विश्व व भारत में रेडियो-टेलीविज़न का इतिहास


रेडियो के इतिहास पर निगाह डालें तो 1896 में इलेक्ट्रिकल इंजिनियर गुगलियेल्मो मार्कोनी ने पहली बार विद्युत चुंबकीय तरंगो द्वारा दो मील की दूरी तक एक सन्देश भेजने में सफलता प्राप्त की थी, लिहाजा रेडियो के विकास में उनका नाम शुरुवात में लिया जाता है। उन्हें 2 जून 1896 को उन्हें वायरलेस का पेटेंट मिला। आगे उन्होंने ही 1919 में चेम्बर्सफोर्ड में पहला रेडियो प्रसारण का ट्रांसमीटर भी स्थापित किया था। मनुष्य में अपनी आवाज को दूर तक पहुँचाने की चाह न जाने कब से रही है, और न जाने कब से लोग, बच्चे माचिस की डिब्बियों से धागा बांधकर आवाज … पढ़ना जारी रखें विश्व व भारत में रेडियो-टेलीविज़न का इतिहास

मनुष्य की तरह पैदा होते, साँस लेते, गुनगुनाते और मरते भी हैं तारे


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प्रो. क्रिस एंजिलब्रेथ्ट

-जोहान्सवर्ग यूनिवर्सिटी के प्रो. क्रिस एंजिलब्रेथ्ट ने अपने ‘म्यूजिक ऑफ दि स्टार’ लेक्चर के जरिये समझाया तारों का संगीत
नवीन जोशी, नैनीताल। कहा जाता है मानव और पृथ्वी की उत्पत्ति मूलत: तारों से हुई। आज भी जब किसे प्रियजन की मृत्यु होती है तो बच्चों को समझाया जाता है, की वह तारा बन गया है। तारे टिमटिमटाते हैं तो लगता है कि वे सांस ले रहे हैं, और उनका दिल धड़क रहा है। लेकिन अब वैज्ञानिक भी यह कहने लगे हैं कि तारे न केवल टिमटिमाते हुए सांस ही लेते हैं, वरन गुनगुनाते भी हैं। वैज्ञानिकों ने इनके गीतों यानी सुरों को समझने का भी दावा किया है। दक्षिण अफ्रीका के विज्ञान को आम लोगों तक पहुंचाने के लिये कार्य करने वाले जोहान्सवर्ग यूनिवर्सिटी में कार्यरत अंतरिक्ष विशेषज्ञ प्रोफेसर क्रिस एंजिलब्रेथ्ट बकायदा जगह-जगह जाकर अपने ‘म्यूजिक ऑफ दि स्टार’ लेक्चर के जरिये तारों के संगीत को समझाते हैं।

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21 जून ‘विश्व योग दिवस’ को आएगा ऐसा अनूठा पल, गायब हो जाएगी आपकी छाया !


21 June

नवीन जोशी, नैनीताल। यूं माना जाता है कि जब भी सूर्य किसी लंबवत वस्तु या खड़े मनुष्य के ठीक सिर के ऊपर होते हैं, तो उस वस्तु या मनुष्य की छाया सैद्धांतिक तौर पर नहीं दिखाई देती। किंतु ऐसा होता नहीं है। सूर्य कभी भी पूरी तरह ठीक सिर के ऊपर लंबवत नहीं होते, वरन थोड़ा-बहुत इधर-उधर होते हैं, और इस कारण लंबवत खड़ी वस्तुओं की छाया भी थोड़ी-बहुत दिखाई देती है। लेकिन आगामी 21 जून को जब पूरी दुनिया भारत वर्ष के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल और संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुमोदन पर विश्व योग दिवस मना रही होगी, तब कर्क रेखा पर स्थित स्थानों पर ऐसा अनूठा पल आएगा, जबकि लंबवत खड़ी वस्तुओं की छाया स्वयं उनमें ही समाहित हो जाएगी और दिखाई नहीं देगी।

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‘काले-मैकालों’ का नया साल सबको मुबारक हो यारो !


