देश को आपस में जोड़ेगा और अपनेपन का भाव भी जगाएगा ‘स्वच्छ भारत अभियान”


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नवीन जोशी, नैनीताल। देश में गंदगी-भ्रष्टाचार, कालाबाजारी, सरकारी लूट-खसोट जैसे अनेक प्रकारों की ही नहीं खासकर कूड़े की, कितनी बड़ी समस्या बन गई है इसे समझने के लिए यह याद करना ही काफी होगा कि इसे साफ करने के उपकरण-झाड़ू को एक नई पार्टी ने अपना चुनाव चिन्ह बनाया, और सत्ता भी प्राप्त कर ली, वहीं वहीं देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी झाड़ू को न केवल अपने वरन देश के अलग-अलग क्षेत्रों के शीर्ष नवरत्नों के हाथ में भी थमा दिया। और तीसरी ओर सर्वोच्च न्यायालय को टिप्पणी करनी पड़ी कि केंद्र सरकार (पूरा देश भी उसमें समाहित है) सफाई के मामले में ‘कुंभकर्णी” नींद सोया हुआ है।

झाड़ू को हाथ में उठाना आसान काम नहीं होता। हम केवल वहीं झाड़ू हाथ में लेकर सफाई कर सकते हैं, जिसे हम नितांत अपना मानते हैं। बहुधा हम अपने घर पर झाड़ू लगाते हैं, और कभी-कभार अपने घर के बाहर आसपास की गंदगी पर भी झाड़ू लगाते हैं। लेकिन ऐसा बहुत कठिन होता है कि हम सड़क की भी सफाई करने लगें। सड़कों की सफाई का जिम्मा हमने नगर निकायों, और वहां भी एक वर्ग के कर्मचारियों को देकर अपना पल्ला झाड़ लिया है। हम खुद अपने हिस्से की सफाई नहीं करते, इसलिए हमने उनका काम बहुत बढ़ा दिया है। इस सवाल को अगर गहराई से समझें तो मानना पड़ेगा कि हम वहीं सफाई करते हैं, जिसे बिलकुल अपना और घर सरीखा मानते हैं। गांवों से शहर में आए लोगों में अपने घर के आसपास की सफाई का भाव कम ही दिखाई देता है। मानना पड़ेगा कि हम किसी स्थान की सफाई तभी कर सकते हैं, जब उस स्थान को अपना घर समझें। प्रधानमंत्री की इस पहल का सीधा लाभ तो देश को साफ करने में होगा ही, इसका परोक्ष लाभ यह भी होगा कि हम अपने घर व परिवेश से बाहर निकलकर अपने शहर, अपने राज्य और अपने देश को भी अपने घर की तरह मान पाएंगे, और कहीं भी गंदगी न करने को प्रेरित होंगे। इससे देश के लोगों में अपनेपन का भाव जागेगा तथा वह आपस में और मजबूती से जुड़ पाएंगे।
इसलिए यदि कुछ लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर ‘स्वच्छ भारत अभियान” में जुड़ रहे हैं, और यहां तक कि केवल अखबारों, मीडिया में फोटो खिंचवाने के लिए भी हाथों में झाड़ू थाम रहे हैं तो यह भी स्वागत योग्य कदम ही कहा जाएगा। कम से इससे कुछ लोग, और खासकर बच्चे और युवा पीढ़ी तो अपने परिवेश को स्वच्छ रखने, कूड़े को इधर-उधर न फैलाने व सही स्थान पर ही डालने को तो प्रेरित होंगे।

सफाई कर्मियों की समस्या:

