घोषित करने के फैसले पर उत्तराखंड सरकार को सुप्रीम कोर्ट से करारा झटका लगा है। उत्तराखंड सरकार के फैसले पर उत्तराखंड हाई कोर्ट के स्टे आदेश पर रोक लगाने से सुप्रीम कोर्ट ने इनकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि पांच अक्टूबर को होने वाले चुनाव में कोर्ट दखल नहीं देगा। अलबत्ता, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता रहे पक्षकारों को भी नोटिस जारी किया है।

पंचायत चुनाव में दो से अधिक बच्चों वाले उम्मीदवारों को अयोग्य घोषित करने वाले पंचायती राज संशोधन एक्ट को हाई कोर्ट से रद्द करने के मामले में उत्तराखंड सरकार ने कहा था कि यह राष्ट्रहित में नहीं होगा कि दो से ज्यादा बच्चों वाले उम्मीदवार चुनाव लड़ें। सरकार ने उत्तराखंड हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने साफ किया था कि इस संशोधन को लागू करने की कट ऑफ डेट 25 जुलाई 2019 होगी। मतलब इस तारीख के बाद दो से अधिक बच्चे वाले प्रत्याशी पंचायत चुनाव लड़ने के अयोग्य माने जाएंगे, जबकि 25 जुलाई 2019 से पहले जिसके तीन बच्चे हैं, वह चुनाव लड़ सकते हैं।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 5 सितंबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकल पीठ ने प्रदेश में आयोजित होने जा रहे त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में सीटों के आरक्षण एवं परिसीमन के मामले में पंचायती राज के निदेशक को दो सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ताओं का पक्ष सुनने एवं निर्णय लेने पर विस्तृत कारण देने के आदेश सुनाए हैं।
मामले के अनुसार डोईवाला देहरादून निवासी संजय पोखरियाल ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि देहरादून जिले की जिला पंचायत सीटों के मामले में उनका पक्ष सुने बिना ही परिसीमन एवं आरक्षण जारी कर दिया गया है। याचिकाकर्ता का कहना था कि देहरादून जिले की हरिपुर कला, साहब नगर व खदरी खड़क माप जिला पंचायत सीटों के परिसीमन व आरक्षण पर आपत्ति जताई कि पक्ष नहीं सुना गया। पहले हरिपुर कला अनारक्षित थी, जबकि साहब नगर एवं खदरी खड़क माप को महिलाओं के लिए आरक्षित किया गया था, किंतु बाद में दबाव में आकर खदरी खड़क माप को अनारक्षित तथा हरिपुर कला को महिलाओं हेतु आरक्षित कर दिया। जबकि हरिपुर कला 2003 में महिला, 2008 में अनारक्षित एवं 2014 में महिला के लिए आरक्षित थी। बताया गया है कि उत्तरकाशी सहित कुछ अन्य मामलों में भी एकल पीठ ने यही आदेश जारी किये हैं।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 21 अगस्त 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने प्रदेश के बहुचर्चित, शक्तिगढ़ (शक्तिफार्म) नगर पंचायत में हुए बहुचर्चित राजीव आवास घोटाला मामले में भाजपा नेता सहित 17 दोषियों से योजना के तहत राजकोष को पहुंचाये गये नुकसान की वसूली करने एवं उनके विरुद्ध मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिये हैं, साथ ही प्रदेश के मुख्य सचिव एवं ऊधमसिंह नगर जिले के डीएम से मामले में 15 दिन के भीतर खंडपीठ के समक्ष कृत कार्रवाई की पूरी रिपोर्ट का काउंटर दाखिल करने के आदेश दिये हैं। मामले में आधे घंटे तक चली बहस में न्यायालय ने यह भी कहा कि गरीबों का पैंसा अमीरों में बांटने के लिए नहीं है।
उल्लेखनीय है कि मामले में वर्ष 2016 से सक्रिय याचिकाकर्ता रमेश राय की याचिका पर आये उच्च न्यायालय के आदेशों पर ऊधमसिंह नगर के डीएम द्वारा कराई गयी जांच में शक्तिगढ़ नगर पंचायत के तत्कालीन अध्यक्ष भाजपा नेता सुक्रांत ब्रह्म, दो सभासद उमेद सिंह व शगुन गुप्ता के साथ ही पूर्व अधिशासी अधिकारी जयवीर राठी व मौजूदा अधिशासी अधिकारी सरिता राणा तथा मौजूदा अवर अभियंता रावेंद्र पाल सिंह सहित कुल 17 लोग दोषी पाये गये थे। इधर श्री राय एवं प्रेम कुमार अरोऱा द्वारा मामले में पुनः उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर कहा गया कि डीएम द्वारा जांच रिपोर्ट न्यायालय एवं शासन को भेजने के बावजूद न ही दोषियों के खिलाफ पुलिस में कोई आपराधिक मामला दर्ज किया गया, न योजना के तहत आवास प्राप्त करने वाले अपात्रों से कोई रिकवरी की गयी, और न कार्यरत अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों के खिलाफ कोई प्रशासनिक व विभागीय कार्रवाई ही की गयी। याचिकाकर्ता के अनुसार पूर्व में उन्होंने 18 जुलाई 2016 को क्षेत्र के एसडीएम एवं ऊधमसिंह नगर के डीएम को ज्ञापन सोंपकर राजीव आवास योजना में अनेक अनियमितताएं होने के आरोप लगाये थे। उनका कहना था कि इस योजना के तहत 3.68 लाख रुपयों से टाइप ए एवं 3.88 लाख रुपयों से टाइप बी के कुल 504 राजीव आवासों का निर्माण होना था। योजना के नियमों के तहत नगर पंचायत के निर्वाचित सदस्यों के रक्त संबंध वाले संबंधियों को भी योजना का लाभ नहीं दिया जा सकता है, और योजना के तहत भवनों का निर्माण स्वयं लााभार्थियों को अपना 10 फीसद अंश लगाकर निर्माण करना था। किंतु शक्तिगढ़ नगर पंचायत के चार में से दो सभासदों ने भी योजना के तहत आवास ले लिये। यही नहीं निर्माण लाभार्थियों के बजाय बिना निविदा कराये ठेकेदार से करवा दिये। निर्माण कार्य भी इतने घटिया हुए कि इनके लिंटर ढहने और फर्श व बुनियाद बैठ गयी हैं।

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-हाईकोर्ट ने बिजली विभाग के खिलाफ याचिका पर याचिकाकर्ता से प्रतिशपथ पत्र मांगा
नवीन समाचार, नैनीताल, 13 अगस्त 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने बिजली विभाग के कर्मचारियों से बिजली बिलों का भुगतान न्यूनतम लिये जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर याचिकाकर्ता से दस दिन के भीतर प्रति शपथपत्र पेश करने को कहा है। ऐसा यूपीसीएल द्वारा आरोपों को नकारने के बाद किया गया है।
उल्लेखनीय है कि कि आरटीआई क्लब उत्तराखंड ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दाखिल कर राज्य में बिजली की दरों में लगातार की जा रही वृद्धि को चुनौती दी है। कहा है कि विभाग ने अपने छोटे-बड़े अधिकारियों का चाहे जितनी बिजली खर्च करें, 100 से 500 रुपये महीना बिल फिक्स कर दिया है। इतना ही नहीं विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों के घरों में या तो मीटर हैं ही नहीं, या खराब पड़ें हैं। याचिका में यह भी कहा गया है कि यूपीसीएल के जीएम ने एक महीने में 92,000 यूनिट बिजली खर्च की जिसका बिल एक लाख से ऊपर था लेकिन इसके एवज में उन्होंने सिर्फ 425 रुपये ही जमा किए। इस तरह बिजली विभाग के अधिकारियों-कर्मचारियों के द्वारा मुफ्त के भाव खर्च की जा रही बिजली का पैसा भी जनता से लिया जा रहा है, लिहाजा इस तरह के फर्जीवाड़े और बिजली घोटाले को बंद किया जाए। वहीं मंगलवार को यूपीसीएल के द्वारा विस्तृत जवाब पेश करने की जगह शपथ पत्र के जरिये छोटा जवाब पेश कर जनहित याचिका में उठाये गए सभी बिंदुओं को निराधार करार दिया। इसके जवाब में याचिकाकर्ता ने कहा कि उन्होंने जिन बिंदुओं पर जनहित याचिका दायर की है, वे आंकड़े उन्हें विभाग ने आरटीआई में दिए हैं। याचिका में करीब तीन सौ कर्मचारियों के बिल लगाये हैं जो न्यूनतम बिल भुगतान करते हैं जबकि उनका महीने का बिल हजारों रूपये में आता है।

हाईकोर्ट ने उर्दू शिक्षक मामले में शिक्षा विभाग से फिर से जवाब मांगा….

नवीन समाचार, नैनीताल, 6 अगस्त 2019। हाईकोर्ट ने उर्दू शिक्षक मामले में विभाग से फिर से जवाब मांगा है। न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई की। सरकारी स्कूल में उर्दू शिक्षक हर गोविंद सिंह ने इस मामले में हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इसमें कहा था कि 17 साल की सेवा के बाद उसे प्रमाण पत्रों में गड़बड़ी के नाम पर बाहर कर दिया गया है। अदालत ने इस मामले में सुनवाई करते हुए सरकार के 30 नवंबर 17 के आदेश पर रोक लगा दी थी और विभाग से उर्दू शिक्षकों की तैनाती को लेकर प्रदेश में चल रही व्यवस्था का पूरा ब्योरा तलब किया था। आदलत ने अदीब, अदीब-ए-माहिर और अदीब-ए-कामिल योग्यता को लेकर पूरी जानकारी तलब की थी। इन योग्यताओं की हाईस्कूल, इंटरमीडिएट और स्नातक तुलनात्मक विवरण तलब किया था। इधर शिक्षा सचिव आर मीनाक्षी सुंदरम व निदेशक माध्यमिक आरके कुंवर सहित शिक्षा विभाग के अधिकारी मंगलवार को हाईकोर्ट में पेश हुए। 16 मार्च 2018 को दिए आदेश के बाद विभाग ने शपथ पत्र के माध्यम से अपना जवाब पेश किया, लेकिन अदालत जवाब से संतुष्ट नहीं हुई। पिछली सुवनाई के दौरान एकलपीठ ने सचिव सहित अन्य अधिकारियों को व्यक्तिगत तौर पर कोर्ट में उपस्थित होने के निर्देश दिए थे। इधर मंगलवार को अदालत में उपस्थित अधिकारी अदालत को मामले में पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर सके। इस पर अदालत ने फिर से पूरे विवरण के साथ उपस्थित होने के निर्देश दिए हैं। इसके लिए तीन सप्ताह का समय दिया है।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 1 अगस्त 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन की खंडपीठ ने प्रदेश के हरिद्वार जनपद को छोड़कर शेष 12 जिलों में 30 नवम्बर तक त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव कराने के आदेश दिए हैं। वहीं प्रशासकों पर अपने पूर्व के निर्णय को बरकरार रखते हुए प्रशासकों की प्रशासनिक या नीतिगत निर्णय लेने पर बरकरार रखी है। अलबत्ता वे अन्य नियमित कार्य करते रहेंगे। साथ ही हरिद्वार जनपद में अगले वर्ष होने वाले पंचायत चुनावों के बारे में ताकीद की है कि वहां ऐसी स्थित नहीं आनी चाहिए। अगर आती है तो चुनाव आयोग कोर्ट की शरण में आ सकता है। उल्लेखनीय है कि सरकार ने गत दिवस इस बाबत दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पंचायत चुनाव कराने के लिए चार माह का समय मांगा था। इस प्रकार उच्च न्यायालय ने सरकार को इच्छित चार माह का समय दे दिया है।

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चुनाव आयोग को भी हाई कोर्ट से मिली फटकार, प्रशासकों के वित्तीय फैसलों व नीतिगत निर्णयों पर कोर्ट ने लगाईं रोक

नवीन समाचार, नैनीताल, 26 जुलाई 2019। उत्तराखंड सरकार राज्य में पंचायत चुनाव कराने को तैयार नहीं है। सरकार पंचायत चुनाव से पूर्व पंचायत राज अधिनियम में संशोधन करने जा रही है, और अभी चुनाव हेतु आरक्षण की प्रक्रिया भी पूरी नही हो पाई है। इसलिए सरकार की ओर से उत्तराखंड उच्च न्यायालय से पंचायत चुनाव कराने के लिए चार माह का समय मांगा गया है। इसके बाद उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने प्रदेश में तय समय के भीतर पंचायत चुनाव नही कराने के खिलाफ दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए सरकार व राज्य चुनाव आयोग से बुधवार तक जवाब पेश करने को कहा है, और मामले की अगली सुनवाई के लिए बृहस्पतिवार की तिथि नियत कर दी है। न्यायालय ने चुनाव आयोग को भी इस बात को लेकर फटकारा व नाराजगी व्यक्त की कि जब सरकार तय समय सीमा में चुनाव नही करा पा रही है तो चुनाव आयोग न्यायालय में याचिका लेकर क्यों नही आया। वहीं प्रशासकों की नियुक्ति के सम्बन्ध में कोर्ट ने प्रशासकों के वित्तीय फैसलों व नीतिगत निर्णयों पर रोक लगा दी है, अलबत्ता वे अपने दिन-प्रतिदिन के ही कार्य करते रहेंगे।
उल्लेखनीय है कि याचिकाकर्ता नईम अहमद पूर्व ग्राम प्रधान गुलरभोज ऊधम सिंह नगर ने हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि सरकार ने अभी तक पंचायत चुनाव का नोटिफिकेशन जारी नही किया है और प्रशासक नियुक्त कर दिए हैं, जबकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243 ई के तहत दिये संवैधानिक प्राविधान के अनुसार पुरानी कमेटी का कार्यकाल समाप्त होने से पहले नई कमेटी का गठन हो जाना चाहिए। लिहाजा सरकार द्वारा पुराने आदेश का पालन नही करने पर सरकार के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही की जाये।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 23 जुलाई 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की गयी है। उच्च न्यायालय ने याचिका को स्वीकार कर राज्य सरकार को अपना पक्ष रखने को कहा है। याचिकाकर्ता गूलरभोज निवासी पूर्व प्रधान नईम का कहना है कि पूर्व में 2010 में राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय में शपथ पत्र देकर समय पर चुनाव कराने और प्रशासक नियुक्त न करने की बात कही थी। सरकार निकाय चुनाव भी समय पर नहीं करा पाई थी और अब पंचायत चुनाव के लिए भी उसकी कोई तैयारी नहीं है।
जनहित याचिका में कहा गया है कि सरकार नियत समय पर पंचायतों के चुनाव कराने के अपने संवैधानिक कर्तव्य का पालन नहीं कर सकी है, वल्कि सरकार ने चुनाव कराने के बजाय पंचायतों को नियमविरुद्ध प्रशासकों के हवाले कर दिया है। सरकार की चुनाव कराने की कोई तैयारी भी नहीं है। इसका खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ेगा। यह एक बड़ा संवैधानिक संकट भी है। इस आधार पर याचिका में मांग की गई है कि धारा 356 के तहत सरकार को हटाकर राष्ट्रपति शासन लगाया जाए। उल्लेखनीय है कि प्रदेश के पंचायतों का कार्यकाल 15 जुलाई को खत्म हो गया था और उसके बाद से राज्य सरकार की 6 जुलाई की अधिसूचना के तहत पंयाचतों का काम प्रशासक संभाल रहे हैं।

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-पूरी तैयारी के बाद 12वीं के बाद चार साल का इंट्रीग्रेटेड बीएड कोर्स कराने से किया इंकार
नवीन समाचार, नैनीताल, 30 जुलाई 2019। उत्तराखंड में 12वीं के बाद चार साल का इंट्रीग्रेटेड बीएड कोर्स नहीं करवाया जाएगा। राज्य सरकार ने इस मामले में केंद्र की राह से खुद को अलग कर लिया है। राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में कहा कि 2021-22 में इंट्रीग्रेटेड बीएड कोर्स नहीं पढ़ाया जाएगा, लिहाजा किसी कॉलेज को एनओसी देने का सवाल नहीं है। इससे चार वर्षीय बीएड में एडमिशन की उम्मीद पाले युवाओं को बड़ा धक्का लगा है।
उल्लेखनीय है कि इसी वर्ष 20 मई को एनसीटीई यानी नेशनल काउंसिल ऑफ टीचर्स एजुकेशन की ओर से चार वर्षीय बीएड कोर्स को लेकर नोटिफिकेशन जारी किया था। राज्य सरकार ने भी रेगुलर बीएड कोर्स के स्थान पर इंट्रीग्रेटेड बीएड कोर्स लागू करने के लिए तैयार होने की बात कही थी। राज्य सरकार की सहमति के आधार पर ही एनसीटीई ने कोर्स की तैयारी शुरु कर दी गई थी। इसके लिए राज्य सरकार की एनओसी के साथ विश्वविद्यालय, सरकारी व निजी बीएड कॉलेज को तीन जून से 31 जुलाई तक ऑनलाइन आवेदन करना था। लेकिन इधर राज्य में 101 बीएड कॉलेज द्वारा आवेदन के लिए राज्य सरकार से एनओसी देने को प्रार्थना पत्र दिया गया। जब एक सप्ताह में एनओसी नहीं मिली तो साईं शिक्षण संस्थान जसपुर ने याचिका दायर की। इस पर कोर्ट ने सरकार से जवाब तलब कर पूछा कि 48 घंटे में एनओसी देने में देरी क्यों की जा रही है। वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकलपीठ में मामले की सुनवाई के दौरान सरकार ने कोर्ट में दिया बयान दिया कि सरकार ने इस साल इस कोर्स को लागू नहीं करने का फैसला लिया है। लिहाजा किसी कॉलेज को एनओसी देने का सवाल नहीं है।

सड़क चौड़ीकरण के लिए हाईकोर्ट के आदेश का भय दिखाकर भवनों को तोड़ने पर डीएम सहित अन्य अधिकारियों को नोटिस

-याचिका में लगाया गया है उच्च न्यायालय के आदेशों के गलत तरीके से प्रयोग का आरोप
नवीन समाचार, नैनीताल, 7 दिसंबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति शुधांशू धुलिया की एकलपीठ ने ऊधमसिंह नगर के डीएम नीरज खैरवाल, सितारगंज के एसडीएम निर्मल बिष्ट व अधिशाषी अभियंता केके तिलारा को न्यायालय के आदेश का गलत प्रयोग करने पर अवमानना का नोटिस जारी किया है। न्यायालय ने उनसे सुनवाई की अगली तिथि 2 जनवरी तक जवाब पेश करने को कहा है।
मामले के अनुसार सितारगंज निवासी अधिवक्ता दयानंद व 2 अन्य ने उच्च न्यायालय में अवमानना याचिका दायर कर कहा है कि पूर्व में न्यायालय ने रुद्रपुर के रम्पुरा ग्राम सभा के प्रधान मनमोहन सिंह की जनहित याचिका में राज्य में सार्वजनिक स्थानों, गलियो व सड़कों में हुए अतिक्रमण को चिन्हित करने के लिए जिला स्तर पर कमेटियां गठित करने के निर्देश सभी जिला अधिकारियों को दिए थे। इन कमेटियो में राजस्व विभाग के अधिकारियों को भी शामिल करने तथा तीन माह के भीतर पूरे प्रदेश में हुए अतिक्रमण को चिन्हित कर अपनी रिपोर्ट न्यायालय में पेश करने को कहा गया था। साथ ही याचिकाकर्ता को निर्देश दिए थे कि वह सभी जिला अधिकारियो को इसमें पक्षकार बनाए। परंतु ऊधमसिंह नगर प्रशासन द्वारा न्यायालय के आदेश की अनदेखी करके सितारगंज में रोड का चौड़ीकरण के नाम पर आवासीय व व्यवसायिक दुकानों को तोडा जा रहा है और इसका विरोध करने पर उच्च न्यायालय के आदेश का हवाला दिया जा रहा है। जबकि न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट लिखा है कि प्रदेश में कहीं भी अतिक्रमण हुआ है तो इसकी जांच करके रिपोर्ट न्यायालय में पेश की जाए। परंतु प्रशाशन के द्वारा इस आदेश का गलत प्रयोग किया जा रहा है।

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-हाईकोर्ट ने की टिप्पणी, ‘सरकार उत्तराखंड को शाकाहारी प्रदेश ही घोषित कर दे…’
नवीन समाचार, नैनीताल, 26 नवंबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मामले की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने मंगलवार को स्लाटर हाउसों के मामले में सुनवाई करते हुए 2011 के अपने आदेश के बावजूद आज तक प्रदेश में स्लॉटर हाउसों का निर्माण करने पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की एवं इसे न्यायालय के अवमानना बताया। कोर्ट ने मामले को सुनने के बाद सचिव शहरी विकास, हरिद्वार व नैनीताल के डीएम, नैनीताल, मंगलौर व रामनगर के ईओ और मुख्य नगर आयुक्त हल्द्वानी को कारण बताओ अवमानना नोटिस जारी कर तीन सप्ताह में जवाब पेश करने को कहा। कोर्ट ने टिप्पणी भी की कि अगर सरकार 2011 से अब तक स्लॉटर हाउस नही बना पा रही है तो राज्य को शाकाहारी प्रदेश घोषित कर दे।

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आज पूर्व के आदेश का पालन नही करने पर प्रदेश के सचिव शहरी विकास, जिला अधिकारी नैनीताल, अधिशाषी अधिकारी नैनीताल, नगर आयुक्त नगर निगम हल्द्वानी व्यक्तिगत रूप से पेश हुए। सचिव शहरी विकास की ओर से शपथ पत्र पेश किया गया परंतु कोर्ट उनके शपथ पत्र से संतुष्ट नही हुई। जिस पर कोर्ट ने नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि 2011 से अभी तक सरकार प्रदेश में स्लॉटर हाउसों का निर्माण नही कर सकी है। इसके बाद भी शपथ पत्र पेश करने के लिए और समय की मांग कर रही है। जो शपथ पत्र आज सचिव की ओर से पेश किया गया वह भी सही तरह से पेश नही किया। उसे सरकार ने वापस ले लिया और फिर से शपथ पत्र पेश करने का समय मांगा। कोर्ट ने स्पष्ट तौर पर कहा कि यह कोर्ट के 2011 में दिए गए आदेश की अवमानना है।
उल्लेखनीय है कि पूर्व में कोर्ट ने प्रदेश में अवैध रूप से संचालित स्लाटर हाउसों व उनमें बिक रहे मीट की जांच करने के आदेश सभी जिला अधिकारियों को दिए थे और उसकी रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने को कहा था परंतु अभी तक रिपोर्ट पेश नही करने पर कोर्ट ने नाराजगी व्यक्त करते हुए उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी कर 25 नवम्बर को व्यक्तिगत रूप से पेश होने को कहा। वहीं 2011 में कोर्ट ने प्रदेश में चल रहे अवैध स्लाटर हाउसों को बंद कराने और मानकों के अनुरूप स्लाटर हाउसो का निर्माण करने के आदेश दिये थे। इस आदेश के विरुद्ध सरकार सुप्रीम कोर्ट चली गयी परंतु अभी तक सरकार को सुप्रीम कोर्ट से कोई राहत नही मिली। 2018 में कोर्ट के आदेश के बाद सरकार ने 72 घंटे में सभी अवैध स्लाटर हाउसों को बंद कर दिया परंतु अभी तक मानकों के अनुरूप स्लॉटर हाउसों का निर्माण नही किया। कोर्ट ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि जब सभी स्लॉटर हाउस बन्द हैं तो प्रदेश में मीट कहाँ से कट के आ रहा है। सरकार के इस आदेश को मीट कारोबारियों ने खंडपीठ में चुनौती देते हुए कहा कि सरकार ने कोर्ट के आदेशों का पालन नही किया और अभी तक स्लाटर हाउस नही बनाये है जिसके कारण उनको करोड़ों का नुकसान हो रहा है।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 16 नवंबर 2019। उत्तराखण्ड हाईकोर्ट ने पूर्व के आदेश का पालन नही करने पर सचिव शहरी विकास, जिला अधिकारी नैनीताल, अधिशाषी अधिकारी नैनीताल, नगर आयुक्त नगर निगम हल्द्वानी व फूड सेफ्टी अधिकारी नैनीताल को कारण बताओ नोटिस जारी कर 25 नवम्बर को व्यग्तिगत रूप से कोर्ट में पेश होने के आदेश दिए हैं। आज नगर आयुक्त हल्द्वानी कोर्ट में पेश हुए उन्होंने कोर्ट को बताया कि सरकार स्लॉटर हाउस खोलने के लिए लाइसेंस नही दे रही है न ही प्रदूषण बोर्ड अनुमति दे रहा है। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायधिश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ में हुई।
उल्लेखनीय है कि पूर्व में कोर्ट ने प्रदेश में अवैध रूप से संचालित स्लॉटर हाउसों व उनमें बिक रहे मीट की जांच करने के आदेश सभी जिला अधिकारियों को दिए थे और उसकी रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने को कहा था परन्तु अभी तक रिपोर्ट पेश नही करने पर कोर्ट ने नाराजगी व्यक्त करते हुए इनको कारण बताओ नोटिस जारी कर 25 नवम्बर को व्यग्तिगत रूप से पेश होने को कहा। 2011 में कोर्ट ने प्रदेश में चल रहे अवैध स्लाटर हाउसों को बंद कराने के आदेश दिए थे और सरकार को ये भी आदेश दिए थे कि मानकों के अनुरूप स्लाटर हाउसांे का निर्माण करे। इस आदेश के विरुद्ध सरकार सुप्रीम कोर्ट चली गयी परन्तु अभी तक सरकार को सुप्रीम कोर्ट से कोई राहत नही मिली। 2018 में कोर्ट के आदेश के बाद सरकार ने 72 घण्टे में सभी अवैध स्लाटर हाउसों को बंद कर दिया परन्तु अभी तक मानकों के अनुरूप कोई स्लाटर हाउसों का निर्माण नही किया। कोर्ट ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि जब सभी स्लाटर हाउस बन्द है तो प्रदेश में मीट कहाँ से कट के आ रहा है। सरकार के इस आदेश को मीट कारोबारियों ने खण्डपीठ में चुनौती दी जिसमें कहा गया कि सरकार ने कोर्ट के आदेशों का पालन नही किया अभी तक स्लाटर हाउस नही बनाये है, जिसके कारण उनको करोड़ो का नुकसान हो रहा है।

