उत्तराखंड में ‘दावानल’ की राष्ट्रीय आपदा : न खुद भड़की आग, न उकसाया हवा ने


  पूरी तरह मानव जनित थी आग  !

-सभी आग कहीं न कहीं लोगों द्वारा ही लगाई गई हैं, तापमान कम होने से प्राकृतिक कारणों से आग लगने का अभी कोई कारण नहीं
-आग को भड़काने में प्राकृतिक हालात बने मददगार, अलबत्ता लकड़ी माफिया द्वारा आग लगाने की संभावनाओं से इन्कार
नवीन जोशी, नैनीताल। पहली बार ‘राष्ट्रीय आपदा’ घोषित उत्तराखंड की वनाग्नि पूरी तरह मानव जनित है, और इसके प्राकृतिक कारणों से शुरू होने के कहीं कोई सबूत या स्थितियां नहीं हैं। अलबत्ता पिछले तीन-चार दिनों में जब यह आग दावानल के रूप में दिखाई दी, तब प्राकृतिक हालातों ने जरूर इसे इस हद तक भड़काने में ‘आग में घी डालने’ जैसा कार्य किया। वहीं वन माफिया द्वारा आग लगाने के दावों को खारिज तो नहीं किया जा रहा है, पर इसकी स्पष्ट वजह भी नहीं बताई जा रही है।

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नैनीताल नगरपालिका के हाथ से रिक्शे भी ‘जायेंगे’, तभी ई-रिक्शा आयेंगे


02NTL-1-पूर्व में शरदोत्सव का आयोजन, फांसी गधेरा और बारापत्थर की चुंगी भी जा चुकी है हाथ से, होगा आर्थिक नुकसान
नवीन जोशी, नैनीताल। नगरवासियों, यहां आने वाले सैलानियों के लिये यह खबर अच्छी है कि नगर में मौजूदा तीन पहिया रिक्शों की जगह बैटरी से चलने वाले ईको-फ्रेंडली ई-रिक्शा चलेंगे। इनमें अपेक्षाकृत तेज गति से एक साथ दो की जगह चार से अधिक सवारियां एक से दूसरे स्थान पर पहुंच पायेंगे, वहीं कुछ हद तक यात्रियों को महंगी टैक्सियों की जगह सस्ता और प्रदूषण मुक्त यातायात का साधन भी उपलब्ध होगा। लेकिन देश की दूसरी प्राचीनतम नगर पालिका नैनीताल के लिये यह खबर इतनी अच्छी शायद न हो। उसके हाथ से रिक्शों का नियंत्रण, लाइसेंस, नियमों का पालन न करने पर चालान आदि करने का अधिकार चला जायेगा। यह खबर इसलिये भी महत्वपूर्ण है कि यह सरकार के आय बढ़ाने की उलाहनाओं और 74वें संविधान संसोधन के जरिये पालिकाओं को अधिक स्वतंत्र व मजबूत बनाने के संकल्प के विपरीत होगा। साथ ही पूर्व में वन, स्वास्थ्य, शिक्षा, विद्युत व पेयजल आदि विभागों और हालिया दौर में फांसी गधेरा और बारापत्थर की चुंगियों व शरदोत्सव के आयोजन को खोने के बाद पालिका वर्तमान में नगर में चलने वाले 82 पंजीकृत रिक्शों के संचालन का अधिकार भी खो देगी।

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मलेशिया में जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनना सीखेगा नैनीताल


शुक्रवार 5 फ़रवरी को मल्लीताल बोट स्टैंड पर नैनी झील का जलस्तर गिरने से उभरा मलबे का पहाड़ सरीखा डेल्टा।
शुक्रवार 5 फ़रवरी को मल्लीताल बोट स्टैंड पर नैनी झील का जलस्तर गिरने से उभरा मलबे का पहाड़ सरीखा डेल्टा।
मलयेशिया में यहाँ होगी संगोष्ठी
मलयेशिया में यहाँ होगी संगोष्ठी

-दो से चार मार्च तक मलयेशिया के मेलाका प्रांत में होने जा रही है एशिया-प्रशांत क्षेत्र के शहरों को जलवायु अनुकूल बनाने की अंतरमहाद्वीपीय संगोष्ठी में नैनीताल नगर पालिका के अध्यक्ष एवं अधिशासी अधिकारी किये गए हैं आमंत्रित

