अब हर कोई दे सकेगा देश की सीमाओं की सुरक्षा में योगदान


-चीन सीमा पर स्थित कुटी गांव की सफलता के बाद अब केएमवीएन शुरू करने जा रहा है दार्मा और ब्यांस घाटियों में भी ‘होम स्टे’ की सुविधा

-ग्रामीणों के साथ घर पर रहकर सैलानी अनुभव कर सकेंगे वहां के जनजीवन का रोमांच

-सीमांत क्षेत्रों में पर्यटन विस्तार के साथ ग्रामीणों का पलायन रोककर सीमाओं को सशक्त करने में भी होगी बड़ी भूमिका

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राष्ट्रीय सहारा, 25 अप्रैल 2017, देहरादून संस्करण।

नवीन जोशी, नैनीताल। क्या हम बिना भारतीय सेना में शामिल हुए देश की सीमाओं की रक्षा और सुरक्षा में योगदान दे सकते हैं ? शायद इस प्रश्न का उत्तर हम ‘नां’ में दें, किंतु कुमाऊं मंडल विकास निगम इस प्रश्न का उत्तर हमारे मुंह से ‘हां’ में देने का प्रबंध करने जा रहा है। निगम के एमडी धीराज गर्ब्यांल अपनी महत्वाकांक्षी ‘सीमांत गांवों की होम स्टे’ योजना के तहत यह प्रबंध करने जा रहे हैं, जिसके तहत सैलानी अब कुमाऊं मंडल के तिब्बत सीमा से लगे प्राकृतिक सुंंदरता से लबरेज हिमालय की गोद में सजी दारमा व ब्यांस घाटियों में जाकर वहां के गांवों में ग्रामीणों के साथ उनके घरों में रहकर न केवल वहां के जनजीवन का अनुभव व रोमांच ले पाएंगे। वरन इन सीमांत गांवों के ग्रामीणों की आर्थिकी में वृद्धि कर उनके समक्ष रोजगार के अभाव में खड़ी पलायन व बेरोजगारी की समस्या का समाधान कर पाएंगे, जिससे अन्तत: यहां के ग्रामीण पलायन करने को मजबूर नहीं होंगे, और देश की सीमाओं पर सेना में रहे बिना भी मानव दीवार के रूप में सीमा के सशक्त प्रहरी की भूमिका का निर्वाह करते रहेंगे, और इसमें इन गांवों में जाने वाले सैलानियों का भी योगदान होगा।

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देवभूमि के कण-कण में ‘देवत्व’: विश्व हिंदी सम्मेलन के संयोजक व अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार डा. अशोक ओझा के हाथों हुआ विमोचन


Coverनैनीताल। अमेका में हिंदी के जरिये रोजगार के अवसर विषयक कार्यक्रम के दौरान विश्व हिंदी सम्मेलन के संयोजक, अमेरिकी सरकार समर्थित स्टारटॉक हिंदी कार्यक्रम के निदेशक व अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार डा. अशोक ओझा, उत्तराखंड मुक्त विवि के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के निदेशक डा. गोविंद सिंह, कुमाऊं विवि के कुलपति प्रो. एचएस धामी, कला संकायाध्यक्ष प्रो. भगवान सिंह बिष्ट व परिसर निदेशक प्रो. एसपीएस मेहता तथा पत्रकारिता एवं जन संचार विभाग के अध्यक्ष डा. गिरीश रंजन तिवारी आदि के हाथों पत्रकार नवीन जोशी की पुस्तक देवभूमि के कण-कण में देवत्व का विमोचन किया गया। लेखक नवीन जोशी ने बताया कि पुस्तक कुमाऊं -उत्तराखंड की भावी पीढि़यों और यहां आने वाले वाले सैलानियों को इस उम्मीद के साथ समर्पित है कि उन्हें इस पुस्तक के माध्यम से इस अंचल को समग्रता में समझने में मदद मिलेगी। पुस्तक तीन खंडों- देवभूमि उत्तराखंड व कुमाऊं के इतिहास, यहां के धार्मिक, आध्यात्मिक व पर्यटन महत्व के स्थलों तथा यहां के तीज-त्योहारों, लोक संस्कृति, लोक परंपराओं और विशिष्टताओं का वर्णन करती है। यह देवभूमि के खास तौर पर ‘देवत्व’ को एक अलग अंदाज में देखने का प्रयास है। उनका मानना है कि देवभूमि का देवत्व केवल देवताओं की धरती होने से नहीं, वरन इस बात से है कि यह भूमि पूरे देश को स्वच्छ हवा, पानी, जवानी व उर्वरा भूमि के साथ प्राकृतिक व आध्यात्मिक शांति के साथ और भी बहुत कुछ देती है, और वास्तव में देवता शब्द देता या दाता शब्दों का विस्तार है। पढ़ना जारी रखें “देवभूमि के कण-कण में ‘देवत्व’: विश्व हिंदी सम्मेलन के संयोजक व अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार डा. अशोक ओझा के हाथों हुआ विमोचन”

