कला की नगरी नैनीताल में नाटक परंपरा का इतिहास


 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

नाटक प्रतियोगिता 20 के विजेता रहे नाटक 'उरुभंगम' के एक भावपूर्ण दृश्य में कलाकार
नाटक प्रतियोगिता 2017 के विजेता रहे नाटक ‘उरुभंगम’ के एक भावपूर्ण दृश्य में कलाकार

सरोवरनगरी को कला की नगरी भी कहा जाता है। एक अभिनेता होते हुए सात समुंदर पार कांस फिल्म महोत्सव में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार जीतने वाले स्वर्गीय निर्मल पांडे तथा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व निदेशक बीएम शाह तथा गीत एवं नाटक प्रभाग के निदेशक मटियानी की धरती सरोवर नगरी नैनीताल में नाटक परम्परा का इतिहास 1895 में ग्रीष्मकालीन राजधानी व बंगाल आर्मी का मुख्यालय बनने के साथ ही बताया जाता है। कहा जाता है कि 1920 तक नगर में 1882 में (वर्तमान कैपिटॉल सिनेमा की जगह पर) बने नाचघर में लानटेनों की रोशनी में नाटक खेले जाते थे, जिसे तक अनेकों कमियों की वजह से दुनिया का सबसे खराब स्टेज भी कहा गया था। सचिवालय में तैनात बंगाली मूल के अधिकारियों-कर्मचारियों ने 1894 में ‘बंगाली एमेच्योर ड्रामेटिक क्लब’ की नींव रखी थी, जिसके तहत वे बंगाली नाटक करते थे।

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विश्व व भारत में रेडियो-टेलीविज़न का इतिहास


रेडियो के इतिहास पर निगाह डालें तो 1896 में इलेक्ट्रिकल इंजिनियर गुगलियेल्मो मार्कोनी ने पहली बार विद्युत चुंबकीय तरंगो द्वारा दो मील की दूरी तक एक सन्देश भेजने में सफलता प्राप्त की थी, लिहाजा रेडियो के विकास में उनका नाम शुरुवात में लिया जाता है। उन्हें 2 जून 1896 को उन्हें वायरलेस का पेटेंट मिला। आगे उन्होंने ही 1919 में चेम्बर्सफोर्ड में पहला रेडियो प्रसारण का ट्रांसमीटर भी स्थापित किया था। मनुष्य में अपनी आवाज को दूर तक पहुँचाने की चाह न जाने कब से रही है, और न जाने कब से लोग, बच्चे माचिस की डिब्बियों से धागा बांधकर आवाज … पढ़ना जारी रखें विश्व व भारत में रेडियो-टेलीविज़न का इतिहास

देवभूमि के कण-कण में ‘देवत्व’: विश्व हिंदी सम्मेलन के संयोजक व अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार डा. अशोक ओझा के हाथों हुआ विमोचन


Coverनैनीताल। अमेका में हिंदी के जरिये रोजगार के अवसर विषयक कार्यक्रम के दौरान विश्व हिंदी सम्मेलन के संयोजक, अमेरिकी सरकार समर्थित स्टारटॉक हिंदी कार्यक्रम के निदेशक व अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार डा. अशोक ओझा, उत्तराखंड मुक्त विवि के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के निदेशक डा. गोविंद सिंह, कुमाऊं विवि के कुलपति प्रो. एचएस धामी, कला संकायाध्यक्ष प्रो. भगवान सिंह बिष्ट व परिसर निदेशक प्रो. एसपीएस मेहता तथा पत्रकारिता एवं जन संचार विभाग के अध्यक्ष डा. गिरीश रंजन तिवारी आदि के हाथों पत्रकार नवीन जोशी की पुस्तक देवभूमि के कण-कण में देवत्व का विमोचन किया गया। लेखक नवीन जोशी ने बताया कि पुस्तक कुमाऊं -उत्तराखंड की भावी पीढि़यों और यहां आने वाले वाले सैलानियों को इस उम्मीद के साथ समर्पित है कि उन्हें इस पुस्तक के माध्यम से इस अंचल को समग्रता में समझने में मदद मिलेगी। पुस्तक तीन खंडों- देवभूमि उत्तराखंड व कुमाऊं के इतिहास, यहां के धार्मिक, आध्यात्मिक व पर्यटन महत्व के स्थलों तथा यहां के तीज-त्योहारों, लोक संस्कृति, लोक परंपराओं और विशिष्टताओं का वर्णन करती है। यह देवभूमि के खास तौर पर ‘देवत्व’ को एक अलग अंदाज में देखने का प्रयास है। उनका मानना है कि देवभूमि का देवत्व केवल देवताओं की धरती होने से नहीं, वरन इस बात से है कि यह भूमि पूरे देश को स्वच्छ हवा, पानी, जवानी व उर्वरा भूमि के साथ प्राकृतिक व आध्यात्मिक शांति के साथ और भी बहुत कुछ देती है, और वास्तव में देवता शब्द देता या दाता शब्दों का विस्तार है। पढ़ना जारी रखें “देवभूमि के कण-कण में ‘देवत्व’: विश्व हिंदी सम्मेलन के संयोजक व अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार डा. अशोक ओझा के हाथों हुआ विमोचन”