यह भी पढ़ें : अजब मामला: उत्तराखंड में 26 वर्ष से नहीं बन पाई डेढ़ किमी की एक सड़क, अब हाईकोर्ट हुआ सख्त

नवीन समाचार, नैनीताल, 20 नवंबर 2019। उत्तराखंड में 1993 से यानी एक सड़क का डेढ़ किमी हिस्सा नहीं बन पाया है। अब यह मामला उत्तराखंड हाई कोर्ट में आ गया है। हाईकोर्ट की मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खण्डपीठ इस सड़क का निर्माण कार्य पूरा नही होने पर सरकार व पीडब्ल्यूडी से सोमवार तक स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।
मामले के अनुसार कमल चन्द्र निवासी पौड़ी गढ़वाल ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि 1993 में पौड़ी गढ़वाल के चोकल से अल्मोड़ा जिले के सराईखेत के लिए 3 किलोमीटर रोड स्वीकृत हुई थी जिसमे से डेढ़ किलोमीटर रोड का निर्माण किया गया बाकी रोड का निर्माण कार्य अभी तक नही हुआ है। इस सम्बंध में उन्होंने व गाँव वालों ने कई बार सरकार व लोनिवि को कई प्रत्यावेदन दिए परन्तु आश्वासन के अलावा रोड का निर्माण कार्य नही किया गया।

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-संशोधनों पर बुधवार तक स्थिति स्पष्ट करे सरकार: हाईकोर्ट
नवीन समाचार, नैनीताल, 7 नवंबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने राज्य सरकार द्वारा किए गये आबकारी अधिनियम में संशोधन के खिलाफ दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से बुधवार तक स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई के लिए बुधवार की तिथि नियत की है।
मामले के अनुसार सितारगंज निवासी आशीष कुमार कौशल ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि राज्य सरकार ने आबकारी अधिनियमों में संशोधन करके शराब की दुकानों के लाइसेंस लेने की प्रक्रिया और भी आसान कर दी है। सरकार ने अधिनियम में ‘सेल’ शब्द की जगह ‘सर्विस’ शब्द कर दिया है। इसकी वजह से शराब की दुकानों का ठेका लेना और भी आसान हो जाएगा। इस पर रोक लगाई जाय। याचिकाकर्ता का यह भी कहना है कि सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के उन आदेशों की भी अवहेलना की है जिसमें कहा गया था कि नेशनल हाइवे से शराब की दुकानें पांच सौ मीटर दूर होंगी लेकिन सरकार ने ये दुकानें नेशनल हाइवे के पास ही आवंटित कर दी हैं।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 6 सितंबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति नारायण सिंह धानिक की एकलपीठ ने प्रदेश की महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री रेखा आर्य के पति गिरधारी लाल साहू की जमीन के एक सौदे के मामले में गिरफ्तारी पर फिलहाल रोक लगा दी है। साथ ही ऊधमसिंह नगर जिले के एसएसपी व शिकायतकर्ता को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।
मामले के अनुसार ऊधमसिंह नगर जनपद के बरा पुलभट्टा किच्छा निवासी रमेश चंद्र तिवारी ने राज्य मंत्री रेखा आर्या के पति गिरधारी साहू के खिलाफ मुकदमा जमीन के एक सौदे के मामले में मुकदमा दर्ज कराया था। निचली अदालत में पुलिस इस मामले में साहू के खिलाफ धारा-420, 467, 468, 120 बी व अन्य धाराओं में चार्जशीट दाखिल कर चुकी है। इस पर गिरफ्तारी से बचने के लिए साहू ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर गिरफ्तारी पर रोक लगाने के साथ ही चार्जशीट निरस्त करने की मांग की है। मामले को सुनने के बाद एकलपीठ ने साहू की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी। साथ ही शिकायतकर्ता व एसएसपी ऊधमसिंह नगर को जवाब पेश करने को कहा है।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 13 अगस्त 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने पिछले डेढ़ साल में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अनुमति के बिना 55 स्टोन क्रशर को लाइसेंस दिए जाने जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से अगले सोमवार तक जवाब पेश करने को कहा है। साथ ही ताकीद की है कि अगर जवाब पेश नहीं किया जाता है तो प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव मंगलवार को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश हों।
उल्लेखनीय है कि रामनगर निवासी सर्वजीत सिंह और आनंद सिंह नेगी की जनहित याचिका में कहा गया कि राज्य सरकार ने पिछले 12 से 15 महीने में उत्तरकाशी, गंगोत्री, रुद्रप्रयाग व ऊखीमठ सहित प्रदेश के कई अन्य स्थानों पर स्टोन क्रेशर लगाने की अनुमति बिना पीसीबी की अनुमति के और स्वयं ही इनके मानक तय करके दे दी है। खासकर ध्वनि प्रदूषण का मानक 70 डेशीबल दिन में और 55 डेशीबल रात के लिए तय कर दिया है जबकि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानको के अनुसार औद्योगिक क्षेत्र में 55 डेशीबल दिन और 45 डेशीबल रात को होनी चाहिए, लिहाजा इन उद्योगों को बंद किया जाना चाहिए। मामले के अनुसार रामनगर निवासी सर्वजीत सिंह और आनंद सिंह ने हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि राज्य सरकार ने पिछले 12 से 15 महीने में उत्तरकाशी, गंगोत्री, रुद्रप्रयाग व ऊखीमठ सहित प्रदेश के कई अन्य स्थानों पर स्टोन क्रेशर लगाने की अनुमति बिना पीसीबी की अनुमति के और स्वयं ही इनके मानक तय करके दे दी है। खासकर ध्वनि प्रदूषण का मानक 70 डेशीबल दिन में और 55 डेशीबल रात के लिए तय कर दिया है जबकि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानको के अनुसार औद्योगिक क्षेत्र में 55 डेशीबल दिन और 45 डेशीबल रात को होनी चाहिए, लिहाजा इन उद्योगों को बन्द किया जाना चाहिए।

यह भी पढ़ें : मनमानी फीस वसूलने के खिलाफ प्रदेश के 13 आयुर्वेदिक मेडिकल कालेजों को हाई कोर्ट का नोटिस…

नवीन समाचार, नैनीताल, 6 अगस्त 2019।  उत्तराखंड हाई कोर्ट ने प्रदेश के आयुर्वेदिक मेडीकल कालेजों द्वारा छात्रो से मनमानी तरीके से फीस वसूलने के खिलाफ दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खण्डपीठ ने प्रदेश के 13 आयुर्वेदिक मेडिकल कालेजों को नोटिस जारी कर तीन सप्ताह में जवाब पेश करने को कहा है। मामले के अनुसार देहरादून निवासी मोहित उनियाल ने हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि प्रदेश के आयुर्वेदिक मेडिकल कालेजों द्वारा सत्र 2018-2019 के छात्रों से भी  बधाई गयी फीस 80 हजार से 2 लाख 15 हजार रूपये वसूले जा जा रहा है । जबकि यह फीस नया शैक्षिणिक सत्र 2020-21,2021-22 पर लागु होना था। जबकि उनसे कालेजों द्वारा यह फीस पिछले शैक्षणिक सत्र से वसूला जा रहा है। याचिकर्ता का कहना है कि कालेज को फीस नही देने पर उनको कालेज में पढ़ने नही दिया जा रहा है जिससे उनका   पाठ्यक्रम लेट हो रहा है यही नही याचिकर्ता का यह भी कहना है कि उनका बीएएमएस का कोर्स साढ़े चार साल का होता है और कालेजो द्वारा उनसे पाँच साल की फीस जमा करवाई जा रही है। फीस निर्धारण के सम्बन्ध में 29 अप्रैल 2019 को जस्टिस कुलदीप सिंह की अध्यक्षता में कमेटी गठित की गयी थी जिसमे कहा गया था कि 2018-19 बैच के छात्रो से 80 हजार फीस निर्धारित की गयी थी और 2020 -21 बैच के छात्रो से 2 लाख 15 हजार फीस निर्धारित की गयी थी। बढ़ी हुई फीस से लगभग चार हजार छात्रो के भविष्य पर प्रभाव पड़ रहा है।

यह भी पढ़ें : सब्सिडी खाकर भाग रही एक और कंपनी के उपकरण-मशीनें ले जाने पर हाईकोर्ट की रोक…

नवीन समाचार, नैनीताल, 1 अगस्त 2019। भगवती कंपनी के 300 कर्मचारियों के बाद अब सितारगंज की एक और ‘एमओर कम्पनी’ ने अपने 135 कर्मचारियों को कम्पनी बंद करने का नोटिस थमा दिया है। कर्मचारियों ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की तो आज हाईकोर्ट की एकलपीठ ने कम्पनी के सामान ले जाने पर रोक लगाने के साथ ही डीएम ऊधमसिंह नगर को आदेश दिया है कि कोई भी उपकरण व मशीन कम्पनी यहां से ना ले जाएं।
बताया गया है कि 29 जुलाई को एमओर कम्पनी ने फैक्ट्री पर नोटिस चिपकाकर जानकारी दी की कम्पनी को बंद किया जा रहा है, लिहाजा कर्मचारी आज से नौकरी पर ना आएं। इस आदेश को कर्मचारियों ने हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए कम्पनी को बंद ना करने की मांग की है। साथ ही कर्मचारियों की मांग है कि उनकी सैलरी व अन्य देयकों को कम्पनी पूरा करें। याचिका में कहा गया है कि उनको बिना बताये कम्पनी ने इस तरह का अचानक निर्णय लिया है जिसके चलते उन पर बेरोजगारी का संकट खड़ा हो गया है। आज सुनवाई के दौरान सामने आया कि राज्य सरकार की सब्सिड़ी खत्म हो जा रही है तो उसके बाद कम्पनियां बंद का नोटिस चिपकाकर भाग रही हैं। जिसको कोर्ट ने गम्भीरता से लिया है।

यह भी पढ़ें : 2017 तक की अनुमति पर चल रहा स्टोन क्रेशर बन्द करने के आदेश…

नवीन समाचार, नैनीताल, 4 जुलाई 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने रतनपुरी जसपुर जिला ऊधम सिंह नगर में ओमकार इंफ्राटेक स्टोन क्रेशर के संचालन पर मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खण्डपीठ ने सुनवाई करते हुए स्टोन क्रेशर को शीघ्र बन्द करने के आदेश दिए हैं।
मामले के अनुसार जसपुर निवासी माणिक गिल ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि स्टोन क्रेशर के मालिक राधेश्याम गर्ग द्वारा रतनपुरी में बिना प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अनुमति से स्टोन क्रेशर चलाया जा रहा है, जिससे पर्यावरण को नुकसान हो रहा है। इस स्टोन क्रेशर को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से 2017 तक के लिए अनुमति दी गयी थी परन्तु उसके बाद भी मालिक द्वारा इसका अवैध रूप से संचालन किया जा रहा है। पूर्व में न्यायालय ने प्रदूषण बोर्ड से शपथ पत्र पेश करने को कहा था जिसमें बोर्ड को तरफ से कहा गया कि इसका परमिट 2017 में समाप्त हो गया अभी यह मानको को पूरा नही कर रहा है।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 13 जून 2019। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने प्रदेश भर में फैक्ट्रियों द्वारा केंद्रीय पर्यावरण प्रदूषण बोर्ड के मानकों को पूरा नही करने व प्रदूषण किये जाने से सम्बंधित जनहित याचिका की सुनवाई करते राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को ऐसी फैक्टरियों को एक सप्ताह का कारण बताओ नोटिस जारी कर उसकी रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने को कहा है। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा को खंडपीठ में हुई।
गुरुअवार को हुई सुनवाई के दौरान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से शपथ पत्र पेश कर कहा गया कि राज्य में 49 फैक्ट्रियां नियमांे का पालन नही कर रही हैं। 8 फैक्ट्रियो के नमूने जाँच करने के लिए भेजे गए है और 72 फैक्ट्रियों ने नियमांे का पालन कर लिया है। साथ ही सितारगंज में दो ट्रीटमेंट प्लांट नियमों का पालन नही कर रहे हैं। यदि इन दोनों ट्रीटमेंट प्लांटो को बंद कर दिया जाता है तो 90 फैक्ट्रियां स्वतः ही बंद हो जाएंगी। कोर्ट ने इस पर टिप्पणी की कि बोर्ड को फैक्ट्रियो के बंद होंने को चिंता है पर्यावरण की नही। बोर्ड ने इस दौरान अपने शपथपत्र में 323 फैक्ट्रियो की लिस्ट भी कोर्ट में पेश की।
उल्लेखनीय है कि पूर्व में कोर्ट ने केंद्रीय पर्यावरण नियंत्रण बोर्ड से सभी फैक्ट्रियो की लिस्ट मांगी थी, जिसमंे कहा गया था कि प्रदेश की 30 से 35 फैक्ट्रियां केंद्रीय पर्यावरण प्रदूषण के मानकांे को पूरा नही करती हैं। इस रिपोर्ट पर राज्य सरकार को कार्यवाही करने के निर्देश दिए गए थे। मालूम हो कि ऊधमसिंह नगर निवासी हिमांशु चंदोला ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि ऊधमसिंह नगर में लगभग 27-28 फैक्टरियों के द्वारा वायु व जल प्रदूषण किया जा रहा है। जिससे कई लोगों की हेपेटाइटिस से मौत भी हो गई है। साथ ही वहां की कृषि भूमि कृषि लायक भी नहीं रह गई है। वहां का सारा पानी खेतों व नदियों में जा रहा है जिससे वहां की नदी भी दूषित हो रही है।

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-पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के दौरान राष्ट्रीय राजमार्ग में चक्काजाम करने व सरकारी कार्यों में व्यवधान डालने के हैं आरोप

नवीन समाचार, नैनीताल, 26 जुलाई 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति एनएएस धनिक की एकलपीठ ने काशीपुर के वर्तमान भाजपा विधायक हरभजन सिंह चीमा के खिलाफ पुलिस द्वारा दायर चार्ज शीट को निरस्त किये जाने सम्बंधित याचिका खारिज कर दी है। इसके बाद चीमा के खिलाफ चार्जशीट के अनुरूप कार्रवाई की तलवार फिर लटक गयी है। विधायक हरभजन सिंह चीमा व तीन अन्य विधायकों सहित कई अन्य लोगों के खिलाफ पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के दौरान राष्ट्रीय राजमार्ग में चक्काजाम करने व सरकारी कार्यों में व्यवधान डालने के आरोप है। अलबत्ता निचली अदालत को आदेश दिए हैं कि उनकी जमानत याचिका पर उसी दिन सुनवाई करें।
मामले के अनुसार 15 जुलाई 2012 को जसपुर थाने के कोतवाल जेसी पाठक ने काशीपुर के विधायक हरभजन सिंह चीमा, गदरपुर के विधायक अरविंद पांडे, जसपुर के विधायक आदेश चौहान, रुद्रपुर के विधायक राजकुमार ठुकराल एवं पूर्व सांसद बलराज पासी सहित कई अन्य लोगो के खिलाफ एक राय होकर राष्ट्रीय राजमार्ग में चक्काजाम करने व सरकारी कार्यों में व्यवधान डालते हुए लोक सेवक पर हमला कर सरकारी सम्पति का नुकसान करने के आरोप में आरोप पत्र दायर की है। बताया गया है कि यह लोग एक सिख युवती के मुस्लिम युवक से शादी करने से नाराज थे और युवती की बरामदगी की मांग कर रहे थे। इस मामले की जांच के बाद पुलिस ने आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट कोर्ट में पेश कर दी थी और कोर्ट ने आरोपितों के खिलाफ सम्मन जारी किये थे। इस चार्जशीट व सम्मन के आदेश को रद्द करने हेतु हरभजन सिंह चीमा ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि प्रथम सूचना रिपोर्ट में उनका नाम नहीं था।

यह भी पढ़ें : सुभारती को हाईकोर्ट से नहीं मिली राहत, सरकार को 25 करोड़ चुकाने के आदेश..

नवीन समाचार, नैनीताल, 24 जुलाई 2019। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सील हुए सुभारती मेडिकल कॉलेज को उत्तराखंड सरकार ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने सुभारती मेडिकल कॉलेज को बड़ा झटका देते कॉलेज के संचालक डा. जगत नारायण सुभारती चैरिटेबल ट्रस्ट को दो सप्ताह के भीतर 25 करोड़ रुपए सरकार को जमा करने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई आगामी 9 अगस्त को होगी। उल्लेखनीय है कि पूर्व में इस मेडिकल कॉलेज के बंद होने के बाद राज्य सरकार ने सके 300 छात्र-छात्राओं के पठन-पाठन के लिए 97.83 करोड़ रुपए जमा करने को कहा था। सुभारती ने इस आदेश को चुनौती देते हुए इस पर रोक लगाने के लिए हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिस पर सुनवाई करते हुए वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकलपीठ ने ट्रस्ट को दो सप्ताह के भीतर 25 करोड़ रुपए जमा करने के आदेश पारित किये हैं।

यह भी पढ़ें : महाराणा प्रताप स्पोर्ट्स कालेज में संविदा कर्मियों को हटाने व नियुक्ति प्रक्रिया पर हाईकोर्ट की रोक

नवीन समाचार, नैनीताल, 9 जुलाई 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने महाराणा प्रताप स्पोर्ट्स कालेज में संविदा में कार्यरत क्रिकेट, बास्केट बॉल व हॉकी कोच तथा ग्राउंड मैन और खेल शिक्षकों को हटाने और सरकार द्वारा 21 जून 2019 को नियुक्तियों के लिए जारी नई विज्ञप्ति पर रोक लगाते हुए पूर्व से कार्यरत संविदा कर्मियो को अपने पदों पर बने रहने के आदेश दिए है। साथ ही न्यायालय ने प्रदेश के खेल सचिव को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब पेश करने को कहा है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की एकलपीठ में हुई।
मामले के अनुसार महाराणा प्रताप स्पोर्ट्स कालेज में संविदा में कार्यरत पवन लाल व अन्य ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर कहा है कि वे 2010 से कालेज में विभिन्न पदों पर संविदा कर्मचारियों के रूप में कार्यरत हैं। सरकार द्वारा उनको निर्धारित सेवा नियमावली के अनुरूप वेतन न देकर कम वेतन दिया जा रहा है। पूर्व में भी उनके द्वारा याचिका दायर की गयी थी जिसमें न्यायालय ने उनके प्रत्यावेदनांे की विधि अनुसार निस्तारित करने के आदेश खेल सचिव को दिए थे परंतु खेल सचिव द्वारा उमा देवी के निर्णय को आधार मानकर निरस्त कर दिया और उनको सेवा विस्तार भी नही दिया गया। उल्टे 21 जून 2019 को एक नई विज्ञप्ति जारी कर दी गयी।

यह भी पढ़ें : चर्चित आईएफएस संजीव चर्तुवेदी के मामले एम्स के निदेशक व केंद्रीय सचिव को अवमानना नोटिस

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नवीन समाचार, नैनीताल, 29 जून 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने चर्चित आइएफएस संजीव चतुर्वेदी के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार 50 हजार जुर्माना अदा नहीं करने पर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान दिल्ली के निदेशक डा. रणदीप गुलेरिया व केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव प्रीति सूद को अवमानना नोटिस जारी कर 26 जुलाई तक जवाब देने को कहा है। साथ ही पूछा है कि क्यों न उनके खिलाफ न्यायालय की अवमानना पर कार्रवाई की जाये।
उल्लेखनीय है कि आइएफएस संजीव चतुर्वेदी ने कैट न्यायालय में दो प्रार्थना पत्र दिए थे। एक में उनका कहना था कि केंद्र सरकार द्वारा उनकी चरित्र पंजिका में किए गए जीरो अंकन मामले में दिया हलफनामा झूठा है। लिहाजा उन्होंने इस मामले में आपराधिक मामला चलाने का आदेश पारित करने की मांग की थी, जबकि दूसरे में उन्होंने एम्स दिल्ली में 2014 में उनके द्वारा अनियमितता के 13 मामले पकड़ने का उल्लेख करते हुए कहा था कि इसी वजह से उन्हें एम्स से हटा दिया गया। हाईकोर्ट ने पिछले वर्ष संजीव की एसीआर में जीरो अंकन को प्रतिशोधात्मक कार्रवाई बताते हुए 25 हजार जुर्माना लगा दिया था। इस आदेश को केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी तो सुप्रीम कोर्ट ने ना केवल हाईकोर्ट का आदेश को सही ठहराया बल्कि जुर्माना 25 हजार से बढ़ाकर 50 हजार कर दिया। इसके बाद संजीव द्वारा 26 जून को हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दायर की गई। न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ ने मामले को सुनने के बाद एम्स निदेशक व केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव को अवमानना नोटिस जारी किया।

मसूरी की सभासद पर लटकी कार्रवाई की तलवार, जानें क्या है मामला

-पति का है पालिका की भूमि पर कब्जा, हाईकोर्ट ने खारिज की विशेष याचिका
-एकलपीठ के आदेशों पर हुई जांच में सभासद के पति का पालिका की भूमि पर कब्जा पाया गया है
नवीन समाचार, नैनीताल, 28 जून 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने मंसूरी नगर पालिका की सभासद गीता कुमाई की विशेष अपील को निरस्त कर मुख्य सचिव को निर्देश दिए है कि इनके खिलाफ विधि अनुसार निर्णय लें। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ में हुई।
उल्लेखनीय है कि 2018 के नगर पालिका चुनाव में गीता से हारे हुए सभासद प्रत्याशी केदार सिंह चौहान ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर सभासद गीता व उसके परिवार द्वारा नगर पालिका भूमि पर कब्जा किये जाने की बात कहते हुए उन्हें सभासद पद से हटाये जाने की मांग की थी। इस पर उच्च न्यायालय की एकलपीठ ने प्रदेश के मुख्य सचिव से आरोपों की जांच कर चार सप्ताह में रिपोर्ट पेश करने को कहा था। जांच में पाया गया कि गीता कुमाई के पति ने नगर पालिका की केमल्स बैक की भूमि के कुछ भाग में कब्जा किया हुआ है। इस आधार पर उसको सभासद के पद से हटाये की मांग की गयी थी। इधर सभासद गीता कुमाई ने एकलपीठ के आदेश को विशेष अपील दायर कर चुनौती दी थी, जिसे न्यायालय ने खारिज कर दिया।

यह भी पढ़ें : केंद्रीय एचआरडी मंत्री डा. निशंक के विरुद्ध फिर उच्च न्यायालय में चुनाव याचिका दायर, सुनवाई सोमवार को होगी

नवीन समाचार, नैनीताल, 28 जून 2019। हरिद्वार निवासी मनीश वर्मा ने एक बार पुनः हरिद्वार के लोक सभा सांसद एवं केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री डा. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के विरुद्ध उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर दी है। याचिका पर सुनवाई सोमवार को न्यायाधीश न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की अदालत में होगी।
इससे पूर्व प्रेस को जारी बयान में वर्मा ने बताया कि उन्होंने चुनाव के समय भी पूर्व मुख्यमंत्री व लोकसभा प्रत्याशी हरिद्वार निशंक के नामांकन पर कई गंभीर आपत्तियां उठाई थीं व मामला उच्च न्यायालय नैनिताल तक पहुचा था। अलबत्ता उच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग की व्यवस्थाओं का हवाला देते हुए चुनाव सम्पन्न होने व परिणाम घोषित होने के 40 दिन के भीतर चुनाव याचिका दायर करने का सुझाव देते हुए निर्णय दिया था। बताया जा रहा है कि पूर्व में याचिकाकर्ताओं के द्वारा इस तरह याचिका पर सुनवाई से पूर्व ही प्रेस में प्रचार करने पर उच्च न्यायालय याचिकाओं को इस आधार पर खारिज कर चुका है और याचिकाकर्ताओं को फटकार लगा चुका है कि वे न्याय से अधिक प्रचार पाने को अधिक उत्सुक है।

