कला की नगरी नैनीताल में नाटक परंपरा का इतिहास


 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

नाटक प्रतियोगिता 20 के विजेता रहे नाटक 'उरुभंगम' के एक भावपूर्ण दृश्य में कलाकार
नाटक प्रतियोगिता 2017 के विजेता रहे नाटक ‘उरुभंगम’ के एक भावपूर्ण दृश्य में कलाकार

सरोवरनगरी को कला की नगरी भी कहा जाता है। एक अभिनेता होते हुए सात समुंदर पार कांस फिल्म महोत्सव में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार जीतने वाले स्वर्गीय निर्मल पांडे तथा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व निदेशक बीएम शाह तथा गीत एवं नाटक प्रभाग के निदेशक मटियानी की धरती सरोवर नगरी नैनीताल में नाटक परम्परा का इतिहास 1895 में ग्रीष्मकालीन राजधानी व बंगाल आर्मी का मुख्यालय बनने के साथ ही बताया जाता है। कहा जाता है कि 1920 तक नगर में 1882 में (वर्तमान कैपिटॉल सिनेमा की जगह पर) बने नाचघर में लानटेनों की रोशनी में नाटक खेले जाते थे, जिसे तक अनेकों कमियों की वजह से दुनिया का सबसे खराब स्टेज भी कहा गया था। सचिवालय में तैनात बंगाली मूल के अधिकारियों-कर्मचारियों ने 1894 में ‘बंगाली एमेच्योर ड्रामेटिक क्लब’ की नींव रखी थी, जिसके तहत वे बंगाली नाटक करते थे।

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इटली के ‘ऑर्डर ऑफ स्टार अवार्ड’ से सम्मानित होंगे नैनीताल के अनुपम


-भारत में कला एवं संस्कृति के संरक्षण के साथ ही देश-विदेश में तकनीक के आदान-प्रदान के लिये कला संरक्षकों को मिलेगी अमेरिकी भारतीय फेलोशिप

नवीन जोशी, नैनीताल। नैनीताल की कला एवं संस्कृति तथा प्राचीन पांडुलिपियों के संरक्षण के लिए समर्पित संस्था हिमालयन सोसायटी फॉर हेरिटेज एंड आर्ट कंजरवेशन (हिमसा) के प्रमुख अनुपम साह को अगले माह इटली में वहां के राष्ट्रपति सर्जियो मटरेल्ला के हाथों प्रतिष्ठित ‘ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ इटली’ अवार्ड प्रदान किया जाएगा।जानकारी के अनुसार 2011 तक ‘ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ इटेलियन सोलिडेरिटी’ अवार्ड कहा जाने वाला यह पुरस्कार इससे पूर्व केवल एक भारतीय, मशहूर शेफ एवं रेस्टोरेंटों की श्रृंखला की मालिक रितु डालमिया को वर्ष 2011 में प्राप्त हुआ था। इस प्रकार अनुपम यह पुरस्कार प्राप्त करने वाले दूसरे भारतीय होंगे।  

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आर्डर ऑफ़ स्टार ऑफ़ इटली अवार्ड

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कुमाउनी लोक संगीत को बचाने में जुटेगा कुमाऊं विश्वविद्यालय


