देवभूमि के कण-कण में ‘देवत्व’: विश्व हिंदी सम्मेलन के संयोजक व अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार डा. अशोक ओझा के हाथों हुआ विमोचन


Coverनैनीताल। अमेका में हिंदी के जरिये रोजगार के अवसर विषयक कार्यक्रम के दौरान विश्व हिंदी सम्मेलन के संयोजक, अमेरिकी सरकार समर्थित स्टारटॉक हिंदी कार्यक्रम के निदेशक व अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार डा. अशोक ओझा, उत्तराखंड मुक्त विवि के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के निदेशक डा. गोविंद सिंह, कुमाऊं विवि के कुलपति प्रो. एचएस धामी, कला संकायाध्यक्ष प्रो. भगवान सिंह बिष्ट व परिसर निदेशक प्रो. एसपीएस मेहता तथा पत्रकारिता एवं जन संचार विभाग के अध्यक्ष डा. गिरीश रंजन तिवारी आदि के हाथों पत्रकार नवीन जोशी की पुस्तक देवभूमि के कण-कण में देवत्व का विमोचन किया गया। लेखक नवीन जोशी ने बताया कि पुस्तक कुमाऊं -उत्तराखंड की भावी पीढि़यों और यहां आने वाले वाले सैलानियों को इस उम्मीद के साथ समर्पित है कि उन्हें इस पुस्तक के माध्यम से इस अंचल को समग्रता में समझने में मदद मिलेगी। पुस्तक तीन खंडों- देवभूमि उत्तराखंड व कुमाऊं के इतिहास, यहां के धार्मिक, आध्यात्मिक व पर्यटन महत्व के स्थलों तथा यहां के तीज-त्योहारों, लोक संस्कृति, लोक परंपराओं और विशिष्टताओं का वर्णन करती है। यह देवभूमि के खास तौर पर ‘देवत्व’ को एक अलग अंदाज में देखने का प्रयास है। उनका मानना है कि देवभूमि का देवत्व केवल देवताओं की धरती होने से नहीं, वरन इस बात से है कि यह भूमि पूरे देश को स्वच्छ हवा, पानी, जवानी व उर्वरा भूमि के साथ प्राकृतिक व आध्यात्मिक शांति के साथ और भी बहुत कुछ देती है, और वास्तव में देवता शब्द देता या दाता शब्दों का विस्तार है। पढ़ना जारी रखें “देवभूमि के कण-कण में ‘देवत्व’: विश्व हिंदी सम्मेलन के संयोजक व अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार डा. अशोक ओझा के हाथों हुआ विमोचन”

माता भद्रकाली के मंदिर में महाकाली की जिह्वा सरीखे प्रस्तर खंड से गिरती गंगा की जल धारा

भद्रकालीः जहां वैष्णो देवी की तरह त्रि-पिंडी स्वरूप में साथ विराजती हैं माता सरस्वती, लक्ष्मी और महाकाली


माता भद्रकाली मंदिर
माता भद्रकाली मंदिर
माता भद्रकाली के मंदिर का गर्भगृह
माता भद्रकाली के मंदिर का गर्भगृह

ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते।।

कहते हैं आदि-अनादि काल में सृष्टि की रचना के समय आदि शक्ति ने त्रिदेवों-ब्रह्मा, विष्णु व महेश के साथ उनकी शक्तियों-सृष्टि का पालन व ज्ञान प्रदान करने वाली ब्रह्माणी यानी माता सरस्वती, पालन करने वाली वैष्णवी यानी माता लक्ष्मी और बुरी शक्तियों का संहार करने वाली शिवा यानी माता महाकाली का भी सृजन किया। सामान्यतया अलग-अलग स्थानों पर प्रतिष्ठित रहने वाली यह तीनों देवियां कम ही स्थानों पर एक स्थान पर तीनों के एकत्व स्वरूप् में विराजती हैं। ऐसा एक स्थान है माता का सर्वोच्च स्थान बताया जाने वाला वैष्णो देवी धाम। लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड राज्य के कुमाऊं अंचल में भी एक ऐसा ही दिव्य एवं अलौकिक विरला धाम मौजूद है, जहां माता सरस्वती, लक्ष्मी और महाकाली एक साथ एक स्थान पर वैष्णो देवी की तरह ही स्वयंभू लिंग या पिंडी स्वरूप में आदि-अनादि काल से एक साथ माता भद्रकाली के रूप में विराजती हैं, और सच्चे मन से आने वाले अपने भक्तों को साक्षात दर्शन देकर उनके कष्टों का हरती तथा जीवन पथ पर संबल प्रदान करती हैं। इस स्थान को माता के 51 शक्तिपीठों में से भी एक माना जाता है। शिव पुराण में आये माता भद्रकाली के उल्लेख के आधार पर श्रद्धालुओं का मानना है कि महादेव शिव द्वारा आकाश मार्ग से कैलाश की ओर ले जाये जाने के दौरान यहां दक्षकुमारी माता सती की मृत देह का दांया गुल्फ यानी घुटने से नीचे का हिस्सा गिरा था।

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‘काले-मैकालों’ का नया साल सबको मुबारक हो यारो !


KC Pantभारत में अंग्रेजी शिक्षा के प्रवर्तक ‘लॉर्ड मैकाले’ ने कभी अपने पिता को पत्र लिखा था-‘आप आस्वस्त रहें, हमें भारत को छोड़ना भी पड़े तो हम यहां ऐसे काले अंग्रेजों को छोड़ जाएंगे, जो अपनी सभ्यता, संस्कृति, स्वाभिमान और शर्म तक भले छोड़ दें पर अंग्रेजियत नहीं छोड़ेंगे… इसकी जड़ें बहुत गहरी हो चुकी हैं।” जब अंग्रेज भारत छोड़कर गए तो मैकाले को पता नहीं था कि जो काले अंग्रेज, भारत में रहेंगे वे धर्म व संस्कृति के ठेकेदार बन देश को लूटने में बढ़-चढ़ कर भाग भी लेंगे। शायद भारत की ऐसी हालत देख लॉर्ड विलियम वेंटिंग के जमाने में पकड़े गए ठग पिण्डारियों की रूह भी कॉंप रही होगी। इस आंग्ल नव वर्ष पर महाकवि तुलसी की एक चौपाई “बिछुड़त एक प्राण हर लेहीं, मिलत एक दारुण दु:ख देहीं”  के साथ यादों के इन्हीं गलियारों से निकली है केसी पंत ‘किसन” सेवानिवृत्त अध्यापक, हरी निवास, सूखाताल, नैनीताल की यह कविता- पढ़ना जारी रखें “‘काले-मैकालों’ का नया साल सबको मुबारक हो यारो !”

कैंची धाम से निकली थी एप्पल और फेसबुक की तरक्की और ओबामा की जीत की राह


कैंची में उत्तर वाहिनी शिप्रा नदी पर स्थित (आज भी मौजूद ) पुलिया पर बैठे बाबा नीब करौरी का एक दुर्लभ चित्र .

