देवभूमि के कण-कण में ‘देवत्व’: विश्व हिंदी सम्मेलन के संयोजक व अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार डा. अशोक ओझा के हाथों हुआ विमोचन


Coverनैनीताल। अमेका में हिंदी के जरिये रोजगार के अवसर विषयक कार्यक्रम के दौरान विश्व हिंदी सम्मेलन के संयोजक, अमेरिकी सरकार समर्थित स्टारटॉक हिंदी कार्यक्रम के निदेशक व अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार डा. अशोक ओझा, उत्तराखंड मुक्त विवि के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के निदेशक डा. गोविंद सिंह, कुमाऊं विवि के कुलपति प्रो. एचएस धामी, कला संकायाध्यक्ष प्रो. भगवान सिंह बिष्ट व परिसर निदेशक प्रो. एसपीएस मेहता तथा पत्रकारिता एवं जन संचार विभाग के अध्यक्ष डा. गिरीश रंजन तिवारी आदि के हाथों पत्रकार नवीन जोशी की पुस्तक देवभूमि के कण-कण में देवत्व का विमोचन किया गया। लेखक नवीन जोशी ने बताया कि पुस्तक कुमाऊं -उत्तराखंड की भावी पीढि़यों और यहां आने वाले वाले सैलानियों को इस उम्मीद के साथ समर्पित है कि उन्हें इस पुस्तक के माध्यम से इस अंचल को समग्रता में समझने में मदद मिलेगी। पुस्तक तीन खंडों- देवभूमि उत्तराखंड व कुमाऊं के इतिहास, यहां के धार्मिक, आध्यात्मिक व पर्यटन महत्व के स्थलों तथा यहां के तीज-त्योहारों, लोक संस्कृति, लोक परंपराओं और विशिष्टताओं का वर्णन करती है। यह देवभूमि के खास तौर पर ‘देवत्व’ को एक अलग अंदाज में देखने का प्रयास है। उनका मानना है कि देवभूमि का देवत्व केवल देवताओं की धरती होने से नहीं, वरन इस बात से है कि यह भूमि पूरे देश को स्वच्छ हवा, पानी, जवानी व उर्वरा भूमि के साथ प्राकृतिक व आध्यात्मिक शांति के साथ और भी बहुत कुछ देती है, और वास्तव में देवता शब्द देता या दाता शब्दों का विस्तार है। पढ़ना जारी रखें “देवभूमि के कण-कण में ‘देवत्व’: विश्व हिंदी सम्मेलन के संयोजक व अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार डा. अशोक ओझा के हाथों हुआ विमोचन”

15 अगस्त को ‘स्वदेशी’ का नया विश्व कीर्तिमान बनाकर देश का ‘गौरव’ बढ़ाया नैनीताल के गौरव ने !


Gaurav Siddarth
बाइकर गौरव सिद्धार्थ बिष्ट का उत्साह बढ़ाने उन्हें बाइक पर पीछे बैठाकर चलते योगगुरु बाबा रामदेव।

-एक देश में सर्वाधिक बाइकिंग का अमेरिकी बाइकर डेनेल लिन का विश्व रिकॉर्ड तोड़ा

-आगे अप्रैल 2017 तक 1.2 लाख किमी का अजेय रिकॉर्ड बनाने की है योजना
-बाइक, ग्लब्स व सुरक्षा उपकरणों से लेकर जीपीएस व हाईवे पर स्थानों की पहचान के लिए मोबाइल ऐप सहित सबकुछ भारतीय प्रयोग कर ‘मेक इन इंडिया’ को भी दे रहे बढ़ावा
नवीन जोशी, नैनीताल। देश के खिलाड़ी आज जहां रियो ओलंपिक में विश्व के खिलाड़ियों से रिकॉर्डों के लिए जूझ रहे हैं, वहीं देश में 70वां स्वतंत्रता दिवस के मौके पर नैनीताल के गौरव सिद्धार्थ बिष्ट  एक विश्व रिकार्ड को तोड़कर देश का ‘गौरव’ बढ़ाया है। एक देश में एक यात्रा में सर्वाधिक दूरी तक मोटरसाइकिल चलाने का गिनीज बुक में दर्ज यह रिकार्ड अमेरिकी महिला बाइकर डेनेल लिन के नाम पर अमेरिका में 48,600 मील यानी 78,214.118 किमी चलने का था, जो उन्होंने 19 सितंबर 2014 से 29 अगस्त 2015 के बीच अमेरिका के सभी 48 राज्यों से गुजरकर बनाया था। गौरव ने इस रिकॉर्ड को स्वतंत्रता दिवस पर तोड़ दिया है, साथ ही यह  भी साफ़ कर दिया है कि वह रिकॉर्ड बनाकर थमने वाले नहीं हैं, वरन आगे उनका इरादा फरवरी 2017 तक 1.2लाख किमी चलकर अजेय रिकार्ड बनाने का भी है। पढ़ना जारी रखें “15 अगस्त को ‘स्वदेशी’ का नया विश्व कीर्तिमान बनाकर देश का ‘गौरव’ बढ़ाया नैनीताल के गौरव ने !”