राष्ट्रीय सहारा, 1 फरवरी 2016

कुमाऊं विवि ने बनाया कुमाऊं के लोक संगीत को अपना ‘मैन्डेट’
-कुमाऊं के परंपरागत लोकगीतों न्यौली, छपेली, चांचरी व शगुराखरों आदि को उनके मूल स्वरूप में आगे लाने, कुमाउनी संगीत को हालिया दौर में आ रहे हल्केपन से बचाने के साथ फ्यूजन के जरिये राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाने के होंगे प्रयास
नवीन जोशी, नैनीताल। कुमाऊं विश्व विद्यालय कुमाऊं मंडल के परंपरागत लोकगीतों न्यौली, छपेली, चांचरी व शगुराखरों आदि को उनके मूल स्वरूप में आगे लाने, कुमाउनी संगीत को हालिया दौर में आ रहे हल्केपन से बचाने के साथ फ्यूजन के जरिये राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाने सुनियोजित पहल करने जा रहा है। इस हेतु एक कार्यशाला पूर्व में की जा चुकी है, तथा आगे और भी इसी तरह की कार्यशालायें और संगोष्ठियां आयोजित की जायेंगी, तथा उनसे निकलने वाली दिशा पर आगे चलकर यहां के लोक संगीत को आधुनिक संचार माध्यमों के जरिये अमर व गैर कुमाउनी भाषी जन-जन की जुबान पर चढ़ाकर लोकप्रिय करने की है। कुमाऊं विवि के कुलपति प्रो. होशियार सिंह धामी का कहना है कि हर राज्य विश्वविद्यालय का अपने क्षेत्र के परंपरागत ज्ञान, लोक संगीत, संस्कृति को संरक्षित व संवर्धित करने का आधिकारिक तौर पर कार्य (मैन्डेट) होना चाहिये। कुमाऊं विवि ने इसी उद्देश्य से कुमाऊं के लोक संगीत को संरक्षित व संवर्धित करने का अपना ‘मैन्डेट’ तय किया है। उनकी कोशिश होगी कि इस सुनियोजित प्रयास के जरिये गैर कुमाउनी भाषी लोग भी कुमाउनी गीतों को सुनकर वैसे ही कुमाउनी पढ़ने की कोशिश करें, जैसे भूपेन हजारिका के असमी गीतों को सुनकर लोग असमी और रवींद्र नाथ टैगोर के बांग्ला गीतों को सुनकर बांग्ला गीतों को सुनने की कोशिश करते हैं।

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भद्रकालीः जहां वैष्णो देवी की तरह त्रि-पिंडी स्वरूप में साथ विराजती हैं माता सरस्वती, लक्ष्मी और महाकाली


माता भद्रकाली मंदिर
माता भद्रकाली मंदिर
माता भद्रकाली के मंदिर का गर्भगृह
माता भद्रकाली के मंदिर का गर्भगृह

ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते।।

कहते हैं आदि-अनादि काल में सृष्टि की रचना के समय आदि शक्ति ने त्रिदेवों-ब्रह्मा, विष्णु व महेश के साथ उनकी शक्तियों-सृष्टि का पालन व ज्ञान प्रदान करने वाली ब्रह्माणी यानी माता सरस्वती, पालन करने वाली वैष्णवी यानी माता लक्ष्मी और बुरी शक्तियों का संहार करने वाली शिवा यानी माता महाकाली का भी सृजन किया। सामान्यतया अलग-अलग स्थानों पर प्रतिष्ठित रहने वाली यह तीनों देवियां कम ही स्थानों पर एक स्थान पर तीनों के एकत्व स्वरूप् में विराजती हैं। ऐसा एक स्थान है माता का सर्वोच्च स्थान बताया जाने वाला वैष्णो देवी धाम। लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड राज्य के कुमाऊं अंचल में भी एक ऐसा ही दिव्य एवं अलौकिक विरला धाम मौजूद है, जहां माता सरस्वती, लक्ष्मी और महाकाली एक साथ एक स्थान पर वैष्णो देवी की तरह ही स्वयंभू लिंग या पिंडी स्वरूप में आदि-अनादि काल से एक साथ माता भद्रकाली के रूप में विराजती हैं, और सच्चे मन से आने वाले अपने भक्तों को साक्षात दर्शन देकर उनके कष्टों का हरती तथा जीवन पथ पर संबल प्रदान करती हैं। इस स्थान को माता के 51 शक्तिपीठों में से भी एक माना जाता है। शिव पुराण में आये माता भद्रकाली के उल्लेख के आधार पर श्रद्धालुओं का मानना है कि महादेव शिव द्वारा आकाश मार्ग से कैलाश की ओर ले जाये जाने के दौरान यहां दक्षकुमारी माता सती की मृत देह का दांया गुल्फ यानी घुटने से नीचे का हिस्सा गिरा था।