‘द ग्रेट खली’ के बनने में नैनीताल की नयना देवी का भी रहा है आशीर्वाद


Khali Nainital
नैनीताल की माल रोड पर जुलूस के साथ खली और स्वर्गीय निर्मल पांडे

-नैनीताल से रहा है खली का दो दशक पुराना नाता, शायद इसीलिये यहां से ‘द ग्रेट खली रिटर्न रेस्लिंग मेनिया’ के जरिये कर रहे हैं रिंग पर वापसी
-यहां 1998 में पहले कुमाऊं महोत्सव में सिने अभिनेता निर्मल पांडे के साथ पहुंचे थे
नवीन जोशी, नैनीताल। 24 फरवरी 2016 को नैनीताल जनपद के हल्द्वानी के गौलापार स्थित इंदिरा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय स्टेडियम से रिंग पर लौट कर रिंग पर करीब एक दशक बाद वापसी करने वाले दुनिया के ‘द ग्रेट खली’ का नैनीताल से रिश्ता करीब दो दशक पुराना रहा है। वह यहां ‘द ग्रेट खली’ नहीं ‘खली’ या ‘महाबली’ भी नहीं वरन अपने मूल नाम ‘दलीप सिंह राणा’ के रूप में पहुंचे थे। यहां उन्होंने नगर की आराध्य देवी नयना देवी के दरबार में शीश नवाया था और यहां से लौटने के तत्काल बाद ही मुंबई में आयोजित हो रही ‘मिस्टर इंडिया’ प्रतियोगिता के लिये आशीर्वाद लिया था। वह यह प्रतियोगिता जीत कर ‘मिस्टर इंडिया’ बने, और इसी के बाद वह ‘जॉइंट सिंह’ और ‘खली’ बनते हुये आखिर ‘द ग्रेट खली’ बनकर यहां लौटे हैं, और शायद इसीलिये उन्होंने यहीं से ‘कॉन्टिनेंटल रेसलिंग एंटरटेनमेंट’  यानि सीडब्ल्यूई के जरिये अपने करियर की दूसरी पारी की शुरूआत की।

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नैनीताल नगरपालिका के हाथ से रिक्शे भी ‘जायेंगे’, तभी ई-रिक्शा आयेंगे