हद है, राज्य बनने के बाद औसतन सवा फीसद ही बढ़े नैनीताल में विदेशी सैलानी


English Tourists (1)-पिछले पांच वर्षों में तो विदेशी सैलानियों की संख्या में हो गयी करीब 27 फीसद की कमी 

-कुल आने वाले सैलानियों में भी राज्य बनने के बाद औसतन सवा आठ फीसद की दर से ही बढ़त
नवीन जोशी, नैनीताल। जी हां, पर्यटन प्रदेश कहे जाने वाले उत्तराखंड प्रदेश में पर्यटन शहरों में सर्वप्रमुख सरोवरनगरी नैनीताल में भले सीजन में पर्यटकों की जितनी बढ़ी संख्या, भीड़-भाड़ दिखाई देती हो, पर पर्यटन विभाग के आंकड़े गवाह हैं कि प्रकृति के स्वर्ग कहे जाने वाले विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी में अपार संभावनाओं के बावजूद विदेशी सैलानियों की संख्या राज्य बनने के डेढ़ दशक में औसतन महज सवा फीसद (1.26 फीसद) की दर से ही बढ़ रही है। वहीं इधर तो हालात और भी बुरे हैं। पिछले पांच वर्षों में तो विदेशी सैलानियों की संख्या में करीब 27 फीसद की कमी हो गयी है। नगर में कुल आने वाले सैलानियों की बात भी करें तो राज्य बनने के बाद औसतन सवा आठ फीसद की दर से बढ़ रही है।

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माता भद्रकाली के मंदिर में महाकाली की जिह्वा सरीखे प्रस्तर खंड से गिरती गंगा की जल धारा

भद्रकालीः जहां वैष्णो देवी की तरह त्रि-पिंडी स्वरूप में साथ विराजती हैं माता सरस्वती, लक्ष्मी और महाकाली


माता भद्रकाली मंदिर
माता भद्रकाली मंदिर
माता भद्रकाली के मंदिर का गर्भगृह
माता भद्रकाली के मंदिर का गर्भगृह

ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते।।

कहते हैं आदि-अनादि काल में सृष्टि की रचना के समय आदि शक्ति ने त्रिदेवों-ब्रह्मा, विष्णु व महेश के साथ उनकी शक्तियों-सृष्टि का पालन व ज्ञान प्रदान करने वाली ब्रह्माणी यानी माता सरस्वती, पालन करने वाली वैष्णवी यानी माता लक्ष्मी और बुरी शक्तियों का संहार करने वाली शिवा यानी माता महाकाली का भी सृजन किया। सामान्यतया अलग-अलग स्थानों पर प्रतिष्ठित रहने वाली यह तीनों देवियां कम ही स्थानों पर एक स्थान पर तीनों के एकत्व स्वरूप् में विराजती हैं। ऐसा एक स्थान है माता का सर्वोच्च स्थान बताया जाने वाला वैष्णो देवी धाम। लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड राज्य के कुमाऊं अंचल में भी एक ऐसा ही दिव्य एवं अलौकिक विरला धाम मौजूद है, जहां माता सरस्वती, लक्ष्मी और महाकाली एक साथ एक स्थान पर वैष्णो देवी की तरह ही स्वयंभू लिंग या पिंडी स्वरूप में आदि-अनादि काल से एक साथ माता भद्रकाली के रूप में विराजती हैं, और सच्चे मन से आने वाले अपने भक्तों को साक्षात दर्शन देकर उनके कष्टों का हरती तथा जीवन पथ पर संबल प्रदान करती हैं। इस स्थान को माता के 51 शक्तिपीठों में से भी एक माना जाता है। शिव पुराण में आये माता भद्रकाली के उल्लेख के आधार पर श्रद्धालुओं का मानना है कि महादेव शिव द्वारा आकाश मार्ग से कैलाश की ओर ले जाये जाने के दौरान यहां दक्षकुमारी माता सती की मृत देह का दांया गुल्फ यानी घुटने से नीचे का हिस्सा गिरा था।

