चंद राजाओं की विरासत है कुमाऊं का प्रसिद्ध छोलिया नृत्य


Chholiya (2)नवीन जोशी, नैनीताल। आधुनिक भौतिकवादी युग के मानव जीवन में सैकड़ों-हजारों वर्ष पुरानी कम ही सांस्कृतिक परंपराएं शेष रह पाई हैं। इन्हीं में एक आज कुमाऊं ही नहीं उत्तराखंड राज्य की सांस्कृतिक पहचान बन चुका प्रसिद्ध छल या छलिया और हिन्दी में छोलिया कहा जाने वाला लोकनृत्य है, जो कि मूलतः युद्ध का नृत्य बताया जाता है। एक साथ श्रृंगार और वीर रस के दर्शन कराने वाले इस नृत्य के बारे में कुछ इतिहासकारों का मत है कि सबसे पहले चंद वंश के पहले राजा सोमचंद के विवाह के अवसर पर इसका प्रयोग हुआ था, जो कि ‘कुमाऊं का इतिहास’ पुस्तक के लेखक बद्री दत्त पांडे के अनुसार 700 ईसवी में गद्दी पर बैठे थे। इस प्रकार कहा जा सकता है कि यह नृत्य चंद राजाओं की विरासत है, और इसे प्रदर्षित करने वाले ‘छलेर’ या ‘छोल्यार’ उस काल की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। पढ़ना जारी रखें “चंद राजाओं की विरासत है कुमाऊं का प्रसिद्ध छोलिया नृत्य”

इतिहास के झरोखे से कुछ महान उत्तराखंडियों के नाम-उपनाम व एतिहासिक घटनायें


वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली – पेशावर कांड के नायक इन्द्र मणि बडोनी: उत्तराखंड का गाँधी देवकी नंदन पांडे: कुमाऊँ का गाँधी अनुसुया प्रसाद बहुगुणा: गढ़ केसरी बद्री दत्त पांडे: कुमाऊँ केसरी ( कुमाऊं का इतिहास पुस्तक के लेखक) बद्री दत्त पांडे: कुली बेगार आन्दोलन के नायक पं. हर्ष देव जोशी (हरक देव जोशी) : कुमाऊं का चाणक्य, कुमाऊं का शिवाजी हर्ष देव ओली: काली कुमाऊं का शेर विश्वेश्वर दत्त सकलानी: वृक्ष मानव शिव प्रसाद डबराल: चारण, इन्साइक्लोपीडिया ऑफ उत्तराखंड मौला राम: गढ़वाली चित्रकला के जन्मदाता पंडित नैन सिंह रावत: भारतीय राज्यों का साथी, मौलिक पंडित गुमानी पंत: कुमाऊं साहित्य के … पढ़ना जारी रखें इतिहास के झरोखे से कुछ महान उत्तराखंडियों के नाम-उपनाम व एतिहासिक घटनायें

आधुनिक विज्ञान से कहीं अधिक समृद्ध और प्रामाणिक था भारतीय ज्ञान


[untitled1.bmp]विज्ञान के वर्तमान दौर में आस्था व विश्वास को अंधविश्वास कहे जाने का चलन चल पड़ा है। आस्था और विज्ञान को एक दूसरे का बिल्कुल उलट-विरोधाभाषी कहा जा रहा है। यानी जो विज्ञान नहीं है, वैज्ञानिक नियमों और आज के वैज्ञानिक दौर के उपकरणों से संचालित नहीं है, जो मनुष्य की आंखों और वैज्ञानिक ज्ञान से प्राप्त बुद्धि-विवेक के अनुसार सही नहीं ठहरता, अंधविश्वास है। और आस्था का भी चूंकि वर्तमान ज्ञान-विज्ञान के अनुसार कोई आधार नहीं है, इसलिए वह भी अंधविश्वास ही है।

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400 वर्ष पुरानी है कुमाउनी शास्त्रीय होली की परंपरा!