-सिलिकॉन वैली में जुकरबर्ग ने मोदी से किया था इस मंदिर का जिक्र, कहा था-फेसबुक को खरीदने के लिए फोन आने के दौर में इस मंदिर ने दिया था परेशानियों से निकलने का रास्ता
नवीन जोशी, नैनीताल। गत दिवस फेसबुक के संस्थापक व प्रमुख मार्क जुकरबर्ग ने फेसबुक मुख्यालय में मोदी से सवाल पूछने के दौरान अपने बुरे दिन याद करते हुए मोदी को बताया था, ‘जब 2011 के दौर में फेसबुक को खरीदने के लिए अनेक लोगों के फोन आ रहे थे, और वह परेशानी में थे । तब वे अपने गुरु एप्पल (दुनिया की सबसे बड़ी मोबाइल कंपनी) के संस्थापक स्टीव जॉब्स से मिले। जॉब्स ने उन्हें कहा कि भारत जाओ तो उत्तराखंड स्थित बाबा नीब करौरी (अपभ्रंश नीम करोली) के कैंची धाम जरूर जाना। इस पर उन्होंने 2013 में एप्पल कंपनी के तत्कालीन प्रमुख टिम कुक के साथ कैंची धाम के दर्शन किए थे। इसी दौरान करीब एक वर्ष भारत में रहकर उन्होंने यहां लोगों के आपस में जुड़े होने को नजदीकी से देखा, और इससे उनका फेसबुक को एक-दूसरे को जोड़ने के उपकरण के रूप में और मजबूत करने का संकल्प और इरादा और अधिक मजबूत हुआ और उन्होंने फेसबुक को किसी को न बेचकर खुद ही आगे बढ़ाया।
वहीं एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स की बात करें तो स्टीव स्वयं अवसाद के दौर से गुजरने के दौर में 1973 में एक बेरोजगार युवा-हिप्पी के रूप में अपने मित्र डैन कोटके के साथ बाबा नीब करोलीके दर्शन करने आये थे, किंतु इसी बीच 11 सितम्बर 1973 को बाबा के शरीर त्यागने के कारण वह दर्शन नहीं कर पाए, लेकिन यहां से मिली प्रेरणा से उन्होंने अपने एप्पल फोन से 1980 के बाद दुनिया में मोबाइल क्रांति का डंका बजा दिया। यहां तक ​​कहा जाता है की स्टीव ने अपने मशहूर मोनोग्राम (एक बाइट खाये सेब) को कैंची धाम से ही प्रेरित होकर ही बनाया है।

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कुमाऊं में परंपरागत ‘जन्यो-पुन्यू’ के रूप में मनाया जाता है रक्षाबंधन


वैश्वीकरण के दौर में लोक पर्व भी अपना मूल स्वरूप खोकर अपने से अन्य बड़े त्योहार में स्वयं को विलीन करते जा रहे हैं। उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के पर्वतीय क्षेत्रों का सबसे पवित्र त्यौहार माना जाने वाला ‘जन्यो पुन्यू’ यानी जनेऊ पूर्णिमा और देवीधूरा सहित कुछ स्थानों पर ‘रक्षा पून्यू’ के रूप में मनाया जाने वाला लोक पर्व रक्षाबंधन के त्योहार में समाहित हो गया है। श्रावणी पूर्णिमा के दिन मनाए जाने इस त्योहार पर परंपरागत तौर पर उत्तराखंड में पंडित-पुरोहित अपने यजमानों को अपने हाथों से बनाई गई जनेऊ (यज्ञोपवीत) का वितरण आवश्यक रूप से नियमपूर्वक करते थे, जिसे इस पर्व के दिन सुबह स्नान-ध्यान के बाद यजमानों के द्वारा गायत्री मंत्र के साथ धारण किया जाता था। इस प्रकार यह लोक-पर्व भाई-बहन से अधिक यजमानों की रक्षा का लोक पर्व रहा है। इस दिन देवीधूरा में प्रसिद्ध बग्वाल का आयोजन होता है। साथ ही अनेक स्थानों पर बटुकों के सामूहिक यज्ञोपवीत धारण कराने के उपनयन संस्कार भी कराए जाते हैं। इस दौरान भद्रा काल का विशेष ध्यान रखा जाता है। भद्रा काल में रक्षाबंधन, यज्ञोपवीत धारण एवं रक्षा धागे-मौली बांधना वर्जित रहता है।

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उत्तराखंड से 1.5 और सिक्किम से 1.7 लाख में होगी कैलाश मानसरोवर यात्रा


kailash mansarovar
कैलाश पर्वत
  • -उत्तराखंड से 1080 और सिक्किम से 250 यात्री जा पाएंगे यात्रा पर
  • -उत्तराखंड के पौराणिक मार्ग से 25 तो सिक्किम से 23 दिनों में पूरी होगी यात्रा
  • -उत्तराखंड के रास्ते पहला बैच 12 जून को और सिक्किम के रास्ते 18 जून को दिल्ली से रवाना होंगे पहले दल
  • -उत्तराखंड के रास्ते नौ सितंबर तक 60 यात्रियों के 18 दल और सिक्किम के रास्ते 22 अगस्त तक 50 यात्रियों के पांच दल पूरी कर लेंगे यात्रा
  • -10 अप्रैल तक कर सकते हैं ऑनलाइन आवेदन