आंकड़े गवाह हैं कि देश भर में २७ लाख सफाई कर्मचारी हैं। इनमें से ७.७ लाख सफाई कर्मचारी ही सरकारी तौर पर नियुक्त हैं, और करीब २० लाख यानी ८५ फीसदी कर्मचारी ठेके पर काम करते हैं। १३ लाख कर्मचारी आज भी मल-मूत्र साफ करते हैं। ६० फीसदी सफाई कर्मी कलेरा, अस्थमा, मलेरिया और कैंसर से पीडित हैं, और उनमें से ९० फीसदी कर्मियों की मौत ६० की उम्र से पहले ही हो जाती है, और देश में हर घंटे आठ सफाई कर्मचारियों की बुरी जीवन स्थिति की वजह से मौत हो जाती है। सफाई कर्मी की औसतन कमाई ३ से ५ हजार रुपए महीना है। देश में वाल्मीकि समाज की १२०० बस्तियां सुविधारहित नहीं है।

देश में शौचालयों की स्थिति:

एक अनुमान के अनुसार भारत में खुले में शौच की दर विश्व की ६० प्रतिशत है। २०११ की जनगणना के अनुसार शहरी क्षेत्रों में करीब १८ प्रतिशत परिवारों में स्वच्छता की पहुंच नहीं है। केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय के अनुमान के अनुसार शहरों की गैर अधिसूचित मलिन बस्तियों के ५१ प्रतिशत घरों में आज भी शौचालय नहीं है। वहीं केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के अनुसार भारत के आठ हजार कस्बों में से केवल १६० में ही सीवेज सिस्टम और सीवेज उपचार संयंत्र उपलब्ध हैं, और उनमें केवल १३ प्रतिशत सीवेज का ही उपचार किया जाता है। इनमें भी ४० प्रतिशत क्षमता देश के केवल दो बड़े शहरों-दिल्ली और मुंबई में ही उपलब्ध है। इसके अलावा एनएफएचएस ३, २००५-०६ के अनुसार भारत में १७ प्रतिशत शहरी परिवारों के घरों में किसी भी प्रकार का शौचालय नहीं थे। २४ प्रतिशत परिवार शौचालय साझा कर रहे थे और १९ प्रतिशत घरों के शौचालय नालियों में खुलते थे, साथ ही पांच प्रतिशत शौचालय में ‘फ्लश” व ‘सेप्टिक टेंक” या गड्ढा नहीं था जिसका अर्थ है कि यहां से निकलने वाला मानव मल भी बिना उपचार के भूमि पर और जल स्रोतों में बहाया जा रहा था। केवल २७.६ प्रतिशत घरों के शौचालय ही सेप्टिक टेंक और ६.१ प्रतिशत में गड्ढे का इस्तेमाल किया गया था। वहीं २०११ की जनगणना के अनुसार केवल ३२.७ प्रतिशत शहरी परिवार ही पाइप लाइन वाली सीवर प्रणाली से जुड़े हैं, जबकि ३८.२ प्रतिशत परिवार अपने मल का निपटारा सेप्टिक टैंक और ७ प्रतिशत गड्ढा शौचालयों में करते हैं। लगभग ५० लाख गड्ढा शौचालयों में कोई स्लैब नहीं है या खुले गड्ढे हैं। इनके अलावा जो १३ लाख सेवा शौचालय हैं, उनमें से भी नौ लाख का अपशिष्ट सीधे नालियों में गिरता है, तथा दो लाख शौचालयों का मानव मल अभी भी अवैध रूप से इंसानों द्वारा उठाया जाता है, और १.८ लाख शौचालय पशुओं द्वारा सेवित है। यानी इस दौरान के पांच-छह वर्षों में कोई खास बढ़ोत्तरी नहीं हुई।

नदियों में गंदगी की समस्या:

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एक अध्ययन के अनुसार देश भर के ९०० से अधिक शहरों और कस्बों का ७० फीसदी गंदा पानी पेयजल के लिए उपयोग की जाने वाले नदियों में बिना शोधन के ही छोड़ दिया जाता है। सर्वाधिक पूज्य धार्मिक नदियों मोक्षदायिनी राष्ट्रीय नदी गंगा और यमुना को प्रदूषण मुक्त करने के लिए अब तक करीब १५ अरब रुपये खर्च किए जा चुके हैं, फिर भी उनकी हालत २० साल पहले से ज्यादा बदतर है। वर्ष २००८ तक के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, शहर और कस्बे ३८,२५४ एमएलडी (मिलियन लीटर प्रतिदिन) गंदा पानी छोड़ते हैं, इससे देश की ७० फीसदी नदियां प्रदूषित हो गई हैं। जबकि ऐसे दूषित पानी के शोधन की क्षमता देश में महज ११,७८७ एमएलडी ही है। देश के कई हिस्सों के भूजल में जल प्रदूषण का प्रमुख तत्व फ्लोराइड भी पाया जाने लगा है, जिसे लगातार पीने से फ्लोरोसिस नाम की बीमारी होती है, और इससे रीढ़ तथा सभी हड्डियां टेढ़ी, खोखली और कमजोर होने लगती हैं।