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पहाड़ पर कहीं से आ-जा नहीं रहे, यहीं के स्थायी निवासी हैं बाघ, संख्या हुई 400 पार


-कैमरे लगाने से हुई पुष्टि, कुमाऊं में बेहद समृद्ध है वन्य जीवन, व्यापक स्तर पर इनकी गणना किये जाने की जरूरत -कैमरा ट्रैप में तराई डिवीजन में भी मिले 30 से अधिक नये बाघ, इससे उत्साहित वनाधिकारी पहाड़ पर बाघों की संख्या की गणना किये जाने की जता रहे हैं जरूरत, स्थायी होने की वजह से डरने की जरूरत नहीं नवीन जोशी, नैनीताल। अब तक माना जाता रहा है कि देश के राष्ट्रीय पशु बाघ (रॉयल बंगाल टाइगर) पहाड़ पर नहीं होते, यह तराई के मूल निवासी हैं, और वहां से यहां चढ़ आते हैं। वन्य जीवों तथा प्रकृति-पर्यावरण प्रेमियों … पढ़ना जारी रखें पहाड़ पर कहीं से आ-जा नहीं रहे, यहीं के स्थायी निवासी हैं बाघ, संख्या हुई 400 पार

महेश खान: यानी प्रकृति और जैव विविधता की खान


maheshkhan Dak Banglowपहली नजर में दो हिंदू-मुस्लिम नामों का सम्मिश्रण लगने वाले महेश खान के नाम में ‘खान’ कोई जाति या धर्म सूचक शब्द नहीं है, लेकिन ‘खान’ शब्द को दूसरे अर्थों में प्रयोग करें तो यह स्थान प्रकृति के लिए भी प्रयोग किए जाने वाले महेश यानी शिव की धरती कहे जाने वाले कुमाऊं में वानस्पतिक एवं वन्य जीव-जंतुओं व पक्षियों की जैव विविधता की ‘खान’ ही है। वैसे शाब्दिक अर्थ की बात करें तो महेश खान के नाम में प्रयुक्त ‘खान’ शब्द का प्रयोग कुमाऊं में खासकर अंग्रेजी दौर के घोड़ा व पैदल मार्गों के पड़ावों के लिए होता है। नैनीताल के निकट बल्दियाखान, बेलुवाखान व अल्मोड़ा-झूलाघाट पैदल मार्ग पर पड़ने वाले चर्चाली खान और न्योली खान की तरह ही महेश खान काठगोदाम से मुक्तेश्वर होते हुए अल्मोड़ा जाने वाले पैदल मार्ग का एक पड़ाव रहा है।

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भगवान राम की नगरी के समीप माता सीता का वन ‘सीतावनी’


Pictures of Sitabani Imagesदेवभूमि कुमाऊं-उत्तराखंड में रामायण में सतयुग, द्वापर से लेकर त्रेता युग से जुड़े अनेकों स्थान मिलते हैं। इन्हीं में से एक है त्रेता युग में भगवान राम की धर्मपत्नी माता सीता के निर्वासन काल का आश्रय स्थल रहा वन क्षेत्र-सीतावनी, जो अपनी शांति, प्रकृति एवं पर्यावरण के साथ मनुष्य को गहरी आध्यात्मिकता के साथ मानो उसी त्रेता युग में लिए चलता है। नैनीताल जनपद में भगवान राम के नाम के नगर-रामनगर से करीब 20 किमी दूर घने वन क्षेत्र में जिम कार्बेट नेशनल पार्क के निकट मौजूद सीतावनी माता सीता, लव-कुश व महर्षि बाल्मीकि के मंदिरों, सीता व लव-कुश के प्राकृतिक जल-धारों के साथ ही सैकड़ों प्रजातियों के पक्षियों को देखने के लिए प्रसिद्ध है। इसलिए यहां जंगल सफारी के साथ ही पौराणिक महत्व के स्थल की आनंद दायक सैर को दोहरा आनंद लिया जा सकता है।
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पक्षी-तितली प्रेमियों का सर्वश्रेष्ठ गंतव्य है पवलगढ़ रिजर्व