इधर याचिकाकर्ता मनीश वर्मा ने बताया कि बृहस्पतिवार 27 जून को उनके द्वारा डा. निशंक के खिलाफ चुनाव याचिका उच्च न्यायालय में दायर कर दी है। अब इस पर शुक्रवार 28 जून को न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की एकलपीठ में सुनवाई होगी। बताया कि चुनाव याचिका में मुख्य रूप से डा. निशंक के नामांकन के शपथ पत्र में छुपाए, स्पष्ट नही किये, स्थान खाली छोड़ दिये गये बिंदुओं को उठाया गया है। जैसे कि डा. निशंक को राज्य सरकार को पूर्व मुख्यमंत्री आवास का 2 करोड़ 7 लाख रुपए का भुगतान करना है व राज्य सरकार उच्च न्यायालय में इस तथ्य को स्वीकार कर चुकी है व इस पर उच्च न्यायालय ने 3 मई को रुलक संस्था की याचिका पर अपना निर्णय भी दे दिया है। इसके बावजूद डा. निशंक के चुनाव लड़ने के लिए राज्य सरकार के अपर सचिव वंशीधर तिवारी ने अनापत्ति दी। उन्हें भी याचिका में पक्षकार बनाया गया है। निशंक ने सांसद आवास का प्रोविजनल नो ड्यूज जमा किया है, जो कि नियमविरुद्ध है। साथ ही निशंक ने अपनी राज्य सरकार के द्वारा आवंटित सम्पति का विवरण शपथ पत्र में नही दिया है। उन्होंने अपनीं शैक्षिक योग्यता का विवरण व शिक्षा कहां से प्राप्त की, यह भी नहीं दर्शाया है। इसके अतिरिक्त हाइडल पावर प्रोजेक्ट्स, स्टूर्डिया घोटाला व अपने मेडिकल कॉलेज के संबंध में जमीन आवंटन घोटाला व उसमे उनकीं पुत्री की भागीदारी व समाज सेवक लिखने पर 100 करोड़ का कॉलेज कैसेे खडा किया गया, आदि विवरण भी याचिका में हैं।

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-दक्षिण अफ्रीकी दूल्हों की दुबई की दुल्हनों से है शादी
कौन हैं गुप्ता बंधु, जो औली में शाही शादी के कारण चर्चाओं में हैंनवीन समाचार, नैनीताल, 18 जून 2019। प्रदेश के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल व अंतरराष्ट्रीय स्कीइंग केंद्र औली में आगामी 22 जून को कथित तौर पर 200 करोड़ रुपए खर्च करके हो रही चर्चित गुप्ता बंधुओं, दक्षिण अफ्रीका के कारोबारी अजय व अतुल गुप्ता के बेटों की दुबई की दुल्हन से शादी पर उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने कड़ा रुख दिखाया है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने अधिवक्ता रक्षित जोशी की जनहित याचिका पर शादी पर तो रोक नहीं लगाई, अलबत्ता शादी से प्रकृति एवं पर्यावरण को इस शादी से भारी नुकसान पहुंचने का अंदेशा जताते हुए आयोजकों से 21 जून से पहले दो किस्तों में उच्च न्यायालय में सुरक्षा धनराशि के बतौर तीन करोड़ रुपए जमा करने के आदेश दिये हैं। यह धनराशि वापस भी की जा रही है, बशर्ते शादी में पर्यावरण व प्रदूषण मानकों का उल्लंघन न हो। इस हेतु चमोली के डीएम व प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को शादी पर पर्यावरण नियमों व मानकों के तहत निगरानी रखने और आठ जुलाई तक इस संबंध में अपनी रिपोर्ट पेश करने को कहा है। शादी में किसी भी तरह प्रकृति से छेड़छाड़ न करने, लाउडस्पीकरों भी निर्धारित से अधिक ध्वनि में न बजाने की भी ताकीद की गयी है। साथ ही तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा है कि अब तो शादी की तैयारियां हो चुकी होंगी। यदि सप्ताह भर पहले यह मामला आया होता तो यहां शादी नहीं होने देते। मामले में यह बात भी उल्लेखनीय रही कि याचिकाकर्ता ने औली को बुग्याल बताते हुए वहां उच्च न्यायालय के बुग्यालों में कोई भी व्यवसायिक गतिविधियां न करने के आदेश का उल्लंघन बताया था, जबकि सरकार अपने जवाब में बताया कि शादी के स्थल से बुग्याल करीब 400 मीटर दूर है।

कौन हैं गुप्ता बंधु, जो औली में शाही शादी के कारण चर्चाओं में हैं

ये तीन भाई हैं-अजय (50 साल), अतुल (47 साल) और राजेश (44 साल)। इन सभी का जन्म उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में हुआ और तीनों की पढ़ाई-लिखाई भी सहारनपुर के जेवी जैन कॉलेज से डिग्री ली। बड़े भाई अजय ने बीकॉम किया और फिर सीए का कोर्स किया। अतुल ने बीएससी की और कंप्यूटर हार्डवेयर और असेंबलिंग का कोर्स किया। छोटे भाई राजेश ने बीएससी की। उन्होंने शुरू में पिता के कारोबार में हाथ बंटाया और फिर दक्षिण अफ्रीका चले गए।
गुप्ता ब्रदर्स 24 साल पहले सहारनपुर से बिजनेस अवसर की तलाश में दक्षिण अफ्रीका गए थे। वो दक्षिण अफ्रीका के टॉप फाइव धनी लोगों में शुमार होते थे एक साल पहले तक वहां उनकी तूती बोलती थी लेकिन अब हालत डावांडोल है। वो दक्षिण अफ्रीका के टॉप फाइव धनी लोगों में शुमार होते थे। पूर्व राष्ट्रपति जैकब जुमा की सरकार उनके इशारों पर नाचती थी। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति के परिवारजनों को अपने यहां ऊंची नौकरियां दे रखी थीं। बाद में गुप्ता बंधुओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। इसके चलते राष्ट्रपति जैकब जुमा को भी पद से इस्तीफा देना पड़ा। दक्षिण अफ्रीका की नई सरकार अब उनके खिलाफ कई मामलों की जांच करा रही है। फिलहाल दक्षिण अफ्रीका का उनका कारोबार डगमगाया हुआ है। ये भी खबरें हैं कि वो वहां से अपना कारोबार समेटना चाहते हैं।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 11 जून 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकलपीठ ने ने देहरादून जिले की नदियों में चुगान से संबंधित नीलामी प्रक्रिया पर रोक लगा दी है। साथ ही राज्य सरकार को अगली सुनवाई की तिथि 12 जुलाई से पूर्व जवाब पेश करने के निर्देश दिए हैं। उल्लेखनीय है कि देहरादून निवासी जगदीश पंवार और संतोष कुमार ने इस मामले में उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि देहरादून के डीएम के स्तर से जिले की सभी नदियों में चुगान के लिए निविदा निकाली गयी थी। इसके लिए कई लोगों ने निविदाएं डालीं लेकिन इधर प्रशासन के स्तर पर चुगान के लिए मात्र 19 दिन का समय रखा गया है। जोकि व्यावहारिक नहीं है। जिले की नदियां राजाजी नेशनल पार्क रिजर्व और अन्य रिजर्व फॉरेस्ट क्षेत्र में हैं। इनमें चुगान से पहले केंद्र सरकार से पर्यावरणीय स्वीकृति लेनी जरूरी है। डीएम ने इसकी औपचारिक स्वीकृति नहीं ली है। चुगान की समयावधि को बढ़ाने को लेकर डीएम को प्रत्यावेदन दिया गया लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई है। इसके चलते याचिका दायर करने को मजबूर हुए हैं। एकलपीठ ने मामले में सुनवाई के बाद निविदा प्रक्रिया पर रोक लगा दी है।

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-सरकार को मिली सभी मापदंडो का अनुपालन करते हुए खेल कोटे में आरक्षण देने की छूट, 5 वर्ष पहले घोषित कर दिया था असंवैधानिक 

नवीन समाचार, नैनीताल, 21 मई 2019। उत्तराखंड हाईकोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने राज्य की सरकारी सेवाओं में खेल कोटे को निरस्त करने के मामले में फैसला सुनाते हुए सरकार को छूट दी है कि यदि सरकार चाहे तो सभी मापदंडो का अनुपालन करते हुए खेल कोटे में आरक्षण दे सकती है। हाईकोर्ट के मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन, न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया एवं न्यायमूर्ति आलोक सिंह की खंडपीठ ने मंगलवार  को यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। 

मामले के अनुसार पिथौरागढ़ निवासी महेश सिंह नेगी व अन्य ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि उत्तराखंड के सरकारी विभागों में राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में प्रतिभाग कर चुके खिलाडियों का राजकीय सेवाओं में कोटा निरस्त किया गया है। उत्तराखंड टेक्निकल बोर्ड आफ एजुकेशन रूड़की के सचिव ने 20 दिसंबर 2011 को विज्ञापन जारी कर उत्तराखंड ग्रुप सी भर्ती परीक्षा के लिए आवेदन मांगे थे। याचिकाकर्ता ने खेल कोटे में सामान्य श्रेणी में आवेदन किया था। याची को प्रवेश पत्र जारी कर लिखित परीक्षा में 28 दिसंबर 2012 को बुलाया गया। परीक्षा पास करने के बाद उसे 20 अप्रैल 2013 को टंकण परीक्षा के लिए बुलाया गया। 30 जुलाई 2013 को अंतिम परिणाम घोषित किया गया जिसमें याची का नाम 40वें नंबर पर था, लेकिन उन्हें नियुक्ति नहीं मिली। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से आग्रह किया था कि 20 दिसंबर 2011 को जारी विज्ञप्ति के तहत कंप्यूटर ऑपरेटर के पद पर उसे नियुक्ति दिलाई जाए। बाद में आरटीआई के तहत मिली जानकारी में पता लगा कि 14 अगस्त 2013 को हाईकोर्ट की खंडपीठ ने क्षैतिज आरक्षण में खेल कोटे को असंवैधानिक घोषित किया था। इसी तरह के अन्य मामले भी हाईकोर्ट के सामने पहुंचे थे। अलग अलग पीठों की राय अलग-अलग होने पर ही तीन जजों की बैंच गठित की गई।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 10 मई 2019। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र में कार्यरत बीमार शिक्षकों को बड़ी राहत दी है। अदालत ने पहाड़ से मैदान में तबादले पर लगी रोक पर सरकार को सशर्त छूट दे दी है। इसके तहत रिक्त होने वाले पद पर मैदान से शिक्षक भेजने पर ही तबादला हो सकेगा। इसके साथ ही सरकार से खाली चल रहे शिक्षकों के पदों को जून 2020 तक हर हालत में भरने के भी आदेश दिए हैं।

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन और न्यायमूर्ति आलोक सिंह की संयुक्त खंडपीठ ने देहरादून निवासी दौलत राम सेमवाल की याचिका पर सुनवाई की। हाईकोर्ट ने पहले हुई सुनवाई में प्रदेश के पहाड़ी जिलों से हरिद्वार, देहरादून या ऊधमसिंह नगर में शिक्षकों के तबादले पर रोक लगा दी थी। अदालत ने कहा था कि शेष 10 जिलों में शिक्षकों की तादाद 70 प्रतिशत होने तक यह रोक जारी रहेगी। इसके साथ ही सभी स्कूल-कॉलेजों में शिक्षक, स्टाफ की उपस्थिति के लिए 24 माह के भीतर बायोमेट्रिक मशीन लगाने और शिक्षकों की एक दिन में तीन बार उपस्थिति दर्ज कराने को भी कहा था। सरकार से अपनी वेबसाइट में प्रदेश में चल रहे मान्यता प्राप्त कोर्स की जानकारी, विद्यायल या शिक्षण संस्थान की जानकारी उपलब्ध कराने के भी आदेश दिए थे। इधर आज हुई सुनवाई में सरकार द्वारा पूर्व के आदेश में संशोधन के लिए प्रार्थना पत्र पर विचार किया। इसमें पहाड़ से मैदानी क्षेत्र में तबादले में बीमार अथवा उनके परिजन के गंभीर बीमारी से ग्रसित होने पर छूट देने की मांग की गई थी। संयुक्त खंडपीठ ने इस पर सशर्त छूट दी। कहा कि सरकार इस बात का ध्यान रखे कि पहाड़ के स्कूलों में शिक्षकों की कमी के चलते पठन-पाठन प्रभावित नहीं होना चाहिए। देहरादून निवासी दौलत राम सेमवाल ने इस मामले में हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। इसमें कहा था कि स्कूल-कॉलेजों में छह से सात घंटे की ‌निर्धारित पढ़ाई नहीं हो रही है। शिक्षकों की उपस्थिति देखने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। याचिका में इसके लिए बायोमेट्रिक मशीन लगाने और एक दिन में तीन बार उपस्थिति लिए जाने की भी मांग की गई थी।

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-सरकार को आज पूर्व मे जारी किये आदेशो के क्रम मे दाखिल करना था प्रति शपथपत्र
-उत्तराखंड के श्रीनगर मे करीब 10 सालों से भवन विहीन संचालित हो रहा है एनआईआईटी कैंपस
-पूर्व छात्र जसवीर सिंह की तरफ से हाईकोर्ट मे याचिका दायर कर एनआईटी को स्थायी कैंपस बनाने की की है मांग
-27 मार्च को हाईकोर्ट ने मामले पर सुनवाई के बाद सरकार को आज यानी 24 अप्रैल तक 4 वैकल्पिक स्थानो का चयन कर सूची कोर्ट मे पेश करने के दिये थे आदेश
राजू पांडे @ नवीन समाचार, नैनीताल, 25 अप्रैल 2019। उत्तराखंड हाई कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन और न्यायमूर्ति एनएस धानिक की खंडपीठ ने श्रीनगर में एनआईआईटी के स्थाई निर्माण और उसे राज्य से बाहर जयपुर स्थानांतरित करने के मामले में पहाड़ अथवा मैदान में चार-चार जगहंे चिन्हित करने के अपने 27 मार्च के आदेश की अवमानना करने पर नाराजगी जताते हुए राज्य सरकार पर कार्यवाही शुरू करने को कहा है। साथ ही पीठ ने केंद्र और राज्य सरकार को भी फटकार लगाई। उल्लेखनीय है कि खंडपीठ ने पूर्व में नए छात्रों के प्रवेशों के बारे में पूछते हुए 24 अप्रैल तक पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रों में चार स्थानों को चयनित कर न्यायालय को सूचित करने को कहा था लेकिन सरकार ने आज ऐसी कोई सूची पेश नहीं की।
खण्डपीठ ने आज नाराज होते हुए कहा कि मामला राजनीति और नौकरशाहों के हाथों की कठपुतली बन गया है। खंडपीठ ने पूरे राज्य के भूगर्भीय दृष्टि से संवेदनशील होने के जवाब के कारण सरकार से कई सवाल किए। याचिकाकर्ता ने न्यायालय से कहा कि सरकार प्रदेश में जिस तरह की भूगर्भीय संवेदनशीलता की बात कर रही है, उस स्थिति में तो पहाड़ों में कोई भी संस्था नहीं स्थापित की जा सकेगी।

प्रमुख सचिव को हाई कोर्ट से राहत, जारी हुए थे वारंट…

नवीन समाचार, नैनीताल, 12 अप्रैल, 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति एनएस धानिक की खण्डपीठ ने प्रदेश के प्रमुख सचिव वन आनंद वर्धन के न्यायालय में पेश होने के बाद उनके खिलाफ जारी जमानती वारंट को वापस ले लिया है, और उन्हें आदेश दिए है कि केंद्र सरकार द्वारा 2007 में दिए गए बाघों के संरक्षण के लिए आवश्यक दिशा-निर्देशों के पालन में की गयी कार्यवाही पर 23 अप्रैल तक जवाब पेश करें।
उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व बीती 9 अप्रैल को उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने बाघों के संरक्षण के मामले में शपथपत्र दाखिल न करने स्वयं न्यायालय में न आने पर प्रमुख सचिव वन के खिलाफ जमानती वारंट जारी कर दिया है। मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन एवं न्यायमूर्ति एनएस धानिक की खंडपीठ ने सोमवार को मामले की सुनवाई करते हुए एसएसपी देहरादून को निर्देश दिए हैं कि वह 22 अप्रैल को प्रमुख सचिव को कोर्ट में पेश करें। मामले के अनुसार ‘ऑपरेशन आई ऑफ टाइगर इंडिया’ द्वारा हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका पर न्यायालय ने पूर्व में केंद्र व राज्य सरकार को शपथपत्र दाखिल करने के निर्देश दिए थे। इसे पेश करने प्रमुख सचिव स्वयं नहीं आये, बल्कि अपर सचिव को भेज दिया। वहीं केंद्र ने अपने शपथपत्र में कहा कि राज्यों को 2017 में ही टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स बनाने के निर्देश दिए थे। कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा कि केंद्र के सर्कुलर पर क्या कार्रवाई की गई। इस पर पहले पहली अप्रैल तक शपथपत्र दाखिल करने को कहा था। इस दौरान सरकार ने कोर्ट को बताया कि उनके द्वारा 20 मार्च को ही प्रमुख सचिव को पत्र भेज दिया था। जिसके बाद कोर्ट ने प्रमुख सचिव को नौ अप्रैल को कोर्ट में पेश होने को कहा था। सोमवार को प्रमुख सचिव पेश नहीं हुए, लेकिन उन्होंने अपर सचिव को भेज दिया। इस पर कोर्ट ने बिना हाजिर माफी का प्रार्थना पत्र दिए उनकी अनुपस्थिति को बेहद गंभीरता से लेते हुए प्रमुख सचिव के खिलाफ जमानती वारंट जारी कर दिया।

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-डीएम से एक सप्ताह में मांगी आवश्यक बजट संबंधी पूरी रिपोर्ट
नवीन समाचार, नैनीताल, 19 फरवरी 2019।
उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने हल्द्वानी की यातायात व्यवस्था को सुधारने के लिए कालादूँगी रोड पर मुखानी चौराहे पर फ्लाई ओवर बनाये जाने पर फिर गंभीर रुख दिखाया है। उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन और न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने सम्बंधित जनहित याचिका में सुनवाई करते हुए जिला अधिकारी को निर्देश दिए है कि समय से फ्लाई ओवर बनाने के लिए आवश्यक बजट की पूरी रिपोर्ट एक सप्ताह के भीतर कोर्ट में पेश करने को कहा है।
मंगलवार को छोटी मुखानी हल्द्वानी निवासी पूरन चन्द्र जोशी की संबंधित जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान जिला अधिकारी द्वारा दायर शपथपत्र पर सुनवाई हुई, जिसमे जिला अधिकारी ने कहा है कि फ्लाई ओवर बनाने के लिए उनको बजट का निर्धारण करना है। फ्लाई ओवर बनाने के लिए 71 अतिक्रमणकारी चिन्हित कर लिए है, और बिजली के पोल, ट्रांसफार्मर, टेलीफोन के तार अन्य जगह शिफ्ट करने है। उल्लेखनीय है कि जनहित याचिका में कहा गया है कि कालाढूंगी रोड पर खासकर मुखानी चौराहे के पास आये दिन जाम की स्थित बनी रहती है, जिससे स्कूल, ऑफिस या अन्य जरूरी कामों के लिए जाने वाले लोगों का अधिकांश समय जाम में ही बीत जाता है और वे समय पर अपना काम नही कर पाते हैं, लिहाजा इस जाम से निजात दिलाने के लिए कालाढूंगी रोड पर फ्लाई ओवर का निर्माण किया जाय।

नवीन समाचार, देहरादून, 8 जनवरी 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय के एक फैसले से उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा परिषद की बोर्ड परीक्षा में हिंदी जैसे ‘अस्पष्ट’ मूल्यांकन वाले विषय में पुर्नमूल्यांकन कर अंकों में वृद्धि मिलने का नजीर बन सकने वाला बड़ा फैसला आया है। उच्च न्यायालय मंे याचिका दायर करने पर इंटरमीडिएट की एक छात्रा के हिंदी विषय में 20 अंक बढ़ गए हैं। यह फैसला इसलिए अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस फैसले के बाद आगे भविष्य में अन्य छात्र भी अधिक हिम्मत के साथ पुर्नमूल्यांकन कराने के लिए आगे आ सकते हैं, तथा इसके बाद मूल्यांकनकर्ताओं को मूल्यांकन में अधिक जिम्मेदार होना होगा।
मामला रुद्रप्रयाग जिले के तिलपाड़ा की रहने वाली मानसी नाम की छात्रा है। मानसी ने वर्ष 2018 में इंटर की परीक्षा दी थी। इसमें उसे 500 में से 411 अंक मिले थे। वह मैरिट में आई, किंतु हिन्दी विषय में उसे 54 अंक ही मिले थे, जबकि उसे लगता था कि उसके कई सवाल सही थे और उसके अधिक अंक आने चाहिए थे। इस पर उसने पुनर्मूल्यांकन करवाया जिसमें उसके 12 अंक बढ़े। किंतु मानसी इससे भी संतुष्ट नहीं हुई, और उसने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कॉपी की सही जांच करवाने की मांग की। अदालत ने सुनवाई के बाद उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा परिषद से कमेटी गठित कर 10 दिन के भीतर याची की उत्तर पुस्तिका का पुनर्मूल्यांकन करवाया। पुर्नमूल्यांकन में छात्रा के साढ़े सात अंक और बढ़े यानी 8 अंक बढ़ गए। अब न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की एकलपीठ फरवरी में मामले की अगली सुनवाई करेगी।

यह भी पढ़ें : आतंकवादी बताकर दर्ज कर दिया था फर्जी मुकदमा, हाई कोर्ट ने मांगा जवाब

नवीन समाचार, नैनीताल, 7 जनवरी 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की एकलपीठ ने रुड़की पुलिस द्वारा फर्जी मुकदमा दर्ज करने पर सरकार से दो सप्ताह में जवाब पेश करने को कहा है।
मामले के अनुसार रुड़की निवासी फिरोज ने अपनी याचिका में  कहा था है कि वे रुड़की  में वाटर स्पोर्ट क्लब चलाते है। 22 जुलाई 2018 को पुलिस ने बिना किसी कारण व अपराध के उनको घर से उठाकर थाने में बंद कर दिया और उनके खिलाफ झूठे मुकदमे चोरी, लूटपाट, आतंकवादी व षड्यंत्र रचने के आधार पर पुरानी तिथि में आईपीसी की धारा 151 के तहत चालान काटकर एफआईआर रुड़की थाने में दर्ज कर दी। 26 जुलाई 2018 को रिहा भी कर दिया और थाने में उनको कोतवाली इंचार्ज साधना त्यागी व एसएसआई हरपाल सिंह ने प्रताड़ित भी किया। इसकी शिकायत उन्होंने डीजीपी से की। डीजीपी ने इस मामले की जांच एसएसपी हरिद्वार से करने को कहा परन्तु कोई कार्यवाही न होने पर उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका दायर की जिसमे उन्होंने दोषी दोनों पुलिस वालो के खिलाफ सीबीआई की जांच करने की मांग की है । मामले को सुनने के कोर्ट ने सरकार से दो सप्ताह के भीतर जवाब पेश करने को कहा है।

यह भी पढ़ें : भारी पड़ी गुमशुदगी की अनदेखी, HC ने दिए सीबीआई जांच व जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के आदेश

नवीन समाचार, नैनीताल, 3 जनवरी 2019। उत्तराखंड पुलिस को 8 तीर्थयात्रियों की गुमशुदगी को  गंभीरता से लेना भारी पड़ने वाला है। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की एकलपीठ ने 2017 में पंजाब से हेमकुंड साहिब में यात्रा के लिए आये आठ तीर्थ यात्रियों के अचानक लापता होने व पुलिस द्वारा मामले के सन्तोषजनक कार्यवाही न करने को गम्भीरता से लेते हुए मामले को सीबीआई से जाँच करने तथा  डीजीपी को जाँच करने वाले अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्यवाही करने के आदेश दिए है।
मामले के अनुसार पंजाब निवासी लखविंदर कौर व अन्य ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि वर्ष 2017 में पंजाब के दो विदेशी सहित आठ श्रद्धालु हेमकुंड साहिब की यात्रा पूरी कर पंजाब के लिए लौट रहे थे। इसकी जानकारी उन्होंने फोन से अपने परिजनों की दी थी परन्तु वे लापता हो गए। जिनकी लापता होने की जानकारी कार के ड्राइवर ने गोविन्द घाट पुलिस को दी थी। उक्त लोगो के घर वापस न लौटने पर अमेरिका में रहने वाले उनके परिजनों ने भारत आ कर पुलिस से जानकारी चाही तो गोविंदघाट पुलिस ने उनको जाँच की रिपोर्ट नही दी। इससे मजबूर होकर याची के द्वारा इस मामले की जाँच सीबीआई से कराने की मांग की गयी थी। जिस पर पूर्व में कोर्ट ने आइओ से रिपोर्ट मांगी थी परन्तु आइओ द्वारा सन्तोषजनक उत्तर नही देने पर 8 लोगो के लापता होने को कोर्ट ने गम्भीरता से लेते हुए मामले की सीबीआई से जाँच करने के आदेश दिए है और आइओ के खिलाफ विभागीय कार्यवाही करने के आदेश भी दिए है।

यह भी पढ़ें : डीएम दीपक रावत को हाई कोर्ट का अवमानना नोटिस, नौ को कोर्ट में हाजिर हों…