KC Pantभारत में अंग्रेजी शिक्षा के प्रवर्तक ‘लॉर्ड मैकाले’ ने कभी अपने पिता को पत्र लिखा था-‘आप आस्वस्त रहें, हमें भारत को छोड़ना भी पड़े तो हम यहां ऐसे काले अंग्रेजों को छोड़ जाएंगे, जो अपनी सभ्यता, संस्कृति, स्वाभिमान और शर्म तक भले छोड़ दें पर अंग्रेजियत नहीं छोड़ेंगे… इसकी जड़ें बहुत गहरी हो चुकी हैं।” जब अंग्रेज भारत छोड़कर गए तो मैकाले को पता नहीं था कि जो काले अंग्रेज, भारत में रहेंगे वे धर्म व संस्कृति के ठेकेदार बन देश को लूटने में बढ़-चढ़ कर भाग भी लेंगे। शायद भारत की ऐसी हालत देख लॉर्ड विलियम वेंटिंग के जमाने में पकड़े गए ठग पिण्डारियों की रूह भी कॉंप रही होगी। इस आंग्ल नव वर्ष पर महाकवि तुलसी की एक चौपाई “बिछुड़त एक प्राण हर लेहीं, मिलत एक दारुण दु:ख देहीं”  के साथ यादों के इन्हीं गलियारों से निकली है केसी पंत ‘किसन” सेवानिवृत्त अध्यापक, हरी निवास, सूखाताल, नैनीताल की यह कविता- पढ़ना जारी रखें “‘काले-मैकालों’ का नया साल सबको मुबारक हो यारो !”

प्रयोगशाला में दुनिया की इकलौती बची प्रजाति-पटवा के क्लोन तैयार


Rashtriya Sahara 15.12.15-सरोवरनगरी के निकट इसी प्रजाति के नाम पर स्थित है पटवाडांगर नाम का कस्बा
नवीन जोशी, नैनीताल। कुमाऊं विवि के जैव प्रोद्योगिकी संस्थान भीमताल स्थित प्लांट एंड मॉलीक्यूलर बायलॉजी प्रयोगशाला ने एक अनूठा कारनामा कर डाला है। प्रयोगशाला में दुनिया की एक ऐसी प्रजाति का प्रयोगशाला में क्लोन तैयार करने में सफलता प्राप्त की है, जो पूरी तरह से विलुप्त होने की कगार पर है, और जिसके दुनिया में 100 से भी कम आखिरी पौधे ही बचे हैं, और इसके प्राकृतिक तौर पर नए पौधे उगने की प्रक्रिया भी समाप्त हो चुकी है। जैव पारिस्थितिकी के लिहाज से यह वैश्विक स्तर पर बड़ी सफलता आंकी गई है, और अमेरिका की शोध पत्रिका-अमेरिकन जर्नल ऑफ प्लांट साइंस व एशियन जर्नल ऑफ माईक्रोबायोलॉजी एंड इन्वायरमैंटल साइंस एवं इण्डियन जर्नल ऑफ साइंटिफिक रिसर्च में भी इस बाबत शोध पत्र प्रकाशित किये गये हैं।

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अरब सागर पर अपना दावा ठोक सकेगा भारत!


-अमेरिका की अगुआई में चल रहा है अध्ययन, अरब सागर और भारतीय प्रायद्वीप की चट्टानों में समानता मिलने की है संभावना -परियोजना में भारत के आठ वैज्ञानिक शामिल, जिनमें कुमाऊं विवि के भूविज्ञानी एवं वाडिया संस्थान के शोध छात्र भी -सामरिक दृष्टिकोण से भारत के लिए हो सकता है अत्यधिक महत्वपूर्ण नवीन जोशी, नैनीताल। अमेरिका की एक परियोजना के तहत हो रहे भू-वैज्ञानिक महत्व के शोध भारत के लिए सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इस परियोजना के तहत प्रारंभिक आकलनों के अनुसार अरब सागर भारतीय प्रायद्वीप की चट्टानों से ही बना हो सकता है। यदि यह आकलन … पढ़ना जारी रखें अरब सागर पर अपना दावा ठोक सकेगा भारत!