Kumaoni Baithaki Holi
कुमाउनी बैठकी होली

-पौष माह के पहले रविवार से ही शुरू हो जाती हैं शास्त्रीय रागों में होलियों की बैठकें, सर्वाधिक लंबे समय चलती हैं होलियां नवीन जोशी, नैनीताल। देश भर में जहां फाल्गुन माह में होली गाई व खेली जाती है, वहीं परंपरागत कुमाउनी होली की शुरुआत पौष माह के पहले रविवार से ही हो जाती है। कुमाऊं में बैठकी होली की शुरुआत पौष माह के पहले रविवार से ही विष्णुपदी होली गीतों के साथ हो जाती है। माना जाता है कि प्राचीनकाल में यहां के राजदरबारों में बाहर के गायकों के आने से यह परंपरा आई है। इसमें शास्त्रीयता का अधिक महत्व होने के कारण इन्हें शास्त्रीय होली भी कहा जाता है। इसके अन्तर्गत विभिन्न प्रहरों में अलग अलग शास्त्रीय रागों पर आधारित होलियां गाई जाती हैं। शुरुआत बहुधा धमार राग से होती है, और फिर सर्वाधिक काफी व पीलू राग में तथा जंगला काफी, सहाना, बिहाग, जैजैवन्ती, जोगिया, झिंझोटी, भीम पलासी, खमाज व बागेश्वरी सहित अनेक रागों में भी बैठकी होलियां विभिन्न पारंपरिक वाद्य यंत्रो के साथ गाई जाती हैं। पढ़ना जारी रखें “400 वर्ष पुरानी है कुमाउनी शास्त्रीय होली की परंपरा!”

पाषाण युग से यायावरी का केंद्र रहा है कुमाऊं


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-पाषाणयुगीन हस्तकला को संजोए लखु उडियार से लेकर रामायण व महाभारत काल में हनुमान व पांडवों से लेकर प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग, आदि गुरु शंकराचार्य, राजर्षि विवेकानंद, महात्मा गांधी व रवींद्रनाथ टैगोर सहित अनेकानेक ख्याति प्राप्त जनों के कदम पड़े

-इनके पथों को भी विकसित किया जाए तो लग सकते हैं कुमाऊं के पर्यटन को पंख
नवीन जोशी, नैनीताल। जी हां, उत्तराखंड का प्राकृतिक व सांस्कृतिक तौर पर समृद्ध कुमाऊं अंचल युग-युगों से प्रकृति की गोद में ज्ञान और शांति की तलाश में आने वाले लोगों की सैरगाह और पर्यटन के लिए पहली पसंद रहा है। पाषाण युग की हस्तकला आज भी यहां अल्मोडा के पास लखु उडियार नाम के स्थान पर सुरक्षित है जो उस दौर में भी यहां मानव कदमों के पड़ने और उनकी कला प्रियता के साक्षी हैं। त्रेता युग में रामायण के कई चरित्र व महाभारत काल में कौरव-पांडवों से लेकर आगे प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग, आदि गुरु शंकराचार्य, राजर्षि स्वामी विवेकानंद, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर, घुमक्कड़ी साहित्य लेखक राहुल सांस्कृत्यायन, सुप्रसिद्ध छायावादी कवयित्री महादेवी वर्मा सहित अनेकानेक ख्याति प्राप्त जनों के कदम यहां पड़े। वहीं स्कंद पुराण के मानसखंड में देवभूमि के रूप में वर्णित अनेकों धार्मिक महत्व के स्थलों से लेकर दुनिया के सबसे ऊंचे श्वेत-धवल नगाधिराज हिमालय पर्वत के अलग-अलग कोणों से सुंदरता के साथ दर्शन कराने वाले और अपनी आबोहवा से बीमार मानवों को प्राकृतिक उपचार से नवयौवन प्रदान करने तथा समृद्ध जैव विविधता और वन्य जीवों से परिपूर्ण जिम कार्बेट पार्क व अस्कोट मृग विहार जैसी अनेकों खूबियों वाले यहां के सुंदर पर्यटन स्थल मानव ही नहीं, पक्षियों को भी आकर्षित करते हैं, और इस कारण पक्षियों के भी पसंदीदा प्रवास स्थल हैं। कुमाऊं में इनके अलावा भी अपनी अलग वास्तुकला, सदाबहार फल-फूल, समृद्ध जैव विविधता के साथ ईको-टूरिज्म तथा ऐसी अनेकों विशिष्टताएं (आधुनिक पर्यटन के लिहाज से यूएसपी) हैं कि इनका जरा भी प्रयोग किया जाए तो कुमाऊं में वर्ष भर कल्पना से भी अधिक संख्या में पर्यटक आ सकते हैं। पढ़ना जारी रखें “पाषाण युग से यायावरी का केंद्र रहा है कुमाऊं”

