गंगा-यमुना के बाद ग्लेशियर, नदी, नाले, झील, जंगल, चरागाह भी अब ‘जीवित मानव’


गंगा माता की आरती के लिए चित्र परिणाम-उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने एक और एतिहासिक फैसला देते हुए गंगा-यमुना के बाद गंगोत्री, यमुनोत्री सहित नदी, नालों, झीलों, जंगलों, चरागाहों को भी जीवित मानव का दर्जा दिया

– भारतीय मिथकों की कण-कण में ईश्वर होने की परिकल्पना पर लगी एक तरह से मुहर
नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने एक और एतिहासिक फैसला देते हुए गंगा और यमुना नदियों के बाद अब इनके उद्गम स्थलों-गंगोत्री व यमुनोत्री सहित ग्लेशियरों के साथ ही नदियों, छोटी नदियों, घाटियांे, जल धाराओं, ग्लेशियरों, झीलों, हवा, घास के मैदानों, जंगलों, जंगली जलराशियों व झरने इत्यादि को कानूनी वैधता, कानूनी तौर पर जीवित मनुष्य का दर्जा दे दिया है। इन्हें एक कानूनी तौर पर जीवित व्यक्ति की तरह सभी संबंधित मौलिक व कानूनी अधिकार होंगे, साथ ही इनके जीवित मनुष्य की तरह दायित्व और जिम्मेदारियां भी होंगी।

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मनुष्य की तरह पैदा होते, साँस लेते, गुनगुनाते और मरते भी हैं तारे


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प्रो. क्रिस एंजिलब्रेथ्ट

-जोहान्सवर्ग यूनिवर्सिटी के प्रो. क्रिस एंजिलब्रेथ्ट ने अपने ‘म्यूजिक ऑफ दि स्टार’ लेक्चर के जरिये समझाया तारों का संगीत
नवीन जोशी, नैनीताल। कहा जाता है मानव और पृथ्वी की उत्पत्ति मूलत: तारों से हुई। आज भी जब किसे प्रियजन की मृत्यु होती है तो बच्चों को समझाया जाता है, की वह तारा बन गया है। तारे टिमटिमटाते हैं तो लगता है कि वे सांस ले रहे हैं, और उनका दिल धड़क रहा है। लेकिन अब वैज्ञानिक भी यह कहने लगे हैं कि तारे न केवल टिमटिमाते हुए सांस ही लेते हैं, वरन गुनगुनाते भी हैं। वैज्ञानिकों ने इनके गीतों यानी सुरों को समझने का भी दावा किया है। दक्षिण अफ्रीका के विज्ञान को आम लोगों तक पहुंचाने के लिये कार्य करने वाले जोहान्सवर्ग यूनिवर्सिटी में कार्यरत अंतरिक्ष विशेषज्ञ प्रोफेसर क्रिस एंजिलब्रेथ्ट बकायदा जगह-जगह जाकर अपने ‘म्यूजिक ऑफ दि स्टार’ लेक्चर के जरिये तारों के संगीत को समझाते हैं।

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21 जून ‘विश्व योग दिवस’ को आएगा ऐसा अनूठा पल, गायब हो जाएगी आपकी छाया !


21 June

नवीन जोशी, नैनीताल। यूं माना जाता है कि जब भी सूर्य किसी लंबवत वस्तु या खड़े मनुष्य के ठीक सिर के ऊपर होते हैं, तो उस वस्तु या मनुष्य की छाया सैद्धांतिक तौर पर नहीं दिखाई देती। किंतु ऐसा होता नहीं है। सूर्य कभी भी पूरी तरह ठीक सिर के ऊपर लंबवत नहीं होते, वरन थोड़ा-बहुत इधर-उधर होते हैं, और इस कारण लंबवत खड़ी वस्तुओं की छाया भी थोड़ी-बहुत दिखाई देती है। लेकिन आगामी 21 जून को जब पूरी दुनिया भारत वर्ष के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल और संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुमोदन पर विश्व योग दिवस मना रही होगी, तब कर्क रेखा पर स्थित स्थानों पर ऐसा अनूठा पल आएगा, जबकि लंबवत खड़ी वस्तुओं की छाया स्वयं उनमें ही समाहित हो जाएगी और दिखाई नहीं देगी।

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उत्तराखंड में ‘दावानल’ की राष्ट्रीय आपदा : न खुद भड़की आग, न उकसाया हवा ने


  पूरी तरह मानव जनित थी आग  !