Bird (4)उत्तराखंड का नैनीताल जनपद में रामनगर वन प्रभाग स्थित पवलगढ़ रिजर्व पक्षी प्रेमियों के लिए बेहतरीन गंतव्य है। दिल्ली से सड़क और रेल मार्ग से करीब 260 किमी तथा नजदीकी हवाई अड्डे पंतनगर से करीब 87 किमी दूर रामनगर के जिम कार्बेट नेशनल पार्क से कोसी नदी के दूसरी-पूर्वी छोर से सटा 5824 हैक्टेयर में फैला प्राकृतिक सौंदर्य और जैव विविधिता से लबरेज पवलगढ रिजर्व, पक्षियों को देखने यानी बर्ड वाचिंग के शौकीनों के लिए सर्वाधिक उपयुक्त स्थान है। यहां अब तक करीब 365 प्रजातियों के पक्षी देखे और पहचाने जा चुके हैं। साथ ही यहां मिलती करीब 83 तरह की तितलियां और 100 प्रकार के मॉथ यानी तितलियों की ही दूसरी प्रजातियां भी मिलती हैं।

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मुक्तेश्वर: जहां होते है प्रकृति के बीच ‘मुक्ति के ईश्वर’ के दर्शन


Chali ki Jali, Mukteshwar
Chali ki Jali, Mukteshwar

देवभूमि उत्तराखंड के नैनीताल जनपद में घने वनों के बीच प्रकृति की गोद में, सूर्यास्त के दौरान स्वर्णिम आभा से दमकते आकाश चूमते पर्वतों-हिमाच्छादित पर्वत चोटियों के स्वर्ग सरीखे रमणीक सुंदर प्राकृतिक दृश्यों के दर्शन कराने वाला एक ऐसा खूबसूरत स्थान है जहां प्रकृति के बीच साक्षात मुक्ति के ईश्वर यानी देवों के भी महादेव के दर्शन है। इस बरसात के मौसम में मुक्तेश्वर किसी भी प्रकृति प्रेमी और शांति की तलाश में पहाड़ों की सैर पर आने वाले सैलानी का अभीष्ट हो सकता है। आइए जानते हैं, ऐसा क्या है मुक्तेश्वर में कि यहां हजारों सैलानी वर्ष भर खिंचे चले आते हैं:-

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प्रकृति को संजोऐ एक वास्तविक हिल स्टेशन, रानी पद्मावती का खेत-रानीखेत


विकास की दौड़ में पीछे छूटती प्राकृतिक सुन्दरता व नैसर्गिक शांति यदि आज भी किसी पर्वतीय नगर में उसके मूल स्वरूप में देखनी और उसमें जीना है, तो यूरोपीय शैली युक्त बंगलों-भवनों के साथ किसी यूरोपीय नगर जैसा अनुभव देने वाला उत्तराखंड का रानीखेत पहली पसंद हो सकता है। 1869 में ब्रिटिश आर्मी के कैप्टन रॉबर्ट ट्रूप द्वारा आर्मी के लिए खोजे और बसाए गए इस बेहद रमणीक नगर का इतिहास हालांकि इससे कहीं पहले कुमाऊं के चंद राजवंश के राजा सुखदेव (कहीं सुधरदेव नाम भी अंकित है) की पत्नी रानी पद्मावती से जुड़ा है, जिनके नाम से इस स्थान की पहचान रानीखेत नाम से है।

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उत्तराखंड के निकायों में सफाई कर्मियों, पशु चिकित्साधिकारियों व शिक्षिकाओं सहित डेढ़ दर्जन पद समाप्त


-प्रति एक हजार की जनसंख्या पर आउटसोर्सिंग से अधिकतम दो पर्यावरण मित्र ही होंगे तैनात नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड सरकार ने प्रदेश के नगर निकायों के लिए बताए नए ढांचे में सफाई कर्मचारियों, पशु चिकित्सा अधिकारियों, सहायक अध्यापिका एवं लाइब्रेरियन सहित करीब डेढ़ दर्जन पद नामों को समाप्त कर दिया है। इनमें से सफाई कर्मचारियों का नाम परिवर्तित कर उन्हें पर्यावरण मित्र नाम देकर उनकी नियुक्ति केवल मृतक आश्रित कोटे से अथवा आउटसोर्सिंग से करने की नई व्यवस्था कर दी है, जबकि अन्य पद नामों को गैर जरूरी बताते हुए समाप्त कर दिया गया है। चतुर्थ श्रेणी के मृत संवर्ग … पढ़ना जारी रखें उत्तराखंड के निकायों में सफाई कर्मियों, पशु चिकित्साधिकारियों व शिक्षिकाओं सहित डेढ़ दर्जन पद समाप्त

