सूर्य पर ‘महाविस्फोट’ का खतरा, उभरा 10 लाख किमी व्यास का ‘सौर कलंक’


राष्ट्रीय सहारा, 10 फ़रवरी 2015,पेज-1

एक साथ उभरे हैं चार बड़े सौर कलंक, पृथ्वी के उपग्रह और संचार प्रणाली पर पड़ सकते हैं दुष्प्रभाव सूर्य पर बनी ‘सौर सुनामी’ और इससे पृथ्वी और इसके उपग्रहों को नुकसान की आशंका से वैज्ञानिक चिंतित

नवीन जोशी नैनीताल। दक्षिणायन से उत्तरायण में आये सूर्य पर एक साथ चार बड़े सौर कलंक (सन स्पॉट) उभर आए हैं। इनमें लगातार ‘एम-श्रेणी’ की सौर भभूकाएं (ज्वालाएं) निकल रही हैं और वैज्ञानिक अगले एक-दो दिनों में ‘एक्स-श्रेणी’ की सौर भभूकाओं के साथ सूर्य पर ‘महाविस्फोट’ होने जैसा अंदेशा जता रहे हैं। परेशानी की बात यह भी है कि सूर्य के दक्षिण पश्चिमी गोलार्ध में करीब आठ से 10 लाख किमी यानी पृथ्वी से चंद्रमा के बीच की दूरी के मुकाबले दो से ढाई गुना और पृथ्वी के व्यास के मुकाबले 62 से 78 गुना बड़ा सौर कलंक बन गया है, जो यदि असंतुलित हुआ तो इससे पृथ्वी तक भी प्रभाव पड़ सकता है। खासकर धरती से भेजे गए कृत्रिम उपग्रहों एवं धरती पर मौजूद संचार पण्राली को बड़ा नुकसान हो सकता है।

उल्लेखनीय है कि सूर्य हमारे सौरमंडल की सबसे महत्वपूर्ण धुरी है, जिस पर उत्तरी व दक्षिणी ध्रुवों के बीच चुंबकीय तूफान चलते हैं। यही चुंबकीय तूफान वास्तव में सूर्य के इतनी अधिक ऊष्मा के साथ धधकने के मुख्य कारक हैं। इससे पृथ्वी सहित सौरमंडल के अन्य ग्रह भी ऊष्मा प्रकाश व जीवन प्राप्त करते हैं, मगर कहते हैं कि एक सीमा से अधिक हर चीज खतरनाक साबित होती है। ऐसा ही सूर्य पर चुंबकीय तूफानों के एक सीमा से अधिक बढ़ने पर भी होता है। चुंबकीय तूफान सूर्य पर पहले असीम अग्नि की लपटों युक्त सन स्पॉट यानी सौर कलंक उत्पन्न करते हैं, जिन्हें सोलर फ्लेयर या सौर भभूका कहा जाता है। सूर्य पर सौर भभूका 11 वर्ष के चक्र में घटती-बढ़ती या शांत रहती हैं, जिसे सोलर साइकिल या सौर चक्र कहा जाता है। खगोल वैज्ञानिकों की गणना के अनुसार वर्तमान में वर्ष 2008 से 24वां सौर चक्र चल रहा है, जिसका चरम यानी ‘सोलर मैक्सिमम’ 2012-13 में था और वर्तमान में सौर चक्र अपने ढलान (डिके पीरियड) की ओर है, मगर इधर बीते कुछ दिनों से सूर्य पर एक साथ चार बड़े सौर कलंक उभर आए हैं। स्थानीय आर्य भट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान के निदेशक एवं वरिष्ठ सौर वैज्ञानिक डॉ. वहाबउद्दीन ने बताया कि सूर्य के दक्षिण पश्चिमी गोलार्ध में 8-10 लाख किमी क्षेत्र में फैला और दक्षिण पूर्वी गोलार्ध में बहुत बड़ा चुंबकीय क्षेत्र बना है, जिसके असंतुलित होने पर एक्स श्रेणी की बड़ी सौर ज्वालाओं के साथ ‘महाविस्फोट’ जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थितियां विरले ही बनती हैं। हालांकि उन्होंने जोड़ा कि दुनिया भर के वैज्ञानिक सतर्क हैं, लिहाजा आमजन को फिलहाल इससे डरना नहीं चाहिए। उन्होंने बताया कि वर्ष 2003 में आए अब तक के बड़े सौर कलंक भी पिछले सौर सक्रियता चक्र के ढलान के दौर में ही उभरे थे।