-सभी आग कहीं न कहीं लोगों द्वारा ही लगाई गई हैं, तापमान कम होने से प्राकृतिक कारणों से आग लगने का अभी कोई कारण नहीं
-आग को भड़काने में प्राकृतिक हालात बने मददगार, अलबत्ता लकड़ी माफिया द्वारा आग लगाने की संभावनाओं से इन्कार
नवीन जोशी, नैनीताल। पहली बार ‘राष्ट्रीय आपदा’ घोषित उत्तराखंड की वनाग्नि पूरी तरह मानव जनित है, और इसके प्राकृतिक कारणों से शुरू होने के कहीं कोई सबूत या स्थितियां नहीं हैं। अलबत्ता पिछले तीन-चार दिनों में जब यह आग दावानल के रूप में दिखाई दी, तब प्राकृतिक हालातों ने जरूर इसे इस हद तक भड़काने में ‘आग में घी डालने’ जैसा कार्य किया। वहीं वन माफिया द्वारा आग लगाने के दावों को खारिज तो नहीं किया जा रहा है, पर इसकी स्पष्ट वजह भी नहीं बताई जा रही है।

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नैनी झील में मलबा सफाई: बिना काम ख़तम-पैसा हजम


नवीन जोशी, नैनीताल। काम खत्म होने के बाद पैसा हजम हो जाए तो कोई बात नहीं, किंतु नैनीताल जिला प्रशासन नैनी झील का मलबा हटाने के लिए वाहवाही लूटने की कोशिश कर रहा है। वह भी बिना काम खत्म पैसा हजम के फार्मूले पर चलकर। यहां यह बताना जरूरी है कि नैनी झील से मलबा हटाने के लिए प्रशासन ने तीन मदों से 80 लाख रपए तो खर्च कर दिए गए, किंतु झील में आया पूरा मलबा हटाना दूर, स्वयं इकट्ठा किया गया मलबा भी बारिश आने पर झील में वापस जाने के लिए छोड़ दिया गया और ऐसा बहुत सारा मलबा झील में वापस चला भी गया है। वहीं झील में दोबारा मलबा न आए, इस के लिए नालों की सफाई जैसे कार्य पिछले एक वर्ष से लंबित पड़े हैं। नालों की मरम्मत के भी पिछले वर्ष जुलाई माह में आई बारिश के बाद ध्वस्त हुए कार्य आज तक पूरे नहीं हो पाए हैं, जिस कारण हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं, और हालातों में पिछले वर्ष से कोई सुधार नहीं देखने को मिला है।

उल्लेखनीय है कि इस वर्ष 31 मई 2016 को सर्वाधिक रिकॉर्ड -7.1 फीट के स्तर तक नैनी झील का जल स्तर गिरा, जबकि इससे पूर्व मई 2012 में -2.5 फीट तक जल स्तर गिरा था। इधर झील में -12 फीट तक जल स्तर मापने का प्रबंध भी किया जा रहा है।

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उत्तराखंड की ‘फील गुड टाइप’ ‘गा’, ‘गे’ व ‘गी’ की खबरें


पानी की बूंद-बूंद पर रहेगी नजर: प्रदेश में लगेंगे पानी के वाई-फाई वाले ऑटोमैटेड डिजिटल मीटर -मीटर रीडिंग के लिये रीडर को घर-घर भी नहीं आना पड़ेगा, बल्कि पास से गुजरते हुए सभी मीटरों की रीडिंग मिल जायेगी -नैनीताल व देहरादून में एशियाई विकास बैंक के माध्यम से योजना स्वीकृत, आगे रामनगर व रुड़की में भी योजना होगी लागू -उपभोक्ताओं को नये मीटरों के लिये कोई शुल्क नहीं देना होगा, मीटर लगाने वाली संस्था की ही अगले सात वर्षों तक इन मीटरों के रखरखाव की जिम्मेदारी नवीन जोशी। नैनीताल। प्रदेश में पेयजल की बरबादी अब बीते समय की बात होने … पढ़ना जारी रखें उत्तराखंड की ‘फील गुड टाइप’ ‘गा’, ‘गे’ व ‘गी’ की खबरें

नैनीताल के नवीन समाचार 



केन्द्रीय बजट में सुनी जाएगी नैनीताल की आवाजें ?


केवल आधा दर्जन साहित्यकारों ने ही वास्तव में लौटाए पुरस्कार

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डा. बृजेंद्र त्रिपाठी

-इनसे से भी आधों ने लौटाई पुरस्कार की राशि
नैनीताल (एसएनबी)। पिछले दिनों साहित्य अकादमी के पुरस्कार लौटाने की खूब चर्चाएं रहीं, और अनेक साहित्यकारों के पुरस्कार लौटाने की खबरें मीडिया में आर्इं। लेकिन सच्चाई यह है कि मुश्किल से आधा दर्जन साहित्यकारों ने ही साहित्य अकादमी को औपचारिक तौर पर अपने पुरस्कार लौटाने के पत्र भेजे, वहीं इनमें से भी करीब आधों ने ही साहित्य अकादमी पुरस्कार के साथ मिली एक लाख रुपए की धनराशि लौटाने की हिम्मत दिखाई।

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