गुदड़ी के लाल ने किया कमाल, घनमूल निकालने का खोजा फॉर्मूला


Jitendra Joshi-17 वीं शताब्दी में स्कॉटलेंड व स्विटजरलेंड के वैज्ञानिकों द्वारा इसके हल के लिए प्रयोग की जारी वाली 1200 शब्दों की जगह केवल 50 शब्दों की लॉग टेबल खोजने का किया है दावा
नवीन जोशी, नैनीताल। प्रतिभा उम्र सहित कैसी भी परिस्थितियों की मोहताज नहीं होती। कॉलेज की पढ़ाई में लगातार ह्रास की आम खबरों के बीच कुमाऊं विवि के एक बीएससी द्वितीय वर्ष के सामान्य पारिवारिक स्थिति वाले छात्र जितेंद्र जोशी का दावा यदि सही है, तो उसने ऐसा कमाल कर डाला है, जो उससे पहले 17 वीं शताब्दी में स्कॉटलेंड के गणितज्ञ जॉन नेपियर ने 1614 में और स्विटजरलेंड के जूस्ट बर्गी ने 1620 में किया था। इन दोनों विद्वान गणितज्ञों से भी छात्र जितेंद्र की उपलब्धि इस मामले में बड़ी है कि इन विद्वानों ने जो लॉग टेबल खोजी थी, वह करीब 1 9 00 शब्दों की है, लिहाजा उसे याद करना किसी के लिए भी आसान नहीं है, और परीक्षाओं में भी इस लॉग टेबल को छात्रों की सहायता के लिए उपलब्ध कराए जाने का प्राविधान है। जबकि जितेंद्र की लॉग टेबल केवल 50 शब्दों की है। इसे आसानी से तैयार तथा याद भी किया जा सकता है। लिहाजा यदि उसकी कोशिश सही पाई गई तो परीक्षाओं में परीक्षार्थियों को लॉग टेबल देने से निजात मिल सकती है, तथा गणित के कठिन घनमूल आसानी से निकाले जा सकते हैं। पढ़ना जारी रखें “गुदड़ी के लाल ने किया कमाल, घनमूल निकालने का खोजा फॉर्मूला”

भूकंप : नेपाल से कम खतरनाक नहीं उत्तराखंड


Rashtriya Sahara 26 April 15 Bhookamp-यहां अधिक लंबा है बड़े भूकंप न आने के कारण साइस्मिक गैप, इसलिए लगातार बढ़ती जा रही है बड़े भूकंपों की संभावना
-एमसीटी यानी मेन सेंट्रल थ्रस्ट पर है नेपाल में भूकंप का केंद्र, उत्तराखंड के धारचूला-मुन्स्यारी से होकर गुजरता है यही थ्रस्ट

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नवीन जोशी, नैनीताल। नेपाल के उत्तर पश्चिमी शहर लामजुम में शनिवार को आए रिक्टर स्केल पर 7.9 तीव्रता के भूकंप का भले उत्तराखंड के पहाड़ों पर सीधा फर्क न पड़ा हो, लेकिन इससे उत्तराखंड में भी लोग सशंकित हो उठे हैं। चिंताजनक यह भी है कि लोगों की आशंकाओं को वैज्ञानिक तथ्य भी स्वीकार कर रहे हैं। नेपाल और उत्तराखंड दोनों उस यूरेशियन-इंडियन प्लेट की बाउंड्री-मेन सेंट्रल थ्रस्ट यानी एमसीटी पर स्थित हैं, जो शनिवार को नेपाल में आये महाविनाशकारी भूकंप और पूरी हिमालय क्षेत्र में भूकंपों और भूगर्भीय हलचलों का सबसे बड़ा कारण है। और यही कारण है, जिसके चलते उत्तराखंड और नेपाल का बड़ा क्षेत्र भूकंपों के दृष्टिकोण से सर्वाधिक खतरनाक जोन-पांच में आता है। इसके अलावा भी उत्तराखंड में पिछले 200 वर्षों में बड़े भूकंप न आने के कारण साइस्मिक गैप अधिक लंबा है, और इसलिए यहां बड़े भूकंपों की संभावना लगातार बढ़ती जा रही है। पढ़ना जारी रखें “भूकंप : नेपाल से कम खतरनाक नहीं उत्तराखंड”

कामयाबी: देवस्थल में एशिया की सबसे बड़ी दूरबीन ‘डॉट’ स्थापित, आइएलएमटी की तैयारी


Rashtriya Sahara 24 April 15

Rashtriya Sahara 24 April 15

-सफलता से लिए गए शनि व बृहस्पति के प्रारंभिक प्रेक्षण नवीन जोशी, नैनीताल। जी हां, देश ही नहीं एशिया की अपनी तरह की सबसे बड़ी 3.6 मीटर व्यास की दूरबीन-डॉट यानी देवस्थल ऑप्टिकल टेलीस्कोप जनपद के देवस्थल नाम के स्थान पर स्थापित हो गई है। इस दूरबीन से प्रायोगिक तौर पर शनि एवं बृहस्पति ग्रहों के चित्र सफलता पूर्वक ले लिए गए हैं। इसे तेजी से अंतरिक्ष, ब्रह्मांड व विज्ञान जगत में लगातार आगे बढ़ रहे देश के लिए बड़ा कदम माना जा सकता है। दूरबीन का औपचारिक तौर पर शुभारंभ इस वर्ष अक्टूबर माह में होने की उम्मीद है। पढ़ना जारी रखें “कामयाबी: देवस्थल में एशिया की सबसे बड़ी दूरबीन ‘डॉट’ स्थापित, आइएलएमटी की तैयारी”

