चार दशक में डेढ़ किमी पीछे खिसक गया पिंडारी ग्लेशियर


  • यूसैक देहरादून, कुमाऊं विवि, नैनीताल व आईआईएसईआर, कोलकाता का संयुक्त अध्ययन 
  • अध्ययन में रिमोट सेंसिंग के माध्यम से ग्लेशियर की 1976 से 2014 तक की तुलना की गई
पिंडारी ग्लेशियर

कुमाऊं का जाना-माना पिंडारी ग्लेशियर बीते चार दशक में डेढ़ किलोमीटर पीछे चला गया है। पिंडारी ग्लेशियर गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी अलकनंदा की भी सहायक नदीं पिंडर का उदगम स्थल है। उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र देहरादून, इंडियन इंस्टीटय़ूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च कोलकाता और कुमाऊं विविद्यालय नैनीताल के संयुक्त अध्ययन में यह बात सामने आई है। यह संयुक्त अध्ययन ‘‘रिमोट सेंसिंग एंड एन्वायरमेंट’ वैज्ञानिक शोध पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। 

अध्ययन में रिमोट सेंसिंग के माध्यम से 1976 से 2014 तक के आंकड़ों की तुलना की गई। अध्ययन में जियो पोजीशनिंग सिस्टम (जीपीएस) को आर्डिनेट का उपयोग कर पता लगाया गया कि 2014 में ग्लेशियर की बर्फ का अग्रभाग कहां तक था, यही नहीं सव्रे ऑफ इंडिया के पुराने भौगोलिक नक्शों व समय समय पर लिए उपग्रह मानचित्रों का उपयोग भी किया गया। अध्ययन में विभिन्न वर्षो में ग्लेशियर की स्थिति व उसके बर्फीले क्षेत्र की स्थिति को भी चिह्नित किया गया। अध्ययन से पता चला कि चार दशक में ग्लेशियर 1569.01 मीटर पीछे खिसक गया है। इस तरह देखा जाए तो हर साल पिंडारी ग्लेशियर 51.23 मीटर पीछे खिसक रहा है। यह भी पता चला कि 199 से 2014 तक ग्लेशियर के सिकुड़ने की सालाना दर 1976 से 1994 से अधिक रही। रिपोर्ट में हिमालय के अन्य ग्लेशियरों के अध्ययन की जरूरत रेखांकित की गई है। उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र के वैज्ञानिक गजेंद्र सिंह रावत का कहना है कि हालांकि अध्ययन दल ने ग्लेशियर के मास बैलेंस का विश्लेषण नहीं किया लेकिन अध्ययन में स्थानीय बुजुगरे की जानकारी व रिमोट सेंसिंग के आंकड़ों के जरिए जमीनी सच्चाई का पता लगाया गया। अध्ययन में यह भी पाया गया कि ग्लेशियर के आस पास की छोटी धाराएं भी ग्लेशियरों की सिकुड़ने की दर को तेज कर रही हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि पिंडारी और अन्य हिमालयी ग्लेशियरों के सिकुड़ने के पीछे ग्लोबल वार्मिग और जलवायु परिवर्तन है। नतीजतन देश की हिमालयी सदानीरा नदियों के पानी में कमी आ सकती है। यही नहीं इसके कारण ग्लेशियल लेक भी बन सकती है जो कि केदारनाथ आपदा जैसी आपदा का सबब बन सकती है।

1906 से 2010 तक 3.08 किमी पीछे खिसक गया था पिंडारी ग्लेशियर

इंडियन इंस्टीटय़ूट ऑफ साइस एजुकेशन एंड रिसर्च पुणो के 2016 के एक पुराने अध्ययन में भी बताया गया था कि 1850 से 2010 तक पिंडारी समेत हिमालय व कराकोरम के 43 ग्लेशियरों की लंबाई घटी है। इस दौरान ये इलाका 1.5 डिग्री सेल्सियस गर्म भी हो गया। लघु हिम युग के बाद ग्लेशियर लगातार सिकुड़ रहे हैं। अध्ययन के मुताबिक 1906 से 2010 तक पिंडारी ग्लेशियर 3.08 किलोमीटर पीछे खिसक गया था। इस तरह देखा जाए तो 104 साल में पिंडारी ग्लेशियर हर साल 30 मीटर की दर से पीछे खिसकता रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्लेशियर र्थमामीटर की तरह होते हैं। जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, वे सिकुड़ते जाते हैं।