नवीन समाचार, नैनीताल, 3 जनवरी 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने अवैध बूचड़खानों को बंद करने के आदेश का अनुपालन नहीं करने के मामले में सुनवाई करते हुए हरिद्वार के डीएम दीपक रावत को अवमानना नोटिस जारी किया है, और उन्हें आगामी नौ जनवरी को कोर्ट में तलब किया है।
बृहस्पतिवार को उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की एकलपीठ में हरिद्वार निवासी परवेज आलम ने अवमानना याचिका पर सुनवाई हुई, जिसमें याची ने जिलाधिकारी रावत पर अदालत के अवैध बूचड़खानों को बंद करने तथा सार्वजनिक स्थान पर जानवर के वध पर पाबंदी लगाने के आदेशों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया है। कहा है कि हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी हरिद्वार में तमाम स्थानों पर सार्वजनिक स्थानों पर अवैध कत्लेखानों का संचालन हो रहा है और जानवरों का वध किया जा रहा है। याची के अनुसार आदेश के क्रियान्वयन को लेकर बार-बार जिला मजिस्ट्रेट को प्रत्यावेदन दिया मगर कोई कार्रवाई नहीं की गई। याची के अधिवक्ता कार्तिकेय हरिगुप्ता ने कोर्ट को बताया कि कोर्ट के आदेश के अनुपालन में शासन की ओर से भी दिशा-निर्देश जारी किए गए थे, मगर डीएम के द्वारा उनका अनुपालन नहीं किया गया। एकलपीठ ने मामले को सुनने के बाद डीएम को अवमानना नोटिस जारी करते हुए नौ जनवरी को कोर्ट में पेश होने के निर्देश दिए।

मर्चूला-भिकियासैण मोटर मार्ग का मलबा रामगंगा नदी में डाले जाने पर हाईकोर्ट ने किया सरकार का जवाब तलब

नवीन समाचार, नैनीताल, 2 जनवरी 2019। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने मर्चूला-भिकियासैण के बीच बन रहे 40 किलोमीटर मोटर मार्ग का मलबा रामगंगा नदी में डाले जाने को लेकर दायर जनहित याचिका में  मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन  व न्यायधीश  आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने सुनवाई करते हुए सरकार से पूछा है कि मोटर मार्ग निर्माण का कार्य कितना बचा है ? निर्माण कार्य कर रही कम्पनी ने निर्धारित जगह पर मलुआ डाला है या सारा मलुआ नदी में डाल दिया है ? और कम्पनी को कितना पेमेंट हो चूका है ? 
उल्लेखनीय है कि हल्द्वानी निवासी मानवाअधिकार आयोग के कार्यकर्ता गुरविंदर चढ्ढा ने हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि मर्चूला-भिकियासैण के लिए 40 किलोमीटर मोटर मार्ग का निर्माण कार्य चल रहा है। पीडब्लूडी की मिलीभगत के कारण निर्माण कार्य कर रही कम्पनी के द्वारा मार्ग का सारा मलबा रामगंगा नदी में डाला जा रहा है, जबकि मोटर मार्ग के टेंडर के वक्त पर्यावरण मंत्रालय भारत सरकार ने इस मलबे को डालने के लिए 8 डम्पिंग जोन घोषित किये थे, परन्तु कम्पनी द्वारा मलबा वहां न डालकर रामगंगा नदी में डाला जा रहा है । रामगंगा नदी कार्बेट नेशनल पार्क का मुख्य जल स्रोत है। मलबा डाले जाने के कारण नदी का मार्ग अवरुद्ध हो गया है जिससे नदी में पाये जाने वाले जीवो खतरे में आ गए है और नदी का मार्ग अवरुद्ध हो जाने के कारण कार्बेट नेशनल पार्क के आस पास रहने वाले लोगो व जीवो पर भी जल संकट का सामना करना पड रहा है। पूर्व में  कोर्ट ने गम्भीर रुख अपनाते हुए निर्माण कार्य कर रही एजेंसी को एक सप्ताह में पक्षकार बनाये जाने के आदेश याचिकर्ता को दिए थे।

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      • उत्तराखंड उच्च न्यायालय से बाबा रामदेव की कंपनी को 20.4 मिलियन का झटका, स्थानीय किसानों के लिए खुशखबरी
    • स्थानीय जैविक संसाधनों को माना राष्ट्र एवं इसे बचाये रखने वाले लोगों की संपत्ति 
रवीन्द्र देवलियाल @ नवीन समाचार, नैनीताल, 27 दिसंबर 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्थानीय संपदाओं को राष्ट्र एवं इसे बचाये रखने वाले स्थानीय लोगों की संपत्ति बताते हुए बड़ा व महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। मामले में योग गुरू बाबा रामदेव की दिव्य फार्मेसी कंपनी को झटका मिला है। कोर्ट ने उत्तराखंड जैव विविधता बोर्ड के आदेश के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें बोर्ड ने जैव विधिधता अधिनियम 2002 के प्रावधानों के तहत कंपनी को होने वाले न्यायोचित लाभ का कुछ अंश किसानों के हित में अदा करने को कहा था। इस प्रकार यह फैसला किसानों के लिए बड़ी खुशखबरी साबित हो सकता है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकलपीठ में हुई। कोर्ट ने विगत 7 सितम्बर को निर्णय सुरक्षित रख लिया था। गत 21 दिसंबर को कोर्ट ने अपना महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया लेकिन आदेश की प्रतिलिपि गुरूवार को जारी हुई।
दिव्य फार्मेसी की ओर से दायर याचिका में कहा गया था कि उत्तराखंड जैव विविधता बोर्ड (यूबीबी) ने जैव विविधता अधिनियम के प्रावधानों के तहत दिव्य फार्मेसी कंपनी को राज्य के जैविक संसाधनों के दोहन व उपयोग करने की खातिर 4.21 बिलियन यानी 421 करोड़ रुपये के राजस्व के बदले में 20.4 मिलियन यानी 2.04 करोड़ रुपये की राशि किसानों व स्थानीय समुदायों को अदा करने को कहा था। वहीं दिव्य फार्मेसी की ओर से कहा गया कि यूबीबी को ऐसी मांग करने को न तो कोई अधिकार है और न ही यह उसके क्षेत्राधिकार का मामला है। साथ ही याचिकाकर्ता ऐसी किसी राशि को अदा करने के लिये उत्तरदायी नहीं है। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि जैव विविधता अधिनियम भारतीय कंपनियों पर लागू नहीं होता है। साथ ही कंपनी की ओर से यह भी कहा गया कि देश के प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से कंपनी को होने वाले लाभ को स्थानीय लोगों के साथ बांटने से उसके समानता के अधिकार का हनन होता है।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जैविक संसाधन राष्ट्र की सम्पत्ति है लेकिन यह उन स्वदेशी व स्थानीय समुदायों की भी संपत्ति है जिन्होंने इसे सदियों से संरक्षित रखा है। कोर्ट ने यह भी कहा है कि उत्तराखंड में उच्च हिमालयी क्षेत्र में रहने वाले समुदाय अपने जैविक संसाधन के पारंपरिक हकदार हैं। वे न केवल इसे संरक्षित रखते हैं बल्कि उसकी जानकारी को वे पीढी दर पीढी समाहित रखते हैं और बढ़ाते रहते हैं। कोर्ट ने आगे कहा कि बेशक यह इन समुदायों का बौद्धिक संपदा अधिकार नहीं माना जा सकता है लेकिन सम्पत्ति  है।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 18 दिसंबर 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की एकलपीठ ने तकनीकी शिक्षा सचिव ओम प्रकाश को बड़ी राहत दी है। कोर्ट के आदेश ना मानने पर अवमानना में फंसे सचिव ओम प्रकाश के खिलाफ जारी अवमानना नोटिस को न्यायालय वापस ले लिया है। एकलपीठ में आज अपर मुख्य सचिव ओम प्रकाश पेश हुए । उन्होंने न्यायालय को अवगत कराया कि जो भी आदेश पूर्व में दिया था उसका पालन कर दिया गया है। इस दौरान कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि राज्य के अधिकारी क्यों हाई कोर्ट के आदेशों को नहीं मान रहे हैं।
मामले के अनुसार राजेंद्र सिंह निवासी देहरादून व 5 अन्य ने हाई कोर्ट में अवमानना याचिका दायर कर कहा है कि 14 जून 2018 को खंडपीठ ने उन्हें राजकीय पॉलिटेक्निक में प्रवक्ता पद पर नियमित करने व नियमित कर्मचारियों की भाँति अन्य सुविधाए देने के आदेश दिए थे। इसके बजाय तकनीकी शिक्षा सचिव ने मौखिक तौर पर काम पर नही आने को कहा और बेतन भी नही दिया जा रहा। परंतु तकनीकी शिक्षा सचिव ओम प्रकाश द्वारा न तो उन्हें नियमित किया न ही न्यूनतम वेतनमान दिया। खंडपीठ के इस आदेश को सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर कर चुनौती दी और सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें हाई कोर्ट के समक्ष पुनर्विचार याचिका दायर करने के आदेश दिए, लेकिन पुनर्विचार याचिका में कोई आदेश पारित न होने के कारण याचिकाकर्ताओं के द्वारा पूर्व के आदेश पर अवमानना याचिका दायर की गयी।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 12 दिसंबर 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने सिडकुल हरिद्वार में पिछली सरकार के कार्यकाल में वर्ष 2012 में सरकारी भूमि को कौड़ियो के दाम पर कंपनियो व रियल स्टेट को बेचे जाने के मामले में सुनवाई करते हुए सिडकुल से दस दिन के भीतर विस्तृत शपथपत्र पेश करने को कहा है। साथ ही खंडपीठ ने यह भी पूछा है कि औद्योगिक क्षेत्र की जमीन को इतने सस्ते दामों में कैसे बेचा जा सकता है।
मामले के अनुसार देहरादून निवासी दीपक आजाद ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि सिडकुल हरिद्वार में सरकार की भूमि को सम्बंधित अधिकारियांे की मिलीभगत से कौड़ियों के दामों पर कम्पनियो व रियल स्टेट को बेच रही है। जिस जमीन के सर्किल रेट 2007 में 20,507 रुपये प्रति वर्ग मीटर थे, वही जमीन 2012 में 6500 रुपये प्रति वर्ग मीटर के दामों पर जमीन बेच दी गयी। लिहाजा मामले की जांच की जाये।

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-बद्रीनाथ मंदिर के महालक्ष्मी मंदिर को दिया गया है किराये पर
नवीन समाचार, नैनीताल, 11 दिसंबर 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खंडपीठ ने बद्रीनाथ में महालक्ष्मी मंदिर को किराए में दिए जाने के मामले में उत्तराखंड के मुख्य सचिव, बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति व महालक्ष्मी मंदिर को चलाने वाली संस्था को नोटिस जारी कर तीन सप्ताह मे जवाब पेश करने को कहा है।
मामले के अनुसार हरिद्वार निवासी राकेश कौशिक ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि बद्रीनाथ-केदारनाथ समिति ने बिना राज्य सरकार की अनुमति लिए बद्रीनाथ में स्थित महालक्ष्मी मंदिर को किसी अन्य संस्था को 35 हजार रुपये प्रतिवर्ष की दर पर किराए पर दे दिया है, साथ ही चरणामृत बेचने की अनुमति भी दे दी है। ऐसा करना गलत है। याची का यह भी कहना है कि बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिरों की सम्पत्ति को बिना राज्य सरकार की अनुमति के किसी को भी हस्तांतरित नहीं किया जा सकता है। मामले को सुनने के बाद खंडपीठ ने मुख्य सचिव ,बद्रीनाथ केदारनाथ समिति व महालक्ष्मी मंदिर को चलाने वाली संस्था को नोटिस जारी किए गए हैं साथ ही तीन सप्ताह मे जवाब पेश करने को कहा है।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 4 दिसंबर 2018। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की 2013 की नियमतिकरण नियमावली पर अग्रिम आदेश तक रोक लगा दी है । न्यायालय ने सरकार को यह भी निर्देश दिए हैं कि नियमितीकरण नियमावली के अन्तर्गत विभागों, निगमों, परिषदों व अन्य सरकारी उपक्रमो में कर्मचारियों को नियमित न करें । मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खण्डपीठ में हुई। अगली सुनवाई दस दिन बाद की नियत की गई है।

मामले के अनुसार नैनीताल जिले के सौड़बगड़ निवासी नरेंद्र सिंह बिष्ट व अन्य ने याचिका दायर कर कहा था कि वे इंजनीयरिंग में डिप्लोमा होल्डर हैैं और सरकार के अधीन जेई पद के लिए नियुक्ति पाने की पूर्ण योग्यता रखते हैं। उन्होंने अपनी याचिका में सरकार की 2013 की नियमितीकरण नियमावली को चुनौती दी है। उनका कहना है कि उक्त नियमितीकरण नियमावली सुप्रीम कोर्ट के उमा देवी व एमएल केसरी के निर्णय के विपरीत है। परन्तु सरकार उक्त निर्णयो के विपरीत निगमो, विभागों, परिषदों व अन्य सरकारी उपक्रमो में बिना किसी चयन प्रक्रिया के कर्मचारियों का नियमितीकरण कर रही है जो पूर्ण रूप से विधि विरुद्ध है । उक्त नियमावली को सरकार ने सन 2016 में संशोधित किया था । इस संशोधन नियमावली को हिमांशु जोशी द्वारा उच्च न्यायालय में पूर्व में चुनौती दी गई थी जिसे न्यायालय ने निस्तारित कर दिया था।

2016 की नियमावली भी हो चुकी है रद

हाई कोर्ट 2016 की नियमितीकरण नियमावली को भी निरस्त कर चुका है। 17 अप्रैल को हाई कोर्ट की एकलपीठ ने हिमांशु जोशी की याचिका पर सुनवाई करते हुए नियमितीकरण नियमावली-2016 निरस्त कर दी थी, जिसके बाद एकलपीठ के आदेश के खिलाफ विशेष अपील दायर की गई। 20 जुलाई को विशेष अपील भी खारिज हो चुकी है। याची के अधिवक्ता के अनुसार, ताजा फैसले के बाद दस अप्रैल 2006 के बाद दस साल पूरे कर नियमित हुए कार्मिकों का नियमितीकरण नियम विरुद्ध माना जाएगा। यहां बता दें कि राज्य के तमाम महकमों में हजारों संविदा, दैनिक, ठेका कर्मचारी कार्यरत हैं।

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नैनीताल, 22 नवंबर 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने पहाड़ पर नियुक्त चिकित्सकों को नियमित चिकित्सकों की तरह पिछले मई माह से एरियर सहित वेतन व अन्य सुविधाएं देने के आदेश दिये हैं। मामले के अनुसार देहरादन के चिकित्सक डा. अभिषेक बडोनी व अन्य ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर कहा था कि उन्होंने एमबीबीएस की शिक्षा राजकीय मेडिकल कॉलेज हल्द्वानी से राजकीय मेडिकल कॉलेज के लिये तय सालाना शुल्क 15 हजार पर ली है। वहां प्रवेश के दौरान देहरादून, ऊधमसिंह नगर, हरिद्वार व नैनीताल के अलावा पर्वतीय जिलों के दुर्गम-अतिदुर्गम के चिकित्सालयों में पांच साल सेवा करने का बांड भरवाया गया था। बांड में साफ उल्लेख था कि उन्हें नियमित चिकित्सकों की तरह 55 हजार से एक लाख 75 हजार वेतनमान, साल भर में 13 दिन अवकाश सहित अन्य सुविधाएं दी जाएंगी, मगर सरकार द्वारा बांड के अनुसार सुविधाएं नहीं बल्कि मासिक तौर पर केवल 52 से 54 हजार रुपये मानदेय दिया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की खंडपीठ ने इस मामले में आदेश पारित किया था, किंतु इसका आदेश अब जारी हुआ है। बताया गया है कि इस आदेश से पहाड़ में सेवाएं दे रहे 26 डॉक्टर सीधे तौर पर लाभान्वित होंगे।

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नैनीताल, 11 अक्तूबर 2018। उत्तराखंड हाई कोर्ट की कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश राजीव शर्मा और न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने राज्य सरकार को पिथौरागढ़ जिले के सीमावर्ती गांवों में रहने वाले लोगों को 24 घंटे में दैनिक आवश्यकता की घी, गेहूं, धान, आटा, सब्जी, मसाले, माचिस, पावडर दूध, कंबल और मिटटी का तेल आदि चीजें उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। खण्डपीठ ने इस आपूर्ति को पूरे शीतकाल में जारी रखने को कहा है। मामले में मुख्य सचिव को भारतीय वायु सेना से संपर्क कर और भारत तिब्बत सीमा पुलिस के साथ समन्वय बनाकर इस आदेश का अनुपालन करने में मदद लेने को भी कहा है। साथ ही विपक्षियों से दो सप्ताह के भीतर शपथपत्र देने को भी कहा है।
मामले के अनुसार धारचूला निवासी महेंद्र सिंह बुदियाल ने जनहित याचिका दायर कर न्यायालय से कहा था कि पिथौरागढ़ जिले के लमारी, बुंदी, गुंजी, चौयालेख, गर्ब्यांग, नपलच्यु नाबी, रोगकोंग, कुटी, कालापानी और नाभीढांग गावों की लगभग 9000 की आबादी के लिए कोई सड़क नहीं है। पगडंडियां ही यहां आनेजाने का एकमात्र रास्ता हैं। 1999 से 2000 के बीच केंद्र सरकार ने सीमांत क्षेत्रों में सड़कों के महत्व को देखते हुए घटियाबागढ़ से लिपुलेख तक चार किलोमीटर मोटर मार्ग का प्रस्ताव स्वीकृत किया था, जिसे बीआरओ द्वारा संचालित कराना था जो अभी तक लंबित है। बताया गया कि वहां हेलीकॉप्टर सेवा शुरू की गई थी लेकिन उसका किराया 3100 रुपए प्रति व्यक्ति यानी बहुत ज्यादा था, और उसे भी बिना किसी नोटिस के बंद कर दिया गया है। संचार और हेलीकॉप्टर सेवा के अभाव में उनके क्षेत्र में अब खाद्य सामग्री और दूसरे रोजमर्रा के जरूरी सामान भी समाप्त हो गए हैं।

बड़ा फैसला: निचली अदालतों से भी ले सकेंगे अग्रिम जमानत, नहीं आना पड़ेगा हाईकोर्ट

नैनीताल, 20 सितंबर 2018। उत्तराखंड में भी अब किसी भी अपराध के आरोपित को अंतरिम जमानत के लिए हाईकोर्ट नहीं आना पड़ेगा। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने दूरगामी प्रभाव के एक फैसले में उत्तराखंड में भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (आईपीसी) की धारा 438 को प्रभावी करते हुए अग्रिम जमानत के प्रभाव को लागू कर दिया है। इस आदेश के बाद राज्य को निचली अदालतों को भी अंतरिम जमानत देने का अधिकार मिल गया है। इससे आरोपित को जेल जाने से पहले ही जमानत मिल जाएगी।
मामले के अनुसार याची विष्णु सहाय व मोहन कुमार मित्तल ने विशेष अपील दायर कर एकल पीठ के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता-उत्तर प्रदेश संशोधन अधिनियम 1976 को चुनौती दी थी और कहा था कि उक्त प्राविधान संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21 व 22 का उल्लंघन है। उत्तर प्रदेश संशोधन अधिनियम 1976 की धारा 16 के द्वारा अग्रिम जमानत के प्राविधान वाली भादंसं की धारा 438 को रिपिल कर दिया था। याची का कहना था कि उत्तर प्रदेश पुर्नगठन अधिनियम के तहत उत्तराखंड सरकार द्वारा लागू किये गये नियम उत्तराखंड राज्य बनने के बाद दो वर्ष तक ही प्रभावी हो सकते थे। इधर उत्तराखंड सरकार ने न तो यूपी संशोधन अधिनियम को लागू किया है और न ही निरस्त किया है। इसलिये यूपी के उस कानून को यहां लागू नहीं किया जा सकता है। माना जा रहा है कि इस आदेश के बाद पुलिस में मामला दर्ज होने के बाद कोई भी आरोपित निचली अदालत में प्रार्थना पत्र दाखिल कर अंतरिम जमानत ले सकता है, जबकि अब तक किसी भी प्रकृति के अपराध में आरोपित को गिरफ्तारी से बचने के लिए हाईकोर्ट में अंतरिम जमानत अर्जी लगानी पड़ती है।

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-निबंधन और शर्त के अनुसार 60 वर्ष की उम्र पहुँच चूके पुरोहितों को मिलेगा अनुरक्षण
-सरकार की ओर से उच्च न्यायालय में 30 जून 2016 का शासनादेश किया गया पेश, जिसमे अनुरक्षण 800 से बढ़ा कर 1000 किया गया
नैनीताल, 6 सितंबर 2018। उत्तराखंड सरकार निबंधन और शर्तों के अनुसार 60 वर्ष की उम्र पहुँच चूके पुरोहितों को प्रतिमाह 1000 रुपए का अनुरक्षण देगी। कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ में राज्य सरकार ने 30 जून 2016 का शासनादेश पेश किया, जिसमे अनुरक्षण 800 से बढ़ा कर 1000 किया गया है।
उल्लेखनीय है कि हरिद्वार निवासी सुभाष जोशी ने हाई कोर्ट के मुख्य न्यायधीश को पत्र लिखकर कहा था कि मंदिरो व श्मशानघाट के महापुरोहितो की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है, इस काम से उनका ठीक से गुजारा तक नहीं चल पाता है लिहाजा उनको सरकार से आर्थिक सहायता दिलाई जाए। पूर्व में खंडपीठ ने इसको जनहित के रूप में स्वीकार किया था और सरकार से इसमें जवाब पेश करने को कहा था। बृहस्पतिवार को मामले की सुनवाई के दौरान महाअधिक्वता द्वारा कोर्ट को अवगत कराया कि सरकार ने इस सम्बन्ध में शासनादेश पूर्व में जारी किये है और इनकी सहायता के लिए सरकार आर्थिक मदद दे रही है। मामले को सुनने के बाद खंडपीठ ने सरकार की इस पहल को सराहनीय माना और सरकार से इसका व्यापक प्रचार प्रशार करने को कहा। साथ ही खंडपीठ ने जनहित याचिका को निस्तारित कर दिया है।

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नैनीताल, 29 अगस्त 2018। उत्तराखण्ड हाई कोर्ट की कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खण्डपीठ ने ब्राह्मणों-पंडितों, पुरोहितों के हितों पर बड़े निर्देश दिए हैं। खण्डपीठ ने तीर्थो, मन्दिरों में पण्डितों और पुरोहितों की आर्थिक स्थिति ठीक नही होने पर हरिद्वार निवासी पण्डित सुभाष जोशी के पत्र को जनहित याचिका के रूप में स्वीकार कर सुनवाई करते हुए सरकार से उन्हें जीवन यापन करने के लिये आर्थिक सहायता या मासिक भुगतान देने के लिए 6 सितम्बर तक वित्त सचिव से जानकारी लेकर कोर्ट में स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।
उल्लेखनीय है कि मामले में याची पण्डित सुभाष जोशी ने अपने पत्र में कहा है कि तीर्थो, मन्दिरों व श्मशान घाट में जो महा ब्राह्मण होते हैं उनकी आर्थिक व सामाजिक स्थिति ठीक नहीं है, लिहाजा उनको सरकार जीवन यापन करने के लिये आर्थिक सहायता या मासिक भुगतान करे, जिससे उनकी आर्थिक व सामाजिक सुरक्षा हो सके। इस मामले में खण्डपीठ ने अधिवक्ता एमसी पंत को न्यायमित्र नियुक्त किया है । पंत ने उनका पक्ष रखते हुए तीर्थो को वैष्णो देवी  और बालाजी की तर्ज पर श्राइन बोर्ड गठित करने की मांग भी की जिससे इनमें कार्य करने वाले लोगों को वेतन व अन्य लाभ दिए जा सकें। मामले में प्रदेश के महाधिवक्ता द्वारा सरकार का पक्ष रखते हुए कहा गया कि संविधान के अनुच्छेद 25(जे) के अनुसार किसी भी धर्म विशेष के लिये इस तरह के सेवाएं देना उचित नहीं है। यह सविधान का उल्लंघन होगा। यह सम्भव भी नहीं है। खण्डपीठ ने इस मामले में महाहाधिवक्ता से कहा है कि वे इस सम्बन्ध में वित्त सचिव से वार्ता करें और 6 सितम्बर को स्थिति से कोर्ट को अवगत कराये। मामले की अगली सुनवाई 6 सितम्बर की तिथि नियत की है।

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नैनीताल, 24 अगस्त 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने प्रदेश में केंद्र सरकार के ‘क्लीनिकल इस्टेब्लिशमेंट एक्ट-2010’ के अधीन पंजीकृत नहीं हुए अस्पतालों और क्लीनिकों को तत्काल बंद करने के आदेश दिये हैं। साथ ही इस एक्ट के तहत पंजीकृत अस्पतालों और क्लीनिकों में इस एक्ट के प्राविधानों का पूर्णतया पालन कराने के आदेश दिये हैं। उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड में इस एक्ट के तहत पंजीकृत अस्पतालों और क्लीनिकों की संख्या नगण्य बताई जा रही है। यानी अधिकांश अस्पताल और क्लीनिक गैर पंजीकृत हैं। ऐसे में उत्तराखंड के कमोबेश सभी अस्पतालों और क्लीनिकों पर ताले लटकने की स्थिति उत्पन्न हो गयी है। आगे देखने वाली बात होगी कि सरकार इस मामले में क्या रुख अपनाती है। हाईकोर्ट के आदेश का पालन करती है, अथवा सर्वोच्च न्यायालय जाती है।
इसके अलावा न्यायाल ने राज्य सरकार को सरकारी और गैर सरकारी अस्पतालों में इलाज, ऑपरेशन और परीक्षणों के लिए एक माह के भीतर फीस तय करने के भी आदेश दिए है। साथ ही न्यायालय ने प्रदेश के सभी अस्पतालों को आदेश दिए हैं कि वे बेवजह मरीजो का डायग्नोस्टिक टेस्ट न कराएं, तथा रोगियों को केवल जेनरिक दवा ही लिखें, ब्रांडेड दवा खरीदने के लिए अनुचित दबाव ना बनाएं।