बैरन (18 नवंबर 1841) से पहले ही 1823 में नैनीताल आ चुके थे कमिश्नर ट्रेल


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-नैनीताल की आज के स्वरूप में स्थापना और खोज को लेकर ऐतिहासिक भ्रम की स्थिति
नवीन जोशी, नैनीताल। इतिहास जैसा लिख दिया जाए, वही सच माना जाता है, और उसमें कोई झूठ हो तो उस झूठ को छुपाने के लिए एक के बाद एक कई झूठ बोलने पड़ते हैं। प्रकृति के स्वर्ग नैनीताल के साथ भी ऐसा ही है। युग-युगों पूर्व स्कंद पुराण के मानस खंड में त्रिऋषि सरोवर के रूप में वर्णित इस स्थान के बारे में कहा जाता है कि सर्वप्रथम पीटर बैरन नाम का अंग्रेज व्यापारी 18 नवंबर 1841 को यहां पहुंचा, और नगर में अपना पहला घर-पिलग्रिम लॉज बनाकर नगर को वर्तमान स्वरूप में बसाना प्रारंभ किया। लेकिन अंग्रेजी दौर के अन्य दस्तावेज भी इसे सही नहीं मानते। उनके अनुसार 1823 में ही कुमाऊं के दूसरे कमिश्नर जॉर्ज विलियम ट्रेल यहां पहुंच चुके थे और इसकी प्राकृतिक सुन्दरता देखकर अभिभूत थे, लेकिन उन्होंने इस स्थान की सुंदरता और स्थानीय लोगों की धार्मिक मान्यताओं के मद्देनजर इसे न केवल अंग्रेज कंपनी बहादुर की नजरों से छुपाकर रखा, वरन स्थानीय लोगों से भी इस स्थान के बारे में किसी अंग्रेज को न बताने की ताकीद की थी। इसके अलावा भी बैरन के 1841 की जगह 1839 में पहले भी नैनीताल आने की बात भी कही जाती है। पढ़ना जारी रखें “बैरन (18 नवंबर 1841) से पहले ही 1823 में नैनीताल आ चुके थे कमिश्नर ट्रेल”

अंग्रेजों के आगमन (1815) से ही अपना अलग अस्तित्व तलाशने लगा था उत्तराखंड


-अंग्रेजी हुकूमत के दौर में भी थी अस्तित्व की तलाश
-सिगौली की संधि में किया गया था उत्तराखंड को अपने परंपरागत कानूनों के साथ अलग इकाई के रूप में माने जाने की शर्त
-1897 में महारानी बिक्टोरिया के समक्ष भी उठाई गई थी मांग, 1916 से 1994 तक जलती रही राज्य आंदोलन की अलख 

