उत्तराखंड राजकाज : अनियमितताओं की नींव पर खड़ी उत्तराखंड शासन की दूसरी लाइन !


  • Rashtriya Sahara, 15th June 2015, Dehradun Edition
  • प्रोन्नति और सीधी भर्ती तथा बैचों में नियमानुसार सामंजस्य न बना पाने से आपस में लड़-झगड़ रहे हैं पीसीएस अधिकारी
  • प्रदेश सरकार का रवैया भी ढीला-ढाला, अनियमितताओं के तमाम मामले पहुंच गए हैं अदालतों की चौखट पर

नवीन जोशी, नैनीताल। पीसीएस संवर्ग को आईएएस के बाद किसी भी राज्य की शासन व प्रशासनिक व्यवस्था की दूसरी लाइन कहा जाता है, लेकिन इस संवर्ग के अधिकारियों की तैनाती में राज्य बनने के बाद से यानी नींव बनाने से ही लगातार अनियमितताएं बरती गई हैं। खासकर प्रोन्नति और सीधी भर्ती की प्रक्रिया जो साथ-साथ होनी चाहिए, ताकि किसी एक वर्ष के अधिकारियों का बैच एक हो तथा उनमें वरिष्ठता का कोई विवाद न हो और राज्य को बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था मिले। इसके उलट उत्तराखंड में प्रोन्नत और सीधी भर्ती के ही नहीं, एक ही वर्ग के पीसीएस अधिकारियों में भी शासन ने अनियमितताओं की ऐसी चौड़ी खाइयां खोदी हुई हैं कि कई मामले न्यायालयों में चल रहे हैं और अनेक अधिकारी आपस में कोई व्यक्तिगत द्वेष न होने के बावजूद व्यवस्था की बेहद पेचीदा खाइयों के इस और उस पार खड़े हैं। स्थिति यहां तक भयावह है कि अनेक अधिकारी बिना पद तथा संवर्ग में स्वीकृत पदों से भी अधिक पर इस अनिश्चितितता के साथ कार्य कर रहे हैं कि उन्हें आगे कौन सा बैच मिलेगा।

संवर्ग से जुड़े अधिकारियों की मानें तो उत्तराखंड राज्य बनने के बाद से ही लगातार इस संवर्ग में सीधी भर्ती व प्रोन्नति के 40-40 पदों के लिए नियुक्तियों में भारी अनियमितता हुई हैं। पहली बार 2002 में पीसीएस संवर्ग में सीधी भर्ती से 20 पद भरने की प्रक्रिया शुरू हुई, जबकि नियमावली के अनुसार इसी दौरान पदोन्नतियों के जरिए भी पदों पर भर्ती की जानी थीं, लेकिन नहीं की गई। इस पर प्रोन्नति कोटे के कुछ अधिकारियों ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय में उनकी अनदेखी किये जाने का आरोप लगाते हुए याचिका दायर कर दी और इसके साथ ही शासन की एक चूक से प्रोन्नति और सीधी भर्ती के अधिकारियों के बीच विवादों का बीज भी पड़ गया। इस पर सरकार ने फरवरी 2004 में पदोन्नति से पदों को भरने की प्रक्रिया शुरू की तथा रेगुलर के बजाय एडहॉक आधार पर उनकी पदोन्नतियां कर दीं।दूसरी ओर 2002 के अध्याचन से सीधी भर्ती से आये 20 अधिकारियों का 2005 में अंतिम चयन हुआ, लेकिन उन्हें 2002 की वरिष्ठता देकर तथा बाद में पदोन्नति कोटे से आए अधिकारियों को 2007 में एडहॉक से रेगुलर कर 2007 का बैच देकर कनिष्ठ बना दिया गया, और इसके साथ ही राज्य में प्रोन्नति व सीधी भर्ती के अधिकारियों में वरिष्ठता की लड़ाई भी शुरू हो गई कि कौन पुराने हैं तथा वरिष्ठ हैं। इस पर मामला सर्वोच्च न्यायालय तक चला गया।सर्वोच्च न्यायालय ने प्रोन्नति व पदोन्नति से आए अधिकारियों की वरिष्ठता को दुबारा से आगणित करने को कहा। इस पर पता चला कि वर्ष 2002 में जिन पदों पर सीधी भर्ती की गई थी, वह पद ही उपलब्ध नहीं थे। इस पर वर्ष 2004 में 15 और 2006 में पांच पदों पर सीधी भर्ती के अध्याचन भेजे गए। वर्ष 2004 की भर्ती प्रक्रिया वर्ष 2009 व 2006 की 2010 में पूरी हुई। वर्ष 2010 में पुन: 16 पदों का अध्याचन भेजा गया। इसके बाद भी लगातार मामले हाईकोर्ट में जाते रहे और सरकार लगातार अपनी गलतियों को छुपाती-बचाती हुई अधिकारियों के भविष्य से खेलती रही है। ताजा स्थिति यह है कि राज्य में पीसीएस अधिकारियों के लिए एसडीएम व एडीएम स्तर के 80 पद हैं, जिनमें से 54 सीधी भर्ती से तथा 52 पदोन्नतियों से भरे गए हैं। वहीं 23 मूल रूप से तहसीलदारों को भी पिछले वर्षो में आई दैवीय आपदा के दौरान काम लेने के लिए एसडीएम का कार्य दिया गया है यानी 80 पदों पर 49 लोग अतिरिक्त यानी 129 लोग कार्यरत हैं, बावजूद 16 के लिए और सीधी भर्ती की प्रक्रिया चल रही है। इनमें से 32 के लिए उच्च पद सृजित कर दिये गए हैं। ऐसी स्थितियों में हालिया 2010 के अध्याचन से सीधी भर्ती से आए पीसीएस अधिकारी बेचैन हैं। उन्हें पता नहीं है कि उन्हें कौन से बैच दिया जाएगा। चिंता का कारण है कि पदोन्नति कोटे के अधिकारी जो पहले से उच्च पदों पर कार्य कर रहे हैं, वरिष्ठता के लिए उनका दावा लगातार मजबूत होता जा रहा है, जबकि आगे नए बैच के लिए सीधी भर्ती की प्रक्रिया चल रही है। उन्हें कितने समय प्रशिक्षण दिया जाएगा, यह भी तय नहीं है। चिंता इस बात की भी है कि प्रशिक्षण जितना लंबा चलेगा, उनका बैच निर्धारण उतना ही पीछे का किया जाएगा। फिलहाल, शासन यदि जल्द कोई निर्णय ना ले तो मामला और गंभीर तथा अधिकारियों के बीच सरेआम सिर-फुटौव्वल तक भी चला जाए तो आश्चर्य न होगा।

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