नवीन जोशी, नैनीताल। नैनीताल नगर मलयेशिया में जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनना सीखेगा। इसके लिये स्थानीय नगर पालिका के अध्यक्ष एवं अधिशासी अधिकारी को दो से चार मार्च तक मलयेशिया के मेलाका प्रांत में आयोजित होने जा रही एशिया-प्रशांत क्षेत्र के शहरों को जलवायु अनुकूल बनाने की ‘रेजीलियेंट सिटीज एशिया-पैसिफिक 2016 कांग्रेस’ विषयक अंतरमहाद्वीपीय कार्यशाला में प्रतिभाग करने के लिये आमंत्रित किया गया है। उल्लेखनीय है कि कार्यशाला में देश के कुछ ही ऐसे चुनिंदा शहरों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया है, जिन्हें आयोजक संस्था आईसीएलईआई ने एशिया-प्रशांत क्षेत्र के ‘रेजीलियेंट’ यानी जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति लचीले शहरों की सूची में शामिल किया है।बताया गया है कि आईसीएलईआई दक्षिण एशिया के स्थानीय निकायों यानी शहरों में स्थायित्व के लिये कार्य करने वाली एक नियंत्रण संस्था है। इसका सूत्र वाक्य है-लोकल गवर्नमेंट फॉर सस्टेनेबिलिटी।

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नैनी झील में मलबा सफाई: बिना काम ख़तम-पैसा हजम


नवीन जोशी, नैनीताल। काम खत्म होने के बाद पैसा हजम हो जाए तो कोई बात नहीं, किंतु नैनीताल जिला प्रशासन नैनी झील का मलबा हटाने के लिए वाहवाही लूटने की कोशिश कर रहा है। वह भी बिना काम खत्म पैसा हजम के फार्मूले पर चलकर। यहां यह बताना जरूरी है कि नैनी झील से मलबा हटाने के लिए प्रशासन ने तीन मदों से 80 लाख रपए तो खर्च कर दिए गए, किंतु झील में आया पूरा मलबा हटाना दूर, स्वयं इकट्ठा किया गया मलबा भी बारिश आने पर झील में वापस जाने के लिए छोड़ दिया गया और ऐसा बहुत सारा मलबा झील में वापस चला भी गया है। वहीं झील में दोबारा मलबा न आए, इस के लिए नालों की सफाई जैसे कार्य पिछले एक वर्ष से लंबित पड़े हैं। नालों की मरम्मत के भी पिछले वर्ष जुलाई माह में आई बारिश के बाद ध्वस्त हुए कार्य आज तक पूरे नहीं हो पाए हैं, जिस कारण हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं, और हालातों में पिछले वर्ष से कोई सुधार नहीं देखने को मिला है।

उल्लेखनीय है कि इस वर्ष 31 मई 2016 को सर्वाधिक रिकॉर्ड -7.1 फीट के स्तर तक नैनी झील का जल स्तर गिरा, जबकि इससे पूर्व मई 2012 में -2.5 फीट तक जल स्तर गिरा था। इधर झील में -12 फीट तक जल स्तर मापने का प्रबंध भी किया जा रहा है।

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अपने मरीजों ही नहीं, दुनिया को बचाने चला है यह डॉक्टर