चंपावत से मिला ‘कुमाऊं’ को अपना नाम और यह ही ‘कुमाऊं’ की मूल पहचान


Baleshwar Templeयूं चंपावत वर्तमान में कुमाऊं मंडल का एक जनपद और जनपद मुख्यालय है, लेकिन यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि कुमाऊं का मूल ‘काली कुमाऊं’ यानी चंपावत ही है। यही नहीं यहीं काली नदी के जलागम क्षेत्र में ‘कर्नतेश्वर पर्वत’ को भगवान विष्णु ने ‘कूर्म’ अवतार का जन्म स्थान माना जाता है, और इसी कारण ही ‘कुमाऊं’ को अपने दोनों नाम ‘कुमाऊं’ और ‘कूर्मांचल’ मिले हैं। लगभग 10वीं शताब्दी में स्थापित चंपावत की ऐतिहासिकता केवल यहीं तक सीमित नहीं, वरन यह भी सच है कि रामायण और महाभारत काल से भी चंपावत सीधे संबंधित रहा है। अल्मोड़ा आने से पूर्व चम्पावत आठवीं अठारहवीं शताब्दी तक कुमाऊं के चंद वंश के राजाओं की राजधानी रहा है, जहां से एक समय सम्पूर्ण पर्वतीय अंचल ही नहीं, अपितु मैदानों के कुछ भागों तक शासन किया जाता था। पढ़ना जारी रखें “चंपावत से मिला ‘कुमाऊं’ को अपना नाम और यह ही ‘कुमाऊं’ की मूल पहचान”

‘पथरीली पगडंडियों पर’ अपने साथ दुनिया के इतिहास की सैर भी कराते हैं वल्दिया


Pathrili Pagdandiyon par-पद्मभूषण प्रो. वल्दिया की आत्मकथात्मक पुस्तक-पथरीली पगडंडियों पर का चंडी प्रसाद भट्ट व अन्य गणमान्य जनों के हाथों हुआ विमोचन
-पुस्तक में लालित्य युक्त गद्य के साथ एक वैज्ञानिक के भीतर कहीं-कहीं कवित्व के भी होते हैं दर्शन
नवीन जोशी, नैनीताल। पद्मभूषण प्रो. खड्ग सिंह वल्दिया की आत्मकथात्मक पुस्तक-पथरीली पगडंडियों पर का रविवार (12.04.2015) को पद्मभूषण चंडी प्रसाद भट्ट व अन्य गणमान्य जनों के हाथों विमोचन किया गया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने प्रो. वल्दिया की एक वैज्ञानिक के हिंदी लेखक के रूप में स्थापित होने को लेकर प्रशंशा की, वहीं विज्ञान को देश के जन-जन की भाषा हिंदी के जरिए आम जन तक पहुंचाने के लिए उनके द्वारा पूर्व से किए जा रहे प्रयासों की भी सराहना की। वक्ताओं ने कहा कि वल्दिया अपनी पुस्तक ‘पथरीली पगडंडियों पर” के जरिए पाठकों को अपने साथ दुनिया के इतिहास की सैर भी कराते हैं। पढ़ना जारी रखें “‘पथरीली पगडंडियों पर’ अपने साथ दुनिया के इतिहास की सैर भी कराते हैं वल्दिया”

दुनिया भर के वैज्ञानिक मिलकर दुनिया के ‘तीसरे ध्रुव’ हिमालय पर जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाएंगे जीवन


-भारत के अलावा अमेरिका, चीन, ब्रिटेन, नेपाल, श्रीलंका व आस्ट्रेलिया के वैज्ञानिक होंगे शामिल -कुमाऊं विवि के भूगोल विभाग को हिमालय पर जलवायु परिवर्तनों से अनुकूलता तथा जल के संरक्षण एवं जल के उपयोग, जल विद्युत परियोजनाओं पर एक साथ मिली तीन अंतराष्ट्रीय परियोजनाएं