ऐसे पहुंचें पिंडारी, कफनी और सुंदरढूंगा ग्लेशियर

पिंडारी ग्लेशियर उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र के बागेश्वर जिले में समुद्र तल से 3627 मीटर (11657 फीट) की ऊंचाई पर नंदा देवी और नंदा कोट की हिमाच्छादित चोटियों के बीच स्थित है। हिमालय के अन्य सभी ग्लेशियरों की तुलना में सबसे आसान पहुंच के कारण पर्वतारोहियों और ट्रेकरों की पहली पसंद पिंडारी ग्लेशियर अपनी खूबसूरती से भी मना को लुभाने वाला है। 3.2 किमी लंबे और 1.5 किमी चौड़े इस ग्लेशियर का जीरो पॉइंट समुद्र तल से 3660 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहीं से पिंडर नदी निकलती है, जो बाद में कर्णप्रयाग से होते हुए अलकनंदा नदी में जाकर मिलती है। पिंडारी ग्लेशियर के बांई ओर समुद्र तल से जिसकी ऊंचाई 3860 मीटर की ऊंचाई पर कफनी ग्लेशियर स्थित है, जिसके लिए द्वाली नाम के पड़ाव से रास्ता अलग होता है। पिंडारी ग्लेशियर जाने के लिए बागेश्वर से कपकोट की ओर 48 किमी आगे सौंग, लोहारखेत तक सड़क जाती है, जहां से धाकुड़ी टॉप तक खड़ी चढ़ाई, वहां से उतार के पैदल मार्ग से इस ट्रेक के आखिरी खाती गांव, द्वाली व फुरकिया होते हुए पिंडारी ग्लेशियर के आखिरी पड़ाव जीरो प्वाइंट पहुंचा जाता है।

यह भी पढ़ें : दिल्ली-एनसीआर की धुंध से एक माह पीछे खिसका ‘हिमालय दर्शन’ !

नवीन जोशी, नैनीताल। सामान्यतया पर्वतीय क्षेत्रों में बरसात निपटने के बाद शरद-हेमंत ऋतु के सितम्बर से अच्छी धूप खिलने के साथ नगाधिराज हिमालय के दर्शन होने लगते हैं, और देर से देर पिछले वर्षों में अक्टूबर प्रथम सप्ताह तक हिमालय के बहुत सुंदरता के दीदार हो जाते हैं। यही पहाड़ों की सैर का वर्ष में सबसे बेहतर समय भी होता है, इस मौसम में पर्वतों के वास्तविक सौंदर्य के प्रेमी सैलानी खासकर ऊंची चोटियों से हिमालय को देखने के लिए बड़ी संख्या में पहाड़ों की और उमड़ पड़ते हैं। किंतु इस वर्ष हिमालय दर्शन एक माह से अधिक पीछे खिसक गया है। इस वर्ष पहली बार 10 नवंबर को हिमालय के दर्शन हुए हैं। आज 11 नवंबर को भी हिमालय के दर्शन हुए, अलबत्ता दोपहर बाद बादलों ने हिमालय को अपने आगोश में छुपा लिया। एक माह देरी से हो रहे हिमालय दर्शन को दिल्ली-एनसीआर में छायी धुंध को कारण माना जा रहा है।

