देवभूमि के कण-कण में ‘देवत्व’: विश्व हिंदी सम्मेलन के संयोजक व अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार डा. अशोक ओझा के हाथों हुआ विमोचन


Coverनैनीताल। अमेका में हिंदी के जरिये रोजगार के अवसर विषयक कार्यक्रम के दौरान विश्व हिंदी सम्मेलन के संयोजक, अमेरिकी सरकार समर्थित स्टारटॉक हिंदी कार्यक्रम के निदेशक व अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार डा. अशोक ओझा, उत्तराखंड मुक्त विवि के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के निदेशक डा. गोविंद सिंह, कुमाऊं विवि के कुलपति प्रो. एचएस धामी, कला संकायाध्यक्ष प्रो. भगवान सिंह बिष्ट व परिसर निदेशक प्रो. एसपीएस मेहता तथा पत्रकारिता एवं जन संचार विभाग के अध्यक्ष डा. गिरीश रंजन तिवारी आदि के हाथों पत्रकार नवीन जोशी की पुस्तक देवभूमि के कण-कण में देवत्व का विमोचन किया गया। लेखक नवीन जोशी ने बताया कि पुस्तक कुमाऊं -उत्तराखंड की भावी पीढि़यों और यहां आने वाले वाले सैलानियों को इस उम्मीद के साथ समर्पित है कि उन्हें इस पुस्तक के माध्यम से इस अंचल को समग्रता में समझने में मदद मिलेगी। पुस्तक तीन खंडों- देवभूमि उत्तराखंड व कुमाऊं के इतिहास, यहां के धार्मिक, आध्यात्मिक व पर्यटन महत्व के स्थलों तथा यहां के तीज-त्योहारों, लोक संस्कृति, लोक परंपराओं और विशिष्टताओं का वर्णन करती है। यह देवभूमि के खास तौर पर ‘देवत्व’ को एक अलग अंदाज में देखने का प्रयास है। उनका मानना है कि देवभूमि का देवत्व केवल देवताओं की धरती होने से नहीं, वरन इस बात से है कि यह भूमि पूरे देश को स्वच्छ हवा, पानी, जवानी व उर्वरा भूमि के साथ प्राकृतिक व आध्यात्मिक शांति के साथ और भी बहुत कुछ देती है, और वास्तव में देवता शब्द देता या दाता शब्दों का विस्तार है। पढ़ना जारी रखें “देवभूमि के कण-कण में ‘देवत्व’: विश्व हिंदी सम्मेलन के संयोजक व अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार डा. अशोक ओझा के हाथों हुआ विमोचन”

इटली के ‘ऑर्डर ऑफ स्टार अवार्ड’ से सम्मानित होंगे नैनीताल के अनुपम


-भारत में कला एवं संस्कृति के संरक्षण के साथ ही देश-विदेश में तकनीक के आदान-प्रदान के लिये कला संरक्षकों को मिलेगी अमेरिकी भारतीय फेलोशिप

नवीन जोशी, नैनीताल। नैनीताल की कला एवं संस्कृति तथा प्राचीन पांडुलिपियों के संरक्षण के लिए समर्पित संस्था हिमालयन सोसायटी फॉर हेरिटेज एंड आर्ट कंजरवेशन (हिमसा) के प्रमुख अनुपम साह को अगले माह इटली में वहां के राष्ट्रपति सर्जियो मटरेल्ला के हाथों प्रतिष्ठित ‘ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ इटली’ अवार्ड प्रदान किया जाएगा।जानकारी के अनुसार 2011 तक ‘ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ इटेलियन सोलिडेरिटी’ अवार्ड कहा जाने वाला यह पुरस्कार इससे पूर्व केवल एक भारतीय, मशहूर शेफ एवं रेस्टोरेंटों की श्रृंखला की मालिक रितु डालमिया को वर्ष 2011 में प्राप्त हुआ था। इस प्रकार अनुपम यह पुरस्कार प्राप्त करने वाले दूसरे भारतीय होंगे।  