राज्य में एक्ट लागू ही नहीं, सभी प्राइवेट स्थानीय नगर निकायों से केवल एक संस्थान के रूप में हैं पंजीकृत

नैनीताल। इस बारे में प्रदेश की चिकित्सा नगरी के रूप में विकसित हो रही हल्द्वानी के कुछ बड़े चिकित्सालयों के मालिकों से बात की गयी तो उनका कहना है कि ‘क्लीनिकल इस्टेब्लिशमेंट एक्ट’ के बारे में पहले ही राज्य सरकार की चिकित्सकों के संगठन आईएमए की वार्ता चल रही है। यह एक्ट अभी राज्य में लागू नहीं है। प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियों के दृष्टिगत इसे लागू करना आसान नहीं है। उनका कहना है कि यह लागू हुआ तो अस्पताल तो किसी तरह अपना पंजीकरण और इसके प्राविधानों का पालन कर लेंगे, परंतु इससे चिकित्सा सुविधाएं और अधिक महंगी हो जाएंगीं। अभी हल्द्वानी के केवल दो चिकित्सालय डा. खुराना का कृष्णा अस्पताल और बृज लाल हॉस्पिटल ही इस एक्ट नहीं वरन एक राष्ट्रीय उपक्रम से पंजीकृत हैं, जबकि अन्य सभी अस्पताल केवल नगर पालिका, नगर निगम में एक संस्थान के रूप में पंजीकृत हैं।

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-राज्य में नशे को रोकने के लिए सभी शिक्षण संस्थानों, निजी संस्थानों और अन्य सार्वजनिक स्थानों में उच्च शिक्षा निदेशक की अध्यक्षता में ड्रग्स कंट्रोल क्लब खोलने के आदेश

प्रतिबंधित की गयी प्रमुख दवाइयां: बुखार की पैरासिटामौल, सिट्राजिन, टेराफिनाडीन, डीकोल्ड टोटल, सेराडॉन, फिंसाडीन, डोवर्स पावडर, दर्द की डाईक्लोफेन्स, पेरासिटामोल डोवोर्स टेबलेट व कोम्बिफ्लेम आदि।

नैनीताल, 13 अगस्त 2018। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने प्रदेश में 434 दवाओं की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया है। यह प्रतिबंध राज्य के युवाओ का नशे की गर्त में जाने के खिलाफ दायर रामनगर नैनीताल निवासी श्वेता मासीवाल की जनहित याचिका में सुनवाई करते हुए कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की अदालत ने दिये। खंडपीठ ने किशोर न्याय अधिनियम की धारा 77 जे जे में विस्तार करते हुए 18 साल से कम उम्र के बच्चों को प्रतिबंधित दवाइयां, मादक पदार्थ और नशा होने की आशंका वाली किसी भी दवा-चीज की बिक्री पर भी रोक लगा दी है।
खंडपीठ ने राज्य सरकार को केंद्रीय औषधि नियंत्रक बोर्ड द्वारा प्रतिबंधित की गयी सभी 434 दवाओं की बिक्री पर पूर्ण रूप से रोक लगा दी है। पीठ ने कहा कि जिस किसी मेडिकल स्टोर में ये दवाईया उपलब्ध हैं उनको पुलिस की मदद से या तो नष्ट किया जाए, अथवा इन्हें इनकी कम्पनी को वापस किया जाए। इसके अलावा खंडपीठ ने राज्य में नशे को रोकने के लिए सभी शिक्षण संस्थानों, निजी संस्थानों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर ड्रग्स कंट्रोल क्लब खोलने के आदेश भी दिए हैं। इन क्लबों के अध्यक्ष उच्च शिक्षा निदेशक और नोडल अधिकारी विद्यालयी शिक्षा निदेशक होंगे। खण्डपीठ ने यह भी निर्देश दिए हैं कि जेलों से कैदियों को लाते व ले जाते वक्त नारकोटिक्स की जांच की जाये। राज्य व जनपदांे की सीमाओं पर ड्रग्स की जांच करने के लिए सरकार 3 सप्ताह में विशेष टीम गठित करे। प्रदेश के प्रत्येक जिले में नशा मुक्ति केंद्र खोले जाएं। राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर ड्रग्स नारकोटिक्स स्क्वाड का गठन करने को भी कहा गया है। मामले के अनुसार याचिकर्ता ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि प्रदेश के युवा वर्ग दिन-प्रतिदिन नशे की गिरफ्त में डूब रहे हैं, लिहाजा नशे के कारोबारियों पर रोक लगाई जाये। उल्लेखनीय है कि पूर्व में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश केएम जोसफ ने भी इस मामले में टिप्पणी करते हुए कहा था कि प्रदेश का युवा वर्ग नशे की गर्त में डूब रहा है, तथा प्रदेश सरकार और पुलिस नशा रोकने में नाकाम हो रही है। पूर्व में इस मामले में एसएसपी एसटीएफ नारकोटिक्स एंड ड्रग्स कण्ट्रोल और क्षेत्रीय निदेशक कोर्ट में पेश हुए थे उन्होंने नशे को रोकने के लिए स्टाफ की कमी का हवाला दिया था, तथा माना था कि जो भी थोडा बहुत इसको रोकने के लिए केवल इलेक्ट्रानिक उपकरणों और एसएसबी की मदद से ही कार्रवाई की जाती है। बताया था कि उत्तराखंड में नशे का कारोबार बाहर के राज्यो से प्रमुख कोबरा गैंग के माध्यम से होता है। इस पर खंडपीठ ने इस मामले को महत्वपूर्ण मानते हुए पूर्व में ही राज्य के सभी 27 विश्वविद्यालयो, सभी एसएसपी और सभी जिला अधिकारियों को पक्षकार बनवाया था।

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  • तीसरे बच्चे को जन्म देने के लिए मातृत्व अवकाश नहीं देने वाले नियम को असंवैधानिक करार दिया

नैनीताल, 4 अगस्त 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने तीसरे बच्चे के जन्म के लिए मातृत्व अवकाश नहीं दिए जाने के प्रावधान में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने संशोधित फैसला दिया है। उच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा की एकलपीठ ने धात्री महिला को तीसरे बच्चे को जन्म देने के लिए मातृत्व अवकाश नहीं देने वाले नियम को उस स्थिति में असंवैधानिक करार दिया है, जबकि उसके पहले से दो जुड़वां बच्चे हों। यानी अब हर दूसरी डिलीवरी पर मातृत्व अवकाश मिल सकेगा, चाहे महिला के पहले से 2 जुड़वाँ बच्चे ही क्यों ना हों।न्यायालय ने साफ कहा कि यह नियम मातृत्व लाभ अधिनियम 1961 की धारा-27 के प्रावधानों के साथ ही संविधान के अनुच्छेद 42 की भावना के विपरीत है। मामले में सुनवाई के बाद यह फैसला दिया है।
उच्च न्यायालय का यह फैसला राजकीय मेडिकल कॉलेज हल्द्वानी की स्टाफ नर्स उर्मिला मैसी की ओर दायर याचिका पर आया है। सिस्टर मैसी ने उत्तराखंड में भी लागू उत्तर प्रदेश मौलिक नियम 153 को चुनौती दी थी। उनका कहना था कि उन्होंने पांच माह के लिए मातृत्व अवकाश को आवेदन किया था, लेकिन स्वास्थ्य विभाग ने यह कहते हुए उनके आवेदन को निरस्त कर दिया कि उत्तराखंड में भी लागू उत्तर प्रदेश मौलिक नियम 153 के तहत तीसरे बच्चे के लिए मातृत्व अवकाश की अनुमति देने का नियम नहीं है। जबकि उसके पहले से दो जुड़वाँ बच्चे हैं, और वह दूसरी बार ही माँ बन रही है।

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    • हाईकोर्ट के आदेश: फिलहाल पुरानी जगह पर ही डाला जाएगा कूड़ा
    • छह महीने में मौजूदा डंपिंग के बगल में ही वन विभाग द्वारा उपलब्ध कराई 6 हैक्टेयर भूमि पर 6 माह में बनेगा ट्रीटमेंट प्लांट,
    • फिलहाल कूड़े को फैलने से लगाई जाएगी डंपिंग ग्राउंड के चारों ओर दीवार,
  • अधिकारी वर्ग उच्च न्यायालय के फैसले से नजर आ रहा है खुश, कूड़ा निस्तारण पर सप्ताह भर से लगी रोक भी हटी

नैनीताल, 18 जुलाई, 2018। हल्द्वानी एवं हल्द्वानी से जुड़े नैनीताल, भवाली, भीमताल, रुद्रपुर आदि क्लस्टर नगरों का कूड़ा फिलहाल पुराने जगह पर ही निस्तारित किया जायेगा। अलबत्ता डंपिंग ग्राउंड के चारों ओर कूड़े को फैलने से बचाने के लिए दीवार लगाई जायेगी। मामले की सुनवाई करते हुए वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की खंडपीठ ने बुधवार को नगर निगम हल्द्वानी को छः माह के भीतर ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करने के लिए समयबद्ध तरीके से कार्य करने के आदेश देते हुए 3 सप्ताह के भीतर वर्तमान डम्पिंग ग्राउंड के चारों ओर कूड़े को फैलने से बचाने के लिए दीवार लगाने व 8 सप्ताह के भीतर ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करने के लिए निविदा आमन्त्रित करने के निर्देश दिये। इस दौरान खंडपीठ ने सरकार से यह भी पूछा कि नैनीताल व हल्द्वानी निकायों के ईओ का स्थानांतरण नियमों के अनुसार तीन साल में क्यों नहीं किया गया। जबकि ये पांच-छः साल से एक ही जगह पर कार्यरत हैं।

इधर बुधवार को उत्तराखंड सरकार ने हल्द्वानी में ट्रंचिंग ग्राउंड बनाने के मामले में उच्च न्यायालय में अपना जवाब पेश किया। बताया कि नगर निगम को कूड़ा निस्तारण के लिए 4 हेक्टेयर जमीन आवंटित कर दी है। बताया गया है कि वन विभाग द्वारा उपलब्ध करायी गयी यह जगह मौजूदा डंपिंग ग्राउंड से ही तथा इसकी तरह ही गौलापार बाईपास से लगी हुई है।

हाईकोर्ट के ताजा फैसले से अधिकारी वर्ग खुश नजर आ रहा है। न्यायालय के फैसले से जहां कूड़ा निस्तारण पर पिछले सप्ताह भर से लगी रोक भी एक तरह से हट गयी है, सो कूड़ा निस्तारण की तात्कालिक समस्या समाप्त हो गयी है। वहीं कूड़ा निस्तारण के लिए, जैसी की अपेक्षा थी, कहीं सड़क से दूर जाने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। आगे देखने वाली बात होगी कि छः माह बाद भी प्रशासन व सरकार कूड़े का कैसा ट्रीटमेंट प्लांट बनाते हैं। इससे गौलापार बाईपास से गुजरने वाले और इंद्रा नगर में रहने वाले लोगों को दुर्गंध से निजात मिलती है अथवा नहीं।

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  • स्वच्छ भारत अभियान के तहत मृत व्यक्तियों और पहले से शौचालयों वाले परिवारों को आवंटित कर दिये शौचालय, तथा पूरा पैंसा भी नहीं दिया

नैनीताल, 22 जून 2018। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2014 में देश में स्वच्छ भारत अभियान चलाया, और इसके तहत हर परिवार, खासकर गरीब-बीपीएल परिवारों के लिए 12 हजार रूपये की धनराशि देने को व्यवस्था भी की। इसमे केंद्र का 75 प्रतिशत व राज्य सरकार का 25 प्रतिशत अंशदान था। लेकिन देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड के कुछ, कुछ भी ‘खा’ सकने वाले दानव सदृश अधिकारी न केवल शौचालयों का पैंसा खा गये, वरन उन्होंने इसके लिये दानवों की तरह ही मृत लोगों का ‘शौच’ खाने से भी परहेज नहीं किया। डीएम के स्तर से जांच में इन तथ्यों की पुष्टि हुई किंतु इसके बाद भी दोषी दानव अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। मामला उत्तराखंड उच्च न्यायालय में आया तो न्यायालय में प्रदेश के मुख्य सचिव को ऐसे दोषी अधिकारियों के खिलाफ एक सप्ताह के भीतर विभागीय कार्यवाही करने व एसएसपी देहरादून को दो सप्ताह के भीतर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिये हैं।
मामले के अनुसार विकास नगर देहरादून निवासी व्यक्ति सुंदर लाल सैनी ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि केंद्र सरकार ने वर्ष 2014 में भारत को स्वच्छ बनाने के लिए स्वच्छ भारत अभियान योजना चलाई थी जिसके तहत बीपीएल परिवारो के लिए सुलभ शौचालयों का निर्माण किया जाना था। योजना के तहत प्रत्येक बीपीएल परिवार को सुलभ शौचालय बनाने के लिए बीपीएल परिवारों के लिए 12 हजार रूपये की धनराशि देने को व्यवस्था थी। इसमे केंद्र का 75 प्रतिशत व राज्य सरकार का 25 प्रतिशत अंशदान था। याची का आरोप था कि सरकार के अधिकारियों ने शौचालय उन लोगो को आवंटित कर दिए, जिनके पास पहले से शौचालय थे। साथ ही ऐसे लोगों के नाम पर भी शौचालय आवंटित दर्शा दिये गये, जो कि मर चुके थे। तथा कई को पूरा पैसा नहीं दिया। इसकी शिकायत लोगों ने जिला अधिकारी देहरादून से की। जिलाधिकारी देहरादून ने इसकी जांच तहसीलदार विकास नगर से कराई। तहसीलदार ने शिकायत को सही मानते हुए जाँच रिपोर्ट जिलाधिकारी को सौपी। इसके बावजूद कोई कार्यवाही नही होने के कारण याची ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की। मामले को सुनने के बाद वरिष्ठ न्यायधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खंडपीठ ने जनता के पैसांे का दुरुपयोग करने वाले अधिकारियों के खिलाफ मुख्य सचिव को एक सप्ताह के भीतर विभागीय कार्यवाही करने, तथा एसएसपी देहरादून को दो सप्ताह के भीतर दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिये, तथा जनहित याचिका को निस्तारित कर दिया है।

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उत्तराखंड में प्राथमिक शिक्षक पद के लिए बाहरी राज्यों से किया गया दो वर्षीय डीएलएड डिप्लोमा भी मान्य होगा। इस मामले में मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति केएम जोसफ और न्यायमूर्ति शरद शर्मा की संयुक्त खंडपीठ ने राज्य सरकार की एकलपीठ के फैसले के खिलाफ दायर विशेष अपील को खारिज कर एकलपीठ के फैसले को सही ठहराया है।  उल्लेखनीय है कि अल्मोड़ा निवासी हरीश चन्द्र  ने राज्य सरकार के ‘प्राथमिक शिक्षकों की भर्ती में प्रदेश के बाहर से डीएलएड को अमान्य करने के आदेश तथा शिक्षक सेवा नियमावली 2012 व संशोधन नियमावली 2013 को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याची का कहना था कि उसके पास दिल्ली के मान्यता प्राप्त संस्थान से प्राथमिक शिक्षा में दो वर्षीय डिप्लोमा है। साथ ही वह टीईटी भी उत्तीर्ण है। इधर जिला शिक्षा अधिकारी बेसिक नैनीताल और उधमसिंह नगर ने शिक्षकों की भर्ती के लिए आवेदन मांगे हैं। जुलाई 2016 में प्रकाशित इस विज्ञप्ति में संबंधित जिले के डायट से डीएलएल अनिवार्य किया गया है जोकि न्याय संगत नहीं है। सरकार का यह कदम एनसीटीई के निर्धारित योग्यता के प्राविधान का भी उल्लंघन है। एकलपीठ ने सुनवाई के बाद याचिकाकर्ताओं को शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में शामिल करने के आदेश दिए थे। सितंबर 2017 के इस आदेश को सरकार ने स्पेशल अपील के माध्यम से चुनौती दी थी। संयुक्त खंडपीठ ने भी मामले की सुनवाई के बाद एकलपीठ के आदेश को बरकरार रखा है और स्पेशल अपील खारिज कर दी है। अदालत के इस फैसले के बाद प्रदेश से बाहर से मान्यता प्राप्त संस्थानों से डीएलएल करने वाले अभ्यर्थी प्राथमिक शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में शामिल हो सकेंगे।

कांग्रेस सरकार  में बनी विनियमितीकरण नियमावली-2016 निरस्त

नैनीताल, 17 अप्रैल 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को बड़ा झटका देते हुए पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में बनी विनियमितीकरण नियमावली-2016 को निरस्त कर दिया है। न्यायालय ने सीधी भर्ती के पदों पर संविदा व अस्थायी कर्मचारियों की बजाय नियमित भर्ती करने के आदेश पारित किए हैं। न्यायालय के फैसले से राज्य के करीब 5000 से अधिक सरकारी नियुक्ति पा चुके कर्मचारियों की नौकरी संकट में पड़ गई है। हालांकि सरकार के पास एकलपीठ के फैसले के खिलाफ अपील और नियुक्ति पा चुके कर्मचारियों को नियमित भर्ती में अधिमान अंक देने के विकल्प मौजूद हैं।

उल्लेखनीय है कि 30 दिसंबर 2016 को पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने विनियमितीकरण सेवा नियमावली-2016 को मंजूरी प्रदान की थी। इसके तहत 2011 में नियुक्त हुए और 5 साल पूरे कर चुके अस्थायी व संविदा कर्मचारियों को नियमितीकरण का हकदार बना दिया गया। इस नियमावली के प्रभावी होने के बाद राज्य के तमाम विभागों में कार्यरत संविदा कर्मचारियों को सीधी भर्ती वाले पदों पर नियमित कर दिया गया। इस नियमावली से करीब 5000 से अधिक कार्मिक लाभान्वित हुए।

सरकार की इस नियमावली को हल्द्वानी के बेरोजगार हिमांशु जोशी ने चुनौती दी। उनका कहना था कि सरकार अस्थायी कार्मिकों को सीधी भर्ती के पदों पर नियमित नहीं कर सकती। सीधी भर्ती के पदों पर नियमितीकरण से युवा रोजगार से वंचित हो रहे हैं, लिहाजा नियमावली को निरस्त किया जाए। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि सरकार द्वारा 2013 और फिर 2016 में विनियमितीकरण सेवा नियमावली बनाई गई। यह सुप्रीम कोर्ट के उमा देवी मामले में दिए गए फैसले के खिलाफ है। सरकार की ओर से उच्च न्यायालय में दलील दी गई कि उमा देवी मामले से कहीं भी अस्थायी कार्मिकों का नियमितीकरण करने से रोक नहीं लगाई है। न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकलपीठ ने मंगलवार 17 अप्रैल 2018 को दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सरकार की विनियमितीकरण सेवा नियमावली-2016 को निरस्त कर दिया।

अधिमान व आयु में छूट दे सकती है सरकार

उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा है कि नियमावली निरस्त होने से प्रभावित होने वाले कार्मिकों को सरकार सीधी भर्ती के पदों में नियुक्ति प्रक्रिया में अधिमान में तथा आयु में छूट दे सकती है।

यह है उमा देवी प्रकरण

2006 में सर्वोच्च न्यायालय ने अस्थायी कर्मी उमा देवी से संबंधित मामले में अहम फैसला दिया था। इसमें कहा था कि दस अप्रैल 2006 तक जिन लोगों को अस्थायी तौर पर काम करते हुए दस साल हो चुके हैं, वह बिना न्यायालय के आदेश के यदि नियमित न हुए हों तो सरकार उन्हें नियमित करने के लिए एक बार नियम बना सकती है। मगर उत्तराखंड में 2011, 2013 फिर 2016 में विनियमितीकरण नियमावली को कैबिनेट ने मंजूरी प्रदान की।

पुनर्विचार याचिका दाखिल करेगी सरकार : कौशिक

हाईकोर्ट के आदेश के बाद जहां राज्य में हजारों की संख्या में नियमित और नियमितीकरण की बाट जोह रहे कर्मचारियों को झटका लगा है, वहीं राज्य सरकार भी सकते में है। इस बारे में अग्रिम कानूनी विकल्प तलाशे जा रहे हैं। सरकार का कहना है कि वह कर्मचारियों के साथ है और कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करेगी। सरकार के प्रवक्ता एवं काबीना मंत्री मदन कौशिक ने कहा कि हाईकोर्ट के आदेश की कॉपी मिलने का इंतजार किया जा रहा है। इसका अध्ययन कर आगे की तैयारी की जाएगी। उन्होंने कहा कि सरकार कर्मचारियों के साथ है और इस आदेश के सिलसिले में रिव्यू में जाएगी।

पुलिस कर्मियों की तरह होमगार्डों को भी दैनिक भत्ते देने के आदेश 

-एकलपीठ का आदेश बरकरार, राज्य सरकार से आठ सप्ताह में इस पर विचार करने को कहा
नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की विशेष अपील पर सुनवाई करते हुए एकल पीठ के आदेश को बरकरार रखते हुए राज्य सरकार से उच्चतम न्यायालय के निर्णय के आधार पर होमगार्डो को पुलिस वालो की तरह दैनिक वेतन भत्ते के लिए 8 सप्ताह के भीतर विचार करने को कहा है। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायधीश केएम जोसफ व न्यायधीश शरद कुमार शर्मा की खंडपीठ में हुई। मामले के अनुसार देहरादून निवासी शिव प्रसाद एवं अन्य ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर होमगार्डों को भी पुलिस वालो की तरह वेतन भत्ते दिए जाय। इस पर पूर्व में उच्च न्यायालय की एकलपीठ ने सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को आदेश दिया था कि होमगार्डो को भी पुलिस के सामान वेतन व अन्य सुविधाए दिये जायें। इस आदेश के विरुद्ध सरकार द्वारा विशेष अपील दायर की गई। जिस पर आज सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने यह आदेश पारित किया है।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 16 जुलाई 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन एवं न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने एक मामले में सुनवाई करते हुए कहा है कि जब भी सरकार लोक निर्माण विभाग में सहायक अभियंताओं के पदों पर पदोन्नति की कार्रवाई करे, उसमें कानूनन आरक्षण के अनुमन्य कोटे के अनुसार अनुसूचित जाति के अभ्यर्थियों को आरक्षण का लाभ दे।
मामले के अनुसार लोनिवि में अवर अभियंता-सिविल के पद पर कार्यरत हल्द्वानी निवासी विनोद कुमार व अन्य की ओर से उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर कहा गया था कि राज्य सरकार लोनिवि में जूनियर से सहायक अभियंताओं के 164 पदों पर पदोन्नति की कार्रवाई करने जा रही है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय के जरनैल सिंह व अन्य विरुद्ध लक्ष्मी नारायण गुप्त एंव अन्य मामले में आये आदेश के विपरीत अनुसूचित जाति के लिए अनुमन्य 19 प्रतिशत के आरक्षण कोटे के तहत 31 पदों पर आरक्षण का लाभ नहीं देने जा रही है। सुनवाई के दौरान उत्तराखंड सरकार के मुख्य स्थायी अधिवक्ता परेश त्रिपाठी के द्वारा खंडपीठ को बताया गया कि 31 नहीं केवल 25 पद अनुसूचित वर्ग के लिए आरक्षित हैं। इनमें से पहले ही अनुसूचित जाति के 12 लोग सहायक अभियंता के पद पर हैं, लिहाजा आगे 13 पदों पर आरक्षण का लाभ दिया जाना है। राज्य सरकार लोनिवि में सहायक अभियंताओं के पदों पर पदोन्नति की कार्रवाई करने नहीं जा रही है, लेकिन जब भी पदोन्नति की कार्रवाई की जाएगी तो अनुसूचित जाति को पदोन्नति में आरक्षण के कोटे के अनुसार आरक्षण दिया जाएगा। सुनवाई के उपरांत खंडपीठ ने याचिका को पूरी तरह से निस्तारित करते हुए आदेश दिया कि जब भी सरकार लोनिवि में जूनियर से सहायक अभियंता-सिविल के पदों पर पदोन्नति की कार्रवाई करे तो आरक्षण के अनुमन्य कोटे के अनुसार अनुसूचित जाति के अभ्यर्थियों को आरक्षण का लाभ दे। याची की ओर से अधिवक्ता हरिमोहन भाटिया ने पैरवी की।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 12 जुलाई 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन और न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की संयुक्त खंडपीठ ने भीमताल झील में अवैध रूप मछली मारने के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए नगर पंचायत भीमताल के साथ ही कुमाऊं कमिश्नर, डीएम और एसएसपी नैनीताल, उप निदेशक मत्स्य भीमताल और सिंचाई विभाग के एसई को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर जवाब तलब किया है। 

उल्लेखनीय है कि भीमताल के ब्लॉक रोड मल्लीताल निवासी संजीव पांडे ने हाईकोर्ट में मामले में जनहित याचिका दायर की है। जिसमें कहा है भीमताल झील में मत्स्य विभाग ने मछली मारने का लाइसेंस दिया है। इसके लिए 30 रुपये प्रतिदिन का शुल्क रखा गया है, लेकिन लाइसेंस की आड़ में अवैध रूप से मछलियां मारी जा रही है। यही नहीं अन्य जलीय जीव भी मारे जा रहे हैं। इससे झील के पर्यावरण पर प्रभाव पड़ रहा है। हो रहा है। साथ ही असंतुलन का असर झील में मौजूद जलीय जीवों पर भी हो रहा है। इस मामले में कुमाऊं कमिश्नर के साथ ही डीएम और एसएसपी नैनीताल, नगर पंचायत भीमताल, उप निदेशक मत्स्य विभाग भीमताल आदि को शिकायती पत्र दिया गया, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। संयुक्त खंडपीठ ने मामले को सुनने के बाद संबंधित पक्षकारों को जवाब के लिए नोटिस जारी किया है। अदालत ने जवाब के लिए दो सप्ताह का समय नियत किया है।