सूर्य पर भी मनाई गई ‘बड़ी दिवाली’, उभरा पृथ्वी से 14 गुना बड़ा ‘सौर कलंक’

23.10.14 की सुबह खेड़ा गौलापार से सूर्य पर नजर आए सौर कलंक का दृश्य (फोटो एक्सक्लूसिव नवीन जोशी)।
23.10.14 की सुबह खेड़ा गौलापार से सूर्य पर नजर आए सौर कलंक का दृश्य (फोटो एक्सक्लूसिव नवीन जोशी)।

-पृथ्वी की ओर है मुंह, सूर्य पर बनी ‘सौर सूनामी” और इससे पृथ्वी और इसके उपग्रहों को नुकसान की आशंका से वैज्ञानिक चिंतित
-पिछले 25 वर्षों का सबसे बड़ा सौर कलंक बताया जा रहा
– सूर्य भी मना रहा दिवाली, एक्स क्लास के दो सौर भभूका निकली, अगले चार-पांच दिन हो सकते हैं महत्वपूर्ण
नवीन जोशी, नैनीताल। यहां भारत में मनाई जा रही दीपावली की तरह ही सूर्य देव पर बहुत ‘बड़ी दीपावली” चल रही है। सूर्य पर पृथ्वी के आकार से करीब 14 गुना बड़े आकार का सौर कलंक (सन स्पॉट) उभरा हुआ है। इसे पिछले २५ वर्षों में सबसे बड़ा सौर कलंक बताया जा रहा है। यह सौर कलंक इतने बड़े आकार का है कि इसे पृथ्वी से सुबह और शाम के वक्त सूर्य के दक्षिण पूर्वी किनारे पर खुली आंखों से देखा जा सकता है। मैं भी 22 अक्टूबर की शाम और 23 की सुबह अपने घर खेड़ा, गौलापार (हल्द्वानी) से अपने कैमरे से इसकी फोटो लेने में सफल रहा। पृथ्वी के लिए खतरे की बात यह है कि इस सौर कलंक का मुंह पृथ्वी की ओर है, और इस पर सबसे बड़ी ‘एक्स क्लास” की दो सौर भभूका (सोलर फ्लेयर) हैं, तथा अगले चार-पांच दिनों तक और बड़ी सौर भभूकाओं के निकलने और यहां तक की इनके बढ़ने पर सौर तूफानों और 2003 जैसी ‘सौर सूनामी” की हद तक जा सकते हैं। ऐसा हुआ तो इससे पृथ्वी से अंतरिक्ष में भेजे गए कृत्रिम उपग्रह तथा पृथ्वी पर संचार सुविधाएं तहस-नहस होने तक का खतरा हो सकता है।