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आर्डर ऑफ़ स्टार ऑफ़ इटली अवार्ड

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आस्था के साथ ही सांस्कृतिक-ऐतिहासिक धरोहर भी हैं ‘जागर’


इस तरह 'जागर' के दौरान पारलौकिक शक्तियों के वसीभूत होकर झूमते हें 'डंगरिये'
इस तरह ‘जागर’ के दौरान पारलौकिक शक्तियों के वसीभूत होकर झूमते हें ‘डंगरिये’

कुमाऊं के जटिल भौगोलिक परिस्थितियों वाले दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में संगीत की मौखिक परम्पराओं के अनेक विशिष्ट रूप प्रचलित हैं। उत्तराखंड के इस अंचल की संस्कृति में बहुत गहरे तक बैठी प्रकृति यहां की लोक संस्कृति के अन्य अंगों की तरह यहां लोक गीतों में भी गहरी समाई हुई है। इन गीतों का मानव पर अद्भुत चमत्कारिक ईश्वरीय प्रभाव भी दिखाई देता है। ‘जागर’ गीत इसके प्रमाण हैं, जो मानव को इन कठिन परिस्थितियों में युग-युगों से परा और प्राकृतिक शक्तियों की कृपा के साथ आत्मिक संबल प्रदान करते आए हैं, और आज भी यह पल भर में मानव का न केवल झंकायमान कर देते हैं, वरन दुःख-तकलीफों, बीमारियांे की हर ओर से गहरी हताशा जैसी स्थितियों से बाहर भी निकाल लाते हैं। इसीलिए पुरानी पीढ़ियों के साथ ही संस्कृति के अन्य रूपों से दूर हो रही और प्रवास में रहने वाली आधुनिक विज्ञान पढ़ी-लिखी पीढ़ी के लोग भी इन्हें खारिज नहीं कर पाते हैं, और पारिवारिक अनुष्ठान के रूप में इसमें अब भी शामिल होते हैं। जागर के गीतों में लोक देवताओं का कथात्मक शैली में गुणगान करते हुए आह्वान किया जाता है, साथ ही इनमें कुमाऊं के सदियों पुराने प्राचीन इतिहास खासकर कत्यूरी शासकों का जिक्र भी आता है, इस प्रकार यह कुमाऊं के इतिहास के मौखिक परंपरा के प्रमाण भी साबित होते हैं, और इस तरह यह ऐतिहासिक धरोहर भी हैं।

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कुमाऊं में परंपरागत ‘जन्यो-पुन्यू’ के रूप में मनाया जाता है रक्षाबंधन


वैश्वीकरण के दौर में लोक पर्व भी अपना मूल स्वरूप खोकर अपने से अन्य बड़े त्योहार में स्वयं को विलीन करते जा रहे हैं। उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के पर्वतीय क्षेत्रों का सबसे पवित्र त्यौहार माना जाने वाला ‘जन्यो पुन्यू’ यानी जनेऊ पूर्णिमा और देवीधूरा सहित कुछ स्थानों पर ‘रक्षा पून्यू’ के रूप में मनाया जाने वाला लोक पर्व रक्षाबंधन के त्योहार में समाहित हो गया है। श्रावणी पूर्णिमा के दिन मनाए जाने इस त्योहार पर परंपरागत तौर पर उत्तराखंड में पंडित-पुरोहित अपने यजमानों को अपने हाथों से बनाई गई जनेऊ (यज्ञोपवीत) का वितरण आवश्यक रूप से नियमपूर्वक करते थे, जिसे इस पर्व के दिन सुबह स्नान-ध्यान के बाद यजमानों के द्वारा गायत्री मंत्र के साथ धारण किया जाता था। इस प्रकार यह लोक-पर्व भाई-बहन से अधिक यजमानों की रक्षा का लोक पर्व रहा है। इस दिन देवीधूरा में प्रसिद्ध बग्वाल का आयोजन होता है। साथ ही अनेक स्थानों पर बटुकों के सामूहिक यज्ञोपवीत धारण कराने के उपनयन संस्कार भी कराए जाते हैं। इस दौरान भद्रा काल का विशेष ध्यान रखा जाता है। भद्रा काल में रक्षाबंधन, यज्ञोपवीत धारण एवं रक्षा धागे-मौली बांधना वर्जित रहता है।