नवीन जोशी, नैनीताल। नौ नवंबर 2000 को देश के 27वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आए उत्तराखंड राज्य का गठन बहुत लंबे संघर्ष और बलिदानों के फलस्वरूप हुआ। क्षेत्रीय जनता ने अंग्रेजों को 1815 में सिगौली की संधि के साथ इसी शर्त के साथ अपनी जमीन पर पांव रखने दिये थे कि वह उनके परंपरागत कानूनों के साथ उन्हें अलग इकाई के रूप में रखेंगे। जून 1897 में रानी विक्टोरिया को शर्तें याद दिलाते हुए लोगों ने स्वयं को अलग रखने को प्रत्यावेदन भी भेजा था। पढ़ना जारी रखें “अंग्रेजों के आगमन (1815) से ही अपना अलग अस्तित्व तलाशने लगा था उत्तराखंड”

कुमाऊं में ‘च्यूड़ा बग्वाल” के रूप में मनाई जाती थी परंपरागत दीपावली


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-ऐपण और च्यूड़ों का होता था प्रयोग नवीन जोशी, नैनीताल। वक्त के साथ हमारे परंपरागत त्योहार अपना स्वरूप बदलते जाते हैं, और बहुधा उनका परंपरागत स्वरूप याद ही नहीं रहता। आज जहां दीपावली का अर्थ रंग-बिरंगी चायनीज बिजली की लड़ियों से घरों-प्रतिष्ठानों को सजाना, महंगी से महंगी आसमानी कान-फोड़ू ध्वनियुक्त आतिषबाजी से अपनी आर्थिक स्थिति का प्रदर्शन करना और अनेक जगह सामाजिक बुराई-जुवे को खेल बताकर खेलने और दीपावली से पूर्व धनतेरस पर आभूषणों और गृहस्थी की महंगी इलेक्ट्रानिक वस्तुओं को खरीदने के अवसर के रूप में जाना जाता है, वैसा अतीत में नहीं था। खासकर कुमाऊं अंचल में दीपावली का पर्व मौसमी बदलाव के दौर में बरसात के बाद घरों को गंदगी से मुक्त करने, साफ-सफाई करने, घरों को परंपरागत रंगोली जैसी लोक कला ऐपण से सजाना तथा तेल अथवा घी के दीपकों से प्रकाशित करने का अवसर था। मूलत: ‘च्यूड़ा बग्वाल” के रूप से मनाए जाने वाले इस त्योहार पर कुमाऊं में बड़ी-बूढ़ी महिलाएं नई पीढ़ी को सिर में नए धान से बने च्यूड़े रखकर आकाश की तरह ऊंचे और धरती की तरह चौड़े होने जैसी शुभाशीषें देती थीं।

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नगर पालिका के हाथों से छिना ‘शरदोत्सव’, अब ‘सत्ता’ कराएगी ‘नैनीताल शीतोत्सव’


वर्ष 1890 के शरदोत्सव के दौरान विशाल हवा के गुब्बारे को उड़ाने के दौरान जमा भीड़।

‘शीतोत्सव’ के नए अवतार में परिवर्तित हो जाएगी 1890 से जारी ‘शरदोत्सव’परंपरा
-नगर पालिका से राज्य की ‘सत्ता’ के हाथ में चला जायेगा आयोजन
नवीन जोशी, नैनीताल। 1890 से होते आ रहे नैनीताल ‘शरदोत्सव” को इस वर्ष न करा पाना नगर पालिका को महंगा पड़ने जा रहा है। जिला प्रशासन ने ‘शीतोत्सव” या ‘नैनीताल विंटर कार्निवाल” के नए रंग-रूप में इस आयोजन को करने का ऐलान कर दिया है, और बड़ी सफाई से पालिका को इसके आयोजन से कमोबेश दूर रखकर स्थानीय विधायक को आयोजन समिति की मुख्य कार्यकारिणी का अध्यक्ष बना दिया है। इस प्रकार तय माना जा रहा है कि इस प्रकार शरदोत्सव इतिहास की बात हो जाएगा, और इसकी जगह शीतोत्सव ले लेगा, और उसका मुख्य आयोजक राज्य का सत्तारूढ़ दल होगा।
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ढाई हजार वर्ष पुरानी ऐतिहासिक थाती से रूबरू कराएगा हिमालय संग्रहालय