नवीन जोशी, नैनीताल। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने बृहस्पतिवार को कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए कार्यक्रम जारी कर स्थिति स्पष्ट कर दी है। इससे पहली बार उत्तराखंड के पांडवों द्वारा भी प्रयुक्त पौराणिक लिपुपास दर्रे के साथ ही सिक्किम के नाथुला दर्रे से होने जा रही यात्रा से संबंधित सभी किंतु-परंतु और संशयों से परदा उठ गया है। इसके साथ ही दोनों मार्गों से प्रस्तावित यात्रा का अंतर भी साफ हो गया है। यात्रा के लिए 10 अप्रैल से पूर्व ऑनलाइन माध्यम से विदेश मंत्रालय की वेबसाइट-केएमवाई डॉट जीओवी डॉट इन पर आवेदन किए जा सकते हैं। पढ़ना जारी रखें “उत्तराखंड से 1.5 और सिक्किम से 1.7 लाख में होगी कैलाश मानसरोवर यात्रा”

उत्तराखंड की सांस्कृतिक राजधानी-रत्नगर्भा अल्मोड़ा


Almora (2)चंद शासकों की राजधानी रहे अल्मोड़ा की मौजूदा पहचान निर्विवाद तौर पर उत्तराखंड की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में है। अपनी प्रसिद्ध बाल मिठाई, चॉकलेट व सिगौड़ी जैसी ही मिठास युक्त कुमाउनी रामलीला और कुमाऊं में बोली जाने वाली अनेक उपबोलियों के मानक व माध्य रूप-खसपर्जिया की यह धरती अपने लोगों की विद्वता के लिए भी विश्व विख्यात है। राजर्षि स्वामी विवेकानंद, विश्वकवि रविन्द्रनाथ टैगोर, नृत्य सम्राट उदय शंकर, सुप्रसिद्ध नृत्यांगना व अदाकारा जोहराबाई, घुमक्कड़ी के महापंडित राहुल सांकृत्यायन व गांधी वादी सरला बहन की प्रिय एवं सुप्रसिद्ध छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत से लेकर मनोहर श्याम जोशी, मृणाल पांडे, रमेश चंद्र साह व प्रसून जोशी जैसे कवि, लेखकों व साहित्यकारों तथा हर्ष देव जोशी, भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत, कुमाऊं केसरी बद्री दत्त पांडे, पूर्व राज्यपाल भैरव दत्त पांडे, विक्टर मोहन जोशी आदि की जन्म-कर्मभूमि अल्मोड़ा की धरती सही मायनों में रत्नगर्भा है। अपने किलों, मंदिरों, प्राकृतिक खूबसूरती, वर्ष भर रुमानी मौसम तथा तहजीब के लिए भी अल्मोड़ा की देश ही दुनिया में अलग पहचान है। बोली-भाषा के साथ ही कुमाऊं की मूल लोक संस्कृति, पहनावा, भोजन, रहन-सहन के साथ ही बदलते परिवेश के भी यहां वास्तविक स्वरूप में दर्शन होते हैं। पढ़ना जारी रखें “उत्तराखंड की सांस्कृतिक राजधानी-रत्नगर्भा अल्मोड़ा”