02NTL-1-पूर्व में शरदोत्सव का आयोजन, फांसी गधेरा और बारापत्थर की चुंगी भी जा चुकी है हाथ से, होगा आर्थिक नुकसान
नवीन जोशी, नैनीताल। नगरवासियों, यहां आने वाले सैलानियों के लिये यह खबर अच्छी है कि नगर में मौजूदा तीन पहिया रिक्शों की जगह बैटरी से चलने वाले ईको-फ्रेंडली ई-रिक्शा चलेंगे। इनमें अपेक्षाकृत तेज गति से एक साथ दो की जगह चार से अधिक सवारियां एक से दूसरे स्थान पर पहुंच पायेंगे, वहीं कुछ हद तक यात्रियों को महंगी टैक्सियों की जगह सस्ता और प्रदूषण मुक्त यातायात का साधन भी उपलब्ध होगा। लेकिन देश की दूसरी प्राचीनतम नगर पालिका नैनीताल के लिये यह खबर इतनी अच्छी शायद न हो। उसके हाथ से रिक्शों का नियंत्रण, लाइसेंस, नियमों का पालन न करने पर चालान आदि करने का अधिकार चला जायेगा। यह खबर इसलिये भी महत्वपूर्ण है कि यह सरकार के आय बढ़ाने की उलाहनाओं और 74वें संविधान संसोधन के जरिये पालिकाओं को अधिक स्वतंत्र व मजबूत बनाने के संकल्प के विपरीत होगा। साथ ही पूर्व में वन, स्वास्थ्य, शिक्षा, विद्युत व पेयजल आदि विभागों और हालिया दौर में फांसी गधेरा और बारापत्थर की चुंगियों व शरदोत्सव के आयोजन को खोने के बाद पालिका वर्तमान में नगर में चलने वाले 82 पंजीकृत रिक्शों के संचालन का अधिकार भी खो देगी।

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‘जिन्ना’ के प्यारे ‘राजा अमीर’ अब न ‘राजा’ रहे न ‘अमीर’


Rashtriya Sahara 13 January 2016 Page-1
राष्ट्रीय सहारा, 13 जनवरी 2016, पेज-1
  • करीब 50 हजार करोड़ की सपंत्ति के मालिक थे राजा अमीर मोहम्मद खान
  • 14 मार्च 2017  को संसद में ध्वनिमत से पारित हुआ 49 वर्ष पुराने शत्रु संपत्ति कानून में संशोधन संबंधी विधेयक
  • नैनीताल में करोड़ों का होटल, यूपी व उत्तराखंड में हैं खरबों रुपये की संपत्तियां

नवीन जोशी, नैनीताल। करीब 50 हजार करोड़ यानी करीब पांच खरब रुपये की शत्रु संपत्ति के मालिक ‘राजा महमूदाबाद’ यानी राजा अमीर मोहम्मद खान एक पल में ‘‘रंक’ जैसी स्थिति में पहुंच गये हैं। ऐसा संसद में पास हुए विधेयक के बाद हुआ है। केंद्र सरकार की ओर से 49 साल पुराने 1968 में बने सरकारी स्थान (अप्राधित अधिभोगियों की बेदखली) अधिनियम 1971 कानून में संशोधन संबंधी विधेयक को मंगलवार को ध्वनिमत से पारित किया गया। इस संशोधन विधेयक के लागू हो जाने से बंटवारे के समय पाकिस्तान चले गए अथवा 1965 और 1971 के युद्ध के बाद पाकिस्तान की नागरिकता ले चुके लोग भारत में अपनी संपत्तियों (जिन्हें शत्रु संपत्ति) कहा जाता है, का हस्तांतरण नहीं कर सकेंगे।नए विधेयक से राजा महमूदाबाद को सर्वाधिक मुश्किलें होनी तय हैं, जिनकी नैनीताल में करोड़ों के 1870 में निर्मित बताये जाने वाले मेट्रोपोल होटल व अन्य भूसंपत्ति सहित करीब 50 हजार करोड़ रुपये की सहित उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में 10 सितम्बर 1965 में शत्रु संपत्ति घोषित देश की कुल 1519 में से करीब 936 संपत्तियां हैं। ताजा विधेयक के अनुसार उनकी संपत्तियां संबंधित जिले के डीएम के अधिकार में चली जाएंगी। विधेयक की एक धारा के अनुसार इन शत्रु संपत्तियों पर काबिज लोगों को मालिकाना हक मिलने की बात भी कही जा रही है। इसलिए काबिज लोगों के लिए राहत भरी खबर हो सकती है। अलबत्ता केंद्र सरकार के इस विधेयक के बावजूद यह मामला आगे भी विवादों में रह सकता है, क्योंकि आगे राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षर होने और विधेयक के कानून बनने के बावजूद संबंधित पक्षों को सर्वोच्च न्यायालय जाने का समय दिया जा रहा है, तथा सर्वोच्च न्यायालय में पहले से भी कई वाद लंबित हैं।

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‘काले-मैकालों’ का नया साल सबको मुबारक हो यारो !