हिमालय संग्रहालय के ऐतिहासिक भवन में मौजूद ऐतिहासिक धरोहरें।
हिमालय संग्रहालय के ऐतिहासिक भवन में मौजूद ऐतिहासिक धरोहरें।

-ईशा से तीन सदी पूर्व की कुषाण कालीन स्वर्ण मुद्रा सहित उत्तराखंड में मिली और यहां की ऐतिहासिक विरासतें हैं संजोई कुमाऊं विवि के इस संग्रहालय ने
-एशियाई विकास बैंक की ‘हैरिटेज पाथ वॉक” योजना से जुड़ेगा
नवीन जोशी, नैनीताल। ईशा से तीन सदी पूर्व की कुषाण कालीन स्वर्ण मुद्रा सहित उत्तराखंड में मिली और यहां की ऐतिहासिक विरासतें संजोए बैठा कुमाऊं विवि का हिमालय संग्रहालय अब सैलानियों को अधिक बेहतर स्वरूप में सैलानियों को ढाई हजार वर्ष पुरानी प्रदेश ही नहीं देश की ऐतिहासिक थाती और हिमालय की ऐतिहासिक धरोहरों से रूबरू कराएगा। ऐसा संभव होगा एशियाई विकास बैंक की ‘हैरिटेज पाथ वॉक” योजना से, जिसमें हिमालय संग्रहालय को पहले फेस में बाहर-भीतर दोनों स्वरूपों में संजोने-संवारने के लिए शामिल कर लिया गया है। पढ़ना जारी रखें “ढाई हजार वर्ष पुरानी ऐतिहासिक थाती से रूबरू कराएगा हिमालय संग्रहालय”

इतिहास होने की ओर शेरशाह सूरी के जमाने की ‘गांधी पुलिस’ पर अब ‘नो वर्क-नो पे’ की तलवार


08NTL-5पटवारियों के लिए ‘नो वर्क-नो पे’ लागू करने में सरकार भी आएगी कटघरे में

-‘तदर्थ” आधार पर चल रही प्रदेश की राजस्व व्यवस्था
नवीन जोशी, नैनीताल। अंग्रेजों से भी पहले मुगल शासक शेर शाह सूरी के शासनकाल से देश में शुरू हुई और खासकर उत्तराखंड में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौर से सफलता से चल रही ‘गांधी पुलिस” के रूप में शुरू हुई राजस्व पुलिस व्यवस्था कमोबेश ‘तदर्थ” आधार पर चल रही है। प्रदेश के संपूर्ण राजस्व क्षेत्रों में पुलिस कार्य संभालते आ रहे पटवारियों ने बीते वर्ष दो अक्टूबर से पुलिस कार्यों का बहिस्कार किया हुआ है, जबकि उनसे ऊपर के कानूनगो, नायब तहसीलदार व तहसीलदार के अधिसंख्य पद रिक्त हैं। और जो भरे हैं वह, तदर्थ आधार पर भरे हैं। शुक्रवार (22.01.2015) को उत्तराखंड सरकार के इस मामले में पटवारियों के लिए ‘नो वर्क-नो पे” की कार्रवाई करने के फरमान से व्यवस्था की कलई खुलने के साथ ही सरकार की कारगुजारी भी सामने आने की उम्मीद बनती नजर आ रही है।
कुमाऊं मंडल की बात करें तो यहां 325 लेखपालों में से 204 एवं पटवारियों के 410 पदों में से 82 रिक्त हैं। आज से भी उनकी भर्ती की कवायद शुरू हो तो वह 30 जून 2016 के बाद ही मिल पाएंगे, और तब तक रिक्तियां क्रमश: 212 और 123 हो जानी हैं। इसी तरह नायब तहसीलदारों के 60 में से 14 तथा तहसीलदारों के 49 में से 33 पद रिक्त पड़े हैं। यही नहीं इन पदों पर जो लोग कार्यरत हैं, वह भी पिछले दो वर्ष से डीपीसी न हो पाने के कारण तदर्थ आधार पर कार्य करने को मजबूर हैं। स्थिति यह है कि उनकी तदर्थ नियुक्ति में डीपीसी होने पर दो वर्ष पुरानी ही तिथि से नियुक्ति माने जाने का उल्लेख है, किंतु इस दौरान नई नियुक्ति पर आए कर्मी उन्हें खुद से जूनियर बता रहे हैं। ऐसे में उनका मनोबल टूट रहा है। प्रदेश में 2006 से पटवारियों की नई भर्तियां नहीं हुई हैं, जबकि इनका हर वर्ष, अगले दो वर्ष की रिक्तियों का पहले से हिसाब लगाकर भर्ती किये जाने का प्राविधान है।