नैनी झील में मलबा सफाई: बिना काम ख़तम-पैसा हजम


नवीन जोशी, नैनीताल। काम खत्म होने के बाद पैसा हजम हो जाए तो कोई बात नहीं, किंतु नैनीताल जिला प्रशासन नैनी झील का मलबा हटाने के लिए वाहवाही लूटने की कोशिश कर रहा है। वह भी बिना काम खत्म पैसा हजम के फार्मूले पर चलकर। यहां यह बताना जरूरी है कि नैनी झील से मलबा हटाने के लिए प्रशासन ने तीन मदों से 80 लाख रपए तो खर्च कर दिए गए, किंतु झील में आया पूरा मलबा हटाना दूर, स्वयं इकट्ठा किया गया मलबा भी बारिश आने पर झील में वापस जाने के लिए छोड़ दिया गया और ऐसा बहुत सारा मलबा झील में वापस चला भी गया है। वहीं झील में दोबारा मलबा न आए, इस के लिए नालों की सफाई जैसे कार्य पिछले एक वर्ष से लंबित पड़े हैं। नालों की मरम्मत के भी पिछले वर्ष जुलाई माह में आई बारिश के बाद ध्वस्त हुए कार्य आज तक पूरे नहीं हो पाए हैं, जिस कारण हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं, और हालातों में पिछले वर्ष से कोई सुधार नहीं देखने को मिला है।

उल्लेखनीय है कि इस वर्ष 31 मई 2016 को सर्वाधिक रिकॉर्ड -7.1 फीट के स्तर तक नैनी झील का जल स्तर गिरा, जबकि इससे पूर्व मई 2012 में -2.5 फीट तक जल स्तर गिरा था। इधर झील में -12 फीट तक जल स्तर मापने का प्रबंध भी किया जा रहा है।

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उत्तराखंड के पहाड़ी बच्चे नहीं मनाते गणतंत्र दिवस, जानिए क्यों ?


-शीतकालीन विद्यालय रहते हैं बंद, अधिकांश बच्चों को नहीं पता कैसे मनाते हैं गणतंत्र दिवस
नवीन जोशी, नैनीताल। पर्वतीय राज्य उत्तराखंड के पहाड़ी अंचलों में अधिकांश बच्चों को गणतंत्र दिवस मनाने के बारे में जानकारी नहीं है। कारण, उनके विद्यालय गणतंत्र दिवस के दौरान शीतकालीन अवकाश के लिए बंद होते हैं, इसलिए न स्कूलों में गणतंत्र दिवस का आयोजन होता है, और न ही बच्चों को ही देश के अपने संविधान के साथ वास्तविक स्वतंत्रता के राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस के आयोजन की जानकारी हो पाती है। इसलिये वे गणतंत्र दिवस आयोजनों में भी भागेदारी नहीं कर पाते हैं।

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भद्रकालीः जहां वैष्णो देवी की तरह त्रि-पिंडी स्वरूप में साथ विराजती हैं माता सरस्वती, लक्ष्मी और महाकाली


माता भद्रकाली मंदिर
माता भद्रकाली मंदिर
माता भद्रकाली के मंदिर का गर्भगृह
माता भद्रकाली के मंदिर का गर्भगृह

ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते।।

कहते हैं आदि-अनादि काल में सृष्टि की रचना के समय आदि शक्ति ने त्रिदेवों-ब्रह्मा, विष्णु व महेश के साथ उनकी शक्तियों-सृष्टि का पालन व ज्ञान प्रदान करने वाली ब्रह्माणी यानी माता सरस्वती, पालन करने वाली वैष्णवी यानी माता लक्ष्मी और बुरी शक्तियों का संहार करने वाली शिवा यानी माता महाकाली का भी सृजन किया। सामान्यतया अलग-अलग स्थानों पर प्रतिष्ठित रहने वाली यह तीनों देवियां कम ही स्थानों पर एक स्थान पर तीनों के एकत्व स्वरूप् में विराजती हैं। ऐसा एक स्थान है माता का सर्वोच्च स्थान बताया जाने वाला वैष्णो देवी धाम। लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड राज्य के कुमाऊं अंचल में भी एक ऐसा ही दिव्य एवं अलौकिक विरला धाम मौजूद है, जहां माता सरस्वती, लक्ष्मी और महाकाली एक साथ एक स्थान पर वैष्णो देवी की तरह ही स्वयंभू लिंग या पिंडी स्वरूप में आदि-अनादि काल से एक साथ माता भद्रकाली के रूप में विराजती हैं, और सच्चे मन से आने वाले अपने भक्तों को साक्षात दर्शन देकर उनके कष्टों का हरती तथा जीवन पथ पर संबल प्रदान करती हैं। इस स्थान को माता के 51 शक्तिपीठों में से भी एक माना जाता है। शिव पुराण में आये माता भद्रकाली के उल्लेख के आधार पर श्रद्धालुओं का मानना है कि महादेव शिव द्वारा आकाश मार्ग से कैलाश की ओर ले जाये जाने के दौरान यहां दक्षकुमारी माता सती की मृत देह का दांया गुल्फ यानी घुटने से नीचे का हिस्सा गिरा था।

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पहाड़ पर कहीं से आ-जा नहीं रहे, यहीं के स्थायी निवासी हैं बाघ, संख्या हुई 400 पार


-कैमरे लगाने से हुई पुष्टि, कुमाऊं में बेहद समृद्ध है वन्य जीवन, व्यापक स्तर पर इनकी गणना किये जाने की जरूरत -कैमरा ट्रैप में तराई डिवीजन में भी मिले 30 से अधिक नये बाघ, इससे उत्साहित वनाधिकारी पहाड़ पर बाघों की संख्या की गणना किये जाने की जता रहे हैं जरूरत, स्थायी होने की वजह से डरने की जरूरत नहीं नवीन जोशी, नैनीताल। अब तक माना जाता रहा है कि देश के राष्ट्रीय पशु बाघ (रॉयल बंगाल टाइगर) पहाड़ पर नहीं होते, यह तराई के मूल निवासी हैं, और वहां से यहां चढ़ आते हैं। वन्य जीवों तथा प्रकृति-पर्यावरण प्रेमियों … पढ़ना जारी रखें पहाड़ पर कहीं से आ-जा नहीं रहे, यहीं के स्थायी निवासी हैं बाघ, संख्या हुई 400 पार

कैंची धाम से निकली थी एप्पल और फेसबुक की तरक्की और ओबामा की जीत की राह


कैंची में उत्तर वाहिनी शिप्रा नदी पर स्थित (आज भी मौजूद ) पुलिया पर बैठे बाबा नीब करौरी का एक दुर्लभ चित्र .

-सिलिकॉन वैली में जुकरबर्ग ने मोदी से किया था इस मंदिर का जिक्र, कहा था-फेसबुक को खरीदने के लिए फोन आने के दौर में इस मंदिर ने दिया था परेशानियों से निकलने का रास्ता
नवीन जोशी, नैनीताल। गत दिवस फेसबुक के संस्थापक व प्रमुख मार्क जुकरबर्ग ने फेसबुक मुख्यालय में मोदी से सवाल पूछने के दौरान अपने बुरे दिन याद करते हुए मोदी को बताया था, ‘जब 2011 के दौर में फेसबुक को खरीदने के लिए अनेक लोगों के फोन आ रहे थे, और वह परेशानी में थे । तब वे अपने गुरु एप्पल (दुनिया की सबसे बड़ी मोबाइल कंपनी) के संस्थापक स्टीव जॉब्स से मिले। जॉब्स ने उन्हें कहा कि भारत जाओ तो उत्तराखंड स्थित बाबा नीब करौरी (अपभ्रंश नीम करोली) के कैंची धाम जरूर जाना। इस पर उन्होंने 2013 में एप्पल कंपनी के तत्कालीन प्रमुख टिम कुक के साथ कैंची धाम के दर्शन किए थे। इसी दौरान करीब एक वर्ष भारत में रहकर उन्होंने यहां लोगों के आपस में जुड़े होने को नजदीकी से देखा, और इससे उनका फेसबुक को एक-दूसरे को जोड़ने के उपकरण के रूप में और मजबूत करने का संकल्प और इरादा और अधिक मजबूत हुआ और उन्होंने फेसबुक को किसी को न बेचकर खुद ही आगे बढ़ाया।
वहीं एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स की बात करें तो स्टीव स्वयं अवसाद के दौर से गुजरने के दौर में 1973 में एक बेरोजगार युवा-हिप्पी के रूप में अपने मित्र डैन कोटके के साथ बाबा नीब करोलीके दर्शन करने आये थे, किंतु इसी बीच 11 सितम्बर 1973 को बाबा के शरीर त्यागने के कारण वह दर्शन नहीं कर पाए, लेकिन यहां से मिली प्रेरणा से उन्होंने अपने एप्पल फोन से 1980 के बाद दुनिया में मोबाइल क्रांति का डंका बजा दिया। यहां तक ​​कहा जाता है की स्टीव ने अपने मशहूर मोनोग्राम (एक बाइट खाये सेब) को कैंची धाम से ही प्रेरित होकर ही बनाया है।