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गौरा-महेश को बेटी-जवांई के रूप में विवाह-बंधन में बांधने का पर्व: सातूं-आठूं (गंवरा या गमरा)


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गौरा से यहां की पर्वत पुत्रियों ने बेटी का रिश्ता बना लिया हैं, तो देवों के देव जगत्पिता महादेव का उनसे विवाह कराकर वह उनसे जवांई यानी दामाद का रिश्ता बना लेती हैं। यहां बकायदा वर्षाकालीन भाद्रपद मास में अमुक्ताभरण सप्तमी को सातूं, और दूर्बाष्टमी को आठूं का लोकपर्व मना कर (गंवरा या गमरा) गौरा-पार्वती और महेश (भगवान शिव) के विवाह की रस्में निभाई जाती हैं, और बेटी व दामाद के रूप में उनकी पूजा-अर्चना भी की जाती है। इस मौके पर बिरुड़े कहे जाने वाले भीगे चने व अन्य दालों के प्रसाद के साथ बिरुड़ाष्टमी भी मनाई जाती है।

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प्रकृति को संजोऐ एक वास्तविक हिल स्टेशन, रानी पद्मावती का खेत-रानीखेत


विकास की दौड़ में पीछे छूटती प्राकृतिक सुन्दरता व नैसर्गिक शांति यदि आज भी किसी पर्वतीय नगर में उसके मूल स्वरूप में देखनी और उसमें जीना है, तो यूरोपीय शैली युक्त बंगलों-भवनों के साथ किसी यूरोपीय नगर जैसा अनुभव देने वाला उत्तराखंड का रानीखेत पहली पसंद हो सकता है। 1869 में ब्रिटिश आर्मी के कैप्टन रॉबर्ट ट्रूप द्वारा आर्मी के लिए खोजे और बसाए गए इस बेहद रमणीक नगर का इतिहास हालांकि इससे कहीं पहले कुमाऊं के चंद राजवंश के राजा सुखदेव (कहीं सुधरदेव नाम भी अंकित है) की पत्नी रानी पद्मावती से जुड़ा है, जिनके नाम से इस स्थान की पहचान रानीखेत नाम से है।

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चार हजार वर्ष पुराना हड़प्पा कालीन है उत्तराखंड राज्य का इतिहास


नवीन जोशी, नैनीताल । उत्तराखंड राज्य के प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो.राम सिंह के अनुसार उत्तराखंड का इतिहास चार हजार वर्ष पुराना है। उन्होंने बताया कि ईसा से डेढ़ से दो हजार वर्ष पूर्व की हड़प्पा कालीन संस्कृति के भग्नावशेष प्रदेश के पिथौरागढ़ जिले के बनकोट व नैनी पातल क्षेत्रों में मिली ताम्र मानवाकृतियों के रूप में प्राप्त हुए हैं। प्रो. सिंह के अनुसार हड़प्पा काल में यहां के लोग कबीलों में रहते थे। क्षेत्र में सर्वप्रथम राज सत्ता के प्रमाण ईसा पूर्व पांचवी से दूसरी शताब्दी के सिक्कों से पता चलते हैं। इनसे पुष्ट होता है कि यहां सबसे पहले कुणिंद वंश के राजाओं ने शासन किया। पढ़ना जारी रखें “चार हजार वर्ष पुराना हड़प्पा कालीन है उत्तराखंड राज्य का इतिहास”

अब पहाड़ पर सैलानी ले सकेंगे गोवा की तरह खुले में नहाने का आनंद


मदकोट में बनेगा देश का पहला गंधक के पानी का ‘तप्त स्विमिंग पूल’