KC Pantभारत में अंग्रेजी शिक्षा के प्रवर्तक ‘लॉर्ड मैकाले’ ने कभी अपने पिता को पत्र लिखा था-‘आप आस्वस्त रहें, हमें भारत को छोड़ना भी पड़े तो हम यहां ऐसे काले अंग्रेजों को छोड़ जाएंगे, जो अपनी सभ्यता, संस्कृति, स्वाभिमान और शर्म तक भले छोड़ दें पर अंग्रेजियत नहीं छोड़ेंगे… इसकी जड़ें बहुत गहरी हो चुकी हैं।” जब अंग्रेज भारत छोड़कर गए तो मैकाले को पता नहीं था कि जो काले अंग्रेज, भारत में रहेंगे वे धर्म व संस्कृति के ठेकेदार बन देश को लूटने में बढ़-चढ़ कर भाग भी लेंगे। शायद भारत की ऐसी हालत देख लॉर्ड विलियम वेंटिंग के जमाने में पकड़े गए ठग पिण्डारियों की रूह भी कॉंप रही होगी। इस आंग्ल नव वर्ष पर महाकवि तुलसी की एक चौपाई “बिछुड़त एक प्राण हर लेहीं, मिलत एक दारुण दु:ख देहीं”  के साथ यादों के इन्हीं गलियारों से निकली है केसी पंत ‘किसन” सेवानिवृत्त अध्यापक, हरी निवास, सूखाताल, नैनीताल की यह कविता- पढ़ना जारी रखें “‘काले-मैकालों’ का नया साल सबको मुबारक हो यारो !”

अरब सागर पर अपना दावा ठोक सकेगा भारत!


-अमेरिका की अगुआई में चल रहा है अध्ययन, अरब सागर और भारतीय प्रायद्वीप की चट्टानों में समानता मिलने की है संभावना -परियोजना में भारत के आठ वैज्ञानिक शामिल, जिनमें कुमाऊं विवि के भूविज्ञानी एवं वाडिया संस्थान के शोध छात्र भी -सामरिक दृष्टिकोण से भारत के लिए हो सकता है अत्यधिक महत्वपूर्ण नवीन जोशी, नैनीताल। अमेरिका की एक परियोजना के तहत हो रहे भू-वैज्ञानिक महत्व के शोध भारत के लिए सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इस परियोजना के तहत प्रारंभिक आकलनों के अनुसार अरब सागर भारतीय प्रायद्वीप की चट्टानों से ही बना हो सकता है। यदि यह आकलन … पढ़ना जारी रखें अरब सागर पर अपना दावा ठोक सकेगा भारत!

नेपाल में चल रही ‘बृहत्तर नेपाल’ के नाम पर भारत के खिलाफ मुहिम


दलिए भागबन्डामा रमाउनु आफन्त आफन्तलाई दुस्मन देख्नु नेपाली नागरिकको कमजोरी हो ! यो अबस्थाको सिर्जना गर्ने नेताहरुनै हुन् ! येस्बाट फाइदा लिने भारतनै हो! सन् १९४७ मा ब्रिटिशले सुगौली सन्धिबाट हडपेको नेपालीको भुमि छोडेकै हो! तत्कालिन नेपाली सासक्ले गुमेको भुमि फिर्ता नलिए पनि त्यो भुमि नेपालकै हो! नेपाली जनता तेती कम्जोर छैनन् ! नेपालीकै छोराहरु भारतीय गोर्खा रैफलमा छन् जसले भारतको सुरक्ष्या गरिरहेका छन्! भारतीय सेनाबाट गोर्खाली सेना नेपाल फिर्ता बोलाउने होभने भारतको अस्तित्तो धरापमा पर्छ ! नेपालीमा एकता छिट्टै पैदा होस् !
फेसबुक पर ‘ग्रेटर नेपाल’ पेज से