डा.आशुतोष पन्त
डा.आशुतोष पन्त

15 फरवरी तक अखरोट के तीन हजार पौधे लगायेंगे पेड़ लगाने के जुनूनी डा. पंत
-अपने पिता की प्रेरणा से वर्ष 1988 से लाखों औषधीय एवं फलदार पौधे लगा चुके हैं पेशे से चिकित्सक पर्यावरण प्रेमी
-प्रतिवर्ष न्यूनतम 10 हजार पौधे लगाने का है लक्ष्य
नवीन जोशी, नैनीताल। इस वर्ष शीतकाल में अपेक्षित बर्फ नहीं गिरने से बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग के साथ आसमान में ओजोन परत के छिद्र में लगातार वृद्धि होने, ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन आदि पर चिंता तो सभी करते हैं, लेकिन विरले लोग ही हैं जो इन स्थितियों से स्वयं की चिंता किये बिना पूरी धरती को बचाने का भगीरथ प्रयास कर रहे हैं। पेशे से हल्द्वानी में चिकित्सक डा. आशुतोष पंत जैसा कार्य राज्यों की पूरी सरकारें भी कर लें तो कम है। डा. पंत अपने पिता स्वर्गीय सुशील चंद्र पंत की प्रेरणा से वर्ष 1988 से लगातार अपने स्वयं के संसाधनों से यथासंभव अधिक से अधिक संख्या में औषधीय और फलदार पेड़ लगाते आ रहे हैं, और अब तक लाखों पौधे लगा चुके हैं। उनका लक्ष्य प्रतिवर्ष कम से कम दस हजार पौधे लगाने का लक्ष्य रखा है। खास बात यह भी है कि इसके लिये अब तक उन्होंने किसी भी संस्था या व्यक्ति से किसी प्रकार का कोई आर्थिक सहयोग नहीं लिया है, तथा आगे भी ऐसी कोई अपेक्षा नहीं रखते हैं। इधर उन्होंने आगामी जनवरी से 15 फरवरी 24 के बीच प्रदेश के नैनीताल, चम्पावत और टिहरी जिलों के पर्वतीय क्षेत्रों में अखरोट की अच्छी प्रजातियों के तीन हजार पौधे लगाने का ऐलान किया है। बताया कि अखरोट के पेड़ों की आयु बहुत लंबी होती है, तथा इनके रोपण से पर्यावरण को लाभ के साथा ही ग्रामीणों की अच्छी आय भी होगी। कोई भी इच्छुक व्यक्ति अपनी भूमि पर लगाने के लिए उनसे नि: शुल्क पौधे प्राप्त कर सकता है।

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अब बनाइये ऐसे बंबू हट, जिन पर गोली, आग व भूकंप का भी असर न होगा


Bamboo Huts at Maheshkhan
महेशखान में वन विभाग के बम्बू हट
Interior of Bamboo Huts at Maheshkhan
महेशखान में वन विभाग के बम्बू हट का इंटीरियर

-नैनीताल स्थित चिड़ियाघर में ऐसा ही एक बंबू हट, जो है पूरी तरह ईको फ्रेंडली तथा बारिश, सर्दी-गर्मी व बारिश के प्रभावों से भी सुरक्षित
नवीन जोशी, नैनीताल। पहाड़ों पर सीमेंट, सरिया की जगह हल्की संरचना के, पारिस्थितिकी के अनुकूल यानी ईको-फ्रेंडली घर बनाने की जरूरत तो बहुत जतायी जाती है, और इसके लिये बंबू हट यानी बांश के बनों घरों का विकल्प सुझाया भी जाता है, लेकिन बंबू हट एक सुरक्षित घरों की जरूरतों को पूरा नहीं करते। उनमें जल्द बारिश-नमी की वजह से फफूंद लग जाती है। बांश की लकड़ी को दीपक भी कुछ वर्षों के भीतर चट कर जाती है, और बांश की खपच्चियों के बीच से सर्द हवायें भीतर आकर बाहर जैसी ही ठंड कर देती हैं। वहीं ऐसे घरों में आग लगने, हल्के धक्कों में भी इसकी दीवारों को तोड़कर किसी के भी भीतर घुस जाने जैसे अन्य तमाम खतरे भी बने रहते हैं। लेकिन अब आप चाहें तो बांश से ही पूरी तरह ईको फ्रेंडली के साथ ही पूरी तरह सुरक्षित बंबू हट बनाने की अपनी ख्वाहिश आम घरों से कम कीमत में पूरी कर सकते हैं। ऐसा ही एक बंबू हट मुख्यालय स्थित नैनीताल जू में रिसेप्सन, टिकट काउंटर व सोविनियर शॉप के लिये इन दिनों निर्मित किया जा रहा है।

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प्रयोगशाला में दुनिया की इकलौती बची प्रजाति-पटवा के क्लोन तैयार


Rashtriya Sahara 15.12.15-सरोवरनगरी के निकट इसी प्रजाति के नाम पर स्थित है पटवाडांगर नाम का कस्बा
नवीन जोशी, नैनीताल। कुमाऊं विवि के जैव प्रोद्योगिकी संस्थान भीमताल स्थित प्लांट एंड मॉलीक्यूलर बायलॉजी प्रयोगशाला ने एक अनूठा कारनामा कर डाला है। प्रयोगशाला में दुनिया की एक ऐसी प्रजाति का प्रयोगशाला में क्लोन तैयार करने में सफलता प्राप्त की है, जो पूरी तरह से विलुप्त होने की कगार पर है, और जिसके दुनिया में 100 से भी कम आखिरी पौधे ही बचे हैं, और इसके प्राकृतिक तौर पर नए पौधे उगने की प्रक्रिया भी समाप्त हो चुकी है। जैव पारिस्थितिकी के लिहाज से यह वैश्विक स्तर पर बड़ी सफलता आंकी गई है, और अमेरिका की शोध पत्रिका-अमेरिकन जर्नल ऑफ प्लांट साइंस व एशियन जर्नल ऑफ माईक्रोबायोलॉजी एंड इन्वायरमैंटल साइंस एवं इण्डियन जर्नल ऑफ साइंटिफिक रिसर्च में भी इस बाबत शोध पत्र प्रकाशित किये गये हैं।

