वन्य पशु-पक्षियों का सर्वश्रेष्ठ गंतव्य-नैनीताल, कुमाऊं

 

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गौरैया

Yello Bird

Green Pegeon (हरियल)

 

घुघुती न बासा….. पहाड़ के सर्वप्रिय पक्षी घुघूती के साथ ही पहाड़ के अन्य पक्षियों को देखने के लिए पक्षी प्रेमियों का पसंदीदा पड़ाव है नैनीताल

विश्व भर के पक्षियों का जैसे तीर्थ है नैनीताल

नवीन जोशी, नैनीताल। सरोवरनगरी नैनीताल की विश्व प्रसिद्ध पहचान पर्वतीय पर्यटन नगरी के रूप में ही की जाती है, इसकी स्थापना ही एक विदेशी सैलानी पीटर बैरन ने 18 नवम्बर 1841 में की थी, और तभी से यह  नगर देश-विदेश के सैलानियों का स्वर्ग है। लेकिन इससे इतर इस नगर की एक और पहचान विश्व भर में है, जिसे बहुधा कम ही लोग शायद जानते हों। इस पहचान के लिए नगर को न तो कहीं बताने की जरूरत है, और नहीं महंगे विज्ञापन करने की। दरअसल यह पहचान मानव नहीं वरन पक्षियों के बीच है। पक्षी विशेषज्ञ उत्तराखंड के अपर प्रमुख वन संरक्षक धनञ्जय मोहन के अनुसार दुनियां में 10,000 पक्षी प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से भारत में 1263 पक्षी प्रजातियां, और कुमाऊँ में 710 पक्षी प्रजातियां पाई जाती हैं। और कुमाऊँ में पाई जाने वाली पक्षी प्रजातियों में से 70-80 प्रतिशत नैनीताल में पाई जाती हैं। वहीँ अन्य विशेषज्ञों के अनुसार भी नैनीताल में 600 पक्षी प्रजातियां मिलती हैं। इनके अलावा भी प्रवासी पक्षियों या पर्यटन की भाषा में पक्षी सैलानियों की बात करें तो देश में कुल आने वाली 400 प्रवासी पक्षी प्रजातियों में से 200 से अधिक यहां आती हैं, जबकि 200 से अधिक पक्षी प्रजातियों का यहां प्राकृतिक आवास भी है। यही आकर्षण है कि देश दुनियां के पक्षी प्रेमी प्रति वर्ष बड़ी संख्या में केवल पक्षियों के दीदार को यहाँ पहुंचाते हैं. इस प्रकार नैनीताल को विश्व भर के पक्षियों का तीर्थ कहा जा सकता है।
  • देश की 1263 पक्षी प्रजातियों में से 600 हैं यहां
  • देश में आने वाली 400 प्रवासी प्रजातियों में से 200 से अधिक भी आती हैं यहां
  • स्थाई रूप से 200 प्रजातियों का प्राकृतिक आवास भी है नैनीताल
  • आखिरी बार ‘माउनटेन क्वेल’ को भी नैनीताल में ही देखा गया था 