पूर्व आलेख: अब पटवारी खुद नहीं चाहते खुद की व्यवस्था, चाहते हैं पुलिस की तरह थानेदार बनना

-1857 के गदर के जमाने से चल रही पटवारी व्यवस्था से पटवारी व कानूनगो पहले ही हैं विरत
-पहले आधुनिक संसाधनों के लिए थे आंदोलित, सरकार के उदासीन रवैये के बाद अब कोई मांग नहीं
-हाईटेक अपराधियों और सरकार की अनसुनी के आगे हुए पस्त
नवीन जोशी, नैनीताल। अंग्रेजों से भी पहले मुगल शासक शेर शाह सूरी के शासनकाल से देश में शुरू हुई और उत्तराखंड में खासकर 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौर से सफलता से चल रही ‘गांधी पुलिस” व्यवस्था बीती दो अक्टूबर यानी गांधी जयंती के दिन से कमोबेश इतिहास ही बन गई है। पूरे देश से इतर राज्य के 65 फीसदी पर्वतीय हिस्से में राजस्व संबंधी कार्यों के साथ ही अपराध नियंत्रण और पूर्व में वन संपदा की हकदारी का काम भी संभालने वाले पटवारियों ने अपने बस्ते अपने जिलों के कलक्ट्रेटों में जमा करा दिए हैं, और मौजूदा स्थितियों में खुद भी अपनी व्यवस्था के तहत कार्य करने से एक तरह से हाथ खड़े कर दिए हैं। सवालिया तथ्य यह भी है कि इतनी बड़ी व्यवस्था के ठप होने के बावजूद शासन व सरकार में इस मामले में कोई हरकत नजर नहीं आ रही है।

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उत्तराखंड : सर्वप्रथम 1897 में उठी थी अलग राज्य की मांग


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-एक शताब्दी से अधिक लम्बे संघर्ष से नसीब हुआ उत्तराखंड राज्य

-सर्वप्रथम 1897 में इंग्लेंड की महारानी विक्टोरिया के समक्ष रखी गई थी कुमाऊं को प्रांत का दर्जा देने की मांग नवीन जोशी, नैनीताल। नौ नवंबर 2000 को अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आए उत्तराखंड राज्य में पृथक राज्य की मांग एक सदी से भी अधिक पुरानी थी। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार सर्वप्रथम जून 1897 में रानी विक्टोरिया को शर्तें याद दिलाते हुए तत्कालीन ब्रिटिश कुमाऊं (जिसमें प्रदेश के वर्तमान गढ़वाल मंडल का भी अलकनंदा नदी के पूर्वी ओर का पूरा सहित तत्कालीन टिहरी रियासत को छोड़कर अधिकांश क्षेत्र शामिल था) को अलग प्रान्त के रूप में रखने को प्रत्यावेदन भेजा था। हरी दत्त पांडे, ज्याला दत्त जोशी, रायबहादुर बद्री दत्त जोशी, रायबहादुर दुर्गा दत्त जोशी (जज)व गोपाल दत्त जोशी द्वारा इंग्लेंड की महारानी विक्टोरिया को भेजे गए पत्र में कहा गया था कि अंग्रेजों ने इस क्षेत्र को जीता नहीं था, वरन 1815 में स्वयं अपनी मर्जी से अपने आप को ब्रिटिश साम्राज्य के संरक्षण में रखा था, इसलिए उनकी वफादारी के बदले उनकी मातृभूमि को अलग प्रांत का दर्जा दें।