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पर्यटन, हर्बल के बाद अब जैविक प्रदेश बनेगा उत्तराखंड


विभिन्न प्रकार के बीज
विभिन्न प्रकार के बीज

-प्रदेश के जैविक उत्पादों का बनेगा अपना राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय ब्रांड
-उत्तराखंड कृषि उत्पादन विपणन बोर्ड के प्रस्ताव को मुख्य मंत्री ने दी हरी झंडी
-राज्य में ही पहली बार लगने जा रही कलर सॉर्टिंग मशीनों से स्थानीय ख्याति प्राप्त उत्पाद राजमा, चौलाई, गहत, भट्ट आदि के जियोग्रेफिकल इंडेक्स बनेंगे
-इस हेतु रुद्रपुर में मंडी परिषद के द्वारा एक वर्ष के भीतर बनाया जाएगा 1500 टन क्षमता का कोल्ड स्टोर और तीन हजार टन क्षमता का गोदाम

नवीन जोशी, नैनीताल। देश में दालों की बढ़ती कीमतों के बीच यह खबर काफी सुकून देने वाली हो सकती है। अभी भी अपेक्षाकृत सस्ती मिल रहीं उत्तराखण्ड की जैविक दालें (मौंठ 50, भट्ट 70 तथा गहत और राजमा 120 रुपये प्रति किग्रा.) देश की महँगी दालों का विकल्प हो सकती हैं। पर्यटन और जड़ी-बूटी प्रदेश के रूप में प्रचारित उत्तराखंड एक नए स्वरूप में स्वयं को ढालने की राह पर चलने जा रहा है। यह राह है हर्बल प्रदेश बनने की, जिस पर अब तक पर्यटन और जड़ी-बूटी प्रदेश के रूप में प्रचारित किये जा रहे उत्तराखण्ड ने कदम बढ़ा दिए हैं। प्रदेश सरकार ने उत्तराखंड कृषि उत्पादन विपणन बोर्ड, मंडी परिषद, उत्तराखंड जैविक उत्पाद परिषद एवं कृषि एवं उद्यान आदि विभागों के संयुक्त तत्वावधान में प्रदेश को जैविक प्रदेश यानी जैविक उत्पादों का प्रदेश बनाने की कवायद शुरू कर दी है। इस कड़ी में राज्य के सभी पर्वतीय जिलों के 10 ब्लॉकों को जैविक ब्लॉक घोषित कर दिया गया है। रुद्रप्रयाग जिला जैविक जिले के रूप में विकसित किया जा रहा है, और आगे चमोली व पिथौरागढ़ को भी जैविक जनपद बनाने की तथा अगले चरण में सभी पर्वतीय जिलों को जैविक जिलों के रूप में विकसित किए जाने की योजना है। साथ ही प्रदेश के जैविक उत्पादों के लिए प्रदेश में ही बड़ी प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित किए जाने को मुख्यमंत्री के स्तर से हरी झंडी मिल गई है। प्रस्तावित जैविक प्रदेश में जैविक खाद्यान्नों के साथ जैविक दालों के उत्पादन को भी बढ़ावा मिलेगा, ऐसी उम्मीद की जा सकती है।

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पहाड़ पर कहीं से आ-जा नहीं रहे, यहीं के स्थायी निवासी हैं बाघ, संख्या हुई 400 पार


-कैमरे लगाने से हुई पुष्टि, कुमाऊं में बेहद समृद्ध है वन्य जीवन, व्यापक स्तर पर इनकी गणना किये जाने की जरूरत -कैमरा ट्रैप में तराई डिवीजन में भी मिले 30 से अधिक नये बाघ, इससे उत्साहित वनाधिकारी पहाड़ पर बाघों की संख्या की गणना किये जाने की जता रहे हैं जरूरत, स्थायी होने की वजह से डरने की जरूरत नहीं नवीन जोशी, नैनीताल। अब तक माना जाता रहा है कि देश के राष्ट्रीय पशु बाघ (रॉयल बंगाल टाइगर) पहाड़ पर नहीं होते, यह तराई के मूल निवासी हैं, और वहां से यहां चढ़ आते हैं। वन्य जीवों तथा प्रकृति-पर्यावरण प्रेमियों … पढ़ना जारी रखें पहाड़ पर कहीं से आ-जा नहीं रहे, यहीं के स्थायी निवासी हैं बाघ, संख्या हुई 400 पार