नाथुला से कहीं अधिक है उत्तराखंड के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा का क्रेज


Rashtriya Sahara. 07.04.2015, Page-1

-निर्मूल साबित हुई नाथुला का मार्ग खुलने पर उत्तराखंड की चिंता
-उत्तराखंड के पौराणिक मार्ग से 1100 और सिक्किम के रास्ते जाने के लिए केवल 800 यात्रियों ने दी है पहली वरीयता
-सिक्किम की वरीयता वालों ने भी दिया है उत्तराखंड का विकल्प
-उत्तराखंड के रास्ते उपलब्ध सीटों से अधिक आ चुके हैं आवेदन
-10 अप्रैल तक उपलब्ध हैं ऑनलाइन आवेदन
नवीन जोशी, नैनीताल। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की मुलाकात के बाद केंद्र सरकार के द्वारा प्रतिष्ठित कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए सिक्किम के नाथुला दर्रे से नया मार्ग खोलने पर उत्तराखंड द्वारा व्यक्त की गई चिंता निर्मूल साबित हुई है। प्रदेश के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने स्वयं इस बारे में आशंका व्यक्त की थी, और केंद्र सरकार को भी अपनी चिंता से अवगत कराया था। किंतु इस यात्रा के लिए जिस तरह से आवेदन आ रहे हैं, और तीर्थ यात्री अभी भी नाथुला के अपेक्षाकृत सुगम व सुविधाजनक बताए जा रहे मार्ग की बजाय पुरातन व पौराणिक दुर्गम मार्ग को ही तरजीह दे रहे हैं, इसके बाद स्वयं सीएम रावत ने स्वीकारा है कि उनकी चिंता गैर वाजिब थी। अलबत्ता, उन्होंने जोड़ा कि चिंता गैरवाजिब ही सही किंतु राज्य हित में थी। पढ़ना जारी रखें “नाथुला से कहीं अधिक है उत्तराखंड के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा का क्रेज”

उत्तराखंड की सांस्कृतिक राजधानी-रत्नगर्भा अल्मोड़ा


Almora (2)चंद शासकों की राजधानी रहे अल्मोड़ा की मौजूदा पहचान निर्विवाद तौर पर उत्तराखंड की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में है। अपनी प्रसिद्ध बाल मिठाई, चॉकलेट व सिगौड़ी जैसी ही मिठास युक्त कुमाउनी रामलीला और कुमाऊं में बोली जाने वाली अनेक उपबोलियों के मानक व माध्य रूप-खसपर्जिया की यह धरती अपने लोगों की विद्वता के लिए भी विश्व विख्यात है। राजर्षि स्वामी विवेकानंद, विश्वकवि रविन्द्रनाथ टैगोर, नृत्य सम्राट उदय शंकर, सुप्रसिद्ध नृत्यांगना व अदाकारा जोहराबाई, घुमक्कड़ी के महापंडित राहुल सांकृत्यायन व गांधी वादी सरला बहन की प्रिय एवं सुप्रसिद्ध छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत से लेकर मनोहर श्याम जोशी, मृणाल पांडे, रमेश चंद्र साह व प्रसून जोशी जैसे कवि, लेखकों व साहित्यकारों तथा हर्ष देव जोशी, भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत, कुमाऊं केसरी बद्री दत्त पांडे, पूर्व राज्यपाल भैरव दत्त पांडे, विक्टर मोहन जोशी आदि की जन्म-कर्मभूमि अल्मोड़ा की धरती सही मायनों में रत्नगर्भा है। अपने किलों, मंदिरों, प्राकृतिक खूबसूरती, वर्ष भर रुमानी मौसम तथा तहजीब के लिए भी अल्मोड़ा की देश ही दुनिया में अलग पहचान है। बोली-भाषा के साथ ही कुमाऊं की मूल लोक संस्कृति, पहनावा, भोजन, रहन-सहन के साथ ही बदलते परिवेश के भी यहां वास्तविक स्वरूप में दर्शन होते हैं। पढ़ना जारी रखें “उत्तराखंड की सांस्कृतिक राजधानी-रत्नगर्भा अल्मोड़ा”