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पर्यटन, हर्बल के बाद अब जैविक प्रदेश बनेगा उत्तराखंड


विभिन्न प्रकार के बीज
विभिन्न प्रकार के बीज

-प्रदेश के जैविक उत्पादों का बनेगा अपना राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय ब्रांड
-उत्तराखंड कृषि उत्पादन विपणन बोर्ड के प्रस्ताव को मुख्य मंत्री ने दी हरी झंडी
-राज्य में ही पहली बार लगने जा रही कलर सॉर्टिंग मशीनों से स्थानीय ख्याति प्राप्त उत्पाद राजमा, चौलाई, गहत, भट्ट आदि के जियोग्रेफिकल इंडेक्स बनेंगे
-इस हेतु रुद्रपुर में मंडी परिषद के द्वारा एक वर्ष के भीतर बनाया जाएगा 1500 टन क्षमता का कोल्ड स्टोर और तीन हजार टन क्षमता का गोदाम

नवीन जोशी, नैनीताल। देश में दालों की बढ़ती कीमतों के बीच यह खबर काफी सुकून देने वाली हो सकती है। अभी भी अपेक्षाकृत सस्ती मिल रहीं उत्तराखण्ड की जैविक दालें (मौंठ 50, भट्ट 70 तथा गहत और राजमा 120 रुपये प्रति किग्रा.) देश की महँगी दालों का विकल्प हो सकती हैं। पर्यटन और जड़ी-बूटी प्रदेश के रूप में प्रचारित उत्तराखंड एक नए स्वरूप में स्वयं को ढालने की राह पर चलने जा रहा है। यह राह है हर्बल प्रदेश बनने की, जिस पर अब तक पर्यटन और जड़ी-बूटी प्रदेश के रूप में प्रचारित किये जा रहे उत्तराखण्ड ने कदम बढ़ा दिए हैं। प्रदेश सरकार ने उत्तराखंड कृषि उत्पादन विपणन बोर्ड, मंडी परिषद, उत्तराखंड जैविक उत्पाद परिषद एवं कृषि एवं उद्यान आदि विभागों के संयुक्त तत्वावधान में प्रदेश को जैविक प्रदेश यानी जैविक उत्पादों का प्रदेश बनाने की कवायद शुरू कर दी है। इस कड़ी में राज्य के सभी पर्वतीय जिलों के 10 ब्लॉकों को जैविक ब्लॉक घोषित कर दिया गया है। रुद्रप्रयाग जिला जैविक जिले के रूप में विकसित किया जा रहा है, और आगे चमोली व पिथौरागढ़ को भी जैविक जनपद बनाने की तथा अगले चरण में सभी पर्वतीय जिलों को जैविक जिलों के रूप में विकसित किए जाने की योजना है। साथ ही प्रदेश के जैविक उत्पादों के लिए प्रदेश में ही बड़ी प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित किए जाने को मुख्यमंत्री के स्तर से हरी झंडी मिल गई है। प्रस्तावित जैविक प्रदेश में जैविक खाद्यान्नों के साथ जैविक दालों के उत्पादन को भी बढ़ावा मिलेगा, ऐसी उम्मीद की जा सकती है।

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कैंची धाम से निकली थी एप्पल और फेसबुक की तरक्की और ओबामा की जीत की राह


कैंची में उत्तर वाहिनी शिप्रा नदी पर स्थित (आज भी मौजूद ) पुलिया पर बैठे बाबा नीब करौरी का एक दुर्लभ चित्र .