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-कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले के मद्देनजर और उत्तराखंड सरकार द्वारा संशोधित अधिनियम की धारा को वैध ठहराते हुए दूसरे प्रसव में जुड़वाँ बच्चों के मामले को अपवादिक परिस्थिति माना और इसे दंपत्ति को चुनाव लड़ने के लिए योग्य ठहराया

नवीन समाचार, नैनीताल, 7 जुलाई 2019। उत्तराखंड में अब एक बच्चे के बाद जुड़वां बच्चे होने पर निकाय या पंचायत चुनाव में प्रत्याशी बनने पर कोई महाही नहीं होगी। हाईकोर्ट ने भाजपा नेता भारत भूषण चुघ की याचिका पर सुनवाई करते हुए मामले को अपवादिक विलक्षण परिस्थिति माना है। 

कोर्ट ने याचिकाकर्ता को उत्तर प्रदेश म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन अधिनियम 1959 के संशोधित अधिनियम के तहत चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य नहीं माना है। कोर्ट ने कहा है कि इन परिस्थितियों पर याचिकाकर्ता का कोई नियंत्रण नहीं था। दरअसल भाजपा नेता भारत भूषण चुघ निवासी भूरारानी पिछले साल निकाय चुनाव लड़ने के इच्छुक थे लेकिन नगर निगम अधिनियम में प्रदेश सरकार के नोटिफिकेशन द्वारा संशोधन के बाद जोड़ी गई धारा 25 (आई) (वी) के तहत निगम और पंचायत चुनाव लड़ने के लिए दो से अधिक बच्चों के होने पर चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य माना गया था। संशोधन में जोड़ी धारा में जुड़वां दो या तीन बच्चों की स्थिति स्पष्ट नहीं होने की वजह से असमंजस की स्थिति बनी थी। याचिकाकर्ता का एक पुत्र और फिर जुड़वां पुत्र हुए थे। भारत ने यूनिटी लॉ कॉलेज के प्राचार्य डॉ. केएस राठौर से चर्चा के बाद हाईकोर्ट में अधिवक्ता कुर्बान अली के माध्यम से एक याचिका निकाय चुनाव से ठीक पहले दाखिल की थी। अधिवक्ता कुर्बान अली ने कोर्ट के समक्ष जावेद अहमद और अन्य बनाम हरियाणा राज्य एवं अन्य मामले रखे थे। हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की एकल पीठ ने याचिका पर सुनवाई के बाद निर्णय दिया कि नगर निगम अधिनियम की संशोधित धारा से याचिकाकर्ता भारत भूषण को अयोग्य नहीं माना जाएगा। जुड़वां बच्चे होने की स्थितियों में याचिकाकर्ता का कोई नियंत्रण नहीं था। कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले के मद्देनजर और उत्तराखंड सरकार द्वारा संशोधित अधिनियम की धारा को वैध ठहराते हुए याचिकाकर्ता के मामले को अपवादिक परिस्थिति माना और उसे चुनाव लड़ने के लिए योग्य ठहराया है।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 4 जुलाई 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने जसपुर ऊधम सिंह नगर के ग्राम मनोरथपुर में ग्राम प्रधान द्वारा विभिन्न सरकारी योजनाओं में वित्तीय अनियमितताओं के मामले में सुनवाई करते हुए न्यायालय ने सचिव पंचायती राज से पूछा है कि पूर्व में आदेश पारित होने के बाद भी आपने घपले में शामिल लोगों के खिलाफ कार्यवाही क्यों नहीं की और न्यायालय के आदेश का पालन क्यों नही किया गया, इसका जवाब न्यायालय में पेश करें।
मामले के अनुसार जसवीर सिंह निवासी मनोरथपुर जसपुर ऊधम सिंह नगर ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि ग्राम प्रधान द्वारा विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ लेते हुए वित्तीय अनियमितता की गयी है। आवासों के आवंटन में अपने ससुर रईस को आवास दिया गया है जबकि उसी नाम के दूसरे व्यक्ति रईस के नाम से आवास आया था। मरे हुए व्यक्तिओ के नाम शौचालय स्वीकृत कर दिए। शिकायत करने पर जिला अधिकारी द्वारा इसकी जाँच की गयी जाँच करने में अनियमित्ताए पाई गयी।
बताया गया कि पूर्व में न्यायालय ने इसकी जाँच कर आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही करने को कहा था। जिसमें जिला अधिकारी द्वारा जाँच की गयी और मामले में एक लाख तीस हजार रुपये का घपला सामने आया परंतु जिला अधिकारी द्वारा ग्राम प्रधान को इस धनराशि पर एक तिहाई अधिभार व चेतावनी देकर छोड़ दिया गया था। न्यायालय ने जिलाधिकारी की इस रिपोर्ट पर सचिव पंचायती राज से कार्यवाही कर इसकी रिपोर्ट न्यायालय में पेश करने को कहा था। परंतु सचिव ने न्यायालय में अपनी रिपोर्ट न देकर जिला अधिकारी की जाँच रिपोर्ट पेश की थी। आज सरकार की ओर से न्यायालय को अवगत कराया गया कि खंड विकास अधिकारी द्वारा ग्राम प्रधान, ग्राम विकास अधिकारी व अवर अभियन्ता के खिलाफ जसपुर थाने में 2 जुलाई को मुकदमा दर्ज करा दिया है। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खण्डपीठ में हुई।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 1 जुलाई 2019। उत्तराखंड रोडवेज कर्मचारी यूनियन ने सरकार द्वारा एस्मा लगाए जाने के विरुद्ध उत्तराखंड उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की है। यूनियन की ओर से कहा गया है कि उनको सरकार हड़ताल पर जाने के लिए मजबूर करती आई है। साथ ही हड़ताल करने पर एस्मा लगाकर कार्यवाही करने को कहती है। यूनियन की ओर से कहा गया है कि उनको समय पर वेतन नही दिया जा रहा है, सेवानिवृत्त कर्मचारियों को उनके देयक नहीं दिए जा रहे है। पिछले चार वर्षों से कर्मचारियो को ओवर टाइम काम नही दिया जा रहा है न ही उनको रेगुलर किया जा रहा है। सरकार व निगम हमेशा बजट का रोना रोते हैं जबकि स्थिति यह है कि निगम का 2002 से उत्तर प्रदेश पर 700 करोड़ और निगम का आपदा के समय का 45 करोड़ रुपया सरकार के पास बकाया है। फिर भी सरकार व निगम के पास अपने कर्मचारीयो को वेतन नही देने के लिए बजट नही है। मामले में सुनवाई 2 जुलाई को हो सकती है।

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-उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने 5 पेज के पत्र को जनहित याचिका के रूप में लिया
नवीन समाचार, नैनीताल, 28 जून 2019। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने चार धाम यात्रा पर आए मुंबई उच्च न्यायालय के न्यायाधीश केआर श्रीराम द्वारा उन्हें भेजे गए पत्र को जनहित याचिका के रूप में लेते हुए राज्य सरकार से चार सप्ताह में जवाब देने को कहा है।
मामले के अनुसार मुंबई उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति आरके श्रीराम ने गत 15 जून को उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन को 5 पन्नों का पत्र लिखकर चार धाम यात्रा में यात्रियों को सुख-सुविधाओं में होने वाली कई असुविधाओं की जानकारी दी है। पत्र में कहा गया है कि चार धाम यात्रा में मानो फिर से आपदा का इंतजार किया जा रहा है। यमुनोत्री में तत्काल सुरक्षा के उपाय करने की जरूरत है। यात्रा मार्ग में कई किलोमीटर तक कोई पुलिस का जवान मौजूद नहीं रहता है जिससे स्वास्थ्य अथवा दूसरी आपात स्थितियों में कोई मदद नहीं मिल पाती है। इसके अलावा यात्रा मार्ग में बैठने के लिए कोई बेंच, कुर्सी अथवा दूसरी सुविधा नहीं है, ताकि यात्री कुछ देर आराम कर सकें। पत्र में लिखा है कि उन्होंने खच्चर से जबकि उनके परिवार के कुछ सदस्यों ने डांडी से पहाड़ों में मिटटी से भरे कट्टे वाले रास्ते से और पथरीले मार्गों से यात्रा तय की। उन्हें इन लंबे मार्गों पर कोई आराम करने की जगह नहीं मिली। न्यायाधीश ने बताया है कि उनका दल फाटा से केदारनाथ और केदारनाथ से फाटा हैलीकॉप्टर से आया और गया। केदारनाथ में उन्हें हैलीकॉप्टर के लिए साढ़े तीन घंटे इंतजार करना पड़ा और वहां आराम कक्ष भी नहीं था, हालांकि उत्तराखंड पुलिस ने उन्हें और उनकी पत्नी को अपने कक्ष में बैठने का स्थान दिया। आम यात्रियों के लिए इन स्थानों में कोई आराम का स्थान नहीं है। यात्रा मार्ग में चिकित्सा और सामान्य भोजन की भी कोई व्यवस्था नहीं है। पत्र में लिखा गया है कि कई स्थानों में दुकानें इतनी नजदीक बनी हैं कि वहां आग लगने अथवा भगदड़ मचने पर काफी जानमाल का नुकसान हो सकता है। खासकर बद्रीनाथ और गंगोत्री में अगर आग लगती है तो बचने की कोई जगह नहीं है और अग्निशमन विभाग भी अपना काम नहीं कर सकेगा। साथ ही यात्रा मार्ग पर सम्पर्क करने के लिए मोबाईल नेटवर्क का अभाव है। उनके इस पत्र को जनहित याचिका के रूप में लेते हुए प्रदेश के मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव तीर्थाटन के साथ ही श्री बद्री केदार मंदिर समिति के सीईओ को पक्षकार बनाया है।

प्राकृतिक सुविधा व चार लेन योजना की प्रशंसा भी

नैनीताल। महाराष्ट्र से चार धाम यात्रा पर आए न्यायाधीश ने मुख्य न्यायाधीश को लिखे पत्र में कहा है कि उनके परिवार के 11 सदस्यीय दल को 22 मई से एक जून तक चार धाम यात्रा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उन्होंने कहा है कि उत्तराखंड बहुत सुंदर है। साथ ही गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ और केदारनाथ को जोड़ती हुई केंद्र सरकार की महवपूर्ण फोर लेन योजना ने भी सभी के दिलों को खुश कर दिया है।

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-शहरी विकास सचिव ने नहीं दिया था जवाब
नवीन समाचार, नैनीताल, 13 जून 2019। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने रुड़की के मंगलौर में चल रही व्यवसायिक पशु वधशाला के संचालन पर रोक लगा दी है। मामले की सुनवाई वरिष्ठ न्यायमूर्ति सुधांशु धुलिया की एकलपीठ में हुई। मामले के अनुसार रुड़की निवासी रईस अहमद राव ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा है कि मंगलौर में व्यवसायिक पशु वधशाला घनी आवादी के बीच में सभी नियमो को ताक पर रखकर खोली गयी है, और इसमंे हर रोज 250 भैंसंे काटी जा रही हैं। यही नहीं जहां पर यह स्लाटर हाउस चलाया जा रहा है उसके आसपास स्कूल, मस्जिद व कब्रिस्तान आदि भी स्थित हैं। क्षेत्र वासियों द्वारा इसका विरोध भी किया गया परंतु सरकार द्वारा इस पर कोई कार्यवही नही की गयी। पूर्व में कोर्ट ने शहरी विकास विभाग के सचिव से जवाब पेश करने को कहा था। साथ में कोर्ट ने यह भी पूछा था कि स्लाटर हाउस खोलने के क्या नियम हैं। लेकिन अब तक सचिव के द्वारा अपना जवाब पेश नही किया गया। मामले को सुनने के बाद एकलपीठ ने स्लाटर हाउस के संचालन पर रोक लगा दी है।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 2 अप्रैल 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति एनएस धनिक की खंडपीठ ने प्रदेश में बंद पड़े स्लाटर हाउस के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए नगर पालिका नैनीताल, रामनगर व मंगलोर तथा नगर निगम हल्द्वानी को 15 जुलाई तक हर हाल में स्लॉटर हाउस चालू करने और इसकी रिपोर्ट एक अगस्त तक कोर्ट में पेश करने के आदेश दिये हैं। साथ ही अगली सुनवाई की तिथि एक अगस्त नियत कर दी है। कोर्ट ने साथ ही यह भी कहा कि पिछले आठ साल से स्लॉटर हाउस नही बनाए गए तो यह कोर्ट के आदेश की अवमानना होगी। उल्लेखनीय है कि पूर्व के आदेश में कोर्ट ने राज्य सरकार से 3 माह के भीतर स्लॉटर हाउसों को अस्तित्व में लाने के आदेश जारी किये थे।
उल्लेखनीय है कि पूर्व में हाई कोर्ट ने प्रदेश के सभी अवैध स्लॉटर हाउसो को बंद करने के आदेश दिए थे और कहा था कि खुले में जानवर ना काटे जाएं। इसके बाद से पुरे प्रदेश में स्लॉटर हाउस बंद है। कोर्ट के इस आदेश को मीट कारोबारीयो ने हाईकोट में चुनौती देते हुए कहा कि पूर्व में हाईकोट ने 9 दिसंबर 2011 को एक आदेश जारी कर प्रदेश में मानकों के अनुसार स्लाटर हाउस बनाने के निर्देश दिये थे। लेकिन आठ साल बीत जाने के बाद भी कोर्ट के आदेशो का पालन नही किया जा रहा है जिस वजह से स्लॉटर हाउसो का मामला अधर मे है। लिहाजा कोर्ट के आदेश का पालन ना करने वाले अधिकारीयो के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही की जाए। वही स्लॉटर हाउस बंद किये जाने के आदेश के खिलाफ सरकार ने मीट कारोबारियों को राहत देने के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी भी दायर की है।

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-उत्तरकाशी के जिला पंचायत अध्यक्ष का पदभार उपाध्यक्ष रमोला को देने के आदेश, राज्य सरकार द्वारा गठित कमेटी को कोर्ट ने किया निरस्त
Image result for प्रकाश चन्द्र रमोलानवीन समाचार, नैनीताल, 12 जून 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकलपीठ ने राज्य सरकार को बड़ा झटका देते हुए सरकार की ओर से दस मई को बनाई गई जिला पंचायत उत्तरकाशी की कमेटी को निरस्त कर दिया है। साथ ही उत्तरकाशी के जिला पंचायत अध्यक्ष का पदभार मौजूदा जिला पंचायत उपाध्यक्ष प्रकाश चंद्र रमोला को देने के आदेश दे दिये के समक्ष मामले की सुनवाई हुई।
उल्लेखनीय है कि पूर्व में जिला पंचायत उत्तरकाशी के उपाध्यक्ष प्रकाश चंद्र रमोला की याचिका पर ही हाईकोर्ट ने तीन अप्रैल 2019 को वोटर लिस्ट में नाम न होने के विवाद के चलते तत्कालीन जिला पंचायत अध्यक्ष जसोदा राणा को अध्यक्ष पद से हटाने के आदेश दिए थे। इस पर जिला प्रशासन ने उपाध्यक्ष प्रकाश चंद्र रमोला को जिला पंचायत अध्यक्ष का चार्ज देने के बजाय तीन सदस्यों की कमेटी बना दी। याचिकाकर्ता की ओर से इस बनाई गई कमेटी को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। इस याचिका पर ही बुधवार को एकलपीठ ने सरकार द्वारा बनाई गयी कमेटी को निरस्त कर याचिकाकर्ता जिला पंचायत उपाध्यक्ष रमोला को अध्यक्ष पद का कार्यभार देने के स्पष्ट आदेश दे दिये हैं।

पहले ही जताई थी सम्भावना: जिला पंचायत अध्यक्ष को हटाने के आदेश, उपाध्यक्ष रमोला की है नया अध्यक्ष बनने की प्रबल संभावना

नवीन समाचार, नैनीताल, 3 अप्रैल 2019। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन और न्यायमूर्ति एनएस धनिक की खंडपीठ ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए मामले में सुनवाई करते हुए उत्तरकाशी जनपद की जिला पंचायत अध्यक्ष जसोदा राणा को उनके पद से हटाने के आदेश दे दिए हैं। ऐसा उनका नाम उत्तरकाशी जिले के ग्रामीण क्षेत्र की मतदाता सूची से उनका नाम कटने की वजह से हुआ है।
उल्लेखनीय है कि पूर्व में उच्च न्यायालय की एकलपीठ द्वारा जिला पंचायत अध्यक्ष के पद पर बने रहने के आदेश दिए थे, जिसे उनकी जगह जिला पंचायत अध्यक्ष बनने की प्रबल संभावना वाले जिला पंचायत सदस्य प्रकाश चन्द्र रमोला ने खंडपीठ में चुनौती दी थी। उनका कहना था कि जब राणा का नाम कंसेरी गांव की मतदाता सूची से कट गया था तो वह वहां की सदस्य ही नही रहीं। खंडपीठ ने याचिकर्ता के इस तर्क से सहमत होकर यह माना कि वह अभी कहीं की वोटर लिस्ट की सदस्य नही है न ही उनका नाम दोनों जगहों में से किसी भी जगह की वोटर लिस्ट में है। उन्होंने गलत तरीके से वर्तमान में अध्यक्ष का पद ग्रहण किया हुआ है इस आधार पर उनकी अध्यक्षता समाप्त की जाती है।
मामले के अनुसार जिला पंचायत अध्यक्ष बड़कोट उत्तरकाशी की जसोदा राणा ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि वे बड़कोट उत्तरकाशी नगर पालिका से चेयरमैन पद हेतु भाजपा की उम्मीदवार हैं। उन्होंने चुनाव लड़ने के लिए सरकार को पत्र लिखा था कि उनका नाम ग्रामीण क्षेत्र की वोटर लिस्ट से हटाकर बड़कोट नगर पालिका की वोटर लिस्ट में जोड़ा जाये। किंतु उत्तरकाशी के जिला अधिकारी डा. आशीष चौहान ने वोटर लिस्ट से नाम हटाने का प्रार्थना पत्र आयोग को भेज दिया परन्तु जोड़ने वाला नही भेजा और इसे अपने पास रख लिया। उनका यह भी कहना था कि 23 अक्टूबर को नामांकन करने की आखिरी तिथि थी और आयोग ने उनका नाम हटाने का आदेश 22 अक्टूबर को दे दिया था। उनका नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया परन्तु जोड़ा नही गया। 22 अक्टूबर को निवार्चन आयोग ने देहरादून से रिपोर्ट मंगाकर कहा कि उनका नाम देहरादून की वोटर लिस्ट में भी है। याचिकर्ता का यह भी कहना था कि उन्होंने कभी भी देहरादून की वोटर लिस्ट में नाम के लिए आवेदन नही किया और उनको में फंसाया जा रहा है। उन्होंने वोटर लिस्ट में नाम नही जोड़ने के मामले को पूर्व में हाई कोर्ट में चुनोती दी परन्तु हाई कोर्ट ने उसे निरस्त कर दिया था। इसी बीच जिला अधिकारी उत्तरकाशी ने सरकार को पत्र लिखकर कहा कि जसोदा राणा का नाम बड़कोट जिला पंचायत की वोटर लिस्ट से कट चुका है इसलिए उनको जिला पंचायत के पद से हटा दिया जाय।
उल्लेखनीय है कि जसोदा राणा के अध्यक्ष पद से हटने के बाद उनके खिलाफ मामले को उच्च न्यायालय में ले गये जिपं अध्यक्ष प्रकाश चंद्र रमोला का अध्यक्ष बनना तय माना जा रहा है।

यह भी पढ़ें : लिंग परिवर्तन कर पुरुष से महिला बनी, मंगेतर ने बलात्कार किया, अब हाईकोर्ट बताएगा दुष्कर्म प्राकृतिक माना जाएगा अथवा अप्राकृतिक, महत्वपूर्ण फैसला सुरक्षित..

नवीन समाचार, नैनीताल, 15 मई 2019। लिंग परिवर्तन कर यदि कोई पुरुष महिला बन जाता है तो उसके साथ उसकी मर्जी के बिना किसी पुरुष के द्वारा किया गया दुष्कर्म महिला के साथ होने पर माना जाने वाला ‘प्राकृतिक’ माना जाएगा अथवा किसी पुरुष के साथ होने वाला ‘अप्राकृतिक‘, इस पर, उत्तराखंड उच्च न्यायालय से शीघ्र ही महत्वपूर्ण फैसला आ सकता है। इस संबंध में एक लिंग परिवर्तन कर बनी महिला की याचिका पर उच्च न्यायालय ने सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया है।
मामले के अनुसार उत्तराखंड के कोटद्वार में एक अजब मामला प्रकाश में आया। यहाँ लिंग परिवर्तन कर पुरुष से महिला बनी ट्रांसजेंडर महिला से उसके मंगेतर ने बलात्कार किया, पर पुलिस ने  अप्राकृतिक यौन शोषण की धाराओं में मामला दर्ज किया। इसे लिंग परिवर्तन कर बनी महिला ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय में चुनौती दी। मामले के अनुसार एक ट्रांसजेंडर महिला ने 2017 में कोटद्वार थाने में एक एफआईआर इस आधार पर दर्ज कराई थी कि वह और कोटद्वार निवासी परीक्षित अरविन्द जोशी दोनों मुम्बई के एक पांच सितारा होटल में जॉब करते थे । दोनों के बीच में प्रेम प्रसंग चल रहा था। इस दौरान अपना लिंग बदल कर महिला बन गई । इधर जोशी ने उसे शादी के बहाने कोटद्वार बुलाया और उसके साथ रेप किया। इसकी रिपोर्ट उसने कोटद्वार थाने में आईपीसी की धारा 376 में दर्ज कराई परन्तु कोटद्वार पुलिस ने 376 का मुकदमा दर्ज न करके 377 अप्राकृतिक यौन शोषण का मुकदमा दर्ज कर दिया । पुलिस ने उनको एक महिला मानने से इन्‍कार कर दिया। उन्होंने अपनी याचिका में यह भी कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश नालसा बनाम केंद्र सरकार जिसमें ट्रांसजेंडर को मान्यता दी गयी है उनको भी एक महिला के समान अधिकार है। उनकी एफआईआर 376 में दर्ज की जाय न कि 377 में।

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-उत्तराखंड में अंतरिम जमानत का प्राविधान समाप्त
नवीन समाचार, नैनीताल, 3 मई 2019। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने प्रदेश की निचली अदालतों सेअग्रिम जमानत लेने का प्राविधान पूरी तरह से समाप्त कर दिया है। इसके बाद 7 वर्ष से कम की सजा के प्राविधान वाले कुछ मामलों में पहले की तरह पुलिस थाने से और बड़े मामलों में केवल उच्च न्यायालय से ही अग्रिम जमानत मिल सकेगी। प्रदेश की निचली अदालतों से किसी भी दशा में अंतरिम/अग्रिम जमानत नहीं मिल सकेगी। उत्तराखंड सरकार द्वारा यूपी के CRPC की धारा 438 से संबंधित अधिनियम को स्वीकार करने के बाद यूपी के अधिनियम के तहत यह व्यवस्था समाप्त की गई है।
उल्लेखनीय है कि हाइकोर्ट ने इससे पहले भारतीय दंड संहिता की धारा 438 को प्रभावी बनाकर अंतरिम जमानत देने की व्यवस्था कर दी थी। इस कारण निचली अदालतों को अंतरिम जमानत देने का अधिकार मिल गया था। बता दें कि देश के तमाम राज्यों ने दंड संहिता की धारा 438 को प्रभावी बनाया था, मगर उत्तराखंड गत वर्ष तक इसमें शामिल नहीं था। पिछले साल तत्कालीन कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश राजीव शर्मा और न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ के समक्ष विष्णु सहाय ने विशेष याचिका दायर कर दंड प्रक्रिया संहिता उत्तर प्रदेश संशोधन अधिनियम 1976 के उस प्राविधान को चुनौती दी थी, जिसमें उत्तर प्रदेश ने धारा 438 को प्रभावी नहीं माना था। इस धारा के तहत अंतरिम जमानत का प्रावधान है। याचिकाकर्ता का कहना था कि सरकार ने धारा 9 यूपी एमेंडमेंट एक्ट 1976 के प्रावधान को न तो उत्तराखंड में अंगीकृत किया और न ही निरस्त किया। कोर्ट ने तब अंतरिम जमानत के प्रावधान उत्तराखंड में प्रभावी कर दिए थे।
किंतु इधर गत दिनों सरकार ने इस संबंध में हाईकोर्ट में पुन: जानकारी दी थी कि राज्य पुनर्गठन एक्ट के तहत नियम अंगीकृत किए गए थे लेकिन इसे समझने में अंतर आ गया था। मामले की समीक्षा के बाद शुक्रवार को मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन और जस्टिस मनोज तिवारी की खंडपीठ ने अंतरिम जमानत के नियम को रद्द कर दिया।