चंपावत से मिला ‘कुमाऊं’ को अपना नाम और यह ही ‘कुमाऊं’ की मूल पहचान


Baleshwar Templeयूं चंपावत वर्तमान में कुमाऊं मंडल का एक जनपद और जनपद मुख्यालय है, लेकिन यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि कुमाऊं का मूल ‘काली कुमाऊं’ यानी चंपावत ही है। यही नहीं यहीं काली नदी के जलागम क्षेत्र में ‘कर्नतेश्वर पर्वत’ को भगवान विष्णु ने ‘कूर्म’ अवतार का जन्म स्थान माना जाता है, और इसी कारण ही ‘कुमाऊं’ को अपने दोनों नाम ‘कुमाऊं’ और ‘कूर्मांचल’ मिले हैं। लगभग 10वीं शताब्दी में स्थापित चंपावत की ऐतिहासिकता केवल यहीं तक सीमित नहीं, वरन यह भी सच है कि रामायण और महाभारत काल से भी चंपावत सीधे संबंधित रहा है। अल्मोड़ा आने से पूर्व चम्पावत आठवीं अठारहवीं शताब्दी तक कुमाऊं के चंद वंश के राजाओं की राजधानी रहा है, जहां से एक समय सम्पूर्ण पर्वतीय अंचल ही नहीं, अपितु मैदानों के कुछ भागों तक शासन किया जाता था। पढ़ना जारी रखें “चंपावत से मिला ‘कुमाऊं’ को अपना नाम और यह ही ‘कुमाऊं’ की मूल पहचान”

प्रसिद्ध वैष्णो देवी शक्तिपीठ सदृश रामायण-महाभारतकालीन द्रोणगिरि वैष्णवी शक्तिपीठ दूनागिरि


हिमालय की गोद में बसे आध्यात्मिक महिमा से मंडित और नैसर्गिक प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर दूनागिरि शक्तिपीठ का अपार महात्म्य है। जम्मू के प्रसिद्ध वैष्णो देवी शक्तिपीठ की तरह ही यहां भी वैष्णवी माता की स्वयंभू सिद्ध पिंडि विग्रह मौजूद हैं। कहते हैं कि इन दोनों स्थानों पर अन्य शक्तिपीठों की तरह माता के कोई अंग नहीं गिरे थे, वरन माता यहां स्वयं उत्पन्न हुई थीं। जैव विविधता से परिपूर्ण इस बेहद पवित्र स्थान पर मृत व्यक्तियों को जीवित करने की क्षमता युक्त संजीवनी जैसी दिव्य जड़ी-बूटियों की उपस्थिति भी बताई जाती है। पढ़ना जारी रखें “प्रसिद्ध वैष्णो देवी शक्तिपीठ सदृश रामायण-महाभारतकालीन द्रोणगिरि वैष्णवी शक्तिपीठ दूनागिरि”

समृद्ध सांस्कृतिक विरासत सहेजे द्वाराहाट और स्याल्दे बिखौती का मेला


‘ओ भिना कसिकै जानूं द्वारहाटा’ जैसे कुमाऊं के लोकप्रिय लोक गीतों में वर्णित और कत्यूरी शासनकाल में राजधानी रहा द्वाराहाट अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए देश-प्रदेश में प्रसिद्ध है। उत्तराखण्ड राज्य के अल्मोड़ा जिले में रानीखेत तहसील मुख्यालय से लगभग 21 किलोमीटर दूर गेवाड़ घाटी में स्थित इस छोटे से कस्बे में 8वीं से 13वीं शदी के बीच निर्मित महामृत्युंजय, गूजरदेव, मनिया, शीतला देवी व रत्नदेव आदि अनेक मंदिरों के अवशेष आज भी अपनी स्थापत्य कला से प्रभावित करते हैं। मंदिरों के चारों ओर अनेक भित्तियों को कलापूर्ण तरीके से शिलापटों अलंकृत किया गया है। पढ़ना जारी रखें “समृद्ध सांस्कृतिक विरासत सहेजे द्वाराहाट और स्याल्दे बिखौती का मेला”