गौरतलब है कि पहाड़ों और खासकर हिमालय में बरसात के बाद आसमान के साफ होने के बाद अक्टूबर-नवंबर के महीनों में, जब मैदानी क्षेत्रों में सर्दियों का कोहरा छाने लगता है, यहां आसमान साफ हो जाता है। पूर्व में हुई बरसात के कारण इन दिनों पहाड़ों का वातावरण साफ भी रहता है, इसलिए इस दौरान यहाँ से सैकड़ों किमी दूर हल्द्वानी, नानकमत्ता, बहेड़ी व काशीपुर, मुरादाबाद तक के मैदानों तथा हिमालय की चोटियों से प्रदेश के गढ़वाल व कुमाऊं अंचलों के साथ ही पड़ोसी राष्ट्र नेपाल की हिमालय की चोटियों को एक नजर में एकाकार होते देखने का भी अनूठा अनुभव प्राप्त होता है। साथ ही गढ़वाल की पोरबंदी, केदारनाथ, कर्छकुंड से लेकर चौखंभा, नीलकंठ, कामेत, गौरी पर्वत, हाथी पर्वत, नंदाघुंटी, त्रिशूल, मैकतोली (त्रिशूल ईस्ट), प्रख्यात पिंडारी व सुंदरढूंगा ग्लेशियर, नंदा देवी, नंदाकोट, राजरम्भा, लास्पाधूरा, रालाम्पा, नौल्पू व पंचाचूली होते हुऐ नेपाल की एपी नेम्फा की एक, दो व तीन सहित कई अन्य चोटियों की 365 किमी से अधिक लंबी पर्वत श्रृंखला को बेहद करीब से देखा जा सकता है। सरोवरनगरी नैनीताल में हिमालय दर्शन तथा नैना पीक, स्नो व्यू व टिपिन टॉप की चोटियों से हिमालय पर्वत की श्रृंखलाओं का सुंदर नजारा लेने के लिए सैलानी आते हैं, और इनसे यहां के युवाओं को अच्छा रोजगार भी मिल जाता है। किंतु इस वर्ष ऐसा नहीं हुआ। अक्टूबर पहले सप्ताह की जगह नवंबर के दूसरे सप्ताह से हिमालय के दर्शन होने प्रारंभ हुए हैं। इस पर हिमालय दर्शन स्थल पर सैलानियों को दूरबीन से हिमालय के दर्शन कराने वाले युवा निखिल जोशी व पंकज वर्मा आदि मायूस हैं। पंकज ने कहा कि पहली बार हिमालय दर्शन एक माह पीछे खिसक गया है। वहीं निखिल को आशंका है कि ऐसा दिल्ली-एनसीआर में इस वर्ष ऐतिहासिक तौर पर पहली बार इस मौसम में धुंध छाने का असर हो सकता है। बीते एक माह हिमालय पर भी धुंध छायी रही। इस कारण बंगाली सीजन बेकार गया। इधर दो-तीन दिन पूर्व केदारनाथ व मुन्स्यारी क्षेत्रों में हिमालय पर बर्फवारी होने के बाद आसमान रात्रि में साफ हुआ। इसके बाद ही बृहस्पतिवार की रात्रि पहली बार इस मौसम में पाला पड़ा, और इसी रात्रि नगर में बारापत्थर के पास रामनगर डिपो की एक रोडवेज बस पाले में फिसलने से सड़क पर पलटी। और इसके बाद ही शुक्रवार को इस मौसम में पहली बार हिमालय के दर्शन हुए। नगर में आ रहे गुजराती सैलानियों ने इनका आनंद उठाया। आगे उम्मीद की जा सकती है कि हिमालय के दीदार होते रहेंगे।