उत्तराखंड की इस 100% लाभ में चल रही कंपनी को निजी हाथों में देने जा रही है केंद्र सरकार, हाईकोर्ट ने जारी किया नोटिस

नवीन समाचार, नैनीताल, 29 अप्रैल 2019। केंद्र सरकार की कंपनी इंडियन मेडिसिन फार्मास्युटिकल्स कारपोरेशन लिमिटेड रामनगर के कर्मचारी संघ (आईएमपीएल) ने कंपनी के लाभ में होने के बावजूद केंद्र सरकार द्वारा इसे निजी हाथों में दिये जाने की आशंका जताते हुए इसके खिलाफ उत्तराखंड उच्च न्यायालय में याचिका दायर की है। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति आलोक सिंह की एकलपीठ ने
केंद्र सरकार से तीन सप्ताह में जवाब पेश करने को कहा है।
मामले के अनुसार आईएमपीएल कर्मचारी संघ रामनगर ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर कहा है कि रामनगर में स्थित केंद्र सरकार की दवा कम्पनी केंद्र सरकार को हर वर्ष सौ प्रतिशत शुद्ध लाभ देती आई है। भारत सरकार के पास कुछ ही कम्पनियां ऐसी है जो सरकार को इतना अधिक शुद्ध लाभ देती है, परंतु केंद्र सरकार इस शुद्ध लाभ देने वाली कम्पनी को निजी हाथांे में देने जा रही है जो फैक्ट्री नियमावली के विपरीत है। कर्मचारी संघ ने अपनी याचिका में यह भी कहा है कि इस कम्पनी को शिखर तक ले जाने में उनका सम्पूर्ण जीवन व्यतीत हो चूका है और वे अब सेवानिवृत्ति की कगार पर हैं, और इस हाल में इसे निजी हाथो में देना उनके भविष्य के खिलाफ है। संघ ने अपनी याचिका में यह भी कहा है कि केंद्र सरकार घाटे में चलने वाली एयर इंडिया को निजी हाथो में तो नही दे रही है, लेकिन सौ प्रतिशत शुद्ध लाभ देने वाली कम्पनी को निजी हाथो में देने जा रही है जो न्यायविरुद्ध है, इसलिए इस पर रोक लगाई जाये।

यह भी पढ़ें : हाईकोर्ट का प्रदूषण फैला रही फैक्टरियों पर कड़ा रुख, दुबारा से जांच कराने के आदेश

नवीन समाचार, नैनीताल, 12 अप्रैल, 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन और न्यायमूर्ति एनएस धानिक की खंडपीठ ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानकों पर आपत्ति वाले उद्योगों की दोबारा से जांच के आदेश दिए हैं। साथ ही प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को 15 अप्रैल को जवाब पेश करने के आदेश देते हुए मामले में सुनवाई की तिथि आगामी सोमवार यानी 15 अप्रैल को नियत कर दी है।
उल्लेखनीय है कि रुद्रपुर ऊधमसिंह नगर निवासी हिमांशु चंदोला ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। याचिका में कहा कि ऊधमसिंह नगर के सिडकुल में तमाम फैक्ट्रियों से वायु, जल और अन्य प्रदूषण बढ़ रहा है। याचिका के साथ फोटो संलग्न कर कहा कि जल प्रदूषण की वजह से क्षेत्र में हैपेटाइटिस-बी रोग फैला और तमाम लोगों की मौत हो गई। जहरीला पानी खेतों में जाने से खेती चौपट हो गई और कल्याणी नदी भी प्रदूषित हो रही है।
मामले की पूर्व में हुई सुनवाई में सरकार की ओर से बताया गया कि प्रदेश में अभी तक मानको को पूरा नही करने वाली फैक्ट्रियो को चिन्हित कर लगभग 130 फैक्ट्रियो यानी करीब 20 फीसद को बंद करने का नोटिस जारी कर दिया गया था। पूर्व में कोर्ट ने केंद्रीय पर्यावरण नियंत्रण बोर्ड से प्रदेश की सभी फैक्ट्रियो की लिस्ट मांगी थी जिसमे कहा गया था कि प्रदेश की 30 से 35 फैक्ट्रियां ऐसी है जो केंद्रीय पर्यावरण प्रदूषण के मानको को पूरा नही करती हैं। इस रिपोर्ट पर राज्य सरकार को निर्देश दिए थे कि वे इस पर कार्यवाही करे। मानक पूरे नहीं करने वाले 130 उद्योगों को बंद करने के लिए नोटिस जारी किया है।

यह भी पढ़ें : पदोन्नति में आरक्षण पर उत्तराखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 7 साल पुरानी अधिसूचना निरस्त…. 

नवीन समाचार, नैनीताल, 1 अप्रैल 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने उत्तराखंड सरकार को बड़ा झटका देते हुए 2012 में जारी उस अधिसूचना को निरस्त कर दिया है जिसमें पदोन्नति में एससी-एसटी कोटे के आरक्षण को खत्म कर दिया गया था।
उल्लेखनीय है कि ज्ञान चन्द्र ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा था कि सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के आदेश के बाद उत्तराखंड सरकार ने 5 सितंबर 2012 को अधिसूचना जारी कर पदोन्नति में एसटी एससी के आरक्षण को खत्म कर दिया, जो गलत है। आज हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के साल 2012 में जारी अधिसूचना को निरस्त करते हुए सरकार को कहा है कि चाहे तो वो इसमें कानून बना सकती है। कोर्ट के इस आदेश के बाद अब पुराने लागू शासनदेश के अनुसार राज्य में भी पदोन्नति में आरक्षण की सुविधा मिल सकती है।
उत्तराखंड हाईकोर्ट के अधिवक्ता हरि मोहन भाटिया ने कहा कि अगर उत्तराखंड सरकार द्वारा उत्तरप्रदेश के किसी भी सरकारी आदेश को लागू किया गया हो या उत्तराखंड सरकार द्वारा खुद सरकारी आदेश जारी किया गया हो, जिसमें पदोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था थी तो वो आज की स्थिति में फिर से लागू हो जाएंगे। साथ ही उन्होंने कहा कि सरकार चाहे तो उत्तराखंड हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार आर्टिकल 16(4) अ के आधार पर नया कानून भी बना सकती है।

यह भी पढ़ें : बड़ा फैसला: बेटियों के लिये खुशखबरी, अब विवाहित बेटियां भी पिता के परिवार की सदस्य और मृतक आश्रित कोटे से नौकरी की हकदार

नवीन समाचार, नैनीताल, 27 मार्च 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने बुधवार को एक दूरगामी व बड़ा फैसला देते हुए विवाहित पुत्रियों को भी मृतक आश्रित कोटे में सरकारी नौकरी का लाभ देने का रास्ता खोल दिया है। बुधवार को नैनीताल उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन, न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह और न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की पूर्णपीठ ने एक याचिका की याचिका पर इस बारे मे ंफैसला सुनाया। पीठ ने मुख्य रूप से इस पर विचार किया कि विवाहित पुत्री परिवार का सदस्य मानी जा सकती है अथवा नहीं और वह मृतक आश्रित कोटे से सरकारी नौकरी पाने की हकदार है या नहीं। विचार विमर्श के बाद पूर्ण पीठ ने विवाहित पुत्री को परिवार का सदस्य माना है। अदालत ने कहा कि वह मृतक आश्रित कोटे में नौकरी पाने का अधिकार रखती है। हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ के इस फैसले के बाद प्रदेश में विवाहित पुत्रियां भी मृतक आश्रित कोटे में नौकरी की हकदार हो गई है।
उल्लेखनीय है कि उच्च न्यायालय में इस मामले में अलग अलग याचिकाएं दायर की गई थी। जिन पर पूर्व में नैनीताल उच्च न्यायालय की एकलपीठ भी इसी आशय का फैसला सुना चुकी थी। इसमें एक याचिका चमोली निवासी संतोष किमोठी नाम की विवाहित महिला की भी थी। जिसमें कहा गया था कि उसका विवाह होने के उपरांत उसके पिता की मृत्यु सरकारी नौकरी में सेवाकाल के दौरान हुई थी। मायके में पिता की मृत्यु के बाद कोई बालिग सदस्य कमाई करने वाला नहीं बचा था। लिहाजा उसने संबंधित विभाग में मृत आश्रित कोटे में नौकरी की गुहार लगाई, लेकिन उसे नामंजूर कर दिया गया है। वहीं, दूसरा मामला ऊधमसिंह नगर डिस्ट्रिक को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड में नौकरी को लेकर था। ऊधमसिंह नगर निवासी अंजुला सिंह और अन्य ने उच्च न्यायालय की एकलपीठ के समक्ष याचिका दायर कर कहा था कि उसके पिता डिस्ट्रिक को-ऑपरेटिव बैंक में लिपिक कैशियर के पद पर कार्यरत थे। 23 फरवरी 2014 को उनका निधन हो गया। उसने मृतक आश्रित के रूप में नौकरी के लिए विभाग में आवेदन किया था, मगर विभाग ने आवेदन इस आधार पर निरस्त कर दिया कि वह मृतक की विवाहित पुत्री है। दोनों मामलों में सुनवाई के बाद एकलपीठ ने विवाहित बेटी को मृतक आश्रित कोटे में नौकरी पाने की हकदार घोषित किया था। बता दें कि चमोली के मामले में सरकार और ऊधमसिंह नगर के मामले में बैंक प्रबंधन ने हाईकोर्ट में एकलपीठ के फैसले को चुनौती दी थी। बाद में दोनों मामलों में विशेष अपील दायर की गई थी। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने मामले की सुनवाई के लिये तीन न्यायाधीशों की पूर्ण पीठ का गठन करने का फैसला लिया था। इसके बाद मुख्य न्यायाधीश समेत तीन न्यायाधीशों की पूर्ण पीठ ने मामले की सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था, जो अब जारी हुआ है।

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-दक्षिण अफ्रीका टूर घोटाले की रकम ब्याज सहित जमा करें: हाईकोर्ट
नवीन समाचार, नैनीताल, 14 फरवरी 2019 । उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायाधीश आरसी खुल्बे की खंडपीठ ने इको टूरिज्म को बढ़ावा देने के नाम पर तत्कालीन कांग्रेस सरकार के कायर्काल में दक्षिण अफ्रीका के टूर के लिए लाखो रुपये का घोटाला करने के मामले में सुनवाई करते हुए तत्कालीन पीसीसीएफ दिग्विजय सिंह खाती व लेसर होटल के मालिक से 12 प्रतिशत ब्याज की दर से रकम जमा जमा करने तथा जमा की गयी धनराशि के संबंध में न्यायालय में शपथपत्र पेश करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 18 मार्च की नियत की है।
उल्लेखनीय है कि अधिवक्ता जय प्रकाश डबराल ने अपनी जनहित याचिका में कहा है कि 2006 में कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में कैबिनेट मंत्री नवप्रभात, तत्कालीन विधायक शैलेंद्र मोहन सिंघल सहित 3 वन अधिकारी और कई अन्य लोग इको पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए दक्षिण अफ्रीका जाकर सरकारी धन का दुरुपयोग किया था। याचिकाकर्ता ने न्यायालय से मामले की जांच सीबीआई से कराने की मांग भी की है।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 3 जनवरी 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य आपदा प्रबंधन न्यूनीकरण केंद्र देहरादून में कथित अवैध नियुक्तियों के मामले में सख्त रवैया अपनाते हुए सरकार को चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

बृहस्पतिवार को उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति रमेश चंद्र खुल्बे की खंडपीठ में देहरादून निवासी राज्य आंदोलनकारी रवींद्र जुगरान की उस जनहित याचिका पर सुनवाई हुई, जिसमें आरोप लगाया गया है कि राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के सचिव व वित्त सचिव द्वारा बिना कैबिनेट की मंजूरी तथा शासनादेश के अवैध तरीके से आपदा प्रबंधन प्राधिकरण में बिना वैधानिक प्रक्रिया अपनाए पांच अनर्ह अभ्यर्थियों को नियुक्त कर सरकारी धन का दुरुपयोग किया गया है। याची के अनुसार उन्होंने इस मामले में प्राधिकरण के अध्यक्ष व मुख्य सचिव को प्रत्यावेदन दिए मगर उनके द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई। खंडपीठ ने मामले को सुनने के बाद सरकार को चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए।

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-सरकार की अपील पर सेवायोजन कार्यालय में पंजीकरण की बाध्यता को समानता के अधिकार के खिलाफ मानने के एकलपीठ के आदेश को सही ठहराया
नवीन समाचार, नैनीताल, 26 दिसंबर 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने साफ कर दिया है कि समूह ‘ग’ की भर्ती में सेवायोजन कार्यालयों में पंजीकरण की अनिवार्यता नहीं होगी।
उल्लेखनीय है कि अधीनस्थ सेवा चयन आयोग ने 2016 में एक्सरे तकनीशियनों के 45 पदों पर आवेदन आमंत्रित किए थे। इसमें आवेदकों को प्रदेश के किसी भी जिले के सेवायोजन कार्यालय में पंजीकरण की अनिवार्यता रखी गई थी। आयोग का कहना था कि स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता देने के लिए सरकार की ओर से 10 फरवरी 2014 को सेवायोजन कार्यालय में पंजीकरण आवश्यक होने के आदेशों के तहत ही यह व्यवस्था की गई थी। माना जा रहा है कि इस फैसले का दीर्घकालीन प्रभाव हो सकता है। इसके बाद राज्य के बेरोजगारों को स्थानीय फैक्टरियों में 70 फीसद आरक्षण, राज्य के बाहर के लोगों को राज्य में संपत्ति खरीदने से रोकने जैसे प्राविधानों युक्त भू-अध्यादेश आदि को भी चुनौती दी जा सकेगी।
एक आवेदनकर्ता ने इस परीक्षा में सेवायोजन कार्यालय में पंजीकरण आवश्यक होने के प्रावधान को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट की एकलपीठ ने उस समय इस अनिवार्यता को समानता के अधिकार के खिलाफ माना था और अधीनस्थ सेवा चयन आयोग को दस सप्ताह के अंदर आवेदनकर्ता को नियुक्ति देने का आदेश दिया था। किंतु हाईकोर्ट का यह आदेश आने तक आयोग परीक्षा पूरी करवाकर शासन को सूची भी भेज चुका था। यह देखते हुए एकलपीठ के आदेश के खिलाफ सरकार की ओर से हाईकोर्ट में अपील दायर की गई थी। इधर मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन और न्यायमूर्ति रमेश चंद्र खुल्बे की खंडपीठ ने इस अपील पर सुनवाई करते हुए एकलपीठ के आदेश को आंशिक रूप से सही माना है। पीठ ने समूह ‘ग’ के लिए आवेदन में सेवायोजन कार्यालय में पंजीकरण की अनिवार्यता को समाप्त करने के एकलपीठ के आदेश को सही माना है। किंतु चूंकि एकलपीठ का आदेश ही नियुक्ति प्रक्रिया पूरी होने के बाद आया, इसलिए पीठ ने याची को नियुक्ति देने संबंधी एकलपीठ के आदेश को खारिज कर दिया है।

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नवीन समाचार, नैनीताल, 18 दिसंबर 2018। पंतनगर विश्वविद्यालय के ठेका मजदूरों को श्रम कानूनों का लाभ मिलने की उम्मीद नजर आ रही है। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की एकलपीठ ने पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय में ठेकेदारी प्रथा के तहत कार्य कर रहे करीब ढाई हजार कर्मचारियों के मामले को सुनने के बाद पंतनगर विश्वविद्यालय, राज्य सरकार व केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब पेश करने के निर्देश दिये हैं।
उल्लेखनीय है कि उच्च न्यायालय में पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय में कार्य करने वाले ठेका मजदूरों की कल्याण समिति की ओर से समिति के सचिव अभिलाख सिंह व जेपी सिंह ने याचिका दायर कर कहा है कि पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय में 2003 से करीब ढाई हजार कर्मचारी ठेकेदारी प्रथा के तहत कार्य कर रहे हैं। उनको श्रम कानून के अंतर्गत देय चिकित्सा, ग्रेच्युटी, बोनस और मुलभुत सुविधाएं तथा मार्च 2018 से सरकार द्वारा देय बढ़ा हुआ न्यूनतम वेतनमान तथा केंद्र सरकार के आदेश पर पहली जून 2016 से देय ईएसआई का लाभ भी नहीं दिया गया है। साथ ही कार्य करते हुए 15 साल होने के बावजूद भी उनको नियमित नहीं किया जा रहा है।

बड़ा समाचार: हाईकोर्ट ने हटाई एलटी संवर्ग के 1214 पदों पर नियुक्ति पर लगी रोक

नवीन समाचार, नैनीताल, 11 दिसंबर 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की एकलपीठ ने एलटी संवर्ग के सहायक अध्यापकों के 1214 रिक्त पदों पर नियुक्ति पर लगी रोक को हटा दिया है। इस संबंध में एकलपीठ ने यह भी कहा है कि नियुक्तियां याचिका पर आने वाले अंतिम निर्णय के अधीन रहेंगी।
मामले के अनुसार इसी वर्ष 21 जनवरी 2018 को उत्तराखण्ड अधीनस्थ चयन आयोग ने 1214 पदों पर एलटी शिक्षकों की भर्ती शुरु की थी। इसके बाद चयनित अभ्यर्थियों को काउंसलिंग के लिये बुलाया गया। इस प्रक्रिया में आरक्षण के नियमों का पालन ना करने तथा गड़बड़ियों का आरोप लगाते हुए पिथौरागढ़ जिले के हरीश कुमार व पुष्पा कार्की सहित अन्य ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी। याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने नियुिक्त पर रोक लगा दी थी। बाद में इस मामले की जांच डी सेंथिल पांडियन की तीन सदस्यों की कमेटी द्वारा की गयी थी जिसकी रिपोर्ट आज सीलबंद लिफाफे में पीठ को दी गयी। रिपोर्ट को पढ़ने के बाद पीठ ने नियुक्ति पर लगी रोक हटा दी।

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नैनीताल, 10  अक्तूबर 2018। उत्तराखंड में एलटी शिक्षकों की नियुक्ति का रास्ता साफ हो गया है। हाई कोर्ट की न्यायमूर्ति वीके विष्ट की एकलपीठ ने नियुक्ति पर लगी रोक को हटा दिया है। साथ ही कोर्ट ने कहा है कि जो भी नियुक्तियां होंगी वो हाई कोर्ट के अन्तिम निर्णय के अधीन रहेंगी। उल्लेखनीय है 21 जनवरी 2018 में उत्तराखण्ड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग ने 1214 पदों पर एलटी शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया शुरू की थी। जिसके बाद चयनित अभ्यर्थियों को काउंसलिंग के लिये बुलाया गया। अभ्यर्थी  हरीश कुमार व अन्य ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर इसे चुनौती दी। 

याचिका में  भर्ती प्रक्रिया  में गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए आरक्षण के नियमों का पालन ना करने का आरोप लगाया था। हाईकोर्ट ने पूर्व में पूरे मामले पर सुनवाई कर नियुक्ति पर रोक लगा दी थी। जिसके बाद आज एकलपीठ में सुनवाई के बाद कोर्ट ने खण्डपीठ के आदेश का हवाला देते हुए नियुक्ति पर लगी रोक को हटा दिया है।

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नैनीताल, 22 नवंबर 2018। माध्यमिक विद्यालयों में अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति की राह खुल गई है। उत्तराखंड उच्च न्यायालय के आदेश के बाद शिक्षा सचिव डा. भूपेंदर कौर औलख ने इस संबंध में शासनादेश जारी कर दिया है। बृहस्पतिवार को जारी शासनादेश के अनुसार 4200 एलटी व 834 प्रवक्ता पदों के लिए 10 दिन के भीतर आवेदन ऑनलाइन करना होगा। अभ्यर्थी जिस जनपद में शिक्षण के इच्छुक होंगे, उन्हें वरीयता क्रम में जिलों का विकल्प अंकित किया जाएगा। मैरिट के आधार पर वरीयता क्रम में एक ही जिला आवंटित किया जाएगा। महिला शाखा के विद्यालयों में सिर्फ महिला अभ्यर्थी ही आवेदन कर सकेंगी।
जिलास्तर पर अतिथि शिक्षकों की तैनाती के लिए जिलाधिकारी की अध्यक्षता में समिति गठित की जाएगी। जिसमें मुख्य शिक्षा अधिकारी सदस्य सचिव, डायट प्राचार्य व जिला शिक्षा अधिकारीे सदस्य होंगे। पहले अतिथि शिक्षक के तौर पर काम कर चुके अभ्यथिर्यों को वरीयता गुणांक प्रदान किए जाएंगे। ऑनलाइन आवेदन के अनुसार मैरिट सूची तैयार की जाएगी। अभ्यर्थियों का नियमित नियुक्ति के लिए किसी भी प्रकार का दावा मान्य नहीं होगा। इस संबंध में उन्हेें सौ रुपये का स्टांप पेपर प्रस्तुत करना होगा। चयनित अभ्यर्थी को मासिक 15 हजार मानदेय दिया जाएगा। हर माह एक दिन का आकस्मिक अवकाश देय होगा। उत्तराखंड लोक सेवा आयोग से प्रथम बैच से चयनित अभ्यर्थियों की नियुक्ति या उससे पूर्व तक के लिए शिक्षण कार्य के लिए रखे जा सकेंगे।

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नैनीताल, 11 अक्तूबर 2018। उत्तराखंड हाई कोर्ट की न्यायमूर्ति वीके बिष्ट की एकलपीठ ने अशासकीय विद्यालयों के लिपिकीय वर्ग के कर्मचारियों को शासकीय लिपिकीय कर्मचारियों की भांति 1 जनवरी 2013 से ग्रेड-पे वेतन देने के निर्देश दिये हैं। मामले के अनुसार नैनीताल निवासी नारायण दत्त पांडे व ऊधमसिंह नगर निवासी मनोरथ पांडे ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि लिपिकीय संवर्ग में अशासकीय विद्यालयों में कनिष्ठ व वरिष्ठ सहायक के पद पर 1994 से कार्यरत है। इधर उत्तराखंड शासन की ओर से 16 जनवरी 2013 को शासनादेश जारी कर शासकीय विद्यालयों में कनिष्ठ सहायक एवं प्रवर सहायकों को तथा सहायता प्राप्त अशासकीय विद्घालयों में ग्रेड पद नाम व ग्रेड पे को 20 अक्टूबर से लागू किया गया। लेकिन विभाग से बार-बार निवेदन के बाद भी उनके प्रकरण पर कोई कार्यवाही नहीं की गई। याची का कहना था कि इसी प्रकार के एक अन्य वाद में 23 मार्च 2018 को जिला हरिद्वार में अशासकीय कर्मचारियों को ग्रेड वेतन व पद नाम दोनों देने के निर्देश पारित किए है। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की एकलपीठ ने इस आधार पर कहा कि अशासकीय विद्यालयों के लिपिकीय वर्ग के कर्मचारियों को भी 1 जनवरी 2013 से शासकीय लिपिकीय कर्मचारियों की भांति ग्रेड पे दिया जाए।

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-इससे पूर्व वैकल्पिक व्यवस्था के तहत आठ सप्ताह के भीतर अतिथि शिक्षकों की जिला स्तर पर नयी भर्तियां करने को भी कहा
-मासी अल्मोड़ा निवासी गोपाल दत्त की शिक्षकों की कमी व अतिथि शिक्षकों की विशेष याचिका पर सुनाया फैसला
नैनीताल, 14 अगस्त 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति आलोक सिंह की खण्डपीठ ने सरकार को मई 2019 तक शिक्षको की स्थायी नियुक्ति कर प्रदेश भर के सरकारी स्कूलो में शिक्षकों की कमी को दूर करने तथा इससे पूर्व वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर आठ सप्ताह के भीतर अतिथि शिक्षकों की वैकल्पिक व्यवस्था करने के आदेश दिये हैं।
खंडपीठ ने छात्रो के भविष्य को देखते हुए सरकार को यह भी निर्देश दिए है कि वह अतिथि शिक्षकों की भर्ती नए सिरे से जिला स्तर पर करे। कहा कि अतिथि शिक्षकों की भर्ती में नए अभियोथियो को भी मौका दिया जायेगा, साथ ही पूर्व से कार्यरत अतिथि शिक्षकों को प्राथमिकता दी जायेगी। खंडपीठ ने यह भी निर्देश दिए है कि जैसे-जैसे अध्यापको की भर्ती होगी, उसी आधार पर अतिथि शिक्षक बाहर होते रहेंगे। खंडपीठ ने संघ लोक सेवा आयोग को यह भी निर्देश दिए हैं कि प्रवक्ताओं के 917 पदों पर चल रही भर्ती प्रक्रिया को छः माह के भीतर पूर्ण करें। साथ ही एलटी के 1214 पदों पर पूर्व से घोषित परिणाम और भर्ती प्रक्रिया को तीन माह के भीतर पूर्ण किया जाये। साथ ही एलटी के 906 पदों पर पदोन्नितियां चार माह के भीतर करने, राज्य आंदोलनकारियों से खाली हुए 296 एलटी के अध्यापको के पदों पर सात सप्ताह के भीतर उत्तराखंड तकनीकी शिक्षा से नियुक्तियां करने और सम्पूर्ण भर्ती प्रक्रिया को मई 2019 तक पूर्ण करने के आदेश सरकार को दिए है।
मामले के अनुसार मासी अल्मोड़ा निवासी गोपाल दत्त ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि प्रदेश की सरकारी विधालयों की शिक्षा व्यव्स्था अध्यापकों की कमी के कारण चरमरा गयी है। विद्यालयों में अध्यापकों की भारी कमी है। इससे छात्रों का भविष्य अंधकारमय हो गया है। इस कारण बच्चों को दूर के स्कूलों में जाना पड़ रहा है, या सभी विषयों के शिक्षक न होने के कारण अपना पसंदीदा विषय छोड़ना पड़ रहा है। याची ने यह भी प्रार्थना की थी कि जब तक स्थायी नियुक्तिया नहीं हो जातीं तब तक वैकल्पिक व्यवस्था की जाये, क्योंकि सत्र को चले हुए चार माह का समय बीत चुका हैं। दूसरी ओर अतिथि शिक्षकों ने भी अपना कार्यकाल बढ़ाने के लिए विशेष अपील दायर की थी। उनका कहना था कि उनका कार्यकाल न्यायालय के आदेशानुसार 31 मार्च को समाप्त हो गया है। खण्डपीठ ने दोनों मामलों की एक साथ सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किये है।