-सिलिकॉन वैली में जुकरबर्ग ने मोदी से किया था इस मंदिर का जिक्र, कहा था-फेसबुक को खरीदने के लिए फोन आने के दौर में इस मंदिर ने दिया था परेशानियों से निकलने का रास्ता
नवीन जोशी, नैनीताल। गत दिवस फेसबुक के संस्थापक व प्रमुख मार्क जुकरबर्ग ने फेसबुक मुख्यालय में मोदी से सवाल पूछने के दौरान अपने बुरे दिन याद करते हुए मोदी को बताया था, ‘जब 2011 के दौर में फेसबुक को खरीदने के लिए अनेक लोगों के फोन आ रहे थे, और वह परेशानी में थे । तब वे अपने गुरु एप्पल (दुनिया की सबसे बड़ी मोबाइल कंपनी) के संस्थापक स्टीव जॉब्स से मिले। जॉब्स ने उन्हें कहा कि भारत जाओ तो उत्तराखंड स्थित बाबा नीब करौरी (अपभ्रंश नीम करोली) के कैंची धाम जरूर जाना। इस पर उन्होंने 2013 में एप्पल कंपनी के तत्कालीन प्रमुख टिम कुक के साथ कैंची धाम के दर्शन किए थे। इसी दौरान करीब एक वर्ष भारत में रहकर उन्होंने यहां लोगों के आपस में जुड़े होने को नजदीकी से देखा, और इससे उनका फेसबुक को एक-दूसरे को जोड़ने के उपकरण के रूप में और मजबूत करने का संकल्प और इरादा और अधिक मजबूत हुआ और उन्होंने फेसबुक को किसी को न बेचकर खुद ही आगे बढ़ाया।
वहीं एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स की बात करें तो स्टीव स्वयं अवसाद के दौर से गुजरने के दौर में 1973 में एक बेरोजगार युवा-हिप्पी के रूप में अपने मित्र डैन कोटके के साथ बाबा नीब करोलीके दर्शन करने आये थे, किंतु इसी बीच 11 सितम्बर 1973 को बाबा के शरीर त्यागने के कारण वह दर्शन नहीं कर पाए, लेकिन यहां से मिली प्रेरणा से उन्होंने अपने एप्पल फोन से 1980 के बाद दुनिया में मोबाइल क्रांति का डंका बजा दिया। यहां तक ​​कहा जाता है की स्टीव ने अपने मशहूर मोनोग्राम (एक बाइट खाये सेब) को कैंची धाम से ही प्रेरित होकर ही बनाया है।

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कुमाऊं में परंपरागत ‘जन्यो-पुन्यू’ के रूप में मनाया जाता है रक्षाबंधन


वैश्वीकरण के दौर में लोक पर्व भी अपना मूल स्वरूप खोकर अपने से अन्य बड़े त्योहार में स्वयं को विलीन करते जा रहे हैं। उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के पर्वतीय क्षेत्रों का सबसे पवित्र त्यौहार माना जाने वाला ‘जन्यो पुन्यू’ यानी जनेऊ पूर्णिमा और देवीधूरा सहित कुछ स्थानों पर ‘रक्षा पून्यू’ के रूप में मनाया जाने वाला लोक पर्व रक्षाबंधन के त्योहार में समाहित हो गया है। श्रावणी पूर्णिमा के दिन मनाए जाने इस त्योहार पर परंपरागत तौर पर उत्तराखंड में पंडित-पुरोहित अपने यजमानों को अपने हाथों से बनाई गई जनेऊ (यज्ञोपवीत) का वितरण आवश्यक रूप से नियमपूर्वक करते थे, जिसे इस पर्व के दिन सुबह स्नान-ध्यान के बाद यजमानों के द्वारा गायत्री मंत्र के साथ धारण किया जाता था। इस प्रकार यह लोक-पर्व भाई-बहन से अधिक यजमानों की रक्षा का लोक पर्व रहा है। इस दिन देवीधूरा में प्रसिद्ध बग्वाल का आयोजन होता है। साथ ही अनेक स्थानों पर बटुकों के सामूहिक यज्ञोपवीत धारण कराने के उपनयन संस्कार भी कराए जाते हैं। इस दौरान भद्रा काल का विशेष ध्यान रखा जाता है। भद्रा काल में रक्षाबंधन, यज्ञोपवीत धारण एवं रक्षा धागे-मौली बांधना वर्जित रहता है।

