अंग्रेजों के आगमन (1815) से ही अपना अलग अस्तित्व तलाशने लगा था उत्तराखंड


-अंग्रेजी हुकूमत के दौर में भी थी अस्तित्व की तलाश
-सिगौली की संधि में किया गया था उत्तराखंड को अपने परंपरागत कानूनों के साथ अलग इकाई के रूप में माने जाने की शर्त
-1897 में महारानी बिक्टोरिया के समक्ष भी उठाई गई थी मांग, 1916 से 1994 तक जलती रही राज्य आंदोलन की अलख 

नवीन जोशी, नैनीताल। नौ नवंबर 2000 को देश के 27वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आए उत्तराखंड राज्य का गठन बहुत लंबे संघर्ष और बलिदानों के फलस्वरूप हुआ। क्षेत्रीय जनता ने अंग्रेजों को 1815 में सिगौली की संधि के साथ इसी शर्त के साथ अपनी जमीन पर पांव रखने दिये थे कि वह उनके परंपरागत कानूनों के साथ उन्हें अलग इकाई के रूप में रखेंगे। जून 1897 में रानी विक्टोरिया को शर्तें याद दिलाते हुए लोगों ने स्वयं को अलग रखने को प्रत्यावेदन भी भेजा था।

1916 में कुमाऊं परिषद की स्थापना, 27 नवम्बर 1923 को संयुक्त प्रांत के गवर्नर को ज्ञापन देकर पूर्व की तरह अलग इकाई बनाए रखने की मांग की। 1940 में कांग्रेस के हल्द्वानी सम्मेलन में पर्वतीय क्षेत्र को विशेष दर्जा देने तथा कुमाऊं-गढ़वाल को पृथक इकाई के रूप में गठित करने और 1954 में विधान परिषद के सदस्य इंद्र सिंह नयाल द्वारा यूपी विधान परिषद में पर्वतीय क्षेत्र के लिए अलग से विकास योजना बनाने की मांग रखने, 1952 में सीपीआई नेता कामरेड पीसी जोशी ने अलग राज्य की मांग उठाई। ब्रिटिश कुमाऊं के पहले कमिश्नर बने ई गार्डनर के बीच 27 अप्रैल 1815 को हुई शुगौली की संधि में इस भूभाग को अलग प्रशासनिक अधिकार दिये जाने की शर्त रखी गई थी, जिसे अलग पटवारी व्यवस्था जैसे कुछ प्रावधानों के साथ कुछ हद तक मानते हुए अंग्रेजी दौर से ही प्रशासनिक व्यवस्था उनके हक-हकूकों पर पाबंदी लगाती रही। इसी कारण कभी यहां विश्व को वनों के संरक्षण का संदेश देने वाला ‘मैती आंदोलन’ तो कभी देश को नया वन अधिनियम देने वाला ‘वनांदोलन’ लड़ा गया। सितम्बर 1916 में बाद में स्वतंत्र भारत के दूसरे गृह मंत्री बने गोविन्द बल्लभ पंत, ‘कुमाऊं केसरी’ बद्रीदत्त पांडे, हरगोविंद पंत, इंद्र लाल साह, मोहन सिंह दड़मवाल, चन्द्र लाल साह, प्रेम बल्लभ पांडे, भोला दत्त पांडे व लक्ष्मीदत्त शास्त्री आदि के द्वारा ‘कुमाऊं परिषद्’ की स्थापना की गई, जो कि 1926 में स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने के लिए कांग्रेस में समाहित हो गई। आगे वर्ष 1940 में कांग्रेस के हल्द्वानी सम्मेलन में बद्री दत्त पांडे ने पर्वतीय क्षेत्र को विशेष दर्जा तथा अनुसूया प्रसाद बहुगुणा ने कुमाऊं-गढ़वाल को पृथक इकाई के रूप में गठन करने की मांगें रखीं। 1954 में विधान परिषद के सदस्य इंद्र सिंह नयाल (वर्तमान कुमाऊं आयुक्त अवनेंद्र सिंह नयाल के पिता) ने यूपी के मुख्यमंत्री बने गोविंद बल्लभ पंत के समक्ष विधान परिषद में पर्वतीय क्षेत्र के लिए पृथक विकास योजना बनाने का प्रस्ताव रखा, जिसके फलस्वरूप 1955 में फजल अली आयोग ने पर्वतीय क्षेत्र को अलग राज्य के रूप में गठित करने की संस्तुति की। वर्ष 1973 से यूपी में उत्तराखंडवासियों को कुछ दिलासा देने को पर्वतीय विकास विभाग का गठन कर दिया गया, लेकिन बात नहीं बनी। 24 जुलाई 1979 को पृथक राज्य के गठन के लिए मसूरी में अंतरराष्ट्रीय स्तर के भौतिकी वैज्ञानिक एवं गांधीवादी विचारक कुमाऊं विवि के कुलपति डा. डीडी पंत की अगुवाई में हुई बुद्धिजीवियों की बैठक में उत्तराखंड क्रांति दल नाम से राजनीतिक दल का गठन किया गया। नवम्बर 1987 में पृथक राज्य के गठन के लिए नई दिल्ली में प्रदर्शन हुआ और राष्ट्रपति को ज्ञापन भेजकर हरिद्वार को भी प्रस्तावित राज्य में सम्मिलित करने की मांग की गई। आगे 1994 में यूपी में अन्य पिछड़ी जातियों को 27 फीसद आरक्षण देने के विरोध में सुलगे आरक्षण आंदोलन की चिनगारी राज्य आंदोलन की मशाल बन उठी। इस आंदोलन के छह वर्ष बाद उत्तराखंड राज्य का गठन किया गया। राज्य गठन के बाद इन 14 वर्षो में प्रदेश अपनी स्थायी राजधानी भी तय नहीं कर पाया। कुछ हुआ तो पहाड़, मैदान के बीच की खाई और अधिक चौड़ी हुई। सारे उद्योग-धंधे, बड़े शैक्षणिक संस्थान, अस्पताल मैदानी भाग में ही अटक गए। शिक्षक-डॉक्टर भी पहाड़ नहीं चढ़ पाए और पहाड़ यूपी की तरह ही मैदानों को देखता और खुद भी पानी और जवानी के साथ पलायन कर उसमें समाता चला गया, और नए परिसीमन से राज्य विधानसभा में उसकी भागेदारी भी घटकर निष्प्रभावी हो गई।

राज्य आंदोलन में कुमाऊं के शहीद

नैनीताल। एक सितम्बर 1994 का दिन राज्य आंदोलन का पहला शहीदी दिवस साबित हुआ। इस दिन खटीमा में शांतिपूर्वक आंदोलन कर रहे आंदोलनकारियों पर यूपी पुलिस द्वारा चलाई गई गोलियों से भगवान सिंह सिरौला, प्रताप सिंह, सलीम अहमद, गोपीचन्द, धर्मानन्द भट्ट, परमजीत सिंह, रामपाल शहीद हुए, वहीं दो अक्टूबर 1994 को रामपुर तिराहा व मुजफ्फरनगर के काले कांडों के विरोध में अगले दिन यानी तीन अक्टूबर को हो रहे प्रदर्शन के दौरान नैनीताल में एक 33 वर्षीय होटलकर्मी प्रताप सिंह शहीद हुए।

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