महेश खान: यानी प्रकृति और जैव विविधता की खान


maheshkhan Dak Banglowपहली नजर में दो हिंदू-मुस्लिम नामों का सम्मिश्रण लगने वाले महेश खान के नाम में ‘खान’ कोई जाति या धर्म सूचक शब्द नहीं है, लेकिन ‘खान’ शब्द को दूसरे अर्थों में प्रयोग करें तो यह स्थान प्रकृति के लिए भी प्रयोग किए जाने वाले महेश यानी शिव की धरती कहे जाने वाले कुमाऊं में वानस्पतिक एवं वन्य जीव-जंतुओं व पक्षियों की जैव विविधता की ‘खान’ ही है। वैसे शाब्दिक अर्थ की बात करें तो महेश खान के नाम में प्रयुक्त ‘खान’ शब्द का प्रयोग कुमाऊं में खासकर अंग्रेजी दौर के घोड़ा व पैदल मार्गों के पड़ावों के लिए होता है। नैनीताल के निकट बल्दियाखान, बेलुवाखान व अल्मोड़ा-झूलाघाट पैदल मार्ग पर पड़ने वाले चर्चाली खान और न्योली खान की तरह ही महेश खान काठगोदाम से मुक्तेश्वर होते हुए अल्मोड़ा जाने वाले पैदल मार्ग का एक पड़ाव रहा है।

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भगवान राम की नगरी के समीप माता सीता का वन ‘सीतावनी’


Pictures of Sitabani Imagesदेवभूमि कुमाऊं-उत्तराखंड में रामायण में सतयुग, द्वापर से लेकर त्रेता युग से जुड़े अनेकों स्थान मिलते हैं। इन्हीं में से एक है त्रेता युग में भगवान राम की धर्मपत्नी माता सीता के निर्वासन काल का आश्रय स्थल रहा वन क्षेत्र-सीतावनी, जो अपनी शांति, प्रकृति एवं पर्यावरण के साथ मनुष्य को गहरी आध्यात्मिकता के साथ मानो उसी त्रेता युग में लिए चलता है। नैनीताल जनपद में भगवान राम के नाम के नगर-रामनगर से करीब 20 किमी दूर घने वन क्षेत्र में जिम कार्बेट नेशनल पार्क के निकट मौजूद सीतावनी माता सीता, लव-कुश व महर्षि बाल्मीकि के मंदिरों, सीता व लव-कुश के प्राकृतिक जल-धारों के साथ ही सैकड़ों प्रजातियों के पक्षियों को देखने के लिए प्रसिद्ध है। इसलिए यहां जंगल सफारी के साथ ही पौराणिक महत्व के स्थल की आनंद दायक सैर को दोहरा आनंद लिया जा सकता है।
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पक्षी-तितली प्रेमियों का सर्वश्रेष्ठ गंतव्य है पवलगढ़ रिजर्व


Bird (4)उत्तराखंड का नैनीताल जनपद में रामनगर वन प्रभाग स्थित पवलगढ़ रिजर्व पक्षी प्रेमियों के लिए बेहतरीन गंतव्य है। दिल्ली से सड़क और रेल मार्ग से करीब 260 किमी तथा नजदीकी हवाई अड्डे पंतनगर से करीब 87 किमी दूर रामनगर के जिम कार्बेट नेशनल पार्क से कोसी नदी के दूसरी-पूर्वी छोर से सटा 5824 हैक्टेयर में फैला प्राकृतिक सौंदर्य और जैव विविधिता से लबरेज पवलगढ रिजर्व, पक्षियों को देखने यानी बर्ड वाचिंग के शौकीनों के लिए सर्वाधिक उपयुक्त स्थान है। यहां अब तक करीब 365 प्रजातियों के पक्षी देखे और पहचाने जा चुके हैं। साथ ही यहां मिलती करीब 83 तरह की तितलियां और 100 प्रकार के मॉथ यानी तितलियों की ही दूसरी प्रजातियां भी मिलती हैं।