राजुला-मालूशाही और उत्तराखंड की रक्तहीन क्रांति की धरती, कुमाऊं की काशी-बागेश्वर


Bageshwar1 पौराणिक काल से ऋषि-मुनियों की स्वयं देवाधिदेव महादेव को हिमालय पुत्री पार्वती के साथ धरती पर उतरने के लिए मजबूर करने वाले तप की स्थली बागेश्वर कूर्मांचल-कुमाऊं मंडल का एक प्रमुख धार्मिक एवं पर्यटन स्थल है। नीलेश्वर और भीलेश्वर नाम के दो पर्वतों की उपत्यका में सरयू, गोमती व विलुप्त मानी जाने वाली सरस्वती नदी की त्रिवेणी पर बसा यह स्थान शायद इसी कारण तीर्थराज और कुमाऊं की काशी के रूप में विख्यात है। कुमाऊं की प्रसिद्ध लोक गाथा-राजुला मालूशाही, कुमाऊं के प्रसिद्ध लोक त्योहार-घुघुतिया और कुमाऊं से गोरखा-अंग्रेजी राज की बेहद दमनकारी प्रथा-कुली बेगार को समाप्त करने को हुई उत्तराखंड की रक्तहीन क्रांति की भी यह भूमि रही है, जिसकी परंपरा आज भी यहां स्थित बागनाथ मंदिर व सरयू बगड़ में प्रति वर्ष होने वाले विश्व प्रसिद्ध उत्तरायणी मेले के रूप में जारी है।कुमाऊं के प्रथम कत्यूर राजवंश की शुरुआत यहीं से हुई मानी जाती है, जिनकी राजधानी कार्तिकेयपुर यहीं पास में बैजनाथ नाम के स्थान पर थी। पढ़ना जारी रखें “राजुला-मालूशाही और उत्तराखंड की रक्तहीन क्रांति की धरती, कुमाऊं की काशी-बागेश्वर”

आधुनिक विज्ञान से कहीं अधिक समृद्ध और प्रामाणिक था भारतीय ज्ञान


[untitled1.bmp]विज्ञान के वर्तमान दौर में आस्था व विश्वास को अंधविश्वास कहे जाने का चलन चल पड़ा है। आस्था और विज्ञान को एक दूसरे का बिल्कुल उलट-विरोधाभाषी कहा जा रहा है। यानी जो विज्ञान नहीं है, वैज्ञानिक नियमों और आज के वैज्ञानिक दौर के उपकरणों से संचालित नहीं है, जो मनुष्य की आंखों और वैज्ञानिक ज्ञान से प्राप्त बुद्धि-विवेक के अनुसार सही नहीं ठहरता, अंधविश्वास है। और आस्था का भी चूंकि वर्तमान ज्ञान-विज्ञान के अनुसार कोई आधार नहीं है, इसलिए वह भी अंधविश्वास ही है।

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12 ज्योर्तिलिंगों में प्रथम ज्योर्तिलिंग है जागेश्वर, यहीं से शुरू हुई दुनिया में शिव लिंग की पूजा


Jageshwar (13)

देवभूमि उत्तराखंड के कण-कण में देवत्व की बात कही जाती है। प्रदेश के अनेक धर्म स्थलों में एक भगवान शिव के प्रथम ज्योर्तिलिंग जागेश्वर के बारे में स्कंद पुराण के मानसखंड में कहा गया है-‘मा वैद्यनाथ मनुषा व्रजंतु, काशीपुरी शंकर बल्ल्भावां। मायानगयां मनुजा न यान्तु, जागीश्वराख्यं तू हरं व्रजन्तु।’ अर्थात मनुष्य वैद्यनाथ, शंकर प्रिय काशी और माया नगरी हरिद्वार, भी न जा सके तो जागेश्वर धाम में शिवदर्शन अवश्य करना चाहिए। मान्यता है कि देवाधिदेव महादेव शिव सुर, नर, मुनि आदि की सेवा से प्रसन्न होकर इस स्थान पर जाग्रत हुए और इसलिए ही इस स्थान का नाम जागेश्वर पड़ा। मानस खंड में इसके लिए ‘नागेशं दारुकावने…’ शब्द का प्रयोग भी किया गया है। इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि अल्मोड़ा जनपद मुख्यालय से पिथौरागढ़ राजमार्ग पर 34 किमी की दूरी पर समुद्र तल से 1860 मीटर की ऊंचाई पर जटा गंगा तथा दो छोटी जलधाराओं नंदिनी व सुरभि के संगम पर स्थित महादेव का यह धाम ‘दारुका’ यानी देवदारु यानी विशाल देवदार के वृक्षों के घने मनोरम वन में स्थित हैं, तथा यह क्षेत्र आदि-अनादि काल से ही नागों का स्थान कहा जाता है। इसके आस-पास ही बेरीनाग, धौलीनाग, कालियानाग व गरूड़ जैसे नामों के स्थान इसकी पुष्टि करते हैं। इसलिए माना जाता है कि कभी इसे ‘नागेश्वर’ भी कहा जाता होगा। इसे देश-दुनिया के सबसे बड़े मंदिर समूहों में भी गिना जाता है।

