श्री नंदादेवी राजजात से कुमाऊं गढ़वाल दोनों के राज परिवार संतुष्ट नहीं


नवीन जोशी, नैनीताल। माता नंदा देवी उत्तराखंड राज्य के दोनों अंचलों-कुमाऊं व गढ़वाल में समान रूप से पूज्य एवं दोनों अंचलों को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में पिरोने वाली देवी हैं, और उनकी कमोबेश हर 12 वर्ष में आयोजित होने वाला और विश्व का अनूठा हिमालयी सचल महाकुंभ कही जाने वाली श्री नंदा देवी राजजात यात्रा मूलतः यहां के दोनों राजाओं की यात्रा है। अंग्रेजी शासनकाल में अंग्रेजों के साथ ही आजादी के बाद यूपी के दौर में यूपी सरकार ने कभी इसके आयोजन में हस्तक्षेप नहीं किया, और राजाओं के वंशजों को ही यात्रा कराने दी। लेकिन उत्तराखंड बनने के बाद पहली बार और पिछले वर्ष आई आपदा के कारण टलने के बाद 14 वर्षों के बाद हो रही यात्रा को प्रदेश सरकार ने अपने हाथ में लिया है। यात्रा पर सरकार करीब एक करोड़ रुपए खर्च कर रही है, लेकिन सरकार द्वारा इसके आयोजन को हाथ में लिए जाने से यात्रा राजाओं के वंशजों और उनकी प्रजा तथा पारंपरिक व धार्मिक स्वरूप की कम सरकारी स्वरूप की और सरकार द्वारा खर्ची जा रही करीब एक करोड़ रुपए को खपाने-कमाने की जुगत अधिक नजर आने लगी है। इससे दोनों राजाओं के वंशज भी संतुष्ट नहीं हैं।
उल्लेखनीय है कि माता नंदा कुमाऊं के चंदवंशीय शासकों की कुल देवी कही जाती हैं, जबकि गढ़वाल के राजा सम्वत् 745 में राजा कनकपाल के जमाने से माता नंदा की बेटी के स्वरूप में मायके से ससुराल भेजने के स्वरूप में इस यात्रा का आयोजन करते हैं, और इसीलिए इस यात्रा को नंदा राज जात यानी राजा की यात्रा और विश्व की सबसे पुरानी यात्रा कहा जाता है। 280 किलोमीटर लंबी इस यात्रा के दौरान 5333 मीटर ऊंची ज्यूंरागली चोटी को भी पार किया जाता है, लिहाजा यह कैलास मानसरोवर यात्रा की तरह दुनिया की सबसे कठिनतम यात्रा भी होती है। इस वर्ष यह यात्रा प्रदेश सरकार की अगुवाई में 18 अगस्त से 6 सितम्बर के मध्य आयोजित होने जा रही है। इधर नैनीताल में यात्रा की तैयारियों के लिए आयोजित हुई बैठक के बीच जहां कुमाऊं की राजजात समिति के अध्यक्ष शिरीष पांडे ने कहा भी कि यह यात्रा मूलतः कुमाऊं व गढ़वाल के राजाओं की यात्रा हैं, लिहाजा उन्हीं के सानिध्य मंे यात्रा आयोजित की जानी चाहिए। साफ था कि वह एक तरह से कुमाऊं के राजा पूर्व सांसद केसी सिंह बाबा का पक्ष ही रख रहे थे। उनका कहना था कि अंग्रेजी शासनकाल में अंग्रेजों के साथ ही आजादी के बाद यूपी के दौर में सरकार ने कभी इसके आयोजन में हस्तक्षेप नहीं किया। जबकि उत्तराखंड सरकार द्वारा इसके आयोजन में आगे आने से इसके स्वरूप पर फर्क पड़ सकता है। हालांकि राजजात यात्रा की अनुश्रवण समिति समिति के अध्यक्ष विधानसभा के उपाध्यक्ष डा. अनुसूइया प्रसाद मैखुरी अपने संबोधन में कहते रहे कि यात्रा कुमाऊं व गढ़वाल दोनों राजाओं के वंशजों निर्देशन में ही हो रही है, और सरकार की भूमिका केवल सहयोग करने की है लेकिन बैठक में अधिकांश लोगों का ध्यान सरकार द्वारा खर्च किए जाने वाले एक करोड़ रुपयों से ज्यादा से ज्यादा हासिल कर लेने पर ही दिखा। अन्य लोग मान रहे थे जहां पैंसा आ जाता है, वहां धार्मिक भावना व श्रद्धा भी प्रभावित हो जाती है। पूछे जाने पर गढ़वाल के राजा एवं गढ़वाल की राजजात यात्रा समिति के अध्यक्ष कुंवर डा. राकेश सिहं ने बैठक में उपस्थित विधायकों की ओर इशारा करते हुए कहा, अब तो ये ही राजा हैं। यानी साफ था कि वे यात्रा की तैयारियों एवं राजाओं को मिली भूमिका से खुश नहीं हैं। वहीं कुमाऊं के चंद वंशीय राजाओं के वंशज पूर्व सांसद बाबा ने भी साफ तौर पर कहा, जितना हो रहा है व काफी नहीं है। सरकार से और सुविधाओं की दरकार है। ऐसे में लगता है कि प्रदेश सरकार ने यात्रा को धार्मिक व पारंपरिक स्वरूप से बाहर निकालकर इसे सरकार में शामिल व अन्य चुनिंदा लोगों के लिए अपनी ओर से ‘आर्थिक आर्शीवाद’ प्रदान करने का माध्यम बना लिया है। अब लोग यात्रा से अब तक के स्वतः स्फूर्त धार्मिक भावना व श्रद्धा के जरिए अपना ‘परलोक’ सुधारने के बजाए तात्कालिक तौर पर ‘इहलोक’ सुधारने के प्रति ही प्रेरित होते जा रहे हैं।

कुमाऊं का राजजात में प्रतिनिधित्व
नैनीताल। श्री नंदा देवी राजजात में इस वर्ष कुमाऊं मंडल का प्रतिनिधित्व कमोबेश सीमित रहा है। इससे पूर्व वर्ष 2000 की यात्रा में भी कुमाऊं की नंदा डोलियों व छंतोलियों ने नंदा देवी राजजात में प्रतिनिधित्व किया था। कुमाऊं मंडल की आयोजन समिति के अध्यक्ष शिरीष पांडे ने बताया कि कुमाऊं को 1925 के बाद लंबे समय के बाद 1987 की श्री नंदा देवी राजजात में में शामिल होने का न्यौता मिला था, लेकिन तब कुमाऊं की ओर से अपेक्षित तैयारी नीं हो पाई थी। हालांकि उन्होंने बताया कि चंद वंशीय शासक बाज बहादुर चंद (1638-78 ई.) के दौर में भी कुमाऊं से राजजात यात्रा की छंतोली (नंदा का छत्र) भेेजे जाने के प्रमाण मिलते हैं।

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