कूड़े से संबंधित कुछ तथ्य:

नेशनल एनवायरनमेंट इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट नागपुर के अनुसार देश में हर साल ४४ लाख टन खतरनाक कचरा निकल रहा है। इसमें देश के केवल ३६६ शहरों से प्रतिदिन निकलने वाले कूड़े का हिस्सा १८८,५०० टन का है। अकेले दिल्ली शहर में रोजारा ७२०० मीट्रिक टन कूड़ा निकलता है। देश का हर व्यक्ति प्रतिदिन ५०० ग्राम कूड़ा हर रोज उत्पन्न करता है। इनमें से आधे से अधिक कागज, लकड़ी वगैरह, जबकि २२ फीसदी घरेलू गंदगी होती है। इसमें भी सबसे बड़ा खतरा ई-कूड़े यानी बैटरियों, कंप्यूटरों व मोबाइलों आदि का है, जिनमें पारा, कोबाल्ट जैसे अनेक जहरीले तत्व होते हैं। इसके अलावा एक अलग तरह का बड़ा खतरा मेडिकल कचरे का भी है। इसमें से अधिकांश प्लास्टिक जैसी सामग्री गलती या सड़ती नहीं हैं, और जमीन में जज्ब होकर मिट्टी की गुणवत्ता को प्रभावित करने और भूगर्भ जल को जहरीला बनाने का काम करती हैं।

इस साल इंसानों से ज्यादा हो जाएंगे मोबाइल फोन

इस साल के अंत तक दुनियाभर में मोबाइल फोनों की संख्या मनुष्य की कुल आबादी से ज्यादा हो जाएगी। इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशन यूनियन के हालिया सर्वेक्षण के मुताबिक वर्ष 2014 के अंत तक दुनियाभर में मोबाइल फोन की संख्या छह अरब से बढ़कर 7.3 अरब हो जाएगी जबकि दुनिया की कुल आबादी सात अरब है। सौ से अधिक देशों में मोबाइल फोन की संख्या कुल आबादी से ज्यादा है। रूस में 25 करोड़ मोबाइल फोन हैं, जो कुल आबादी से 1.8 गुना ज्यादा हैं। वहीं ब्राजील में कुल 24 करोड़ मोबाइल फोन हैं जो उसकी कुल आबादी से 1.2 गुना ज्यादा है। इसी तरह भारत में 1.2 अरब आबादी के सापेक्ष 90 करोड़ मोबाइल, चीन में 1.3 अरब आबादी के सापेक्ष 1.2 अरब मोबाइल, अमेरिका में 31.7 करोड़ आबादी के सापेक्ष 32 करोड़ मोबाइल तथा पाकिस्तान में 18 करोड़ आबादी के सापेक्ष 14 करोड़ मोबाइल फोन हैं।

गन्दगी की वजह से मौतें:

पूरे देश में 60 प्रतिशत लोग गन्दगी की वजह से ही उत्पन्न इन्फेक्शन यानि संक्रमण और बैक्टीरिया की वजह से बीमार होते हैं। वहीँ डब्ल्यूएचओ के अनुसार अकेले डायरिया से हर साल दुनियाभर में 20 लाख बच्चे मर जाते हैं, जिनमें से हर पांचवां बच्चा भारतीय होता है। लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन के अनुसार, हाथ धोने को आदत में सुधार किया जाए तो 47 प्रतिशत डायरिया कम किया जा सकता है।

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