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भारत एवम् विश्व


अरब सागर पर अपना दावा ठोक सकेगा भारत! -अमेरिका की अगुआई में चल रहा है अध्ययन, अरब सागर और भारतीय प्रायद्वीप की चट्टानों में समानता मिलने की है संभावना -परियोजना में भारत के आठ वैज्ञानिक शामिल, जिनमें कुमाऊं विवि के भूविज्ञानी एवं वाडिया संस्थान के शोध छात्र भी -सामरिक दृष्टिकोण से भारत के लिए हो सकता है अत्यधिक महत्वपूर्ण नवीन जोशी, नैनीताल। अमेरिका की एक परियोजना के तहत हो रहे भू-वैज्ञानिक महत्व के शोध भारत के लिए सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इस परियोजना के तहत प्रारंभिक आकलनों के अनुसार अरब सागर भारतीय प्रायद्वीप की चट्टानों से … पढ़ना जारी रखें भारत एवम् विश्व

महेश खान: यानी प्रकृति और जैव विविधता की खान


maheshkhan Dak Banglowपहली नजर में दो हिंदू-मुस्लिम नामों का सम्मिश्रण लगने वाले महेश खान के नाम में ‘खान’ कोई जाति या धर्म सूचक शब्द नहीं है, लेकिन ‘खान’ शब्द को दूसरे अर्थों में प्रयोग करें तो यह स्थान प्रकृति के लिए भी प्रयोग किए जाने वाले महेश यानी शिव की धरती कहे जाने वाले कुमाऊं में वानस्पतिक एवं वन्य जीव-जंतुओं व पक्षियों की जैव विविधता की ‘खान’ ही है। वैसे शाब्दिक अर्थ की बात करें तो महेश खान के नाम में प्रयुक्त ‘खान’ शब्द का प्रयोग कुमाऊं में खासकर अंग्रेजी दौर के घोड़ा व पैदल मार्गों के पड़ावों के लिए होता है। नैनीताल के निकट बल्दियाखान, बेलुवाखान व अल्मोड़ा-झूलाघाट पैदल मार्ग पर पड़ने वाले चर्चाली खान और न्योली खान की तरह ही महेश खान काठगोदाम से मुक्तेश्वर होते हुए अल्मोड़ा जाने वाले पैदल मार्ग का एक पड़ाव रहा है।

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भगवान राम की नगरी के समीप माता सीता का वन ‘सीतावनी’


Pictures of Sitabani Imagesदेवभूमि कुमाऊं-उत्तराखंड में रामायण में सतयुग, द्वापर से लेकर त्रेता युग से जुड़े अनेकों स्थान मिलते हैं। इन्हीं में से एक है त्रेता युग में भगवान राम की धर्मपत्नी माता सीता के निर्वासन काल का आश्रय स्थल रहा वन क्षेत्र-सीतावनी, जो अपनी शांति, प्रकृति एवं पर्यावरण के साथ मनुष्य को गहरी आध्यात्मिकता के साथ मानो उसी त्रेता युग में लिए चलता है। नैनीताल जनपद में भगवान राम के नाम के नगर-रामनगर से करीब 20 किमी दूर घने वन क्षेत्र में जिम कार्बेट नेशनल पार्क के निकट मौजूद सीतावनी माता सीता, लव-कुश व महर्षि बाल्मीकि के मंदिरों, सीता व लव-कुश के प्राकृतिक जल-धारों के साथ ही सैकड़ों प्रजातियों के पक्षियों को देखने के लिए प्रसिद्ध है। इसलिए यहां जंगल सफारी के साथ ही पौराणिक महत्व के स्थल की आनंद दायक सैर को दोहरा आनंद लिया जा सकता है।
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पक्षी-तितली प्रेमियों का सर्वश्रेष्ठ गंतव्य है पवलगढ़ रिजर्व