-1816 की सुगौली की संधि को नकारते हुए भारत के उत्तराखंड, हिमाचल, बिहार व पश्चिम बंगाल तथा बांग्ला देश के कुछ हिस्सों को बताया जा रहा ग्रेटर नेपाल का हिस्सा
-नेपाली संविधान सभा से इसे देश के संविधान में जोड़ने का भी किया जा रहा आह्वान
नवीन जोशी, नैनीताल। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हजारों करोड़ रुपए की मदद के साथ नेपाल को साधने की मुहिम को पलीता लगाने की तैयारी हो रही है। हमेशा से पड़ोसी मित्र राष्ट्र कहे जाने वाले नेपाल में ‘बृहत्तर नेपाल राष्ट्रवादी मोर्चा’ सरीखे कुछ संगठनों के द्वारा भारत विरोधी छद्म युद्ध की जमीन तैयार की जा रही है। यह संगठन 2 दिसंबर 1815 को हस्ताक्षरित और 4 मार्च 1816 को पुष्टि होने वाली अंग्रेजों व गोर्खाओं के बीच हुई सुगौली की संधि से इतर भारत के हिमांचल, उत्तराखंड, बिहार व पश्चिम बंगाल तक गंगा नदी के उत्तर के क्षेत्रों और बांग्ला देश के भी एक हिस्से को जोड़कर ‘बृहत्तर नेपाल’ बनाने का दिवा स्वप्न पाल रहे हैं। नेपाल का संविधान बनाने में जुटी नेपाली संविधान सभा पर भी इस हेतु दबाव बनाया जा रहा है।

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चार हजार वर्ष पुराना हड़प्पा कालीन है उत्तराखंड राज्य का इतिहास


नवीन जोशी, नैनीताल । उत्तराखंड राज्य के प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो.राम सिंह के अनुसार उत्तराखंड का इतिहास चार हजार वर्ष पुराना है। उन्होंने बताया कि ईसा से डेढ़ से दो हजार वर्ष पूर्व की हड़प्पा कालीन संस्कृति के भग्नावशेष प्रदेश के पिथौरागढ़ जिले के बनकोट व नैनी पातल क्षेत्रों में मिली ताम्र मानवाकृतियों के रूप में प्राप्त हुए हैं। प्रो. सिंह के अनुसार हड़प्पा काल में यहां के लोग कबीलों में रहते थे। क्षेत्र में सर्वप्रथम राज सत्ता के प्रमाण ईसा पूर्व पांचवी से दूसरी शताब्दी के सिक्कों से पता चलते हैं। इनसे पुष्ट होता है कि यहां सबसे पहले कुणिंद वंश के राजाओं ने शासन किया। पढ़ना जारी रखें “चार हजार वर्ष पुराना हड़प्पा कालीन है उत्तराखंड राज्य का इतिहास”

1.2 करोड़ वर्ष पुराना इतिहास संजोए, उच्च हिमालयी मिनी कश्मीर-सोर घाटी पिथौरागढ़


Pithoragarhउच्च हिमालयी हिमाच्छादित पंचाचूली पर्वत श्रृंखलाओं तथा कल-कल बहती सदानीरा काली-गोरी व रामगंगा जैसी नदियों के बीच प्राकृतिक जैव विविधता से परिपूर्ण उत्तराखंड के सीमान्त जनपद मुख्यालय पिथौरागढ़ की पहचान ‘सोर’ यानी सरोवरों की घाटी तथा ‘मिनी कश्मीर’ के रूप में भी है। भारतीय प्रायद्वीप एवं एशिया महाद्वीपीय भू-पट्टियों के बीच करीब 1.2 करोड़ वर्ष पूर्व हुए मिलन या टक्कर की गवाही स्वरूप आज भी तत्कालीन टेथिस सागर को अपने  नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व स्थित लेप्थल, लिलंग व गर्ब्यांग नाम के पर्वतीय गावों में “शालिग्राम” कहे जाने वाले और आश्चर्यजनक तौर पर मिलने वाले समुद्री जीवाश्मों को संभाले पिथौरागढ़ की ऐतिहासिक और विरासत महत्व की पहचान भी रही है। पांडु पुत्र नकुल के नाम पर मुख्यालय के चार किमी करीब मौजूद खजुराहो स्थापत्य शैली में बना नकुलेश्वर मंदिर महाभारत काल से इस स्थान के जुड़ाव की पुष्टि करता है। महान राजपूत शासक पृथ्वी राज चौहान से भी इसके नाम को जोड़ा जाता है। उत्तराखंड राज्य के राज्य पशु कस्तूरा के एकमात्र मृग विहार और अस्कोट वन्य जीव अभयारण्य भी यहां दर्शनीय हैं। पिथौरागढ़ ऐरो स्पोर्टस यानी पैराग्लाइडिंग जैसे हवा के तथा सरयू व रामगंगा नदियों में रिवर राफ्टिंग व मुन्स्यारी के कालामुनी व खलिया टॉप में स्कीइंग व हैंग ग्लाइडिंग जैसे साहसिक खेलों के लिए भी सर्वश्रेष्ठ गंतव्य है। पढ़ना जारी रखें “1.2 करोड़ वर्ष पुराना इतिहास संजोए, उच्च हिमालयी मिनी कश्मीर-सोर घाटी पिथौरागढ़”