ठंड पर भारी ग्लोबलवार्मिंग, हिमालय पर बर्फ का टोटा

-बढ़ती ठंड के बीच नगाधिराज बता रहा मौसम की हकीकत, मीथेन सुलगा रही पहाड़ों को
नवीन जोशी, नैनीताल। देश-प्रदेश सहित समूचे दक्षिणी गोलार्ध से आ रही कंपकंपाती ठंड की खबरों के बीच यह खबर हैरान करने वाली है। भारत ही नहीं एशिया के मौसम की असली तस्वीर बयां करने वाला नगाधिराज हिमालय मौसम की असली कहानी बयां करने को मानो छटपटा रहा है। बीते वर्षों में सर्दियों में भी कम बर्फवारी होने के कारण इन दिनों श्वेत-धवल बर्फ से लकदक रहने वाला हिमालय स्याह पड़ा हुआ है। उसकी रौनक बेहद फीकी पड़ी हुई है। नैनीताल के निकट हिमालय दर्शन से हिमालय का नजारा ले रहे सैलानियों के साथ ही पुराने गाइड भी हिमालय की बदसूरती को देखकर आहत महसूस कर रहे हैं। वैज्ञानिक ग्लोबल वार्मिंग को इसका कारण बता रहे हैं।
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार ग्लोबलवार्मिंग पहाड़ों और मैदानों के मौसम को सर्दियों व गर्मियों में दो तरह से प्रभावित कर रहा है। ग्लोबलवार्मिंग व प्रदूषण के कारण धरती के वायुमंडल में मौजूद पौल्यूटेंट्स यानी प्रदूषण के कारक धूल, धुंवा, ग्रीन हाउस गैसों के सूक्ष्म प्रदूषित कण (एरोसोल) तथा नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड , कार्बन डाई आक्साइड, सल्फर डाई आक्साइड, जल वाष्प तथा ब्लैक कार्बन के कण धरती के ऊपर ढक्कन जैसा (कैपिंग इफेक्ट) प्रभाव उत्पन्न कर देते हैं। गर्मियों में दिनों में दिन के अधिक घंटे धूप पड़ने के कारण वायुमंडल में मौजूद गर्मी धरती से परावर्तित होकर इस ढक्कन से बाहर नहीं जा पाती, जिस कारण धरती की गर्मी बढ़ जाती है, जबकि इसके उलट सर्दियों में यही ढक्कन सूर्य की रोशनी को धरती पर नहीं आने देता, साथ ही दिन में कम घंटे धूप पड़ती है, इसलिये धरती गर्म नहीं होने पाती, परिणामस्वरूप मैदानों में कोहरा छा जाता है, और पहाड़ आम तौर पर धूप से गुलजार रहते हैं। इसका परिणाम है कि पहाड़ों पर लगातार सर्दियों के दिनों में बर्फवारी में कमी देखने को मिल रही है। दूसरी ओर एरीज द्वारा ही किये गये एक अध्ययन में पहाड़ों पर मीथेन की मात्रा 2.5 पीपीएम (पार्ट पर मालीक्यूल) तक पाई गई है, जबकि वायुमंडल में मीथेन की मात्रा का विश्व औसत 1.8 से 1.9 पीपीएम है। मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि मीथेन की यह बढ़ी हुई मात्रा पहाड़ों पर गर्मी बढ़ाने का बड़ा कारण हो सकती है।
इधर नैनीताल के हिमालय दर्शन से नेपाल की नेम्फा से लेकर प्रदेश के गढ़वाल मंडल के केदारनाथ तक की करीब 365 किमी लंबी हिमालय की पर्वत श्रृंखला का अटूट नजारा बेहद खूबसूरती से नजर आता है, लेकिन हिमालय दर्शन से सैलानियों को दूरबीन की मदद से दशकों से हिमालय नजदीक से दिखा रहे लोग हतप्रभ हैं कि बीते वर्षों में हिमालय की छटा लगातार फीकी पड़ रही है। केवल चोटियों पर ही बर्फ नजर आती है, और शेष हिस्सा काला पड़ा नजर आता है, और बीते वर्षों में इसमें लगातार बढ़ोत्तरी देखी जा रही है। यदि ऐसा है तो यह खतरनाक संकेत हैं। इसके दूरगामी दुष्परिणाम हो सकते हैं।

आंकड़ों न होने से परेशानी
नैनीताल। यूं हिमालय में स्थित ग्लेशियरों के पिघलने के दावे भी पूर्व से ही किये जा रहे हैं, परंतु सच्चाई है कि यह बातें आंकड़ों के बिना हो रही हैं। प्रदेश के मौसम विज्ञान केंद्र के निदेशक डा. आनंद शर्मा भी यह स्वीकार करते हैं । लिहाजा इस दिशा में गहन शोध और कम से कम आंकड़े एकत्र कर डाटा बेस तैयार करने की मौसम विज्ञानी आवश्यकता जताते रहे हैं। इधर कुमाऊं विवि द्वारा देश-प्रदेश का पहला सेंटर फार क्लाइमेट चेंज वर्चुअल मोड में इसी वर्ष स्थापना कर चुका है, जिससे आगे डाटा बेस तैयार करने की उम्मीद की जा रही है।

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