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मदकोट में गंधक के पानी का ‘तप्त स्विमिंग पूल’

-गोरी नदी में बहता है गंधक का पानी, जो शरीर को गोरा करने के साथ ही त्वचा रोगों के लिए भी बहुत लाभदायक है
-पिथौरागढ़ जिले के मदकोट में केएमवीएन कर रहा निर्माण, निगम के टीआरएच के बिल्कुल करीब बहती गोरी नदी में है गंधक का बड़ा प्राकृतिक जल श्रोत
नवीन जोशी, नैनीताल। सामान्यतया पहाड़ पर लोग नहाने और खासकर खुले में नहाने में ठंड की वजह से डर जाते हैं, लेकिन कुमाऊं मंडल यहां पिथौरागढ़ जिले के सुदूरवर्ती प्राकृतिक सुषमा के बीच गोरी नदी के किनारे गोवा की तरह खुले में न केवल प्राकृतिक तौर पर गर्म पानी से नहा पाएंगे, वरन यहां नहाने से उनका शरीर नदी के नाम की तरह गोरा भी होगा और त्वचा रोगों से मुक्ति भी मिलेगी। पढ़ना जारी रखें “अब पहाड़ पर सैलानी ले सकेंगे गोवा की तरह खुले में नहाने का आनंद”

उत्तराखंड से 1.5 और सिक्किम से 1.7 लाख में होगी कैलाश मानसरोवर यात्रा


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कैलाश पर्वत
  • -उत्तराखंड से 1080 और सिक्किम से 250 यात्री जा पाएंगे यात्रा पर
  • -उत्तराखंड के पौराणिक मार्ग से 25 तो सिक्किम से 23 दिनों में पूरी होगी यात्रा
  • -उत्तराखंड के रास्ते पहला बैच 12 जून को और सिक्किम के रास्ते 18 जून को दिल्ली से रवाना होंगे पहले दल
  • -उत्तराखंड के रास्ते नौ सितंबर तक 60 यात्रियों के 18 दल और सिक्किम के रास्ते 22 अगस्त तक 50 यात्रियों के पांच दल पूरी कर लेंगे यात्रा
  • -10 अप्रैल तक कर सकते हैं ऑनलाइन आवेदन

नवीन जोशी, नैनीताल। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने बृहस्पतिवार को कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए कार्यक्रम जारी कर स्थिति स्पष्ट कर दी है। इससे पहली बार उत्तराखंड के पांडवों द्वारा भी प्रयुक्त पौराणिक लिपुपास दर्रे के साथ ही सिक्किम के नाथुला दर्रे से होने जा रही यात्रा से संबंधित सभी किंतु-परंतु और संशयों से परदा उठ गया है। इसके साथ ही दोनों मार्गों से प्रस्तावित यात्रा का अंतर भी साफ हो गया है। यात्रा के लिए 10 अप्रैल से पूर्व ऑनलाइन माध्यम से विदेश मंत्रालय की वेबसाइट-केएमवाई डॉट जीओवी डॉट इन पर आवेदन किए जा सकते हैं। पढ़ना जारी रखें “उत्तराखंड से 1.5 और सिक्किम से 1.7 लाख में होगी कैलाश मानसरोवर यात्रा”