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गौरा-महेश को बेटी-जवांई के रूप में विवाह-बंधन में बांधने का पर्व: सातूं-आठूं (गंवरा या गमरा)


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गौरा से यहां की पर्वत पुत्रियों ने बेटी का रिश्ता बना लिया हैं, तो देवों के देव जगत्पिता महादेव का उनसे विवाह कराकर वह उनसे जवांई यानी दामाद का रिश्ता बना लेती हैं। यहां बकायदा वर्षाकालीन भाद्रपद मास में अमुक्ताभरण सप्तमी को सातूं, और दूर्बाष्टमी को आठूं का लोकपर्व मना कर (गंवरा या गमरा) गौरा-पार्वती और महेश (भगवान शिव) के विवाह की रस्में निभाई जाती हैं, और बेटी व दामाद के रूप में उनकी पूजा-अर्चना भी की जाती है। इस मौके पर बिरुड़े कहे जाने वाले भीगे चने व अन्य दालों के प्रसाद के साथ बिरुड़ाष्टमी भी मनाई जाती है।

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स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का लोकपर्व घी-त्यार, घृत-संक्रांति


Ghonghaप्रकृति एवं पर्यावरण से प्रेम व उसके संरक्षण के साथ ही अभावों में भी हर मौके को उत्साहपूर्वक त्योहारों के साथ ऋतु व कृर्षि पर्वों के साथ मनाना देवभूमि उत्तराखंड की हमेशा से पहचान रही है। यही त्योहारधर्मिता उत्तराखंड के कमोबेश सही लोक पर्वों में दृष्टिगोचर होती है। यहां प्रचलित हिंदू विक्रमी संवत की हर माह की पहली तिथि-एक पैट या एक गते को संक्रांति पर्व (चैत्र एवं श्रावण संक्रांति को हरेला तथा मकर संक्रांति को घुघुतिया-उत्तरायणी) त्योहार की तरह मनाए जाते हैं। इसी कड़ी में भाद्रपद मास की संक्रान्तियहां घी-त्यार या घृत-संक्रांति एवं ओलगिया के रुप में मनाई जाती है।

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जितने सवाल-उतने जवाब थे अपने फक्कड़दा-गिर्दा


Late Girish Tiwari 'Girda' , Photo By: Navin Joshi
Late Girish Tiwari ‘Girda’ , Photo By: Navin Joshi

‘बबा, मानस को खोलो, गहराई में जाओ, चीजों को पकड़ो.. यह मेरी व्यक्तिगत सोच है, मेरी बात सुनी जाए लेकिन मानी न जाए….’ प्रदेश के जनकवि, संस्कृतिकर्मी, आंदोलनकारी, कवि, लेखक गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ (जन्म 9 सितंबर, 1945 को अल्मोड़ा के ज्योली हवालबाग गांव में हंसादत्त तिवाडी और जीवंती तिवाडी के घर-मृत्यु 22 अगस्त 2010 को हल्द्वानी में ) जब यह शब्द कहते थे, तो पीछे से लोग यह चुटकी भी लेते थे कि ‘तो बात कही ही क्यों जाए’ लेकिन यही बात जब वर्ष 2009 की होली में ‘स्वांग’ परंपरा के तहत युगमंच संस्था के कलाकारों ने उनका ‘स्वांग’ करते हुए कही तो गिर्दा का कहना था कि यह उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है। और शायद इसी सबसे बड़े पुरस्कार के वह इंतजार में थे, और इसे लेने के बाद वह दुनिया के रंगमंच से विदा ही हो लिए।