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नैनीताल में पक्षियों की संख्या के बारे में यह दावे केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी पार्क भरतपुर राजस्थान के मशहूर पक्षी गाइड बच्चू सिंह ने किऐ हैं। वह गत दिनों ताईवान के लगभग 100 पक्षी प्रेमियों को जयपुर की संस्था इण्डिविजुअल एण्ड ग्रुप टूर्स के मनोज वर्धन के निर्देशन में यहाँ लाये थे. इस दौरान ताईवान के पक्षी प्रेमी जैसे ही यहाँ पहुंचे, उन्हें अपने देश की ग्रे हैरौन एवं चीन, मंगोलिया की शोवलर, पिनटेल, पोचर्ड, मलार्ड व गार्गनी टेल जैसी कुछ चिड़ियाऐं तो होटल परिसर के आसपास की पहाड़ियों पर ही जैसे उनके इन्तजार में ही बैठी हुई मिल गईं। उन्हें यहां रूफस सिबिया, बारटेल ट्री क्रीपर, चेसनेट टेल मिल्ला आदि भी मिलीं। मनोज वर्धन के अनुसार वह कई दशकों से यहाँ विदेशी दलों को पक्षी दिखाने ला रहे हैं. यहां मंगोली, बजून, पंगोट, सातताल व नैनीझील एवं कूड़ा खड्ड पक्षियों के जैसे तीर्थ ही हैं। उनका मानना है कि अगर देश-विदेश में नैनीताल का इस रूप में प्रचार किया जाऐ तो यहां अनंत संभावनायें हैं। अब गाइड बच्चू सिंह की बात करते हैं। वह बताते हैं जिम कार्बेट पार्क, तुमड़िया जलाशय, नानक सागर आदि का भी ऐसा आकर्षण है कि हर प्रवासी पक्षी अपने जीवन में एक बार यहां जरूर आता है।वह प्रवासी पक्षियों का रूट बताते हैं। गर्मियों में लगभग 20 प्रकार की बतखें, तीन प्रकार की क्रेन सहित सैकड़ों प्रजातियों के पक्षी साइबेरिया के कुनावात प्रान्त स्थित ओका नदी में प्रजनन करते हैं। यहां सितम्बर माह में सर्दी बढ़ने पर और बच्चों के उड़ने लायक हो जाने पर यह कजाकिस्तान-साइबेरिया की सीमा में कुछ दिन रुकते हैं और फिर उजबेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, अफगानिस्तान व पाकिस्तान होते हुए भारत आते हैं। इनमें से लगभग 600 पक्षी प्रजातियां लगभग एक से डेड़ माह की उड़ान के बाद भारत पहुंचती हैं, जिनमें से 200 से अधिक उत्तराखण्ड के पहाड़ों और खास तौर पर अक्टूबर से नवंबर अन्त तक नैनीताल पहुँच जाते हैं। इनके उपग्रह एवं ट्रांसमीटर की मदद से भी रूट परीक्षण किए गऐ हैं। 

इस प्रकार दुनियां की कुल साढ़े दस हजार पक्षी प्रजातियों में से देश में जो 1100 प्रजातियां भारत में हैं उनमें से 600 से अधिक प्रजातियां नैनीताल में पाई जाती हैं। यहां उन्हें अपनी आवश्यकतानुसार दलदली, रुके या चलते पानी और जंगल में अपने खाने योग्य कीड़े मकोड़े और अन्य खाद्य वनस्पतियां आसानी से मिल जाती हैं। 