1.2 करोड़ वर्ष पुराना इतिहास संजोए, उच्च हिमालयी मिनी कश्मीर-सोर घाटी पिथौरागढ़


Pithoragarhउच्च हिमालयी हिमाच्छादित पंचाचूली पर्वत श्रृंखलाओं तथा कल-कल बहती सदानीरा काली-गोरी व रामगंगा जैसी नदियों के बीच प्राकृतिक जैव विविधता से परिपूर्ण उत्तराखंड के सीमान्त जनपद मुख्यालय पिथौरागढ़ की पहचान ‘सोर’ यानी सरोवरों की घाटी तथा ‘मिनी कश्मीर’ के रूप में भी है। भारतीय प्रायद्वीप एवं एशिया महाद्वीपीय भू-पट्टियों के बीच करीब 1.2 करोड़ वर्ष पूर्व हुए मिलन या टक्कर की गवाही स्वरूप आज भी तत्कालीन टेथिस सागर को अपने  नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व स्थित लेप्थल, लिलंग व गर्ब्यांग नाम के पर्वतीय गावों में “शालिग्राम” कहे जाने वाले और आश्चर्यजनक तौर पर मिलने वाले समुद्री जीवाश्मों को संभाले पिथौरागढ़ की ऐतिहासिक और विरासत महत्व की पहचान भी रही है। पांडु पुत्र नकुल के नाम पर मुख्यालय के चार किमी करीब मौजूद खजुराहो स्थापत्य शैली में बना नकुलेश्वर मंदिर महाभारत काल से इस स्थान के जुड़ाव की पुष्टि करता है। महान राजपूत शासक पृथ्वी राज चौहान से भी इसके नाम को जोड़ा जाता है। उत्तराखंड राज्य के राज्य पशु कस्तूरा के एकमात्र मृग विहार और अस्कोट वन्य जीव अभयारण्य भी यहां दर्शनीय हैं। पिथौरागढ़ ऐरो स्पोर्टस यानी पैराग्लाइडिंग जैसे हवा के तथा सरयू व रामगंगा नदियों में रिवर राफ्टिंग व मुन्स्यारी के कालामुनी व खलिया टॉप में स्कीइंग व हैंग ग्लाइडिंग जैसे साहसिक खेलों के लिए भी सर्वश्रेष्ठ गंतव्य है। पढ़ना जारी रखें “1.2 करोड़ वर्ष पुराना इतिहास संजोए, उच्च हिमालयी मिनी कश्मीर-सोर घाटी पिथौरागढ़”

चंपावत से मिला ‘कुमाऊं’ को अपना नाम और यह ही ‘कुमाऊं’ की मूल पहचान


Baleshwar Templeयूं चंपावत वर्तमान में कुमाऊं मंडल का एक जनपद और जनपद मुख्यालय है, लेकिन यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि कुमाऊं का मूल ‘काली कुमाऊं’ यानी चंपावत ही है। यही नहीं यहीं काली नदी के जलागम क्षेत्र में ‘कर्नतेश्वर पर्वत’ को भगवान विष्णु ने ‘कूर्म’ अवतार का जन्म स्थान माना जाता है, और इसी कारण ही ‘कुमाऊं’ को अपने दोनों नाम ‘कुमाऊं’ और ‘कूर्मांचल’ मिले हैं। लगभग 10वीं शताब्दी में स्थापित चंपावत की ऐतिहासिकता केवल यहीं तक सीमित नहीं, वरन यह भी सच है कि रामायण और महाभारत काल से भी चंपावत सीधे संबंधित रहा है। अल्मोड़ा आने से पूर्व चम्पावत आठवीं अठारहवीं शताब्दी तक कुमाऊं के चंद वंश के राजाओं की राजधानी रहा है, जहां से एक समय सम्पूर्ण पर्वतीय अंचल ही नहीं, अपितु मैदानों के कुछ भागों तक शासन किया जाता था। पढ़ना जारी रखें “चंपावत से मिला ‘कुमाऊं’ को अपना नाम और यह ही ‘कुमाऊं’ की मूल पहचान”