Bird (4)उत्तराखंड का नैनीताल जनपद में रामनगर वन प्रभाग स्थित पवलगढ़ रिजर्व पक्षी प्रेमियों के लिए बेहतरीन गंतव्य है। दिल्ली से सड़क और रेल मार्ग से करीब 260 किमी तथा नजदीकी हवाई अड्डे पंतनगर से करीब 87 किमी दूर रामनगर के जिम कार्बेट नेशनल पार्क से कोसी नदी के दूसरी-पूर्वी छोर से सटा 5824 हैक्टेयर में फैला प्राकृतिक सौंदर्य और जैव विविधिता से लबरेज पवलगढ रिजर्व, पक्षियों को देखने यानी बर्ड वाचिंग के शौकीनों के लिए सर्वाधिक उपयुक्त स्थान है। यहां अब तक करीब 365 प्रजातियों के पक्षी देखे और पहचाने जा चुके हैं। साथ ही यहां मिलती करीब 83 तरह की तितलियां और 100 प्रकार के मॉथ यानी तितलियों की ही दूसरी प्रजातियां भी मिलती हैं।

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मुक्तेश्वर: जहां होते है प्रकृति के बीच ‘मुक्ति के ईश्वर’ के दर्शन


Chali ki Jali, Mukteshwar
Chali ki Jali, Mukteshwar

देवभूमि उत्तराखंड के नैनीताल जनपद में घने वनों के बीच प्रकृति की गोद में, सूर्यास्त के दौरान स्वर्णिम आभा से दमकते आकाश चूमते पर्वतों-हिमाच्छादित पर्वत चोटियों के स्वर्ग सरीखे रमणीक सुंदर प्राकृतिक दृश्यों के दर्शन कराने वाला एक ऐसा खूबसूरत स्थान है जहां प्रकृति के बीच साक्षात मुक्ति के ईश्वर यानी देवों के भी महादेव के दर्शन है। इस बरसात के मौसम में मुक्तेश्वर किसी भी प्रकृति प्रेमी और शांति की तलाश में पहाड़ों की सैर पर आने वाले सैलानी का अभीष्ट हो सकता है। आइए जानते हैं, ऐसा क्या है मुक्तेश्वर में कि यहां हजारों सैलानी वर्ष भर खिंचे चले आते हैं:-

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प्रकृति को संजोऐ एक वास्तविक हिल स्टेशन, रानी पद्मावती का खेत-रानीखेत


विकास की दौड़ में पीछे छूटती प्राकृतिक सुन्दरता व नैसर्गिक शांति यदि आज भी किसी पर्वतीय नगर में उसके मूल स्वरूप में देखनी और उसमें जीना है, तो यूरोपीय शैली युक्त बंगलों-भवनों के साथ किसी यूरोपीय नगर जैसा अनुभव देने वाला उत्तराखंड का रानीखेत पहली पसंद हो सकता है। 1869 में ब्रिटिश आर्मी के कैप्टन रॉबर्ट ट्रूप द्वारा आर्मी के लिए खोजे और बसाए गए इस बेहद रमणीक नगर का इतिहास हालांकि इससे कहीं पहले कुमाऊं के चंद राजवंश के राजा सुखदेव (कहीं सुधरदेव नाम भी अंकित है) की पत्नी रानी पद्मावती से जुड़ा है, जिनके नाम से इस स्थान की पहचान रानीखेत नाम से है।

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नैनीताल को कमजोर नगर बताना सच्चाई है या कोई साजिश !