नैनीताल जिले में पाए जाने वाली अन्य पक्षी

नैनीताल जिले में पाए जाने वाले पक्षियों में रेड बिल्ड ब्लू मैगपाई, रेड बिल्ड मैगपाई, किंगफिशर, नीले-गले और भूरे रंग के शिर वाले बारबेट, लिनेटेड बारबेट, क्रिमसन फ्रंटेड बारबेट, कॉपरस्मिथ बारबेट, प्लम हेडेड पाराकीट यानी कठफोड़वा, स्लेटी हेडेड पाराकीट, चेस्टनट बेलीड थ्रस, टिटमाउस, बाबलर्स, जंगल आवलेट, फिश ईगल, हिमालय कठफोड़वा, पाइड कठफोड़वा, ब्राउन कैप्ड वुडपीकर, ग्रे कैप्ड पिग्मी वुडपीकर, ब्राउन फ्रंटेड वुडपीकर, स्ट्राइप ब्रेस्टेड वुडपीकर, येलो क्राउन्ड वुडपीकर, रूफोस बेलीड वुडपीकर, क्रिमसन ब्रेस्टेड यानी लाल छाती वाला कठफोड़वा, हिमालयी कठफोड़वा, लेसर येलोनेप वुडपीकर, ग्रेटर येलोनेप वुडपीकर, स्ट्रेक थ्रोटेड वुडपीकर, ग्रे हेेडेड यानी भूरे शिर वाला कठफोड़वा, स्केली बेलीड वुडपीकर, कॉमन फ्लेमबैक वुडपीकर, लेडी गोल्ड सनबर्ड, क्रिमसन सनबर्ड, हिमालयन किंगफिशर, ब्राउन हेडेट स्टार्क बिल्ड किंगफिशर, स्टार्क बिल्ड किंगफिशर, पाइड किंगफिशर, कॉमन किंगफिशर, ब्लू इयर्ड किंगफिशर, ग्रीन-टेल्ड सनबर्ड, बैगनी सनबर्ड, मिसेज गॉल्ड सनबर्ड, काले गले वाली ब्लेक थ्रोटेड सनबर्ड, ब्लेक ब्रेस्टेड यानी काले छाती वाली सनबर्ड, फायर टेल्ड सनबर्ड, रसेट यानी लाल गौरैया, फिंच, माउंटेन हॉक ईगल, काले ईगल, सफेद पूंछ वाली नीडल टेल, काली बुलबुल, येलो थ्रोटेड यानी पीले गले वाली वार्बलर, लेमन रम्प्ड वार्बलर, एशी यानी राख जैसे गले वाली वार्बलर, आम गिद्ध, लॉफिंगथ्रश, इंडियन ट्री पाइज, ब्लू ह्विसलिंग थ्रस यानी चिड़िया, लैम्रेगियर, हिमालयन ग्रिफॉन, यूरेशियन ग्रिफॉन, क्रेस्टेड सेरपेंट ईगल, फ्लाई कैचर्स यानी तितलियां पकड़ने वाले, चीड़ फीजेंट्स, कलीज फीजेंट्स, कोकलास फीजेंट्स, डॉलर बर्ड, लीफ बर्ड्स, फ्लावर पीकर, थिक बिल्ड फ्लावरपीकर, प्लेन लीफ फ्लावरपीकर, फायर ब्रेस्टेड फ्लावरपीकर, ब्लेक हेडेड जे, यूरेशियन जे, स्केली ब्रेस्टेड रेन बाबलर, ब्लेक चिन्ड बाबलर, रुफोस बाबलर, ब्लेक कैप्ड सिबिया, ब्लू ह्विसलिंग थ्रस, ह्वाइट रम्प्ड नीडलटेल, ब्लेक हेडेड जे, ब्लेक लोर्ड, ब्लेक थ्रोटेड टिट्स यानी छोटी चिड़िया,रूफोस ब्रेस्टेड एसेंटर, ग्रे विंग्ड ब्लेक बर्ड यानी भूरे पंखों वाली काली चिड़िया, कॉमर बुजॉर्ड, पिंक ब्रावड रोजफिंच, कॉमर वुड पिजन, चेस्टनट टेल्ड मिन्ला,

‘माउंटेन क्वेल’

‘माउंटेन क्वेल’ यानि “काला तीतर” को केवल भारत में तथा आखिरी बार 1876 में नैनीताल की “शेर-का-डांडा” पहाडी में देखने के दावे किये जाते हैं। इस पक्षी को उस समय मेजर कास्वेथन नाम के अंग्रेज द्वारा मारे जाने की बात कही जाती है। इससे पूर्व 1865 में कैनथ मैकनन ने मसूरी के बुद्धराजा व बेकनाग के बीच में इसके एक जोड़े का शिकार किया था, जबकि 1867 में मसूरी के जेवपानी में कैप्टन हटन ने अपने घर के पास इसके आधा दर्जन जोड़े देखने का दावा किया था। आम तौर पर पहाड़ी बटेर कहे जाने माउंटेन क्वेल की गर्दन चकोर की सफेद रंग की गर्दन से इतर काली होती है। आम तौर पर जोड़े में दिखने वाले और घास के मैदानों में रहने वाले इस पक्षी का प्रिय भोजन घास के बीज बताए जाते हैं। कांग्रेस के संस्थापक व प्रसिद्ध पक्षी विशेषज्ञ एओ ह्यूम द्वारा  1885 में लिखे एक दस्तावेज के अनुसार विश्व में इसकी केवल 10 खालें ही उपलब्ध थीं, जिनमें से पांच खालें स्वयं ह्यूम के संग्रहलय में, दो खालें लार्ड डर्बिन के संग्रहालय में तथा एक-एक ब्रिटिश म्यूजियम व कर्नल टाइटलर के संग्रहालय में सुरक्षित रखी गई थीं। नैनीताल में मारी गई आखिरी माउंटेन क्वेल की खाल के बारे में कोई जानकारी नहीं है।

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4 responses to “वन्य पशु-पक्षियों का सर्वश्रेष्ठ गंतव्य-नैनीताल, कुमाऊं

  1. पिंगबैक: नैनीताल समग्र | नवीन जोशी समग्र·

  2. पिंगबैक: अनाम·

  3. पिंगबैक: अनाम·

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