नैनीताल स्वच्छता दिवसः हम देर से जागे और जल्दी सो गए…


1880 Landslide Nainital rare photo

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-नैनीताल में रुक गया पर यहां की प्रेरणा से अजमेर, गाजियाबाद सहित कई शहरों में आगे बढ़ा ‘माई क्लीन इंडिया’ अभियान
-ऑस्ट्रेलियाई नागरिक रैम्को वान सान्टेन ने वर्ष 2007 में शुरू की थी ‘माई क्लीन कम्युनिटी’ मुहिम

नैनीताल को शायद इसी लिए ठंडी तासीर वाला शहर कहा जाता है। यहां लोग देर से जागते हैं और जल्दी सो जाते हैं। 18 सितंबर 1880 को केवल ढाई हजार की जनसंख्या वाले शहर की 151 जिंदगियों को जिंदा दफन करने वाले महाविनाशकारी भूस्खलन के बाद 2007 में शहर के लोग एक ऑस्ट्रेलियाई नागरिक रैम्को वान सान्टेन के जगाने पर जागे थे, और उनकी ऑस्ट्रेलिया में शुरू की गई ‘माई क्लीन कम्युनिटी’ मुहिम से बेहद गर्मजोशी से जुड़े थे। नैनीताल से ‘माई क्लीन नैनीताल’ के रूप में शुरू हुई यह मुहिम नैनीताल में तो वर्ष-दर-वर्ष धीमी पड़ती हुई इस वर्ष दम ही तोड़ गई, जबकि देश के अजमेर, गाजियाबाद, मेरठ, लखनऊ, इलाहाबाद व आगरा आदि नगरों में यह मुहिम ‘माई क्लीन इंडिया’ बनती जा रही है।

सबसे पहले जान लें कि रैम्को कौन थे। रैम्को ऑस्ट्रेलिया के स्कारबौरौ शहर के रहने वाले सेवानिवृत्त कैमिकल इंजीनियर तथा बीएससी, बीईसी व एमबीए डिग्री प्राप्त व्यक्ति थे। वह सर्वप्रथम वर्ष 2004 में भारत और नैनीताल आये तो यहां की खूबसूरती के कायल हो गये। उनके मन में एक कसक उठी कि इस शहर को और अधिक साफ-स्वच्छ बनाया जाये। इसी कसक को साथ लेकर वापस ऑस्ट्रेलिया लौटे तो मन के भीतर से आवाज आई कि पहले अपना घर साफ करो, तब दूसरों का करने की सोचो। बस क्या था। ‘माई क्लीन कम्युनिटी’ नाम की संस्था बनाकर अपने शहर को सामुदायिक सहभागिता के जरिये साफ करने का बीड़ा उठा लिया। इसके बाद वर्ष 2007 में नैनीताल लौटे और यहां के लोगों को भी इसी तरह से सफाई के लिये जगाया। 18 सितंबर 1880 यानी नैनीताल के महाविनाशकारी भूस्खलन के दिन को हर वर्ष ‘नैनीताल स्वच्छता दिवस’ मनाना तय हुआ। लोग काफी हद तक सफाई के प्रति जागे भी, और यह आरोप भी लगा कि जब कोई विदेशी आकर ही इस विदेशियों के बसाए शहर के वासियों को उनके घर की समस्याओं का समाधान बताता है, तभी वह देर से जागते हैं, और फिर जल्दी सो भी जाते हैं। हुआ भी यही। वर्ष दर वर्ष अभियान धीमा पड़ने लगा। अलबत्ता, वर्ष भर सोने के बाद 18 सितंबर को पिछले वर्ष तक सांकेतिक सफाई अभियान होने लगे, अभियान से कुछ दिन पूर्व नगर पालिका की अगुवाई में समाजसेवी व वरिष्ठ पत्रकार राजीव लोचन साह, उमेश तिवाड़ी ‘विश्वास’ व दिनेश डंडरियाल आदि लोग स्कूली बच्चों को जागरूक करते, जबकि 18 सितंबर के कार्यक्रम में अधिकांश लोगों की भूमिका मीडिया में फोटो खिंचवाने तक सीमित रहती। लेकिन इधर अपनी मेहनत का सिला न मिलने से बीते वर्ष से इन लोगों का होंसला भी टूटने लगा था। पिछले वर्ष श्री साह ने कह ही दिया था कि अब आगे की पीढ़ी यह दायित्व संभाले। इस पर ‘नैनीताल बचाओ अभियान’ से जुड़े कुछ युवा आगे आए थे, लेकिन इस वर्ष वह भी कुछ स्कूलों में जागरूकता फैलाने तक सीमित रहे। इस वर्ष श्री साह ने नगर पालिका को यह दायित्व संभालने के लिए लंबा-चौड़ा पत्र भी लिखा था, लेकिन कुछ नहीं हुआ। इस 18 सितंबर के ‘नैनीताल स्वच्छता दिवस’ व ‘नैनीताल दिवस’ तक कहे गए दिन को पूरा शहर भूल गया। सांकेतिक सफाई भी नहीं की गई। कहीं एक पत्ता तक किसी ने उठाने की जहमत नहीं उठाई, और अपनी ‘देर से जागने और जल्दी सोने’ की ‘ठंडी’ फितरत सच साबित कर दी।

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