Rashtriya Sahara News-25.10.2014

जान लें कि सूर्य हमारे सौरमंडल की सबसे महत्वपूर्ण धुरी है, जिस पर उत्तरी व दक्षिणी ध्रुवों के बीच चुंबकीय तूफान चलते हैं। यही चुंबकीय तूफान वास्तव में सूर्य के इतनी अधिक ऊष्मा के साथ धधकने के मुख्य कारक हैं, जिससे पृथ्वी सहित सौरमंडल के अन्य ग्रह भी ऊष्मा, प्रकाश एवं जीवन प्राप्त करते हैं। लेकिन कहते हैं कि एक सीमा से अधिक हर चीज खतरनाक साबित होती है। ऐसा ही सूर्य पर चुंबकीय तूफानों के एक सीमा से अधिक बढ़ने पर भी होता है। चुंबकीय तूफान सूर्य पर पहले सन स्पॉट यानी सौर कलंक उत्पन्न करते हैं, इन्हें सामान्यतया बड़ी सौर दूरबीनों के माध्यम से ही काले बिंदुओं के आकार में देखा जाता है। सौर कलंक सूर्य पर असीम अग्नि की लपटें उत्पन्न करते हैं, इन्हें सोलर फ्लेयर या सौर भभूका कहते हैं। सूर्य पर सौर भभूका 11 वर्ष के चक्र में घटती-बढ़ती या शांत रहती हैं, जिसे सोलर साइकिल या सौर चक्र कहा जाता है। खगोल वैज्ञानिकों की गणना के अनुसार वर्तमान में वर्ष 2008 से 24वां सौर चक्र चल रहा है, जिसका चरम यानी ‘सोलर मैक्सिमम” 2012-13 में था। इसके बाद वर्तमान सौर चक्र अपने ढलान (डिके पीरियड) की ओर है, लेकिन इधर वैज्ञानिकों के अनुसार बीती 17 अक्टूबर से सूर्य पर एक बड़ा सौर कलंक बनना शुरू हुआ। तब यह सूर्य के पृथ्वी से दिखने के लिहाज से पीछे की ओर था। 18 से यह पृथ्वी की ओर आया, तब तक इसका आकार अपेक्षाकृत छोटा ही था। 19 और 22 अक्टूबर को इस पर बड़ी एक्स-1.8 श्रेणी की दो सौर भभूका प्रकट हुर्इं। इसके अलावा भी इस बीच सूर्य पर इस सौर कलंक से सी-श्रेणी की 27 और एम-श्रेणी की नौ सौर भभूका निकल चुकी हैं। शुक्रवार को भी इस पर सौर भभूकाओं का निकलना जारी रहा। स्थानीय आर्य भट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान के निदेशक एवं वरिष्ठ सौर वैज्ञानिक डा. वहाब उद्दीन ने बताया कि इस सौर कलंक का आकार पृथ्वी से करीब नौ गुना बड़ा है, और इससे अगले चार-पांच दिनों तक बड़े सौर तूफान आने की आशंका बनी हुई है। बताया कि वर्ष 2003 में आए अब तक के बड़े सौर कलंक भी पिछले सौर सक्रियता चक्र के ढलान के दौर में ही उभरे थे। उन्होंने खुलासा किया कि बीती 22 की रात्रि सूर्य पर उभरी सौर भभूका ने 23 को पृथ्वी पर पहुंचकर कुछ पलों के लिए यहां संचार तंत्र को प्रभावित भी किया था। उत्तरी अमेरिका में कल 23 अक्टूबर के दिन लगे सूर्य ग्रहण के दौरान भी इसके चित्र लिए गए हैं।

कितना बड़ा हो सकता है नुकसान

नैनीताल। वैज्ञानिकों के अनुसार एक सौर कलंक में सामान्य सूर्य के मुकाबले तीन से चार हजार गुना तक चुंबकीय क्षेत्र हो सकता है। इसकी इकाई गौज कही जाती है। यहां बता दें कि सामान्य सूर्य का चुंबकीय क्षेत्र एक गौज तथा पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र महज आधा गौज होता है। यह चुंबकीय क्षेत्र ही छह हजार डिग्री सेल्सियस से अधिक गर्म सूर्य पर बड़ी सौर ज्वालाएें पैदा करता है, जिन्हें कि एक अंग्रेजी फिल्म में सौर सूनामी नाम दे दिया गया है। इनके कारण वर्ष 1859 में अमेरिका व यूरोप में आग लगने की अनेक घटनाएें हुई थीं, और टेलीग्राफ के तार शार्ट कर गऐ थे। ध्रुवीय देशों रूस, नार्वे के साथ फिनलेंड व कनाडा में पावर ग्रिड फेल होने से विद्युत आपूर्ति ओर कृत्रिम उपग्रह डगमगा जाने से संचार व्यवस्था ध्वस्त हो गई थी। डा. वहाबउद्दीन के अनुसार इसी कारण वर्ष 1989 में नासा का सोलर मैक्सिमम मिशन व कोदाना उपग्रह तथा 1976 में स्काई लैब उपग्रह नष्ट हो गऐ थे। इससे अधिक ऊंचाई पर उड़ने वाले हवाई जहाजों के साथ ही मानव स्वास्थ्य पर भी प्रभाव पड़ता है, व जीपीएस सिस्टम भी गड़बड़ा जाता है। इसलिए इन सौर तूफानों के अध्ययन की जरूरत और अधिक बढ़ जाती है। डा. वहाबउद्दीन का कहना है कि सौर तूफानों से कृत्रिम उपग्रहों को बचाने के लिए वैज्ञानिक प्रयासरत हैं।

यह भी पढ़ें : सूर्य पर सौर सुनामी की आशंका बढ़ी

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