यह भी पढ़ें : अंग्रेजों के आगमन (1815) से ही अपना अलग अस्तित्व तलाशने लगा था उत्तराखण्ड 

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1830 में मुरादाबाद से हुई कुमाउनी रामलीला की शुरुआत


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Kumaoni Ramlila

-कुमाऊं की रामलीला की है देश में अलग पहचान
नवीन जोशी, नैनीताल। प्रदेश के कुमाऊं मंडल में होने वाली कुमाउनी रामलीला की अपनी मौलिकता, कलात्मकता, संगीत एवं राग-रागिनियों में निबद्ध होने के कारण देश भर में अलग पहचान है। कुमाउनी रामलीला में 1943 में नृत्य सम्राट उदयशंकर के कल्चरल सेंटर ने पंचवटी का सेट लगाकर उसके आसपास शेष दृश्यों का मंचन करने तथा छायाओं के माध्यम से फंतासी के दृश्य दिखाने का प्रयोग किया, जिसका प्रभाव अब भी कई जगह दिखता है। महामना मदन मोहन मालवीय की पहल पर प्रयाग के गुजराती मोहल्ले में सर्वप्रथम कुमाउनी रामलीला का मंचन हुआ था। पढ़ना जारी रखें “1830 में मुरादाबाद से हुई कुमाउनी रामलीला की शुरुआत”

स्कॉटलेंड से गहरा नाता रहा है कुमाऊं और उत्तराखंड का 


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    132 वर्ष के अंग्रेजी राज में 70 वर्ष रहे स्कॉटिश मूल के कमिश्नर ट्रेल, बेटन व रैमजे, अपने घर की तरह मानते थे उत्तराखंड को, उन्होंने परंपरागत कानूनो को दी महत्ता, स्थानीय लोक संस्कृति व धार्मिक मान्यताओं का रखा खयाल, इसीलिए उत्तराखंड में हुआ अंग्रेजों का कम विरोध

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शी-मोदी के कैलाश को नया मार्ग खोलने से हरीश रावत नाखुश, पर केएमवीएन उत्साहित


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-कहा, इससे इस धार्मिक यात्रा को और अधिक प्रचार-प्रसार मिलेगा
नवीन जोशी, नैनीताल। ‘हाई टेक’ होते जमाने में भी आस्था का कोई विकल्प नहीं है। आज भी दुनिया में यह विश्वास कायम है कि ‘प्रभु’ के दर्शन करने हों तो कठिन परीक्षा देनी ही पड़ती है। उत्तराखंड से शिव के धाम कैलाश मानसरोवर का मार्ग पौराणिक है। पांडवों के द्वारा भी इसी मार्ग से कैलाश जाने के पौराणिक संदर्भ मिलते हैं। इसलिए भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं चीन के राष्ट्रपति शी चिन फिंग के बीच हुए समझौते के तहत उत्तराखंड के मौजूदा मार्ग के साथ ही सिक्किम के नाथुला दर्रे से नए मार्ग के खोले जाने से भले प्रदेश के मुख्यमंत्री राजनीतिक कारणों से नाखुशी जाहिर कर रहे हों, पर यात्रा की आयोजक संस्था कुमाऊं मंडल विकास निगम-केएमवीएन चिंतित नहीं वरन और अधिक आशावादी है कि इस कदम से यात्रा को और अधिक प्रचार-प्रसार मिलेगा तथा मौजूदा पौराणिक यात्रा मार्ग से होने वाली यात्रा को भी बढ़ावा मिलेगा। पढ़ना जारी रखें “शी-मोदी के कैलाश को नया मार्ग खोलने से हरीश रावत नाखुश, पर केएमवीएन उत्साहित”