नैनीताल हाईकोर्ट की कार्रवाई के भय से भाजपा विधायक ने छोड़ा पद !
नैनीताल, 26 सितंबर 2018। भाजपा की थराली सुरक्षित सीट से विधायक मुन्नी देवी साह ने आखिर बुधवार को जिला पंचायत अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है। यह जानकारी उन्होंने बुधवार को उच्च न्यायालय को अपने मामले की सुनवाई के दौरान दी। इसके बाद उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकलपीठ ने जिला पंचायत के उपाध्यक्ष व मामले के याची को थराली के जिला पंचायत अध्यक्ष पद का चार्ज देने के आदेश दिये और उनकी याचिका का निस्तारित कर दिया।
मामले के अनुसार मुन्नी देवी के थराली से विधायक चुने जाने के बाद जिला पंचायत उपाध्यक्ष लखपत सिंह बुटोला ने अध्यक्ष का चार्ज 10 अगस्त को ले लिया था। लेकिन उन्हें कार्य नहीं करने दिया। बल्कि विधायक चुनी गयीं मुन्नी देवी ही कार्य देखती रहीं। लखपत सिंह ने हाईकोर्ट मे याचिका दाखिल कर मुन्नी देवी के दो पदों पर काबिज होने को चुनौती दी। उनका कहना था कि मुन्नी देवी की दो पदों पर काम करने की मंशा है, और सरकार भी उन्हें सहयोग कर रही है। जबकि जैसे ही वे थराली सुरक्षित सीट से विधायक चुनी गईं, वैसे ही चमोली जिला पंचायत अध्यक्ष की सीट रिक्त हो गई है। पंचायती राज अधिनियम के तहत उन्होंने उपाध्यक्ष से अध्यक्ष पद का कार्यभार ग्रहण कर लिया है। मुन्नी देवी दो पदों पर एक साथ कार्य नहीं कर सकती हैं। वे या तो वो विधायक थराली रह सकती हैं, या जिला पंचायत अध्यक्ष चमोली। इस दौरान मुन्नीदेवी ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने जिला पंचायत अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया है। इसके बाद लखपत सिंह के अध्यक्ष बनने का रास्ता साफ हो गया।

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    • हल्द्वानी के एसटीएच-कैंसर हॉस्पिटल के कायापलट के लिए हाईकोर्ट ने दिये आठ बड़े आदेश
    • अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्ति के लिए सरकार को 1 सप्ताह का अल्टीमेटम
  • हल्द्वानी के भाजपा नेता विकास भगत की जनहित याचिका पर दिये हैं यह निेर्दश

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p style=”text-align: justify;”>नैनीताल, 19 सितंबर 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने हल्द्वानी के सुशीला तिवारी मेडिकल कॉलेज स्थित स्वामी राम कैंसर इंस्टिट्यूट को राज्य स्तरीय कैंसर इंटिटूयूट बनाने और एक हप्ते के भीतर विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्ति करने के लिए सरकार को अंतिम निर्णय लेने और सरकार द्वारा खरीदी गयी 61 एम्बुलेंस को तीन सप्ताह के भीतर चलाने के निर्देश भी दिए है।
मामले के अनुसार हल्द्वानी निवासी विकास भगत ने जनहित याचिका दायर कर कहा था कि सुशीला तिवारी अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सकों व स्वास्थ्य सेवाओ का अभाव है। विकास हल्द्वानी के भाजपा विधायक व पूर्व काबीना मंत्री बंशीधर भगत के पुत्र व युवा भाजपा नेता बताये गये हैं। इस पर पीठ ने निर्देश दिये हैं कि सरकार अस्पताल में आकस्मिकता के आधार पर एक माह के भीतर विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्ति हर हप्ते साक्षात्कार के माध्यम से करे। साथ ही सुशीला तिवारी अस्पताल व स्वामी राम कैंसर अस्पताल के विस्तारीकरण में केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के आपत्ति को दूर करने के लिए राज्य सरकार का नोडल ऑफिशर केंद्र के सामने पैरवी करे और केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय पैरवी के 15 दिन के भीतर लगाई गयी आपतियो का निस्तारण करे। सुशीला तिवारी अस्पताल में तीन माह के भीतर नेफ्रोलॉजी, यूरोलॉजी व कार्डियोलॉजी विभागों की स्थापना करने और और उसके एक सप्ताह के भीतर इन विभागों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्त करने को भी पीठ ने कहा है। साथ ही इस अस्पताल में ट्रामा सेंटर की स्थापना के लिए शुरू की गयी टेंडर प्रक्रिया को चार सप्ताह के भीतर निस्तारित करने व उसके तीन सप्ताह का भीतर ट्रॉमा सेंटर को अस्तित्व में लाने के निर्देश भी दिए है। इसके अलावा मेडिकल कालेज हल्द्वानी में रेजिडेंट डॉक्टरों के पदों को भरने के लिए छः सप्ताह में प्रक्रिया पूर्ण करने व उसके चार सप्ताह में भीतर उनकी नियुक्ति करने के आदेश भी दिए गये है। साथ ही राज्य के पहाड़ी क्षेत्रो में एम्बुलेंस के अभाव में मरीजो को डोलियो व कुर्सियो में लाने-ले जाने का सज्ञान लेते हुए खंडपीठ ने 61 एम्बुलेंस को शीघ्र चलाये जाने के आदेश दिए है। साथ ही खंडपीठ ने कुमाऊं मण्डल में चिकित्सको के कुल 1110 पदों में से 445 रिक्त पदों को शीघ्र भरने के आदेश भी दिए है।

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p style=”text-align: justify;”>नैनीताल, 14 सितंबर 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने उपनल कर्मियो को साल में दिए जाने वाले ब्रेक पर रोक लगा दी है। खंडपीठ ने इसे सर्वोच्च न्यायलय के आदेशों के विपरीत माना है।
उल्लेखनीय है कि पूर्व में हाईकोर्ट के आदेशों पर राज्य सरकार सरकार की ओर से आज कोर्ट को बताया गया कि इस प्रकरण पर विचार किया जा रहा है और 2 सप्ताह के भीतर निर्णय ले लिया जाएगा। मामले के अनुसार कुंदन सिंह नेगी ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायधीश को पत्र भेजकर उपनल द्वारा की जा रही नियुक्तियों पर रोक लगाने की मांग की है। जिसका हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए इसे जनहित याचिका के रूप में स्वीकार कर लिया है। याचिका में कहा गया कि उपनल का संविदा लेबर एक्ट में पंजीकरण नही है इसलिए यह असंवैधानिक संस्था है। उपनल का गठन पूर्व सैनिको व उनके आश्रितों के लिए हुआ था लेकिन राज्य सरकार ने इस संस्था को आउटसोर्सिंग से कर्मचारियों की नियुक्ति का माध्यम बना दिया है। जिस पर पूर्ण नियंत्रण राज्य सरकार का है। याचिका में उपनल कर्मियों के समाजिक व आर्थिक स्थिति को देखते हुए भविष्य के लिए निति बनाने की मांग की। अधिवक्ता एमसी पंत की ओर से कोर्ट को अवगत कराया गया कि कर्मचारियों की ओर से जब याचिका दायर की थी तो सरकार उनको एक दिन का फिक्सनल ब्रेक साल में देती है, जिससे कि उनकी नियमित नियुक्ति ना हो सके। कोर्ट ने सरकार को ऐसा कोई ब्रेक न देने को कहा है और सर्वोच्च न्यायलय द्वारा पारित आदेश के विरुद्ध माना है।

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p style=”text-align: justify;”>नैनीताल, 31 अगस्त 2018। अब अंगुलियों से विहीन अथवा आंखों में दिक्कत जैसे आधार कार्ड बनाने में किसी कारण से अनुपयुक्त दिव्यांगों के आधार कार्ड भी बन सकेंगे। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश राजीव शर्मा और न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने दिव्यांग (विकलांगता) पेंशन संबंधी एक पत्र का स्वतः संज्ञान लेते हुए इसे जनहित याचिका के रूप में मानते हुए जिलाधिकारियों से ऐसे सभी मामलों में मानवीयता व संवेदनशीलता दिखाते हुए दिव्यांगों के आधार कार्ड बनाने और दिव्यांग पेंशन देने के आदेश दिये हैं।
उल्लेखनीय है कि अल्मोड़ा निवासी दिव्यांग लक्ष्मण सिंह नेगी ने उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर शिकायत की थी कि विकलांगता के कारण उनके तथा कई लोगों के आधार कार्ड नहीं बन रहे हैं। इस वजह से उन्हें विकलांगता पेंशन भी नहीं मिल पा रही है। न्यायालय ने इस मामले को अति संवेदनशील मानते हुए प्रशासन को आदेश दिए हैं कि ऐसे लोगों के साथ मानवीयता का व्यवहार करते हुए इनकी समस्याओं का समाधान अति शीघ्र किया जाना चाहिए। खासकर याची के मामले में अल्मोड़ा के डीएम को तीन दिन के भीतर बनाने तथा सात दिन के भीतर उनकी रुकी हुए पेंशन एरियर सहित देने के आदेश दिये।

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  • देहरादून स्थित एनआईवीएच यानी राष्ट्रीय दृष्टिबाधितार्थ संस्थान का मामला, रंग लाया छात्रों का आंदोलन, हाईकोर्ट ने सचिव सेंथिल पांडियन को बनाया जांच अधिकारी

नैनीनाल, 29 अगस्त 2018। नैनीताल हाईकोर्ट ने देहरादून के एनआइवीएच यानी राष्ट्रीय दृष्टिबाधितार्थ संस्थानमें छात्राओं के साथ छेड़छाड़ और यौन शोषण के मामले को गंभीरता से लिया है। प्रकरण में नैनीताल हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने केन्द्र और राज्य सरकार को कड़े निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने संस्थान के निदेशक को आदेश दिया है कि छेड़छाड़ के आरोपी टीचर को सस्पेंड कर उसके खिलाफ एफआइआर दर्ज करें। गौरतलब है कि छेड़छाड़, यौन शोषण सहित कई मांगों को लेकर पिछले लम्बे समय से आंदोलन कर रहे छात्र आंदोलन कर रहे थे, उनकी मुहिम आखिर रंग लाई है।  इसके बाद एनआईवीएच में सुधार की उम्मीद जगी है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा और न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए सचिव सेंथिल पांडियन को इस जांच अधिकारी नियुक्त किया है और कहा है कि तीन दिनों के भीतर अपनी जांच रिपोर्ट कोर्ट सभी बातें पेश करें।

इसके साथ ही एसएसपी देहरादून को आदेश दिया है कि वो एनआइवीएच में रेगुलर विजिट के लिए एक महिला एसआई के साथ दो कॉन्स्टेबलों की नियुक्ति करें। संस्थान में बिजली की आपूर्ति बाधित ना हो इसके लिये 48 घंटों के भीतर जनरेटर की व्यवस्था की जाए। साथ ही संस्थान में 12 घंटों के भीतर एमबीबीएस डॉक्टर की नियुक्ति की जाए, जिससे बच्चों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा मिल सके। इसके अलावा हाईकोर्ट ने संस्कृति सचिव को आदेश दिया है कि एनआईवीएच में खेल मैदान बनाया जाए। साथ ही बच्चों को खेल और सास्कृतिक कार्यक्रमों में प्रतिभाग कराया जाए। कोर्ट ने कहा कि ये उनकी नैतिक जिम्मेदारी भी है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को आदेश दिया है कि इस संस्थान में सात दिन के भीतर नियमित निदेशक की नियुक्त की जाए। मामले में अगली सुनवाई मंगलवार यानी 4 सितंबर को होगी।

यह भी पढ़ें : हाईकोर्ट ने उत्तराखंड सरकार पर की अभूतपूर्व टिप्पणी व कार्रवाई, राष्ट्रीय प्राधिकरण को सौंप दी सरकार की यह बड़ी जिम्मेदारी

नैनीनाल, 23 अगस्त 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने जिम कार्बेट पार्क में वन्यजीवों की सुरक्षा के मामले में बेहद सख्त रुख दिखाते हुए राष्ट्रीय बाघ प्राधिकरण को नोटिस जारी किया है। साथ ही राष्ट्रीय बाघ प्राधिकरण को अंतरिम रूप से जिम कॉर्बेट पार्क पर अपना नियंत्रण लेने के आदेश दिए है। साथ ही प्राधिकरण से वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए उठाये जा सकने वाले कदमों पर 30 अगस्त को अगली सुनवाई तक न्यायालय में जवाब देने को कहा।

उच्च न्यायालय ने यह बात राज्य सरकार पर वन्य जीवों के प्रति उदासीन बताने की अभूतपूर्व टिप्पणी व उससे जिम कार्बेट पार्क का प्रबंधन हटाने की अभूतपूर्व कार्रवाई करते हुए कही है। पीठ ने कहा कि हाथियों की मौत के मामले में प्राथमिकी दर्ज होने के बावजूद पांच लोग देश से बाहर चले गए। इस पर उन्होंने नैनीताल के एसएसपी से भी सवाल-जवाब किये और उनके द्वारा दिये गये शपथ पत्र पर नाराजगी जतायी। कहा कि आरोपितों को रोकने के लिए उचित कदम क्यों नहीं उठाए गए। वहीं गूजरों को ना हटाये जाने पर भी कोर्ट ने नाराजगी जताई। कहा सरकार वन गूजरों को क्यों बचा रही है। बार-बार शपथ पत्रों में बदलाव करने पर भी न्यायालय ने राज्य सरकार को गैरजिम्मेदार बताया। अपर मुख्य सचिव के न्यायालय में पेश ना होने को अदालत के आदेश से बचने का प्रयास बताया।

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p style=”text-align: justify;”>-वन गूर्जरों को सरकार स्वयं अतिक्रमणकारी मानती है तो मुआवजा क्यों दे रही है
-झिरना और ढेला रेंज के रेंजरों की कार्यप्रणाली को संधिग्ध मानते हुए उन्हें निलंबित करने को कहा
-हाथियों को अवैध ढंग से रखने के मामले में दर्ज मुकदमों में शीघ्र कार्यवाही करे नैनीताल पुलिस
-फारेस्ट गार्ड के बजाय पूर्व सैनिकों को भर्ती करने को कहा
नैनीताल, 16 अगस्त 2018। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने वन भूमि पर रह रहे वन गूर्जरों को नया नोटिस जारी कर हटाने के निर्देश दिये हैं। कोर्ट ने दिसंबर 2017 से मार्च 2018 तक देश के विभिन्न हिस्सों में मिली बाघ की पांच खालों के जिम कॉर्बेट पार्क रामनगर के बाघों के होने व दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही न होने पर अपर मुख्य सचिव से छह दिन में जवाब पेश करने को कहा है। साथ ही मामले को सीबीआई को भेजे जाने की चेतावनी भी दी है।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खंडपीठ में हिमालयन युवा ग्रामीण विकास समिति रामनगर की जनहित याचिका में अनिल बलूनी के प्रार्थना पत्र, जिसमें कार्बेट पार्क के बफर जोन से वन गुर्जरों को हटाने व बाघों के संरक्षण की अपील की गयी थी की सुनवाई के दौरान राज्य के अपर मुख्य सचिव रणबीर सिंह ने शपथ पत्र पेश कर 11 अगस्त को पारित आदेशों के क्रियान्वयन की जानकारी दी। किन्तु वन गूर्जरों को हटाने के संदर्भ में कार्बेट पार्क के निर्देशक की ओर से वन गूर्जरों को दिये गये नोटिस पर हाईकोर्ट ने असंतोष व्यक्त करते हुए नया नोटिस जारी करने को कहा है। कोर्ट ने कहा कि वन विभाग ने नोटिस में हाईकोर्ट के आदेश का आर्डर का जिक्र क्यों किया और अतिक्रमणकारियों को वन भूमि खाली करने के लिये इतना समय क्यों दिया गया, उनके द्वारा वन भूमि खाली करने पर एक ही परिवार के 10 या उससे अधिक लोगों को 10-10 लाख रूपये का मुआवजा देने या 2 एकड़ भूमि देने का प्रस्ताव क्यों रखा गया है। जबकि सरकार उनको अपने शपथ पत्र में अतिक्रमणकारी मान रही है। कोर्ट ने इस मामले में झिरना और ढेला रेंज के रेंजरों की कार्यप्रणाली को संधिग्ध मानते हुए उन्हें निलंबित करने को कहा है। साथ ही कोर्ट ने जिम कार्बेट पार्क के निदेशक राहुल से वन गुर्जरों की अतिक्रमित भूमि का मौका मुआयना करने को भी कहा है। साथ ही खंडपीठ ने पांच बाघों की खालों के मामले में जांच में दोषी पाये गये अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही करने के बजाय एसआईटी गठित करने पर असंतोष व्यक्त करते हुए अपर मुख्य सचिव से पूछा कि उन्होंने दोषी अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्यवाही की है। चेतावनी दी कि इस मामले को कोर्ट जांच के लिये सीबीआई को सौंप देगी। इसके साथ ही आज रामनगर वन प्रभाग की डीएफओ ने कोर्ट को बताया कि कब्जे में लिये गये हाथी अभी पूर्ण स्वस्थ नहीं है। उनका उपचार चल रहा है। इनके खाने-पीने व रहने की पर्याप्त व्यवस्था की है। इसके अलावा कोर्ट ने हाथियों को अवैध ढंग से रखने के मामले में दर्ज मुकदमों की शीघ्र कार्यवाही करने के निर्देश एसएसपी नैनीताल को दिये हैं और प्रगति रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने को कहा है। साथ ही टाइगर रिजर्व फोर्स के संदर्भ में काबेट पार्क के निदेशक ने बताया कि विभाग 83 फारेस्ट गार्डों की प्रतिनियुक्ति कर रही है। इस पर हाईकोर्ट ने फारेस्ट गार्ड के बजाय पूर्व सैनिकों को भर्ती करने को कहा है।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड में रीवरराफ्टिंग, पैराग्लाइडिंग व अन्य जल खेलों के लिए नियमावली बनने तक रोक

नैनीताल, 21 जून 2018। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को रीवरराफ्टिंग, पैराग्लाइडिंग व अन्य जल खेलों के लिए उचित नियमावली बनाने के निर्देश दिए हैं, और तब तक रीवरराफ्टिंग की स्वीकृति न देने तथा जो चल रहें हैं, उन पर रोक लगाने को कहा है। वरिष्ठ न्यायमूर्ति राजीव शर्मा एवं न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार देहरादून रोड ऋषिकेश निवासी हरिओम कश्यप ने हाईकार्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि सरकार ने 2014 में भगवती काला व विरेंद्र सिंह गुसाई को राफ्टिंग कैंप लगाने के लिए कुछ शर्तों के साथ लाइसेंस दिया था। याचिका में विपक्षीगणों की ओर से शर्तों का उल्लंघन करते हुए राफ्टिंग के नाम पर गंगा नदी के किनारे कैंप लगाने शुरू कर दिये और कैंपों में गंगा के किनारे कैंप की आड में मीट, मदिरा का सेवन, डीजे बजाना, बाथरूम का मुहाना नदी में खोलना व कूडा इत्यादि नदी में बहाने जैसे असामाजिक कार्य किए जाने लगे। याचिकाकर्ता ने इस संबंध में कुछ फोटोग्राफ भी याचिका में लगाए थे। सभी पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सरकार को आदेश दिए हैं कि वे नदी के किनारे उपयुक्त शुल्क लिये बिना लाइसेंस जारी नहीं कर सकती तथा खेल गतिविधियों के नाम पर अय्याशी करने की स्वीकृति नहीं दे सकती। कोर्ट ने कहा कि सरकार द्वारा राफ्टिंग कैंप को नदी किनारे स्वीकृति दी गई है, जिससे नदियों का पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है और राफ्टिंग के नाम पर लांचिंग पाइंट पर ट्रेफिक जाम की स्थिति बन रही है। बडे बडे राफ्टों से छोटी गाड़ियों से भी ढोया जा रही हैं। इस प्रकार की गतिविधियों की स्वीकृति नहीं देनी चाहिए तथा राफ्टों को मानव शक्ति द्वारा ले जाया जाए न कि गाडियों द्वारा।

सात साल के बाद आचार्य बालकृष्ण को मिली राहत

  • हाई कोर्ट ने दिये सीबीआई द्वारा दर्ज मुकदमे में 2011 में जब्त पासपोर्ट छोड़ने के आदेश

नैनीताल, 17 जुलाई 2018। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने आचार्य बालकृष्ण का जब्त पासपोर्ट छोड़ने के आदेश दिए हैं। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की एकलपीठ में हुई। मामले के अनुसार पतंजलि योगपीठ के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण का पासपोर्ट जुलाई 2011 से हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के कार्यालय मे जमा है। 2011 में सीबीआई द्वारा उनके खिलाफ धोखाधड़ी व फर्जी तरीके से शैक्षणिक दस्तावेज व पासपोर्ट हासिल करने के आरोप में धारा 120 बी के तहत षडयंत्र का आरोप लगाया था। पूर्व में एकलपीठ ने उनके पासपोर्ट को हाईकोर्ट में जमा करने के आदेश दिए थे। तब से उनका पासपोर्ट यहीं जमा है। इधर मंगलवार को मामले को सुनने के बाद एकलपीठ ने उनके पासपोर्ट को रिलीज करने के निर्देश दे दिए हैं, साथ ही पासपोर्ट ऑथोरिटी को निर्देश दिए हैं कि वे चाहें तो बालकृष्ण के विदेश से लौटने के बाद उन्हें पासपोर्ट ऑथोरिटी के समक्ष पेश करवा लें या विदेश से आने का शपथपत्र लें।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने दिया नजीर पेश करने वाला बड़ा फैसला : फांसी की सजा पाये दोषियों को अकेले में रखे जाने को असंवैधानिक करार दिया

उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने शुक्रवार 27 अप्रैल 2018 को एक बड़ा, देश भर के लिए नजीर बन सकने वाला फैसला देते हुए फांसी की सजा पाये व्यक्ति को अकेले में रखे जाने को असंवैधानिक करार दिया है। अपने निर्णय में उत्तराखंड उच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायधीश राजीव शर्मा व न्यायाधीश आलोक सिंह की खंडपीठ ने साफ तौर पर कहा है कि सजा के दो-तीन दिन तक ही फांसी की सजा पाये व्यक्ति को अकेले में रखा जा सकता है, उसके बाद उनको अन्य कैदियों के साथ ही रखा जाय। खंडपीठ ने इस संबंध में जेल मैन्युअल में दिए गए प्राविधानों को भी असवैधानिक माना और कहा कि जेल मेनुअल में फांसी की सजा पाये अभियुक्तों को 24 घण्टे में से 23 घंटे अलग रखे जाने का प्राविधान गलत है और यह भी एक प्रकार की दूसरी सजा से कम नही है।
खंडपील ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी निचली अदालत द्वारा एक महिला की क्रूरतापूर्वक की गयी हत्या व दुर्व्यवहार किये जाने के आरोपी सुुशील व महताब को निचली अदालत द्वारा दी गयी फांसी की सजा के मामले में की। खंडपीठ ने फांसी की सजा को बरकरार रखा, परन्तु दोषियों पर लगाये गए एससी-एसटी एक्ट को गलत माना और फाँसी की सजा पाये अभियुक्तों को अकेले रखने को असवैधानिक माना।
मामले के अनुसार विकास नगर निवासी अनिल चौहान ने 29 दिसम्बर 2012 को विकास नगर थाने में एक प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखाई थी कि उसकी 55 वर्षीय माँ गायों को चराने के लिए जंगल गयी हुई थी, जहां से वह वापस नही आयी। काफी खोजबीन करने पर उनका शव जंगल में मिला और उनके साथ दुर्व्यवहार भी हुआ था। जाँच करने पर उक्त दोनों अभियुक्तों के द्वारा हत्या करने की पुष्टि हुई। मामले में विशेष न्यायाधीश देहरादून द्वारा उन्हें 27 जनवरी 2014 को आईपीसी की धारा 302,376 जी में निर्मम हत्या करने व दुष्कर्म करने के मामले में फाँसी की सजा सुनाई गयी। साथ ही उन पर एससी-एसटी एक्ट भी लगाया। इस आदेश को सरकार व अभियुक्तों द्वारा हाई कोर्ट में चुनौती दी जिस पर अभियुक्तों के अधिवक्ता ने कहा है कि अभियुक्तों के खिलाफ कोई प्रत्यक्षदर्शी शाक्ष्य नही है उनको संदेह के आधार पर इस मामले में फसाया जा रहा है।

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