1.2 करोड़ वर्ष पुराना इतिहास संजोए, उच्च हिमालयी मिनी कश्मीर-सोर घाटी पिथौरागढ़


Pithoragarhउच्च हिमालयी हिमाच्छादित पंचाचूली पर्वत श्रृंखलाओं तथा कल-कल बहती सदानीरा काली-गोरी व रामगंगा जैसी नदियों के बीच प्राकृतिक जैव विविधता से परिपूर्ण उत्तराखंड के सीमान्त जनपद मुख्यालय पिथौरागढ़ की पहचान ‘सोर’ यानी सरोवरों की घाटी तथा ‘मिनी कश्मीर’ के रूप में भी है। भारतीय प्रायद्वीप एवं एशिया महाद्वीपीय भू-पट्टियों के बीच करीब 1.2 करोड़ वर्ष पूर्व हुए मिलन या टक्कर की गवाही स्वरूप आज भी तत्कालीन टेथिस सागर को अपने  नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व स्थित लेप्थल, लिलंग व गर्ब्यांग नाम के पर्वतीय गावों में “शालिग्राम” कहे जाने वाले और आश्चर्यजनक तौर पर मिलने वाले समुद्री जीवाश्मों को संभाले पिथौरागढ़ की ऐतिहासिक और विरासत महत्व की पहचान भी रही है। पांडु पुत्र नकुल के नाम पर मुख्यालय के चार किमी करीब मौजूद खजुराहो स्थापत्य शैली में बना नकुलेश्वर मंदिर महाभारत काल से इस स्थान के जुड़ाव की पुष्टि करता है। महान राजपूत शासक पृथ्वी राज चौहान से भी इसके नाम को जोड़ा जाता है। उत्तराखंड राज्य के राज्य पशु कस्तूरा के एकमात्र मृग विहार और अस्कोट वन्य जीव अभयारण्य भी यहां दर्शनीय हैं। पिथौरागढ़ ऐरो स्पोर्टस यानी पैराग्लाइडिंग जैसे हवा के तथा सरयू व रामगंगा नदियों में रिवर राफ्टिंग व मुन्स्यारी के कालामुनी व खलिया टॉप में स्कीइंग व हैंग ग्लाइडिंग जैसे साहसिक खेलों के लिए भी सर्वश्रेष्ठ गंतव्य है। पढ़ना जारी रखें “1.2 करोड़ वर्ष पुराना इतिहास संजोए, उच्च हिमालयी मिनी कश्मीर-सोर घाटी पिथौरागढ़”

चंपावत से मिला ‘कुमाऊं’ को अपना नाम और यह ही ‘कुमाऊं’ की मूल पहचान


Baleshwar Templeयूं चंपावत वर्तमान में कुमाऊं मंडल का एक जनपद और जनपद मुख्यालय है, लेकिन यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि कुमाऊं का मूल ‘काली कुमाऊं’ यानी चंपावत ही है। यही नहीं यहीं काली नदी के जलागम क्षेत्र में ‘कर्नतेश्वर पर्वत’ को भगवान विष्णु ने ‘कूर्म’ अवतार का जन्म स्थान माना जाता है, और इसी कारण ही ‘कुमाऊं’ को अपने दोनों नाम ‘कुमाऊं’ और ‘कूर्मांचल’ मिले हैं। लगभग 10वीं शताब्दी में स्थापित चंपावत की ऐतिहासिकता केवल यहीं तक सीमित नहीं, वरन यह भी सच है कि रामायण और महाभारत काल से भी चंपावत सीधे संबंधित रहा है। अल्मोड़ा आने से पूर्व चम्पावत आठवीं अठारहवीं शताब्दी तक कुमाऊं के चंद वंश के राजाओं की राजधानी रहा है, जहां से एक समय सम्पूर्ण पर्वतीय अंचल ही नहीं, अपितु मैदानों के कुछ भागों तक शासन किया जाता था। पढ़ना जारी रखें “चंपावत से मिला ‘कुमाऊं’ को अपना नाम और यह ही ‘कुमाऊं’ की मूल पहचान”

पंचाचूली की गोद में ‘सात संसार-एक मुनस्यार’