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कुमाऊँ के ऋतु, प्रकृति व लोक पर्व-हरेला, भिटौली, चैतौल और फूलदेई


हरेला: लाग हरिया्व, लाग दसैं, लाग बग्वाल, जी रये, जागि रये…. नवीन जोशी, नैनीताल। `लाग हरिया्व, लाग दसैं, लाग बग्वाल, जी रये, जागि रये, यो दिन यो मास भेटनैं रये, तिष्टिये, पनपिये, हिमाल में ह्यूं छन तक, गंग ज्यू में पांणि छन तक, अगासाक चार उकाव, धरती चार चकाव है जये, स्याव कस बुद्धि हो, स्यों जस तराण हो, दुब जस पंगुरिये, सिल पिसी भात खाये, जाँठ टेकी झाड़ जाए…´ यानी 10वें दिन कटने वाला हरेला तुम्हारे लिए शुभ होवे,  बग्वाल तुम्हारे लिए शुभ होवे, तुम जीते रहो, जाग्रत रहो, यह शुभ दिन, माह तुम्हारी जिन्दगी में आते रहें, समृद्ध बनो, विकसित होवो, हिमालय … पढ़ना जारी रखें कुमाऊँ के ऋतु, प्रकृति व लोक पर्व-हरेला, भिटौली, चैतौल और फूलदेई

विश्व योग दिवस के साथ युग परिवर्तन की शुरुआत, विश्व गुरु बनने की राह पर भारत


प्रकृति योग
प्रकृति योग

Image result for योग दिवस के साथ युग परिवर्तनबात कुछ पुराने संदर्भों से शुरू करते हैं। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि 1836 में उनके गुरु आचार्य रामकृष्ण परमहंस के जन्म के साथ ही युग परिवर्तन गया है काल प्रारंभ हो। यह वह दौर था जब देश में 700 वर्षों की मुगलों की गुलामी के बाद अंग्रेजों के अधीन था, और पहले स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल भी नहीं बजा था।
बाद में महर्षि अरविन्द ने प्रतिपादित किया कि युग परिवर्तन का काल, संधि काल कहलाता है और यह करीब 175 वर्ष का होता है …

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नाथुला से कहीं अधिक है उत्तराखंड के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा का क्रेज


Rashtriya Sahara. 07.04.2015, Page-1

-निर्मूल साबित हुई नाथुला का मार्ग खुलने पर उत्तराखंड की चिंता
-उत्तराखंड के पौराणिक मार्ग से 1100 और सिक्किम के रास्ते जाने के लिए केवल 800 यात्रियों ने दी है पहली वरीयता
-सिक्किम की वरीयता वालों ने भी दिया है उत्तराखंड का विकल्प
-उत्तराखंड के रास्ते उपलब्ध सीटों से अधिक आ चुके हैं आवेदन
-10 अप्रैल तक उपलब्ध हैं ऑनलाइन आवेदन
नवीन जोशी, नैनीताल। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की मुलाकात के बाद केंद्र सरकार के द्वारा प्रतिष्ठित कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए सिक्किम के नाथुला दर्रे से नया मार्ग खोलने पर उत्तराखंड द्वारा व्यक्त की गई चिंता निर्मूल साबित हुई है। प्रदेश के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने स्वयं इस बारे में आशंका व्यक्त की थी, और केंद्र सरकार को भी अपनी चिंता से अवगत कराया था। किंतु इस यात्रा के लिए जिस तरह से आवेदन आ रहे हैं, और तीर्थ यात्री अभी भी नाथुला के अपेक्षाकृत सुगम व सुविधाजनक बताए जा रहे मार्ग की बजाय पुरातन व पौराणिक दुर्गम मार्ग को ही तरजीह दे रहे हैं, इसके बाद स्वयं सीएम रावत ने स्वीकारा है कि उनकी चिंता गैर वाजिब थी। अलबत्ता, उन्होंने जोड़ा कि चिंता गैरवाजिब ही सही किंतु राज्य हित में थी। पढ़ना जारी रखें “नाथुला से कहीं अधिक है उत्तराखंड के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा का क्रेज”