Nainital Zone Map
नैनीताल का संवेदनशीलता को प्रदर्शित करता मानचित्र, जिसमें केवल पीला भाग ही भूस्खलनों से कम प्रभावित और शेष खतरनाक बताया गया है।

हाईकोर्ट की रोक हटने के बाद नैनीताल में फिर ध्वस्तीकरण संकट: कदम-दर-कदम प्रशासनिक अक्षमताएं, और खामियाजा जनता को
फिर वही सवाल – क्या नैनीताल को बचाया नहीं जा सकता ? क्या ध्वस्तीकरण ही है आखिरी विकल्प ?

-2011 में पूरी हो चुकी है 1995 में बनी ‘नैनीताल महायोजना’, प्रशासन चार वर्षों से महायोजना नहीं बना पाया
-नालों की मरम्मत के लिए चार वर्ष पुराने करीब 21 करोड़ के दो प्रस्तावों पर शासन ने नहीं दिया एक ढेला भी, अब सारी गलती जनता पर डालने की तैयारी
-प्रशासन के पास कमजोर घरों का कोई सर्वेक्षण भी नहीं है
नवीन जोशी, नैनीताल। नैनीताल जिला प्रशासन नगर को ‘बचाने’ के नाम पर नगर के कमजोर, असुरक्षित घरों को ध्वस्त करने का मंसूबा बना रहा है। उत्तराखंड उच्च न्यायालय के कथित आदेशों का हवाला देकर नगर के जोन-एक व जोन-दो तथा सूखाताल के डूब क्षेत्र के घरों को ध्वस्त करने की योजना बताई जा रही है। इसके लिए प्रशासन भूमिका बनाने के लिए नगर के चुनिंदा लोगों की बैठक बुला चुका है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या नैनीताल को बचाने को अन्य विकल्प आजमाए जा चुके हैं, और क्या ध्वस्तीकरण ही आखिरी विकल्प बचा है।

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नालों को बचाना होगा तभी बचेगा नैनीताल


मल्लीताल में रोप-वे स्टेशन के पास के नाले की आज भी पाइप लाइनों और मलवे से पटी हुई ऐसी है स्थिति।
मल्लीताल में रोप-वे स्टेशन के पास के नाले की आज भी पाइप लाइनों और मलवे से पटी हुई ऐसी है स्थिति।

-नगर में अंग्रेजी दौर में बने 100 शाखाओं युक्त करीब 324 किमी लंबे 50 नालों में पानी की लाइनें, अतिक्रमण और गंदगी है बाधक
-कैचपिटों को हर बारिश के बाद साफ करने की व्यवस्था का नहीं होता पालन, मरम्मत के निर्माण कार्यों की गुणबत्ता बेहद खराब, सफाई के नाम पर भी होती है खानापूरी
नवीन जोशी, नैनीताल। सरोवरनगरी नैनीताल में सितंबर 1880 में 18 को आए महाविनाशकारी भूस्खलन के बाद वर्ष 1901 तक बने 100 शाखाओं युक्त करीब 324.45 किमी लंबे 50 नालों की स्थिति बहुत ही दयनीय है। नगर की धमनियां कहे जाने वाले इन नालों को हर किसी ने अपनी ओर से मनमाना इस्तेमाल किया है। नगर वासियों ने इन्हें कूड़ा व मलवा निस्तारण का कूड़ा खड्ड तथा इनके ऊपर तक अतिक्रमण कर अपने घर बनाने का स्थान बनाया है तो जल संस्थान ने इन्हें पानी की पाइप लाइनें गुजारने का स्थान, जबकि इसकी सफाई का जिम्मा उठाने वाली नगर पालिका और लोक निर्माण विभाग ने इनमें आने वाले कूड़े व गंदगी को उठाने के नाम पर जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालने और सफाई के नाम पर पैंसे बनाने का माध्यम बनाया है। यदि ऐसा न होता तो आज नाले अपना मूल कार्य, नैनी झील में इसके जलागम क्षेत्र का पूरा पानी बिना किसी रोकटोक के ला रहे होते, और नगर को कैसी भी भयानक जल प्रलय या आपदा न डिगा पाती। गनीमत रही कि उत्तराखंड उच्च न्यायालय के आदेशों पर नगर के होटलों द्वारा अभी हाल ही में उसी स्थान से छह कमरे हटा दिए गए थे, जहां से रविवार की रात्रि दो हजार टन मलवा माल रोड पर आया है, यह कमरे न हटे होते तो रात्रि में इन कमरों में सोए लोगों के साथ हुई दुर्घटना का अंदाजा लगाना अधिक कठिन नहीं है।

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