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नवीन जोशी नैनीताल । देवभूमि कुमाऊं में एक स्थान ऐसा भी है, जिसके बारे में कोई कहता है-‘सार संसार-एक मुनस्यार’, और कोई ‘सात संसार-एक मुनस्यार’ तो कोई ‘आध संसार-एक मुनस्यार’। लेकिन इन तीनों कहावतों का मूलतः एक ही अर्थ है सारे अथवा सारे अथवा आधे अथवा सात महाद्वीपों युक्त संसार एक ओर और मुन्स्यारी एक ओर। यानी आप पूरी दुनियां देख लें, लेकिन यदि आपने मुन्स्यारी नहीं देखा तो फिर पूरी दुनिया भी नहीं देखी। मुनस्यारी में कुदरत अपने आंचल में तमाम खूबसूरत नजारों के साथ अमूल्य पेड़-पौधे व तमाम जड़ी-बूटियों को छुपाए हुए बताती है कि वह उस पर खासतौर पर मेहरबान है। देशी-विदेशी सैलानियों को बेहद पसंद समुद्र सतह से 2,200 मीटर की ऊंचाई पर बसा मुन्स्यारी देवभूमि उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के सीमांत पिथौरागढ़ जिले में तिब्बत और नेपाल सीमा से लगा हुआ एक छोटा का कस्बा है, किंतु इसकी पूरी खूबसूरती इसके सामने खड़ी हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाओं और नजदीकी खूबसूरत प्राकृतिक स्थलों और यहां की सांस्कृतिक खूबसूरती में निहित है। खासकर सामने की विस्मयकारी हिमालय की पांच चोटियांे वाली पंचाचूली पर्वतमाला, जिसे कोई पांच पांडवों के स्वर्गारोहण करने के दौरान प्रयोग की गई पांच चूलियां या रसोइयां कहते हैं तो कोई साक्षात हिमालय पर रहने वाले पंचमुखी देवाधिदेव महादेव। कहते हैं पांडवों ने स्वर्ग की ओर बढ़ने से पहले यहीं आखिरी बार खाना बनाया था।  पढ़ना जारी रखें “पंचाचूली की गोद में ‘सात संसार-एक मुनस्यार’”

कुमाउनी ऐपण: शक, हूण सभ्यताओं के साथ ही तिब्बत, महाराष्ट्र, राजस्थान व बिहार की लोक चित्रकारी की भी मिलती है झलक


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नवीन जोशी, नैनीताल। लोक कलाएं संबंधित क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर होने के साथ ही उस संस्कृति के उद्भव और विकास की प्रत्यक्षदर्शी भी होती हैं। उनकी विकास यात्रा में आने-जाने वाली अन्य संस्कृतियों के प्रभाव भी उनमें समाहित होती हैं इसलिए वह अपनी विकास यात्रा की एतिहासिक दस्तावेज भी होती हैं। कुमाऊं के लोकशिल्प के रूप में ऐपण तथा पट्टालेखन का भी ऐसा ही विराट इतिहास है, जिसमें करीब चार हजार वर्ष पुरानी शक व हूण जैसी प्राचीन सभ्यताओं के साथ ही तिब्बत, महाराष्ट्र, राजस्थान व बिहार की लोक चित्रकारी की झलक भी मिलती है। पढ़ना जारी रखें “कुमाउनी ऐपण: शक, हूण सभ्यताओं के साथ ही तिब्बत, महाराष्ट्र, राजस्थान व बिहार की लोक चित्रकारी की भी मिलती है झलक”

बेमौसम के कफुवा, प्योंली संग मुस्काया शरद, बसंत शंशय में


Buransh2भवाली के निकट श्याम खेत के जंगलों में खिला बसंत ऋतु का प्रतीक राज्य वृक्ष बुरांश, आगे बसंत रह सकता है फूलों के बिना