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भारत के सच्चे मुस्लिम नहीं करते गौ-हत्या, बाबर भी था गौरक्षक : कुरैशी


Taking Interview with Governor Dr. Ajij Kuraishi

-दावा किया, वह आज से नहीं 50 वर्षों से हैं गौहत्या के विरोधी, उनकी वकालत को गवर्नर पद बचाने का उपक्रम बताने वाले लोग मानसिक दिवालियापन के शिकार
नवीन जोशी, नैनीताल। गौरक्षा के बाबत लगातार अपने विचार रख रहे प्रदेश के राज्यपाल ने कहा कि वह आज से नहीं 50 वर्षों से गौहत्या का विरोध कर रहे हैं। मध्य प्रदेश में उनके पुराने जानने वाले लोग इसकी पुष्टि कर सकते हैं। कहा कि जो लोग उनकी इस बात को उनका गवर्नर पद बचाने का उपक्रम बता रहे हैं, वह वास्तव में मानसिक दिवालियापन के शिकार हैं। दावा किया कि सच्चे मुसलमान कभी गौ हत्या नहीं करते। दुनिया के ईरान-ईराक सहित तमाम मुस्लिम राष्ट्रों में गायें ही नहीं होती हैं। भारत के अन्य प्रांतों में गौहत्या पर केवल तीन वर्ष की सजा का प्राविधान है जबकि देश के मुस्लिम बहुल जम्मू-कश्मीर प्रांत में गौ हत्या पर 10 वर्ष की सजा मिलती है। उन्होंने पूर्व सीएम विजय बहुगुणा के नाना द्वारा लिखित एतिहासिक पुस्तक के आधार पर दावा किया कि मुगल शासक बाबर भी गौरक्षक था। उसने अपनी वसीयत में हुमायूं के लिए लिखा था-हिंदुस्तान पर हुकूमत करनी है तो हिंदुओं का विश्वास जीतो, और गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाओ। पढ़ना जारी रखें “भारत के सच्चे मुस्लिम नहीं करते गौ-हत्या, बाबर भी था गौरक्षक : कुरैशी”

नाथुला नहीं, कुमाऊं-उत्तराखंड से ही है कैलाश मानसरोवर का पौराणिक व शास्त्र सम्मत मार्ग


केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों से चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग से वार्ता कर कैलाश मानसरोवर के लिए सिक्किम के नाथुला दर्रे का रास्ता खुलवा दिया है, लेकिन सार्वभौमिक तथ्य है कि कैलाश मानसरोवर का पौराणिक व शास्त्र सम्मत मार्ग कुमाऊं-उत्तराखंड के परंपरागत लिपुलेख दर्रे से ही है। कहते हैं कि स्वयं भगवान शिव भी माता पार्वती के साथ इसी मार्ग से कैलाश गए थे। उत्तराखंड के प्राचीन ‘कत्यूरी राजाओं’ के समय में भी यही मार्ग कैलाश मानसरोवर के तीर्थाटन के लिए प्रयोग किया जाता था। पांडवों ने भी इसी मार्ग से कैलाश की यात्रा की थी … पढ़ना जारी रखें नाथुला नहीं, कुमाऊं-उत्तराखंड से ही है कैलाश मानसरोवर का पौराणिक व शास्त्र सम्मत मार्ग