नवीन जोशी, नैनीताल। दुनिया भर में हो रहे जलवायु परिवर्तन व ग्लोबलवार्मिंग से सर्वाधिक प्रभावित हिमालय और वहां रहने वाले लोग हो रहे हैं। लेकिन मानव की जिजीविषा है कि वह कैसी भी परिस्थितियों में स्वयं के जीवन को अपने पारंपरिक ज्ञान से अनुकूल बना लेता है। जैसे पहाड़ों पर उसने बदलते मौसम के साथ लगातार आ रही आपदाओं से अपना सब कुछ खो देने के बावजूद जीना कमोबेश सीख लिया है। इधर विश्व के वैज्ञानिक समुदाय ने पहाड़ के लोगों को ऐसी स्थितियों के अनुकूल बनाने और उनके नुकसान को बचाने के प्रति अपनी चिंता को कार्य रूप में परिणत करने की तैयारी कर ली है। कुमाऊं विवि के भूगोल विभाग को इन्हीं चिंताओं के समाधान के लिए अलग-अलग तीन अंतराष्ट्रीय परियोजनाओं का हिस्सा बनाया गया है, जो अपने निश्कर्षों से सीधे तौर पर आम जन के हाथ मजबूत करेंगे तथा केंद्र एवं राज्य सरकार के साथ मिलकर नीतिगत निर्णय भी लेंगे। पढ़ना जारी रखें “दुनिया भर के वैज्ञानिक मिलकर दुनिया के ‘तीसरे ध्रुव’ हिमालय पर जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाएंगे जीवन”

ग्लोबल वार्मिग की वजह से ही होती है बेमौसम व कम-ज्यादा बारिश


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आधुनिक विज्ञान से कहीं अधिक समृद्ध और प्रामाणिक था भारतीय ज्ञान


[untitled1.bmp]विज्ञान के वर्तमान दौर में आस्था व विश्वास को अंधविश्वास कहे जाने का चलन चल पड़ा है। आस्था और विज्ञान को एक दूसरे का बिल्कुल उलट-विरोधाभाषी कहा जा रहा है। यानी जो विज्ञान नहीं है, वैज्ञानिक नियमों और आज के वैज्ञानिक दौर के उपकरणों से संचालित नहीं है, जो मनुष्य की आंखों और वैज्ञानिक ज्ञान से प्राप्त बुद्धि-विवेक के अनुसार सही नहीं ठहरता, अंधविश्वास है। और आस्था का भी चूंकि वर्तमान ज्ञान-विज्ञान के अनुसार कोई आधार नहीं है, इसलिए वह भी अंधविश्वास ही है।

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दुनिया की ‘टीएमटी” में अपनी ‘टीएमटी” का ख्वाब भी बुन रहा है भारत



-30 मीटर की दूरबीन के निर्माण में महत्वपूर्ण सहयोगी है भारत
-इसके निर्माण के जरिए अपनी दूरबीन निर्माण की क्षमता बढ़ाना चाहता है देश
नवीन जोशी, नैनीताल। जी हां, दुनिया की दूसरे नंबर की सबसे बड़ी 30 मीटर (एक छोटे फुटबॉल स्टेडियम जितने बड़े) व्यास की दूरबीन-थर्टी मीटर टेलीस्कोप यानी टीएमटी के निर्माण में जुटे भारत के वैज्ञानिक इसके निर्माण के अनुभवों से अपनी 10 मीटर व्यास की दूरबीन (टेन मीटर टेलीस्कोप-टीएमटी) के लिए विशेषज्ञता जुटाने का ख्वाब भी बुन रहे हैं। बताया गया है कि केंद्र सरकार ने भारतीय वैज्ञानिकों के लिए 30 मीटर की दूरबीन में अपनी सहभागिता को मंजूरी ही इस शर्त के साथ दी है कि वह स्वयं में देश के लिए 10 मीटर की दूरबीन तैयार करने की विशेषज्ञता हासिल कर लें। इसके बाद भारतीय वैज्ञानिकों ने टीएमटी के निर्माण में अपने हिस्से के लिए ऐसे कार्य ही चुने, जिनकी उन्हें अपनी टीएमटी बनाने में जरूरत होगी, और अभी तक उसमें देश की क्षमता बहुत कमतर थी। पढ़ना जारी रखें “दुनिया की ‘टीएमटी” में अपनी ‘टीएमटी” का ख्वाब भी बुन रहा है भारत”