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गौरा-महेश को बेटी-जवांई के रूप में विवाह-बंधन में बांधने का पर्व: सातूं-आठूं (गंवरा या गमरा)


Gamara1

गौरा से यहां की पर्वत पुत्रियों ने बेटी का रिश्ता बना लिया हैं, तो देवों के देव जगत्पिता महादेव का उनसे विवाह कराकर वह उनसे जवांई यानी दामाद का रिश्ता बना लेती हैं। यहां बकायदा वर्षाकालीन भाद्रपद मास में अमुक्ताभरण सप्तमी को सातूं, और दूर्बाष्टमी को आठूं का लोकपर्व मना कर (गंवरा या गमरा) गौरा-पार्वती और महेश (भगवान शिव) के विवाह की रस्में निभाई जाती हैं, और बेटी व दामाद के रूप में उनकी पूजा-अर्चना भी की जाती है। इस मौके पर बिरुड़े कहे जाने वाले भीगे चने व अन्य दालों के प्रसाद के साथ बिरुड़ाष्टमी भी मनाई जाती है।

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जितने सवाल-उतने जवाब थे अपने फक्कड़दा-गिर्दा


Late Girish Tiwari 'Girda' , Photo By: Navin Joshi
Late Girish Tiwari ‘Girda’ , Photo By: Navin Joshi

‘बबा, मानस को खोलो, गहराई में जाओ, चीजों को पकड़ो.. यह मेरी व्यक्तिगत सोच है, मेरी बात सुनी जाए लेकिन मानी न जाए….’ प्रदेश के जनकवि, संस्कृतिकर्मी, आंदोलनकारी, कवि, लेखक गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ (जन्म 9 सितंबर, 1945 को अल्मोड़ा के ज्योली हवालबाग गांव में हंसादत्त तिवाडी और जीवंती तिवाडी के घर-मृत्यु 22 अगस्त 2010 को हल्द्वानी में ) जब यह शब्द कहते थे, तो पीछे से लोग यह चुटकी भी लेते थे कि ‘तो बात कही ही क्यों जाए’ लेकिन यही बात जब वर्ष 2009 की होली में ‘स्वांग’ परंपरा के तहत युगमंच संस्था के कलाकारों ने उनका ‘स्वांग’ करते हुए कही तो गिर्दा का कहना था कि यह उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है। और शायद इसी सबसे बड़े पुरस्कार के वह इंतजार में थे, और इसे लेने के बाद वह दुनिया के रंगमंच से विदा ही हो लिए।

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नैनीताल को कमजोर नगर बताना सच्चाई है या कोई साजिश !


Nainital Zone Map
नैनीताल का संवेदनशीलता को प्रदर्शित करता मानचित्र, जिसमें केवल पीला भाग ही भूस्खलनों से कम प्रभावित और शेष खतरनाक बताया गया है।

हाईकोर्ट की रोक हटने के बाद नैनीताल में फिर ध्वस्तीकरण संकट: कदम-दर-कदम प्रशासनिक अक्षमताएं, और खामियाजा जनता को
फिर वही सवाल – क्या नैनीताल को बचाया नहीं जा सकता ? क्या ध्वस्तीकरण ही है आखिरी विकल्प ?

-2011 में पूरी हो चुकी है 1995 में बनी ‘नैनीताल महायोजना’, प्रशासन चार वर्षों से महायोजना नहीं बना पाया
-नालों की मरम्मत के लिए चार वर्ष पुराने करीब 21 करोड़ के दो प्रस्तावों पर शासन ने नहीं दिया एक ढेला भी, अब सारी गलती जनता पर डालने की तैयारी
-प्रशासन के पास कमजोर घरों का कोई सर्वेक्षण भी नहीं है
नवीन जोशी, नैनीताल। नैनीताल जिला प्रशासन नगर को ‘बचाने’ के नाम पर नगर के कमजोर, असुरक्षित घरों को ध्वस्त करने का मंसूबा बना रहा है। उत्तराखंड उच्च न्यायालय के कथित आदेशों का हवाला देकर नगर के जोन-एक व जोन-दो तथा सूखाताल के डूब क्षेत्र के घरों को ध्वस्त करने की योजना बताई जा रही है। इसके लिए प्रशासन भूमिका बनाने के लिए नगर के चुनिंदा लोगों की बैठक बुला चुका है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या नैनीताल को बचाने को अन्य विकल्प आजमाए जा चुके हैं, और क्या ध्वस्तीकरण ही आखिरी विकल्प बचा है।

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