नवीन जोशी, नैनीताल। ‘…वारा डाना, पारा डाना, कफुवा फुली रै, मैं कैहुं टिपूं फूला मेरि हंसि रिसै रै” पहाड़ी जंगलों में पशु चारण करते हुऐ यह गीत गाते ग्वाल बालों द्वारा आम तौर पर बसंत के मौसम में फूलदेई (पहाड़ का एक त्योहार) के करीब गाया जाने वाला यह गीत प्रतीक होता है कि कफुवा यानी राज्य वृक्ष बुरांश खिलकर ऋतुराज वसंत के आने का संदेश दे रहा है। Pyonliफूलदेई पर नन्हे बच्चों द्वारा गांवों में द्वार पूजा के दौरान बुरांश के साथ साथ इसी दौरान खिलने वाले दूसरे नन्हे प्यारे पीले रंग के ‘प्योंली’ (गढ़वाल में फ्योंली शब्द प्रयोग किया जाता है) भी प्रयोग किये जाते हैं। लेकिन इधर सरोवरनगरी के पास बुरांश और प्योंली के फूल जनवरी के पहले पखवाड़े यानी बसंत ऋतु में ही खिल आए हैं। इससे पर्यावरण प्रेमी चिंतित हैं कि समय से पूर्व इन फूलों का खिलना किसी खतरे अथवा बड़े मौसमी परिवर्तन का संकेत तो नहीं, जबकि बच्चे भी चिंताग्रस्त हैं कि कहीं फूलदेई पर, जब उन्हें इन फूलों की जरूरत होगी, तब उन्हें यह प्राप्त होंगे या नहीं। वनस्पति विज्ञानी भी इस बारे में शंशय में हैं। पढ़ना जारी रखें “बेमौसम के कफुवा, प्योंली संग मुस्काया शरद, बसंत शंशय में”

::युवा दिवस 12 जनवरी, 152वीं जयंती पर पर विशेष: नैनीताल से ही नरेंद्र बना था शिकागो का राजर्षि विवेकानंद


Kakadighat
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-नैनीताल जनपद के काकड़ीघाट में ‘बोधि वृक्ष’ सरीखे पीपल का पेड़ के नीचे स्वामी विवेकानंद को हुऐ थे अणु में ब्रह्मांड के दर्शन -स्वामी विवेकानंद व देवभूमि का संबंध तीन चरणों, यानी उनके नरेंद्र होने से लेकर स्वामी विवेकानंद और फिर राजर्षि विवेकानंद बनने तक का था

नवीन जोशी, नैनीताल। उस दौर में सपेरों के देश माने जाने वाले भारत को दुनिया के समक्ष आध्यात्मिक गुरु के रूप में प्रवर्तित करने वाले युगदृष्टा राजर्षि विवेकानंद को आध्यात्मिक ज्ञान नैनीताल जनपद के काकड़ीघाट नाम के स्थान पर प्राप्त हुआ था। यानी सही मायनों में बालक नरेंद्र के राजर्षि विवेकानंद बनने की यात्रा देवभूमि के इसी स्थान से प्रारंभ हुई थी, और काकड़ीघाट ही उनका ‘बोध गया’ था। यहीं उनके अवचेतन शरीर में अजीब सी सिंहरन हुई, और वह वहीं ‘बोधि वृक्ष’ सरीखे पीपल का पेड़ के नीचे ध्यान लगा कर बैठ गऐ। इस बात का जिक्र करते हुऐ बाद में स्वामी जी ने कहा था, यहां (काकड़ीघाट) में उन्हें पूरे ब्रह्मांड के एक अणु में दर्शन हुऐ। यही वह ज्ञान था जिसे 11 सितंबर 1893 को शिकागो में आयोजित धर्म संसद में स्वामी जी ने पूरी दुनिया के समक्ष रखकर विश्व को चमत्कृत करते हुए देश का मानवर्धन किया। सम्भवतः स्वामी जी को अपने मंत्र ‘उत्तिष्ठ जागृत प्राप्यवरान्निबोधत्’ के प्रथम शब्द ‘उत्तिष्ठ’ की प्रेरणा भी अल्मोड़ा में ही मिली थी। उन्होंने हिन्दी में अपना पहला भाषण राजकीय इण्टर कालेज अल्मोड़ा में दिया था।  पढ़ना जारी रखें “::युवा दिवस 12 जनवरी, 152वीं जयंती पर पर विशेष: नैनीताल से ही नरेंद्र बना था शिकागो का राजर्षि विवेकानंद”