चंपावत से मिला ‘कुमाऊं’ को अपना नाम और यह ही ‘कुमाऊं’ की मूल पहचान


Baleshwar Templeयूं चंपावत वर्तमान में कुमाऊं मंडल का एक जनपद और जनपद मुख्यालय है, लेकिन यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि कुमाऊं का मूल ‘काली कुमाऊं’ यानी चंपावत ही है। यही नहीं यहीं काली नदी के जलागम क्षेत्र में ‘कर्नतेश्वर पर्वत’ को भगवान विष्णु ने ‘कूर्म’ अवतार का जन्म स्थान माना जाता है, और इसी कारण ही ‘कुमाऊं’ को अपने दोनों नाम ‘कुमाऊं’ और ‘कूर्मांचल’ मिले हैं। लगभग 10वीं शताब्दी में स्थापित चंपावत की ऐतिहासिकता केवल यहीं तक सीमित नहीं, वरन यह भी सच है कि रामायण और महाभारत काल से भी चंपावत सीधे संबंधित रहा है। अल्मोड़ा आने से पूर्व चम्पावत आठवीं अठारहवीं शताब्दी तक कुमाऊं के चंद वंश के राजाओं की राजधानी रहा है, जहां से एक समय सम्पूर्ण पर्वतीय अंचल ही नहीं, अपितु मैदानों के कुछ भागों तक शासन किया जाता था। पढ़ना जारी रखें “चंपावत से मिला ‘कुमाऊं’ को अपना नाम और यह ही ‘कुमाऊं’ की मूल पहचान”

तीसरी कोशिश में बन पाया था बकिंघम पैलेस जैसा नैनीताल राजभवन


Governor House, Nainital
Governor House, Nainital

नवीन जोशी नैनीताल। लंदन के बकिंघम पैलेस की प्रतिकृति के रूप में 1899 में गौथिक शैली में बने नैनीताल राजभवन का नाम अपने अद्भुद शिल्प के लिये न केवल नगर की प्रसिद्ध इमारतों में सबसे ऊपर आता है, वरन इसकी गिनती देश ही नहीं दुनिया की सबसे सुंदर और बेजोड़ इमारतों में की जाती है, अपने कुल करीब 220 एकड़ क्षेत्रफल में से आठ एकड़ क्षेत्रफल में बने इसके मुख्य भवन के साथ 50 एकड़ क्षेत्रफल में फैला विश्व का सर्वाधिक ऊंचाई पर स्थित 18 होल का गोल्फ मैदान और गोल्फ क्लब तथा शेष 160 एकड़ भूमि पर घना खूबसूरत जंगल भी है। इसका निर्माण गहन भूगर्भीय जांचों के उपरांत बड़ी मजबूती के साथ किया गया, क्योंकि इससे पूर्व नैनीताल में दो और राजभवन बनाए गए थे, जिनमें नगर और उनके स्थानों की कमजोर भूगर्भीय स्थितियों की वजह से की बहुत कम समय में ही दरारें आने लगीं। लिहाजा यह तीसरी कोशिश में बन पाया।

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कुमाऊं का ऋतु पर्व ही नहीं ऐतिहासिक व सांस्कृतिक लोक पर्व भी है घुघुतिया-उत्तरायणी