उत्तराखंड में गुझिया-मिठाई सहित कुछ भी खाना रिस्की, मैगी नूडल्स की जांच की भी नहीं व्यवस्था


Gujhiyaनवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड राज्य में त्योहार राज्य वासियों के स्वास्थ्य पर भारी न पड़ जाए। राज्यवासी होली दिवाली या आम दिनों में गुझिया-मिठाई सहित कुछ भी खाएें तो अपने रिस्क पर। इसमें पूरा जोखिम उनका स्वयं का होगा। राज्य के इकलौते रुद्रपुर स्थित फूड एंड ड्रग टेस्टिंग लेबोरेटरी यानी खाद्य एवं औषधि परीक्षण प्रयोगशाला में पिछली होलियों तक एक भी खाद्य विश्लेषक नहीं था। हमारे द्वारा समाचार प्रकाशित किये जाने के बाद इधर बमुश्किल एक खाद्य विश्लेषक की तैनाती की गयी है, जो भी नाकाफी साबित हो रही है। ऐसे में पिछले सितंबर (2014) माह से राज्य में खाद्य पदार्थों एवं औषधियों के जो भी नमूने लिए जा रहे हैं, वह जांच के बिना ही प्रयोगशाला से बैरंग वापस आ रहे हैं। ऐसे में खाद्य सुरक्षा से जुड़े अधिकारी होली पर किसी तरह की छापेमारी करने से ही बच रहे हैं। होली के त्योहार में राज्य में एक जगह भी खाद्य पदार्थों की छापेमारी नहीं की गई। पढ़ना जारी रखें “उत्तराखंड में गुझिया-मिठाई सहित कुछ भी खाना रिस्की, मैगी नूडल्स की जांच की भी नहीं व्यवस्था”

उत्तराखंड से 1.5 और सिक्किम से 1.7 लाख में होगी कैलाश मानसरोवर यात्रा


kailash mansarovar
कैलाश पर्वत
  • -उत्तराखंड से 1080 और सिक्किम से 250 यात्री जा पाएंगे यात्रा पर
  • -उत्तराखंड के पौराणिक मार्ग से 25 तो सिक्किम से 23 दिनों में पूरी होगी यात्रा
  • -उत्तराखंड के रास्ते पहला बैच 12 जून को और सिक्किम के रास्ते 18 जून को दिल्ली से रवाना होंगे पहले दल
  • -उत्तराखंड के रास्ते नौ सितंबर तक 60 यात्रियों के 18 दल और सिक्किम के रास्ते 22 अगस्त तक 50 यात्रियों के पांच दल पूरी कर लेंगे यात्रा
  • -10 अप्रैल तक कर सकते हैं ऑनलाइन आवेदन

नवीन जोशी, नैनीताल। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने बृहस्पतिवार को कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए कार्यक्रम जारी कर स्थिति स्पष्ट कर दी है। इससे पहली बार उत्तराखंड के पांडवों द्वारा भी प्रयुक्त पौराणिक लिपुपास दर्रे के साथ ही सिक्किम के नाथुला दर्रे से होने जा रही यात्रा से संबंधित सभी किंतु-परंतु और संशयों से परदा उठ गया है। इसके साथ ही दोनों मार्गों से प्रस्तावित यात्रा का अंतर भी साफ हो गया है। यात्रा के लिए 10 अप्रैल से पूर्व ऑनलाइन माध्यम से विदेश मंत्रालय की वेबसाइट-केएमवाई डॉट जीओवी डॉट इन पर आवेदन किए जा सकते हैं। पढ़ना जारी रखें “उत्तराखंड से 1.5 और सिक्किम से 1.7 लाख में होगी कैलाश मानसरोवर यात्रा”