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  • 1921 में इसी त्योहार के दौरान बागेश्वर में हुई प्रदेश की अनूठी रक्तहीन क्रांति, कुली बेगार प्रथा से मिली थी निजात
  • घुघुतिया के नाम से है पहचान, काले कौआ कह कर न्यौते जाते हैं कौए और परोसे जाते हैं पकवान

नवीन जोशी, नैनीताल। दुनिया को रोशनी के साथ ऊष्मा और ऊर्जा के रूप में जीवन देने के कारण साक्षात देवता कहे जाने वाले सूर्यदेव के धनु से मकर राशि में यानी दक्षिणी से उत्तरी गोलार्ध में आने का उत्तर भारत में मकर संक्रांति के रूप में मनाया जाने वाला पर्व पूरे देश में अलग-अलग प्रकार से मनाया जाता है। पूर्वी भारत में यह बीहू, पश्चिमी भारत (पंजाब) में लोहणी और दक्षिणी भारत (कर्नाटक, तमिलनाडु आदि) में पोंगल तथा देवभूमि उत्तराखंड में यह उत्तरायणी के रूप में मनाया जाता है। उत्तराखंड के लिए यह पर्व न केवल मौसम परिवर्तन के लिहाज से एक ऋतु पर्व वरन बड़ा ऐतिहासिक और सांस्कृतिक लोक पर्व भी है। पढ़ना जारी रखें “कुमाऊं का ऋतु पर्व ही नहीं ऐतिहासिक व सांस्कृतिक लोक पर्व भी है घुघुतिया-उत्तरायणी”

::युवा दिवस 12 जनवरी, 152वीं जयंती पर पर विशेष: नैनीताल से ही नरेंद्र बना था शिकागो का राजर्षि विवेकानंद


Kakadighat
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-नैनीताल जनपद के काकड़ीघाट में ‘बोधि वृक्ष’ सरीखे पीपल का पेड़ के नीचे स्वामी विवेकानंद को हुऐ थे अणु में ब्रह्मांड के दर्शन -स्वामी विवेकानंद व देवभूमि का संबंध तीन चरणों, यानी उनके नरेंद्र होने से लेकर स्वामी विवेकानंद और फिर राजर्षि विवेकानंद बनने तक का था

नवीन जोशी, नैनीताल। उस दौर में सपेरों के देश माने जाने वाले भारत को दुनिया के समक्ष आध्यात्मिक गुरु के रूप में प्रवर्तित करने वाले युगदृष्टा राजर्षि विवेकानंद को आध्यात्मिक ज्ञान नैनीताल जनपद के काकड़ीघाट नाम के स्थान पर प्राप्त हुआ था। यानी सही मायनों में बालक नरेंद्र के राजर्षि विवेकानंद बनने की यात्रा देवभूमि के इसी स्थान से प्रारंभ हुई थी, और काकड़ीघाट ही उनका ‘बोध गया’ था। यहीं उनके अवचेतन शरीर में अजीब सी सिंहरन हुई, और वह वहीं ‘बोधि वृक्ष’ सरीखे पीपल का पेड़ के नीचे ध्यान लगा कर बैठ गऐ। इस बात का जिक्र करते हुऐ बाद में स्वामी जी ने कहा था, यहां (काकड़ीघाट) में उन्हें पूरे ब्रह्मांड के एक अणु में दर्शन हुऐ। यही वह ज्ञान था जिसे 11 सितंबर 1893 को शिकागो में आयोजित धर्म संसद में स्वामी जी ने पूरी दुनिया के समक्ष रखकर विश्व को चमत्कृत करते हुए देश का मानवर्धन किया। सम्भवतः स्वामी जी को अपने मंत्र ‘उत्तिष्ठ जागृत प्राप्यवरान्निबोधत्’ के प्रथम शब्द ‘उत्तिष्ठ’ की प्रेरणा भी अल्मोड़ा में ही मिली थी। उन्होंने हिन्दी में अपना पहला भाषण राजकीय इण्टर कालेज अल्मोड़ा में दिया था।  पढ़ना जारी रखें “::युवा दिवस 12 जनवरी, 152वीं जयंती पर पर विशेष: नैनीताल से ही नरेंद्र बना था शिकागो का राजर्षि विवेकानंद”